शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के 60वें स्थापना दिवस कार्यक्रम में पार्टी प्रमुख उद्धव ठाकरे ने संगठन में जारी बगावत के बीच बड़ा और भावुक बयान दिया है। उन्होंने कहा कि यदि कार्यकर्ताओं को उन पर भरोसा नहीं है, तो वे पार्टी प्रमुख का पद छोड़ने को तैयार हैं।
उद्धव ठाकरे ने कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा, “अगर आपको मुझ पर विश्वास नहीं है, तो मैं पार्टी प्रमुख का पद छोड़ने को तैयार हूं। किसी और को शिवसेना का अध्यक्ष बना दीजिए।” उनके इस बयान को पार्टी के भीतर चल रहे संकट के बीच महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
अपने संबोधन में ठाकरे ने केंद्र सरकार पर भी निशाना साधा। उन्होंने आरोप लगाया कि देश एक ऐसी दिशा में बढ़ रहा है जहां “एक पार्टी व्यवस्था और बिना चुनाव” जैसी स्थिति बन सकती है, जो लोकतंत्र के लिए खतरा है।
कार्यक्रम में ठाकरे ने उन मतदाताओं से माफी भी मांगी जिन्होंने 2024 के लोकसभा चुनाव में शिवसेना (UBT) के सांसदों को वोट दिया था, लेकिन अब उनके बगावत करने की खबरें सामने आ रही हैं। उन्होंने दावा किया कि पार्टी कार्यकर्ताओं में अभी भी उत्साह बना हुआ है और शिवसेना की विचारधारा मजबूत है।
पार्टी के कांग्रेस में विलय की चर्चाओं को खारिज करते हुए उद्धव ठाकरे ने स्पष्ट कहा कि शिवसेना का किसी पार्टी में विलय का सवाल ही नहीं उठता। उन्होंने कहा कि पार्टी ने पहले भाजपा के साथ लंबे समय तक गठबंधन किया, लेकिन कभी भी विलय नहीं किया।
शिवसेना (UBT) इस समय गंभीर राजनीतिक संकट का सामना कर रही है। पार्टी के छह सांसदों के एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाले गुट में शामिल होने की अटकलों के बीच संगठन में हलचल तेज हो गई है। ये सांसद हाल ही में पार्टी की संसदीय बैठक में भी शामिल नहीं हुए थे।
पार्टी नेता अंबादास दानवे ने इस पूरे घटनाक्रम के पीछे भाजपा की भूमिका का आरोप लगाया है। वहीं संजय राउत ने दावा किया कि बागी सांसदों को मंत्री पद और आर्थिक प्रलोभन दिए जाने की चर्चा है। हालांकि, भाजपा ने इन आरोपों को पूरी तरह खारिज किया है।
फिलहाल महाराष्ट्र की राजनीति में इस घटनाक्रम ने नई अनिश्चितता पैदा कर दी है, और आने वाले दिनों में स्थिति और स्पष्ट होने की उम्मीद है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
सरयू राय ने हेमंत सोरेन को दिया ये ऑफर रांची। झारखंड राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार की हार के बाद सत्तारूढ़ गठबंधन के भीतर सियासी हलचल और आरोप-प्रत्यारोप का दौर तेज हो गया है। इसी बीच जदयू विधायक और पूर्व मंत्री सरयू राय ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को कांग्रेस के बिना सरकार चलाने की सलाह देकर नई राजनीतिक बहस छेड़ दी है। सरयू राय का कहना है कि कांग्रेस के साथ गठबंधन सरकार के सुचारु संचालन में बाधा बन रहा है और मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में कांग्रेस के बिना भी स्थिर सरकार बनाई जा सकती है। सरयू राय ने राजनीतिक गणित भी पेश किया सरयू राय ने राज्यसभा चुनाव का हवाला देते हुए कहा कि कांग्रेस उम्मीदवार को उनकी ही पार्टी के विधायकों का पूरा समर्थन नहीं मिला। उनके मुताबिक, मतदान के दौरान गठबंधन की अपेक्षित एकजुटता नहीं दिखी, जिससे कांग्रेस की आंतरिक स्थिति और अनुशासन पर सवाल खड़े हुए हैं। उन्होंने दावा किया कि क्रॉस वोटिंग की घटनाओं ने यह संकेत दिया है कि कांग्रेस संगठन के भीतर तालमेल की कमी है और इसका असर गठबंधन की मजबूती पर पड़ा है। सरयू राय ने सरकार गठन का नया राजनीतिक गणित भी पेश किया। उन्होंने कहा कि झामुमो के 34 विधायक, राजद के 4 विधायक और भाकपा (माले) के 2 विधायक मिलाकर कुल 40 विधायकों का समर्थन पहले से उपलब्ध है। यदि उनका समर्थन जोड़ लिया जाए तो संख्या 41 तक पहुंच जाती है, जो सरकार के लिए आवश्यक बहुमत है। उन्होंने यह भी कहा कि यदि जयराम महतो समर्थन देते हैं तो यह आंकड़ा 42 हो जाएगा। राय का दावा है कि जरूरत पड़ने पर अन्य विधायकों का सहयोग भी प्राप्त किया जा सकता है। यह सरयू राय की पहली सलाह नहीं बता दे यह पहली बार नहीं है जब सरयू राय ने हेमंत सोरेन को इस तरह की सलाह दी हो। वर्ष 2019 में भाजपा छोड़ने के बाद से वह कई बार सरकार को विभिन्न मुद्दों पर सुझाव देते रहे हैं। जुलाई 2024 में हेमंत सोरेन के दोबारा मुख्यमंत्री बनने के बाद भी उन्होंने सार्वजनिक रूप से सलाह दी थी कि सरकार को दलालों और भ्रष्ट मध्यस्थों से दूरी बनाकर काम करना चाहिए तथा सहयोगी दलों के अनावश्यक दबाव से ऊपर उठकर निर्णय लेने चाहिए। क्या कहते है राजनीतिक विश्लेषक राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, सरयू राय की इस सलाह के पीछे कई कारण हैं। राज्यसभा चुनाव से पहले झामुमो और कांग्रेस के बीच उम्मीदवार चयन और सीट बंटवारे को लेकर मतभेद खुलकर सामने आए थे। कांग्रेस द्वारा उम्मीदवार घोषित किए जाने के बाद झामुमो नेतृत्व ने नाराजगी जताई थी कि उनसे पर्याप्त चर्चा नहीं की गई। बाद में दोनों दलों के बीच समझौता तो हुआ, लेकिन अंदरूनी खींचतान की चर्चाएं जारी रहीं। सरयू राय लंबे समय से कांग्रेस की संगठनात्मक कमजोरी और आंतरिक गुटबाजी को झारखंड सरकार के लिए चुनौती बताते रहे हैं। उनका मानना है कि राज्यसभा चुनाव में सामने आई क्रॉस वोटिंग ने इस धारणा को और मजबूत किया है। वहीं, झामुमो और कांग्रेस के बीच राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई भी सामने आती रही है, जिससे गठबंधन में तनाव की स्थिति बनी रहती है। जयराम महतो ने क्या कहा है? इस बीच जयराम महतो ने भी पिछले कुछ महीनों में संकेत दिए हैं कि उनकी राजनीति भाजपा और कांग्रेस दोनों से अलग है। हालांकि उन्होंने खुलकर हेमंत सरकार में शामिल होने की बात नहीं कही है, लेकिन कई मौकों पर यह जरूर कहा कि यदि झारखंड के हित में कोई प्रस्ताव आता है तो उसका समर्थन करने पर विचार किया जा सकता है। यही वजह है कि सरयू राय ने अपने नए राजनीतिक समीकरण में जयराम महतो का नाम भी जोड़ा है। हालांकि इन बयानों के बावजूद झामुमो या कांग्रेस की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
कर्नाटक विधान परिषद (एमएलसी) चुनाव के नतीजों के बाद राज्य की राजनीति में बड़ा सियासी भूचाल आ गया है। 7 सीटों में से 5 पर कांग्रेस की जीत ने जहां पार्टी की स्थिति मजबूत की है, वहीं एनडीए खेमे में हुई क्रॉस-वोटिंग ने बीजेपी और जेडी(एस) के भीतर गंभीर मतभेदों को उजागर कर दिया है। क्रॉस-वोटिंग से बीजेपी में नाराजगी चुनाव में एनडीए के 11 विधायकों द्वारा पार्टी लाइन के खिलाफ मतदान किए जाने की पुष्टि के बाद बीजेपी नेतृत्व नाराज है। इस क्रॉस-वोटिंग के चलते कांग्रेस को अप्रत्यक्ष रूप से लाभ मिला और उसने 5 सीटों पर जीत दर्ज की। बीजेपी के भीतर इस घटनाक्रम को अनुशासनहीनता और संगठनात्मक विफलता के रूप में देखा जा रहा है। बीवाई विजयेंद्र को दिल्ली तलब स्थिति की गंभीरता को देखते हुए बीजेपी के राष्ट्रीय नेतृत्व ने कर्नाटक बीजेपी अध्यक्ष बीवाई विजयेंद्र को दिल्ली बुलाया है। पार्टी अध्यक्ष नितिन नबीन ने पूरे मामले की विस्तृत रिपोर्ट मांगी है और क्रॉस-वोटिंग के कारणों की जांच के निर्देश दिए हैं। विजयेंद्र ने स्वीकार किया है कि बीजेपी और जेडी(एस) के कुछ विधायकों ने पार्टी व्हिप के खिलाफ जाकर मतदान किया है। उन्होंने साफ किया कि दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी और किसी को माफ नहीं किया जाएगा। 11 विधायकों ने तोड़ा पार्टी अनुशासन सूत्रों के अनुसार कुल 11 विधायकों ने एनडीए उम्मीदवार के खिलाफ वोटिंग की, जिनमें बीजेपी और जेडी(एस) दोनों के विधायक शामिल हैं। जेडी(एस) के उम्मीदवार गोविंदराजू की हार इस चुनाव का सबसे बड़ा झटका मानी जा रही है। पार्टी के 18 विधायकों के बावजूद उन्हें केवल 14 वोट मिले, जिससे कम से कम चार विधायकों के क्रॉस-वोटिंग करने की पुष्टि होती है। कांग्रेस की सीटों में बढ़ोतरी 75 सदस्यीय विधान परिषद में अब कांग्रेस की स्थिति और मजबूत हो गई है। कांग्रेस: 34 से बढ़कर 39 सीटें बीजेपी: 29 सीटें जेडी(एस): 6 सीटें कांग्रेस ने इस नतीजे को एनडीए के भीतर असंतोष और नेतृत्व संकट का संकेत बताया है। सदन में आरोप-प्रत्यारोप तेज बीजेपी ने क्रॉस-वोटिंग के पीछे कांग्रेस की रणनीति का आरोप लगाया है, जबकि कांग्रेस ने इसे विपक्षी गठबंधन में गहरी दरार का परिणाम बताया है। विपक्षी नेता चालावाड़ी नारायणस्वामी ने सवाल उठाते हुए कहा कि यदि सत्ता पक्ष को लाभ पहुंचाने वाला वोट लोकतांत्रिक है, तो विपक्षी वोटिंग को असंवैधानिक कैसे कहा जा सकता है। राजनीतिक असर कर्नाटक एमएलसी चुनाव परिणामों ने राज्य की राजनीति में नए समीकरण खड़े कर दिए हैं। बीजेपी जहां आंतरिक अनुशासन को लेकर दबाव में है, वहीं कांग्रेस इस परिणाम को अपनी बड़ी राजनीतिक जीत के रूप में देख रही है। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर दिल्ली से लेकर बेंगलुरु तक सियासी सरगर्मी और बढ़ने की संभावना है।
रांची। झारखंड राज्यसभा चुनाव के नतीजों के बाद महागठबंधन के भीतर तनाव बढ़ गया है। कांग्रेस उम्मीदवार की हार के बाद लगाए गए क्रॉस वोटिंग के आरोपों पर अब राष्ट्रीय जनता दल (राजद) ने कड़ा पलटवार किया है। चुनाव में एनडीए समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार की जीत और महागठबंधन की हार के बाद गठबंधन में बयानबाजी तेज हो गई है। कांग्रेस की ओर से आरोप लगाया गया था कि राजद और भाकपा (माले) के कुछ विधायकों ने क्रॉस वोटिंग की है। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए राजद ने कांग्रेस पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं। राजद का बयान: हार का ठीकरा दूसरों पर फोड़ा जा रहा है राजद ने अपने आधिकारिक सोशल मीडिया पोस्ट में कहा कि कांग्रेस अपने ही विधायकों का समर्थन सुनिश्चित करने में असफल रही और अब दूसरों पर आरोप लगा रही है। पार्टी ने कहा कि पहले कांग्रेस को आत्ममंथन करना चाहिए और अपनी संगठनात्मक कमजोरियों पर ध्यान देना चाहिए। राजद ने यह भी दावा किया कि इससे पहले हरियाणा, ओडिशा और बिहार जैसे राज्यों में भी कांग्रेस के कई विधायकों ने क्रॉस वोटिंग या मतदान से दूरी बनाई थी, लेकिन उन मामलों में पार्टी ने कोई गंभीर कार्रवाई नहीं की। INDIA गठबंधन की एकजुटता पर सवाल राजद ने अपने बयान में कहा कि इस तरह के सार्वजनिक आरोप INDIA गठबंधन की एकजुटता को नुकसान पहुंचा सकते हैं। पार्टी ने कांग्रेस नेताओं से संयम बरतने और गठबंधन धर्म का पालन करने की सलाह दी। राजद ने यह भी कहा कि अन्य राज्यों में हुई घटनाओं के बावजूद सहयोगी दलों ने कभी कांग्रेस पर सार्वजनिक रूप से हमला नहीं किया, लेकिन झारखंड में स्थिति अलग दिखाई दे रही है। राज्यसभा चुनाव के बाद शुरू हुई यह बयानबाजी अब झारखंड की राजनीति में नया विवाद बन गई है और महागठबंधन के भीतर मतभेद खुलकर सामने आने लगे हैं।