Vat Savitri Vrat हिंदू धर्म का एक बेहद महत्वपूर्ण व्रत माना जाता है, जिसे सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की कामना के लिए रखती हैं। इस दिन महिलाएं वट वृक्ष यानी बरगद के पेड़ की पूजा करती हैं और सावित्री-सत्यवान की कथा सुनती हैं। इस व्रत से जुड़ी कई परंपराएं हैं, लेकिन इनमें सबसे खास मानी जाती है बहू द्वारा अपनी सास को “बायना” देने की रस्म। पूजा के बाद बहुएं अपनी सास को श्रृंगार सामग्री, मिठाई, फल और वस्त्र भेंट कर उनका आशीर्वाद लेती हैं। क्यों दिया जाता है बायना? Savitri और Satyavan की कथा के अनुसार, माता सावित्री ने अपने पतिव्रता धर्म, बुद्धिमानी और समर्पण से यमराज को प्रसन्न किया था। उन्होंने अपने पति सत्यवान के प्राण मांगने से पहले अपने अंधे सास-ससुर की आंखों की रोशनी और उनका खोया हुआ राजपाट वापस मांगा था। इसी प्रसंग को आदर्श बहू के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। माना जाता है कि सास-ससुर का सम्मान और सेवा परिवार में सुख-शांति और समृद्धि लाती है। यही कारण है कि वट सावित्री के दिन बहुएं अपनी सास को बायना देकर सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करती हैं। यह परंपरा सास-बहू के रिश्ते में प्रेम, सम्मान और अपनापन बढ़ाने का प्रतीक भी मानी जाती है। बायने की थाली में क्या-क्या रखें? वट सावित्री के बायने की थाली में शुभ और पारंपरिक वस्तुएं रखने का विशेष महत्व माना जाता है। मुख्य प्रसाद भीगे हुए काले चने पूड़ी हलवा गुलगुले सुहाग सामग्री सिंदूर बिंदी लाल चूड़ियां मेहंदी काजल आलता शीशा और कंघी वस्त्र और फल सास के लिए नई साड़ी लाल, पीला या गुलाबी रंग शुभ माना जाता है आम, केला, तरबूज, खरबूजा पानी वाला नारियल दक्षिणा श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार नकद राशि बायना देते समय किन बातों का रखें ध्यान? धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, बायना देते समय कुछ सावधानियां रखना बेहद जरूरी माना जाता है। इस्तेमाल किया हुआ सुहाग सामान न दें काले, सफेद और गहरे नीले रंग के कपड़े न दें थाली में कैंची, सुई या सेफ्टी पिन जैसी धारदार चीजें न रखें कैसे दी जाती है बायने की थाली? वट वृक्ष की 7 या 108 परिक्रमा और कथा सुनने के बाद महिलाएं घर लौटती हैं। इसके बाद वे बांस के पंखे से अपने पति को हवा करती हैं और उनका आशीर्वाद लेती हैं। फिर बायने की थाली को पल्लू से ढककर सास को सम्मानपूर्वक भेंट किया जाता है। यदि सास मौजूद न हों, तो यह बायना घर की किसी बड़ी महिला, जेठानी या मंदिर के पुजारी की पत्नी को भी दिया जा सकता है।
Vat Savitri Vrat हिंदू धर्म का बेहद महत्वपूर्ण व्रत माना जाता है। यह व्रत विशेष रूप से विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी आयु, सुख-समृद्धि और अखंड सौभाग्य की कामना के लिए रखती हैं। धार्मिक मान्यता है कि इसी दिन माता सावित्री ने अपने तप, प्रेम और दृढ़ संकल्प से यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राण वापस प्राप्त किए थे। तभी से यह व्रत वैवाहिक सुख और समर्पण का प्रतीक माना जाता है। वट सावित्री व्रत 2026 कब है? पंचांग के अनुसार Vat Savitri Vrat ज्येष्ठ माह की अमावस्या तिथि को रखा जाता है। इस वर्ष व्रत की तिथि: व्रत: 16 मई 2026, शनिवार अमावस्या तिथि प्रारंभ: सुबह 05:12 बजे अमावस्या तिथि समाप्त: देर रात 01:31 बजे पूजा का शुभ मुहूर्त ज्योतिषाचार्य पंडित राकेश झा के अनुसार, वट वृक्ष की पूजा सुबह के समय करना विशेष फलदायी माना गया है। शुभ योग: सुबह 10:26 बजे तक सौभाग्य योग रहेगा इस दौरान पूजा और व्रत संबंधी धार्मिक कार्य करना अत्यंत शुभ माना जा रहा है। वट सावित्री व्रत का धार्मिक महत्व धार्मिक मान्यताओं के अनुसार: वट वृक्ष में Brahma, Vishnu और Shiva का वास माना जाता है। इसे “अक्षय वट” भी कहा जाता है। वट वृक्ष की पूजा करने से वैवाहिक जीवन में सुख-शांति बनी रहती है। इस दिन महिलाएं: व्रत रखती हैं वट वृक्ष की पूजा करती हैं सावित्री-सत्यवान की कथा सुनती हैं पति की लंबी आयु की कामना करती हैं वट सावित्री व्रत पूजा विधि Vat Savitri Vrat के दिन: सुबह जल्दी उठकर स्नान करें स्वच्छ वस्त्र धारण करें वट वृक्ष के पास जाकर जल अर्पित करें रोली, अक्षत, फूल और मिठाई चढ़ाएं पेड़ के चारों ओर कच्चा सूत लपेटें सावित्री-सत्यवान कथा का पाठ करें पति की लंबी आयु की प्रार्थना करें दान का भी है विशेष महत्व धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन: भोजन वस्त्र फल जरूरत की वस्तुएं दान करने से पुण्य फल की प्राप्ति होती है और परिवार में सुख-समृद्धि आती है।
हिंदू पंचांग के अनुसार वर्ष 2026 की पहली शनिश्चरी अमावस्या 16 मई, शनिवार को पड़ रही है। जब अमावस्या तिथि शनिवार के दिन आती है, तो उसे शनिश्चरी अमावस्या कहा जाता है। इस दिन को धार्मिक और ज्योतिषीय दृष्टि से बेहद शुभ और फलदायी माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन किए गए शनि देव की पूजा, तर्पण और दान-पुण्य से न केवल पितृ दोष शांत होता है, बल्कि जीवन की बाधाएं भी कम होती हैं। शुभ योगों का विशेष संयोग ज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार 16 मई 2026 को कई शुभ योग बन रहे हैं: सुबह से 10:26 बजे तक सौभाग्य योग इसके बाद शोभन योग का प्रारंभ इन योगों को सुख, समृद्धि और सफलता का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इन समयों में किए गए कार्य कई गुना अधिक फल देते हैं। पूजा और स्नान के शुभ मुहूर्त इस दिन कई महत्वपूर्ण मुहूर्त बताए गए हैं: ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 4:07 से 4:48 बजे तक शनि पूजा का शुभ समय: सुबह 7:19 से 8:59 बजे तक अभिजीत मुहूर्त: दोपहर 11:50 से 12:45 बजे तक इस दौरान स्नान, ध्यान और मंत्र जाप को अत्यंत शुभ माना गया है। शनि देव को प्रसन्न करने के उपाय ज्योतिषाचार्यों के अनुसार शनिश्चरी अमावस्या पर किए गए उपाय विशेष फलदायी माने जाते हैं: पीपल के पेड़ के नीचे सरसों के तेल का दीपक जलाना काले तिल और नीले फूल अर्पित करना जरूरतमंदों को काले वस्त्र, उड़द दाल और लोहे की वस्तुएं दान करना इन उपायों से शनि दोष में कमी आती है और आर्थिक बाधाएं दूर होने की मान्यता है। पितृ दोष निवारण के लिए तर्पण का महत्व इस दिन पितरों के लिए श्राद्ध और तर्पण करना अत्यंत शुभ माना गया है। माना जाता है कि इससे पितृ दोष शांत होता है और परिवार में सुख-समृद्धि आती है। ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार इस दिन: चावल की खीर बनाकर पितरों के नाम से अग्नि में अर्पित करना तर्पण और श्राद्ध करना इन उपायों से पितरों की कृपा प्राप्त होती है और वंश वृद्धि का आशीर्वाद मिलता है। धार्मिक महत्व और मान्यता शनिश्चरी अमावस्या को शनि देव की कृपा प्राप्त करने का विशेष दिन माना जाता है। इस दिन किए गए धार्मिक कार्य व्यक्ति के जीवन में चल रही परेशानियों को कम करने और सकारात्मक ऊर्जा बढ़ाने में सहायक माने जाते हैं।
Masik Shivratri हिंदू धर्म में बेहद पवित्र और फलदायी पर्व माना जाता है। हर महीने कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाई जाने वाली यह शिवरात्रि भगवान Shiva की आराधना के लिए विशेष मानी जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन व्रत, पूजा और दान करने से जीवन के कष्ट दूर होते हैं और सुख-समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त होता है। माना जाता है कि मासिक शिवरात्रि भगवान शिव और शक्ति के दिव्य मिलन का प्रतीक है। यही कारण है कि इस दिन श्रद्धा और सच्चे मन से की गई पूजा और दान का विशेष महत्व बताया गया है। मई 2026 में कब है मासिक शिवरात्रि? पंचांग के अनुसार, ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि 15 मई 2026 को सुबह 8 बजकर 31 मिनट से शुरू होगी और 16 मई को सुबह 5 बजकर 11 मिनट तक रहेगी। निशिता काल को ध्यान में रखते हुए मासिक शिवरात्रि का व्रत और पूजा 15 मई, शुक्रवार को किया जाएगा। इस दिन शिव भक्त उपवास रखकर भगवान शिव का अभिषेक और रात्रि पूजा करते हैं। दूध और सफेद वस्तुओं का दान मासिक शिवरात्रि पर दूध, दही, चावल, मिश्री और सफेद वस्त्रों का दान बेहद शुभ माना जाता है। सफेद रंग को शांति, पवित्रता और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इन वस्तुओं का दान करने से मानसिक तनाव कम होता है और भगवान शिव की विशेष कृपा प्राप्त होती है। अन्न और भोजन का दान इस दिन गरीब और जरूरतमंद लोगों को भोजन, फल और अन्न दान करना पुण्यदायी माना गया है। मान्यता है कि भूखे लोगों को भोजन कराने से घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। कहा जाता है कि भगवान शिव ऐसे दान से शीघ्र प्रसन्न होते हैं। तिल और घी का दान काले तिल और घी का दान भी मासिक शिवरात्रि पर विशेष महत्व रखता है। शिव मंदिर में घी का दीपक जलाना और तिल का दान करना जीवन की नकारात्मकता और बाधाओं को दूर करने वाला माना जाता है। धार्मिक विश्वास है कि इससे जीवन में शांति और स्थिरता आती है। वस्त्र और जरूरत की चीजों का दान जरूरतमंद लोगों को कपड़े, कंबल और दैनिक उपयोग की वस्तुएं दान करने से पुण्य फल प्राप्त होता है। मान्यता है कि ऐसा करने से जीवन में सकारात्मकता, सुख और संतोष बढ़ता है। धार्मिक दृष्टि से दान को केवल पुण्य का माध्यम नहीं बल्कि मानव सेवा का भी प्रतीक माना गया है। धार्मिक मान्यता मान्यता है कि मासिक शिवरात्रि पर श्रद्धा और सच्चे मन से किया गया दान भगवान शिव को प्रसन्न करता है। इससे व्यक्ति के जीवन में सुख, शांति, समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा का आगमन होता है। इस दिन शिव पूजा के साथ दान-पुण्य करने को विशेष फलदायी माना गया है।
सोने से पहले एक छोटा टुकड़ा बन सकता है हेल्दी आदत अगर आपको रात में मीठा खाने की आदत है, तो डार्क चॉकलेट आपके लिए एक बेहतर विकल्प हो सकती है। हाल ही में सामने आई रिपोर्ट्स के अनुसार, सोने से पहले थोड़ी मात्रा में डार्क चॉकलेट खाने से शरीर को रिलैक्स महसूस हो सकता है और नींद की गुणवत्ता बेहतर हो सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि इसमें मौजूद कुछ पोषक तत्व शरीर में मेलाटोनिन और सेरोटोनिन जैसे हार्मोन को सपोर्ट करते हैं, जो बेहतर नींद और मानसिक शांति से जुड़े होते हैं। मेलाटोनिन और रिलैक्सेशन में कैसे करती है मदद? डार्क चॉकलेट में ट्रिप्टोफैन नामक तत्व पाया जाता है, जो शरीर में सेरोटोनिन और मेलाटोनिन के निर्माण में मदद करता है। मेलाटोनिन वह हार्मोन है जो शरीर की स्लीप साइकिल को नियंत्रित करता है। वहीं सेरोटोनिन मूड को बेहतर बनाने और तनाव कम करने में सहायक माना जाता है। इसके अलावा डार्क चॉकलेट में मैग्नीशियम भी भरपूर मात्रा में होता है। यह मिनरल मांसपेशियों को रिलैक्स करने और तनाव कम करने में मदद करता है, जिससे शरीर को आराम महसूस होता है। ब्लड सर्कुलेशन और मूड पर भी असर विशेषज्ञों के मुताबिक, डार्क चॉकलेट में मौजूद फ्लेवोनॉयड्स ब्लड फ्लो को बेहतर बनाने में मदद करते हैं। इससे दिमाग तक ऑक्सीजन की सप्लाई बेहतर होती है और मानसिक शांति महसूस हो सकती है। यही कारण है कि कई लोग रात में थोड़ी मात्रा में डार्क चॉकलेट खाने के बाद अधिक रिलैक्स महसूस करते हैं। क्या रात में चॉकलेट खाने से नींद खराब भी हो सकती है? हालांकि हर व्यक्ति पर इसका असर अलग हो सकता है। डार्क चॉकलेट में थोड़ी मात्रा में कैफीन भी मौजूद होती है। ऐसे में जो लोग कैफीन के प्रति ज्यादा संवेदनशील होते हैं, उन्हें रात में इसे खाने से नींद आने में परेशानी हो सकती है या बेचैनी महसूस हो सकती है। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि अगर आपको कॉफी या कैफीन वाली चीजों से जल्दी असर होता है, तो रात में बहुत ज्यादा डार्क चॉकलेट खाने से बचना चाहिए। वजन बढ़ने का डर कितना सही? पोषण विशेषज्ञों के अनुसार, सीमित मात्रा में डार्क चॉकलेट खाना वजन बढ़ाने का बड़ा कारण नहीं बनता। करीब 10 ग्राम डार्क चॉकलेट में लगभग 60 कैलोरी होती है। अगर इसे संतुलित मात्रा में लिया जाए, तो यह लो-कैलोरी डाइट में भी शामिल की जा सकती है। डार्क या मिल्क चॉकलेट, कौन बेहतर? डॉक्टर और न्यूट्रिशनिस्ट आमतौर पर 65-70 प्रतिशत या उससे ज्यादा कोको वाली डार्क चॉकलेट को बेहतर मानते हैं, क्योंकि इसमें चीनी कम और एंटीऑक्सीडेंट ज्यादा होते हैं। हालांकि इसमें कैफीन की मात्रा मिल्क चॉकलेट से थोड़ी अधिक होती है। अगर आपको कैफीन से दिक्कत नहीं होती, तो डार्क चॉकलेट बेहतर विकल्प मानी जाती है। वहीं कैफीन से संवेदनशील लोग कम मात्रा में मिल्क चॉकलेट चुन सकते हैं।
आज मनाई जा रही है अपरा एकादशी आज 13 मई 2026 को अपरा एकादशी का पावन व्रत रखा जा रहा है। हिंदू धर्म में यह एकादशी भगवान Vishnu को समर्पित मानी जाती है। इसे अचला एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन श्रद्धा और विधि-विधान से भगवान विष्णु की पूजा करने से व्यक्ति को अपार पुण्य, सुख-समृद्धि और मानसिक शांति प्राप्त होती है। कहा जाता है कि अपरा एकादशी का व्रत करने से अनजाने में हुए पापों से मुक्ति मिलती है और मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग खुलता है। पहली बार व्रत रखने वालों के लिए पूजा विधि, नियम और सावधानियों की जानकारी बेहद जरूरी मानी जाती है। अपरा एकादशी 2026: शुभ मुहूर्त और पारण समय एकादशी तिथि प्रारंभ: 12 मई 2026, दोपहर 2:52 बजे एकादशी तिथि समाप्त: 13 मई 2026, दोपहर 1:29 बजे व्रत पारण समय: 14 मई 2026, सुबह 5:31 बजे से 8:14 बजे तक उदयातिथि के अनुसार आज यानी 13 मई को व्रत रखा जा रहा है। इस बार अपरा एकादशी पर सर्वार्थसिद्धि योग का भी शुभ संयोग बन रहा है, जिससे इस दिन का धार्मिक महत्व और बढ़ गया है। भगवान विष्णु को प्रिय हैं ये रंग और भोग धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान विष्णु को पीला रंग अत्यंत प्रिय माना जाता है। इसलिए अपरा एकादशी के दिन पीले वस्त्र पहनना और पीली वस्तुएं अर्पित करना शुभ माना जाता है। प्रिय फूल पीले गेंदे के फूल कमल पीले गुलाब प्रिय भोग पीले फल केसरिया भात पीले रंग की मिठाइयां भोग में तुलसी दल अवश्य शामिल करना चाहिए, क्योंकि बिना तुलसी के भगवान विष्णु का भोग अधूरा माना जाता है। अपरा एकादशी पूजा विधि सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और व्रत का संकल्प लें। इसके बाद भगवान विष्णु की प्रतिमा या तस्वीर को पीले वस्त्र पर स्थापित करें। फिर पंचामृत से भगवान का अभिषेक करें। पूजा में पीले फूल, पीला चंदन और पीले वस्त्र अर्पित करें। दीपक और धूप जलाकर फल और मिठाई का भोग लगाएं। पूजा के दौरान विष्णु मंत्रों का जाप करें और बाद में विष्णु चालीसा व व्रत कथा का पाठ करें। अंत में आरती करके पूजा संपन्न करें। भगवान विष्णु के प्रमुख मंत्र ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥ कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने। प्रणत क्लेशनाशाय गोविन्दाय नमो नमः॥ नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि। तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्॥ अपरा एकादशी पर इन बातों का रखें विशेष ध्यान चावल खाना माना जाता है वर्जित एकादशी के दिन चावल का सेवन नहीं करना चाहिए। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन चावल खाना अशुभ माना गया है। सात्विक भोजन करें घर में प्याज, लहसुन, मांस और मदिरा का प्रयोग नहीं करना चाहिए। व्रत में सेंधा नमक का ही उपयोग करें। तुलसी दल न तोड़ें एकादशी के दिन तुलसी के पत्ते तोड़ना वर्जित माना जाता है। पूजा के लिए तुलसी दल दशमी तिथि को ही तोड़कर रख लेना चाहिए। क्रोध और विवाद से बचें इस दिन शांत मन से भगवान विष्णु का ध्यान करें। किसी की निंदा या अपशब्द बोलने से बचना चाहिए। दिन में न सोएं धार्मिक मान्यता है कि एकादशी पर दिन में सोने से व्रत का पूर्ण फल नहीं मिलता। इस समय को भजन-कीर्तन और धार्मिक पाठ में लगाना शुभ माना गया है।
ज्योतिष शास्त्र में Shani Dev को न्याय का देवता माना जाता है। मान्यता है कि शनिदेव व्यक्ति को उसके कर्मों के अनुसार फल देते हैं। अगर कुंडली में शनि की स्थिति कमजोर हो या शनि की महादशा और साढ़ेसाती चल रही हो, तो जीवन में संघर्ष, आर्थिक परेशानी, मानसिक तनाव और कार्यों में बाधाएं बढ़ सकती हैं। ज्योतिष के अनुसार शनि की महादशा 19 वर्षों तक रहती है और इस दौरान व्यक्ति को शुभ-अशुभ दोनों प्रकार के परिणाम मिल सकते हैं। ऐसे में विधि-विधान से शनिदेव की पूजा करने से कष्टों में राहत मिलने और सकारात्मक परिणाम प्राप्त होने की मान्यता है। शनिदेव पूजा के लिए जरूरी सामग्री पूजा शुरू करने से पहले सभी पूजन सामग्री एकत्रित कर लें– आम की लकड़ी या लोहे का काला सिंहासन काला वस्त्र काला अंगोछा काले पुष्प काला तिल उड़द दाल सरसों का तेल दीपक और रुई काले तिल के लड्डू अरबी पंचपात्र काला कंबल शहद शक्कर दही गाय का दूध लौंग और इलायची सूखे मेवे हवन सामग्री शनिदेव पूजा की विधि शनिवार के दिन स्नान करके स्वच्छ काले या गहरे रंग के वस्त्र धारण करें। पूजा स्थान को साफ करके शनिदेव की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें। इसके बाद दाहिने हाथ में जल लेकर पूरे शरीर पर छिड़कें और शुद्धिकरण करें। फिर सरसों के तेल का दीपक जलाकर शनिदेव के सामने रखें। अब शनिदेव का ध्यान करते हुए काले पुष्प, चंदन और बेलपत्र अर्पित करें। इसके बाद कुशा की पवित्री धारण करें और माथे पर चंदन का तिलक लगाएं। तिलक मंत्र तिलक लगाते समय इस मंत्र का जाप करें– “ॐ चन्दनस्य महत्पुण्यं पवित्रं पापनाशनम्। आपदां हरते नित्यं शनि देवः सदा मम॥” शनिदेव आह्वान मंत्र पूजा के दौरान शनिदेव का आह्वान इस मंत्र से करें– “ॐ भूर्भुवः स्वः शनैश्चराय नमः, इहागच्छ इह तिष्ठ।” विनियोग मंत्र संकल्प लेने के बाद इस मंत्र का जाप करें– “ॐ शन्नो देवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये।” ऋष्यादिन्यास विधि विनियोग के बाद शरीर के विभिन्न अंगों का स्पर्श करते हुए यह प्रक्रिया करें– “ॐ दध्यंडाथर्वण ऋषये नमः” – सिर स्पर्श करें “ॐ गायत्री छन्दसे नमः” – मुख स्पर्श करें “ॐ शनैश्चर देवतायै नमः” – हृदय स्पर्श करें “ॐ आपोबीजाय नमः” – नाभि या गुह्य भाग स्पर्श करें “ॐ वर्तमान शक्तये नमः” – दोनों पैरों का स्पर्श करें शनि दोष से राहत के लिए क्या करें? ज्योतिषाचार्यों के अनुसार शनि की कृपा पाने के लिए कुछ विशेष उपाय भी लाभकारी माने जाते हैं– शनिवार को पीपल के पेड़ के नीचे सरसों के तेल का दीपक जलाएं काले तिल, उड़द और काले वस्त्र का दान करें जरूरतमंद और बुजुर्ग लोगों की सेवा करें कौओं और काले कुत्तों को भोजन खिलाएं शनिदेव के मंत्र “ॐ शं शनैश्चराय नमः” का जाप करें मान्यता है कि सच्चे मन से की गई शनिदेव की आराधना जीवन की बाधाओं को कम कर सकती है और व्यक्ति को मानसिक शांति व स्थिरता प्रदान करती है।
हिंदू धर्म में समय-समय पर आने वाले विशेष महीनों का धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि से खास महत्व होता है। इन्हीं में से एक है मलमास, जिसे अधिक मास या पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है। साल 2026 में मलमास की शुरुआत 17 मई से होने जा रही है, जो 15 जून 2026 तक रहेगा। इस पूरे महीने को भगवान विष्णु की भक्ति और साधना के लिए बेहद शुभ माना जाता है, लेकिन मांगलिक कार्यों के लिए इसे वर्जित माना जाता है। क्या होता है मलमास? हिंदू पंचांग के अनुसार, जब सूर्य एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश नहीं करता, तब उस अवधि को अधिक मास या मलमास कहा जाता है। यह समय खगोलीय संतुलन बनाए रखने के लिए जोड़ा जाता है, लेकिन धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह सांसारिक और भौतिक कार्यों के लिए अनुकूल नहीं माना जाता। क्यों रुक जाते हैं शुभ कार्य? मलमास के दौरान विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन, नामकरण और नए व्यवसाय की शुरुआत जैसे कार्यों को टालने की परंपरा है। मान्यता है कि इस समय किए गए शुभ कार्यों का फल अपेक्षित नहीं मिलता और जीवन में बाधाएं आ सकती हैं। इसलिए लोग इस पूरे महीने को धार्मिक साधना और आत्मचिंतन के लिए समर्पित करते हैं। मलमास में क्या करें? यह महीना भगवान विष्णु की उपासना के लिए सबसे उत्तम माना गया है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार इस दौरान: रोजाना विष्णु पूजा और व्रत करना शुभ होता है “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जाप विशेष फलदायी माना जाता है दान-पुण्य, कथा श्रवण और भजन-कीर्तन करने से पुण्य की प्राप्ति होती है जरूरतमंदों की मदद करने से जीवन में सुख-समृद्धि आती है विशेष योग बना रहे हैं मलमास को खास इस बार का अधिक मास और भी खास माना जा रहा है, क्योंकि इसमें दो गुरु पुष्य योग का संयोग बन रहा है। आमतौर पर एक महीने में एक ही पुष्य नक्षत्र आता है, लेकिन इस बार दो बार यह शुभ योग बनना आध्यात्मिक दृष्टि से बेहद लाभकारी माना जा रहा है। दुर्लभ संयोग, अगली बार 2037 में ज्योतिषाचार्यों के अनुसार, ज्येष्ठ मास में अधिक मास का यह संयोग काफी दुर्लभ है। ऐसा योग अब 2037 में देखने को मिलेगा। इसलिए इस बार मलमास को विशेष महत्व दिया जा रहा है।
30 अप्रैल को मनाई जाएगी छिन्नमस्ता जयंती सनातन धर्म में मां शक्ति के अनेक स्वरूपों की पूजा की जाती है। इनमें मां छिन्नमस्ता का स्वरूप सबसे रहस्यमयी, उग्र और अद्वितीय माना जाता है। दस महाविद्याओं में शामिल मां छिन्नमस्ता त्याग, आत्मबल और दिव्य शक्ति की प्रतीक हैं। उनकी साधना विशेष रूप से तांत्रिक परंपरा में अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। वर्ष 2026 में छिन्नमस्ता जयंती 30 अप्रैल, गुरुवार को मनाई जाएगी। यह पर्व वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को आता है। छिन्नमस्ता जयंती 2026 का शुभ मुहूर्त पंचांग के अनुसार, चतुर्दशी तिथि 29 अप्रैल 2026 को शाम 7:51 बजे प्रारंभ होगी और 30 अप्रैल 2026 को रात 9:12 बजे समाप्त होगी। उदया तिथि के आधार पर छिन्नमस्ता जयंती 30 अप्रैल को मनाना शुभ रहेगा। मां छिन्नमस्ता का अनोखा और रहस्यमयी स्वरूप मां छिन्नमस्ता का स्वरूप अत्यंत विलक्षण है। वे अपने ही कटे हुए सिर को एक हाथ में धारण करती हैं, जबकि दूसरे हाथ में तलवार रहती है। उनकी गर्दन से बहने वाली रक्त की तीन धाराएं जीवन ऊर्जा, त्याग और ब्रह्मांडीय शक्ति का प्रतीक मानी जाती हैं। इनमें से एक धारा स्वयं देवी ग्रहण करती हैं, जबकि शेष दो उनकी सहचरियां पीती हैं। यह स्वरूप आत्मसंयम, बलिदान और शक्ति के अनंत प्रवाह का संदेश देता है। क्यों खास है मां छिन्नमस्ता की साधना? दस महाविद्याओं में मां छिन्नमस्ता को छठा स्थान प्राप्त है। उनका उग्र रूप साधकों को भय, मोह और नकारात्मकता से मुक्ति दिलाने वाला माना जाता है। यही कारण है कि तांत्रिक, योगी, अघोरी और नाथ संप्रदाय के साधक उनकी विशेष उपासना करते हैं। यह साधना सामान्य पूजा से अलग होती है और इसमें विशेष नियमों एवं विधियों का पालन किया जाता है। मां छिन्नमस्ता की पूजा से मिलते हैं ये लाभ मन से भय और असुरक्षा की भावना दूर होती है। आत्मविश्वास और साहस में वृद्धि होती है। जीवन की कठिन परिस्थितियों का सामना करने की शक्ति मिलती है। शारीरिक कष्टों और रोगों से राहत प्राप्त होती है। साधक की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। मान्यता है कि सच्चे मन से मां की आराधना करने पर जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आते हैं। रजरप्पा मंदिर: मां छिन्नमस्ता का प्रमुख धाम झारखंड के रामगढ़ जिले में स्थित रजरप्पा मंदिर मां छिन्नमस्ता का सबसे प्रसिद्ध शक्तिपीठ है। यह पवित्र मंदिर रांची से लगभग 80 किलोमीटर दूर दामोदर और भैरवी नदियों के संगम पर स्थित है। तांत्रिक साधना के लिए यह स्थल विशेष महत्व रखता है। नवरात्रि और छिन्नमस्ता जयंती के अवसर पर यहां हजारों श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं। श्रद्धा और शक्ति का अद्भुत संगम मां छिन्नमस्ता केवल उग्रता की प्रतीक नहीं हैं, बल्कि वे आत्मबल, त्याग और जीवन ऊर्जा का साक्षात स्वरूप हैं। उनकी उपासना साधक को भयमुक्त बनाकर जीवन में सफलता और साहस प्रदान करती है। छिन्नमस्ता जयंती का पर्व शक्ति साधना के लिए अत्यंत फलदायी माना जाता है।
भगवान Shiva को समर्पित भौम प्रदोष व्रत आज, 28 अप्रैल 2026, मंगलवार को रखा जा रहा है। यह व्रत विशेष रूप से मंगल दोष शांति, बाधाओं की समाप्ति और मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए अत्यंत फलदायी माना जाता है। भौम प्रदोष व्रत का शुभ मुहूर्त काशी पंचांग के अनुसार, प्रदोष काल शाम 6:54 बजे से रात 9:04 बजे तक रहेगा। इस अवधि में की गई पूजा का विशेष महत्व होता है। भौम प्रदोष क्यों है खास? जब प्रदोष व्रत मंगलवार को पड़ता है, तो उसे भौम प्रदोष कहा जाता है। यह दिन विशेष रूप से: मंगल दोष शांति कर्ज मुक्ति विवादों से राहत आत्मविश्वास में वृद्धि नकारात्मक ऊर्जा के नाश के लिए शुभ माना जाता है। पूजा विधि प्रातः स्नान कर व्रत का संकल्प लें। पूजा स्थल को स्वच्छ कर शिवलिंग स्थापित करें। जल, दूध और पंचामृत से अभिषेक करें। चंदन, बेलपत्र, फूल और धतूरा अर्पित करें। घी-शक्कर या मिठाई का भोग लगाएं। "ॐ नमः शिवाय" मंत्र का जाप करें। Shiv Chalisa का पाठ करें। प्रदोष व्रत कथा सुनें। घी का दीपक जलाकर आरती करें। शाम को प्रदोष काल में पुनः विधिपूर्वक पूजा करना अत्यंत शुभ माना जाता है। भौम प्रदोष व्रत के लाभ मान्यता है कि इस व्रत से भगवान शिव शीघ्र प्रसन्न होते हैं और भक्तों को सुख, समृद्धि, मानसिक शांति तथा जीवन की कठिनाइयों से मुक्ति प्रदान करते हैं।
कब है नरसिंह चतुर्दशी? नरसिंह चतुर्दशी, जिसे नरसिंह जयंती भी कहा जाता है, इस साल 30 अप्रैल 2026 (गुरुवार) को मनाई जाएगी। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इसी दिन भगवान विष्णु ने अपने चौथे अवतार भगवान नरसिंह के रूप में प्रकट होकर भक्त प्रह्लाद की रक्षा की थी। हिंदू पंचांग के मुताबिक: चतुर्दशी तिथि शुरू: 29 अप्रैल 2026, शाम 07:51 बजे चतुर्दशी तिथि समाप्त: 30 अप्रैल 2026, रात 09:12 बजे व्रत और पूजा: 30 अप्रैल (उदया तिथि के आधार पर) पूजा का शुभ मुहूर्त नरसिंह भगवान का प्राकट्य संध्या काल में हुआ था, इसलिए इस दिन शाम के समय पूजा करना सबसे शुभ माना जाता है। शुभ मुहूर्त: शाम 04:17 बजे से 06:56 बजे तक यह समय भगवान की आराधना और व्रत पूजन के लिए सर्वोत्तम माना गया है। कैसे करें पूजा? जानें आसान विधि नरसिंह चतुर्दशी के दिन विधि-विधान से पूजा करने से विशेष फल मिलता है। पूजा की प्रक्रिया इस प्रकार है: सुबह स्नान कर साफ और संभव हो तो पीले वस्त्र पहनें हाथ में जल और अक्षत लेकर व्रत का संकल्प लें भगवान नरसिंह और माता लक्ष्मी की प्रतिमा स्थापित करें पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद) से अभिषेक करें चंदन, पीले फूल, धूप और दीप अर्पित करें भगवान को केसरयुक्त दूध, फल और मिठाई का भोग लगाएं नरसिंह मंत्रों का जाप करें और प्रह्लाद कथा का पाठ करें अंत में कपूर से आरती कर पूजा पूर्ण करें धार्मिक महत्व और मान्यता मान्यता है कि इस दिन सच्चे मन से व्रत और पूजा करने से भय, बाधाएं और कष्ट दूर होते हैं। भगवान नरसिंह अपने भक्तों की रक्षा करते हैं और जीवन में सुख-समृद्धि प्रदान करते हैं। यह पर्व बुराई पर अच्छाई की जीत और भक्ति की शक्ति का प्रतीक माना जाता है।
सनातन धर्म में हर शुभ कार्य की शुरुआत भगवान गणेश की पूजा से करना परंपरा का अहम हिस्सा है। “श्री गणेश” से कार्य प्रारंभ करने का अर्थ ही है कि उस कार्य में सफलता, शुभता और बाधा-रहित मार्ग की कामना की जा रही है। गणपति को ऋद्धि-सिद्धि, बुद्धि, विवेक और शुभ-लाभ का देवता माना जाता है, इसलिए उन्हें “प्रथम पूजनीय” का दर्जा प्राप्त है। गणपति प्रथम पूजनीय क्यों हैं? धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, एक बार सभी देवी-देवताओं के बीच यह प्रतियोगिता हुई कि जो सबसे पहले पूरे ब्रह्मांड का चक्कर लगाएगा, वही प्रथम पूजनीय होगा। जहां अन्य देवता अपने-अपने वाहनों पर सवार होकर ब्रह्मांड की यात्रा पर निकल पड़े, वहीं भगवान गणेश ने अपनी बुद्धिमत्ता का परिचय देते हुए अपने माता-पिता–भगवान शिव और माता पार्वती–की परिक्रमा की। गणेश जी के अनुसार, माता-पिता ही उनका संपूर्ण ब्रह्मांड हैं। उनकी इस सूझबूझ से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें प्रथम पूजनीय होने का वरदान दिया। गणपति पूजा के 7 प्रमुख लाभ 1. नवग्रह दोषों से मुक्ति गणेश जी की विधिपूर्वक पूजा करने से कुंडली के नवग्रह दोष शांत होते हैं और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। 2. सफलता और समृद्धि की प्राप्ति लंबोदर रूप में पूजे जाने वाले गणपति की कृपा से जीवन के हर क्षेत्र में सफलता और आर्थिक उन्नति मिलती है। 3. विघ्नों का नाश विघ्नहर्ता गणेश की आराधना से कार्यों में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं और योजनाएं सफलतापूर्वक पूर्ण होती हैं। 4. नकारात्मकता और दोषों का अंत गणपति की पूजा व्यक्ति के भीतर के अहंकार को समाप्त कर उसे विनम्र बनाती है, साथ ही नकारात्मक शक्तियों को भी दूर करती है। 5. बुद्धि और विवेक का आशीर्वाद गणेश जी को ज्ञान और बुद्धि का देवता माना जाता है। उनकी कृपा से व्यक्ति सही निर्णय लेने में सक्षम होता है। 6. वास्तु दोष से मुक्ति घर में गणपति की मूर्ति या चित्र रखने से वास्तु दोष दूर होते हैं और सकारात्मक वातावरण बना रहता है। 7. सुख-समृद्धि और मनोकामना पूर्ति सच्चे मन से की गई गणपति पूजा जीवन के कष्टों को दूर कर इच्छाओं की पूर्ति करती है और घर में सुख-समृद्धि बनाए रखती है। भगवान गणेश की पूजा केवल धार्मिक आस्था ही नहीं, बल्कि जीवन को संतुलित, सकारात्मक और सफल बनाने का मार्ग भी मानी जाती है। उनकी आराधना व्यक्ति को मानसिक, आध्यात्मिक और व्यावहारिक रूप से सशक्त बनाती है।
हिंदू धर्म में प्रत्येक माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मासिक कृष्ण जन्माष्टमी का व्रत अत्यंत श्रद्धा के साथ रखा जाता है। यह दिन भगवान श्री कृष्ण की उपासना के लिए विशेष माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से पूजा करने पर जीवन में सुख-समृद्धि, मानसिक शांति और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है। कब है वैशाख मासिक कृष्ण जन्माष्टमी 2026? हिंदू पंचांग के अनुसार, वैशाख माह में कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि: आरंभ: 9 अप्रैल 2026, रात 9:19 बजे समापन: 10 अप्रैल 2026, सुबह 11:15 बजे निशिता काल (मध्यरात्रि पूजा) को ध्यान में रखते हुए यह व्रत 9 अप्रैल 2026, गुरुवार को रखा जाएगा। क्या है शुभ मुहूर्त? पूजा और व्रत के लिए प्रमुख शुभ समय इस प्रकार हैं: ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 4:38 बजे से 5:26 बजे तक अमृत काल: सुबह 6:07 बजे से 7:54 बजे तक अभिजीत मुहूर्त: दोपहर 12:03 बजे से 12:53 बजे तक इन मुहूर्तों में भगवान श्रीकृष्ण की पूजा करना अत्यंत फलदायी माना जाता है। व्रत और पूजा का महत्व धार्मिक मान्यताओं के अनुसार: भगवान श्रीकृष्ण की पूजा करने से सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है जीवन में मानसिक शांति और सकारात्मक ऊर्जा आती है संतान प्राप्ति की कामना रखने वालों के लिए यह व्रत विशेष लाभकारी माना जाता है पूजन के दौरान क्या करें? इस दिन भक्त: श्रीकृष्ण का अभिषेक करें माखन-मिश्री का भोग लगाएं “ॐ कृष्णाय नमः” और “हरे कृष्ण महामंत्र” का जाप करें आरती “आरती कुंजबिहारी की” का पाठ करें
भारतीय सनातन परंपरा में शनि देव को न्याय, कर्म और अनुशासन का प्रतीक माना जाता है। आम धारणा के विपरीत, शनि देव भय के नहीं बल्कि न्याय के देवता हैं, जो मनुष्य को उसके कर्मों के अनुसार फल देते हैं। जीवन में आने वाले कठिन समय जैसे साढ़ेसाती या ढैय्या दरअसल व्यक्ति को आत्ममंथन, धैर्य और सही मार्ग पर चलने की सीख देते हैं। शनिवार का महत्व शनिवार का दिन विशेष रूप से शनि देव की आराधना के लिए समर्पित माना गया है। यह दिन हमें अपने कर्मों का मूल्यांकन करने और जीवन में अनुशासन व विनम्रता अपनाने का अवसर देता है। इस दिन व्रत, पूजा और दान करने से नकारात्मक प्रभाव कम होते हैं और मानसिक शांति प्राप्त होती है। शनि देव को तेल क्यों चढ़ाया जाता है? धार्मिक मान्यताओं और प्राचीन ग्रंथों के अनुसार, तिल का तेल नकारात्मक ऊर्जा को अवशोषित करने की क्षमता रखता है। जब भक्त शनि देव को तेल अर्पित करते हैं, तो यह प्रतीक होता है कि उनके जीवन की बाधाएं, कष्ट और नकारात्मक कर्म धीरे-धीरे समाप्त हो रहे हैं। तेल की चिकनाहट और शीतलता शनि की कठोर ऊर्जा को शांत करती है, जिससे जीवन में स्थिरता और राहत मिलती है। पूजा विधि शनिवार के दिन सुबह स्नान कर साफ वस्त्र धारण करें और शनि मंदिर जाएं। पीपल के पेड़ की जड़ में जल अर्पित करें सरसों के तेल का दीपक जलाएं शनि देव की मूर्ति पर तिल का तेल चढ़ाएं काले तिल, उड़द या लोहे की वस्तुएं दान करें शनि देव को प्रसन्न करने के उपाय जरूरतमंदों को दान करना विशेष फलदायी माना गया है काले वस्त्र, जूते-चप्पल, काली उड़द आदि का दान करें नियमित रूप से शनि मंत्रों का जाप करें शनि मंत्र “ॐ शं शनेश्वराय नमः” या “ॐ प्रां प्रीं प्रौं सः शनैश्चराय नमः” इन मंत्रों का श्रद्धा से जाप करने से शनि दोषों में कमी आती है और जीवन में सकारात्मकता बढ़ती है।
हिंदू धर्म में आस्था और आध्यात्म का विशेष महत्व है, और इसी क्रम में आज 3 अप्रैल 2026 से हिंदू नववर्ष का दूसरा महीना वैशाख शुरू हो गया है। इस महीने को “माधव मास” के नाम से भी जाना जाता है, जो भगवान विष्णु को समर्पित माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस पूरे माह में प्रतिदिन स्नान, पूजा और दान का विशेष महत्व होता है। पंचांग के अनुसार, वैशाख कृष्ण प्रतिपदा तिथि 2 अप्रैल सुबह 7:41 बजे से शुरू होकर 3 अप्रैल सुबह 8:42 बजे तक रही, लेकिन उदया तिथि के आधार पर आज 3 अप्रैल से वैशाख माह का आरंभ माना गया है। क्यों जरूरी है वैशाख में रोज स्नान? धार्मिक ग्रंथों और व्रत-परंपराओं के अनुसार, चैत्र शुक्ल पूर्णिमा से लेकर वैशाख शुक्ल पूर्णिमा तक प्रतिदिन प्रातःकाल स्नान करना अत्यंत पुण्यदायक माना गया है। मान्यता है कि इस दौरान सूर्योदय से पहले स्नान करने से व्यक्ति के सभी पाप, रोग और दोष समाप्त होते हैं और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। यदि तीर्थ स्थल जैसे नदी, कुआं या सरोवर में स्नान संभव न हो, तो घर पर शुद्ध जल में गंगाजल मिलाकर स्नान करना भी समान फलदायी माना गया है। इस माह में नियमित स्नान करने से पुण्य में वृद्धि होती है और व्यक्ति का प्रभाव व तेज बढ़ता है। वैशाख में स्नान और पूजा के प्रमुख नियम प्रतिदिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करना श्रेष्ठ माना गया है। स्नान के जल में गंगाजल मिलाना शुभ होता है। स्नान के दौरान अपने इष्ट देव का स्मरण करें। स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण कर भगवान विष्णु की पूजा करें। “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” या “हरे राम हरे राम” मंत्र का जाप करें। मंत्र जाप 108 या 1008 बार किया जा सकता है। इस माह में एक समय भोजन करने का भी विधान बताया गया है। पूरे 31 दिनों तक इन नियमों का पालन करने से विशेष पुण्य प्राप्त होता है। मेष संक्रांति का विशेष महत्व वैशाख माह में मेष संक्रांति का पर्व भी आता है। इस दिन सूर्य देव अपनी उच्च राशि मेष में प्रवेश करते हैं, जो अत्यंत शुभ माना जाता है। साल 2026 में मेष संक्रांति 14 अप्रैल को मनाई जाएगी। इस दिन सुबह 9:39 बजे सूर्य देव के मेष राशि में प्रवेश के समय स्नान और दान करने से विशेष पुण्य और सूर्य कृपा प्राप्त होती है। वैशाख माह का धार्मिक महत्व वैशाख को “माधव मास” कहा जाता है, इसलिए इस पूरे महीने भगवान विष्णु और जल देवता की पूजा का विशेष महत्व है। मान्यता है कि इस माह में किए गए स्नान, दान और पूजा से “अक्षय पुण्य” प्राप्त होता है, जो कभी समाप्त नहीं होता।
चैत्र नवरात्रि के आठवें दिन, जिसे महाअष्टमी के नाम से जाना जाता है, मां महागौरी की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां महागौरी को शांति, पवित्रता और समृद्धि की देवी माना जाता है। इस दिन विधि-विधान से पूजा करने पर भक्तों को धन-धान्य, सुख-शांति और सभी कष्टों से मुक्ति का आशीर्वाद प्राप्त होता है। मिर्जापुर के विंध्यधाम के विद्वान आचार्य पं. अनुपम महाराज के अनुसार, महाअष्टमी के दिन विशेष पूजा और कुछ सरल उपाय करने से मां की कृपा शीघ्र प्राप्त होती है। पूजा विधि: ऐसे करें मां महागौरी की आराधना महाअष्टमी के दिन सुबह स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें और पूजा स्थान को शुद्ध करें। इसके बाद एक थाली में लाल चुनरी, चंदन, अक्षत, धूप, लाल और पीले पुष्प रखें। मां को अर्पित करने के लिए 7 गोमती चक्र, 7 कौड़ियां, चांदी या पीतल का कछुआ, लक्ष्मी बैल और पान रखें। मान्यता है कि पूजा के बाद कछुए को तिजोरी में रखने से धन की कमी नहीं होती। मां को प्रसन्न करने के लिए 56 भोग अर्पित करना अत्यंत शुभ माना जाता है। यदि संभव न हो तो पूड़ी और लप्सी का भोग भी लगाया जा सकता है। कन्या पूजन का महत्व और सही विधि महाअष्टमी के दिन कन्या पूजन का विशेष महत्व होता है। 1 वर्ष से अधिक और 9 वर्ष से कम आयु की कन्याओं को देवी का स्वरूप मानकर उनका पूजन किया जाता है। कन्याओं को हलवा और खीर का भोग खिलाएं मिष्ठान अर्पित करें और दक्षिणा दें ध्यान रखें कि कन्या पूजन में नमक का उपयोग न करें मां को नारियल अर्पित करना भी अत्यंत शुभ माना जाता है धार्मिक मान्यता के अनुसार, नारियल की आठ आहुति देने से अष्टलक्ष्मी प्रसन्न होती हैं और घर में सुख-समृद्धि का वास होता है। खास उपाय: दूर होंगे कष्ट और बढ़ेगा धन-धान्य मां महागौरी को 7 कौड़ियां और 7 गोमती चक्र अर्पित करने से जीवन की बाधाएं दूर होती हैं। इसके साथ ही घी, शक्कर और बेल के मुरब्बे से हवन करने से आर्थिक स्थिति मजबूत होती है और घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। चैत्र नवरात्रि के नौ दिनों में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा की जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, हर दिन माता के अलग-अलग रूप को विशेष भोग अर्पित करने से सुख-समृद्धि और मनोकामनाओं की पूर्ति होती है। पहले से तीसरे दिन तक का भोग नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा में दूध, घी या खीर का भोग लगाना शुभ माना जाता है। दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी को मिश्री, चीनी या गुड़ अर्पित किया जाता है, जिससे ज्ञान और विवेक की प्राप्ति होती है। तीसरे दिन मां चंद्रघंटा को दूध से बने पकवान या मेवे का भोग लगाना शुभ होता है। चौथे से छठे दिन तक का भोग चौथे दिन मां कूष्मांडा को मालपुए का भोग अर्पित किया जाता है, जो जीवन में सुख-समृद्धि लाता है। पांचवें दिन मां स्कंदमाता को केला चढ़ाना शुभ माना जाता है, जिससे संतान सुख की प्राप्ति होती है। छठे दिन मां कात्यायनी को शहद या मीठा पान अर्पित किया जाता है। सातवें से नौवें दिन तक का भोग सातवें दिन मां कालरात्रि को गुड़ या गुड़ से बने पदार्थ चढ़ाए जाते हैं। आठवें दिन मां महागौरी को हलवा-पूरी, खीर और नारियल का भोग लगाया जाता है। वहीं नौवें दिन मां सिद्धिदात्री को काला चना, हलवा और नारियल अर्पित कर नवरात्रि पूजा का समापन किया जाता है। धार्मिक मान्यता है कि विधि-विधान से माता के नौ रूपों को भोग अर्पित करने से भक्तों को विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है और जीवन में सुख-शांति बनी रहती है।
कलावा के रंगों का रहस्य: कौन सा धागा देता है किस तरह का लाभ, जानें धार्मिक और ज्योतिषीय महत्व हिंदू धर्म में पूजा-पाठ और धार्मिक अनुष्ठानों के दौरान हाथ में कलावा या मौली बांधने की परंपरा सदियों पुरानी है। इसे केवल एक साधारण धागा नहीं माना जाता, बल्कि आस्था, सुरक्षा और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक समझा जाता है। आमतौर पर लोग लाल रंग का कलावा बांधते हैं, लेकिन ज्योतिष और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अलग-अलग रंग के कलावे का अपना अलग महत्व बताया गया है। माना जाता है कि यदि व्यक्ति अपनी जरूरत या उद्देश्य के अनुसार कलावा धारण करता है, तो उसे जीवन में विशेष लाभ मिल सकता है। लाल कलावा: शक्ति और साहस का प्रतीक लाल रंग का कलावा सबसे अधिक प्रचलित है और इसे ऊर्जा, शक्ति और साहस का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इसे धारण करने से व्यक्ति को मानसिक शांति मिलती है और जीवन की कठिन परिस्थितियों का सामना करने की शक्ति प्राप्त होती है। इसे भगवान हनुमान और देवी दुर्गा की कृपा से भी जोड़ा जाता है, इसलिए पूजा-पाठ के समय अक्सर यही कलावा बांधा जाता है। पीला कलावा: गुरु कृपा और ज्ञान की वृद्धि पीले रंग का कलावा गुरु ग्रह से जुड़ा माना जाता है। मान्यता है कि इसे धारण करने से ज्ञान, बुद्धि और शुभता में वृद्धि होती है। शिक्षा, अध्यात्म या ज्ञान से जुड़े कार्य करने वाले लोगों के लिए पीला कलावा विशेष रूप से शुभ माना जाता है। काला कलावा: नकारात्मक ऊर्जा से सुरक्षा काले रंग का कलावा आमतौर पर बुरी नजर और नकारात्मक शक्तियों से बचाव के लिए बांधा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार यह व्यक्ति को नजर दोष से बचाने के साथ-साथ शनि से जुड़ी परेशानियों को कम करने में भी सहायक माना जाता है। हरा कलावा: स्वास्थ्य और तरक्की का संकेत हरा रंग समृद्धि, विकास और उन्नति का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि हरा कलावा बांधने से स्वास्थ्य में सुधार होता है और जीवन में प्रगति के नए अवसर मिलते हैं। ज्योतिष के अनुसार यह रंग बुध ग्रह से भी जुड़ा हुआ माना जाता है। सफेद कलावा: शांति और पवित्रता का प्रतीक सफेद रंग शांति, पवित्रता और संतुलन का प्रतीक है। सफेद कलावा धारण करने से मन में स्थिरता और सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है। इसे चंद्रमा और शुक्र ग्रह की कृपा से भी जोड़ा जाता है। नीला कलावा: कर्म और सफलता के लिए नीला रंग धैर्य, अनुशासन और कर्म का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि नीला कलावा पहनने से व्यक्ति अपने कार्यों में एकाग्रता बनाए रखता है और सफलता की ओर आगे बढ़ता है। कई लोग इसे शनि से जुड़ी सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त करने के लिए भी धारण करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार कलावा केवल एक धागा नहीं, बल्कि आस्था और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक है। सही उद्देश्य और श्रद्धा के साथ इसे धारण करने से जीवन में मानसिक संतुलन, सुरक्षा और सफलता की भावना को बल मिलता है।
हिंदू धर्म में अमावस्या तिथि को विशेष धार्मिक महत्व दिया जाता है, लेकिन Chaitra Amavasya को वर्ष की प्रमुख अमावस्याओं में गिना जाता है। यह दिन खास तौर पर पितरों की शांति, दान-पुण्य और आध्यात्मिक साधना के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन किए गए स्नान, तर्पण और दान से पूर्वजों की आत्मा को शांति मिलती है और परिवार पर उनकी कृपा बनी रहती है। देशभर में श्रद्धालु इस दिन पवित्र नदियों में स्नान करते हैं या घर पर ही विधि-विधान से पूजा कर अपने पितरों का स्मरण करते हैं। धार्मिक परंपराओं के अनुसार इस दिन कुछ विशेष नियमों का पालन करना भी आवश्यक माना जाता है, ताकि पूजा का पूर्ण फल प्राप्त हो सके। चैत्र अमावस्या 2026 की तिथि और समय हिंदू पंचांग के अनुसार Chaitra Amavasya की तिथि 18 मार्च 2026 को सुबह 08:25 बजे से शुरू होकर 19 मार्च 2026 को सुबह 06:52 बजे तक रहेगी। शास्त्रों के अनुसार स्नान, दान और पितरों का तर्पण जैसे शुभ कार्य 19 मार्च को करना अधिक फलदायी माना गया है। तामसिक भोजन से रखें दूरी धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक अमावस्या के दिन मांस, मछली, शराब और अन्य तामसिक भोजन से दूर रहना चाहिए। इस दिन सात्विक भोजन करना शुभ माना जाता है। ऐसा करने से मन शांत रहता है और व्यक्ति पूजा-पाठ में पूरी श्रद्धा के साथ शामिल हो पाता है। घर में शांति बनाए रखना जरूरी अमावस्या के दिन घर में झगड़ा या विवाद करने से बचने की सलाह दी जाती है। मान्यता है कि इस दिन नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव अधिक हो सकता है, इसलिए सकारात्मक माहौल बनाए रखना जरूरी होता है। परिवार के सदस्यों के बीच प्रेम और सौहार्द बनाए रखने से आध्यात्मिक वातावरण भी मजबूत होता है। पितरों का तर्पण और सम्मान चैत्र अमावस्या को पितरों को समर्पित दिन माना जाता है। इस दिन पूर्वजों के नाम से तर्पण करना, उनका स्मरण करना और जरूरतमंदों को दान देना विशेष पुण्यदायी माना गया है। धार्मिक मान्यता है कि इससे पितरों की आत्मा को शांति मिलती है और परिवार पर उनका आशीर्वाद बना रहता है। सुबह जल्दी उठकर करें पूजा अमावस्या के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करना और भगवान का ध्यान करना शुभ माना जाता है। देर तक सोने के बजाय सुबह ध्यान, जप और पूजा-पाठ करने से आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होता है और मन में सकारात्मकता बनी रहती है। दान-पुण्य का विशेष महत्व इस दिन जरूरतमंदों को भोजन, कपड़े या धन का दान करना अत्यंत पुण्यकारी माना जाता है। कहा जाता है कि अमावस्या के दिन किया गया दान कई गुना फल देता है और व्यक्ति के जीवन में सुख-समृद्धि और शांति का मार्ग प्रशस्त करता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, अगर इस दिन श्रद्धा और नियमों के साथ पूजा-पाठ, तर्पण और दान किया जाए, तो व्यक्ति को आध्यात्मिक संतोष के साथ-साथ पारिवारिक सुख-शांति भी प्राप्त होती है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।