नई दिल्ली: अभिनेता अनिल कपूर की भाभी और बिजनेसमैन संजय कपूर की पत्नी महीप कपूर ने पहली बार खुलकर बताया कि कैसे टाइप 1 डायबिटीज की वजह से उनका वजन अचानक 15 किलोग्राम तक कम हो गया और शुरुआत में उन्होंने इसे कोविड-19 का असर समझ लिया। अभिनेत्री सोहा अली खान के पॉडकास्ट में बातचीत के दौरान महीप ने अपनी बीमारी, गलतफहमी और समय पर इलाज न मिलने से जुड़ी पूरी कहानी साझा की। उन्होंने बताया कि बीमारी का पता चलने से पहले उनका शरीर लगातार संकेत दे रहा था, लेकिन कोविड महामारी के दौरान डॉक्टर के पास जाने से बचने और लक्षणों को वायरस का प्रभाव मान लेने के कारण सही समय पर बीमारी की पहचान नहीं हो सकी। हालात इतने गंभीर हो गए कि एक यात्रा के दौरान दिल्ली पहुंचते ही वह अचानक गिर पड़ीं और उन्हें तुरंत अस्पताल के आईसीयू में भर्ती कराना पड़ा। कोविड का असर समझती रहीं, लेकिन वजह थी डायबिटीज महीप कपूर ने बताया कि डायबिटीज का पता चलने से पहले उन्हें टाइफाइड भी हुआ था। इसके साथ ही उनके पीरियड्स अनियमित होने लगे, वजन तेजी से घटने लगा और उन्हें महसूस हो रहा था कि शरीर पहले जैसा नहीं रहा। उस समय वह पेरीमेनोपॉज के दौर से भी गुजर रही थीं, इसलिए कई बदलाव सामान्य हार्मोनल परिवर्तन जैसे लगे। कोविड-19 संक्रमण के बाद उनका वजन लगभग 15 किलोग्राम कम हो गया। उन्होंने इसे कोविड का साइड इफेक्ट समझ लिया और करीब तीन महीने तक लगातार काम और यात्रा करती रहीं। इस दौरान उनकी वास्तविक बीमारी लगातार बढ़ती रही। दिल्ली पहुंचते ही बिगड़ी तबीयत महीप ने बताया कि लगातार यात्रा के बाद जैसे ही वह दिल्ली पहुंचीं, उनकी तबीयत अचानक बिगड़ गई और वह गिर पड़ीं। उन्हें तुरंत अस्पताल ले जाकर आईसीयू में भर्ती किया गया। जांच के बाद डॉक्टरों ने टाइप 1 डायबिटीज की पुष्टि की और इंसुलिन थेरेपी शुरू की। उन्होंने कहा कि अब वह अपनी सेहत को लेकर बेहद सतर्क रहती हैं और नियमित रूप से ब्लड शुगर की जांच करती हैं ताकि किसी भी तरह की जटिलता से बचा जा सके। उन्हें वर्ष 2022 में टाइप 1 डायबिटीज का निदान हुआ था। टाइप 1 डायबिटीज में वजन तेजी से क्यों घटता है? टाइप 1 डायबिटीज में शरीर पर्याप्त मात्रा में इंसुलिन नहीं बना पाता। इंसुलिन का काम रक्त में मौजूद ग्लूकोज को कोशिकाओं तक पहुंचाकर उसे ऊर्जा में बदलना होता है। जब इंसुलिन की कमी होती है, तो शरीर ग्लूकोज का उपयोग नहीं कर पाता। ऐसे में शरीर ऊर्जा की जरूरत पूरी करने के लिए फैट और मांसपेशियों को तोड़ना शुरू कर देता है। यही वजह है कि मरीज का वजन तेजी से कम होने लगता है। इसके अलावा, रक्त में बढ़ी हुई शुगर को बाहर निकालने के लिए किडनी अधिक मेहनत करती है, जिससे शरीर की ऊर्जा और तेजी से खर्च होती है। परिणामस्वरूप व्यक्ति में कमजोरी, थकान और तेजी से वजन घटने जैसी समस्याएं दिखाई देने लगती हैं। क्या है टाइप 1 डायबिटीज? टाइप 1 डायबिटीज एक ऑटोइम्यून बीमारी है। इसमें शरीर का इम्यून सिस्टम गलती से अग्न्याशय (Pancreas) की उन बीटा कोशिकाओं पर हमला कर देता है जो इंसुलिन बनाती हैं। जब ये कोशिकाएं नष्ट हो जाती हैं, तो शरीर में इंसुलिन का उत्पादन लगभग बंद हो जाता है और मरीज को जीवनभर इंसुलिन पर निर्भर रहना पड़ सकता है। क्या केवल बच्चों को होती है टाइप 1 डायबिटीज? आम धारणा है कि टाइप 1 डायबिटीज केवल बच्चों या किशोरों में होती है, लेकिन ऐसा पूरी तरह सही नहीं है। विशेषज्ञों के अनुसार, इस बीमारी के कई मामले वयस्कों में भी सामने आते हैं। कई बार डॉक्टर भी शुरुआती लक्षणों को टाइप 2 डायबिटीज समझ लेते हैं, जिससे सही इलाज में देरी हो सकती है। कुछ मामलों में 70–80 वर्ष की उम्र में भी टाइप 1 डायबिटीज का पता चलता है। किन लक्षणों को नजरअंदाज न करें? बिना किसी स्पष्ट कारण के तेजी से वजन कम होना बार-बार प्यास लगना बार-बार पेशाब आना अत्यधिक थकान और कमजोरी धुंधला दिखाई देना लगातार भूख लगना यदि ये लक्षण लंबे समय तक बने रहें, तो तुरंत डॉक्टर से जांच कराना जरूरी है।
नई दिल्ली: गर्मियों में घंटों एयर कंडीशनर (AC) में रहने के बाद जब अचानक 40 डिग्री या उससे अधिक तापमान वाली तेज धूप में निकलते हैं, तो शरीर को कुछ ही सेकंड में खुद को नए तापमान के अनुसार ढालना पड़ता है। इस दौरान कई लोगों को सांस फूलना, दिल की धड़कन तेज होना, चक्कर आना, कमजोरी या सीने में बेचैनी जैसी समस्याएं महसूस हो सकती हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, स्वस्थ लोगों में यह बदलाव अक्सर कुछ समय के लिए होता है, लेकिन हृदय रोग, हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, अस्थमा और बुजुर्गों के लिए यह स्थिति गंभीर हो सकती है। ऐसे लक्षणों को हल्के में लेना सही नहीं है। AC से निकलते ही दिल पर क्यों बढ़ता है दबाव? जब कोई व्यक्ति 22–24°C तापमान वाले कमरे से निकलकर 40°C या उससे अधिक गर्म वातावरण में पहुंचता है, तो शरीर तुरंत खुद को ठंडा रखने की कोशिश शुरू कर देता है। इस प्रक्रिया में: त्वचा की रक्त वाहिकाएं फैलने लगती हैं। शरीर पसीने के जरिए तापमान कम करने की कोशिश करता है। हृदय को त्वचा तक ज्यादा रक्त पहुंचाने के लिए अधिक मेहनत करनी पड़ती है। इससे कुछ समय के लिए हार्ट रेट बढ़ सकती है और दिल पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है। विशेषज्ञों के मुताबिक, गर्म मौसम में शरीर को ठंडा रखने के लिए हृदय को सामान्य से ज्यादा काम करना पड़ता है। क्यों फूलने लगती है सांस? तेज गर्मी और उमस में शरीर को ऑक्सीजन की जरूरत बढ़ जाती है। यदि किसी व्यक्ति को पहले से हार्ट डिजीज, अस्थमा, COPD या अन्य श्वसन संबंधी बीमारी है, तो अचानक तापमान बदलने पर सांस लेने में दिक्कत महसूस हो सकती है। ब्लड प्रेशर पर भी पड़ सकता है असर तापमान बदलने से रक्त वाहिकाएं सिकुड़ने और फैलने लगती हैं। इसका असर ब्लड प्रेशर पर भी पड़ सकता है। कुछ लोगों में इसके कारण: चक्कर आना कमजोरी सिर भारी लगना घबराहट दिल की धड़कन तेज होना जैसी समस्याएं हो सकती हैं। किन लोगों को सबसे ज्यादा सावधान रहने की जरूरत? इन लोगों में जोखिम अपेक्षाकृत अधिक हो सकता है: बुजुर्ग हाई ब्लड प्रेशर के मरीज हार्ट अटैक या हार्ट फेलियर का इतिहास रखने वाले लोग डायबिटीज के मरीज अस्थमा या फेफड़ों की बीमारी से पीड़ित व्यक्ति खुद को कैसे रखें सुरक्षित? AC से बाहर निकलने से पहले कुछ मिनट सामान्य तापमान वाले स्थान पर रहें। AC का तापमान 24–26°C के बीच रखें। पर्याप्त मात्रा में पानी पीते रहें ताकि शरीर डिहाइड्रेट न हो। धूप में निकलते समय टोपी, छाता और हल्के रंग के कपड़े पहनें। दोपहर की तेज धूप में अनावश्यक बाहर निकलने से बचें। कब तुरंत डॉक्टर से मिलना चाहिए? यदि AC से बाहर आने के बाद बार-बार ये लक्षण दिखाई दें, तो तुरंत चिकित्सकीय सलाह लें: सीने में दर्द या दबाव लगातार सांस फूलना बहुत तेज या अनियमित धड़कन चक्कर आना या बेहोशी जैसा महसूस होना अत्यधिक कमजोरी या पसीना आना ये लक्षण केवल गर्मी की वजह से ही नहीं, बल्कि किसी गंभीर हृदय समस्या का संकेत भी हो सकते हैं।
रांची। मानसून शुरू होते ही झारखंड के जंगलों में मिलने वाला रुगड़ा (पुटू) मशरूम बाजारों की रौनक बढ़ा देता है। यह देसी जंगली मशरूम केवल बारिश के मौसम में प्राकृतिक रूप से उगता है और स्थानीय लोगों के बीच बेहद लोकप्रिय है। स्वाद और पौष्टिकता के कारण इसे झारखंड का पारंपरिक खजाना माना जाता है। सीमित समय के लिए मिलने वाला यह मशरूम हर साल लोगों को बेसब्री से इंतजार कराता है। साल के जंगलों में प्राकृतिक रूप से उगता है रुगड़ा रुगड़ा मुख्य रूप से झारखंड के साल के जंगलों में मिट्टी के अंदर उगता है। इसे स्थानीय भाषा में पुटू भी कहा जाता है। सफेद और गोल आकार वाले इस मशरूम को मिट्टी हटाकर सावधानी से निकाला जाता है। इसकी प्राकृतिक उपलब्धता सीमित होने के कारण बाजार में इसकी मांग हमेशा अधिक रहती है। स्वाद और पोषण का अनोखा मेल रुगड़ा का स्वाद इतना अलग और लाजवाब होता है कि कई लोग इसकी तुलना चिकन और मटन से करते हैं। पकने के बाद इसका बाहरी हिस्सा हल्का कुरकुरा और अंदर का भाग बेहद मुलायम हो जाता है। सावन के दौरान मांसाहार से परहेज करने वाले लोगों के लिए यह स्वादिष्ट और पौष्टिक शाकाहारी विकल्प माना जाता है। खरीदते और साफ करते समय रखें सावधानी चूंकि रुगड़ा मिट्टी के अंदर उगता है, इसलिए इसे पकाने से पहले अच्छी तरह साफ करना जरूरी होता है। खरीदते समय एक-दो रुगड़ा काटकर देख लेना चाहिए ताकि वह अंदर से ताजा और सुरक्षित हो। अच्छी गुणवत्ता वाला रुगड़ा स्वाद के साथ स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी माना जाता है। ऐसे बनाएं स्वादिष्ट रुगड़ा करी रुगड़ा करी बनाने के लिए सबसे पहले मशरूम को अच्छी तरह धोकर बीच से काट लें और हल्का भून लें। इसके बाद कड़ाही में तेल गर्म कर जीरा, प्याज और टमाटर भूनें। फिर हल्दी, धनिया, लाल मिर्च और नमक जैसे मसाले डालकर अच्छी तरह पकाएं। अब इसमें भुना हुआ रुगड़ा मिलाकर धीमी आंच पर कुछ मिनट पकाएं। अंत में गरम मसाला और हरा धनिया डालकर इसे गर्मागर्म चावल या रोटी के साथ परोसें। स्वाद और पोषण से भरपूर यह पारंपरिक झारखंडी व्यंजन मानसून का आनंद कई गुना बढ़ा देता है।
नई दिल्ली: आज की भागदौड़ भरी जिंदगी, बढ़ता तनाव, नींद की कमी और अनियमित खानपान ने माइग्रेन की समस्या को आम बना दिया है। यह केवल साधारण सिरदर्द नहीं, बल्कि एक ऐसी न्यूरोलॉजिकल समस्या है जो कई घंटों तक व्यक्ति की दिनचर्या पूरी तरह प्रभावित कर सकती है। माइग्रेन के दौरान सिर के एक हिस्से में तेज दर्द, मतली, उल्टी, तेज रोशनी और आवाज से परेशानी जैसी समस्याएं देखने को मिलती हैं। दवाओं के अलावा कुछ घरेलू उपाय भी माइग्रेन के लक्षणों को कम करने में मदद कर सकते हैं। इन्हीं में से एक है अजवाइन, जो लगभग हर भारतीय रसोई में आसानी से मिल जाती है। आयुर्वेद में लंबे समय से अजवाइन का उपयोग पाचन, गैस, सर्दी-जुकाम और सिरदर्द जैसी समस्याओं में किया जाता रहा है। क्यों होता है माइग्रेन? विशेषज्ञों के अनुसार माइग्रेन एक न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर है, जिसमें सिर के एक हिस्से में बार-बार तेज दर्द होता है। यह दर्द 4 घंटे से लेकर 72 घंटे तक भी बना रह सकता है। इसके साथ कई लोगों को मतली, उल्टी, धुंधला दिखाई देना और चिड़चिड़ापन भी महसूस होता है। माइग्रेन के सामान्य ट्रिगर हैं: लगातार मानसिक तनाव पर्याप्त नींद न लेना हार्मोनल बदलाव लंबे समय तक भूखे रहना कुछ विशेष खाद्य पदार्थ तेज रोशनी और तेज आवाज माइग्रेन में कैसे फायदेमंद है अजवाइन? अजवाइन में थाइमोल (Thymol) नामक सक्रिय तत्व पाया जाता है। शोध के अनुसार इसमें एंटी-इन्फ्लेमेटरी, एंटीऑक्सीडेंट और दर्द कम करने वाले गुण मौजूद होते हैं। आयुर्वेद के अनुसार अजवाइन में: पाचन शक्ति बढ़ाने वाले गुण वात और कफ को संतुलित करने की क्षमता गैस और अपच कम करने वाले तत्व पाए जाते हैं, जो अप्रत्यक्ष रूप से माइग्रेन के कुछ ट्रिगर्स को कम करने में मदद कर सकते हैं। माइग्रेन में अजवाइन के संभावित फायदे 1. तनाव कम करने में मदद अजवाइन में मौजूद एंटीऑक्सीडेंट शरीर में ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस को कम करने में सहायक माने जाते हैं। तनाव कम होने से माइग्रेन के एपिसोड की तीव्रता भी कम हो सकती है। 2. पाचन सुधारकर राहत कई लोगों में गैस, अपच और पेट की गड़बड़ी माइग्रेन का कारण बनती है। अजवाइन पाचन को बेहतर बनाकर इस ट्रिगर को कम करने में मदद कर सकती है। 3. सूजन कम करने में सहायक शरीर में सूजन भी माइग्रेन के लक्षणों को बढ़ा सकती है। अजवाइन के एंटी-इन्फ्लेमेटरी गुण सूजन कम करने में मदद कर सकते हैं। माइग्रेन में अजवाइन का इस्तेमाल कैसे करें? 1. अजवाइन की गर्म पोटली 2 से 4 चम्मच अजवाइन को तवे पर हल्का गर्म करें। इसे सूती कपड़े में बांधकर पोटली बना लें। समय-समय पर इसकी हल्की सुगंध लें। इससे बंद नाक खुलने, रक्त संचार बेहतर होने और सिरदर्द में कुछ राहत महसूस हो सकती है। 2. अजवाइन का पानी 2 कप पानी में 2 चम्मच अजवाइन डालें। इसे कुछ मिनट तक उबालें। छानकर सुबह और शाम हल्का गुनगुना पी सकते हैं। यह पाचन बेहतर रखने में मदद कर सकता है, जिससे माइग्रेन के कुछ ट्रिगर्स कम हो सकते हैं। माइग्रेन से बचने के लिए अपनाएं ये आदतें पर्याप्त मात्रा में पानी पिएं। रोज 7-8 घंटे की नींद लें। तेज रोशनी और तेज आवाज से बचें। लंबे समय तक खाली पेट न रहें। प्रोसेस्ड फूड और अत्यधिक कैफीन से दूरी बनाएं। योग, मेडिटेशन और नियमित व्यायाम करें। अपने माइग्रेन ट्रिगर्स की पहचान कर उनसे बचने की कोशिश करें।
नई दिल्ली: लंबे समय तक खड़े रहने, अधिक चलने या हल्की चोट लगने के बाद पैरों में सूजन आना आम बात है। लेकिन अगर बिना किसी स्पष्ट कारण के पैरों, टखनों या तलवों में लगातार सूजन बनी रहती है, तो इसे हल्के में लेना खतरनाक साबित हो सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह हार्ट फेलियर, किडनी की बीमारी, लिवर संबंधी समस्याओं या रक्त संचार में गड़बड़ी जैसी गंभीर बीमारियों का शुरुआती संकेत हो सकता है। सीनियर इंटरनल मेडिसिन विशेषज्ञ डॉ. एलेक्स मैथ्यू के अनुसार, जब शरीर के टिश्यू में अतिरिक्त तरल पदार्थ जमा होने लगता है, तो पैरों में सूजन यानी एडिमा (Edema) की समस्या होती है। यदि सूजन वाली जगह पर उंगली दबाने के बाद कुछ समय तक गड्ढा बना रहे, तो इसे पिटिंग एडिमा कहा जाता है, जो कई गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं से जुड़ा संकेत हो सकता है। हार्ट फेलियर का शुरुआती संकेत हो सकती है सूजन जब हृदय शरीर में पर्याप्त मात्रा में रक्त पंप नहीं कर पाता, तो अतिरिक्त तरल पदार्थ पैरों और टखनों में जमा होने लगता है। इसे कंजेस्टिव हार्ट फेलियर कहा जाता है। इस स्थिति में आमतौर पर दोनों पैरों में सूजन के साथ-साथ ये लक्षण भी दिखाई दे सकते हैं: सांस फूलना जल्दी थक जाना सीने में भारीपन रात में सांस लेने में परेशानी किडनी ठीक से काम न करे तो भी फूल सकते हैं पैर किडनी शरीर से अतिरिक्त पानी और विषैले तत्व बाहर निकालने का काम करती है। जब इसकी कार्यक्षमता कम हो जाती है, तो शरीर में पानी जमा होने लगता है। ऐसे मामलों में मरीज को दिखाई दे सकते हैं: पैरों और टखनों में सूजन चेहरे पर सूजन पेशाब में बदलाव लगातार थकान क्रोनिक किडनी डिजीज (CKD) के मरीजों में यह लक्षण काफी आम माना जाता है। लिवर की बीमारी भी बन सकती है वजह लिवर एल्ब्यूमिन नामक महत्वपूर्ण प्रोटीन बनाता है, जो रक्त वाहिकाओं में तरल पदार्थ को नियंत्रित रखने में मदद करता है। यदि लिवर सिरोसिस या अन्य गंभीर बीमारी से प्रभावित हो जाए, तो एल्ब्यूमिन कम बनने लगता है, जिससे: पैरों में सूजन पेट में पानी भरना शरीर में भारीपन जैसी समस्याएं सामने आ सकती हैं। नसों में खून का थक्का भी हो सकता है कारण यदि किसी एक पैर में अचानक सूजन, दर्द, गर्माहट या लालिमा दिखाई दे, तो यह डीप वेन थ्रॉम्बोसिस (DVT) यानी नस में रक्त का थक्का बनने का संकेत हो सकता है। यह स्थिति गंभीर होती है और तुरंत डॉक्टर से जांच करानी चाहिए क्योंकि थक्का फेफड़ों तक पहुंचकर जानलेवा भी बन सकता है। शरीर में प्रोटीन की कमी से भी आती है सूजन कुपोषण, किडनी रोग या लिवर की बीमारी के कारण शरीर में एल्ब्यूमिन का स्तर कम हो सकता है। ऐसे में रक्त से तरल पदार्थ बाहर निकलकर टिश्यू में जमा होने लगता है, जिससे पैरों में सूजन दिखाई देती है। कुछ दवाएं भी बढ़ा सकती हैं परेशानी विशेषज्ञों के अनुसार इन दवाओं के सेवन से भी पैरों में सूजन हो सकती है: हाई ब्लड प्रेशर की कुछ दवाएं स्टेरॉयड हार्मोनल दवाएं कुछ दर्द निवारक दवाएं डायबिटीज की कुछ दवाएं यदि नई दवा शुरू करने के बाद सूजन आने लगे, तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है। पैरों की सूजन से बचने के आसान उपाय लंबे समय तक लगातार खड़े या बैठे न रहें। नमक का सेवन सीमित करें। पर्याप्त मात्रा में पानी पिएं। नियमित व्यायाम करें। वजन नियंत्रित रखें। बैठते समय पैरों को हल्का ऊंचा रखें। डॉक्टर की सलाह के बिना दवाओं में बदलाव न करें। कब तुरंत डॉक्टर से मिलना चाहिए? यदि पैरों की सूजन के साथ इनमें से कोई लक्षण दिखाई दे, तो तुरंत चिकित्सकीय सलाह लें: अचानक दोनों या एक पैर में तेज सूजन सांस लेने में तकलीफ सीने में दर्द तेज दर्द या लालिमा पेशाब कम होना कई दिनों तक सूजन का बने रहना
नई दिल्ली: अंडे को दुनिया के सबसे संपूर्ण और पौष्टिक खाद्य पदार्थों में गिना जाता है। इसमें हाई क्वालिटी प्रोटीन, विटामिन, मिनरल्स, हेल्दी फैट्स और कई जरूरी पोषक तत्व मौजूद होते हैं, जो शरीर के विभिन्न अंगों और कार्यों को बेहतर बनाए रखने में मदद करते हैं। यदि संतुलित आहार के साथ लगातार 30 दिनों तक रोज़ाना दो अंडे खाए जाएं, तो शरीर में कई सकारात्मक बदलाव महसूस किए जा सकते हैं। डाइटिशियन गिन्नी कालरा के अनुसार, अंडे कोई जादुई भोजन नहीं हैं, लेकिन नियमित और संतुलित मात्रा में सेवन करने से शरीर को आवश्यक पोषण मिलता है, जिससे मांसपेशियों, दिमाग, आंखों, हड्डियों और त्वचा की सेहत में सुधार देखने को मिल सकता है। मसल्स होंगे मजबूत, रिकवरी होगी तेज दो अंडों से लगभग 12–13 ग्राम उच्च गुणवत्ता वाला प्रोटीन मिलता है। इसमें शरीर के लिए आवश्यक सभी नौ अमीनो एसिड मौजूद होते हैं, जो मांसपेशियों के विकास, टिश्यू रिपेयर और रिकवरी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। नियमित व्यायाम करने वाले, बुजुर्ग और बीमारी से उबर रहे लोगों के लिए यह विशेष रूप से लाभदायक माना जाता है। देर तक नहीं लगेगी भूख अंडे में मौजूद प्रोटीन और हेल्दी फैट्स धीरे-धीरे पचते हैं, जिससे पेट लंबे समय तक भरा रहता है। अगर नाश्ते में दो अंडे शामिल किए जाएं तो बार-बार स्नैकिंग की आदत कम हो सकती है और वजन नियंत्रित रखने में भी मदद मिल सकती है। दिमाग रहेगा अधिक सक्रिय अंडों में कोलीन (Choline) नामक पोषक तत्व पाया जाता है, जो मस्तिष्क, याददाश्त और नर्वस सिस्टम के लिए बेहद जरूरी है। यह एसिटाइलकोलीन नामक न्यूरोट्रांसमीटर के निर्माण में मदद करता है, जिससे सीखने की क्षमता, एकाग्रता और मानसिक सतर्कता बेहतर हो सकती है। आंखों की सेहत को मिलेगा फायदा अंडे में मौजूद ल्यूटिन और जेक्सैंथिन जैसे एंटीऑक्सीडेंट आंखों की रेटिना की सुरक्षा करते हैं। ये बढ़ती उम्र और लंबे समय तक स्क्रीन देखने से होने वाले नुकसान को कम करने में सहायक माने जाते हैं। हड्डियां होंगी मजबूत अंडे प्राकृतिक रूप से विटामिन-डी का स्रोत हैं, जो शरीर में कैल्शियम के अवशोषण में मदद करता है। इससे हड्डियों और दांतों की मजबूती के साथ-साथ इम्यून सिस्टम को भी समर्थन मिलता है। हालांकि, केवल अंडों से पूरी विटामिन-डी की आवश्यकता पूरी नहीं होती, लेकिन यह कुल पोषण में महत्वपूर्ण योगदान देता है। त्वचा, बाल और नाखूनों में दिख सकता है सुधार अंडों में बायोटिन, सेलेनियम, विटामिन-बी कॉम्प्लेक्स और प्रोटीन मौजूद होते हैं, जो बालों, त्वचा और नाखूनों की गुणवत्ता को बेहतर बनाने में मदद करते हैं। संतुलित आहार के साथ नियमित सेवन करने पर कुछ सप्ताह में सकारात्मक बदलाव महसूस किए जा सकते हैं। क्या अंडे खाने से बढ़ता है कोलेस्ट्रॉल? यह सबसे आम सवालों में से एक है। हाल के वर्षों में हुई कई रिसर्च बताती हैं कि अधिकांश स्वस्थ लोगों में सीमित मात्रा में अंडे खाने से हृदय रोग का खतरा नहीं बढ़ता। शरीर स्वयं कोलेस्ट्रॉल के उत्पादन को नियंत्रित करता है और अंडों से मिलने वाला डाइटरी कोलेस्ट्रॉल पहले की तुलना में कम प्रभाव डालता है। हालांकि, जिन लोगों को अनियंत्रित डायबिटीज, फैमिलियल हाइपरकोलेस्ट्रोलेमिया या पहले से हृदय संबंधी गंभीर बीमारी है, उन्हें नियमित रूप से अंडे खाने से पहले डॉक्टर की सलाह जरूर लेनी चाहिए। क्या रोज़ दो अंडे पर्याप्त हैं? विशेषज्ञों के अनुसार, अधिकांश स्वस्थ वयस्कों के लिए रोज़ाना दो अंडे पर्याप्त माने जाते हैं। इससे प्रोटीन, विटामिन, मिनरल्स और हेल्दी फैट्स की संतुलित मात्रा मिल जाती है। हालांकि, बेहतर परिणाम के लिए अंडों के साथ फल, हरी सब्जियां, साबुत अनाज और अन्य पौष्टिक खाद्य पदार्थों को भी आहार में शामिल करना जरूरी है। ध्यान रहे कि 30 दिनों में कोई चमत्कारी परिवर्तन नहीं होता, लेकिन नियमित और संतुलित जीवनशैली के साथ दो अंडों का सेवन शरीर के समग्र स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में निश्चित रूप से सहायक हो सकता है।
भारत में हाई ब्लड प्रेशर (Hypertension) और डायबिटीज के मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है। आमतौर पर लोग हाई बीपी की वजह अधिक नमक, मोटापा, तनाव, धूम्रपान या खराब लाइफस्टाइल को मानते हैं। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि कई बार बार-बार बढ़ता ब्लड प्रेशर किसी हार्मोनल समस्या, खासकर थायरॉइड डिसऑर्डर का भी संकेत हो सकता है। कार्डियक विशेषज्ञों के अनुसार, यदि ब्लड प्रेशर दवाइयों के बावजूद बार-बार बढ़ रहा है या नियंत्रित नहीं हो रहा, तो थायरॉइड की जांच जरूर करानी चाहिए। कैसे जुड़ा है थायरॉइड और हाई ब्लड प्रेशर? थायरॉइड ग्रंथि शरीर में बनने वाले T3 (Triiodothyronine) और T4 (Thyroxine) हार्मोन का उत्पादन करती है। ये हार्मोन शरीर के मेटाबॉलिज्म, दिल की धड़कन और रक्त वाहिकाओं के सामान्य कामकाज को नियंत्रित करते हैं। जब थायरॉइड हार्मोन कम बनने लगते हैं, जिसे हाइपोथायरॉइडिज्म (Hypothyroidism) कहा जाता है, तब रक्त वाहिकाएं धीरे-धीरे सख्त होने लगती हैं। इससे रक्त प्रवाह प्रभावित होता है और ब्लड प्रेशर, विशेष रूप से डायस्टोलिक ब्लड प्रेशर (निचला स्तर), बढ़ सकता है। डायस्टोलिक ब्लड प्रेशर क्यों बढ़ता है? हाइपोथायरॉइडिज्म में दिल की धड़कन सामान्य से धीमी हो जाती है। साथ ही रक्त वाहिकाओं का लचीलापन कम होने लगता है। यही कारण है कि शरीर में रक्त प्रवाह बनाए रखने के लिए दबाव बढ़ सकता है, जिससे डायस्टोलिक ब्लड प्रेशर बढ़ने का खतरा रहता है। विशेषज्ञों का कहना है कि हाई बीपी और थायरॉइड के बीच संबंध को देखते हुए दोनों स्थितियों की जांच एक साथ करना बेहतर माना जाता है। कब करानी चाहिए थायरॉइड जांच? यदि आपको— बार-बार हाई ब्लड प्रेशर की समस्या हो, दवा लेने के बावजूद बीपी नियंत्रित न हो, लगातार थकान महसूस हो, वजन बढ़ रहा हो, ठंड ज्यादा लगती हो, दिल की धड़कन धीमी रहती हो, तो डॉक्टर की सलाह पर TSH, T3 और T4 टेस्ट जरूर करवाना चाहिए। हाइपोथायरॉइडिज्म में किन दवाओं में बरतें सावधानी? विशेषज्ञों के अनुसार, हाइपोथायरॉइडिज्म के मरीजों में पहले से ही दिल की धड़कन धीमी हो सकती है। ऐसे में कुछ बीपी की दवाएं, जैसे बीटा-ब्लॉकर्स और कुछ कैल्शियम चैनल ब्लॉकर्स, धड़कन को और धीमा कर सकती हैं। इसलिए कोई भी दवा डॉक्टर की सलाह के बिना शुरू या बंद नहीं करनी चाहिए। ब्लड प्रेशर कंट्रोल रखने के आसान उपाय हाई ब्लड प्रेशर और थायरॉइड दोनों स्थितियों में स्वस्थ जीवनशैली काफी मददगार साबित होती है। रोजाना कम से कम 30 मिनट व्यायाम करें। योग और कार्डियो एक्सरसाइज को दिनचर्या में शामिल करें। नमक का सेवन सीमित रखें। फल, सब्जियां और साबुत अनाज से भरपूर DASH डाइट अपनाएं। पोटैशियम युक्त खाद्य पदार्थों का सेवन बढ़ाएं। धूम्रपान और शराब से दूरी बनाएं। नियमित रूप से ब्लड प्रेशर और थायरॉइड की जांच कराते रहें। डॉक्टर की सलाह विशेषज्ञों का कहना है कि हाई ब्लड प्रेशर और थायरॉइड की समस्या कई मामलों में एक-दूसरे से जुड़ी हो सकती हैं। इसलिए जिन लोगों को लगातार हाई बीपी की शिकायत रहती है, उन्हें थायरॉइड की जांच जरूर करानी चाहिए। वहीं थायरॉइड के मरीजों को भी समय-समय पर अपना ब्लड प्रेशर मॉनिटर करना चाहिए ताकि किसी गंभीर हृदय संबंधी समस्या से बचा जा सके।
आज की व्यस्त जीवनशैली में महिलाएं अक्सर अपनी सेहत से जुड़े कई संकेतों को नजरअंदाज कर देती हैं। खासतौर पर पीरियड्स में होने वाली अनियमितता को तनाव, काम के दबाव या बदलती दिनचर्या का असर मानकर टाल दिया जाता है। लेकिन अगर आपकी पीरियड्स साइकिल लगातार 35 दिनों से ज्यादा लंबी हो रही है या मासिक धर्म कई महीनों तक नहीं आ रहा है, तो यह पॉलीएंडोक्राइन मेटाबोलिक ओवेरियन सिंड्रोम (PMOS) का शुरुआती संकेत हो सकता है। महिला स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, पहले जिसे PCOS (पॉलीसिस्टिक ओवेरियन सिंड्रोम) के नाम से जाना जाता था, अब कई विशेषज्ञ इसे PMOS के रूप में भी संदर्भित कर रहे हैं। यह एक ऐसी स्थिति है जिसमें हार्मोनल असंतुलन महिलाओं की प्रजनन क्षमता, मेटाबॉलिज्म और संपूर्ण स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है। क्या है PMOS? PMOS एक हार्मोनल और मेटाबोलिक समस्या है, जिसमें ओवरीज में कई छोटे फॉलिकल्स विकसित हो जाते हैं और ओव्यूलेशन की प्रक्रिया प्रभावित होती है। इसके कारण पीरियड्स अनियमित हो सकते हैं, वजन बढ़ सकता है और शरीर में कई अन्य बदलाव दिखाई देने लगते हैं। नई दिल्ली स्थित कैपिटल हेल्थ क्लिनिक की डायरेक्टर और महिला स्वास्थ्य विशेषज्ञ डॉ. बिमलप्रीत मोहन के अनुसार, कई युवा महिलाएं पीरियड्स की अनियमितता को सामान्य मान लेती हैं, जबकि यह शरीर में चल रहे हार्मोनल असंतुलन का संकेत हो सकता है। PMOS के प्रमुख लक्षण 1. 35 दिनों से लंबी पीरियड्स साइकिल यह PMOS का सबसे सामान्य और शुरुआती संकेत माना जाता है। पीरियड्स के बीच का अंतर 35 दिनों से अधिक होना, महीनों तक मासिक धर्म न आना या ब्लीडिंग का पैटर्न अनियमित होना हार्मोनल गड़बड़ी का संकेत हो सकता है। 2. बिना वजह वजन बढ़ना विशेष रूप से पेट और कमर के आसपास तेजी से वजन बढ़ना PMOS से जुड़ा आम लक्षण है। कई बार डाइट और एक्सरसाइज के बावजूद वजन कम नहीं होता। 3. लगातार मुंहासे होना अगर टीनएज के बाद भी चेहरे पर बार-बार मुंहासे निकल रहे हैं, खासकर ठुड्डी और जॉलाइन के आसपास, तो यह हार्मोनल असंतुलन की ओर इशारा कर सकता है। 4. चेहरे और शरीर पर अनचाहे बाल होंठों के ऊपर, ठुड्डी, छाती, पेट या पीठ पर अत्यधिक बाल उगना शरीर में एंड्रोजन हार्मोन के बढ़े स्तर का संकेत हो सकता है। 5. बालों का झड़ना सिर के बाल पतले होना, हेयरलाइन चौड़ी होना या जरूरत से ज्यादा बाल झड़ना भी PMOS से जुड़ा महत्वपूर्ण लक्षण माना जाता है। 6. गर्भधारण में परेशानी अनियमित ओव्यूलेशन के कारण कई महिलाओं को कंसीव करने में कठिनाई का सामना करना पड़ता है। हालांकि समय पर उपचार से इस समस्या को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। कब डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए? यदि आपको निम्न में से कोई समस्या लगातार दिखाई दे रही है, तो तुरंत स्त्री रोग विशेषज्ञ से परामर्श लेना चाहिए— तीन महीने से अधिक समय तक अनियमित पीरियड्स लगातार मुंहासों की समस्या चेहरे या शरीर पर अत्यधिक बाल बिना कारण तेजी से वजन बढ़ना बालों का अत्यधिक झड़ना गर्भधारण में कठिनाई क्या PMOS को रोका जा सकता है? हालांकि आनुवंशिक और हार्मोनल कारणों को पूरी तरह रोका नहीं जा सकता, लेकिन स्वस्थ जीवनशैली अपनाकर इसके प्रभाव को काफी हद तक कम किया जा सकता है। नियमित व्यायाम करें संतुलित और पौष्टिक भोजन लें प्रोसेस्ड फूड्स से दूरी बनाएं तनाव कम करने के लिए योग और मेडिटेशन करें पर्याप्त नींद लें समय-समय पर स्वास्थ्य जांच कराएं विशेषज्ञों का मानना है कि PMOS का समय पर पता लगने और सही इलाज मिलने पर महिलाएं सामान्य और स्वस्थ जीवन जी सकती हैं। इसलिए पीरियड्स से जुड़े किसी भी असामान्य बदलाव को नजरअंदाज करना भविष्य में बड़ी समस्या का कारण बन सकता है।
नई दिल्ली: गर्मियों के मौसम में रात के खाने के बाद ठंडी और मीठी आइसक्रीम खाना कई लोगों की पसंद होती है। कुछ लोग इसे दिनभर की थकान दूर करने का तरीका मानते हैं, तो कुछ के लिए यह डेजर्ट का अहम हिस्सा होती है। लेकिन क्या रोजाना डिनर के बाद आइसक्रीम खाना सेहत के लिए सही है? विशेषज्ञों के अनुसार, कभी-कभार सीमित मात्रा में आइसक्रीम खाना नुकसानदायक नहीं माना जाता, लेकिन अगर इसे रोजाना और अधिक मात्रा में खाया जाए तो इससे पाचन, वजन, ब्लड शुगर और नींद पर नकारात्मक असर पड़ सकता है। डिनर के बाद आइसक्रीम खाने से शरीर पर क्या असर पड़ता है? आइसक्रीम में शुगर, सैचुरेटेड फैट और कैलोरी की मात्रा अधिक होती है। जब भारी भोजन के तुरंत बाद इसका सेवन किया जाता है, तो शरीर को एक साथ ज्यादा फैट और शुगर को पचाने में अधिक मेहनत करनी पड़ती है। रात के समय शरीर का मेटाबॉलिज्म दिन की तुलना में थोड़ा धीमा हो जाता है। ऐसे में अतिरिक्त कैलोरी और शुगर शरीर में जमा होने लगती है, जिससे कई तरह की समस्याएं पैदा हो सकती हैं। पाचन प्रक्रिया हो सकती है धीमी अगर आपने ऑयली या भारी भोजन किया है और उसके तुरंत बाद आइसक्रीम खा लेते हैं, तो इससे: पेट भारी लगना गैस बनना ब्लोटिंग एसिडिटी पेट दर्द सुस्ती महसूस होना जैसी समस्याएं हो सकती हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि फैट और शुगर पाचन प्रक्रिया को धीमा कर देते हैं, जिससे भोजन को पूरी तरह पचने में अधिक समय लग सकता है। ब्लड शुगर पर पड़ सकता है असर सामान्य आइसक्रीम में मौजूद अधिक शुगर ब्लड शुगर लेवल को तेजी से बढ़ा सकती है। खासकर डायबिटीज के मरीजों के लिए रात में मीठी आइसक्रीम का सेवन जोखिम बढ़ा सकता है। ब्लड शुगर अचानक बढ़ने और फिर गिरने की वजह से: देर रात भूख लगना थकान महसूस होना सुस्ती बढ़ना जैसी समस्याएं सामने आ सकती हैं। नींद की गुणवत्ता भी हो सकती है प्रभावित रात में हाई-फैट और हाई-शुगर फूड खाने से नींद की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है। पेट में गैस, एसिडिटी या भारीपन की वजह से नींद बार-बार टूट सकती है। कुछ लोगों में ठंडी चीजें खाने के बाद शरीर की अलर्टनेस भी बढ़ जाती है, जिससे आसानी से नींद नहीं आती। किन लोगों को ज्यादा सावधानी बरतनी चाहिए? रात में आइसक्रीम खाने से इन लोगों को विशेष सावधानी बरतनी चाहिए: लैक्टोज इनटॉलरेंस से पीड़ित लोग डायबिटीज के मरीज मोटापे से परेशान लोग एसिडिटी या गैस की समस्या वाले लोग कमजोर पाचन वाले लोग क्या पूरी तरह आइसक्रीम छोड़ देनी चाहिए? विशेषज्ञों के अनुसार, डिनर के बाद कभी-कभार सीमित मात्रा में आइसक्रीम खाना सामान्य रूप से सुरक्षित माना जा सकता है। लेकिन रोजाना और ज्यादा मात्रा में इसका सेवन पाचन, वजन और मेटाबॉलिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है। अगर आपको पहले से डायबिटीज, मोटापा या पाचन संबंधी समस्या है, तो रात में हाई-कैलोरी और अधिक मीठे डेजर्ट से दूरी बनाना बेहतर विकल्प हो सकता है।
मुंबई: कॉमेडियन समय रैना का चर्चित शो इंडियाज गॉट लेटेंट अपने दूसरे सीजन के साथ वापस आ चुका है। पहले ही एपिसोड में बॉलीवुड अभिनेत्री आलिया भट्ट की मौजूदगी ने दर्शकों का ध्यान खींचा, लेकिन शो का एक छोटा सा मजेदार पल सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बन गया। दरअसल, आलिया अपने साथ एक खास पानी की बोतल लेकर पहुंची थीं, जिसे देखकर समय रैना ने मजाकिया अंदाज में उनकी खिंचाई कर दी। समय रैना ने पूछा- "ये कौन-सा अमीरों वाला पानी है?" शो के दौरान जब समय रैना ने आलिया भट्ट को सामान्य पानी और प्रोटीन ड्रिंक ऑफर किया, तो अभिनेत्री ने बताया कि उनके पास अपना पानी है। इस पर समय ने हंसते हुए कहा, "आप हम नॉर्मल लोगों का पानी नहीं पीते हो क्या? ये कौन-सा अमीरों वाला पानी है?" इस मजेदार सवाल के जवाब में आलिया ने बताया कि उनकी बोतल में साधारण पानी नहीं बल्कि इलेक्ट्रोलाइट्स मिला हुआ पानी है, जो उन्हें स्टेज पर नर्वसनेस और डिहाइड्रेशन जैसी समस्याओं से बचाने में मदद करता है। क्या होते हैं इलेक्ट्रोलाइट्स? इलेक्ट्रोलाइट्स ऐसे जरूरी मिनरल्स होते हैं जो शरीर में पानी का संतुलन बनाए रखने, नसों और मांसपेशियों के सही कामकाज और ऊर्जा स्तर को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इनमें मुख्य रूप से शामिल हैं: सोडियम पोटैशियम कैल्शियम मैग्नीशियम क्लोराइड फॉस्फोरस बायकार्बोनेट कब होती है इलेक्ट्रोलाइट्स की जरूरत? विशेषज्ञों के अनुसार, अत्यधिक पसीना आने, गर्मी में लंबे समय तक रहने, डिहाइड्रेशन, दस्त, उल्टी या शरीर में तरल पदार्थ की कमी होने पर इलेक्ट्रोलाइट्स का संतुलन बिगड़ सकता है। ऐसे में व्यक्ति को थकान, सिरदर्द, मांसपेशियों में कमजोरी, हाथ-पैर कांपना और तेज धड़कन जैसी समस्याएं महसूस हो सकती हैं। घर पर ऐसे बनाएं इलेक्ट्रोलाइट्स वाला पानी अगर आपको अतिरिक्त इलेक्ट्रोलाइट्स की जरूरत महसूस होती है, तो आप घर पर भी आसान तरीके से ओआरएस जैसा घोल तैयार कर सकते हैं। विधि: 1 लीटर साफ पीने का पानी लें। इसमें 6 छोटी चम्मच चीनी मिलाएं। आधी छोटी चम्मच नमक डालें। अच्छी तरह घोलकर तैयार करें। थोड़ी-थोड़ी मात्रा में धीरे-धीरे सेवन करें। सावधानी भी है जरूरी स्वस्थ व्यक्ति सीमित मात्रा में इलेक्ट्रोलाइट्स वाला पानी पी सकता है, लेकिन किडनी, लिवर, हाई ब्लड प्रेशर या अन्य गंभीर बीमारियों से पीड़ित लोगों को डॉक्टर की सलाह के बाद ही इसका सेवन करना चाहिए। शरीर में इलेक्ट्रोलाइट्स की अधिकता भी नुकसान पहुंचा सकती है। कुल मिलाकर, आलिया भट्ट के "स्पेशल पानी" ने शो में हंसी का माहौल जरूर बनाया, लेकिन इसके पीछे छिपी स्वास्थ्य संबंधी जानकारी कई लोगों के लिए उपयोगी साबित हो सकती है।
Stress Side Effects: तनाव हमारी सेहत के लिए नुकसानदायक होता है, यह बात लगभग हर कोई जानता है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि केवल लंबे समय तक बना रहने वाला स्ट्रेस ही नहीं, बल्कि सिर्फ 3 से 5 मिनट का तनाव भी शरीर में कई नकारात्मक बदलाव पैदा कर सकता है। बार-बार होने वाला छोटा तनाव धीरे-धीरे दिल, दिमाग, इम्यूनिटी और पाचन तंत्र पर गहरा असर डाल सकता है। गुरुग्राम स्थित सीके बिड़ला हॉस्पिटल के एसोसिएट डायरेक्टर (इंटरनल मेडिसिन) डॉ. तुषार तायल के अनुसार, शरीर हर प्रकार के तनाव को एक खतरे की तरह लेता है और उसी के अनुसार प्रतिक्रिया देता है। तनाव के दौरान शरीर में क्या होता है? जब मस्तिष्क किसी चुनौती या खतरे को महसूस करता है, तो ब्रेन का एमिग्डाला सक्रिय हो जाता है। इसके बाद शरीर में एड्रेनालिन और कॉर्टिसोल जैसे स्ट्रेस हार्मोन रिलीज होने लगते हैं। इसके परिणामस्वरूप: हार्ट रेट बढ़ जाता है। ब्लड प्रेशर बढ़ने लगता है। पाचन प्रक्रिया धीमी हो जाती है। शरीर अधिक सतर्क हो जाता है। ऊर्जा मांसपेशियों की ओर केंद्रित हो जाती है। इस प्रक्रिया को "फाइट या फ्लाइट रिस्पॉन्स" कहा जाता है। असली खतरा कब शुरू होता है? कुछ मिनटों का तनाव सामान्य रूप से खत्म हो जाता है, लेकिन यदि दिनभर में बार-बार तनाव की स्थिति पैदा होती रहे, तो शरीर सामान्य अवस्था में लौट नहीं पाता। लगातार: काम का दबाव मोबाइल नोटिफिकेशन छोटी-छोटी बहसें डेडलाइन का तनाव इन सबकी वजह से कोर्टिसोल का स्तर लगातार ऊंचा बना रह सकता है। दिल पर पड़ता है असर शोध के अनुसार, बार-बार सक्रिय होने वाला स्ट्रेस रिस्पॉन्स: हाई ब्लड प्रेशर का खतरा बढ़ाता है। धमनियों में प्लाक जमने की संभावना बढ़ाता है। हृदय रोगों का जोखिम बढ़ा सकता है। वजन और नींद भी होती है प्रभावित कॉर्टिसोल का बढ़ा हुआ स्तर: भूख बढ़ा सकता है। मोटापे का कारण बन सकता है। नींद की गुणवत्ता खराब कर सकता है। व्यायाम करने की इच्छा कम कर सकता है। कमजोर हो सकती है इम्यूनिटी लगातार तनाव इम्यून सिस्टम की कार्यक्षमता को प्रभावित करता है। ऐसे लोगों में: बार-बार संक्रमण होने का खतरा बढ़ जाता है। बीमारी से रिकवरी में अधिक समय लग सकता है। गट हेल्थ पर भी पड़ता है असर बार-बार होने वाला तनाव: गट माइक्रोबायोम का संतुलन बिगाड़ सकता है। एसिडिटी और एसिड रिफ्लक्स बढ़ा सकता है। IBS (इरिटेबल बॉवेल सिंड्रोम) जैसी समस्याओं को ट्रिगर कर सकता है। मानसिक स्वास्थ्य पर भी पड़ सकता है प्रभाव लगातार छोटे-छोटे तनाव के एपिसोड से: एंग्जायटी बढ़ सकती है। भावनात्मक सहनशक्ति कम हो सकती है। डिप्रेशन का खतरा बढ़ सकता है। तनाव से राहत पाने के आसान उपाय विशेषज्ञों के अनुसार, छोटे-छोटे रिलैक्सेशन ब्रेक तनाव के प्रभाव को कम करने में मदद कर सकते हैं। अपनाएं ये आदतें गहरी डायाफ्रामिक ब्रीदिंग करें। 5 मिनट शांत बैठें। थोड़ी देर बाहर टहलें। स्क्रीन से कुछ समय का ब्रेक लें। पर्याप्त नींद और नियमित व्यायाम करें। इन छोटे प्रयासों से कोर्टिसोल का स्तर नियंत्रित रखने में मदद मिल सकती है और शरीर को अगली तनावपूर्ण स्थिति से पहले सामान्य होने का मौका मिलता है।
बॉलीवुड अभिनेत्री शिल्पा शेट्टी कुंद्रा 51 साल की हो चुकी हैं, लेकिन उनकी फिटनेस और एनर्जी आज भी लाखों लोगों के लिए प्रेरणा बनी हुई है। 1993 में फिल्म बाजीगर से अपने करियर की शुरुआत करने वाली शिल्पा ने वर्षों से योग, संतुलित खानपान और नियमित व्यायाम को अपनी जीवनशैली का हिस्सा बनाया हुआ है। शिल्पा का मानना है कि फिटनेस केवल शरीर को आकार देने का जरिया नहीं, बल्कि मानसिक और भावनात्मक संतुलन बनाए रखने का भी माध्यम है। वह हमेशा समग्र स्वास्थ्य (Holistic Wellness) पर जोर देती हैं और साफ-सुथरे खानपान के साथ नियमित शारीरिक गतिविधियों को बेहद महत्वपूर्ण मानती हैं। प्लैंक एक्सरसाइज से बनाती हैं मजबूत कोर हाल ही में शिल्पा शेट्टी ने सोशल मीडिया पर अपने वर्कआउट रूटीन की झलक साझा की थी। इस रूटीन में उन्होंने कई तरह की प्लैंक एक्सरसाइज शामिल की हैं, जिनमें— एक्सटेंडेड आर्म प्लैंक विद हिप एक्सटेंशन साइड एल्बो प्लैंक विद हिप डिप्स एल्बो प्लैंक विद हिप एब्डक्शन और एडडक्शन इन सभी एक्सरसाइज को वह 15-20 रेपिटेशन के तीन सेट में करती हैं। यह रूटीन पेट की मांसपेशियों को मजबूत बनाने के साथ-साथ कंधों, हाथों, पैरों और पीठ की मांसपेशियों की सहनशक्ति भी बढ़ाता है। सबसे खास बात यह है कि इस पूरे वर्कआउट के लिए केवल एक योगा मैट और करीब 20 मिनट का समय चाहिए। शिल्पा इसे अपनी "वॉशबोर्ड एब्स की रेसिपी" बताती हैं। हालांकि, वह नए लोगों को सलाह देती हैं कि शुरुआत आसान एक्सरसाइज से करें और धीरे-धीरे एडवांस रूटीन की तरफ बढ़ें। योग और मेडिटेशन भी हैं फिटनेस का अहम हिस्सा शिल्पा शेट्टी केवल जिम वर्कआउट पर निर्भर नहीं रहतीं, बल्कि योग और मेडिटेशन को भी अपनी दिनचर्या का महत्वपूर्ण हिस्सा मानती हैं। उनका कहना है कि योग शरीर के साथ-साथ मन और आत्मा को भी संतुलित करता है। सेतु बंधासन से मिलता है मानसिक और शारीरिक लाभ सेतु बंधासन (ब्रिज पोज) गर्दन, कंधों और पीठ को मजबूत बनाने में मदद करता है। यह रीढ़ की हड्डी के लचीलेपन को बढ़ाने के साथ तनाव कम करने और मानसिक शांति प्रदान करने में भी सहायक माना जाता है। अर्ध हलासन और नौकासन से मजबूत होती हैं पेट की मांसपेशियां अर्ध हलासन और नौकासन दोनों ही कोर स्ट्रेंथ बढ़ाने वाले प्रमुख योगासन माने जाते हैं। इनसे— पेट की मांसपेशियां मजबूत होती हैं। पाचन तंत्र बेहतर होता है। रीढ़ की लचक बढ़ती है। शरीर का पोश्चर सुधरता है। आत्मविश्वास और मानसिक मजबूती में भी वृद्धि होती है। शिल्पा शेट्टी की फिटनेस फिलॉसफी यही संदेश देती है कि नियमित व्यायाम, योग और संतुलित जीवनशैली के जरिए किसी भी उम्र में स्वस्थ और फिट रहा जा सकता है।
एक समय था जब कमर और पीठ दर्द को बढ़ती उम्र की समस्या माना जाता था, लेकिन अब यह परेशानी युवाओं में भी तेजी से बढ़ रही है। बदलती जीवनशैली, वर्क फ्रॉम होम कल्चर, घंटों मोबाइल और लैपटॉप का इस्तेमाल तथा शारीरिक गतिविधियों की कमी के कारण कम उम्र में ही लोग कमर दर्द से जूझ रहे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, लगातार एक ही स्थिति में बैठे रहना, गलत पोश्चर अपनाना और बढ़ता मोटापा रीढ़ की हड्डी पर अतिरिक्त दबाव डालता है, जिससे पीठ और कमर में दर्द की शिकायत बढ़ जाती है। अगर समय रहते इस समस्या पर ध्यान न दिया जाए तो यह दैनिक जीवन और कार्यक्षमता दोनों को प्रभावित कर सकती है। युवाओं में कमर दर्द बढ़ने के प्रमुख कारण गलत पोश्चर में बैठना या खड़े रहना ऑफिस में काम करते समय या मोबाइल-लैपटॉप का इस्तेमाल करते समय झुककर बैठने से रीढ़ की हड्डी पर लगातार दबाव पड़ता है। इससे गर्दन, कंधों और पीठ के निचले हिस्से में दर्द शुरू हो सकता है। सुस्त जीवनशैली आज अधिकांश लोग दिन का बड़ा हिस्सा कुर्सी पर बैठकर बिताते हैं। पर्याप्त शारीरिक गतिविधि न होने से रीढ़ को सहारा देने वाली मांसपेशियां कमजोर होने लगती हैं, जिससे अकड़न और दर्द की समस्या बढ़ जाती है। तनाव और मानसिक दबाव मानसिक तनाव का असर केवल दिमाग पर ही नहीं, बल्कि शरीर पर भी पड़ता है। तनाव के कारण गर्दन, कंधे और पीठ की मांसपेशियां सख्त हो जाती हैं, जिससे दर्द और थकान बढ़ सकती है। बढ़ता स्क्रीन टाइम मोबाइल, टैबलेट और लैपटॉप के लंबे इस्तेमाल से "टेक नेक" और लोअर बैक पेन जैसी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं। लगातार स्क्रीन देखने की आदत रीढ़ की प्राकृतिक स्थिति को प्रभावित करती है। मोटापा और कसरत की कमी शरीर का अतिरिक्त वजन रीढ़ की हड्डी और जोड़ों पर अधिक दबाव डालता है। पेट और पीठ की कमजोर मांसपेशियां रीढ़ के संतुलन को प्रभावित करती हैं, जिससे दर्द की संभावना बढ़ जाती है। कमर दर्द से बचने के आसान उपाय बैठने और खड़े होने का सही तरीका अपनाएं। हर 30 से 40 मिनट में कुछ देर के लिए उठकर चलें। नियमित रूप से योग, स्ट्रेचिंग और एक्सरसाइज करें। मोबाइल और लैपटॉप का इस्तेमाल सीमित रखें। आरामदायक और सपोर्ट देने वाली कुर्सी का उपयोग करें। वजन को नियंत्रित रखें। रीढ़ को सहारा देने वाले अच्छे गद्दे पर सोएं। भारी सामान उठाते समय सही तकनीक अपनाएं। कब डॉक्टर से संपर्क करना जरूरी है? अगर कमर दर्द कई दिनों तक लगातार बना रहे, दर्द के साथ सुन्नपन महसूस हो, चलने-फिरने में परेशानी होने लगे या दर्द धीरे-धीरे बढ़ता जाए, तो तुरंत डॉक्टर की सलाह लेनी चाहिए।
आजकल हाई ब्लड प्रेशर और हाई एलडीएल (खराब) कोलेस्ट्रॉल को दिल की सेहत के दो सबसे बड़े दुश्मन माना जाता है। ये दोनों समस्याएं धीरे-धीरे शरीर में विकसित होती हैं और लंबे समय तक कोई स्पष्ट लक्षण नहीं देतीं। लेकिन जब इनका असर रक्त वाहिकाओं और दिल पर पड़ने लगता है, तब कुछ चेतावनी भरे संकेत सामने आ सकते हैं। एशियन हॉस्पिटल के इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. दिवाकर कुमार के अनुसार, हाई बीपी और हाई कोलेस्ट्रॉल का कॉम्बिनेशन हार्ट अटैक, स्ट्रोक और अन्य कार्डियोवैस्कुलर बीमारियों का खतरा कई गुना बढ़ा सकता है। दोनों समस्याएं साथ होने पर शरीर में क्या होता है? एलडीएल कोलेस्ट्रॉल धमनियों में जमा होकर प्लाक बनाता है, जिससे रक्त वाहिकाएं संकरी हो जाती हैं। वहीं हाई ब्लड प्रेशर धमनियों की दीवारों पर अतिरिक्त दबाव डालता है। दोनों स्थितियां मिलकर आर्टरी को तेजी से नुकसान पहुंचाती हैं और दिल के काम करने की क्षमता प्रभावित हो सकती है। हाई बीपी और हाई कोलेस्ट्रॉल के 10 चेतावनी संकेत डॉ. दिवाकर कुमार के मुताबिक, यदि ये समस्याएं लंबे समय तक बनी रहें तो निम्नलिखित लक्षण दिखाई दे सकते हैं— सांस फूलना लगातार सिरदर्द रहना चक्कर आना सीने में दर्द या दबाव महसूस होना अत्यधिक थकान रहना धुंधला दिखाई देना दिल की धड़कन तेज महसूस होना शरीर के किसी हिस्से में सुन्नपन (गंभीर स्थिति में) पैरों में सूजन (गंभीर स्थिति में) रोजमर्रा के काम करने में कठिनाई होना इसके अलावा, खराब ब्लड सर्कुलेशन के कारण हाथ-पैर ठंडे पड़ना, चलने पर मांसपेशियों में दर्द या ऐंठन और घावों का देर से भरना भी संकेत हो सकते हैं। पेट की चर्बी भी हो सकती है खतरे की घंटी विशेषज्ञों के अनुसार, पेट के आसपास जमा अतिरिक्त चर्बी हाई ब्लड प्रेशर और हाई कोलेस्ट्रॉल दोनों से जुड़ी होती है। डायबिटीज, मोटापा और मेटाबॉलिक सिंड्रोम से पीड़ित लोगों में इसका जोखिम अधिक रहता है। किन आदतों से बढ़ता है खतरा? ज्यादा तला-भुना और प्रोसेस्ड फूड खाना नमक और शुगर का अधिक सेवन शारीरिक गतिविधि की कमी धूम्रपान और शराब का सेवन तनाव और खराब नींद मोटापा और बढ़ती उम्र परिवार में हार्ट डिजीज की हिस्ट्री बचाव के लिए क्या करें? फल, सब्जियां, साबुत अनाज और फाइबर युक्त भोजन लें। नमक और अनहेल्दी फैट का सेवन कम करें। रोजाना कम से कम 30 मिनट वॉक या एक्सरसाइज करें। वजन नियंत्रित रखें। तनाव कम करें और पर्याप्त नींद लें। धूम्रपान और शराब से दूरी बनाएं। 30 वर्ष की उम्र के बाद नियमित बीपी और कोलेस्ट्रॉल की जांच करवाएं। डॉ. दिवाकर कुमार का कहना है कि लक्षण दिखने का इंतजार करने के बजाय समय-समय पर हेल्थ चेकअप करवाना सबसे बेहतर तरीका है। शुरुआती अवस्था में लाइफस्टाइल में बदलाव और जरूरत पड़ने पर दवाओं की मदद से इन समस्याओं को नियंत्रित किया जा सकता है।
आजकल बदलती जीवनशैली, घंटों बैठकर काम करने की आदत और असंतुलित खानपान के कारण डायबिटीज और हाई ब्लड शुगर की समस्या तेजी से बढ़ रही है। विशेषज्ञों के अनुसार, रोजमर्रा की कुछ छोटी आदतें ब्लड शुगर को नियंत्रित रखने में अहम भूमिका निभा सकती हैं। इन्हीं में से एक है खाना खाने के बाद हल्की सैर करना। कानपुर के अपोलो स्पेक्ट्रा हॉस्पिटल के कंसल्टेंट क्रिटिकल केयर विशेषज्ञ डॉ. आशीष मेहरोत्रा के अनुसार, भोजन के बाद 10 से 20 मिनट तक टहलना ब्लड शुगर को नियंत्रित करने और पाचन तंत्र को बेहतर बनाने में मददगार साबित हो सकता है। खाना खाने के बाद शरीर में क्या होता है? भोजन करने के बाद शरीर कार्बोहाइड्रेट को ग्लूकोज में बदलता है, जो खून में पहुंचता है। यदि भोजन में कार्बोहाइड्रेट या मीठी चीजें अधिक हों तो ब्लड शुगर तेजी से बढ़ सकती है। ऐसे में हल्की वॉक करने से शरीर की मांसपेशियां सक्रिय हो जाती हैं और वे ग्लूकोज का उपयोग ऊर्जा के रूप में करने लगती हैं। इससे खून में मौजूद अतिरिक्त शुगर कम होने लगती है और ब्लड शुगर का स्तर संतुलित रहता है। खाना खाने के बाद टहलने के फायदे 1. ब्लड शुगर में अचानक बढ़ोतरी को रोकता है भोजन के बाद होने वाले शुगर स्पाइक को कम करने में मदद मिलती है, जो डायबिटीज और प्रीडायबिटीज के मरीजों के लिए बेहद फायदेमंद है। 2. इंसुलिन संवेदनशीलता में सुधार नियमित वॉक करने से शरीर इंसुलिन के प्रति बेहतर प्रतिक्रिया देता है, जिससे ग्लूकोज आसानी से कोशिकाओं तक पहुंच पाता है। 3. पाचन तंत्र को बनाता है मजबूत खाने के बाद टहलने से बाउल मूवमेंट बेहतर होता है और पेट फूलना, भारीपन तथा अपच जैसी समस्याओं से राहत मिल सकती है। 4. वजन नियंत्रित रखने में मददगार हल्की शारीरिक गतिविधि कैलोरी बर्न करने में मदद करती है, जिससे मोटापा और टाइप-2 डायबिटीज का खतरा कम हो सकता है। 5. हार्ट और मेटाबॉलिज्म को फायदा ब्लड सर्कुलेशन बेहतर होता है और शरीर का मेटाबॉलिज्म सक्रिय रहता है, जिससे समग्र स्वास्थ्य को लाभ मिलता है। ब्लड शुगर कंट्रोल करने के लिए अपनाएं ये आदतें खाना खाने के बाद 10-20 मिनट तक टहलें। ज्यादा मीठा और ओवरईटिंग से बचें। भोजन में फाइबर युक्त खाद्य पदार्थ शामिल करें। पर्याप्त मात्रा में पानी पिएं। शुगरी ड्रिंक्स और प्रोसेस्ड फूड का सेवन कम करें। प्रोटीन, हेल्दी फैट और कॉम्प्लेक्स कार्बोहाइड्रेट वाला संतुलित आहार लें। नियमित व्यायाम करें और वजन नियंत्रित रखें। भोजन के तुरंत बाद लेटने से बचें। यदि डायबिटीज या प्रीडायबिटीज है तो नियमित ब्लड शुगर जांच करवाएं। विशेषज्ञों का मानना है कि खाने के बाद की छोटी-सी सैर लंबे समय में ब्लड शुगर नियंत्रण, बेहतर पाचन और अच्छी नींद जैसी कई स्वास्थ्य समस्याओं में लाभ पहुंचा सकती है।
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में खराब खानपान और धूप से दूरी के कारण विटामिन डी की कमी तेजी से बढ़ रही है। लंबे समय तक इस जरूरी विटामिन की कमी केवल हड्डियों को ही नहीं, बल्कि शरीर के शुगर मेटाबॉलिज्म को भी प्रभावित कर सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि कम विटामिन डी स्तर टाइप-2 डायबिटीज के खतरे को बढ़ाने में भूमिका निभा सकता है। इंसुलिन के लिए क्यों जरूरी है विटामिन डी? विटामिन डी केवल कैल्शियम के अवशोषण और हड्डियों की मजबूती तक सीमित नहीं है। यह इंसुलिन के उत्पादन और उसके प्रभावी कार्य में भी मदद करता है। इंसुलिन वह हार्मोन है जो रक्त में मौजूद शुगर को नियंत्रित करता है। अध्ययनों के अनुसार, जिन लोगों में विटामिन डी की कमी होती है, उनमें इंसुलिन रेजिस्टेंस बढ़ सकता है। ऐसी स्थिति में शरीर इंसुलिन का सही तरीके से उपयोग नहीं कर पाता, जिससे टाइप-2 डायबिटीज का जोखिम बढ़ सकता है। डायबिटीज के साथ बढ़ सकता है अन्य बीमारियों का खतरा विशेषज्ञों के अनुसार, यदि किसी व्यक्ति को विटामिन डी की कमी और डायबिटीज दोनों हैं, तो माइक्रोवैस्कुलर जटिलताओं का खतरा भी बढ़ सकता है। इसका असर शरीर की छोटी रक्त वाहिकाओं पर पड़ता है, जिससे कई गंभीर समस्याएं हो सकती हैं। इनमें शामिल हैं: डायबिटिक रेटिनोपैथी (आंखों की बीमारी) डायबिटिक नेफ्रोपैथी (किडनी को नुकसान) डायबिटिक न्यूरोपैथी (नसों की कमजोरी) विटामिन डी की कमी से शरीर में सूजन बढ़ सकती है, जो रक्त वाहिकाओं की अंदरूनी परत को नुकसान पहुंचाकर ब्लड फ्लो को प्रभावित कर सकती है। विटामिन डी की कमी के संकेत लगातार थकान और कमजोरी मांसपेशियों में दर्द हड्डियों में दर्द बार-बार बीमार पड़ना ऊर्जा की कमी ब्लड शुगर नियंत्रण में परेशानी विटामिन डी की कमी कैसे दूर करें? विशेषज्ञों के अनुसार, कुछ आसान उपाय अपनाकर विटामिन डी के स्तर को बेहतर बनाया जा सकता है: रोज सुबह 20 से 30 मिनट धूप में समय बिताएं। आहार में अंडा, मशरूम, फैटी फिश, दूध और दही शामिल करें। नियमित रूप से व्यायाम, योग और वॉक करें। डॉक्टर की सलाह पर विटामिन डी सप्लीमेंट लें। जरूरत पड़ने पर 25(OH)D टेस्ट करवाएं। क्या केवल विटामिन डी की कमी से डायबिटीज होती है? स्वास्थ्य विशेषज्ञ स्पष्ट करते हैं कि डायबिटीज एक बहु-कारक बीमारी है। केवल विटामिन डी की कमी को इसका एकमात्र कारण नहीं माना जा सकता। हालांकि, पर्याप्त विटामिन डी स्तर बनाए रखना बेहतर इंसुलिन संवेदनशीलता और समग्र स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।
शरीर देता है शुरुआती संकेत, जिन्हें अक्सर लोग कर देते हैं नजरअंदाज आज की भागदौड़ भरी जिंदगी, खराब खानपान, कम शारीरिक गतिविधि और बढ़ते तनाव के कारण पेट की चर्बी बढ़ना एक आम समस्या बन चुकी है। हालांकि बेली फैट अचानक नहीं बढ़ता, बल्कि शरीर इसके संकेत काफी पहले से देना शुरू कर देता है। समस्या यह है कि ज्यादातर लोग इन शुरुआती लक्षणों को पहचान नहीं पाते। यदि समय रहते इन संकेतों पर ध्यान दिया जाए, तो पेट की बढ़ती चर्बी को नियंत्रित करना आसान हो सकता है। कमर और पेट का आकार धीरे-धीरे बढ़ना पेट की चर्बी बढ़ने का सबसे सामान्य संकेत कमर का आकार बढ़ना है। कई बार शरीर का कुल वजन ज्यादा नहीं बढ़ता, लेकिन पेट और कमर के आसपास फैट जमा होने लगता है। इसका असर कपड़ों की फिटिंग पर दिखाई देता है। पहले जो जींस या पैंट आराम से फिट आती थी, वह धीरे-धीरे टाइट महसूस होने लगती है। यह शरीर में अतिरिक्त चर्बी जमा होने का शुरुआती संकेत हो सकता है। पेट हमेशा फूला-फूला महसूस होना यदि आपको अक्सर पेट भारी या फूला हुआ महसूस होता है, तो इसे सिर्फ गैस या अपच समझकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। पाचन तंत्र की धीमी गति और शरीर में बढ़ते फैट के कारण ऐसा हो सकता है। समय के साथ यही स्थिति पेट के बाहर निकलने और चर्बी बढ़ने का कारण बन सकती है। छोटी-छोटी गतिविधियों में थकान महसूस होना जब शरीर में अतिरिक्त फैट जमा होने लगता है, तो ऊर्जा का स्तर प्रभावित होने लगता है। यदि आपको सामान्य काम करने के बाद भी जल्दी थकान महसूस होती है या हर समय सुस्ती बनी रहती है, तो यह बढ़ते बेली फैट का संकेत हो सकता है। इसके पीछे मेटाबॉलिज्म का धीमा होना भी एक महत्वपूर्ण कारण माना जाता है। सीढ़ियां चढ़ते समय सांस फूलना यदि थोड़ी दूरी चलने, तेज गति से चलने या कुछ सीढ़ियां चढ़ने के बाद ही सांस फूलने लगे, तो यह भी शरीर में बढ़ती चर्बी का संकेत हो सकता है। पेट और शरीर में जमा अतिरिक्त फैट हृदय और फेफड़ों पर अतिरिक्त दबाव डालता है, जिससे सामान्य गतिविधियों में भी अधिक मेहनत करनी पड़ती है। कपड़ों की फिटिंग में बदलाव को न करें नजरअंदाज कपड़ों की फिटिंग में बदलाव बेली फैट बढ़ने का सबसे आसान और स्पष्ट संकेत माना जाता है। यदि आपकी पसंदीदा ड्रेस, शर्ट या जींस पेट और कमर के आसपास पहले की तुलना में ज्यादा टाइट महसूस होने लगी है, तो यह संकेत हो सकता है कि शरीर में धीरे-धीरे चर्बी जमा हो रही है। स्वस्थ जीवनशैली से करें बचाव विशेषज्ञों के अनुसार नियमित व्यायाम, संतुलित आहार, पर्याप्त नींद और तनाव प्रबंधन पेट की चर्बी को नियंत्रित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। शुरुआती संकेतों को पहचानकर समय पर कदम उठाने से भविष्य में होने वाली कई स्वास्थ्य समस्याओं से बचा जा सकता है।
गर्मियों के मौसम में पेट से जुड़ी समस्याएं तेजी से बढ़ जाती हैं। पेट दर्द, उल्टी, दस्त, कमजोरी और डिहाइड्रेशन जैसी शिकायतें इस मौसम में आम हो जाती हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार इसका सबसे बड़ा कारण फूड पॉइजनिंग है, जो दूषित भोजन और पानी के सेवन से होती है। गर्म मौसम बैक्टीरिया, वायरस और अन्य सूक्ष्म जीवों के पनपने के लिए अनुकूल वातावरण तैयार करता है। यही वजह है कि गर्मियों में भोजन को सुरक्षित तरीके से स्टोर करना और स्वच्छता का विशेष ध्यान रखना बेहद जरूरी हो जाता है। गर्मियों में क्यों बढ़ जाते हैं फूड पॉइजनिंग के मामले? विशेषज्ञों के अनुसार जब भोजन लंबे समय तक सामान्य तापमान पर रखा रहता है, तो उसमें बैक्टीरिया तेजी से बढ़ने लगते हैं। साल्मोनेला (Salmonella), ई.कोलाई (E. coli), नोरोवायरस और हेपेटाइटिस-ए जैसे संक्रमण पैदा करने वाले जीव भोजन और पानी को दूषित कर सकते हैं। ऐसा भोजन खाने के बाद व्यक्ति को उल्टी, दस्त, पेट में मरोड़, बुखार और कमजोरी जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। फूड पॉइजनिंग के प्रमुख कारण दूषित भोजन खराब या संक्रमित भोजन फूड पॉइजनिंग का सबसे बड़ा कारण माना जाता है। भोजन में मौजूद बैक्टीरिया पेट में पहुंचकर संक्रमण पैदा कर सकते हैं। दूषित पानी गंदा या संक्रमित पानी भी कई प्रकार के बैक्टीरिया और वायरस शरीर में पहुंचाता है, जिससे पेट संबंधी बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। गलत तरीके से भोजन स्टोर करना अगर पका हुआ खाना लंबे समय तक कमरे के तापमान पर रखा जाए या सही तरीके से रेफ्रिजरेट न किया जाए, तो उसमें बैक्टीरिया तेजी से विकसित हो सकते हैं। कच्चे दूध का सेवन बिना उबाला गया दूध कई प्रकार के हानिकारक बैक्टीरिया का स्रोत हो सकता है, जो फूड पॉइजनिंग का कारण बनते हैं। फूड पॉइजनिंग से बचने के लिए अपनाएं ये जरूरी उपाय फलों और सब्जियों को अच्छी तरह धोएं खाने से पहले सभी फलों और सब्जियों को साफ पानी से अच्छी तरह धोना जरूरी है। इससे उन पर मौजूद धूल, गंदगी और बैक्टीरिया हट जाते हैं। खाना बनाने से पहले हाथ साफ करें भोजन तैयार करने से पहले कम से कम 20 से 30 सेकंड तक साबुन से हाथ धोना चाहिए। इससे संक्रमण फैलने का खतरा कम होता है। खाने को ज्यादा समय तक स्टोर न करें हर खाद्य पदार्थ की एक निश्चित शेल्फ लाइफ होती है। लंबे समय तक रखा हुआ भोजन खराब हो सकता है और स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक साबित हो सकता है। पाश्चराइज्ड या उबला हुआ दूध ही पिएं कच्चे दूध के बजाय उबले हुए या पाश्चराइज्ड दूध का सेवन करना सुरक्षित माना जाता है। बाहर के खुले भोजन से बचें खुले में रखे खाद्य पदार्थों में धूल, प्रदूषण और बैक्टीरिया आसानी से पहुंच सकते हैं। इसलिए सड़क किनारे या खुले भोजन का सेवन करने से बचना चाहिए। बच्चों और बुजुर्गों को रखें खास सुरक्षित विशेषज्ञों का कहना है कि बच्चे, बुजुर्ग और कमजोर इम्यूनिटी वाले लोग फूड पॉइजनिंग से अधिक प्रभावित हो सकते हैं। इसलिए उन्हें हमेशा ताजा, स्वच्छ और सही तरीके से तैयार किया गया भोजन ही देना चाहिए। गर्मियों में थोड़ी सी सावधानी और स्वच्छता का पालन करके फूड पॉइजनिंग जैसी समस्या से आसानी से बचा जा सकता है।
Gut Microbiome से जुड़ी समस्याएं आजकल तेजी से बढ़ रही हैं। खाने के बाद पेट फूलना, गैस बनना या भारीपन महसूस होना आम बात लग सकती है, लेकिन अगर यह समस्या लगातार बनी रहती है तो यह शरीर की ओर से मिलने वाला गंभीर संकेत हो सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार बार-बार ब्लोटिंग यानी पेट फूलना फूड इंटॉलरेंस, खराब पाचन, बैक्टीरियल इन्फेक्शन या आंतों की दूसरी समस्याओं का संकेत हो सकता है। ऐसे में समय रहते सही जांच करवाना बेहद जरूरी हो जाता है। विशेषज्ञों के मुताबिक लगातार होने वाली ब्लोटिंग को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए, क्योंकि सही टेस्ट के जरिए इसकी असली वजह पता लगाकर लंबे समय तक राहत पाई जा सकती है। पेट फूलने की वजह जानने के लिए जरूरी 5 टेस्ट 1. फूड इंटॉलरेंस टेस्ट कई लोगों को कुछ खास चीजें जैसे दूध, ग्लूटेन या अन्य फूड कॉम्पोनेंट्स सूट नहीं करते। ऐसे में फूड इंटॉलरेंस टेस्ट यह पता लगाने में मदद करता है कि कौन-सा खाना पेट फूलने और गैस की वजह बन रहा है। इसके बाद डॉक्टर या डाइटिशियन की सलाह से खानपान में बदलाव किया जा सकता है। 2. गट माइक्रोबायोम टेस्ट यह टेस्ट आंतों में मौजूद अच्छे और खराब बैक्टीरिया का संतुलन जांचता है। जब खराब बैक्टीरिया ज्यादा बढ़ जाते हैं, तो इसे गट डिस्बायोसिस कहा जाता है। यह स्थिति पाचन को खराब कर सकती है और बार-बार ब्लोटिंग की समस्या पैदा कर सकती है। 3. SIBO Breath Test यह एक नॉन-इनवेसिव टेस्ट होता है, जिसमें मरीज को ग्लूकोज वाला घोल पिलाया जाता है। इसके बाद सांस में हाइड्रोजन और मीथेन गैस का स्तर जांचा जाता है। अगर गैस तेजी से बढ़ती है, तो यह Small Intestinal Bacterial Overgrowth यानी SIBO का संकेत हो सकता है, जो गैस और पेट फूलने की बड़ी वजह माना जाता है। 4. स्टूल टेस्ट अगर पेट फूलने के साथ बार-बार पेट खराब हो रहा है या लंबे समय से पाचन संबंधी दिक्कत बनी हुई है, तो डॉक्टर स्टूल टेस्ट कराने की सलाह दे सकते हैं। इससे इन्फेक्शन, सूजन या अन्य पाचन संबंधी समस्याओं का पता लगाया जाता है। 5. एंडोस्कोपी या इमेजिंग टेस्ट लगातार गंभीर ब्लोटिंग या पेट दर्द की स्थिति में डॉक्टर एंडोस्कोपी या इमेजिंग टेस्ट कर सकते हैं। इस टेस्ट में कैमरे की मदद से आंतों और पेट के अंदर की स्थिति देखी जाती है, जिससे अल्सर, सूजन या अन्य संरचनात्मक समस्याओं का पता चलता है। कब समझें कि टेस्ट करवाना जरूरी है? अगर आपको ये लक्षण लगातार महसूस हो रहे हैं, तो डॉक्टर से संपर्क करना जरूरी हो सकता है: बार-बार और लंबे समय तक पेट फूलना लगातार पेट दर्द अनियमित मल त्याग कुछ खास चीजें खाने के बाद हमेशा समस्या होना बिना वजह थकान महसूस होना प्राकृतिक तरीके से कैसे सुधारें Gut Health? विशेषज्ञों के अनुसार कुछ आसान आदतें अपनाकर गट हेल्थ को बेहतर बनाया जा सकता है: फाइबर युक्त भोजन बढ़ाएं पर्याप्त पानी पिएं प्रोबायोटिक फूड्स खाएं ट्रिगर फूड्स से बचें तनाव कम करें नियमित शारीरिक गतिविधि करें विशेषज्ञों का कहना है कि समय पर जांच और सही इलाज से लंबे समय तक होने वाली पाचन समस्याओं से बचा जा सकता है।
गर्मियों में ज्यादातर लोग ठंडी कॉफी या आइस्ड कॉफी पीना पसंद करते हैं। तेज गर्मी में बर्फ से भरा कॉफी का गिलास राहत देने वाला लगता है, लेकिन स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि गर्म मौसम में भी गर्म कॉफी शरीर के लिए ज्यादा फायदेमंद हो सकती है। पोषण विशेषज्ञों और डॉक्टरों के मुताबिक, गर्म कॉफी पाचन को बेहतर बनाने, शरीर के तापमान को संतुलित रखने और ऊर्जा को स्थिर बनाए रखने में मदद कर सकती है। वहीं जरूरत से ज्यादा आइस्ड कॉफी शरीर में डिहाइड्रेशन, बेचैनी और अत्यधिक कैफीन सेवन जैसी समस्याएं बढ़ा सकती है। गर्म कॉफी पाचन के लिए क्यों मानी जाती है बेहतर? मुंबई की गट हेल्थ न्यूट्रिशनिस्ट पायल कोठारी के अनुसार, गर्म कॉफी शरीर के प्राकृतिक पाचन तंत्र के साथ बेहतर तालमेल बनाती है। गर्म पेय पदार्थ पाचन क्रिया को सक्रिय रखते हैं और रक्त संचार को बेहतर बनाने में मदद करते हैं। इसके विपरीत, बहुत ठंडी कॉफी कुछ लोगों में पाचन को धीमा कर सकती है। खासकर जिन लोगों को पेट फूलना, गैस या संवेदनशील पाचन की समस्या होती है, उनके लिए आइस्ड कॉफी परेशानी बढ़ा सकती है। विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि गर्म कॉफी धीरे-धीरे पी जाती है, जबकि आइस्ड कॉफी को लोग तेजी से खत्म कर देते हैं। इससे शरीर में कैफीन की मात्रा अचानक बढ़ सकती है। ज्यादा आइस्ड कॉफी क्यों बन सकती है समस्या? इंटीग्रेटिव लाइफस्टाइल विशेषज्ञ ल्यूक कोटिन्हो के मुताबिक, कोल्ड ब्रू कॉफी को लंबे समय तक तैयार किया जाता है, जिसके कारण उसमें कैफीन की मात्रा अधिक हो सकती है। चूंकि इसका स्वाद कम कड़वा और ज्यादा स्मूद होता है, लोग बिना महसूस किए ज्यादा मात्रा में इसे पी लेते हैं। इससे चिंता, घबराहट, एसिडिटी, नींद की समस्या और डिहाइड्रेशन जैसी दिक्कतें बढ़ सकती हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि गर्म कॉफी शरीर को अधिक संतुलित और धीरे-धीरे ऊर्जा देती है। इससे शरीर को अचानक झटका महसूस नहीं होता। क्या गर्म कॉफी सच में शरीर को ठंडा करने में मदद करती है? यह सुनने में अजीब लग सकता है, लेकिन डॉक्टरों के अनुसार गर्म पेय पदार्थ शरीर को ठंडा करने में भी मदद कर सकते हैं। मुंबई के न्यूरोलॉजिस्ट डॉक्टर प्रशांत माखीजा बताते हैं कि जब हम गर्म पेय पीते हैं तो शरीर की रक्त वाहिकाएं फैलती हैं। इससे शरीर की गर्मी त्वचा के जरिए बाहर निकलने लगती है। वहीं न्यूट्रिशनिस्ट नमामी अग्रवाल के मुताबिक, गर्म पेय हल्का पसीना लाने में मदद करते हैं। जब पसीना सूखता है, तो शरीर को प्राकृतिक रूप से ठंडक मिलती है। क्या आइस्ड कॉफी पूरी तरह छोड़ देनी चाहिए? विशेषज्ञों का कहना है कि आइस्ड कॉफी पूरी तरह नुकसानदायक नहीं है। समस्या तब बढ़ती है जब इसमें अत्यधिक चीनी, फ्लेवर्ड सिरप, व्हिप्ड क्रीम और कृत्रिम स्वीटनर मिलाए जाते हैं। साधारण और सीमित मात्रा में पी गई आइस्ड कॉफी संतुलित जीवनशैली का हिस्सा हो सकती है। हालांकि लगातार इसे पानी की तरह पीना शरीर के लिए ठीक नहीं माना जाता। कॉफी पीने का सही तरीका क्या है? विशेषज्ञों के अनुसार कॉफी खाली पेट पीने से बचना चाहिए। सुबह नाश्ते के बाद या मध्य सुबह कॉफी पीना बेहतर माना जाता है। इससे एसिडिटी और कोर्टिसोल बढ़ने की संभावना कम हो सकती है। साथ ही पूरे दिन पर्याप्त पानी पीना भी जरूरी है, ताकि शरीर में डिहाइड्रेशन न हो। संतुलन है सबसे जरूरी स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि कॉफी छोड़ने की जरूरत नहीं है, बल्कि इसे सही तरीके और सीमित मात्रा में पीना अधिक जरूरी है। गर्मियों में भी गर्म कॉफी कई लोगों के लिए शरीर को बेहतर महसूस कराने में मदद कर सकती है, बशर्ते कैफीन का सेवन संतुलित रखा जाए।
आजकल “फाइबर” सिर्फ पोषण से जुड़ा शब्द नहीं रह गया है, बल्कि हेल्दी लाइफस्टाइल का एक बड़ा हिस्सा बन चुका है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि शरीर को स्वस्थ रखने और कई गंभीर बीमारियों से बचाने में पर्याप्त फाइबर बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसके बावजूद ज्यादातर लोग अपनी रोजाना की जरूरत के अनुसार फाइबर का सेवन नहीं कर पा रहे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार पर्याप्त फाइबर लेने से: पाचन तंत्र बेहतर रहता है ब्लड शुगर नियंत्रित करने में मदद मिलती है दिल स्वस्थ रहता है लंबे समय तक पेट भरा महसूस होता है कुछ प्रकार के कैंसर का खतरा कम हो सकता है US Food and Drug Administration के अनुसार एक स्वस्थ वयस्क को रोजाना लगभग 28 ग्राम फाइबर लेना चाहिए। लेकिन कई शोध बताते हैं कि अधिकतर लोग इस लक्ष्य से काफी पीछे हैं। आइए जानते हैं रोजाना फाइबर बढ़ाने के 7 आसान और असरदार तरीके। 1. फलों और सब्जियों का छिलका न हटाएं विशेषज्ञों का कहना है कि कई फलों और सब्जियों के छिलकों में अंदरूनी हिस्से से ज्यादा फाइबर होता है। उदाहरण के तौर पर, अगर सेब को छिलके सहित खाया जाए तो लगभग 2 ग्राम अतिरिक्त फाइबर मिलता है। जहां संभव हो, पूरे फल खाना ज्यादा फायदेमंद माना जाता है। 2. दाल और बीन्स को भोजन में शामिल करें मसूर दाल, राजमा, चना और दूसरी दालें फाइबर का बेहतरीन स्रोत मानी जाती हैं। इन्हें: सलाद सूप चावल पास्ता जैसे भोजन में मिलाकर आसानी से खाया जा सकता है। इससे खाना ज्यादा पौष्टिक और पेट भरने वाला बनता है। 3. बीज और मेवे का सेवन बढ़ाएं Chia seed, अलसी के बीज और दूसरे पौष्टिक बीज फाइबर बढ़ाने का आसान तरीका हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक: चिया सीड्स में लगभग 10 ग्राम फाइबर अलसी में करीब 8 ग्राम फाइबर पाया जाता है। इन्हें दही, दलिया, सलाद या स्मूदी में मिलाकर खाया जा सकता है। 4. मिठाई के साथ फल खाएं अगर आपको मीठा पसंद है तो मिठाई के साथ ताजे फल खाना बेहतर विकल्प हो सकता है। कुछ ज्यादा फाइबर वाले फल: नाशपाती सेब रसभरी ये शरीर को विटामिन और खनिज भी प्रदान करते हैं। 5. ज्यादा फाइबर वाले स्नैक्स चुनें तले-भुने और प्रोसेस्ड स्नैक्स की जगह ऐसे विकल्प चुनें जिनमें प्राकृतिक फाइबर ज्यादा हो, जैसे: भुना चना पॉपकॉर्न मेवे बीज उदाहरण के तौर पर, बिना ज्यादा तेल वाला पॉपकॉर्न फाइबर का अच्छा स्रोत माना जाता है। 6. “पकाएं और ठंडा करें” तरीका अपनाएं विशेषज्ञों के अनुसार आलू, चावल, पास्ता और कुछ दालों को पकाकर ठंडा करने से उनमें “रेजिस्टेंट स्टार्च” बनता है। यह तरीका: ब्लड शुगर नियंत्रित करने में मदद करता है कोलेस्ट्रॉल कम करने में सहायक हो सकता है पाचन तंत्र को बेहतर बनाता है लंबे समय तक पेट भरा रखता है 7. जूस की बजाय पूरा फल खाएं फलों के रस की तुलना में पूरा फल ज्यादा फायदेमंद माना जाता है क्योंकि उसमें फाइबर सुरक्षित रहता है। पूरा फल: पाचन को धीमा करता है ज्यादा देर तक पेट भरा रखता है अचानक शुगर बढ़ने की संभावना कम करता है इसीलिए विशेषज्ञ जूस की जगह पूरे फल खाने की सलाह देते हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि छोटे-छोटे बदलाव करके भी रोजाना फाइबर का सेवन काफी बढ़ाया जा सकता है। संतुलित आहार के साथ फाइबर से भरपूर चीजों को शामिल करना लंबे समय तक अच्छी सेहत बनाए रखने में मददगार साबित हो सकता है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।