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Russian President Vladimir Putin and Indian Prime Minister during BRICS Summit discussions in New Delhi
BRICS Summit 2026: सितंबर में भारत आएंगे रूसी राष्ट्रपति पुतिन, नई दिल्ली में होगा शिखर सम्मेलन

रूस के राष्ट्रपति Vladimir Putin सितंबर में भारत दौरे पर आने वाले हैं। वह 12 और 13 सितंबर को नई दिल्ली में आयोजित होने वाले BRICS शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेंगे। दक्षिण अफ्रीका में रूसी दूतावास ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर इसकी पुष्टि की है। यह एक साल के भीतर पुतिन की दूसरी भारत यात्रा होगी। इससे पहले दिसंबर 2025 में 23वें भारत-रूस वार्षिक शिखर सम्मेलन में शामिल होने के लिए उन्होंने भारत का दौरा किया था। अब वह फिर से भारत में आयोजित होने वाले BRICS Summit में भाग लेने आ रहे हैं। भारत कर रहा है BRICS सम्मेलन की मेजबानी इस वर्ष BRICS शिखर सम्मेलन की मेजबानी India कर रहा है। भारत चौथी बार इस संगठन की अध्यक्षता संभाल रहा है। इससे पहले भारत 2012, 2016 और 2021 में BRICS की मेजबानी कर चुका है। नई दिल्ली में होने वाला यह सम्मेलन वैश्विक राजनीति, व्यापार, आर्थिक सहयोग और विकासशील देशों के बीच साझेदारी को मजबूत करने के लिहाज से बेहद अहम माना जा रहा है। BRICS देशों के बीच तेजी से बढ़ा व्यापार हाल ही में गुजरात के गांधीनगर में आयोजित BRICS व्यापार एवं आर्थिक मामलों की बैठक में वाणिज्य सचिव Rajesh Agrawal ने बताया कि BRICS देशों के बीच वस्तु व्यापार में पिछले 21 वर्षों में 13 गुना वृद्धि दर्ज की गई है। उन्होंने कहा कि साल 2003 में BRICS देशों के बीच व्यापार 84 अरब डॉलर था, जो बढ़कर 2024 में 1.17 लाख करोड़ डॉलर तक पहुंच गया। हालांकि, यह अभी भी वैश्विक व्यापार का लगभग 5 प्रतिशत ही है। BRICS में शामिल हुए कई नए देश BRICS संगठन की शुरुआत Brazil, Russia, India, China और South Africa के साथ हुई थी। इसके बाद 2024 में संगठन का विस्तार करते हुए Egypt, Ethiopia, Iran और United Arab Emirates को सदस्य बनाया गया। वहीं, 2025 में Indonesia भी BRICS का सदस्य बन गया। वैश्विक अर्थव्यवस्था में BRICS की बड़ी भूमिका BRICS अब दुनिया की 11 प्रमुख उभरती अर्थव्यवस्थाओं का समूह बन चुका है। यह समूह वैश्विक आबादी का लगभग 49.5 प्रतिशत, वैश्विक GDP का करीब 40 प्रतिशत और दुनिया के कुल व्यापार का लगभग 26 प्रतिशत प्रतिनिधित्व करता है। नई दिल्ली में होने वाला BRICS Summit वैश्विक दक्षिण (Global South) की आवाज को मजबूत करने और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।  

surbhi मई 20, 2026 0
Donald Trump claims Iran nuclear sites destroyed amid rising tensions and stalled US-Iran talks
Iran War: बातचीत अधर में, डोनाल्ड ट्रंप का दावा–‘ऑपरेशन मिडनाइट हैमर’ में ईरान के परमाणु ठिकाने तबाह

  अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बीच कूटनीतिक प्रयासों पर अनिश्चितता गहराती जा रही है। इसी बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बड़ा दावा करते हुए कहा है कि ईरान के परमाणु ठिकानों को “पूरी तरह तबाह” कर दिया गया है, जिससे बातचीत की संभावनाओं पर भी असर पड़ सकता है। ‘ऑपरेशन मिडनाइट हैमर’ का दावा ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर कहा कि “ऑपरेशन मिडनाइट हैमर” के तहत ईरान के परमाणु ठिकानों को खाक कर दिया गया है। उनके मुताबिक, इन ठिकानों को दोबारा उपयोग में लाना अब बेहद मुश्किल होगा और इसके लिए लंबा समय लगेगा। उन्होंने इस दौरान अमेरिकी मीडिया–खासकर CNN–पर भी निशाना साधते हुए “फेक न्यूज” करार दिया और आरोप लगाया कि उनकी उपलब्धियों को जानबूझकर कम करके दिखाया जा रहा है। ईरान का पलटवार–‘धमकियों में बातचीत नहीं’ ईरान ने ट्रंप के इन दावों और दबाव की रणनीति को सिरे से खारिज कर दिया है। ईरानी संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बगेर गालिबाफ ने कहा कि अमेरिका बातचीत को “आत्मसमर्पण” में बदलना चाहता है, जिसे तेहरान कभी स्वीकार नहीं करेगा। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर हालात बिगड़ते हैं, तो ईरान भी अपने नए सैन्य कदम उठाने के लिए तैयार है और “मैदान-ए-जंग में नए पत्ते खोल सकता है।” सीजफायर पर भी असमंजस इस बीच ट्रंप ने संकेत दिए हैं कि 22 अप्रैल को खत्म हो रहे युद्धविराम को आगे बढ़ाने के पक्ष में वे नहीं हैं। इससे क्षेत्र में फिर से टकराव बढ़ने की आशंका गहरा गई है। हालांकि पहले यह योजना थी कि अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल–जिसमें जेडी वेंस और जैरेड कुशनर जैसे नाम शामिल थे–इस्लामाबाद जाकर बातचीत करेगा, लेकिन ईरान की अनिच्छा के कारण यह पहल अधर में लटकी हुई है। बढ़ता तनाव, घटती बातचीत की उम्मीद एक तरफ अमेरिका सैन्य दबाव बढ़ा रहा है, तो दूसरी ओर ईरान सख्त रुख अपनाए हुए है। ऐसे में साफ संकेत मिल रहे हैं कि फिलहाल कूटनीतिक रास्ता मुश्किल होता जा रहा है और हालात फिर से टकराव की ओर बढ़ सकते हैं।  

surbhi अप्रैल 21, 2026 0
Donald Trump warns Iran as US blockade on ports continues amid stalled nuclear deal talks
ईरानी बंदरगाहों की नाकाबंदी पर अड़े ट्रंप, बोले–डील से पहले नहीं हटेगा प्रतिबंध

US-Iran Tension: अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने साफ कर दिया है कि ईरान के बंदरगाहों पर लगी अमेरिकी नाकाबंदी तब तक नहीं हटेगी, जब तक दोनों देशों के बीच कोई ठोस समझौता नहीं हो जाता। यह बयान ऐसे समय में आया है, जब युद्ध खत्म करने के लिए प्रस्तावित दूसरे दौर की वार्ता को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। ट्रंप का सख्त संदेश डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म Truth Social पर लिखा: “नाकाबंदी ईरान को पूरी तरह तबाह कर रही है। वे हर दिन 500 मिलियन डॉलर गंवा रहे हैं। यह लंबे समय तक नहीं चल सकता।” ट्रंप के इस बयान से साफ है कि अमेरिका नाकाबंदी को एक दबाव की रणनीति के रूप में इस्तेमाल कर रहा है, ताकि ईरान को बातचीत और समझौते के लिए मजबूर किया जा सके। ईरान ने भी रखी शर्त दूसरी ओर Iran ने भी स्पष्ट कर दिया है कि जब तक अमेरिकी नाकाबंदी नहीं हटाई जाती, तब तक वह किसी भी वार्ता में शामिल नहीं होगा। ईरान के इस रुख से दोनों देशों के बीच गतिरोध (Deadlock) की स्थिति बन गई है। पाकिस्तान में बैठक पर संशय Islamabad में संभावित दूसरे दौर की बातचीत को लेकर तैयारियां तो जारी हैं, लेकिन हालात अभी भी अनिश्चित हैं। सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल की यात्रा अब तक तय नहीं उपराष्ट्रपति JD Vance अभी वॉशिंगटन से रवाना नहीं हुए हैं ईरान ने भी बैठक में शामिल होने पर अंतिम फैसला नहीं लिया है वार्ता पर संकट के बादल अमेरिका और ईरान दोनों अपनी-अपनी शर्तों पर अड़े हुए हैं: अमेरिका: पहले समझौता, फिर नाकाबंदी खत्म ईरान: पहले नाकाबंदी हटाओ, फिर बातचीत इस टकराव के चलते शांति वार्ता की संभावनाएं कमजोर पड़ती नजर आ रही हैं।  

surbhi अप्रैल 21, 2026 0
US and Iran diplomatic meeting illustration showing peace talks tension over Middle East geopolitical conflict
US-Iran Peace Talks: क्या बनेगी ऐतिहासिक डील या भड़क सकती है नई जंग?

नई दिल्ली/इस्लामाबाद: वैश्विक कूटनीति के बेहद अहम मोड़ पर अमेरिका और ईरान के बीच शांति वार्ता शुरू होने जा रही है, जिसकी मेजबानी पाकिस्तान कर रहा है। दोनों देशों के बीच लंबे समय से जारी तनाव के बीच यह बातचीत उम्मीद की किरण भी है और आशंकाओं से भरी भी। अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व कर रहे जेडी वेंस ने बातचीत को लेकर सकारात्मक संकेत दिए हैं, लेकिन सख्त चेतावनी भी दी है कि किसी भी तरह की धोखाधड़ी बर्दाश्त नहीं होगी। ऐसे में यह वार्ता विश्वास और अविश्वास के बीच संतुलन साधने की चुनौती बन गई है। लेबनान बना सबसे बड़ा शुरुआती विवाद इस वार्ता की शुरुआत से पहले ही लेबनान का मुद्दा सबसे बड़ी अड़चन बनकर सामने आया है। ईरान चाहता है कि लेबनान में पूर्ण युद्धविराम लागू हो, जबकि इजरायल हिजबुल्लाह के खिलाफ अपने सैन्य अभियान को रोकने के मूड में नहीं है। इस टकराव ने वार्ता की सफलता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, क्योंकि इसमें तीसरे पक्ष की भूमिका भी बेहद अहम है। होर्मुज जलडमरूमध्य पर बढ़ता तनाव वैश्विक तेल आपूर्ति की लाइफलाइन माने जाने वाले होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर भी दोनों देशों के बीच तनाव चरम पर है। ईरान इसे अपना संप्रभु क्षेत्र बताते हुए नए ट्रांजिट नियम और टोल लागू करना चाहता है, जबकि अमेरिका ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई है। यह मुद्दा केवल क्षेत्रीय नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने वाला बन चुका है। परमाणु कार्यक्रम पर आमने-सामने ईरान का परमाणु कार्यक्रम इस वार्ता का सबसे संवेदनशील और जटिल पहलू है। डोनाल्ड ट्रंप का स्पष्ट रुख है कि ईरान को यूरेनियम संवर्धन पूरी तरह बंद करना होगा, जबकि ईरान परमाणु अप्रसार संधि का हवाला देते हुए शांतिपूर्ण उपयोग के लिए इसे अपना अधिकार बता रहा है। यही मतभेद इस मुद्दे को सबसे कठिन बना देता है। ‘एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस’ पर टकराव मध्य पूर्व में ईरान का प्रभाव उसके “एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस” नेटवर्क के जरिए मजबूत होता है, जिसमें लेबनान, यमन और गाजा के संगठन शामिल हैं। अमेरिका और उसके सहयोगी इसे क्षेत्रीय स्थिरता के लिए खतरा मानते हैं, जबकि ईरान इसे अपनी सुरक्षा रणनीति का हिस्सा बताता है। सीरिया में हालिया घटनाओं के बावजूद ईरान इस नेटवर्क को छोड़ने के लिए तैयार नहीं दिख रहा। $120 अरब की मांग ने बढ़ाई मुश्किल वार्ता से पहले ही ईरान ने अपनी जमी हुई लगभग 120 अरब डॉलर की संपत्तियों को जारी करने और प्रतिबंध हटाने की मांग रख दी है। अमेरिका ने इस पर अभी तक कोई स्पष्ट सहमति नहीं दी है, जिससे यह आशंका बनी हुई है कि यह मांग वार्ता को पटरी से उतार सकती है। क्या होगा नतीजा? इन सभी जटिल मुद्दों के बीच यह साफ है कि यह वार्ता या तो इतिहास रच सकती है या फिर तनाव को और गहरा कर सकती है। अगर दोनों पक्ष लचीलापन दिखाते हैं, तो मध्य पूर्व में शांति की नई शुरुआत हो सकती है, लेकिन अगर मतभेद कायम रहे, तो यह टकराव और गंभीर रूप ले सकता है।  

surbhi अप्रैल 11, 2026 0
China, US and Iran flags symbolizing diplomatic role in ceasefire and global geopolitical tensions
ईरान-अमेरिका सीजफायर के पीछे चीन की ‘खामोश कूटनीति’? पाकिस्तान की भूमिका पर उठे सवाल

ईरान और अमेरिका के बीच हालिया युद्धविराम ने वैश्विक राजनीति में नया मोड़ ला दिया है। शुरुआती तौर पर जहां इस सीजफायर का श्रेय Shehbaz Sharif और पाकिस्तान की मध्यस्थता को दिया गया, वहीं अब नई रिपोर्ट्स में दावा किया जा रहा है कि असल ‘गेम चेंजर’ China रहा। रिपोर्ट के मुताबिक, एक महीने तक चले संघर्ष के दौरान चीन ने खुलकर कोई भूमिका नहीं निभाई, लेकिन आखिरी समय में उसकी ‘डिस्क्रीट डिप्लोमेसी’ यानी पर्दे के पीछे की बातचीत ने हालात बदल दिए। जब युद्ध तेज होने की कगार पर था और Donald Trump ने सख्त चेतावनी दी, उसी दौरान चीन ने सीधे हस्तक्षेप कर ईरान को वार्ता के लिए तैयार किया। 10 घंटे में बदला खेल बताया जा रहा है कि ट्रंप की कड़ी चेतावनी के बाद महज 10 घंटों में हालात पूरी तरह बदल गए। ईरान ने न केवल सीजफायर पर सहमति दी, बल्कि वैश्विक तेल आपूर्ति के लिए अहम Strait of Hormuz को फिर से खोलने का फैसला भी किया। चीन की रणनीतिक चाल सूत्रों के अनुसार, शुरुआत में चीन ने पाकिस्तान, तुर्की और मिस्र के जरिए अप्रत्यक्ष रूप से बातचीत कराई। लेकिन जैसे ही पूर्ण युद्ध का खतरा बढ़ा, चीन ने सीधे ईरान से संपर्क साधा। यही निर्णायक मोड़ साबित हुआ। इसके अलावा, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में चीन और रूस ने उस प्रस्ताव को भी रोक दिया, जिसमें हॉरमुज़ जलडमरूमध्य को बलपूर्वक खोलने की बात थी। चीन ने इसे ईरान के खिलाफ पक्षपाती बताया। अमेरिका ने क्यों नहीं दिया खुला श्रेय? हालांकि Donald Trump ने अनौपचारिक तौर पर चीन की भूमिका को स्वीकार किया, लेकिन आधिकारिक बयान में पाकिस्तान को ही श्रेय दिया गया। विशेषज्ञों का मानना है कि यह अमेरिका की रणनीति का हिस्सा था, ताकि चीन को वैश्विक स्तर पर ‘बराबरी का मध्यस्थ’ न माना जाए। पाकिस्तान की भूमिका पर उठे सवाल इस घटनाक्रम के बाद पाकिस्तान की भूमिका पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि पाकिस्तान सिर्फ संदेशवाहक की भूमिका में था, जबकि असली कूटनीतिक दबाव चीन ने बनाया। Shehbaz Sharif के एक सोशल मीडिया पोस्ट के ड्राफ्ट को लेकर भी विवाद हुआ, जिसमें “Draft” शब्द दिखने के बाद यह चर्चा तेज हो गई कि संदेश कहीं और से तैयार किया गया था। चीन के हित भी जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि चीन की इस सक्रियता के पीछे उसके आर्थिक हित भी हैं। चीन दुनिया का सबसे बड़ा कच्चा तेल आयातक है और मध्य पूर्व में अस्थिरता उसकी ऊर्जा सुरक्षा और वैश्विक व्यापार को प्रभावित कर सकती थी। अगर युद्ध बढ़ता, तो न केवल ईरान का तेल निर्यात रुक सकता था, बल्कि वैश्विक सप्लाई चेन भी बुरी तरह प्रभावित होती-जिसका सीधा असर चीन की अर्थव्यवस्था पर पड़ता। निष्कर्ष कुल मिलाकर, यह घटनाक्रम दिखाता है कि वैश्विक राजनीति में कई बार असली फैसले पर्दे के पीछे लिए जाते हैं। इस मामले में चीन की चुप्पी ही उसकी सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरी, जिसने अंतिम समय में युद्धविराम को संभव बनाया।  

surbhi अप्रैल 8, 2026 0
Iran US ceasefire diplomacy meeting scene with flags ahead of Islamabad peace talks
ईरान-अमेरिका के बीच सीजफायर के बाद बातचीत शुरू, इस्लामाबाद में शुक्रवार को होगी अहम बैठक

मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच बड़ी कूटनीतिक पहल सामने आई है। Iran और United States के बीच दो हफ्ते के सीजफायर पर सहमति बनने के बाद अब दोनों देशों के बीच औपचारिक वार्ता शुरू होने जा रही है। यह अहम बातचीत Islamabad में शुक्रवार को आयोजित होगी, जिसकी मेजबानी Pakistan करेगा। ईरान की राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के अनुसार, यह बातचीत तेहरान के 10-सूत्रीय प्रस्ताव के आधार पर होगी। इस प्रस्ताव में सबसे अहम मांग Strait of Hormuz पर नियंत्रण और सभी अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों को हटाने की है। सीजफायर के बाद शुरू हुई कूटनीतिक प्रक्रिया यह घटनाक्रम तब सामने आया जब Donald Trump ने ईरान पर हमले अस्थायी रूप से रोकने का ऐलान किया। इसके जवाब में ईरान ने भी अपनी सैन्य कार्रवाई रोकने पर सहमति जताई। दोनों पक्षों ने दो हफ्ते के भीतर स्थायी समझौते की दिशा में काम करने की बात कही है। हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य बना मुख्य मुद्दा दुनिया के लगभग 20% तेल सप्लाई का रास्ता Strait of Hormuz से होकर गुजरता है। ईरान द्वारा आंशिक नाकेबंदी के कारण वैश्विक तेल बाजार में उथल-पुथल मच गई थी, जिससे ईंधन की कीमतें बढ़ीं और कई देशों में सप्लाई प्रभावित हुई। अब अमेरिका ने इस जलमार्ग को पूरी तरह खोलने की शर्त रखी है, जबकि ईरान इसके बदले आर्थिक प्रतिबंध हटाने और क्षेत्रीय प्रभाव बनाए रखने की मांग कर रहा है। पाकिस्तान की मध्यस्थता से बढ़ी उम्मीदें Shehbaz Sharif ने दोनों देशों के बीच सीजफायर की पुष्टि करते हुए इस्लामाबाद में बातचीत के लिए आमंत्रण दिया है। उन्होंने इसे क्षेत्रीय शांति की दिशा में बड़ा कदम बताया है। प्रस्ताव में क्या-क्या शामिल? ईरान के 10-सूत्रीय प्रस्ताव में शामिल प्रमुख मांगें: हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य पर निगरानी और नियंत्रण मध्य-पूर्व से अमेरिकी सैनिकों की वापसी युद्ध से हुए नुकसान की भरपाई सभी आर्थिक प्रतिबंधों को हटाना विदेशी बैंकों में जमा ईरानी संपत्तियों की रिहाई हालांकि, ईरान ने साफ कहा है कि वह अमेरिका पर “पूरी तरह भरोसा नहीं करता” और किसी भी गलती पर कड़ी प्रतिक्रिया देगा। इजरायल की चुप्पी बरकरार इस पूरे घटनाक्रम पर Israel की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है, जबकि वह इस संघर्ष का अहम पक्ष रहा है।  

surbhi अप्रैल 8, 2026 0
Strait of Hormuz oil tankers amid tension, UN Security Council debate on global crisis
होर्मुज संकट: UN में रूस-चीन का वीटो, फ्रांस ने भी रोका प्रस्ताव-क्या ट्रंप की रणनीति को झटका?

मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर वैश्विक राजनीति और कूटनीति अपने चरम पर पहुंच गई है। संयुक्त राष्ट्र में इस अहम समुद्री मार्ग को खोलने के लिए लाए गए प्रस्ताव पर रूस और चीन ने वीटो लगा दिया, जबकि हैरानी की बात यह रही कि नाटो सदस्य फ्रांस ने भी इस प्रस्ताव का विरोध किया। क्या था UN में प्रस्ताव? संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में बहरीन ने एक प्रस्ताव पेश किया था, जिसका उद्देश्य होर्मुज जलडमरूमध्य में फंसे वाणिज्यिक जहाजों की सुरक्षा सुनिश्चित करना था। इस प्रस्ताव में जरूरत पड़ने पर सैन्य कार्रवाई की अनुमति देने का भी प्रावधान शामिल था, ताकि तेल सप्लाई बहाल की जा सके। रूस-चीन ने क्यों लगाया वीटो? रूस और चीन ने इस प्रस्ताव का कड़ा विरोध किया। चीन का कहना है कि सैन्य हस्तक्षेप से हालात और बिगड़ सकते हैं रूस ने ईरान का समर्थन करते हुए प्रस्ताव को खारिज कर दिया दोनों देशों का मानना है कि यह प्रस्ताव अप्रत्यक्ष रूप से अमेरिका की सैन्य रणनीति को समर्थन देता है। फ्रांस का विरोध क्यों चौंकाने वाला? सबसे बड़ा राजनीतिक मोड़ तब आया जब फ्रांस ने भी इस प्रस्ताव का विरोध कर दिया। फ्रांस, नाटो का सदस्य होने के बावजूद अमेरिका के रुख से अलग नजर आया। इससे यह संकेत मिला कि पश्चिमी देशों के बीच भी इस मुद्दे पर एकजुटता नहीं है। क्यों अहम है होर्मुज जलडमरूमध्य? होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्गों में से एक है। वैश्विक तेल सप्लाई का बड़ा हिस्सा यहीं से गुजरता है संघर्ष के कारण जहाजों की आवाजाही लगभग ठप हो गई है इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं ट्रंप की रणनीति पर असर? डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन इस क्षेत्र में सैन्य दबाव बढ़ाकर स्थिति को नियंत्रित करना चाहता है। लेकिन UN में वीटो और सहयोगी देशों के मतभेद से: अमेरिका की रणनीति को झटका लगा है वैश्विक समर्थन कमजोर होता दिख रहा है कूटनीतिक समाधान और मुश्किल हो सकता है आगे क्या? प्रस्ताव के पास होने की संभावना फिलहाल कम दिख रही है तेल बाजार में अस्थिरता जारी रह सकती है बड़े देशों के बीच तनाव और बढ़ सकता है इस पूरे घटनाक्रम ने साफ कर दिया है कि होर्मुज जलडमरूमध्य सिर्फ एक समुद्री रास्ता नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन का केंद्र बन चुका है।  

surbhi अप्रैल 3, 2026 0
US and Israeli military officials in strategic meeting discussing Iran amid rising Middle East tensions
ईरान पर हमले की तैयारी? अमेरिका-इजरायल की सीक्रेट बैठक से बढ़ी वैश्विक चिंता

मध्य पूर्व में तनाव एक बार फिर खतरनाक मोड़ पर पहुंचता दिख रहा है। ताजा रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका और इजरायल के शीर्ष सैन्य अधिकारियों के बीच हुई एक कथित ‘सीक्रेट मीटिंग’ ने इस आशंका को और गहरा कर दिया है कि ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई कभी भी शुरू हो सकती है। क्या है पूरा मामला? रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) के प्रमुख एडमिरल ब्रैड कूपर ने इजरायल में इजरायली डिफेंस फोर्सेज (IDF) के चीफ ऑफ स्टाफ लेफ्टिनेंट जनरल एयाल जमीर के साथ अहम बैठक की। इस बैठक में ईरान की सैन्य क्षमताओं, खासकर उसके हथियार निर्माण ढांचे को कमजोर करने की रणनीति पर चर्चा हुई। इसी दौरान, इजरायली सेना के प्रवक्ता ब्रिगेडियर जनरल एफी डेफ्रिन ने संकेत दिए कि आने वाले दिनों में ईरान के सैन्य उत्पादन के “महत्वपूर्ण हिस्सों” को निशाना बनाया जा सकता है, जिससे उसकी रक्षा क्षमता को बड़ा झटका लगेगा। अमेरिकी सैनिकों की तैनाती और संभावित कार्रवाई रिपोर्ट्स के अनुसार, लगभग 3,500 अमेरिकी सैनिक पहले ही मध्य पूर्व में तैनात किए जा चुके हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump के पास किसी भी वक्त सैन्य कार्रवाई का आदेश देने का विकल्प मौजूद है। इसके साथ ही, अमेरिका का उभयचर हमला जहाज USS Tripoli (LHA-7) भी क्षेत्र में पहुंच चुका है, जो आधुनिक युद्ध क्षमताओं से लैस है और इसमें फाइटर जेट्स, हेलीकॉप्टर और बड़ी संख्या में मरीन तैनात हैं। क्या होगा ग्राउंड ऑपरेशन? रिपोर्ट्स यह भी संकेत देती हैं कि संभावित सैन्य अभियान पारंपरिक बड़े पैमाने के युद्ध जैसा नहीं होगा। इसके बजाय, इसमें स्पेशल फोर्सेज और पैदल सेना की संयुक्त टीमों द्वारा सीमित और टारगेटेड ऑपरेशन शामिल हो सकते हैं। इसका मकसद ईरान की सैन्य और परमाणु क्षमताओं को कमजोर करना हो सकता है, बिना पूर्ण युद्ध में उतरे। वैश्विक असर की आशंका अगर यह सैन्य कार्रवाई शुरू होती है, तो इसका असर सिर्फ मध्य पूर्व तक सीमित नहीं रहेगा। तेल की कीमतों, वैश्विक अर्थव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा पर इसका व्यापक प्रभाव पड़ सकता है। हालांकि, अभी तक अमेरिका या इजरायल की ओर से इस तरह की किसी कार्रवाई की आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है। ऐसे में इन रिपोर्ट्स को संभावित रणनीतिक तैयारी के तौर पर देखा जा रहा है, न कि अंतिम निर्णय के रूप में।  

surbhi मार्च 30, 2026 0
Ukrainian military experts training Middle East forces on anti-drone systems amid rising Iran drone threat
मिडिल ईस्ट में यूक्रेन की ‘ड्रोन डिप्लोमेसी’: रूस से जंग के बीच 200+ मिलिट्री एक्सपर्ट क्यों तैनात?

रूस के साथ जारी युद्ध के बीच एक सवाल वैश्विक रणनीतिक हलकों में तेजी से उभरा है-जब यूक्रेन खुद मोर्चे पर है, तो उसके 200 से अधिक सैन्य विशेषज्ञ मिडिल ईस्ट में क्या कर रहे हैं? इस सवाल का जवाब खुद वोलोडिमीर ज़ेलेंस्की ने ब्रिटेन की संसद में दिया, और इसके साथ ही एक नई भू-राजनीतिक तस्वीर सामने आई। यूक्रेन की ‘नई भूमिका’: युद्ध से सहयोग तक ज़ेलेंस्की के मुताबिक, यूक्रेन के 200 से ज्यादा एंटी-ड्रोन मिलिट्री एक्सपर्ट इस समय खाड़ी और मिडिल ईस्ट के कई देशों में तैनात हैं। ये सैनिक पारंपरिक युद्ध नहीं लड़ रहे, बल्कि: ईरानी ड्रोन हमलों से बचाव की ट्रेनिंग दे रहे हैं   स्थानीय सुरक्षा एजेंसियों को तकनीकी सहायता प्रदान कर रहे हैं   एंटी-ड्रोन सिस्टम को मजबूत करने में मदद कर रहे हैं   यह यूक्रेन की रणनीति में बड़ा बदलाव दर्शाता है- ‘सिर्फ युद्ध लड़ने वाला देश’ से ‘सुरक्षा समाधान देने वाला साझेदार’। किन देशों में है तैनाती? यूक्रेनी राष्ट्रपति ने स्पष्ट किया कि उनकी टीमें: संयुक्त अरब अमीरात   कतर   सऊदी अरब   में पहले से मौजूद हैं, जबकि अगला पड़ाव कुवैत है। इसके अलावा, कई अन्य देशों के साथ भी समझौते हो चुके हैं। ईरान के ड्रोन: असली खतरा क्या है? मिडिल ईस्ट में तनाव की जड़ है ईरान के ‘शाहेद’ ड्रोन, जिन्हें कम लागत और आत्मघाती हमले की क्षमता के कारण बेहद घातक माना जाता है। ज़ेलेंस्की ने कहा: यही ड्रोन रूस 2022 से यूक्रेन के खिलाफ इस्तेमाल कर रहा है   ईरान ने न सिर्फ रूस को ये ड्रोन दिए, बल्कि इनके इस्तेमाल और निर्माण की तकनीक भी साझा की   यानी यूक्रेन अब उसी खतरे से दूसरों को बचाने की कोशिश कर रहा है, जिससे वह खुद जूझ चुका है। ‘रूस-ईरान गठजोड़’ पर सीधा हमला अपने भाषण में ज़ेलेंस्की ने साफ कहा: “रूस और ईरान नफरत के साझेदार हैं, और हथियारों में भी सहयोगी।” उनका संदेश स्पष्ट था- यह केवल यूक्रेन की जंग नहीं है   बल्कि वैश्विक सुरक्षा का मुद्दा है   ड्रोन टेक्नोलॉजी: यूक्रेन की असली ताकत यूक्रेन ने पिछले कुछ वर्षों में ड्रोन युद्ध में असाधारण प्रगति की है। ज़ेलेंस्की के अनुसार: रूस को होने वाले 90% नुकसान ड्रोन के जरिए हो रहे हैं   यूक्रेन अब रोजाना 2000 तक इंटरसेप्टर ड्रोन बना सकता है   इनमें शामिल हैं: FPV इंटरसेप्टर ड्रोन   समुद्री ड्रोन   एंटी-एयर डिफेंस ड्रोन   यह तकनीक अब यूक्रेन की ‘एक्सपोर्टेबल सिक्योरिटी स्ट्रेंथ’ बन चुकी है। अमेरिका क्यों अलग खड़ा है? दिलचस्प बात यह है कि जहां खाड़ी देश यूक्रेन की मदद ले रहे हैं, वहीं डोनाल्ड ट्रंप ने साफ कहा कि अमेरिका को इस मामले में यूक्रेन की मदद की जरूरत नहीं है। अमेरिका ने अपने स्तर पर ‘लुकास’ ड्रोन सिस्टम विकसित किया है, जो ईरानी ड्रोन का मुकाबला करने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। असली कहानी: रणनीति या मजबूरी? यूक्रेन का यह कदम केवल सहयोग नहीं, बल्कि एक रणनीतिक संदेश भी है: वैश्विक मंच पर अपनी उपयोगिता साबित करना   सहयोगी देशों के साथ सैन्य रिश्ते मजबूत करना   रूस-ईरान गठजोड़ के खिलाफ व्यापक मोर्चा तैयार करना   क्यों अहम है यह घटनाक्रम? मिडिल ईस्ट में यूक्रेन की यह सक्रियता कई बड़े संकेत देती है: युद्ध अब सीमाओं तक सीमित नहीं रहा   ड्रोन टेक्नोलॉजी आधुनिक युद्ध का केंद्र बन चुकी है   छोटे लेकिन तकनीकी रूप से सक्षम देश भी वैश्विक समीकरण बदल सकते हैं  

surbhi मार्च 18, 2026 0
Iranian security chief Ali Larijani killed in Israeli strike amid escalating Iran Israel conflict
ईरान-इजरायल संघर्ष: सिक्योरिटी चीफ अली लारिजानी की मौत से ईरान को बड़ा रणनीतिक झटका, क्यों यह नुकसान सुप्रीम लीडर से भी ज्यादा भारी माना जा रहा है

मध्य-पूर्व में जारी संघर्ष के बीच ईरान को अब तक का सबसे बड़ा रणनीतिक झटका लगा है। इजरायली हमले में ईरान की शीर्ष सुरक्षा संस्था के प्रमुख अली लारिजानी की मौत की पुष्टि खुद सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल ने की है। इस हमले में उनके बेटे और कई अन्य वरिष्ठ अधिकारी भी मारे गए हैं। विशेषज्ञ मान रहे हैं कि यह नुकसान केवल एक व्यक्ति की मौत नहीं, बल्कि ईरान की सुरक्षा और कूटनीतिक रणनीति के केंद्र को झटका है। क्यों थे अली लारिजानी इतने अहम? अली लारिजानी ईरान की सत्ता संरचना के उन दुर्लभ चेहरों में थे, जिनका प्रभाव राजनीति, सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति-तीनों स्तरों पर फैला हुआ था। उन्होंने वर्षों तक ईरान के सरकारी मीडिया तंत्र को नियंत्रित किया   बाद में वे सुप्रीम लीडर अली खामेनेई के करीबी सुरक्षा सलाहकार बने   2005 में उन्हें देश का शीर्ष परमाणु वार्ताकार नियुक्त किया गया   वे रूस, चीन जैसे देशों में भी मजबूत कूटनीतिक नेटवर्क रखते थे   लारिजानी की सबसे बड़ी ताकत यह थी कि वे अलग-अलग सत्ता केंद्रों के बीच संतुलन बनाकर फैसले लागू कराने की क्षमता रखते थे। क्यों उनकी मौत को “सुप्रीम लीडर से भी बड़ा झटका” कहा जा रहा है? सवाल यही है कि एक सिक्योरिटी चीफ की मौत को इतना बड़ा नुकसान क्यों माना जा रहा है। इसके पीछे कई ठोस कारण हैं: 1. रणनीतिक दिमाग का नुकसान लारिजानी केवल पद पर बैठे अधिकारी नहीं थे, बल्कि ईरान की सुरक्षा और विदेश नीति के प्रमुख रणनीतिकार थे। उनकी अनुपस्थिति में तत्काल निर्णय लेने की क्षमता कमजोर पड़ सकती है। 2. अंतरराष्ट्रीय कनेक्शन का टूटना उनके रूस, चीन और पश्चिमी देशों के साथ स्थापित रिश्ते किसी और के पास उसी स्तर पर नहीं हैं। इससे युद्ध के बाद संभावित बातचीत और सीजफायर प्रयास प्रभावित हो सकते हैं। 3. सत्ता के भीतर संतुलन बिगड़ना ईरान की राजनीति कई धड़ों में बंटी हुई है। लारिजानी उन कुछ नेताओं में थे जो इन धड़ों के बीच संतुलन बनाए रखते थे। उनके जाने से आंतरिक अस्थिरता बढ़ सकती है। 4. युद्ध के बीच नेतृत्व में खालीपन 18 दिनों से जारी इस संघर्ष के बीच ऐसे समय पर शीर्ष सुरक्षा नेतृत्व का खत्म होना युद्ध संचालन पर सीधा असर डाल सकता है।   क्या यह हमला सिर्फ सैन्य कार्रवाई नहीं, बल्कि रणनीतिक निशाना था? विश्लेषकों का मानना है कि यह हमला केवल सैन्य कार्रवाई नहीं, बल्कि ईरान की भविष्य की रणनीति को कमजोर करने की सोची-समझी कोशिश है। इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू पर आरोप लग रहे हैं कि वे संभावित सीजफायर और अमेरिका-ईरान वार्ता के रास्ते को रोकना चाहते हैं-और लारिजानी उस प्रक्रिया के अहम सूत्रधार हो सकते थे। पिछले बड़े झटकों से तुलना विशेषज्ञ इस घटना की तुलना 2020 में बगदाद में हुए उस हमले से कर रहे हैं, जिसमें ईरानी सैन्य कमांडर कासिम सुलेमानी की मौत हुई थी। माना जा रहा है कि उसके बाद यह ईरान के लिए सबसे बड़ा झटका है। लारिजानी की मौत से न केवल युद्ध की दिशा प्रभावित हो सकती है, बल्कि मध्य-पूर्व में शक्ति संतुलन भी बदल सकता है। अब सबकी नजर इस बात पर है कि ईरान इस नुकसान की भरपाई कैसे करता है और क्या यह घटना संघर्ष को और भड़का देगी या कूटनीतिक समाधान की संभावनाओं को और कमजोर कर देगी।  

surbhi मार्च 18, 2026 0
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शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

Top week

Indian delegation at international cyber security meeting after India assumed CCDB chairmanship role
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भारत को मिली बड़ी अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारी, संभाला CCDB के अध्यक्ष का पद

surbhi मई 15, 2026 0