Hindu Rituals

Married Hindu women worship a banyan tree during Vat Purnima Vrat for their husband's long life and marital happiness.
Vat Purnima Vrat 2026: आज रखा जा रहा है वट पूर्णिमा व्रत, जानें पूजा विधि, जरूरी नियम और किन बातों का रखें विशेष ध्यान

नई दिल्ली: आज, 29 जून 2026 (सोमवार) को वट पूर्णिमा व्रत रखा जा रहा है। हिंदू धर्म में इस व्रत का विशेष महत्व माना जाता है। सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु, सुखी दांपत्य जीवन और अखंड सौभाग्य की कामना के साथ यह व्रत करती हैं। इस दिन वट (बरगद) वृक्ष, माता सावित्री और सत्यवान की विधि-विधान से पूजा की जाती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, श्रद्धा और नियमपूर्वक वट पूर्णिमा व्रत करने से वैवाहिक जीवन में सुख-समृद्धि बनी रहती है और अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद प्राप्त होता है। वट पूर्णिमा व्रत की पूजा विधि वट पूर्णिमा के दिन महिलाओं को सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करने के बाद स्वच्छ या लाल एवं पीले रंग के वस्त्र धारण करने चाहिए। पूजा के दौरान इन बातों का विशेष ध्यान रखें— सोलह श्रृंगार करके व्रत और पूजा का संकल्प लें। एक बांस की टोकरी में सात प्रकार के अनाज रखें और उसे स्वच्छ कपड़े से ढक दें। पूजा की सामग्री लेकर वट (बरगद) वृक्ष के पास जाएं। वट वृक्ष, माता सावित्री और सत्यवान की विधिवत पूजा करें। वट वृक्ष पर जल अर्पित करें तथा कुमकुम, अक्षत, फूल, फल, रोली और दीप अर्पित करें। कच्चा सूत लपेटते हुए वट वृक्ष की परिक्रमा करें। वट सावित्री व्रत कथा श्रद्धापूर्वक सुनें। पूजा के बाद दान-दक्षिणा करें। चना और गुड़ का प्रसाद अर्पित करें। सुहाग की सामग्री वट वृक्ष पर चढ़ाएं। घर लौटकर पति का आशीर्वाद लें और उन्हें प्रसाद अर्पित करें। वट पूर्णिमा व्रत में क्या करें? सोलह श्रृंगार अवश्य करें। पूजा में सुहाग की सामग्री अर्पित करें। व्रत का पारण परंपरा के अनुसार भीगे हुए चने खाकर करें। पूजा में चढ़ाई गई सुहाग सामग्री किसी सुहागिन महिला, सास या ननद को भेंट करें। वट वृक्ष की 5, 7, 11, 21 या 51 परिक्रमा करें। यदि संभव हो तो 108 परिक्रमा भी की जा सकती है। वट पूर्णिमा व्रत में क्या नहीं करना चाहिए? मन में नकारात्मक विचार न रखें। किसी से विवाद या बहस करने से बचें। जीवनसाथी से क्रोध या कटु व्यवहार न करें। काले, नीले और सफेद रंग के वस्त्र पहनने से बचें। व्रत कथा के दौरान बीच में उठकर न जाएं। पूरी कथा समाप्त होने के बाद ही अपने स्थान से उठें। धार्मिक महत्व धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, माता सावित्री ने अपने दृढ़ संकल्प, तप और पतिव्रत धर्म के बल पर अपने पति सत्यवान के प्राण यमराज से वापस प्राप्त किए थे। तभी से वट पूर्णिमा और वट सावित्री व्रत को अखंड सौभाग्य, पति की लंबी आयु और सुखी वैवाहिक जीवन का प्रतीक माना जाता है।  

surbhi जून 29, 2026 0
Devotees worship Lord Vishnu during Nirjala Ekadashi with lamps, tulsi leaves, and traditional offerings.
Nirjala Ekadashi 2026: कब है निर्जला एकादशी? जानिए क्यों इस एक व्रत से मिलता है पूरे साल की 24 एकादशियों का पुण्य

Nirjala Ekadashi 2026 Date: हिंदू धर्म में निर्जला एकादशी को सभी एकादशियों में सबसे श्रेष्ठ और पुण्यदायी माना गया है। मान्यता है कि जो व्यक्ति श्रद्धा और नियमपूर्वक इस व्रत का पालन करता है, उसे पूरे वर्ष की 24 एकादशियों के समान पुण्य फल प्राप्त होता है। इस दिन भगवान विष्णु की विशेष पूजा की जाती है और व्रती पूरे दिन अन्न और जल का त्याग कर उपवास रखते हैं। इसलिए इसे सबसे कठिन और सबसे फलदायी एकादशी भी कहा जाता है। कब है निर्जला एकादशी 2026? पंचांग के अनुसार, ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि का आरंभ 24 जून 2026, बुधवार को शाम 6:13 बजे से होगा और इसका समापन 25 जून 2026, गुरुवार को शाम 8:10 बजे पर होगा। उदया तिथि के आधार पर निर्जला एकादशी का व्रत 25 जून 2026, गुरुवार को रखा जाएगा। तिथि समय एकादशी तिथि प्रारंभ 24 जून 2026, शाम 6:13 बजे एकादशी तिथि समाप्त 25 जून 2026, शाम 8:10 बजे निर्जला एकादशी व्रत 25 जून 2026, गुरुवार क्यों माना जाता है निर्जला एकादशी को सबसे श्रेष्ठ? शास्त्रों के अनुसार, निर्जला एकादशी का महत्व अत्यंत विशेष है। पद्म पुराण में उल्लेख मिलता है कि इस दिन बिना जल ग्रहण किए भगवान विष्णु का स्मरण और उपवास करने से मनुष्य को बड़े से बड़े पापों से मुक्ति मिलती है और मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है। इस दिन किए गए स्नान, दान, जप और पूजा का फल अक्षय माना गया है। मान्यता है कि इस व्रत से मेरु पर्वत के समान बड़े पाप भी नष्ट हो जाते हैं। भीमसेनी एकादशी क्यों कहलाती है? निर्जला एकादशी को भीमसेनी एकादशी भी कहा जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार, महाभारत काल में पांडवों में से भीमसेन अपनी प्रबल भूख के कारण नियमित व्रत नहीं रख पाते थे। तब उन्होंने महर्षि वेदव्यास से ऐसा उपाय पूछा, जिससे उन्हें सभी एकादशियों का फल प्राप्त हो सके। महर्षि वेदव्यास ने उन्हें ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी पर निर्जल रहकर व्रत करने का उपदेश दिया। भीमसेन ने इस कठिन व्रत का पालन किया और उन्हें वर्षभर की सभी एकादशियों के समान पुण्य प्राप्त हुआ। तभी से इसे भीमसेनी एकादशी कहा जाने लगा। क्यों मिलता है 24 एकादशियों के बराबर फल? धार्मिक मान्यता के अनुसार, जो लोग पूरे वर्ष की सभी एकादशियों का व्रत करने में सक्षम नहीं होते, उनके लिए निर्जला एकादशी विशेष महत्व रखती है। कहा जाता है कि केवल इस एक व्रत को श्रद्धा और नियमपूर्वक करने से वर्षभर में आने वाली सभी एकादशियों के समान पुण्य प्राप्त होता है। निर्जला एकादशी व्रत की विधि प्रातःकाल स्नान करके भगवान विष्णु का पूजन करें। पीले वस्त्र, तुलसी दल, फल और पंचामृत अर्पित करें। दिनभर अन्न और जल का त्याग कर उपवास रखें। विष्णु मंत्र और विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें। जरूरतमंदों को दान करें। अगले दिन द्वादशी तिथि में विधिपूर्वक व्रत का पारण करें।

surbhi जून 23, 2026 0
Tulsi leaves and Gangajal offered during Hindu last rites as described in Garuda Purana
गरुड़ पुराण: मृत्यु के समय मुंह में तुलसी और गंगाजल क्यों डाला जाता है? जानिए इसका आध्यात्मिक रहस्य

हिंदू धर्म में जन्म से लेकर मृत्यु तक कुल 16 संस्कारों का वर्णन मिलता है। इनमें अंतिम संस्कार को अंत्येष्टि संस्कार कहा जाता है। मृत्यु के समय व्यक्ति के मुख में तुलसी का पत्ता और गंगाजल डालने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। गरुड़ पुराण में इस परंपरा के पीछे गहरे धार्मिक और आध्यात्मिक कारण बताए गए हैं। मृत्यु के समय तुलसी का पत्ता रखने का महत्व गरुड़ पुराण के अनुसार, जब किसी व्यक्ति की मृत्यु निकट होती है तो उसकी आत्मा शरीर छोड़ने की तैयारी करती है। मान्यता है कि उस समय यमदूत जीवात्मा को लेने आते हैं, जिससे आत्मा भयभीत हो सकती है। शास्त्रों में तुलसी को भगवान विष्णु की अत्यंत प्रिय माना गया है और इसे ‘हरिप्रिया’ कहा जाता है। माना जाता है कि मृत्यु के समय यदि व्यक्ति के मुख, सिर या छाती पर तुलसी का पत्ता रखा जाए तो यमदूत उसके पास नहीं आते। इसके बजाय भगवान विष्णु के दूत उसकी आत्मा का मार्गदर्शन करते हैं और उसे शुभ लोकों की ओर ले जाते हैं। गंगाजल को क्यों माना गया है मोक्षदायी? सनातन परंपरा में गंगा नदी को केवल जलधारा नहीं, बल्कि मां गंगा का स्वरूप माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार गंगाजल अत्यंत पवित्र होता है और यह व्यक्ति के पापों का नाश करने वाला माना गया है। गरुड़ पुराण में वर्णन मिलता है कि यदि मृत्यु के समय गंगाजल की कुछ बूंदें व्यक्ति के कंठ से नीचे उतर जाएं तो उसके जीवनभर के अनेक पापों का क्षय होता है। ऐसा माना जाता है कि इससे आत्मा को सांसारिक बंधनों से मुक्ति मिलती है और मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है। यमलोक की यातनाओं से मुक्ति की मान्यता धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, तुलसी और गंगाजल का स्पर्श आत्मा को शांति प्रदान करता है। यह माना जाता है कि इनके प्रभाव से आत्मा को यमलोक की कठोर यातनाओं का सामना नहीं करना पड़ता और उसे शुभ गति प्राप्त होती है। शास्त्रों में वर्णित श्लोक गरुड़ पुराण में इस परंपरा के महत्व को दर्शाते हुए एक प्रसिद्ध श्लोक का उल्लेख मिलता है— तुलसीदलयुक्तं जलं यो पिबेत् मरणे काले। स गच्छति परं धाम यत्र न म्रियते पुनः।। अर्थ: जो व्यक्ति मृत्यु के समय तुलसी युक्त जल का सेवन करता है, वह परम धाम को प्राप्त करता है, जहां पहुंचने के बाद उसे पुनः जन्म और मृत्यु के चक्र में नहीं आना पड़ता। धार्मिक आस्था और परंपरा का संगम तुलसी और गंगाजल से जुड़ी यह परंपरा हिंदू धर्म में आस्था, श्रद्धा और मोक्ष की अवधारणा से गहराई से जुड़ी हुई है। यही कारण है कि आज भी अधिकांश हिंदू परिवार मृत्यु के अंतिम क्षणों में अपने प्रियजनों को तुलसी और गंगाजल अर्पित करते हैं, ताकि उनकी आत्मा को शांति और शुभ गति प्राप्त हो सके।  

surbhi जून 16, 2026 0
Devotee chanting Gayatri Mantra during morning prayer with rosary and rising sun
गायत्री मंत्र का अर्थ, जप का सही समय और जरूरी नियम, जानें क्यों माना जाता है इसे सबसे प्रभावशाली मंत्र

सनातन धर्म में गायत्री मंत्र को अत्यंत पवित्र, शक्तिशाली और कल्याणकारी मंत्रों में से एक माना जाता है। मान्यता है कि नियमित रूप से गायत्री मंत्र का जप करने से मन को शांति मिलती है, बुद्धि का विकास होता है और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। धार्मिक परंपराओं के अनुसार, इस मंत्र के जप के लिए कुछ विशेष नियमों का पालन करना भी आवश्यक माना गया है। गायत्री मंत्र ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो नः प्रचोदयात्।। गायत्री मंत्र का अर्थ गायत्री मंत्र का अर्थ है— "हम उस परम प्रकाशमान, सर्वशक्तिमान और दिव्य परमात्मा के तेज का ध्यान करते हैं। वह परम तेज हमारी बुद्धि को प्रकाशित करे और हमें सत्य तथा सद्मार्ग पर चलने की प्रेरणा प्रदान करे।" यह मंत्र ज्ञान, विवेक और आध्यात्मिक जागृति का प्रतीक माना जाता है। गायत्री मंत्र जप का सही समय धार्मिक मान्यताओं के अनुसार गायत्री मंत्र का जप विशेष रूप से इन समयों में शुभ माना जाता है— सूर्योदय से पहले ब्रह्म मुहूर्त में सूर्योदय के समय सूर्यास्त के बाद संध्या काल में मान्यता है कि इन समयों में वातावरण अपेक्षाकृत शांत और सात्विक होता है, जिससे ध्यान और मंत्र जप में एकाग्रता बढ़ती है। गायत्री मंत्र जप के प्रमुख नियम 1. स्वच्छता का रखें विशेष ध्यान मंत्र जप से पहले स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करना शुभ माना जाता है। शारीरिक और मानसिक पवित्रता पर विशेष बल दिया जाता है। 2. शांत स्थान का चयन करें जप के लिए ऐसे स्थान का चुनाव करें जहां शांति हो और ध्यान भंग न हो। मंत्र जप शुरू करने से पहले माता गायत्री का स्मरण और ध्यान करें। 3. रुद्राक्ष की माला का प्रयोग परंपरागत मान्यताओं के अनुसार गायत्री मंत्र के जप के लिए रुद्राक्ष की माला का उपयोग शुभ माना जाता है। 4. 108 बार जप का महत्व एक माला में 108 मनके होते हैं। इसलिए कम से कम 108 बार मंत्र जप करना शुभ माना जाता है। 5. सकारात्मक भाव रखें मंत्र जप करते समय मन में सकारात्मक विचार और शुभ संकल्प रखना चाहिए। मान्यता है कि श्रद्धा और एकाग्रता के साथ किया गया जप अधिक फलदायी माना जाता है। 6. संध्या से पहले जप करते समय मौन रहें कुछ धार्मिक परंपराओं में माना जाता है कि यदि सूर्यास्त से पहले जप किया जाए तो यथासंभव मौन रहकर जप करना चाहिए। क्या कोई भी कर सकता है गायत्री मंत्र का जप? इस विषय में विभिन्न धार्मिक परंपराओं और मतों में अलग-अलग विचार मिलते हैं। कई परंपराएं मानती हैं कि गायत्री मंत्र का जप गुरु से दीक्षा लेकर करना चाहिए और गुरु द्वारा बताए गए नियमों का पालन करना चाहिए। वहीं कई आधुनिक आध्यात्मिक संस्थाएं श्रद्धा और उचित उच्चारण के साथ सभी लोगों को गायत्री मंत्र जप की अनुमति देती हैं। यदि आप किसी विशेष धार्मिक परंपरा का पालन करते हैं, तो अपने गुरु या आध्यात्मिक मार्गदर्शक से परामर्श लेना उचित रहेगा। गायत्री मंत्र जप के बताए गए लाभ धार्मिक मान्यताओं के अनुसार नियमित गायत्री मंत्र जप से— मानसिक शांति प्राप्त होती है। एकाग्रता और स्मरण शक्ति बढ़ती है। सकारात्मक सोच विकसित होती है। आत्मविश्वास में वृद्धि होती है। निर्णय लेने की क्षमता बेहतर हो सकती है। विद्यार्थियों को अध्ययन में लाभ मिलने की मान्यता है। हालांकि इन लाभों को धार्मिक और आध्यात्मिक मान्यताओं के संदर्भ में देखा जाना चाहिए।  

surbhi जून 4, 2026 0
Ganesh Puja on Vibhuvan Sankashti Chaturthi with flowers, modak and sacred offerings
3 जून को मनाई जाएगी विभुवन संकष्टी चतुर्थी, पूजा से पहले नोट कर लें पूरी सामग्री और विधि

भगवान गणेश को समर्पित विभुवन संकष्टी चतुर्थी इस वर्ष 3 जून 2026, बुधवार को मनाई जाएगी। हिंदू धर्म में इस व्रत का विशेष महत्व माना गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन विधि-विधान से भगवान गणेश की पूजा और व्रत करने से जीवन के सभी संकट दूर होते हैं तथा सुख, शांति और समृद्धि की प्राप्ति होती है। विभुवन संकष्टी चतुर्थी को वर्ष भर में आने वाली संकष्टी चतुर्थियों में सबसे दुर्लभ और विशेष माना जाता है, क्योंकि यह केवल तीन वर्ष में एक बार आती है। यह ज्येष्ठ अधिक मास (पुरुषोत्तम मास) के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाई जाती है। विभुवन संकष्टी चतुर्थी का धार्मिक महत्व हिंदू मान्यता के अनुसार, भगवान गणेश विघ्नहर्ता और प्रथम पूज्य देव हैं। विभुवन संकष्टी चतुर्थी के दिन श्रद्धापूर्वक व्रत रखने और गणपति बप्पा की पूजा करने से जीवन की बाधाएं दूर होती हैं, कार्यों में सफलता मिलती है और परिवार में सुख-समृद्धि का वास होता है। विशेष रूप से संतान सुख, आर्थिक उन्नति और मानसिक शांति की कामना करने वाले भक्त इस व्रत को बड़ी श्रद्धा के साथ करते हैं। पूजा के लिए आवश्यक सामग्री विभुवन संकष्टी चतुर्थी की पूजा शुरू करने से पहले सभी सामग्री एकत्र कर लेना शुभ माना जाता है। आवश्यक पूजा सामग्री भगवान गणेश की प्रतिमा या चित्र लाल या पीला वस्त्र दूर्वा घास लाल पुष्प अक्षत (चावल) रोली कुमकुम पीला चंदन धूप अगरबत्ती दीपक कपूर घी कलश गंगाजल पान के पत्ते सुपारी लौंग इलायची कलावा मौसमी फल मिठाई या मोदक तांबे, पीतल या चांदी का लोटा पूजा विधि व्रत के दिन सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके बाद भगवान गणेश का स्मरण करते हुए व्रत का संकल्प लें। एक साफ चौकी पर लाल या पीला कपड़ा बिछाकर गणेश जी की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। भगवान गणेश को रोली, चंदन का तिलक लगाएं और 21 दूर्वा तथा लाल पुष्प अर्पित करें। इसके बाद धूप, दीप और अगरबत्ती जलाकर पूजा प्रारंभ करें। गणेश जी को फल, मिठाई, अक्षत, लौंग, इलायची तथा अन्य पूजन सामग्री अर्पित करें। पूजा के दौरान गणेश मंत्रों का कम से कम 108 बार जाप करें और विभुवन संकष्टी व्रत कथा का पाठ या श्रवण अवश्य करें। अंत में कपूर या दीपक से भगवान गणेश की आरती करें। चंद्रमा को अर्घ्य देने का विशेष महत्व संकष्टी चतुर्थी व्रत में चंद्र दर्शन का विशेष महत्व माना जाता है। रात्रि में चंद्रमा के दर्शन होने पर लोटे में जल, दूध और चंदन मिलाकर चंद्रदेव को अर्घ्य अर्पित करें। इसके बाद भगवान गणेश का प्रसाद ग्रहण कर व्रत का पारण करें। मान्यता है कि इस विधि से पूजा करने पर भगवान गणेश की विशेष कृपा प्राप्त होती है और जीवन के सभी विघ्न दूर होते हैं।  

surbhi जून 1, 2026 0
Devotee applying sacred tilak on forehead during Hindu religious ritual and worship.
माथे पर तिलक लगाने की परंपरा क्यों है? जानिए धार्मिक, आध्यात्मिक और वैज्ञानिक महत्व

सनातन धर्म में तिलक केवल एक धार्मिक चिन्ह नहीं, बल्कि आस्था, ऊर्जा और आध्यात्मिक चेतना का प्रतीक माना जाता है। पूजा-पाठ, यज्ञ, दान और अन्य धार्मिक अनुष्ठानों में तिलक का विशेष महत्व बताया गया है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार तिलक धारण करने से व्यक्ति को शुभ फल प्राप्त होते हैं और उसकी आध्यात्मिक शक्ति में वृद्धि होती है। शास्त्रों में तिलक का महत्व धार्मिक ग्रंथों में तिलक को अत्यंत पवित्र माना गया है। ब्रह्मवैवर्त पुराण के ब्रह्मपर्व में उल्लेख मिलता है कि स्नान, दान, तप, हवन, देवपूजन और पितरों से जुड़े कर्म यदि तिलक लगाए बिना किए जाएं तो उनका पूर्ण फल प्राप्त नहीं होता। यही कारण है कि वैदिक परंपरा में पूजा और धार्मिक अनुष्ठान से पहले तिलक धारण करने की परंपरा रही है। किस अंगुली से तिलक लगाने का क्या फल मिलता है? स्कंदपुराण में तिलक लगाने की विधि और उसके प्रभाव का विस्तार से वर्णन किया गया है। अनामिका (रिंग फिंगर) से तिलक लगाने पर शांति और मानसिक संतुलन की प्राप्ति होती है। मध्यमा अंगुली से तिलक करने पर आयु वृद्धि का फल बताया गया है। अंगूठे से लगाया गया तिलक स्वास्थ्य और बल प्रदान करने वाला माना जाता है। तर्जनी अंगुली से तिलक लगाने को मोक्ष प्राप्ति से जोड़ा गया है। देवी-देवताओं के अनुसार अलग-अलग तिलक हिंदू धर्म में विभिन्न संप्रदायों और उपासना पद्धतियों के अनुसार तिलक के स्वरूप भी अलग-अलग होते हैं। विष्णु भक्तों का ऊर्ध्व तिलक भगवान विष्णु के उपासक माथे पर दो सीधी रेखाओं वाला ऊर्ध्व तिलक धारण करते हैं, जो भक्ति और समर्पण का प्रतीक माना जाता है। शक्ति उपासकों का तिलक मां शक्ति की आराधना करने वाले साधक प्रायः दो बिंदुओं या विशेष स्वरूप का तिलक लगाते हैं, जो शक्ति और ऊर्जा का प्रतीक होता है। शिव भक्तों का त्रिपुंड भगवान शिव के भक्त भस्म से तीन आड़ी रेखाओं वाला त्रिपुंड धारण करते हैं। धार्मिक मान्यता है कि त्रिपुंड धारण कर जप, तप और पूजा करने से आध्यात्मिक उन्नति होती है। तिलक का वैज्ञानिक और आध्यात्मिक महत्व माथे के बीच का भाग, जहां तिलक लगाया जाता है, शरीर का एक महत्वपूर्ण ऊर्जा केंद्र माना जाता है। योग और ध्यान परंपरा में इसे आज्ञा चक्र कहा जाता है। यह स्थान दोनों भौंहों के बीच स्थित होता है और मानसिक एकाग्रता तथा चेतना से जुड़ा माना जाता है। मान्यता है कि इस स्थान पर चंदन, कुमकुम या भस्म का तिलक लगाने से मन को शांति मिलती है, एकाग्रता बढ़ती है और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। कई विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि माथे के इस हिस्से पर हल्का दबाव मानसिक तनाव को कम करने और ध्यान केंद्रित करने में सहायक हो सकता है। केवल परंपरा नहीं, आस्था और ऊर्जा का प्रतीक तिलक सनातन संस्कृति की एक महत्वपूर्ण पहचान है। यह व्यक्ति की धार्मिक आस्था, आध्यात्मिक चेतना और सांस्कृतिक विरासत को दर्शाता है। पूजा, व्रत और शुभ कार्यों में तिलक लगाने की परंपरा सदियों से चली आ रही है और आज भी श्रद्धालु इसे शुभता, सकारात्मकता और ईश्वरीय कृपा का प्रतीक मानते हैं।  

surbhi मई 26, 2026 0
Hindu funeral ritual being performed near a cremation pyre before sunset as per Garuda Purana beliefs.
सूर्यास्त के बाद क्यों नहीं किया जाता अंतिम संस्कार? जानिए Garuda Purana में क्या है मान्यता

हिंदू धर्म में जन्म से लेकर मृत्यु तक हर संस्कार का विशेष महत्व माना गया है। सनातन परंपरा के अनुसार प्रत्येक धार्मिक कार्य को विधि-विधान और निर्धारित नियमों के साथ करना जरूरी माना जाता है। यही वजह है कि किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसका अंतिम संस्कार भी पूरी श्रद्धा और धार्मिक रीति-रिवाजों के साथ किया जाता है। Garuda Purana में मृत्यु, आत्मा और मोक्ष से जुड़े कई नियमों और मान्यताओं का उल्लेख मिलता है। इन्हीं मान्यताओं के अनुसार सूर्यास्त के बाद अंतिम संस्कार करना अशुभ माना गया है। अंतिम संस्कार का क्या है धार्मिक महत्व? हिंदू मान्यता के अनुसार मृत्यु केवल शरीर का अंत है, जबकि आत्मा अमर मानी जाती है। अंतिम संस्कार को आत्मा की मुक्ति और मोक्ष प्राप्ति का महत्वपूर्ण माध्यम माना गया है। धार्मिक विश्वास है कि यदि दाह संस्कार सही विधि-विधान, मंत्रों और परंपराओं के अनुसार न किया जाए, तो आत्मा को शांति नहीं मिलती और उसे मोक्ष प्राप्त करने में बाधा आ सकती है। सूर्यास्त के बाद अंतिम संस्कार क्यों नहीं किया जाता? Garuda Purana और अन्य धार्मिक ग्रंथों में उल्लेख मिलता है कि सूर्यास्त के बाद दाह संस्कार करने से बचना चाहिए। धार्मिक मान्यता के अनुसार: सूर्य देव प्रकाश, ऊर्जा और सकारात्मकता के प्रतीक माने जाते हैं। दिन के समय किए गए संस्कारों को शुभ और देवताओं का आशीर्वाद प्राप्त माना जाता है। रात का समय नकारात्मक शक्तियों और अशुभ प्रभावों से जुड़ा माना गया है। इसी वजह से माना जाता है कि सूर्यास्त के बाद अंतिम संस्कार करने से आत्मा को मोक्ष प्राप्त करने में कठिनाई हो सकती है। यही कारण है कि यदि किसी व्यक्ति की मृत्यु रात में हो जाए, तो शव को अगले दिन सूर्योदय तक सुरक्षित रखा जाता है। इसके पीछे वैज्ञानिक और व्यावहारिक कारण भी हैं धार्मिक मान्यताओं के अलावा इसके पीछे कुछ व्यावहारिक वजहें भी बताई जाती हैं। प्राचीन समय में: रात में पर्याप्त रोशनी की व्यवस्था नहीं होती थी जंगलों और श्मशान घाटों में सुरक्षा का खतरा रहता था अंतिम संस्कार की प्रक्रिया सही ढंग से पूरी करना कठिन होता था इन्हीं कारणों से दिन के समय अंतिम संस्कार करने की परंपरा विकसित हुई, जो आज भी कई परिवारों में निभाई जाती है। परंपरा और आस्था का प्रतीक सनातन धर्म में अंतिम संस्कार केवल एक धार्मिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि आत्मा की शांति और मोक्ष से जुड़ा पवित्र संस्कार माना जाता है। इसलिए आज भी अधिकांश लोग सूर्यास्त के बाद दाह संस्कार करने से बचते हैं और पारंपरिक मान्यताओं का पालन करते हैं।  

surbhi मई 22, 2026 0
Married women performing Vat Savitri Vrat rituals and offering bayana to mother-in-law in traditional attire
वट सावित्री 2026: व्रत के दिन बहू सास को क्यों देती है बायना? जानें इसका धार्मिक महत्व

Vat Savitri Vrat हिंदू धर्म का एक बेहद महत्वपूर्ण व्रत माना जाता है, जिसे सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की कामना के लिए रखती हैं। इस दिन महिलाएं वट वृक्ष यानी बरगद के पेड़ की पूजा करती हैं और सावित्री-सत्यवान की कथा सुनती हैं। इस व्रत से जुड़ी कई परंपराएं हैं, लेकिन इनमें सबसे खास मानी जाती है बहू द्वारा अपनी सास को “बायना” देने की रस्म। पूजा के बाद बहुएं अपनी सास को श्रृंगार सामग्री, मिठाई, फल और वस्त्र भेंट कर उनका आशीर्वाद लेती हैं। क्यों दिया जाता है बायना? Savitri और Satyavan की कथा के अनुसार, माता सावित्री ने अपने पतिव्रता धर्म, बुद्धिमानी और समर्पण से यमराज को प्रसन्न किया था। उन्होंने अपने पति सत्यवान के प्राण मांगने से पहले अपने अंधे सास-ससुर की आंखों की रोशनी और उनका खोया हुआ राजपाट वापस मांगा था। इसी प्रसंग को आदर्श बहू के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। माना जाता है कि सास-ससुर का सम्मान और सेवा परिवार में सुख-शांति और समृद्धि लाती है। यही कारण है कि वट सावित्री के दिन बहुएं अपनी सास को बायना देकर सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करती हैं। यह परंपरा सास-बहू के रिश्ते में प्रेम, सम्मान और अपनापन बढ़ाने का प्रतीक भी मानी जाती है। बायने की थाली में क्या-क्या रखें? वट सावित्री के बायने की थाली में शुभ और पारंपरिक वस्तुएं रखने का विशेष महत्व माना जाता है। मुख्य प्रसाद भीगे हुए काले चने पूड़ी हलवा गुलगुले सुहाग सामग्री सिंदूर बिंदी लाल चूड़ियां मेहंदी काजल आलता शीशा और कंघी वस्त्र और फल सास के लिए नई साड़ी लाल, पीला या गुलाबी रंग शुभ माना जाता है आम, केला, तरबूज, खरबूजा पानी वाला नारियल दक्षिणा श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार नकद राशि बायना देते समय किन बातों का रखें ध्यान? धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, बायना देते समय कुछ सावधानियां रखना बेहद जरूरी माना जाता है। इस्तेमाल किया हुआ सुहाग सामान न दें काले, सफेद और गहरे नीले रंग के कपड़े न दें थाली में कैंची, सुई या सेफ्टी पिन जैसी धारदार चीजें न रखें कैसे दी जाती है बायने की थाली? वट वृक्ष की 7 या 108 परिक्रमा और कथा सुनने के बाद महिलाएं घर लौटती हैं। इसके बाद वे बांस के पंखे से अपने पति को हवा करती हैं और उनका आशीर्वाद लेती हैं। फिर बायने की थाली को पल्लू से ढककर सास को सम्मानपूर्वक भेंट किया जाता है। यदि सास मौजूद न हों, तो यह बायना घर की किसी बड़ी महिला, जेठानी या मंदिर के पुजारी की पत्नी को भी दिया जा सकता है।  

surbhi मई 16, 2026 0
Married women performing Vat Savitri Vrat puja around banyan tree
वट सावित्री व्रत 2026 कब है? जानें सही तिथि, पूजा का शुभ मुहूर्त और महत्व

Vat Savitri Vrat हिंदू धर्म का बेहद महत्वपूर्ण व्रत माना जाता है। यह व्रत विशेष रूप से विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी आयु, सुख-समृद्धि और अखंड सौभाग्य की कामना के लिए रखती हैं। धार्मिक मान्यता है कि इसी दिन माता सावित्री ने अपने तप, प्रेम और दृढ़ संकल्प से यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राण वापस प्राप्त किए थे। तभी से यह व्रत वैवाहिक सुख और समर्पण का प्रतीक माना जाता है। वट सावित्री व्रत 2026 कब है? पंचांग के अनुसार Vat Savitri Vrat ज्येष्ठ माह की अमावस्या तिथि को रखा जाता है। इस वर्ष व्रत की तिथि: व्रत: 16 मई 2026, शनिवार अमावस्या तिथि प्रारंभ: सुबह 05:12 बजे अमावस्या तिथि समाप्त: देर रात 01:31 बजे पूजा का शुभ मुहूर्त ज्योतिषाचार्य पंडित राकेश झा के अनुसार, वट वृक्ष की पूजा सुबह के समय करना विशेष फलदायी माना गया है। शुभ योग: सुबह 10:26 बजे तक सौभाग्य योग रहेगा इस दौरान पूजा और व्रत संबंधी धार्मिक कार्य करना अत्यंत शुभ माना जा रहा है। वट सावित्री व्रत का धार्मिक महत्व धार्मिक मान्यताओं के अनुसार: वट वृक्ष में Brahma, Vishnu और Shiva का वास माना जाता है। इसे “अक्षय वट” भी कहा जाता है। वट वृक्ष की पूजा करने से वैवाहिक जीवन में सुख-शांति बनी रहती है। इस दिन महिलाएं: व्रत रखती हैं वट वृक्ष की पूजा करती हैं सावित्री-सत्यवान की कथा सुनती हैं पति की लंबी आयु की कामना करती हैं वट सावित्री व्रत पूजा विधि Vat Savitri Vrat के दिन: सुबह जल्दी उठकर स्नान करें स्वच्छ वस्त्र धारण करें वट वृक्ष के पास जाकर जल अर्पित करें रोली, अक्षत, फूल और मिठाई चढ़ाएं पेड़ के चारों ओर कच्चा सूत लपेटें सावित्री-सत्यवान कथा का पाठ करें पति की लंबी आयु की प्रार्थना करें दान का भी है विशेष महत्व धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन: भोजन वस्त्र फल जरूरत की वस्तुएं दान करने से पुण्य फल की प्राप्ति होती है और परिवार में सुख-समृद्धि आती है।  

surbhi मई 15, 2026 0
Devotees offering oil lamp and prayers to Shani Dev on शनिश्चरी अमावस्या 2026
शनिश्चरी अमावस्या 2026: 16 मई को बनेगा शुभ संयोग, पितृ दोष से राहत और शनि कृपा पाने का खास अवसर

हिंदू पंचांग के अनुसार वर्ष 2026 की पहली शनिश्चरी अमावस्या 16 मई, शनिवार को पड़ रही है। जब अमावस्या तिथि शनिवार के दिन आती है, तो उसे शनिश्चरी अमावस्या कहा जाता है। इस दिन को धार्मिक और ज्योतिषीय दृष्टि से बेहद शुभ और फलदायी माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन किए गए शनि देव की पूजा, तर्पण और दान-पुण्य से न केवल पितृ दोष शांत होता है, बल्कि जीवन की बाधाएं भी कम होती हैं। शुभ योगों का विशेष संयोग ज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार 16 मई 2026 को कई शुभ योग बन रहे हैं: सुबह से 10:26 बजे तक सौभाग्य योग इसके बाद शोभन योग का प्रारंभ इन योगों को सुख, समृद्धि और सफलता का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इन समयों में किए गए कार्य कई गुना अधिक फल देते हैं। पूजा और स्नान के शुभ मुहूर्त इस दिन कई महत्वपूर्ण मुहूर्त बताए गए हैं: ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 4:07 से 4:48 बजे तक शनि पूजा का शुभ समय: सुबह 7:19 से 8:59 बजे तक अभिजीत मुहूर्त: दोपहर 11:50 से 12:45 बजे तक इस दौरान स्नान, ध्यान और मंत्र जाप को अत्यंत शुभ माना गया है। शनि देव को प्रसन्न करने के उपाय ज्योतिषाचार्यों के अनुसार शनिश्चरी अमावस्या पर किए गए उपाय विशेष फलदायी माने जाते हैं: पीपल के पेड़ के नीचे सरसों के तेल का दीपक जलाना काले तिल और नीले फूल अर्पित करना जरूरतमंदों को काले वस्त्र, उड़द दाल और लोहे की वस्तुएं दान करना इन उपायों से शनि दोष में कमी आती है और आर्थिक बाधाएं दूर होने की मान्यता है। पितृ दोष निवारण के लिए तर्पण का महत्व इस दिन पितरों के लिए श्राद्ध और तर्पण करना अत्यंत शुभ माना गया है। माना जाता है कि इससे पितृ दोष शांत होता है और परिवार में सुख-समृद्धि आती है। ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार इस दिन: चावल की खीर बनाकर पितरों के नाम से अग्नि में अर्पित करना तर्पण और श्राद्ध करना इन उपायों से पितरों की कृपा प्राप्त होती है और वंश वृद्धि का आशीर्वाद मिलता है। धार्मिक महत्व और मान्यता शनिश्चरी अमावस्या को शनि देव की कृपा प्राप्त करने का विशेष दिन माना जाता है। इस दिन किए गए धार्मिक कार्य व्यक्ति के जीवन में चल रही परेशानियों को कम करने और सकारात्मक ऊर्जा बढ़ाने में सहायक माने जाते हैं।  

surbhi मई 15, 2026 0
Devotees offering milk and donations during Masik Shivratri 2026 worship of Lord Shiva
मासिक शिवरात्रि 2026: इस दिन करें इन चीजों का दान, भगवान शिव बरसाएंगे कृपा

Masik Shivratri हिंदू धर्म में बेहद पवित्र और फलदायी पर्व माना जाता है। हर महीने कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाई जाने वाली यह शिवरात्रि भगवान Shiva की आराधना के लिए विशेष मानी जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन व्रत, पूजा और दान करने से जीवन के कष्ट दूर होते हैं और सुख-समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त होता है। माना जाता है कि मासिक शिवरात्रि भगवान शिव और शक्ति के दिव्य मिलन का प्रतीक है। यही कारण है कि इस दिन श्रद्धा और सच्चे मन से की गई पूजा और दान का विशेष महत्व बताया गया है। मई 2026 में कब है मासिक शिवरात्रि? पंचांग के अनुसार, ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि 15 मई 2026 को सुबह 8 बजकर 31 मिनट से शुरू होगी और 16 मई को सुबह 5 बजकर 11 मिनट तक रहेगी। निशिता काल को ध्यान में रखते हुए मासिक शिवरात्रि का व्रत और पूजा 15 मई, शुक्रवार को किया जाएगा। इस दिन शिव भक्त उपवास रखकर भगवान शिव का अभिषेक और रात्रि पूजा करते हैं। दूध और सफेद वस्तुओं का दान मासिक शिवरात्रि पर दूध, दही, चावल, मिश्री और सफेद वस्त्रों का दान बेहद शुभ माना जाता है। सफेद रंग को शांति, पवित्रता और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इन वस्तुओं का दान करने से मानसिक तनाव कम होता है और भगवान शिव की विशेष कृपा प्राप्त होती है। अन्न और भोजन का दान इस दिन गरीब और जरूरतमंद लोगों को भोजन, फल और अन्न दान करना पुण्यदायी माना गया है। मान्यता है कि भूखे लोगों को भोजन कराने से घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। कहा जाता है कि भगवान शिव ऐसे दान से शीघ्र प्रसन्न होते हैं। तिल और घी का दान काले तिल और घी का दान भी मासिक शिवरात्रि पर विशेष महत्व रखता है। शिव मंदिर में घी का दीपक जलाना और तिल का दान करना जीवन की नकारात्मकता और बाधाओं को दूर करने वाला माना जाता है। धार्मिक विश्वास है कि इससे जीवन में शांति और स्थिरता आती है। वस्त्र और जरूरत की चीजों का दान जरूरतमंद लोगों को कपड़े, कंबल और दैनिक उपयोग की वस्तुएं दान करने से पुण्य फल प्राप्त होता है। मान्यता है कि ऐसा करने से जीवन में सकारात्मकता, सुख और संतोष बढ़ता है। धार्मिक दृष्टि से दान को केवल पुण्य का माध्यम नहीं बल्कि मानव सेवा का भी प्रतीक माना गया है। धार्मिक मान्यता मान्यता है कि मासिक शिवरात्रि पर श्रद्धा और सच्चे मन से किया गया दान भगवान शिव को प्रसन्न करता है। इससे व्यक्ति के जीवन में सुख, शांति, समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा का आगमन होता है। इस दिन शिव पूजा के साथ दान-पुण्य करने को विशेष फलदायी माना गया है।  

surbhi मई 14, 2026 0
Dark chocolate pieces kept beside a bedside lamp symbolizing better sleep and stress relief at night
रात में डार्क चॉकलेट खाना फायदेमंद? बेहतर नींद और तनाव कम करने में मिल सकती है मदद

सोने से पहले एक छोटा टुकड़ा बन सकता है हेल्दी आदत अगर आपको रात में मीठा खाने की आदत है, तो डार्क चॉकलेट आपके लिए एक बेहतर विकल्प हो सकती है। हाल ही में सामने आई रिपोर्ट्स के अनुसार, सोने से पहले थोड़ी मात्रा में डार्क चॉकलेट खाने से शरीर को रिलैक्स महसूस हो सकता है और नींद की गुणवत्ता बेहतर हो सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि इसमें मौजूद कुछ पोषक तत्व शरीर में मेलाटोनिन और सेरोटोनिन जैसे हार्मोन को सपोर्ट करते हैं, जो बेहतर नींद और मानसिक शांति से जुड़े होते हैं। मेलाटोनिन और रिलैक्सेशन में कैसे करती है मदद? डार्क चॉकलेट में ट्रिप्टोफैन नामक तत्व पाया जाता है, जो शरीर में सेरोटोनिन और मेलाटोनिन के निर्माण में मदद करता है। मेलाटोनिन वह हार्मोन है जो शरीर की स्लीप साइकिल को नियंत्रित करता है। वहीं सेरोटोनिन मूड को बेहतर बनाने और तनाव कम करने में सहायक माना जाता है। इसके अलावा डार्क चॉकलेट में मैग्नीशियम भी भरपूर मात्रा में होता है। यह मिनरल मांसपेशियों को रिलैक्स करने और तनाव कम करने में मदद करता है, जिससे शरीर को आराम महसूस होता है। ब्लड सर्कुलेशन और मूड पर भी असर विशेषज्ञों के मुताबिक, डार्क चॉकलेट में मौजूद फ्लेवोनॉयड्स ब्लड फ्लो को बेहतर बनाने में मदद करते हैं। इससे दिमाग तक ऑक्सीजन की सप्लाई बेहतर होती है और मानसिक शांति महसूस हो सकती है। यही कारण है कि कई लोग रात में थोड़ी मात्रा में डार्क चॉकलेट खाने के बाद अधिक रिलैक्स महसूस करते हैं। क्या रात में चॉकलेट खाने से नींद खराब भी हो सकती है? हालांकि हर व्यक्ति पर इसका असर अलग हो सकता है। डार्क चॉकलेट में थोड़ी मात्रा में कैफीन भी मौजूद होती है। ऐसे में जो लोग कैफीन के प्रति ज्यादा संवेदनशील होते हैं, उन्हें रात में इसे खाने से नींद आने में परेशानी हो सकती है या बेचैनी महसूस हो सकती है। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि अगर आपको कॉफी या कैफीन वाली चीजों से जल्दी असर होता है, तो रात में बहुत ज्यादा डार्क चॉकलेट खाने से बचना चाहिए। वजन बढ़ने का डर कितना सही? पोषण विशेषज्ञों के अनुसार, सीमित मात्रा में डार्क चॉकलेट खाना वजन बढ़ाने का बड़ा कारण नहीं बनता। करीब 10 ग्राम डार्क चॉकलेट में लगभग 60 कैलोरी होती है। अगर इसे संतुलित मात्रा में लिया जाए, तो यह लो-कैलोरी डाइट में भी शामिल की जा सकती है। डार्क या मिल्क चॉकलेट, कौन बेहतर? डॉक्टर और न्यूट्रिशनिस्ट आमतौर पर 65-70 प्रतिशत या उससे ज्यादा कोको वाली डार्क चॉकलेट को बेहतर मानते हैं, क्योंकि इसमें चीनी कम और एंटीऑक्सीडेंट ज्यादा होते हैं। हालांकि इसमें कैफीन की मात्रा मिल्क चॉकलेट से थोड़ी अधिक होती है। अगर आपको कैफीन से दिक्कत नहीं होती, तो डार्क चॉकलेट बेहतर विकल्प मानी जाती है। वहीं कैफीन से संवेदनशील लोग कम मात्रा में मिल्क चॉकलेट चुन सकते हैं।  

surbhi मई 13, 2026 0
Devotees worshipping Lord Vishnu with yellow flowers and lamps on Apara Ekadashi 2026
अपरा एकादशी 2026 आज: भगवान विष्णु की पूजा से मिलेगा अपार पुण्य, जानें शुभ मुहूर्त, मंत्र और जरूरी नियम

आज मनाई जा रही है अपरा एकादशी आज 13 मई 2026 को अपरा एकादशी का पावन व्रत रखा जा रहा है। हिंदू धर्म में यह एकादशी भगवान Vishnu को समर्पित मानी जाती है। इसे अचला एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन श्रद्धा और विधि-विधान से भगवान विष्णु की पूजा करने से व्यक्ति को अपार पुण्य, सुख-समृद्धि और मानसिक शांति प्राप्त होती है। कहा जाता है कि अपरा एकादशी का व्रत करने से अनजाने में हुए पापों से मुक्ति मिलती है और मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग खुलता है। पहली बार व्रत रखने वालों के लिए पूजा विधि, नियम और सावधानियों की जानकारी बेहद जरूरी मानी जाती है। अपरा एकादशी 2026: शुभ मुहूर्त और पारण समय एकादशी तिथि प्रारंभ: 12 मई 2026, दोपहर 2:52 बजे एकादशी तिथि समाप्त: 13 मई 2026, दोपहर 1:29 बजे व्रत पारण समय: 14 मई 2026, सुबह 5:31 बजे से 8:14 बजे तक उदयातिथि के अनुसार आज यानी 13 मई को व्रत रखा जा रहा है। इस बार अपरा एकादशी पर सर्वार्थसिद्धि योग का भी शुभ संयोग बन रहा है, जिससे इस दिन का धार्मिक महत्व और बढ़ गया है। भगवान विष्णु को प्रिय हैं ये रंग और भोग धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान विष्णु को पीला रंग अत्यंत प्रिय माना जाता है। इसलिए अपरा एकादशी के दिन पीले वस्त्र पहनना और पीली वस्तुएं अर्पित करना शुभ माना जाता है। प्रिय फूल पीले गेंदे के फूल कमल पीले गुलाब प्रिय भोग पीले फल केसरिया भात पीले रंग की मिठाइयां भोग में तुलसी दल अवश्य शामिल करना चाहिए, क्योंकि बिना तुलसी के भगवान विष्णु का भोग अधूरा माना जाता है। अपरा एकादशी पूजा विधि सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और व्रत का संकल्प लें। इसके बाद भगवान विष्णु की प्रतिमा या तस्वीर को पीले वस्त्र पर स्थापित करें। फिर पंचामृत से भगवान का अभिषेक करें। पूजा में पीले फूल, पीला चंदन और पीले वस्त्र अर्पित करें। दीपक और धूप जलाकर फल और मिठाई का भोग लगाएं। पूजा के दौरान विष्णु मंत्रों का जाप करें और बाद में विष्णु चालीसा व व्रत कथा का पाठ करें। अंत में आरती करके पूजा संपन्न करें। भगवान विष्णु के प्रमुख मंत्र ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥ कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने। प्रणत क्लेशनाशाय गोविन्दाय नमो नमः॥ नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि। तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्॥ अपरा एकादशी पर इन बातों का रखें विशेष ध्यान चावल खाना माना जाता है वर्जित एकादशी के दिन चावल का सेवन नहीं करना चाहिए। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन चावल खाना अशुभ माना गया है। सात्विक भोजन करें घर में प्याज, लहसुन, मांस और मदिरा का प्रयोग नहीं करना चाहिए। व्रत में सेंधा नमक का ही उपयोग करें। तुलसी दल न तोड़ें एकादशी के दिन तुलसी के पत्ते तोड़ना वर्जित माना जाता है। पूजा के लिए तुलसी दल दशमी तिथि को ही तोड़कर रख लेना चाहिए। क्रोध और विवाद से बचें इस दिन शांत मन से भगवान विष्णु का ध्यान करें। किसी की निंदा या अपशब्द बोलने से बचना चाहिए। दिन में न सोएं धार्मिक मान्यता है कि एकादशी पर दिन में सोने से व्रत का पूर्ण फल नहीं मिलता। इस समय को भजन-कीर्तन और धार्मिक पाठ में लगाना शुभ माना गया है।  

surbhi मई 13, 2026 0
Shani Dev puja with oil lamp, black sesame and traditional worship materials on Saturday
Shani Dev की महादशा से हैं परेशान? जानिए मंत्र सहित संपूर्ण पूजा विधि और उपाय

ज्योतिष शास्त्र में Shani Dev को न्याय का देवता माना जाता है। मान्यता है कि शनिदेव व्यक्ति को उसके कर्मों के अनुसार फल देते हैं। अगर कुंडली में शनि की स्थिति कमजोर हो या शनि की महादशा और साढ़ेसाती चल रही हो, तो जीवन में संघर्ष, आर्थिक परेशानी, मानसिक तनाव और कार्यों में बाधाएं बढ़ सकती हैं। ज्योतिष के अनुसार शनि की महादशा 19 वर्षों तक रहती है और इस दौरान व्यक्ति को शुभ-अशुभ दोनों प्रकार के परिणाम मिल सकते हैं। ऐसे में विधि-विधान से शनिदेव की पूजा करने से कष्टों में राहत मिलने और सकारात्मक परिणाम प्राप्त होने की मान्यता है। शनिदेव पूजा के लिए जरूरी सामग्री पूजा शुरू करने से पहले सभी पूजन सामग्री एकत्रित कर लें– आम की लकड़ी या लोहे का काला सिंहासन काला वस्त्र काला अंगोछा काले पुष्प काला तिल उड़द दाल सरसों का तेल दीपक और रुई काले तिल के लड्डू अरबी पंचपात्र काला कंबल शहद शक्कर दही गाय का दूध लौंग और इलायची सूखे मेवे हवन सामग्री शनिदेव पूजा की विधि शनिवार के दिन स्नान करके स्वच्छ काले या गहरे रंग के वस्त्र धारण करें। पूजा स्थान को साफ करके शनिदेव की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें। इसके बाद दाहिने हाथ में जल लेकर पूरे शरीर पर छिड़कें और शुद्धिकरण करें। फिर सरसों के तेल का दीपक जलाकर शनिदेव के सामने रखें। अब शनिदेव का ध्यान करते हुए काले पुष्प, चंदन और बेलपत्र अर्पित करें। इसके बाद कुशा की पवित्री धारण करें और माथे पर चंदन का तिलक लगाएं। तिलक मंत्र तिलक लगाते समय इस मंत्र का जाप करें– “ॐ चन्दनस्य महत्पुण्यं पवित्रं पापनाशनम्। आपदां हरते नित्यं शनि देवः सदा मम॥” शनिदेव आह्वान मंत्र पूजा के दौरान शनिदेव का आह्वान इस मंत्र से करें– “ॐ भूर्भुवः स्वः शनैश्चराय नमः, इहागच्छ इह तिष्ठ।” विनियोग मंत्र संकल्प लेने के बाद इस मंत्र का जाप करें– “ॐ शन्नो देवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये।” ऋष्यादिन्यास विधि विनियोग के बाद शरीर के विभिन्न अंगों का स्पर्श करते हुए यह प्रक्रिया करें– “ॐ दध्यंडाथर्वण ऋषये नमः” – सिर स्पर्श करें “ॐ गायत्री छन्दसे नमः” – मुख स्पर्श करें “ॐ शनैश्चर देवतायै नमः” – हृदय स्पर्श करें “ॐ आपोबीजाय नमः” – नाभि या गुह्य भाग स्पर्श करें “ॐ वर्तमान शक्तये नमः” – दोनों पैरों का स्पर्श करें शनि दोष से राहत के लिए क्या करें? ज्योतिषाचार्यों के अनुसार शनि की कृपा पाने के लिए कुछ विशेष उपाय भी लाभकारी माने जाते हैं– शनिवार को पीपल के पेड़ के नीचे सरसों के तेल का दीपक जलाएं काले तिल, उड़द और काले वस्त्र का दान करें जरूरतमंद और बुजुर्ग लोगों की सेवा करें कौओं और काले कुत्तों को भोजन खिलाएं शनिदेव के मंत्र “ॐ शं शनैश्चराय नमः” का जाप करें मान्यता है कि सच्चे मन से की गई शनिदेव की आराधना जीवन की बाधाओं को कम कर सकती है और व्यक्ति को मानसिक शांति व स्थिरता प्रदान करती है।  

surbhi मई 9, 2026 0
Devotees praying to Lord Vishnu during Malmas month with rituals and puja setup
Malmas 2026: 17 मई से शुरू होगा मलमास, एक महीने तक शुभ कार्यों पर विराम, जानें धार्मिक महत्व और नियम

हिंदू धर्म में समय-समय पर आने वाले विशेष महीनों का धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि से खास महत्व होता है। इन्हीं में से एक है मलमास, जिसे अधिक मास या पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है। साल 2026 में मलमास की शुरुआत 17 मई से होने जा रही है, जो 15 जून 2026 तक रहेगा। इस पूरे महीने को भगवान विष्णु की भक्ति और साधना के लिए बेहद शुभ माना जाता है, लेकिन मांगलिक कार्यों के लिए इसे वर्जित माना जाता है। क्या होता है मलमास? हिंदू पंचांग के अनुसार, जब सूर्य एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश नहीं करता, तब उस अवधि को अधिक मास या मलमास कहा जाता है। यह समय खगोलीय संतुलन बनाए रखने के लिए जोड़ा जाता है, लेकिन धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह सांसारिक और भौतिक कार्यों के लिए अनुकूल नहीं माना जाता। क्यों रुक जाते हैं शुभ कार्य? मलमास के दौरान विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन, नामकरण और नए व्यवसाय की शुरुआत जैसे कार्यों को टालने की परंपरा है। मान्यता है कि इस समय किए गए शुभ कार्यों का फल अपेक्षित नहीं मिलता और जीवन में बाधाएं आ सकती हैं। इसलिए लोग इस पूरे महीने को धार्मिक साधना और आत्मचिंतन के लिए समर्पित करते हैं। मलमास में क्या करें? यह महीना भगवान विष्णु की उपासना के लिए सबसे उत्तम माना गया है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार इस दौरान: रोजाना विष्णु पूजा और व्रत करना शुभ होता है “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जाप विशेष फलदायी माना जाता है दान-पुण्य, कथा श्रवण और भजन-कीर्तन करने से पुण्य की प्राप्ति होती है जरूरतमंदों की मदद करने से जीवन में सुख-समृद्धि आती है विशेष योग बना रहे हैं मलमास को खास इस बार का अधिक मास और भी खास माना जा रहा है, क्योंकि इसमें दो गुरु पुष्य योग का संयोग बन रहा है। आमतौर पर एक महीने में एक ही पुष्य नक्षत्र आता है, लेकिन इस बार दो बार यह शुभ योग बनना आध्यात्मिक दृष्टि से बेहद लाभकारी माना जा रहा है। दुर्लभ संयोग, अगली बार 2037 में ज्योतिषाचार्यों के अनुसार, ज्येष्ठ मास में अधिक मास का यह संयोग काफी दुर्लभ है। ऐसा योग अब 2037 में देखने को मिलेगा। इसलिए इस बार मलमास को विशेष महत्व दिया जा रहा है।

surbhi मई 4, 2026 0
Goddess Chhinnamasta idol depicting her fierce headless form with divine energy and symbolic blood streams
छिन्नमस्ता जयंती 2026: बिना सिर वाली देवी की पूजा से मिलता है अद्भुत साहस, जानिए रहस्यमयी शक्ति का महत्व

30 अप्रैल को मनाई जाएगी छिन्नमस्ता जयंती सनातन धर्म में मां शक्ति के अनेक स्वरूपों की पूजा की जाती है। इनमें मां छिन्नमस्ता का स्वरूप सबसे रहस्यमयी, उग्र और अद्वितीय माना जाता है। दस महाविद्याओं में शामिल मां छिन्नमस्ता त्याग, आत्मबल और दिव्य शक्ति की प्रतीक हैं। उनकी साधना विशेष रूप से तांत्रिक परंपरा में अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। वर्ष 2026 में छिन्नमस्ता जयंती 30 अप्रैल, गुरुवार को मनाई जाएगी। यह पर्व वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को आता है। छिन्नमस्ता जयंती 2026 का शुभ मुहूर्त पंचांग के अनुसार, चतुर्दशी तिथि 29 अप्रैल 2026 को शाम 7:51 बजे प्रारंभ होगी और 30 अप्रैल 2026 को रात 9:12 बजे समाप्त होगी। उदया तिथि के आधार पर छिन्नमस्ता जयंती 30 अप्रैल को मनाना शुभ रहेगा। मां छिन्नमस्ता का अनोखा और रहस्यमयी स्वरूप मां छिन्नमस्ता का स्वरूप अत्यंत विलक्षण है। वे अपने ही कटे हुए सिर को एक हाथ में धारण करती हैं, जबकि दूसरे हाथ में तलवार रहती है। उनकी गर्दन से बहने वाली रक्त की तीन धाराएं जीवन ऊर्जा, त्याग और ब्रह्मांडीय शक्ति का प्रतीक मानी जाती हैं। इनमें से एक धारा स्वयं देवी ग्रहण करती हैं, जबकि शेष दो उनकी सहचरियां पीती हैं। यह स्वरूप आत्मसंयम, बलिदान और शक्ति के अनंत प्रवाह का संदेश देता है। क्यों खास है मां छिन्नमस्ता की साधना? दस महाविद्याओं में मां छिन्नमस्ता को छठा स्थान प्राप्त है। उनका उग्र रूप साधकों को भय, मोह और नकारात्मकता से मुक्ति दिलाने वाला माना जाता है। यही कारण है कि तांत्रिक, योगी, अघोरी और नाथ संप्रदाय के साधक उनकी विशेष उपासना करते हैं। यह साधना सामान्य पूजा से अलग होती है और इसमें विशेष नियमों एवं विधियों का पालन किया जाता है। मां छिन्नमस्ता की पूजा से मिलते हैं ये लाभ मन से भय और असुरक्षा की भावना दूर होती है। आत्मविश्वास और साहस में वृद्धि होती है। जीवन की कठिन परिस्थितियों का सामना करने की शक्ति मिलती है। शारीरिक कष्टों और रोगों से राहत प्राप्त होती है। साधक की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। मान्यता है कि सच्चे मन से मां की आराधना करने पर जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आते हैं। रजरप्पा मंदिर: मां छिन्नमस्ता का प्रमुख धाम झारखंड के रामगढ़ जिले में स्थित रजरप्पा मंदिर मां छिन्नमस्ता का सबसे प्रसिद्ध शक्तिपीठ है। यह पवित्र मंदिर रांची से लगभग 80 किलोमीटर दूर दामोदर और भैरवी नदियों के संगम पर स्थित है। तांत्रिक साधना के लिए यह स्थल विशेष महत्व रखता है। नवरात्रि और छिन्नमस्ता जयंती के अवसर पर यहां हजारों श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। श्रद्धा और शक्ति का अद्भुत संगम मां छिन्नमस्ता केवल उग्रता की प्रतीक नहीं हैं, बल्कि वे आत्मबल, त्याग और जीवन ऊर्जा का साक्षात स्वरूप हैं। उनकी उपासना साधक को भयमुक्त बनाकर जीवन में सफलता और साहस प्रदान करती है। छिन्नमस्ता जयंती का पर्व शक्ति साधना के लिए अत्यंत फलदायी माना जाता है।  

surbhi अप्रैल 29, 2026 0
Lord Shiva during Bhaum Pradosh
आज है भौम प्रदोष व्रत 2026: शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और महत्व

भगवान Shiva को समर्पित भौम प्रदोष व्रत आज, 28 अप्रैल 2026, मंगलवार को रखा जा रहा है। यह व्रत विशेष रूप से मंगल दोष शांति, बाधाओं की समाप्ति और मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए अत्यंत फलदायी माना जाता है। भौम प्रदोष व्रत का शुभ मुहूर्त काशी पंचांग के अनुसार, प्रदोष काल शाम 6:54 बजे से रात 9:04 बजे तक रहेगा। इस अवधि में की गई पूजा का विशेष महत्व होता है। भौम प्रदोष क्यों है खास? जब प्रदोष व्रत मंगलवार को पड़ता है, तो उसे भौम प्रदोष कहा जाता है। यह दिन विशेष रूप से: मंगल दोष शांति कर्ज मुक्ति विवादों से राहत आत्मविश्वास में वृद्धि नकारात्मक ऊर्जा के नाश के लिए शुभ माना जाता है। पूजा विधि प्रातः स्नान कर व्रत का संकल्प लें। पूजा स्थल को स्वच्छ कर शिवलिंग स्थापित करें। जल, दूध और पंचामृत से अभिषेक करें। चंदन, बेलपत्र, फूल और धतूरा अर्पित करें। घी-शक्कर या मिठाई का भोग लगाएं। "ॐ नमः शिवाय" मंत्र का जाप करें। Shiv Chalisa का पाठ करें। प्रदोष व्रत कथा सुनें। घी का दीपक जलाकर आरती करें। शाम को प्रदोष काल में पुनः विधिपूर्वक पूजा करना अत्यंत शुभ माना जाता है। भौम प्रदोष व्रत के लाभ मान्यता है कि इस व्रत से भगवान शिव शीघ्र प्रसन्न होते हैं और भक्तों को सुख, समृद्धि, मानसिक शांति तथा जीवन की कठिनाइयों से मुक्ति प्रदान करते हैं।  

surbhi अप्रैल 28, 2026 0
Devotees पूजा Lord Narasimha with lamps and flowers during Narasimha Jayanti ritual
नरसिंह चतुर्दशी 2026: कब है व्रत, जानें शुभ मुहूर्त और पूरी पूजा विधि

  कब है नरसिंह चतुर्दशी? नरसिंह चतुर्दशी, जिसे नरसिंह जयंती भी कहा जाता है, इस साल 30 अप्रैल 2026 (गुरुवार) को मनाई जाएगी। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इसी दिन भगवान विष्णु ने अपने चौथे अवतार भगवान नरसिंह के रूप में प्रकट होकर भक्त प्रह्लाद की रक्षा की थी। हिंदू पंचांग के मुताबिक: चतुर्दशी तिथि शुरू: 29 अप्रैल 2026, शाम 07:51 बजे चतुर्दशी तिथि समाप्त: 30 अप्रैल 2026, रात 09:12 बजे व्रत और पूजा: 30 अप्रैल (उदया तिथि के आधार पर) पूजा का शुभ मुहूर्त नरसिंह भगवान का प्राकट्य संध्या काल में हुआ था, इसलिए इस दिन शाम के समय पूजा करना सबसे शुभ माना जाता है। शुभ मुहूर्त: शाम 04:17 बजे से 06:56 बजे तक यह समय भगवान की आराधना और व्रत पूजन के लिए सर्वोत्तम माना गया है। कैसे करें पूजा? जानें आसान विधि नरसिंह चतुर्दशी के दिन विधि-विधान से पूजा करने से विशेष फल मिलता है। पूजा की प्रक्रिया इस प्रकार है: सुबह स्नान कर साफ और संभव हो तो पीले वस्त्र पहनें हाथ में जल और अक्षत लेकर व्रत का संकल्प लें भगवान नरसिंह और माता लक्ष्मी की प्रतिमा स्थापित करें पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद) से अभिषेक करें चंदन, पीले फूल, धूप और दीप अर्पित करें भगवान को केसरयुक्त दूध, फल और मिठाई का भोग लगाएं नरसिंह मंत्रों का जाप करें और प्रह्लाद कथा का पाठ करें अंत में कपूर से आरती कर पूजा पूर्ण करें धार्मिक महत्व और मान्यता मान्यता है कि इस दिन सच्चे मन से व्रत और पूजा करने से भय, बाधाएं और कष्ट दूर होते हैं। भगवान नरसिंह अपने भक्तों की रक्षा करते हैं और जीवन में सुख-समृद्धि प्रदान करते हैं। यह पर्व बुराई पर अच्छाई की जीत और भक्ति की शक्ति का प्रतीक माना जाता है।  

surbhi अप्रैल 22, 2026 0
Devotees performing Ganesh Puja with idol, flowers, and lamps seeking blessings for prosperity and success.
Ganesh Puja: क्यों प्रथम पूजनीय हैं भगवान गणेश? जानिए पूजा के 7 प्रमुख आध्यात्मिक लाभ

सनातन धर्म में हर शुभ कार्य की शुरुआत भगवान गणेश की पूजा से करना परंपरा का अहम हिस्सा है। “श्री गणेश” से कार्य प्रारंभ करने का अर्थ ही है कि उस कार्य में सफलता, शुभता और बाधा-रहित मार्ग की कामना की जा रही है। गणपति को ऋद्धि-सिद्धि, बुद्धि, विवेक और शुभ-लाभ का देवता माना जाता है, इसलिए उन्हें “प्रथम पूजनीय” का दर्जा प्राप्त है। गणपति प्रथम पूजनीय क्यों हैं? धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, एक बार सभी देवी-देवताओं के बीच यह प्रतियोगिता हुई कि जो सबसे पहले पूरे ब्रह्मांड का चक्कर लगाएगा, वही प्रथम पूजनीय होगा। जहां अन्य देवता अपने-अपने वाहनों पर सवार होकर ब्रह्मांड की यात्रा पर निकल पड़े, वहीं भगवान गणेश ने अपनी बुद्धिमत्ता का परिचय देते हुए अपने माता-पिता–भगवान शिव और माता पार्वती–की परिक्रमा की। गणेश जी के अनुसार, माता-पिता ही उनका संपूर्ण ब्रह्मांड हैं। उनकी इस सूझबूझ से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें प्रथम पूजनीय होने का वरदान दिया। गणपति पूजा के 7 प्रमुख लाभ 1. नवग्रह दोषों से मुक्ति गणेश जी की विधिपूर्वक पूजा करने से कुंडली के नवग्रह दोष शांत होते हैं और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। 2. सफलता और समृद्धि की प्राप्ति लंबोदर रूप में पूजे जाने वाले गणपति की कृपा से जीवन के हर क्षेत्र में सफलता और आर्थिक उन्नति मिलती है। 3. विघ्नों का नाश विघ्नहर्ता गणेश की आराधना से कार्यों में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं और योजनाएं सफलतापूर्वक पूर्ण होती हैं। 4. नकारात्मकता और दोषों का अंत गणपति की पूजा व्यक्ति के भीतर के अहंकार को समाप्त कर उसे विनम्र बनाती है, साथ ही नकारात्मक शक्तियों को भी दूर करती है। 5. बुद्धि और विवेक का आशीर्वाद गणेश जी को ज्ञान और बुद्धि का देवता माना जाता है। उनकी कृपा से व्यक्ति सही निर्णय लेने में सक्षम होता है। 6. वास्तु दोष से मुक्ति घर में गणपति की मूर्ति या चित्र रखने से वास्तु दोष दूर होते हैं और सकारात्मक वातावरण बना रहता है। 7. सुख-समृद्धि और मनोकामना पूर्ति सच्चे मन से की गई गणपति पूजा जीवन के कष्टों को दूर कर इच्छाओं की पूर्ति करती है और घर में सुख-समृद्धि बनाए रखती है। भगवान गणेश की पूजा केवल धार्मिक आस्था ही नहीं, बल्कि जीवन को संतुलित, सकारात्मक और सफल बनाने का मार्ग भी मानी जाती है। उनकी आराधना व्यक्ति को मानसिक, आध्यात्मिक और व्यावहारिक रूप से सशक्त बनाती है।  

surbhi अप्रैल 15, 2026 0
Masik Krishna Janmashtami with decorated idol and offerings.
मासिक कृष्ण जन्माष्टमी 2026: वैशाख माह में कब रखा जाएगा व्रत? जानें सही तिथि और शुभ मुहूर्त

हिंदू धर्म में प्रत्येक माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मासिक कृष्ण जन्माष्टमी का व्रत अत्यंत श्रद्धा के साथ रखा जाता है। यह दिन भगवान श्री कृष्ण की उपासना के लिए विशेष माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से पूजा करने पर जीवन में सुख-समृद्धि, मानसिक शांति और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है। कब है वैशाख मासिक कृष्ण जन्माष्टमी 2026? हिंदू पंचांग के अनुसार, वैशाख माह में कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि: आरंभ: 9 अप्रैल 2026, रात 9:19 बजे समापन: 10 अप्रैल 2026, सुबह 11:15 बजे निशिता काल (मध्यरात्रि पूजा) को ध्यान में रखते हुए यह व्रत 9 अप्रैल 2026, गुरुवार को रखा जाएगा। क्या है शुभ मुहूर्त? पूजा और व्रत के लिए प्रमुख शुभ समय इस प्रकार हैं: ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 4:38 बजे से 5:26 बजे तक अमृत काल: सुबह 6:07 बजे से 7:54 बजे तक अभिजीत मुहूर्त: दोपहर 12:03 बजे से 12:53 बजे तक इन मुहूर्तों में भगवान श्रीकृष्ण की पूजा करना अत्यंत फलदायी माना जाता है। व्रत और पूजा का महत्व धार्मिक मान्यताओं के अनुसार: भगवान श्रीकृष्ण की पूजा करने से सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है जीवन में मानसिक शांति और सकारात्मक ऊर्जा आती है संतान प्राप्ति की कामना रखने वालों के लिए यह व्रत विशेष लाभकारी माना जाता है पूजन के दौरान क्या करें? इस दिन भक्त: श्रीकृष्ण का अभिषेक करें माखन-मिश्री का भोग लगाएं “ॐ कृष्णाय नमः” और “हरे कृष्ण महामंत्र” का जाप करें आरती “आरती कुंजबिहारी की” का पाठ करें

surbhi अप्रैल 7, 2026 0
Devotee offering mustard oil to Shani Dev idol in temple on Saturday Pooja ritual
शनि देव पूजा: क्यों चढ़ाया जाता है तेल, क्या है पूजा विधि और क्या है इसका आध्यात्मिक महत्व?

भारतीय सनातन परंपरा में शनि देव को न्याय, कर्म और अनुशासन का प्रतीक माना जाता है। आम धारणा के विपरीत, शनि देव भय के नहीं बल्कि न्याय के देवता हैं, जो मनुष्य को उसके कर्मों के अनुसार फल देते हैं। जीवन में आने वाले कठिन समय जैसे साढ़ेसाती या ढैय्या दरअसल व्यक्ति को आत्ममंथन, धैर्य और सही मार्ग पर चलने की सीख देते हैं। शनिवार का महत्व शनिवार का दिन विशेष रूप से शनि देव की आराधना के लिए समर्पित माना गया है। यह दिन हमें अपने कर्मों का मूल्यांकन करने और जीवन में अनुशासन व विनम्रता अपनाने का अवसर देता है। इस दिन व्रत, पूजा और दान करने से नकारात्मक प्रभाव कम होते हैं और मानसिक शांति प्राप्त होती है। शनि देव को तेल क्यों चढ़ाया जाता है? धार्मिक मान्यताओं और प्राचीन ग्रंथों के अनुसार, तिल का तेल नकारात्मक ऊर्जा को अवशोषित करने की क्षमता रखता है। जब भक्त शनि देव को तेल अर्पित करते हैं, तो यह प्रतीक होता है कि उनके जीवन की बाधाएं, कष्ट और नकारात्मक कर्म धीरे-धीरे समाप्त हो रहे हैं। तेल की चिकनाहट और शीतलता शनि की कठोर ऊर्जा को शांत करती है, जिससे जीवन में स्थिरता और राहत मिलती है। पूजा विधि शनिवार के दिन सुबह स्नान कर साफ वस्त्र धारण करें और शनि मंदिर जाएं। पीपल के पेड़ की जड़ में जल अर्पित करें सरसों के तेल का दीपक जलाएं शनि देव की मूर्ति पर तिल का तेल चढ़ाएं काले तिल, उड़द या लोहे की वस्तुएं दान करें शनि देव को प्रसन्न करने के उपाय जरूरतमंदों को दान करना विशेष फलदायी माना गया है काले वस्त्र, जूते-चप्पल, काली उड़द आदि का दान करें नियमित रूप से शनि मंत्रों का जाप करें शनि मंत्र “ॐ शं शनेश्वराय नमः” या “ॐ प्रां प्रीं प्रौं सः शनैश्चराय नमः” इन मंत्रों का श्रद्धा से जाप करने से शनि दोषों में कमी आती है और जीवन में सकारात्मकता बढ़ती है।  

surbhi अप्रैल 4, 2026 0
Popular post
शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

Top week

Sapna Jain Gogi Gang
राष्ट्रीय

दिल्ली में 50 लाख की रंगदारी की साजिश का खुलासा, कारोबारी की पत्नी निकली मास्टरमाइंड

abhishek singh जून 30, 2026 0