Pakistan के पंजाब प्रांत में अल्पसंख्यक समुदायों की उपेक्षा को लेकर राजनीतिक विवाद गहरा गया है। पंजाब विधानसभा में विधायकों ने सरकार पर आरोप लगाया कि 2025-26 के बजट में चर्चों और मंदिरों के संरक्षण के लिए कोई फंड आवंटित नहीं किया गया, जबकि अल्पसंख्यक बहुल इलाकों के विकास के लिए भी पर्याप्त राशि नहीं रखी गई। सत्तारूढ़ Pakistan Muslim League-Nawaz के सीनेटर Baba Falbus Christopher ने विधानसभा सत्र के दौरान कहा कि पंजाब में चर्चों और मंदिरों की मरम्मत व संरक्षण के लिए “एक भी पैसा” नहीं दिया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि ईसाई बहुल बस्तियों के विकास के लिए भी लगभग कोई बजट नहीं रखा गया। क्रिस्टोफर ने सरकार से मांग की कि 2026-27 के बजट में अल्पसंख्यक समुदायों के धार्मिक स्थलों और बुनियादी सुविधाओं के लिए पर्याप्त फंड आवंटित किया जाए। हिंदू विधायक ने उठाए सवाल वहीं Pakistan Peoples Party के हिंदू विधायक Basro Ji ने कहा कि दक्षिण पंजाब में बड़ी संख्या में हिंदू आबादी रहती है, लेकिन उनके लिए कोई ठोस कल्याणकारी योजना शुरू नहीं की गई। उन्होंने आरोप लगाया कि हिंदू इलाकों के विकास के लिए जो सीमित फंड रखा गया था, उसे बाद में वापस ले लिया गया। इससे समुदाय में नाराजगी बढ़ी है। स्पीकर ने भी जताई चिंता बहस के दौरान पंजाब विधानसभा के स्पीकर Malik Muhammad Ahmad Khan ने अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय के कामकाज पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि अल्पसंख्यक समुदाय आज भी: पीने के पानी सफाई स्वास्थ्य सुविधाओं जैसी बुनियादी जरूरतों से वंचित हैं। स्पीकर ने कहा कि विकास निधि का इस्तेमाल सबसे पहले इन जरूरी सुविधाओं पर होना चाहिए। मंत्री रमेश सिंह अरोड़ा की सफाई अल्पसंख्यक मामलों का मंत्रालय संभाल रहे Ramesh Singh Arora ने सरकार का बचाव करते हुए कहा कि अल्पसंख्यकों की समस्याएं 1947 से चली आ रही हैं और उन्हें “रातोंरात खत्म नहीं किया जा सकता।” उन्होंने दावा किया कि Maryam Nawaz सरकार ने पिछले दो वर्षों में अल्पसंख्यक मामलों के विभाग का बजट 300 प्रतिशत तक बढ़ाया है। हालांकि विपक्ष और अल्पसंख्यक प्रतिनिधियों का कहना है कि जमीनी स्तर पर अब भी हालात में ज्यादा सुधार दिखाई नहीं दे रहा। मानवाधिकार संगठनों ने जताई चिंता मानवाधिकार संगठन Minority Rights Group के अनुसार पाकिस्तान में हिंदू, ईसाई, अहमदी, सिख और कलाश जैसे अल्पसंख्यक समुदाय अक्सर गरीबी, भेदभाव और असुरक्षा के माहौल में जीवन बिताते हैं। संगठन का कहना है कि देश की लगभग 4 प्रतिशत आबादी होने के बावजूद इन समुदायों को कई बार “दूसरे दर्जे के नागरिक” जैसा व्यवहार झेलना पड़ता है। लगातार उठते रहे हैं अल्पसंख्यकों से जुड़े मुद्दे पाकिस्तान में लंबे समय से: धार्मिक स्थलों की सुरक्षा जबरन धर्मांतरण सामाजिक भेदभाव सीमित राजनीतिक प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दों को लेकर सवाल उठते रहे हैं। अब पंजाब विधानसभा में यह मामला जोर-शोर से उठने के बाद सरकार पर अल्पसंख्यकों के लिए ठोस कदम उठाने का दबाव बढ़ सकता है।
द हेग में अंतरराष्ट्रीय अदालत ने आरोपों को दी मंजूरी अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (ICC) ने गुरुवार को फिलीपींस के पूर्व राष्ट्रपति रोड्रिगो दुतेर्ते के खिलाफ ‘मानवता के खिलाफ अपराध’ (crimes against humanity) के आरोपों को आगे बढ़ाने की अनुमति दे दी है। अदालत के जजों ने कहा कि उपलब्ध सबूत यह मानने के लिए पर्याप्त हैं कि उनके कार्यकाल में गंभीर मानवाधिकार उल्लंघन हुए। ड्रग्स के खिलाफ अभियान बना विवाद की जड़ रोड्रिगो दुतेर्ते पर आरोप है कि उनके कार्यकाल में चलाए गए “एंटी-ड्रग अभियान” के दौरान बड़े पैमाने पर हत्याएं हुईं। अभियोजकों के अनुसार, पुलिस और कथित हिट स्क्वॉड ने कई लोगों की हत्या की, जिन्हें सरकार ने अपराधी बताया था। रिपोर्ट्स के मुताबिक, इन कार्रवाइयों की शुरुआत उनके राष्ट्रपति बनने से पहले, डावाओ शहर के मेयर रहते हुए भी हुई थी। अदालत का बड़ा निष्कर्ष: “नीति बनाकर हत्या को बढ़ावा दिया गया” ICC के तीन जजों की पीठ ने अपने फैसले में कहा कि ऐसे “ठोस आधार” मौजूद हैं जिनसे यह साबित होता है कि दुतेर्ते ने कथित अपराधियों को “neutralise” करने की नीति विकसित और लागू की। अदालत के अनुसार, यह केवल कुछ घटनाएं नहीं थीं, बल्कि एक व्यवस्थित अभियान के संकेत मिलते हैं। हजारों मौतों का दावा, आंकड़ों में बड़ा अंतर इस पूरे अभियान में मौतों के आंकड़े अलग-अलग स्रोतों में भिन्न हैं: फिलीपींस पुलिस: लगभग 6,000 मौतें मानवाधिकार संगठन: 20,000 से 30,000 तक मौतों का अनुमान यह अंतर इस मामले को और अधिक विवादास्पद बनाता है। दुतेर्ते की सफाई और कानूनी लड़ाई 81 वर्षीय दुतेर्ते ने सभी आरोपों को खारिज किया है। उनके वकीलों का कहना है कि यह मामला “बिना पुष्टि वाले गवाहों” और संदिग्ध बयानों पर आधारित है। दुतेर्ते फिलहाल अदालत की कार्यवाही में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित नहीं हुए हैं और वीडियो कॉन्फ्रेंस के जरिए जुड़े रहे हैं। ICC का बड़ा कदम और अपीलें खारिज ICC की अपील पीठ ने पहले ही दुतेर्ते की उस याचिका को खारिज कर दिया था जिसमें कहा गया था कि फिलीपींस के कोर्ट से हटने के बाद ICC को इस मामले पर अधिकार नहीं है। इसके साथ ही अदालत ने यह भी माना कि अब मुकदमे की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा सकती है। पीड़ित परिवारों की प्रतिक्रिया: “यह न्याय की शुरुआत है” फिलीपींस में इस फैसले का कई पीड़ित परिवारों ने स्वागत किया है। उनका कहना है कि यह निर्णय वर्षों से चले आ रहे दर्द और अन्याय के खिलाफ एक महत्वपूर्ण कदम है। कुछ परिवारों ने कहा कि अब उम्मीद है कि उनके प्रियजनों को आखिरकार न्याय मिल सकेगा। मानवाधिकार संगठनों ने भी इस फैसले को ऐतिहासिक बताया है। उनका कहना है कि यह संदेश देता है कि चाहे कोई भी नेता हो, गंभीर अपराधों से बच नहीं सकता। वैश्विक न्याय व्यवस्था के लिए अहम मामला रोड्रिगो दुतेर्ते का यह मामला अंतरराष्ट्रीय न्याय व्यवस्था के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यह ट्रायल इस बात की परीक्षा होगा कि वैश्विक स्तर पर सत्ता में रहे नेताओं को मानवाधिकार उल्लंघन के लिए कितनी जवाबदेही तय की जाती है।
म्यांमार में सत्ता परिवर्तन के बाद एक बड़ा और चौंकाने वाला फैसला सामने आया है। देश के नए राष्ट्रपति और सैन्य प्रमुख Min Aung Hlaing ने देशभर में फांसी की सजा पाए सभी कैदियों की सजा को उम्रकैद में बदलने का ऐलान किया है। यह फैसला उनके राष्ट्रपति बनने के महज एक हफ्ते के भीतर लिया गया, जिसे सरकार ‘मेल-मिलाप’ की दिशा में कदम बता रही है, जबकि आलोचक इसे छवि सुधारने की कोशिश मान रहे हैं। 2021 तख्तापलट के बाद पहली बड़ी राहत गौरतलब है कि फरवरी 2021 में सेना ने तख्तापलट कर लोकतांत्रिक सरकार को हटा दिया था। इसके बाद Myanmar में सैन्य शासन के खिलाफ आवाज उठाने वालों पर सख्त कार्रवाई हुई और कई लोगों को फांसी की सजा सुनाई गई। संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के अनुसार, सत्ता संभालने के बाद पहले ही साल में 130 से ज्यादा लोगों को मौत की सजा दी गई थी, हालांकि वास्तविक संख्या इससे अधिक हो सकती है। पूर्व राष्ट्रपति को भी मिली रिहाई इस आम माफी के तहत म्यांमार के पूर्व राष्ट्रपति Win Myint को भी रिहा कर दिया गया है। उन्हें तख्तापलट के बाद गिरफ्तार किया गया था और अब वे पूरी तरह आजाद हैं। हजारों कैदियों को राहत सरकार ने इस फैसले के साथ बड़े पैमाने पर कैदियों को राहत देने की भी घोषणा की है। रिपोर्ट के मुताबिक: 4,300 से ज्यादा कैदियों को रिहा किया जाएगा 179 विदेशी नागरिक भी रिहाई सूची में शामिल हैं 40 साल से कम सजा पाने वालों की सजा में एक-छठा तक की कमी की जाएगी त्योहार के मौके पर लिया गया फैसला यह फैसला म्यांमार के पारंपरिक नए साल ‘थिंगयान’ के मौके पर लिया गया, जब आमतौर पर कैदियों को माफी देने की परंपरा रही है। लोकतंत्र समर्थक संगठनों का कहना है कि यह कदम केवल अंतरराष्ट्रीय दबाव कम करने और सैन्य शासन को “नागरिक चेहरा” देने की रणनीति हो सकती है।
एक चौंकाने वाले खुलासे में सामने आया है कि अमेरिकी सेना का एक पूर्व सैनिक कथित तौर पर भाड़े का हत्यारा बनकर संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के लिए टारगेटेड हत्याएं करता था। इस काम के बदले उसे हर महीने करोड़ों रुपये मिलते थे। क्या है पूरा मामला? एसोसिएटेड प्रेस (AP) की रिपोर्ट के अनुसार, पूर्व अमेरिकी सैनिक अब्राहम गोलन पर आरोप है कि उसने 2015 में यमन में हत्या के मिशन को अंजाम दिया यह ऑपरेशन कथित तौर पर UAE के इशारे पर किया गया था लक्ष्य थे राजनीतिक विरोधी और खास लोग बनाई निजी ‘किल टीम’ गोलन ने एक पूर्व नेवी सील इसैक गिलमोर के साथ मिलकर “Spear Operations Group” नाम की प्राइवेट मिलिट्री कंपनी बनाई इस टीम में ज्यादातर पूर्व अमेरिकी स्पेशल फोर्सेज के सदस्य शामिल थे कंपनी पर टारगेटेड असैसिनेशन (लक्षित हत्याओं) का कॉन्ट्रैक्ट लेने का आरोप है कितनी होती थी कमाई? रिपोर्ट्स के मुताबिक: हर महीने करीब 15 लाख डॉलर (लगभग 10 करोड़ रुपये) मिलते थे सफल मिशन पर अलग से बोनस भी दिया जाता था यमन सांसद ने लगाए गंभीर आरोप यमन के सांसद अंसाफ अली मायो ने आरोप लगाया कि: 2015 में उन्हें मारने की साजिश रची गई उनके दफ्तर में 29 दिसंबर 2015 को विस्फोटक लगाए गए धमाके से कुछ मिनट पहले ही वह बच निकले बाद में सुरक्षा कारणों से उन्हें यमन छोड़कर सऊदी अरब में शरण लेनी पड़ी। कानूनी कार्रवाई की तैयारी मायो अब अमेरिका में इन पूर्व सैनिकों पर केस कर सकते हैं Alien Tort Statute कानून के तहत विदेशी नागरिक भी अमेरिकी अदालत में मुकदमा दायर कर सकते हैं मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि यह मामला युद्ध अपराध और मानवता के खिलाफ अपराध से जुड़ा हो सकता है गोलन ने कबूला था मिशन अब्राहम गोलन ने 2018 में एक इंटरव्यू में स्वीकार किया था: “यमन में टारगेटेड असैसिनेशन प्रोग्राम था और मैं उसे चला रहा था।”
मध्य पूर्व में जारी तनाव के बीच Israel और Iran के बीच चल रहे संघर्ष का असर अब West Bank में भी साफ दिखाई देने लगा है। इजरायली कब्जे वाले इस क्षेत्र में फिलिस्तीनियों के खिलाफ हिंसक घटनाओं में तेजी आई है, जिससे स्थानीय आबादी में दहशत का माहौल है। रामल्लाह स्थित Palestinian Ministry of Health के अनुसार, इस महीने की शुरुआत से अब तक वेस्ट बैंक में छह फिलिस्तीनियों को गोली मारकर हत्या कर दी गई है। लगातार बढ़ती इन घटनाओं ने क्षेत्र में तनाव को और गहरा कर दिया है। युद्ध के बीच बढ़ी हमलों की घटनाएं विश्लेषकों का मानना है कि ईरान-इजरायल युद्ध शुरू होने के बाद वेस्ट बैंक में बसने वाले इजरायली समूहों के हमलों में वृद्धि हुई है। मानवाधिकार संगठन B'Tselem का कहना है कि मौजूदा हालात में हिंसा की घटनाएं यह संकेत देती हैं कि युद्ध की स्थिति का फायदा उठाकर फिलिस्तीनियों पर दबाव बढ़ाया जा रहा है। स्थानीय लोगों के अनुसार, 28 फरवरी को इजरायल द्वारा ईरान के खिलाफ सैन्य अभियान शुरू करने के बाद हमलों की संख्या तेजी से बढ़ी है। संयुक्त राष्ट्र की एजेंसी OCHA के आंकड़ों के मुताबिक, अक्टूबर 2023 में गाजा युद्ध शुरू होने से लेकर हालिया संघर्ष तक 28 महीनों में बसने वालों की हिंसा में कम से कम 24 फिलिस्तीनियों की मौत हुई है। वेस्ट बैंक में बढ़ता तनाव वेस्ट बैंक में लगभग 30 लाख फिलिस्तीनी रहते हैं, जबकि करीब पांच लाख इजरायली भी विभिन्न बस्तियों और चौकियों में बसे हुए हैं। अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार इन बस्तियों को अवैध माना जाता है, लेकिन इसके बावजूद यहां लगातार विस्तार और झड़पों की घटनाएं सामने आती रहती हैं। स्थानीय निवासी Ibrahim Hamayel ने बताया कि हाल ही में बसने वालों के एक समूह ने गांव के पास हमला किया, जहां कुछ लोग नकाब पहने हुए थे और उनके पास हथियार भी थे। झड़प के बाद इलाके में एक व्यक्ति की मौत हो गई और वहां अस्थायी स्मारक बनाए गए, जिन पर फिलिस्तीनी झंडे लगाए गए हैं। सेना ने तीन मौतों की पुष्टि की इजरायली सेना ने बसने वालों की हिंसा की निंदा करते हुए तीन फिलिस्तीनियों की मौत की पुष्टि की है। इनमें से एक व्यक्ति की मौत दम घुटने से हुई बताई गई, हालांकि यह स्पष्ट नहीं किया गया कि यह आंसू गैस के कारण हुआ या किसी अन्य वजह से। बढ़ रहा विस्थापन संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, 28 फरवरी को ईरान-इजरायल युद्ध शुरू होने के बाद से अब तक करीब 180 फिलिस्तीनियों को वेस्ट बैंक से बेदखल किया जा चुका है। वहीं 2026 की शुरुआत से अब तक लगभग 1,500 लोग अपने घरों से विस्थापित हो चुके हैं। यूरोपीय संघ ने भी इस स्थिति पर चिंता जताते हुए कहा है कि वेस्ट बैंक में बढ़ती हिंसा और संपत्तियों के नुकसान की घटनाएं अस्वीकार्य हैं। लगातार बढ़ रहे हमलों के कारण कई फिलिस्तीनी समुदायों की रोजी-रोटी और सुरक्षा पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है।
देश में इच्छामृत्यु को लेकर एक बेहद संवेदनशील और ऐतिहासिक फैसला सामने आया है। Supreme Court of India ने गाजियाबाद के 31 वर्षीय Harish Rana को पैसिव यूथेनेशिया (इच्छामृत्यु) की अनुमति दे दी है। यह देश के उन दुर्लभ मामलों में से एक माना जा रहा है, जहां लंबे समय से अचेत अवस्था में जी रहे मरीज के लिए अदालत ने मानवीय आधार पर ऐसा फैसला सुनाया है। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि हरीश राणा के ठीक होने की कोई चिकित्सकीय संभावना नहीं बची है और उन्हें जीवनरक्षक उपकरणों पर बनाए रखना केवल पीड़ा को लंबा करने जैसा है। 13 साल से अचेत अवस्था में जीवन गाजियाबाद के रहने वाले हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में हैं। वर्ष 2013 में हुए एक हादसे के बाद से वे बिस्तर पर पड़े हैं और पूरी तरह दूसरों पर निर्भर हैं। डॉक्टरों के मुताबिक उनके मस्तिष्क को इतनी गंभीर चोट पहुंची थी कि उनके दिमाग की नसें लगभग निष्क्रिय हो चुकी हैं। वर्तमान में उनकी स्थिति ऐसी है कि वे न बोल सकते हैं, न सुन सकते हैं और न ही किसी चीज़ को महसूस कर पाते हैं। कभी-कभी पलक झपकना ही उनके जीवित होने का एकमात्र संकेत माना जाता है। एक हादसे ने बदल दी पूरी जिंदगी हरीश राणा कभी एक होनहार और ऊर्जा से भरे युवा थे। वे Chandigarh University में सिविल इंजीनियरिंग के छात्र थे। पढ़ाई के साथ-साथ उन्हें बॉडीबिल्डिंग का भी शौक था और वे अपनी फिटनेस को लेकर बेहद सजग रहते थे। लेकिन 20 अगस्त 2013 को हुई एक दुर्घटना ने उनकी जिंदगी को पूरी तरह बदल दिया। उस दिन वे अपने पीजी (पेइंग गेस्ट) की चौथी मंजिल से अचानक नीचे गिर गए। इस हादसे में उनके सिर पर गंभीर चोट आई, जिसके बाद वे कोमा जैसी स्थिति में चले गए। बेटे को बचाने के लिए माता-पिता का लंबा संघर्ष हादसे के बाद हरीश के पिता अशोक राणा और उनकी मां ने बेटे को बचाने के लिए हर संभव कोशिश की। इलाज के लिए उन्हें देश के कई बड़े अस्पतालों में ले जाया गया। हरीश का इलाज Postgraduate Institute of Medical Education and Research (पीजीआई चंडीगढ़), All India Institute of Medical Sciences (एम्स, नई दिल्ली) और कई निजी अस्पतालों में कराया गया। परिवार ने वर्षों तक उम्मीद नहीं छोड़ी, लेकिन डॉक्टरों ने साफ कर दिया कि हरीश के ठीक होने की संभावना लगभग समाप्त हो चुकी है। माता-पिता की पीड़ा और अदालत का दरवाजा समय के साथ-साथ बेटे की हालत में कोई सुधार नहीं हुआ। 100 प्रतिशत दिव्यांगता से जूझ रहे अपने बेटे की दशा देखकर माता-पिता मानसिक रूप से टूट चुके थे। आखिरकार उन्होंने भारी मन से सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और अदालत से पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति देने की अपील की। उनका कहना था कि बेटे को इस तरह पीड़ा भरे जीवन में बनाए रखना मानवीय नहीं है। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने हरीश के माता-पिता से सीधे बातचीत भी की और उनकी भावनाओं तथा परिस्थितियों को समझने की कोशिश की। सभी मेडिकल रिपोर्ट और विशेषज्ञों की राय पर विचार करने के बाद अदालत ने यह फैसला सुनाया। क्या होता है पैसिव यूथेनेशिया पैसिव यूथेनेशिया का मतलब होता है कि मरीज को जीवित रखने के लिए दिए जा रहे कृत्रिम जीवनरक्षक उपकरण या उपचार को हटा लिया जाए, ताकि प्राकृतिक रूप से जीवन की प्रक्रिया समाप्त हो सके। भारत में यह बेहद संवेदनशील और कानूनी रूप से नियंत्रित प्रक्रिया है, जिसे केवल विशेष परिस्थितियों में अदालत की अनुमति से ही लागू किया जा सकता है। एक परिवार की पीड़ा की कहानी हरीश राणा का मामला केवल कानूनी या चिकित्सकीय बहस नहीं, बल्कि एक परिवार के लंबे संघर्ष और भावनात्मक पीड़ा की कहानी भी है। पिछले 13 वर्षों से माता-पिता ने उम्मीद के सहारे बेटे की देखभाल की, लेकिन जब सभी रास्ते बंद हो गए तो उन्होंने भारी मन से उसे इस अंतहीन पीड़ा से मुक्त करने का फैसला किया। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला देश में इच्छामृत्यु से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण मिसाल के रूप में देखा जा रहा है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।