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Hepatitis C medicine packaging representing patent dispute over affordable generic drug access in India.
अमेरिकी दवा कंपनी को झटका, भारत ने हेपेटाइटिस C कॉम्बो थेरेपी पर पेटेंट देने से किया इनकार

भारतीय पेटेंट कार्यालय ने अमेरिकी दवा कंपनी AbbVie को बड़ा झटका देते हुए हेपेटाइटिस C के इलाज में इस्तेमाल होने वाली कॉम्बो थेरेपी glecaprevir/pibrentasvir पर पेटेंट देने से इनकार कर दिया है। इस फैसले को सार्वजनिक स्वास्थ्य और सस्ती दवाओं की उपलब्धता के लिहाज से अहम माना जा रहा है।  इस निर्णय से मरीजों को दवा के सस्ते और जेनेरिक विकल्प उपलब्ध हो सकेंगे, जिससे इलाज अधिक लोगों की पहुंच में आ पाएगा। पब्लिक हेल्थ ग्रुप्स ने फैसले का किया स्वागत पब्लिक हेल्थ एडवोकेसी संगठन Third World Network ने भारतीय पेटेंट कार्यालय के फैसले का स्वागत किया है। संगठन ने कहा कि यह आदेश भारत के पेटेंट सुरक्षा प्रावधानों की अहमियत को दर्शाता है, खासकर “प्री-ग्रांट अपोजिशन” जैसी व्यवस्था की, जो गैर-जरूरी पेटेंट एकाधिकारों को रोकने में मदद करती है। संगठन के अनुसार, ऐसे पेटेंट कई बार जरूरी दवाओं की उपलब्धता और उनकी सस्ती पहुंच में बाधा बनते हैं। हेपेटाइटिस C इलाज में अहम है यह थेरेपी AbbVie जिस कॉम्बो थेरेपी के लिए पेटेंट मांग रही थी, उसे हेपेटाइटिस C के इलाज का एक प्रभावी तरीका माना जाता है। यह दवा दुनिया भर में Mavyret नाम से बेची जाती है। विशेषज्ञों के अनुसार, यदि इस दवा पर पेटेंट मिल जाता तो कंपनी का बाजार पर एकाधिकार मजबूत हो सकता था, जिससे जेनेरिक दवाओं के उत्पादन और उपलब्धता पर असर पड़ता। भारतीय पेटेंट कार्यालय ने क्या कहा? भारतीय पेटेंट कार्यालय ने पेटेंट अधिनियम की धारा 15 के तहत आवेदन को खारिज किया है। आदेश में कहा गया कि कंपनी की ओर से आवश्यक जवाब या पर्याप्त साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किए गए। बाद में AbbVie ने पेटेंट कार्यालय को आवेदन वापस लेने की जानकारी भी दे दी। मरीजों को होगा फायदा स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले से भारत में हेपेटाइटिस C के मरीजों के लिए सस्ती दवाओं का रास्ता खुला रहेगा। भारत लंबे समय से जेनेरिक दवाओं के बड़े उत्पादक के रूप में जाना जाता है और ऐसे फैसले सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।  

surbhi मई 19, 2026 0
Scientists analyzing asthma blood biomarkers through metabolomic profiling to identify hidden biological asthma subtypes.
Metabolomic Profiling से सामने आए अस्थमा के छिपे हुए सबटाइप, लक्षण समान लेकिन बीमारी की प्रकृति अलग

अस्थमा को अब तक मुख्य रूप से मरीज के लक्षणों और हालिया अटैक (exacerbation) के आधार पर नियंत्रित या स्थिर माना जाता रहा है। लेकिन एक नई रिसर्च ने इस धारणा को चुनौती देते हुए दिखाया है कि समान लक्षणों वाले अस्थमा मरीजों के शरीर में बीमारी की जैविक गतिविधियां पूरी तरह अलग हो सकती हैं। हाल ही में प्रकाशित एक अध्ययन में वैज्ञानिकों ने मेटाबोलोमिक्स-आधारित ब्लड एनालिसिस के जरिए अस्थमा के ऐसे छिपे हुए जैविक सबटाइप (endotypes) की पहचान की है, जो सामान्य क्लिनिकल जांच में दिखाई नहीं देते। यह रिसर्च भविष्य में अस्थमा के इलाज को अधिक व्यक्तिगत और सटीक बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। क्या था अध्ययन का उद्देश्य? यह एक prospective observational study थी, जिसमें उन वयस्क मरीजों को शामिल किया गया जो नियमित inhaled corticosteroid therapy ले रहे थे और जिनका अस्थमा क्लिनिकली “well-controlled” माना जा रहा था। शोधकर्ताओं का उद्देश्य यह जानना था कि क्या खून में मौजूद मेटाबोलाइट्स की प्रोफाइलिंग के जरिए बीमारी के भीतर चल रही अलग-अलग जैविक प्रक्रियाओं को पहचाना जा सकता है। इसके लिए वैज्ञानिकों ने liquid chromatography–tandem mass spectrometry तकनीक का उपयोग करते हुए untargeted plasma metabolomic profiling की। इसके बाद consensus clustering analysis के माध्यम से मरीजों को तीन अलग-अलग जैविक समूहों में वर्गीकृत किया गया। तीन अलग-अलग अस्थमा एंडोटाइप की पहचान अध्ययन में पाया गया कि भले ही सभी मरीजों में लक्षण और हालिया अटैक लगभग समान थे, लेकिन फेफड़ों की कार्यक्षमता, एयरवे की संरचना और इम्यून सिस्टम की गतिविधियों में बड़ा अंतर मौजूद था। 1. “Remodeling-Prone” समूह (C1) इस समूह के मरीजों में glycerophospholipid-related metabolites की मात्रा अधिक पाई गई। इन मरीजों में: Post-bronchodilator FEV1 कम था एयरवे वॉल्स अधिक मोटी थीं Innate lymphoid cells का स्तर बढ़ा हुआ था वैज्ञानिकों के अनुसार यह संकेत देता है कि मरीजों में लक्षण नियंत्रित होने के बावजूद फेफड़ों की संरचना में बदलाव और एयरवे remodeling की प्रक्रिया जारी रह सकती है। 2. “Biologically Stable” समूह (C2) यह समूह सबसे अधिक स्थिर माना गया। इन मरीजों में: एयरवे वॉल्स पतली थीं Post-bronchodilator FEV1 बेहतर था फेफड़ों की संरचना अपेक्षाकृत सामान्य बनी हुई थी रिसर्चर्स का मानना है कि यह समूह वास्तव में नियंत्रित बीमारी वाले मरीजों का प्रतिनिधित्व कर सकता है। 3. “T2-High” समूह (C3) इस समूह में type-2 inflammation से जुड़े मेटाबोलाइट्स की पहचान हुई। इन मरीजों में: Fractional exhaled nitric oxide (FeNO) का स्तर अधिक था Blood eosinophil counts बढ़े हुए थे हालांकि, इनकी एयरवे संरचना अभी काफी हद तक सुरक्षित बनी हुई थी। क्यों महत्वपूर्ण है यह खोज? अब तक अस्थमा नियंत्रण का मूल्यांकन मुख्य रूप से लक्षणों और हालिया अटैक पर आधारित रहा है। लेकिन यह अध्ययन दिखाता है कि केवल लक्षण देखकर बीमारी की वास्तविक स्थिति को समझना संभव नहीं है। कई मरीज बाहर से स्थिर दिख सकते हैं, जबकि उनके फेफड़ों में सूजन, airway remodeling या इम्यून एक्टिविटी लगातार जारी हो सकती है। यही कारण है कि भविष्य में कुछ मरीजों में बीमारी अचानक गंभीर रूप ले सकती है। Precision Medicine की दिशा में बड़ा कदम विशेषज्ञों का मानना है कि यह रिसर्च precision medicine आधारित अस्थमा उपचार को मजबूत करेगी। यदि मेटाबोलोमिक प्रोफाइलिंग को भविष्य में नियमित क्लिनिकल प्रैक्टिस में शामिल किया जाता है, तो डॉक्टर: बीमारी के वास्तविक जैविक स्वरूप को पहचान सकेंगे हाई-रिस्क मरीजों की पहले से पहचान कर सकेंगे अधिक targeted therapies चुन सकेंगे लंबे समय में फेफड़ों की क्षति को कम कर सकेंगे हालांकि वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया कि अभी और बड़े अध्ययन की जरूरत है ताकि यह पता लगाया जा सके कि ये metabolite-defined subgroups भविष्य में बीमारी की प्रगति और इलाज के प्रति प्रतिक्रिया को किस तरह प्रभावित करते हैं।  

surbhi मई 18, 2026 0
Medical illustration of psoriasis treatment showing IL-17 inhibitors reducing risk of psoriatic arthritis in patients
IL-17 Inhibitors से Psoriatic Arthritis का खतरा कम, नई स्टडी में बड़ा दावा

Psoriatic Arthritis के खतरे को लेकर नई रिसर्च में अहम खुलासा हुआ है। अध्ययन के मुताबिक, सोरायसिस मरीजों में बायोलॉजिक दवाओं के चयन और उनके क्रम (sequencing) का भविष्य में Psoriatic Arthritis विकसित होने के जोखिम पर असर पड़ सकता है। खासतौर पर IL-17 inhibitors लेने वाले मरीजों में बीमारी का खतरा कम पाया गया। बायोलॉजिक थेरेपी के क्रम पर बढ़ी रुचि Psoriasis से पीड़ित मरीजों में Psoriatic Arthritis होने का खतरा सामान्य लोगों की तुलना में अधिक होता है। हालांकि अब तक यह पूरी तरह स्पष्ट नहीं था कि अलग-अलग बायोलॉजिक थेरेपी इस जोखिम को कैसे प्रभावित करती हैं। पहले के कुछ अध्ययनों में संकेत मिले थे कि first-line IL-23p19 inhibitors Psoriatic Arthritis के खतरे को कम कर सकते हैं, लेकिन second-line बायोलॉजिक थेरेपी के प्रभाव को लेकर पर्याप्त जानकारी उपलब्ध नहीं थी। इसी को ध्यान में रखते हुए शोधकर्ताओं ने यह अध्ययन किया। 20 साल के डेटा का विश्लेषण इस population-based cohort study में 2002 से 2022 के बीच सोरायसिस के लिए बायोलॉजिक थेरेपी शुरू करने वाले 2,819 मरीजों का विश्लेषण किया गया। मरीजों को अलग-अलग दवा समूहों में बांटा गया, जिनमें शामिल थे: Tumour Necrosis Factor (TNF) inhibitors IL-17 inhibitors IL-23p19 inhibitors IL-12/23 inhibitors शोधकर्ताओं ने first-line और second-line दोनों प्रकार की बायोलॉजिक थेरेपी का अलग-अलग विश्लेषण किया। अध्ययन का मुख्य उद्देश्य यह देखना था कि कितने मरीजों में बाद में Psoriatic Arthritis विकसित हुआ। IL-17 Inhibitors में सबसे कम जोखिम अध्ययन में first-line biologic therapy लेने वाले 2,819 मरीजों में से 400 मरीजों (14.2%) में Psoriatic Arthritis विकसित हुआ। विश्लेषण में पाया गया कि first-line IL-23p19 inhibitors लेने वाले मरीजों में TNF inhibitors की तुलना में बीमारी का खतरा काफी कम था। वहीं second-line biologic therapy लेने वाले 1,246 मरीजों में से 125 मरीजों (10%) में Psoriatic Arthritis विकसित हुआ। Second-line treatment analysis में IL-17 inhibitors ही एकमात्र दवा वर्ग था, जिसने TNF inhibitors की तुलना में बीमारी के जोखिम को उल्लेखनीय रूप से कम किया। रिसर्च के अनुसार: IL-17 inhibitors से बीमारी का खतरा लगभग 63% तक कम देखा गया IL-12/23 inhibitors और IL-23p19 inhibitors में भी जोखिम कम होने के संकेत मिले, लेकिन परिणाम सांख्यिकीय रूप से पूरी तरह मजबूत नहीं थे इलाज की रणनीति बदल सकती है शोधकर्ताओं का मानना है कि यह अध्ययन भविष्य में सोरायसिस मरीजों के लिए बायोलॉजिक थेरेपी चुनने की रणनीति को प्रभावित कर सकता है। खासतौर पर TNF inhibitor therapy असफल होने के बाद IL-17 inhibitors बेहतर second-line विकल्प बन सकते हैं। हालांकि विशेषज्ञों ने कहा कि इन निष्कर्षों की पुष्टि के लिए आगे prospective studies की जरूरत होगी, ताकि Psoriatic Arthritis की रोकथाम पर आधारित बेहतर treatment guidelines तैयार की जा सकें।  

surbhi मई 14, 2026 0
Rheumatoid arthritis patient consulting doctor about steroid treatment and bone density health risks
Rheumatoid Arthritis के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवा से हड्डियों पर असर, नई स्टडी में खुलासा

एक नई रिसर्च में सामने आया है कि Rheumatoid Arthritis के इलाज में इस्तेमाल होने वाले लो-डोज ग्लूकोकॉर्टिकोइड ट्रीटमेंट से रीढ़ की हड्डी यानी लम्बर स्पाइन की बोन डेंसिटी पर असर पड़ सकता है। हालांकि राहत की बात यह है कि इससे फ्रैक्चर का खतरा सामान्य इलाज की तुलना में ज्यादा नहीं पाया गया। यह निष्कर्ष एक बड़े मेटा-एनालिसिस में सामने आया है, जिसमें कई क्लिनिकल ट्रायल्स के डेटा का विश्लेषण किया गया। क्या है ग्लूकोकॉर्टिकोइड ट्रीटमेंट? ग्लूकोकॉर्टिकोइड दवाएं आमतौर पर Rheumatoid Arthritis के मरीजों में सूजन और दर्द को नियंत्रित करने के लिए दी जाती हैं। इन्हें अक्सर Disease-Modifying Antirheumatic Drugs (DMARDs) के साथ इस्तेमाल किया जाता है। हालांकि लंबे समय से यह सवाल बना हुआ था कि इन दवाओं का हड्डियों की सेहत पर कितना असर पड़ता है। स्टडी में क्या पाया गया? रिसर्चर्स ने 1,112 मरीजों के डेटा का विश्लेषण किया। इसमें उन मरीजों को शामिल किया गया जिन्हें प्रतिदिन 7.5 mg या उससे कम प्रेडनिसोन समकक्ष ग्लूकोकॉर्टिकोइड दिया गया था। दो साल तक किए गए अध्ययन में पाया गया कि ग्लूकोकॉर्टिकोइड लेने वाले मरीजों में लम्बर स्पाइन की बोन मिनरल डेंसिटी में हल्की कमी देखी गई। हालांकि फीमर यानी जांघ की हड्डी पर कोई बड़ा असर नहीं पाया गया। फ्रैक्चर का खतरा नहीं बढ़ा स्टडी के दौरान कुल 35 मरीजों में क्लिनिकल फ्रैक्चर दर्ज किए गए, लेकिन ग्लूकोकॉर्टिकोइड ट्रीटमेंट लेने वाले और सामान्य इलाज पाने वाले मरीजों के बीच फ्रैक्चर के खतरे में कोई बड़ा अंतर नहीं मिला। रिसर्चर्स का कहना है कि बोन लॉस की गंभीरता हर मरीज में अलग हो सकती है और यह व्यक्ति की पहले से मौजूद ऑस्टियोपोरोसिस रिस्क पर भी निर्भर करती है। आगे और रिसर्च की जरूरत विशेषज्ञों ने कहा कि भविष्य में लंबी अवधि के प्रभावों को समझने और हड्डियों को नुकसान से बचाने के उपायों पर और रिसर्च की जरूरत है। डॉक्टरों का मानना है कि इलाज के फायदे और संभावित जोखिमों के बीच संतुलन बनाना बेहद जरूरी है, ताकि मरीजों को बेहतर राहत मिलने के साथ हड्डियों की सेहत भी सुरक्षित रह सके। मरीजों के लिए क्या है जरूरी? नियमित बोन डेंसिटी जांच कैल्शियम और विटामिन D का संतुलित सेवन डॉक्टर की सलाह के बिना दवा बंद न करना ऑस्टियोपोरोसिस रिस्क का समय-समय पर मूल्यांकन

surbhi मई 12, 2026 0
Cardiac MRI showing advanced risk assessment in hypertrophic cardiomyopathy using Left Atrioventricular Coupling Index
Hypertrophic Cardiomyopathy: नए MRI इंडेक्स से Sudden Cardiac Death का जोखिम आकलन हुआ और सटीक

हृदय रोग Hypertrophic Cardiomyopathy (HCM) में अचानक हृदय मृत्यु (Sudden Cardiac Death) का जोखिम लंबे समय से चिंता का विषय रहा है। अब एक नई स्टडी में पाया गया है कि MRI से निकाला गया एक नया मापदंड – Left Atrioventricular Coupling Index (LACI) – जोखिम का अनुमान लगाने में मौजूदा मॉडल्स से भी बेहतर मदद कर सकता है। क्या है LACI और क्यों है महत्वपूर्ण? LACI दिल के बाएं एट्रियम और वेंट्रिकल के बीच के संबंध को दर्शाता है। इसे बाएं एट्रियम और बाएं वेंट्रिकल के एंड-डायस्टोलिक वॉल्यूम के अनुपात से मापा जाता है। यह इंडेक्स दिल की कार्यप्रणाली के उस पहलू को पकड़ता है, जिसे पारंपरिक पैरामीटर पूरी तरह नहीं दर्शा पाते। बड़े अध्ययन से मिले अहम संकेत इस रिसर्च में 2,240 HCM मरीजों को औसतन 4 साल तक फॉलो किया गया। इस दौरान: 128 मरीजों (5.7%) में Sudden Cardiac Death की घटनाएं दर्ज हुईं जिन मरीजों में घटना हुई, उनमें LACI का स्तर ज्यादा था साथ ही Late Gadolinium Enhancement (LGE) भी अधिक और हृदय की पंपिंग क्षमता (Ejection Fraction) कम पाई गई मौजूदा मॉडल्स से बेहतर प्रदर्शन अध्ययन में यह भी पाया गया कि LACI, पारंपरिक जोखिम कारकों और LGE के साथ मिलकर Sudden Cardiac Death का स्वतंत्र भविष्यवक्ता (independent predictor) बना रहा। जब इसे ESC और ACC/AHA के मौजूदा जोखिम मॉडल्स में जोड़ा गया, तो जोखिम आकलन की सटीकता और बेहतर हो गई। डॉक्टरों के लिए क्या मतलब? इस नई जानकारी से डॉक्टरों को यह तय करने में मदद मिल सकती है कि किन मरीजों में अचानक हृदय मृत्यु का खतरा ज्यादा है। इससे इलाज और मॉनिटरिंग की रणनीति और अधिक सटीक बनाई जा सकती है। अभी और रिसर्च की जरूरत हालांकि यह अध्ययन रेट्रोस्पेक्टिव था, इसलिए इसके आधार पर सीधे कारण-परिणाम का निष्कर्ष निकालना सीमित है। साथ ही, अलग-अलग आबादी (जैसे लिंग और जातीयता) पर इसके प्रभाव को समझने के लिए और शोध जरूरी है।  

surbhi मई 2, 2026 0
Narrowband and broadband UVB phototherapy comparison for treating moderate to severe atopic dermatitis
Atopic Dermatitis में Narrowband vs Broadband UVB: असर बराबर, सहनशीलता में Narrowband बेहतर – नई स्टडी

मध्यम से गंभीर Atopic Dermatitis के इलाज में Ultraviolet B phototherapy (UVB) लंबे समय से प्रभावी विकल्प माना जाता है, खासकर उन मरीजों के लिए जो टॉपिकल स्टेरॉयड जैसे उपचारों से पर्याप्त लाभ नहीं पा रहे हैं। अब एक नई रैंडमाइज्ड कंट्रोल्ड ट्रायल ने narrowband और broadband UVB के बीच तुलना करते हुए अहम निष्कर्ष सामने रखे हैं। स्टडी कैसे की गई? इस अध्ययन में 18 वर्ष से अधिक उम्र के 69 मरीज शामिल किए गए, जिन्हें मध्यम से गंभीर और ट्रीटमेंट-रेफ्रैक्टरी एटोपिक डर्मेटाइटिस था। मरीजों को दो समूहों में बांटा गया: एक को broadband UVB दूसरे को narrowband UVB दोनों समूहों को 12 हफ्तों तक फुल-बॉडी फोटोथेरेपी दी गई, साथ ही उनकी मौजूदा टॉपिकल थेरेपी जारी रही। अध्ययन का मुख्य मापदंड Eczema Area and Severity Index (EASI) स्कोर में बदलाव था। असर में नहीं दिखा बड़ा अंतर रिजल्ट्स के मुताबिक, दोनों ही थेरेपी ने बीमारी की गंभीरता में उल्लेखनीय सुधार किया: Broadband UVB: EASI में औसत −8.1 की कमी Narrowband UVB: EASI में औसत −8.9 की कमी दोनों के बीच का अंतर सांख्यिकीय रूप से महत्वपूर्ण नहीं था, यानी प्रभाव लगभग समान रहा। इसके अलावा vIGA, POEM, PP-NRS, DLQI और RECAP जैसे अन्य क्लिनिकल और मरीज-आधारित मापदंडों में भी दोनों ग्रुप्स के बीच कोई खास अंतर नहीं पाया गया। सहनशीलता में बड़ा फर्क हालांकि, टॉलरबिलिटी (सहनशीलता) के मामले में फर्क देखने को मिला: Broadband UVB ग्रुप में 4 मरीजों ने साइड इफेक्ट्स के कारण इलाज छोड़ दिया Narrowband UVB ग्रुप में कोई भी मरीज बीच में नहीं छोड़ा यह दर्शाता है कि narrowband UVB ज्यादा सुरक्षित और बेहतर सहन किया जाने वाला विकल्प हो सकता है। क्या है इसका मतलब? इस अध्ययन से यह साफ होता है कि दोनों UVB थेरेपी प्रभावी हैं, लेकिन बेहतर सहनशीलता के कारण narrowband UVB को प्राथमिकता दी जा सकती है। यह निष्कर्ष डॉक्टरों को इलाज का सही विकल्प चुनने में मदद कर सकता है, खासकर उन मरीजों के लिए जिनकी बीमारी लंबे समय से नियंत्रण में नहीं आ रही।  

surbhi मई 2, 2026 0
Semaglutide injection pen used for diabetes and weight loss treatment becoming more affordable in India
डायबिटीज और मोटापे की दवा सस्ती होगी: Semaglutide का पेटेंट खत्म, 50–70% तक घट सकते हैं दाम

क्या है बड़ा बदलाव? डायबिटीज और मोटापे के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवा Semaglutide का भारत में पेटेंट 20 मार्च को खत्म हो गया है। इसके साथ ही अब कई भारतीय दवा कंपनियां इसके सस्ते जेनेरिक वर्जन बाजार में उतार सकेंगी। यह वही दवा है जो Novo Nordisk की चर्चित दवाओं Ozempic, Wegovy और Rybelsus में इस्तेमाल होती है। मरीजों को क्या होगा फायदा? पेटेंट खत्म होते ही Sun Pharma, Dr. Reddy’s Laboratories, Zydus Lifesciences, Lupin, Natco Pharma और Mankind Pharma जैसी कंपनियां जेनेरिक दवाएं लॉन्च करने की तैयारी में हैं। इससे दाम में 50 से 70 प्रतिशत तक गिरावट आ सकती है। जहां पहले इलाज महंगा था, अब मरीजों को करीब ₹3,000–₹5,000 प्रति माह में दवा मिल सकती है। भारत जैसे देश में, जहां ज्यादातर इलाज अपनी जेब से होता है, यह बदलाव लाखों मरीजों के लिए राहत लेकर आ सकता है। एक्सपर्ट्स क्यों मानते हैं ‘गेम-चेंजर’? डॉक्टरों के अनुसार Semaglutide सिर्फ शुगर कंट्रोल नहीं करता, बल्कि पूरी बीमारी पर असर डालता है। यह वजन घटाने में मदद करता है शरीर में जमा फैट को कम करता है हार्ट अटैक और स्ट्रोक का खतरा घटाता है क्लिनिकल ट्रायल SUSTAIN-6 trial के मुताबिक: हार्ट अटैक का खतरा 26% कम स्ट्रोक का खतरा 39% कम इसके अलावा FLOW trial और ESSENCE trial में भी दिल, किडनी और लीवर पर सकारात्मक असर सामने आया है। क्यों बढ़ी इस दवा की मांग? Semaglutide आधारित दवाएं दुनिया भर में तेजी से लोकप्रिय हुई हैं क्योंकि: हफ्ते में एक बार इंजेक्शन तेजी से वजन घटाने के परिणाम लाइफस्टाइल बीमारियों पर असर इसी वजह से यह दवा ग्लोबल मार्केट में अरबों डॉलर का कारोबार कर रही है। Novo Nordisk कैसे बचाएगी अपना बाजार? पेटेंट खत्म होने के बावजूद Novo Nordisk अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए नई रणनीति अपना रही है: Wegovy की कीमत में 37% तक कटौती स्थानीय कंपनियों के साथ साझेदारी Emcure Abbott India “सेकंड ब्रांड” लॉन्च कर मार्केट में पकड़ मजबूत करना कंपनी अपनी मजबूत डिस्ट्रीब्यूशन और कोल्ड-चेन सिस्टम के जरिए प्रतिस्पर्धा का सामना कर रही है। क्या जेनेरिक दवाएं उतनी ही असरदार होंगी? यह सबसे बड़ा सवाल बना हुआ है। कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि जेनेरिक दवाएं अलग तकनीक से बनती हैं, जिससे असर में फर्क आ सकता है वहीं जेनेरिक कंपनियों का दावा है कि उनके प्रोडक्ट्स पूरी तरह सुरक्षित और प्रभावी होंगे अंततः, दवा की गुणवत्ता और असर का फैसला नियामक संस्थाओं और बाजार के अनुभव पर निर्भर करेगा।  

surbhi मार्च 20, 2026 0
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शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

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surbhi मई 15, 2026 0