गर्मी के मौसम में तेज धूप से बचने की सलाह हर किसी को दी जाती है, क्योंकि इससे सनबर्न, टैनिंग और त्वचा में जलन जैसी समस्याएं हो सकती हैं। लेकिन कुछ लोगों के लिए धूप सिर्फ असुविधा नहीं, बल्कि एक गंभीर त्वचा समस्या का कारण बन जाती है। यदि धूप में निकलते ही आपकी त्वचा पर खुजली, लाल चकत्ते, सूजन या छोटे-छोटे दाने दिखाई देने लगते हैं, तो यह सन एलर्जी (Sun Allergy) का संकेत हो सकता है। त्वचा विशेषज्ञों के अनुसार, सन एलर्जी केवल धूप से होने वाली सामान्य परेशानी नहीं है, बल्कि यह शरीर के इम्यून सिस्टम की सूर्य की पराबैंगनी (UV) किरणों के प्रति असामान्य प्रतिक्रिया होती है। इससे त्वचा में सूजन, रैशेज और अन्य लक्षण विकसित हो सकते हैं। क्या होती है सन एलर्जी? सन एलर्जी ऐसी स्थिति है, जिसमें सूर्य की किरणों के संपर्क में आने के बाद त्वचा जरूरत से ज्यादा प्रतिक्रिया देने लगती है। इसका सबसे सामान्य प्रकार पॉलीमॉर्फस लाइट इरप्शन (Polymorphous Light Eruption) कहलाता है, जिसमें धूप के संपर्क में आने के बाद त्वचा पर खुजली वाले लाल दाने दिखाई देते हैं। सन एलर्जी के प्रमुख प्रकार 1. पॉलीमॉर्फस लाइट इरप्शन (PMLE) यह सन एलर्जी का सबसे आम प्रकार है। इसमें हाथ, गर्दन और छाती जैसे हिस्सों पर खुजली वाले लाल दाने निकल आते हैं। यह समस्या महिलाओं में अपेक्षाकृत अधिक देखी जाती है। 2. एक्टिनिक प्रुरिगो इस स्थिति में त्वचा पर अत्यधिक खुजली वाले दाने हो सकते हैं और यह समस्या लंबे समय तक बनी रह सकती है। 3. फोटोएलर्जिक रिएक्शन कुछ सनस्क्रीन, परफ्यूम या स्किनकेयर उत्पाद धूप के साथ मिलकर त्वचा पर एलर्जी पैदा कर सकते हैं। 4. सोलर अर्टिकेरिया (Sun Hives) यह सन एलर्जी का गंभीर रूप है, जिसमें धूप के संपर्क में आने के कुछ ही मिनटों के भीतर त्वचा पर पित्ती या उभरे हुए खुजलीदार निशान दिखाई देने लगते हैं। 5. दवाओं के कारण होने वाली संवेदनशीलता कुछ एंटीबायोटिक्स, दर्द निवारक दवाएं और मुंहासों के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवाएं त्वचा को धूप के प्रति अधिक संवेदनशील बना सकती हैं। किन लोगों में ज्यादा होता है खतरा? हल्के रंग की त्वचा वाले लोग जिनके परिवार में सन एलर्जी का इतिहास हो कुछ विशेष दवाओं का सेवन करने वाले लोग ऑटोइम्यून बीमारियों से पीड़ित मरीज सन एलर्जी के सामान्य लक्षण धूप में जाने के बाद खुजली होना त्वचा पर लाल चकत्ते या रैशेज सूजन और जलन छोटे दाने या छाले कुछ मामलों में पित्ती (Hives) ये लक्षण मुख्य रूप से चेहरे, गर्दन, हाथों और शरीर के खुले हिस्सों पर दिखाई देते हैं। कब लें डॉक्टर की सलाह? यदि धूप में जाने के बाद बार-बार त्वचा पर रैशेज या एलर्जी की समस्या हो रही है और इससे आपकी रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित हो रही है, तो तुरंत त्वचा रोग विशेषज्ञ से संपर्क करना चाहिए। सही समय पर उपचार और उचित सावधानियों से इस समस्या को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। बचाव के लिए अपनाएं ये उपाय तेज धूप में निकलते समय पूरी बांह के कपड़े पहनें। SPF 30 या उससे अधिक वाला सनस्क्रीन इस्तेमाल करें। दोपहर की तेज धूप से बचें। डॉक्टर की सलाह के बिना दवाओं का सेवन न करें। यदि कोई स्किनकेयर प्रोडक्ट एलर्जी पैदा कर रहा हो, तो उसका इस्तेमाल बंद कर दें। त्वचा पर धूप के कारण होने वाले बदलावों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। समय पर पहचान और सही उपचार से सन एलर्जी के लक्षणों को नियंत्रित किया जा सकता है और त्वचा को लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है।
ग्लोइंग और हेल्दी स्किन के लिए मॉइश्चराइजर को स्किनकेयर रूटीन का सबसे जरूरी हिस्सा माना जाता है। लेकिन अगर वही मॉइश्चराइजर लगाते ही त्वचा में जलन, चुभन या तीखापन महसूस होने लगे, तो यह सामान्य बात नहीं है। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसी स्थिति में आपकी त्वचा किसी गहरी समस्या का संकेत दे रही होती है। मॉइश्चराइजर से जलन क्यों होती है? त्वचा विशेषज्ञों के अनुसार, जब मॉइश्चराइजर लगाने पर जलन महसूस होती है तो इसका सबसे बड़ा कारण स्किन बैरियर का कमजोर या क्षतिग्रस्त होना हो सकता है। स्किन बैरियर त्वचा की बाहरी सुरक्षा परत होती है, जो नमी को बनाए रखने और बाहरी हानिकारक तत्वों को अंदर जाने से रोकने का काम करती है। जब यह सुरक्षा परत कमजोर हो जाती है, तब सामान्य और हल्के उत्पाद भी त्वचा में चुभन या जलन पैदा कर सकते हैं। पहले ठीक लगने वाले उत्पाद अचानक क्यों करने लगते हैं परेशान? स्किन बैरियर खराब होने पर कई ऐसे तत्व भी त्वचा को परेशान कर सकते हैं जो पहले किसी तरह की समस्या नहीं पैदा करते थे। इनमें रेटिनॉल, विटामिन-सी, नियासिनामाइड, लैक्टिक एसिड, एएचए, सुगंध वाले उत्पाद और कुछ केमिकल सनस्क्रीन शामिल हैं। ध्यान देने वाली बात यह है कि ये तत्व अपने आप में खराब नहीं होते, लेकिन संवेदनशील या क्षतिग्रस्त त्वचा पर इनका असर अलग हो सकता है। क्या मॉइश्चराइजर लगाने पर हल्की चुभन सामान्य है? विशेषज्ञ बताते हैं कि बहुत ज्यादा रूखी त्वचा, हाल ही में एक्सफोलिएशन कराने, शेविंग के बाद या त्वचा में पहले से मौजूद जलन की स्थिति में कुछ सेकंड की हल्की झनझनाहट महसूस हो सकती है। हालांकि अगर यह जलन बार-बार हो रही है या लंबे समय तक बनी रहती है, तो इसे सामान्य नहीं माना जाना चाहिए। स्किन बैरियर खराब होने के पीछे ये आदतें हैं जिम्मेदार त्वचा की सुरक्षा परत अचानक नहीं टूटती। कई छोटी-छोटी गलतियां धीरे-धीरे इसे नुकसान पहुंचाती हैं। इनमें शामिल हैं: जरूरत से ज्यादा एक्सफोलिएशन करना एक साथ कई एक्टिव इंग्रीडिएंट्स का इस्तेमाल बार-बार चेहरा धोना कठोर फेसवॉश का उपयोग लगातार नए-नए स्किनकेयर उत्पाद बदलना पर्याप्त सनस्क्रीन न लगाना बहुत गर्म पानी से चेहरा धोना विशेषज्ञों का मानना है कि अधिकतर लोगों के लिए क्लेंजिंग, मॉइश्चराइजिंग और सन प्रोटेक्शन पर आधारित सरल स्किनकेयर रूटीन ही पर्याप्त होता है। स्किन बैरियर को कैसे करें रिपेयर? अगर आपकी त्वचा मॉइश्चराइजर से जलन महसूस करा रही है, तो सबसे पहले स्किनकेयर रूटीन को सरल बनाना जरूरी है। कुछ दिनों के लिए रेटिनॉल, विटामिन-सी, ग्लाइकोलिक एसिड, सैलिसिलिक एसिड, स्क्रब और केमिकल पील जैसे एक्टिव उत्पादों का इस्तेमाल बंद कर दें। इसके बजाय: माइल्ड क्लेंजर का उपयोग करें सेरामाइड्स युक्त बैरियर-रिपेयर मॉइश्चराइजर लगाएं मिनरल सनस्क्रीन चुनें सुगंध वाले उत्पादों से दूरी बनाएं गर्म पानी की जगह गुनगुने पानी का इस्तेमाल करें कब डॉक्टर से मिलना जरूरी है? यदि मॉइश्चराइजर लगाने पर लगातार जलन बनी रहती है, तो यह एक्जिमा, रोसैशिया या डर्मेटाइटिस जैसी त्वचा संबंधी बीमारियों का शुरुआती संकेत भी हो सकता है। ऐसी स्थिति में घरेलू उपायों पर निर्भर रहने के बजाय त्वचा विशेषज्ञ से सलाह लेना बेहतर होता है। कम उत्पाद, ज्यादा फायदा आजकल लंबी और जटिल स्किनकेयर रूटीन का चलन तेजी से बढ़ा है, लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि हर त्वचा को दर्जनों उत्पादों की जरूरत नहीं होती। कई बार कम उत्पादों वाला संतुलित रूटीन ही त्वचा को स्वस्थ और मजबूत बनाए रखने का सबसे प्रभावी तरीका साबित होता है। यदि आपका मॉइश्चराइजर अचानक चुभने लगे, तो नया प्रोडक्ट खरीदने से पहले अपनी त्वचा की वास्तविक जरूरतों को समझना ज्यादा जरूरी है।
फिटनेस और ब्यूटी की दुनिया में अब एक नया ट्रेंड तेजी से चर्चा में है-“फेस वर्कआउट” या फेसजिम। हाल ही में यूके से शुरू हुए इस कॉन्सेप्ट FaceGym ने भारत में भी एंट्री कर ली है, और मुंबई में इसके अनुभव को लेकर काफी उत्सुकता देखी जा रही है। इस अनोखे स्किनकेयर और फिटनेस कॉम्बिनेशन में दावा किया जाता है कि चेहरे की मांसपेशियों को एक्सरसाइज देकर उसे ज्यादा टोन, रिलैक्स और ग्लोइंग बनाया जा सकता है। 60 मिनट का “फेस वर्कआउट” कैसा होता है? रिपोर्ट के मुताबिक, इस अनुभव में पूरा सेशन लगभग एक घंटे का होता है, जिसमें चेहरे की सफाई से शुरुआत होती है और फिर गहरी मसाज तकनीकों के जरिए चेहरे की मांसपेशियों पर काम किया जाता है। इस दौरान: गालों, जबड़े और माथे पर स्ट्रॉन्ग मसाज लिम्फैटिक ड्रेनेज तकनीक स्किन को रिलैक्स करने वाले स्ट्रोक्स टेंशन रिलीज पर फोकस उद्देश्य यह बताया गया है कि चेहरे की उन मांसपेशियों को एक्टिव किया जाए जिन्हें हम रोजमर्रा की जिंदगी में नजरअंदाज कर देते हैं। क्या सच में चेहरा “ट्रेन” हो सकता है? ब्यूटी एक्सपर्ट्स और डर्मेटोलॉजिस्ट का कहना है कि चेहरे की एक्सरसाइज से तुरंत बदलाव तो दिख सकता है, लेकिन यह स्थायी नहीं होता। डर्मेटोलॉजिस्ट के अनुसार: चेहरे की संरचना (bone structure) नहीं बदलती लेकिन सूजन (puffiness) कम हो सकती है ब्लड सर्कुलेशन बेहतर होता है जबड़े और चेहरे की टाइटनेस में राहत मिलती है इसका मतलब यह है कि यह “स्कल्प्टिंग” से ज्यादा “रिलैक्सेशन थेरेपी” जैसा असर देता है। अनुभव: ग्लो तो मिला, लेकिन असली असर क्या था? रिपोर्ट में बताया गया कि 60 मिनट के सेशन के बाद चेहरा ज्यादा ब्राइट, फ्रेश और रिलैक्स महसूस हुआ। खासकर जबड़े की टाइटनेस में कमी महसूस हुई, जो तनाव और लंबे समय तक स्क्रीन के उपयोग से आम समस्या बन चुकी है। हालांकि विशेषज्ञों का साफ कहना है कि यह असर अस्थायी होता है और इसे बनाए रखने के लिए नियमित सेशन की जरूरत होती है। विशेषज्ञों की राय विशेषज्ञों के अनुसार, फेस वर्कआउट से: चेहरे की ब्लड सर्कुलेशन बेहतर होती है लिम्फैटिक ड्रेनेज से सूजन कम हो सकती है फेस मसल्स में रिलैक्सेशन मिलता है लेकिन “परमानेंट चीकबोन ट्रांसफॉर्मेशन” संभव नहीं है
Psoriasis के इलाज में इस्तेमाल होने वाली systemic therapies को लेकर लंबे समय से यह चिंता बनी हुई है कि क्या ये दवाएं मरीजों में गंभीर संक्रमण का खतरा बढ़ाती हैं। अब ब्रिटेन के बड़े रियल-वर्ल्ड डेटा रजिस्टर BADBIR पर आधारित एक नई स्टडी ने इस मुद्दे पर महत्वपूर्ण जानकारी दी है। शोधकर्ताओं ने पाया कि ज्यादातर systemic treatments के बीच गंभीर संक्रमण के खतरे में बहुत बड़ा अंतर नहीं दिखा, हालांकि कुछ दवाओं के साथ संक्रमण का जोखिम थोड़ा अधिक पाया गया। क्या है BADBIR स्टडी? यह अध्ययन British Association of Dermatologists Biologic Interventions Register (BADBIR) के डेटा पर आधारित था। इसमें Psoriasis से पीड़ित 18,976 वयस्क मरीजों के 46,770 treatment episodes का विश्लेषण किया गया। मरीजों को इलाज शुरू होने से लेकर दवा बंद होने, मृत्यु या अंतिम फॉलो-अप तक ट्रैक किया गया। इस स्टडी में “serious infection” उन मामलों को माना गया, जिनमें अस्पताल में भर्ती होना पड़ा, IV एंटीमाइक्रोबियल थेरेपी की जरूरत पड़ी या संक्रमण के कारण मृत्यु हुई। कितने मरीजों में दिखा गंभीर संक्रमण? अध्ययन में शामिल मरीजों की औसत आयु 45.6 वर्ष थी और औसत BMI 31.6 kg/m² दर्ज किया गया। पूरे अध्ययन के दौरान गंभीर संक्रमण की दर 27.67 घटनाएं प्रति 1,000 person-years रही। हालांकि जिन मरीजों को पहले भी गंभीर संक्रमण हो चुका था, उनमें दोबारा संक्रमण का खतरा काफी ज्यादा पाया गया। इस समूह में संक्रमण की दर 78.70 प्रति 1,000 person-years रही। किन दवाओं के साथ दिखा ज्यादा जोखिम? शोधकर्ताओं ने पाया कि Apremilast और Secukinumab के साथ गंभीर संक्रमण का खतरा Adalimumab की तुलना में थोड़ा अधिक दिखाई दिया। हालांकि sensitivity analyses में ये परिणाम पूरी तरह स्थिर नहीं रहे, इसलिए वैज्ञानिकों ने इन निष्कर्षों को सावधानी से देखने की सलाह दी है। किस दवा में दिखा कम संक्रमण जोखिम? अध्ययन में recurrent event analysis भी किया गया, जिसमें एक ही मरीज में बार-बार होने वाले संक्रमणों को शामिल किया गया। इस विश्लेषण में Risankizumab के साथ गंभीर संक्रमण का जोखिम कई अन्य therapies की तुलना में कम पाया गया। विशेष रूप से इसकी तुलना Brodalumab, Etanercept और standard systemic therapies से की गई। संक्रमण से मौत के मामले कितने गंभीर? स्टडी के मुताबिक गंभीर संक्रमण से जुड़ी मौतें बहुत कम दर्ज की गईं। इसकी दर केवल 1.81 प्रति 1,000 person-years रही। मरीजों और डॉक्टरों के लिए क्या है इसका मतलब? विशेषज्ञों का मानना है कि यह अध्ययन Psoriasis के इलाज में इस्तेमाल होने वाली systemic therapies की सुरक्षा को लेकर महत्वपूर्ण real-world evidence देता है। रिपोर्ट बताती है कि ज्यादातर दवाओं के बीच संक्रमण जोखिम में कोई बड़ा अंतर नहीं है, लेकिन जिन मरीजों को पहले संक्रमण हो चुका हो या जिनकी immunity कमजोर हो, उनके लिए इलाज चुनते समय अतिरिक्त सावधानी जरूरी हो सकती है। विशेषज्ञों के अनुसार हर मरीज की स्थिति अलग होती है, इसलिए treatment selection हमेशा individual risk profile को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए।
मध्यम से गंभीर Atopic Dermatitis के इलाज में Ultraviolet B phototherapy (UVB) लंबे समय से प्रभावी विकल्प माना जाता है, खासकर उन मरीजों के लिए जो टॉपिकल स्टेरॉयड जैसे उपचारों से पर्याप्त लाभ नहीं पा रहे हैं। अब एक नई रैंडमाइज्ड कंट्रोल्ड ट्रायल ने narrowband और broadband UVB के बीच तुलना करते हुए अहम निष्कर्ष सामने रखे हैं। स्टडी कैसे की गई? इस अध्ययन में 18 वर्ष से अधिक उम्र के 69 मरीज शामिल किए गए, जिन्हें मध्यम से गंभीर और ट्रीटमेंट-रेफ्रैक्टरी एटोपिक डर्मेटाइटिस था। मरीजों को दो समूहों में बांटा गया: एक को broadband UVB दूसरे को narrowband UVB दोनों समूहों को 12 हफ्तों तक फुल-बॉडी फोटोथेरेपी दी गई, साथ ही उनकी मौजूदा टॉपिकल थेरेपी जारी रही। अध्ययन का मुख्य मापदंड Eczema Area and Severity Index (EASI) स्कोर में बदलाव था। असर में नहीं दिखा बड़ा अंतर रिजल्ट्स के मुताबिक, दोनों ही थेरेपी ने बीमारी की गंभीरता में उल्लेखनीय सुधार किया: Broadband UVB: EASI में औसत −8.1 की कमी Narrowband UVB: EASI में औसत −8.9 की कमी दोनों के बीच का अंतर सांख्यिकीय रूप से महत्वपूर्ण नहीं था, यानी प्रभाव लगभग समान रहा। इसके अलावा vIGA, POEM, PP-NRS, DLQI और RECAP जैसे अन्य क्लिनिकल और मरीज-आधारित मापदंडों में भी दोनों ग्रुप्स के बीच कोई खास अंतर नहीं पाया गया। सहनशीलता में बड़ा फर्क हालांकि, टॉलरबिलिटी (सहनशीलता) के मामले में फर्क देखने को मिला: Broadband UVB ग्रुप में 4 मरीजों ने साइड इफेक्ट्स के कारण इलाज छोड़ दिया Narrowband UVB ग्रुप में कोई भी मरीज बीच में नहीं छोड़ा यह दर्शाता है कि narrowband UVB ज्यादा सुरक्षित और बेहतर सहन किया जाने वाला विकल्प हो सकता है। क्या है इसका मतलब? इस अध्ययन से यह साफ होता है कि दोनों UVB थेरेपी प्रभावी हैं, लेकिन बेहतर सहनशीलता के कारण narrowband UVB को प्राथमिकता दी जा सकती है। यह निष्कर्ष डॉक्टरों को इलाज का सही विकल्प चुनने में मदद कर सकता है, खासकर उन मरीजों के लिए जिनकी बीमारी लंबे समय से नियंत्रण में नहीं आ रही।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।