Election Analysis

West Bengal map
बंगाल चुनाव 2026: पहले चरण में दागी और धनी उम्मीदवारों का दबदबा, BJP के 70% प्रत्याशी दागी, TMC सबसे अमीर

कोलकाता: Association for Democratic Reforms (ADR) की ताजा रिपोर्ट में पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के पहले चरण को लेकर चौंकाने वाले खुलासे हुए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक चुनावी मैदान में उतरे उम्मीदवारों में दागी और करोड़पति प्रत्याशियों का दबदबा साफ दिखाई दे रहा है। 23% उम्मीदवारों पर आपराधिक मामले ADR और पश्चिम बंगाल इलेक्शन वॉच द्वारा 1,475 उम्मीदवारों के हलफनामों के विश्लेषण में सामने आया कि: कुल 23% उम्मीदवारों पर आपराधिक मामले दर्ज हैं 294 उम्मीदवारों पर गंभीर आरोप (हत्या, हत्या का प्रयास, दुष्कर्म आदि) इनमें 19 पर हत्या और 98 पर महिलाओं के खिलाफ अपराध के मामले दर्ज दागी उम्मीदवारों में BJP सबसे आगे पार्टीवार आंकड़े भी काफी चौंकाने वाले हैं: BJP: 70% (152 में से 106 उम्मीदवार दागी) TMC: 43% उम्मीदवारों पर केस CPI(M): 43% Congress: 26% 66 सीटें ‘रेड अलर्ट’ घोषित रिपोर्ट के अनुसार, पहले चरण की 152 सीटों में से 66 सीटों को ‘रेड अलर्ट’ घोषित किया गया है। इन सीटों पर तीन या उससे अधिक उम्मीदवारों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं। धनबल में TMC सबसे आगे सिर्फ बाहुबल ही नहीं, धनबल के मामले में भी चुनाव काफी भारी दिख रहा है: उम्मीदवारों की औसत संपत्ति: 1.34 करोड़ रुपये TMC उम्मीदवार सबसे अमीर, औसत संपत्ति 5.70 करोड़ रुपये कुल 309 उम्मीदवार (21%) करोड़पति महिला प्रतिनिधित्व अब भी कम रिपोर्ट में महिला भागीदारी को लेकर निराशाजनक तस्वीर सामने आई है: कुल 1,478 उम्मीदवारों में सिर्फ 167 महिलाएं (11%) टिकट वितरण में महिलाओं को अब भी सीमित अवसर कब होगी वोटिंग? West Bengal की 294 विधानसभा सीटों के लिए मतदान दो चरणों में होगा: पहला चरण: 23 अप्रैल दूसरा चरण: 29 अप्रैल नतीजे: 4 मई ADR की रिपोर्ट ने एक बार फिर चुनावी राजनीति में “विनिंग एबिलिटी” को प्राथमिकता देने की प्रवृत्ति पर सवाल खड़े किए हैं। अब देखना दिलचस्प होगा कि मतदाता इस बार साफ छवि को प्राथमिकता देते हैं या फिर धनबल और बाहुबल का असर बरकरार रहता है।  

surbhi अप्रैल 17, 2026 0
Suvendu Adhikari and Mamata Banerjee during the high-profile Nandigram 2021 election battle in West Bengal.
नंदीग्राम 2021: कैसे शुभेंदु अधिकारी ने ममता बनर्जी को दी मात? जानिए पूरा विश्लेषण

कोलकाता: पश्चिम बंगाल की राजनीति में 2021 का नंदीग्राम चुनाव सबसे हाई-प्रोफाइल मुकाबलों में से एक रहा। इस सीट पर बीजेपी नेता शुभेंदु अधिकारी ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को 1,956 वोटों से हराकर बड़ा उलटफेर कर दिया था। आइए जानते हैं वे अहम कारण, जिनकी वजह से यह परिणाम सामने आया। 1. रणनीति का बड़ा फर्क: रैली vs संगठन ममता बनर्जी ने अपने कुल खर्च का 89.5% बड़ी रैलियों और जनसभाओं पर लगाया शुभेंदु अधिकारी ने जमीनी संगठन, लोकल नेटवर्क और लॉजिस्टिक्स पर ज्यादा ध्यान दिया नतीजा: लोकल स्तर पर बीजेपी की पकड़ मजबूत हुई 2. खर्च कम, लेकिन असरदार ममता बनर्जी: ₹21.88 लाख खर्च शुभेंदु अधिकारी: ₹23.62 लाख खर्च शुभेंदु ने ममता से करीब ₹1.74 लाख ज्यादा खर्च किया लेकिन असली फर्क खर्च की रणनीति ने डाला, न कि सिर्फ रकम ने 3. फंडिंग और उपयोग में अंतर ममता के पास कुल ₹40 लाख का फंड, लेकिन उन्होंने सिर्फ 54.7% खर्च किया शुभेंदु के पास ₹21.02 लाख, लेकिन उन्होंने 112% तक खर्च किया (अतिरिक्त संसाधनों के साथ) शुभेंदु ने आक्रामक निवेश मॉडल अपनाया 4. लोकल नेटवर्क और कैडर की ताकत ममता के पास 116 वाहन और 1,400+ कार्यकर्ता शुभेंदु को मिला BJP का मजबूत राष्ट्रीय कैडर और संगठन बूथ स्तर पर बेहतर मैनेजमेंट ने चुनाव का रुख बदला 5. वोट और प्रति वोट खर्च ममता बनर्जी: 41,505 वोट | ₹52.73 प्रति वोट खर्च शुभेंदु अधिकारी: 43,461 वोट | ₹54.36 प्रति वोट खर्च मामूली अंतर, लेकिन निर्णायक जीत 6. अंदरूनी फूट भी बनी वजह TMC में स्थानीय स्तर पर मतभेद शुभेंदु पहले TMC में थे, जिससे उन्हें स्थानीय समीकरणों की गहरी समझ थी

surbhi अप्रैल 9, 2026 0
West Bengal election map with voter list changes and BJP vs TMC political analysis after SIR revision
SIR के बाद बदला बंगाल का चुनावी गणित? आंकड़ों में छिपा बड़ा संकेत, BJP के लिए खुला मौका

पश्चिम बंगाल की राजनीति में सतह पर भले ही Mamata Banerjee और उनकी पार्टी All India Trinamool Congress (TMC) की पकड़ मजबूत दिखती हो, लेकिन विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के बाद सामने आए आंकड़े चुनावी समीकरण में बड़े बदलाव की ओर इशारा कर रहे हैं। यह बदलाव सिर्फ राजनीतिक माहौल तक सीमित नहीं, बल्कि वोटिंग पैटर्न और सीट-दर-सीट मुकाबले को भी प्रभावित कर सकता है। सबसे बड़ा झटका मतदाता सूची में हुए बदलाव से जुड़ा है। SIR प्रक्रिया के तहत करीब 91 लाख नाम हटाए गए हैं, जिनमें से लगभग 60 प्रतिशत हटाव छह जिलों-मालदा, मुर्शिदाबाद, उत्तर दिनाजपुर, नदिया, और उत्तर-दक्षिण 24 परगना-से हुआ है। ये सभी क्षेत्र पारंपरिक रूप से TMC के मजबूत गढ़ माने जाते हैं। ऐसे में इस बड़े बदलाव ने चुनावी तस्वीर को पहले से ज्यादा अनिश्चित बना दिया है। राजनीतिक विश्लेषण यह भी बताता है कि TMC का वोट शेयर भले ही अधिक हो, लेकिन उसका बड़ा हिस्सा कुछ खास क्षेत्रों तक सीमित है, खासकर मुस्लिम बहुल सीटों में। इन सीटों पर भारी जीत का अंतर मिलता है, लेकिन यही “अतिरिक्त वोट” अन्य सीटों पर कोई खास फायदा नहीं दे पाते। इसके उलट Bharatiya Janata Party (BJP) का वोट राज्यभर में अपेक्षाकृत समान रूप से फैला हुआ है, जिससे उसे करीबी मुकाबलों में बढ़त मिल सकती है। आंकड़ों के अनुसार, TMC के पास 114 सीटें ऐसी हैं जहां जीत का अंतर 10 प्रतिशत से ज्यादा है, जबकि BJP के पास केवल 35 सीटें इस श्रेणी में आती हैं। 2024 के आंकड़ों के आधार पर TMC के लगभग 55.8 लाख वोट “वेस्टेड” माने जा रहे हैं, जबकि BJP के लिए यह संख्या काफी कम-करीब 11.9 लाख-है। इसका सीधा मतलब है कि BJP के वोट ज्यादा “इफेक्टिव” साबित हो सकते हैं। हालांकि BJP के सामने चुनौतियां भी कम नहीं हैं। मतुआ समुदाय से जुड़े शरणार्थी वोट बैंक में बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने से पार्टी को नुकसान हो सकता है, खासकर उन 55 सीटों पर जहां यह समुदाय प्रभावशाली है। लेकिन उत्तर बंगाल और जंगलमहल जैसे इलाकों में अपेक्षाकृत कम कटौती BJP के लिए राहत की बात हो सकती है। सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि करीब 58 करीबी सीटों पर सिर्फ 1.92 लाख वोटों का झुकाव चुनावी नतीजों को पूरी तरह बदल सकता है। यानी अब यह चुनाव कुल वोट प्रतिशत से ज्यादा, सीट-दर-सीट मार्जिन का खेल बन गया है। इसके अलावा, राज्य में महिला मतदाताओं के अनुपात में गिरावट (959 से घटकर 950 प्रति 1000 पुरुष) भी एक नया फैक्टर बनकर उभरा है, जो Mamata Banerjee के लिए चिंता का विषय हो सकता है। कुल मिलाकर, एंटी-इंकम्बेंसी, मतदाता सूची में बदलाव और वोटों का असमान वितरण-ये तीनों कारक मिलकर यह संकेत दे रहे हैं कि पश्चिम बंगाल में चुनावी मुकाबला अब पहले से कहीं ज्यादा खुला और दिलचस्प हो गया है। अब देखना होगा कि यह आंकड़ों का गणित वास्तविक चुनावी नतीजों में कितना बदलता है।  

surbhi अप्रैल 8, 2026 0
Saryu Roi speaking at IIT (ISM) Dhanbad event on World Water Day, commenting on Assam elections and JMM role
असम चुनाव पर सरयू राय का तीखा बयान: जेएमएम की भूमिका पर उठाए सवाल, ‘बदले की राजनीति’ का आरोप

आदिवासी मुद्दों पर स्थानीय नेतृत्व को बताया अहम, कांग्रेस-जेएमएम गठबंधन पर भी कसा तंज असम विधानसभा चुनाव को लेकर झारखंड की सियासत में हलचल तेज हो गई है। जदयू नेता और जमशेदपुर पूर्वी के विधायक सरयू राय ने झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कई अहम टिप्पणियां की हैं। वे आईआईटी (आईएसएम) धनबाद में विश्व जल दिवस के कार्यक्रम में शामिल होने पहुंचे थे, जहां मीडिया से बातचीत में उन्होंने यह बयान दिया। “स्थानीय मुद्दे ही तय करते हैं चुनाव” सरयू राय ने कहा कि असम के आदिवासी भले ही झारखंड या ओडिशा से गए हों, लेकिन अब वे पूरी तरह स्थानीय समाज में घुल-मिल चुके हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि वहां के मतदाता बाहरी हस्तक्षेप के बजाय स्थानीय मुद्दों और नेतृत्व को प्राथमिकता देते हैं। ऐसे में बाहरी राजनीतिक दलों की भूमिका सीमित रह सकती है। हेमंत सोरेन के दौरे पर उठाए सवाल राय ने झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के असम दौरे को लेकर भी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि यह कदम “बदले की राजनीति” का हिस्सा हो सकता है। उनके मुताबिक, असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा पहले झारखंड आ चुके हैं, ऐसे में यह राजनीतिक प्रतिक्रिया के तौर पर देखा जा सकता है। कांग्रेस-जेएमएम गठबंधन पर तंज असम चुनाव में संभावित कांग्रेस-जेएमएम गठबंधन को लेकर भी सरयू राय ने कटाक्ष किया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस इतनी “दिमागी दिवालिया” नहीं है कि बिना सोचे-समझे हवा का रुख देखकर गठबंधन कर ले। हेमंत सोरेन पर नरम रुख भी हालांकि, सरयू राय ने यह भी कहा कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की पूरी तरह आलोचना करना सही नहीं होगा। उन्होंने माना कि सोरेन संभवतः असम में रह रहे आदिवासी समुदाय के मुद्दों को उठाकर राजनीतिक आधार मजबूत करना चाहते हैं और अन्य राज्यों में जीत हासिल कर अपनी पार्टी को राष्ट्रीय पहचान दिलाने की कोशिश कर रहे हैं।  

surbhi मार्च 23, 2026 0
DMK flags and supporters at political rally in Tamil Nadu ahead of 2026 assembly elections
Tamil Nadu Election 2026: क्या आएगी DMK सुनामी? 223 सीटों का गणित बता रहा-विपक्ष अभी काफी पीछे

तमिलनाडु विधानसभा चुनाव 2026 से पहले सियासी माहौल गरमा गया है, लेकिन आंकड़े साफ संकेत दे रहे हैं कि सत्ताधारी Dravida Munnetra Kazhagam (DMK) और उसके सहयोगी दल बेहद मजबूत स्थिति में हैं। 2024 के लोकसभा चुनावों और 2021 के विधानसभा चुनावों के आधार पर देखें तो विपक्ष फिलहाल काफी पीछे नजर आ रहा है। 223 सीटों का गणित: DMK गठबंधन की बड़ी बढ़त 2024 के लोकसभा चुनाव नतीजों के विधानसभा क्षेत्रों के विश्लेषण से पता चलता है कि DMK गठबंधन ने 234 में से 223 विधानसभा क्षेत्रों में बढ़त हासिल की थी। यह आंकड़ा बहुमत के लिए जरूरी 118 सीटों के आंकड़े से बहुत आगे है, जो इस बात का संकेत है कि अगर यही ट्रेंड जारी रहा तो DMK को सत्ता में वापसी से रोकना विपक्ष के लिए बेहद मुश्किल होगा। वहीं, All India Anna Dravida Munnetra Kazhagam (AIADMK) सिर्फ 8 सीटों पर बढ़त बना पाई, जबकि Pattali Makkal Katchi (PMK) को सिर्फ 3 सीटों पर बढ़त मिली। लोकसभा 2024 में ‘INDIA’ गठबंधन का दबदबा 2024 के लोकसभा चुनावों में DMK के नेतृत्व वाले ‘INDIA’ गठबंधन ने 39 में से 38 सीटों पर जीत दर्ज की। इस प्रदर्शन ने साफ कर दिया कि राज्य में सत्ताधारी गठबंधन की पकड़ मजबूत बनी हुई है। M. K. Stalin के नेतृत्व में DMK ने 22 सीटों पर चुनाव लड़ा और सभी जीतीं, साथ ही 125 विधानसभा क्षेत्रों में बढ़त हासिल की। वोट शेयर बनाम सीटों की कहानी DMK: 26.93% वोट शेयर AIADMK: 20.46% वोट शेयर हालांकि वोट शेयर का अंतर ज्यादा बड़ा नहीं दिखता, लेकिन सीटों में यह अंतर बहुत बड़ा हो गया है। राज्य के 234 विधानसभा क्षेत्रों में से 52 में DMK को 50% से ज्यादा वोट मिले, जबकि AIADMK सिर्फ 1 सीट पर ही यह आंकड़ा छू पाई। करीबी मुकाबलों में भी DMK आगे जिन 26 लोकसभा सीटों पर जीत का अंतर 10,000 वोट से कम था, उनमें भी DMK गठबंधन ने 19 सीटों पर बढ़त बनाई, जबकि AIADMK सिर्फ 7 सीटों पर ही आगे रही। यह दर्शाता है कि कड़े मुकाबलों में भी सत्ताधारी गठबंधन का पलड़ा भारी रहा। विपक्ष के लिए चुनौती क्यों बढ़ी? AIADMK का 2024 लोकसभा चुनाव में प्रदर्शन 2021 विधानसभा चुनाव के मुकाबले कमजोर रहा। जहां 2021 में उसने 66 सीटें जीती थीं, वहीं 2024 में उसे कई सीटों पर DMK, कांग्रेस और अन्य सहयोगी दलों से हार का सामना करना पड़ा। नए खिलाड़ी से बदलेगा खेल? इस बार चुनाव में अभिनेता से नेता बने Vijay की पार्टी Tamilaga Vettri Kazhagam (TVK) भी मैदान में उतर रही है। TVK की एंट्री मुकाबले को दिलचस्प बना सकती है, लेकिन बड़ा सवाल यही है कि क्या यह पार्टी विपक्ष को मजबूत करेगी या DMK के वोट बैंक में सेंध लगाएगी। मौजूदा आंकड़ों और चुनावी ट्रेंड को देखते हुए DMK गठबंधन स्पष्ट रूप से बढ़त में है। हालांकि, अंतिम नतीजे इस बात पर निर्भर करेंगे कि चुनावी मैदान में नए समीकरण कैसे बनते हैं और TVK जैसे नए खिलाड़ी कितना असर डालते हैं।  

surbhi मार्च 23, 2026 0
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शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

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surbhi मई 15, 2026 0