Human Rights

Emergency responders assist after a man set himself on fire outside the United Nations headquarters in New York during an apparent protest linked to Tibet.
UN मुख्यालय के बाहर आत्मदाह: तिब्बती झंडा लेकर पहुंचे व्यक्ति ने लगाई आग, इलाज के दौरान मौत

न्यूयॉर्क: अमेरिका के न्यूयॉर्क स्थित संयुक्त राष्ट्र (UN) मुख्यालय के बाहर गुरुवार को एक व्यक्ति ने कथित तौर पर खुद को आग लगा ली। गंभीर रूप से झुलसे 52 वर्षीय व्यक्ति को तत्काल अस्पताल पहुंचाया गया, जहां इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई। घटना के बाद इलाके में सुरक्षा बढ़ा दी गई और पुलिस ने जांच शुरू कर दी है। बौद्ध भिक्षु जैसे वस्त्र पहनकर पहुंचा था व्यक्ति प्रत्यक्षदर्शियों और सामने आए वीडियो के अनुसार, व्यक्ति पारंपरिक बौद्ध भिक्षु जैसे वस्त्र पहने हुए था। उसने पहले फुटपाथ पर तिब्बती झंडा रखा और फिर खुद को आग के हवाले कर दिया। कुछ ही सेकंड में वह सड़क पर गिर पड़ा। मौके पर मौजूद लोगों ने तुरंत पुलिस और आपातकालीन सेवाओं को सूचना दी। 'चीन तिब्बत छोड़ो' लिखे पर्चे बरामद न्यूयॉर्क पुलिस विभाग (NYPD) के अनुसार, घटनास्थल से "China Out of Tibet" (चीन तिब्बत छोड़ो) लिखे कई पर्चे बरामद किए गए हैं। शुरुआती जांच में घटना को तिब्बत से जुड़े विरोध प्रदर्शन से जोड़कर देखा जा रहा है, पुलिस ने अभी तक किसी आधिकारिक निष्कर्ष की पुष्टि नहीं की है। मृतक की पहचान फिलहाल सार्वजनिक नहीं की गई है, क्योंकि पहले उसके परिजनों को सूचना देना जरूरी है। 20 वर्षों से अमेरिका में रहने का दावा कुछ मीडिया रिपोर्टों में मृतक की पहचान लोबगा रांगजेन के रूप में की गई है। बताया गया है कि वह लगभग 20 वर्षों से अमेरिका में रह रहा था। अधिकारियों ने अभी तक इस पहचान की आधिकारिक पुष्टि नहीं की है। UN ने क्या कहा? संयुक्त राष्ट्र के प्रवक्ता ने बताया कि घटना उस समय हुई जब दिनभर की आधिकारिक बैठकें समाप्त हो चुकी थीं। इसलिए इस घटना का संयुक्त राष्ट्र के नियमित कामकाज पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। तिब्बत मुद्दे पर पहले भी हो चुके हैं आत्मदाह तिब्बत से जुड़े संगठनों के अनुसार, वर्ष 2009 से अब तक 150 से अधिक तिब्बती चीन के शासन के विरोध में आत्मदाह कर चुके हैं। इनमें बौद्ध भिक्षु, साध्वियां, छात्र, किसान और आम नागरिक शामिल रहे हैं। तिब्बती संगठनों का कहना है कि ऐसे विरोध प्रदर्शन धार्मिक स्वतंत्रता, सांस्कृतिक पहचान की रक्षा, तिब्बती भाषा के संरक्षण और दलाई लामा की तिब्बत वापसी जैसी मांगों से जुड़े रहे हैं। वहीं, चीन का आरोप है कि इन घटनाओं के पीछे निर्वासित तिब्बती नेतृत्व लोगों को उकसाता है। दूसरी ओर, निर्वासित तिब्बती प्रशासन इन आरोपों को खारिज करते हुए कहता है कि लोग चीन की नीतियों और बढ़ते सरकारी दबाव के विरोध में ऐसा कदम उठाते हैं। जांच जारी न्यूयॉर्क पुलिस ने मामले की जांच शुरू कर दी है। अधिकारी आत्मदाह के पीछे की परिस्थितियों, घटनास्थल से मिले दस्तावेजों और उपलब्ध वीडियो फुटेज की जांच कर रहे हैं। फिलहाल घटना के कारणों को लेकर कोई आधिकारिक निष्कर्ष जारी नहीं किया गया है।  

Deepshikha जुलाई 3, 2026 0
Thousands of protesters gather at Eidgah Ground in Rawalakot, Pakistan-administered Kashmir, demanding rights and protesting against the Pakistan government amid a growing political movement.
PoK में पाकिस्तान के खिलाफ उबाल, हजारों लोगों का प्रदर्शन; JAAC प्रमुख शौकत नवाज गिरफ्तार

  इस्लामाबाद/रावलकोट: पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) में पाकिस्तान सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन तेज हो गए हैं। मंगलवार को रावलकोट के ईदगाह ग्राउंड में हजारों लोग एकत्र हुए और पाकिस्तान सरकार के खिलाफ जमकर नारेबाजी की। प्रदर्शनकारियों ने दावा किया कि PoK पाकिस्तान का हिस्सा नहीं है और स्थानीय लोगों के अधिकारों की अनदेखी की जा रही है। यह आंदोलन जम्मू-कश्मीर अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) के नेतृत्व में चल रहा है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, JAAC के प्रमुख शौकत नवाज मीर को उनके दो सहयोगियों के साथ धीरकोट के सांगर फत्तारे इलाके से गिरफ्तार कर लिया गया। इसके अलावा JAAC के 600 से अधिक नेताओं और कार्यकर्ताओं को भी हिरासत में लिया गया है। शौकत नवाज पर था एक करोड़ रुपये का इनाम रिपोर्ट्स के मुताबिक, पाकिस्तान सरकार ने शौकत नवाज मीर और अन्य JAAC नेताओं की सूचना देने वालों के लिए एक करोड़ रुपये के इनाम की घोषणा की थी। गिरफ्तारी के बाद इलाके में सुरक्षा व्यवस्था और कड़ी कर दी गई है। 'हमें नहीं, पाकिस्तान को हमारी जरूरत' प्रदर्शन को संबोधित करते हुए JAAC नेता सरदार अमन खान ने पाकिस्तान सरकार पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि सरकार आंदोलन को दबाने के लिए जानबूझकर आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति रोक रही है। उन्होंने कहा, "हमें आपके राशन की जरूरत नहीं है, बल्कि आपको हमारी जरूरत है। यदि जरूरी सामान की सप्लाई नहीं हुई तो लोग जिंदा रहने के लिए दूसरा रास्ता चुनने को मजबूर होंगे।" महंगाई से शुरू हुआ आंदोलन, अब बना राजनीतिक विरोध बताया जा रहा है कि यह आंदोलन शुरुआत में महंगाई, खाद्य संकट, बढ़ती कीमतों और स्थानीय प्रशासन की नीतियों के खिलाफ शुरू हुआ था। अब यह पाकिस्तान सरकार के खिलाफ व्यापक राजनीतिक विरोध में बदल गया है। हाल ही में पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ द्वारा रावलकोट और मीरपुर के लोगों को "असल कश्मीरी नहीं" बताए जाने के बाद लोगों में नाराजगी और बढ़ गई। JAAC पर प्रतिबंध, आतंकवाद विरोधी कानून के तहत कार्रवाई रिपोर्ट्स के अनुसार, पाकिस्तान सरकार ने 5 जून को JAAC पर आतंकवाद विरोधी कानून के तहत प्रतिबंध लगा दिया था। इसके बाद संगठन के कई नेताओं और कार्यकर्ताओं के खिलाफ आतंकवाद निरोधक कानून के तहत मुकदमे दर्ज किए गए हैं। इंटरनेट सेवाएं प्रभावित, 22 लोगों की मौत का दावा स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, जून की शुरुआत से PoK के कई हिस्सों में इंटरनेट सेवाएं सीमित कर दी गई हैं। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि आंदोलन की तस्वीरें और वीडियो बाहर जाने से रोकने के लिए ऐसा किया गया। दावा किया जा रहा है कि पिछले दो सप्ताह के दौरान प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच हुई झड़पों में 22 लोगों की मौत हुई है। इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है। 27 जुलाई को होंगे विधानसभा चुनाव पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में 27 जुलाई को विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं। विधानसभा में कुल 53 सीटें हैं, जिनमें 45 सीटों पर प्रत्यक्ष चुनावहोंगे, जबकि 8 सीटें महिलाओं, तकनीकी विशेषज्ञों और धार्मिक विद्वानों के लिए आरक्षित हैं। चुनाव से पहले बढ़ते विरोध प्रदर्शनों और राजनीतिक तनाव ने क्षेत्र की सुरक्षा और राजनीतिक स्थिति को लेकर नई चिंताएं खड़ी कर दी हैं।  

Deepshikha जुलाई 1, 2026 0
French woman and her five children rescued in Pakistan after allegedly living in isolation for nearly a decade.
पाकिस्तान में 10 साल तक कथित कैद में रही फ्रांसीसी महिला और पांच बच्चों को मिली आजादी, बेटे की बहादुरी से खुला राज

  इस्लामाबाद: पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रांत से एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जहां एक फ्रांसीसी महिला और उसके पांच बच्चे कथित तौर पर लगभग एक दशक तक अलग-थलग और कैद जैसी परिस्थितियों में रहने को मजबूर रहे। परिवार को तब राहत मिली, जब महिला के एक बेटे ने किसी तरह घर से बाहर निकलकर पुलिस को सूचना दी। इसके बाद पुलिस ने कार्रवाई करते हुए पूरे परिवार को सुरक्षित बाहर निकाला। पुलिस और स्थानीय मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, यह मामला खैबर पख्तूनख्वा के पहाड़ी क्षेत्र बारा का है। अधिकारियों का कहना है कि परिवार को लंबे समय तक बाहरी दुनिया से काटकर रखा गया था और महिला के पति पर शारीरिक व मानसिक उत्पीड़न के गंभीर आरोप लगे हैं। बेटे ने पुलिस तक पहुंचाई जानकारी अधिकारियों के मुताबिक, परिवार के एक बच्चे ने साहस दिखाते हुए घर से बाहर निकलकर पुलिस को अपनी स्थिति के बारे में बताया। सूचना मिलने के बाद 18 जून को पुलिस ने संबंधित घर पर छापा मारा। जब पुलिस मौके पर पहुंची तो 54 वर्षीय फ्रांसीसी नागरिक सिल्वी यास्मीना और उनके पांच बच्चे एक छोटे और जर्जर कमरे में रह रहे थे। पुलिस ने बताया कि परिवार की हालत बेहद खराब थी और कुछ सदस्यों के शरीर पर चोट के निशान भी पाए गए। रेस्क्यू के बाद सभी को तत्काल पेशावर स्थित महिला आश्रय गृह में भेजा गया, जहां उन्हें चिकित्सा और अन्य आवश्यक सहायता उपलब्ध कराई जा रही है। महिला ने लगाए गंभीर आरोप जांच के दौरान सिल्वी यास्मीना ने अपने पति पर कई गंभीर आरोप लगाए। उनका कहना है कि उन्हें और उनके बच्चों को वर्षों तक स्वतंत्र रूप से जीवन जीने का अधिकार नहीं मिला। महिला के अनुसार, परिवार को लगातार भय और दबाव में रखा गया तथा पति द्वारा नियमित रूप से शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना दी जाती थी। उन्होंने जांचकर्ताओं को बताया कि उन्हें लगने लगा था कि उनका और उनके बच्चों का भविष्य पूरी तरह अंधकारमय हो चुका है। महिला ने कहा कि परिवार को बाहरी दुनिया से लगभग पूरी तरह अलग कर दिया गया था। बच्चों की पढ़ाई भी हुई प्रभावित पुलिस अधिकारियों के अनुसार, परिवार के सदस्यों को अन्य लोगों से मिलने-जुलने की अनुमति नहीं थी। महिला ने बताया कि 2014 में ऑस्ट्रेलिया से पाकिस्तान आने के बाद परिवार पर कड़े प्रतिबंध लगा दिए गए थे। जानकारी के मुताबिक, परिवार के दो बड़े बच्चों की शिक्षा बीच में ही छूट गई, जबकि पाकिस्तान में जन्मे तीन छोटे बच्चों का कभी किसी स्कूल में दाखिला नहीं कराया गया। अधिकारियों का कहना है कि बच्चों के सामाजिक और शैक्षणिक विकास पर इसका गंभीर असर पड़ा है। ऑस्ट्रेलिया में हुई थी शादी पाकिस्तानी अधिकारियों के अनुसार, सिल्वी यास्मीना और उनके पति की मुलाकात ऑस्ट्रेलिया में हुई थी। दोनों ने वर्ष 2003 में विवाह किया था और कुछ वर्षों तक वहीं रहे। बाद में 2014 में परिवार अपने दो बड़े बच्चों के साथ पाकिस्तान आ गया। पुलिस अब यह जांच कर रही है कि पाकिस्तान आने के बाद परिवार किन परिस्थितियों में रह रहा था और कथित उत्पीड़न कब से शुरू हुआ। पति हिरासत में, जांच जारी पुलिस ने महिला के पति को हिरासत में ले लिया है और मामले की विस्तृत जांच शुरू कर दी गई है। अधिकारियों का कहना है कि विभिन्न सबूत जुटाए जा रहे हैं तथा मामले से जुड़े अन्य लोगों से भी पूछताछ की जा रही है। इस बीच, फ्रांसीसी दूतावास को भी मामले की जानकारी दे दी गई है। महिला और उनके बच्चों ने फ्रांस लौटने की इच्छा जताई है। संबंधित अधिकारियों के बीच उनकी वापसी को लेकर प्रक्रिया शुरू की जा सकती है। मानवाधिकारों को लेकर उठे सवाल इस घटना ने पाकिस्तान में महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा तथा मानवाधिकारों से जुड़े मुद्दों पर एक बार फिर बहस छेड़ दी है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि आरोप सही साबित होते हैं, तो यह लंबे समय तक घरेलू हिंसा और सामाजिक अलगाव का एक गंभीर मामला माना जाएगा। पुलिस का कहना है कि जांच पूरी होने के बाद आरोपों के आधार पर आगे की कानूनी कार्रवाई की जाएगी।  

Deepshikha जून 25, 2026 0
Baloch human rights activist Mahrang Baloch appears at a court hearing after being sentenced to life imprisonment in Pakistan.
पाकिस्तान में बलोच मानवाधिकार कार्यकर्ता महरंग बलोच को उम्रकैद, फैसले पर उठा विवाद

  पाकिस्तान की एक विशेष अदालत ने चर्चित बलोच मानवाधिकार कार्यकर्ता महरंग बलोच और उनके दो सहयोगियों को हत्या तथा आतंकवाद से जुड़े मामले में दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई है। क्वेटा स्थित एंटी-टेररिज्म कोर्ट ने यह फैसला सुनाते हुए महरंग बलोच, सिबगतुल्लाह और बलाच कादिर को दोषी माना। अदालत के फैसले के बाद पाकिस्तान में मानवाधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और न्यायिक प्रक्रिया को लेकर नई बहस शुरू हो गई है। भीड़ को उकसाने का आरोप जांच एजेंसियों के अनुसार, तीनों आरोपियों ने कथित रूप से एक भीड़ को उकसाया था, जिसने अर्धसैनिक बल के जवान शब्बीर अहमद पर हमला कर उनकी हत्या कर दी थी। अभियोजन पक्ष ने अदालत में दावा किया कि घटना के दौरान हिंसा फैलाने और सुरक्षा बलों के खिलाफ माहौल बनाने में आरोपियों की भूमिका थी। इन्हीं आरोपों के आधार पर अदालत ने उन्हें हत्या और आतंकवाद से संबंधित धाराओं के तहत दोषी ठहराया। कौन हैं महरंग बलोच? 33 वर्षीय महरंग बलोच बलूचिस्तान की प्रमुख मानवाधिकार कार्यकर्ताओं में गिनी जाती हैं। वह बलोच यकजेहती कमेटी (BYC) की प्रमुख हैं और लंबे समय से बलूचिस्तान में कथित जबरन गुमशुदगी, मानवाधिकार उल्लंघन और नागरिक अधिकारों से जुड़े मुद्दों को उठाती रही हैं। महरंग बलोच को पिछले वर्ष मार्च में कई अन्य कार्यकर्ताओं के साथ गिरफ्तार किया गया था। उनकी गिरफ्तारी के बाद देश और विदेश में कई मानवाधिकार संगठनों ने चिंता जताई थी। मानवाधिकार आयोग ने उठाए सवाल फैसले के बाद पाकिस्तान मानवाधिकार आयोग ने मामले की स्वतंत्र समीक्षा की मांग की है। आयोग का कहना है कि मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के खिलाफ अपनाया जा रहा रवैया चिंता का विषय है और यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि न्यायिक प्रक्रिया निष्पक्ष और पारदर्शी हो। आयोग ने कहा कि मानवाधिकारों की वकालत करने वाले लोगों के साथ चरमपंथियों जैसा व्यवहार किए जाने की धारणा लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए नुकसानदायक हो सकती है। BYC ने फैसले को बताया राजनीतिक बलोच यकजेहती कमेटी (BYC) ने अदालत के फैसले की कड़ी आलोचना की है। संगठन का आरोप है कि यह फैसला बलोच समुदाय की आवाज दबाने और मानवाधिकार आंदोलनों को कमजोर करने की कोशिश है। संगठन ने कहा कि महरंग बलोच लंबे समय से शांतिपूर्ण तरीके से अपने समुदाय के अधिकारों के लिए आवाज उठाती रही हैं और उनके खिलाफ कार्रवाई को राजनीतिक दृष्टि से देखा जाना चाहिए। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी प्रतिक्रिया स्वीडन की पर्यावरण कार्यकर्ता Greta Thunberg ने भी इस फैसले की आलोचना की है। उन्होंने मुकदमे को न्याय का मजाक बताते हुए मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के खिलाफ कार्रवाई पर सवाल उठाए। इसके अलावा कई अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने भी मामले पर चिंता व्यक्त की है और पाकिस्तान सरकार से निष्पक्ष न्यायिक प्रक्रिया सुनिश्चित करने की अपील की है। मानवाधिकार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर बढ़ी बहस महरंग बलोच को सजा सुनाए जाने के बाद पाकिस्तान में मानवाधिकारों, नागरिक स्वतंत्रताओं और अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर बहस तेज हो गई है। एक ओर सरकार और जांच एजेंसियां इसे कानून के अनुसार हुई कार्रवाई बता रही हैं, वहीं मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि असहमति की आवाजों को दबाने की धारणा लोकतांत्रिक संस्थाओं के लिए चुनौती बन सकती है। विश्लेषकों का मानना है कि इस मामले का प्रभाव केवल बलूचिस्तान तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पाकिस्तान में मानवाधिकार और राजनीतिक स्वतंत्रता को लेकर चल रही व्यापक बहस को भी प्रभावित करेगा।  

Deepshikha जून 24, 2026 0
Women protest in Herat as rights concerns grow amid disputed crackdown allegations.
अफगानिस्तान में महिलाओं के प्रदर्शन पर बल प्रयोग के आरोप, UN ने तालिबान की कार्रवाई पर जताई चिंता

  काबुल/हेरात: अफगानिस्तान के पश्चिमी शहर हेरात में महिलाओं के विरोध प्रदर्शन के दौरान बल प्रयोग और गोलीबारी के आरोपों को लेकर विवाद गहरा गया है। संयुक्त राष्ट्र से जुड़े स्वतंत्र मानवाधिकार विशेषज्ञों ने इस घटना पर चिंता व्यक्त करते हुए तालिबान प्रशासन की आलोचना की है। विशेषज्ञों के अनुसार, प्रदर्शन के दौरान कम से कम दो लोगों की मौत हुई और 20 से अधिक लोग घायल हुए। हालांकि, इन आंकड़ों की स्वतंत्र पुष्टि सीमित है। रिपोर्टों के मुताबिक, हेरात में तालिबान की नैतिकता पुलिस (Morality Police) द्वारा कथित तौर पर उन महिलाओं के खिलाफ कार्रवाई की गई, जिन पर निर्धारित ड्रेस कोड का पालन नहीं करने का आरोप था। इसके बाद महिलाओं ने विरोध प्रदर्शन किया, जिसके दौरान सुरक्षा बलों द्वारा बल प्रयोग किए जाने के आरोप सामने आए। UN विशेषज्ञों ने जताई चिंता संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (UNHRC) द्वारा नियुक्त स्वतंत्र विशेषज्ञों के एक समूह ने जारी बयान में कहा कि महिलाओं को ड्रेस कोड के कथित उल्लंघन के आधार पर हिरासत में लिए जाने की खबरें गंभीर चिंता का विषय हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि महिलाओं को अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता या भेदभाव से मुक्त रहने के अधिकार का उपयोग करने के कारण दंडित किया गया है, तो यह अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों के अनुरूप नहीं माना जा सकता। गोलीबारी को लेकर अलग-अलग दावे प्रत्यक्षदर्शियों और स्थानीय स्रोतों ने दावा किया है कि प्रदर्शन को तितर-बितर करने के दौरान सुरक्षा बलों ने गोलीबारी की। कुछ रिपोर्टों में एक बच्चे की मौत का भी दावा किया गया है। तालिबान प्रशासन और स्थानीय पुलिस अधिकारियों ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि प्रदर्शन के दौरान किसी प्रकार के हथियार का इस्तेमाल नहीं किया गया। इस कारण घटना को लेकर दोनों पक्षों के दावों में स्पष्ट अंतर बना हुआ है। ड्रेस कोड को लेकर जारी है विवाद अफगानिस्तान में महिलाओं के पहनावे से जुड़े नियम सदाचार के प्रसार और बुराई की रोकथाम मंत्रालय (PVPV) के तहत लागू किए जाते हैं। वर्तमान नियमों के अनुसार महिलाओं को सार्वजनिक स्थानों पर शरीर को पूरी तरह ढकने वाले वस्त्र पहनने की सलाह दी जाती है। कई महिलाएं पारंपरिक बुर्के की बजाय अबाया, हिजाब या अन्य ढीले-ढाले परिधानों का उपयोग करती हैं। हाल के महीनों में ड्रेस कोड के पालन को लेकर निगरानी और कार्रवाई बढ़ने की खबरों के बाद महिलाओं के अधिकारों को लेकर बहस तेज हुई है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजर हेरात की घटना ने एक बार फिर अफगानिस्तान में महिलाओं के अधिकारों और नागरिक स्वतंत्रताओं को लेकर अंतरराष्ट्रीय चिंता बढ़ा दी है। मानवाधिकार संगठनों और संयुक्त राष्ट्र से जुड़े विशेषज्ञों ने घटना की निष्पक्ष जांच और नागरिकों के अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग की है। फिलहाल घटना से जुड़े मौतों और घायलों के आंकड़ों तथा सुरक्षा बलों की भूमिका को लेकर अलग-अलग दावे सामने आ रहे हैं। स्वतंत्र जांच या आधिकारिक सत्यापन के बाद ही स्थिति की पूरी तस्वीर स्पष्ट हो सकेगी।  

Deepshikha जून 12, 2026 0
Protesters gather in Rawalakot as demonstrations over economic demands escalate in PoK.
POK के रावलकोट में प्रदर्शन के दौरान गोलीबारी, 16 लोगों की मौत का दावा; कई घायल

  रावलकोट: पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (POK) के रावलकोट में प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच तनाव हिंसक रूप लेता नजर आया। स्थानीय सूत्रों और प्रदर्शनकारी संगठनों के अनुसार, प्रदर्शन के दौरान पाकिस्तानी सेना और रेंजर्स की कथित गोलीबारी में कम से कम 16 लोगों की मौत हो गई, जबकि 37 से अधिक लोग घायल हुए हैं। इन आंकड़ों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है। रिपोर्टों के मुताबिक, रावलकोट के ईदगाह मैदान में हजारों लोग महंगाई, बिजली दरों में वृद्धि और बुनियादी राजनीतिक एवं आर्थिक अधिकारों की मांग को लेकर एकत्र हुए थे। प्रदर्शन के दौरान हालात तनावपूर्ण हो गए और सुरक्षा बलों द्वारा बल प्रयोग किए जाने के आरोप लगाए गए। घटना के बाद मौके पर अफरा-तफरी मच गई तथा घायलों को नजदीकी अस्पतालों में भर्ती कराया गया। कई दिनों से जारी है आंदोलन POK में पिछले कई दिनों से सस्ती बिजली, सब्सिडी वाले खाद्यान्न और अधिक प्रशासनिक अधिकारों की मांग को लेकर आंदोलन जारी है। प्रदर्शनकारी संगठनों का कहना है कि बढ़ती महंगाई और आर्थिक चुनौतियों के कारण आम लोगों का असंतोष लगातार बढ़ रहा है। हाल के दिनों में जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) पर लगाए गए प्रतिबंधों और आंदोलन से जुड़े कई कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी के बाद क्षेत्र में तनाव और बढ़ गया है। स्थानीय रिपोर्टों के अनुसार, प्रशासन ने कुछ इलाकों में इंटरनेट सेवाएं भी बंद कर दी हैं। रावलकोट घटना के बाद विरोध प्रदर्शन तेज रावलकोट की घटना के बाद खाई गाला समेत कई इलाकों में विरोध प्रदर्शन तेज हो गए हैं। कई बाजार बंद रहे और लोगों ने सुरक्षा बलों की कार्रवाई के खिलाफ मार्च निकाले। महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों की भी इन प्रदर्शनों में भागीदारी देखी गई। प्रदर्शनकारी नेताओं का दावा है कि 5 जून से जारी आंदोलन के दौरान अब तक 53 नागरिकों की मौत हो चुकी है। इस संख्या की भी स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है। नेताओं ने कहा है कि वे आर्थिक राहत और लोकतांत्रिक अधिकारों की मांग को लेकर अपना आंदोलन जारी रखेंगे। भारत की प्रतिक्रिया भारत ने घटना पर प्रतिक्रिया देते हुए इसकी कड़ी निंदा की है। भारत ने इसे गंभीर मानवाधिकार मुद्दा बताते हुए कहा कि यह पाकिस्तान के नियंत्रण वाले क्षेत्रों में नागरिक अधिकारों की स्थिति पर सवाल खड़े करता है। साथ ही अंतरराष्ट्रीय समुदाय से मामले का संज्ञान लेने और प्रभावित लोगों के अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की अपील की गई है। फिलहाल क्षेत्र में तनाव बना हुआ है और स्थिति पर सभी पक्षों की नजर है। घटना से जुड़े दावों और हताहतों के आंकड़ों की स्वतंत्र पुष्टि का इंतजार किया जा रहा है।  

Deepshikha जून 12, 2026 0
Andrew Malkinson after exoneration following 17 years in prison for a wrongful conviction in the UK.
17 साल जेल में रहा बेगुनाह, 23 साल बाद पकड़ा गया असली दोषी; ब्रिटेन की न्याय व्यवस्था पर उठे सवाल

  लंदन: ब्रिटेन में न्यायिक व्यवस्था की सबसे बड़ी भूलों में गिने जा रहे एक मामले ने एक बार फिर सुर्खियां बटोर ली हैं। एंड्रयू माल्किंसन नामक व्यक्ति ने जिस अपराध को कभी स्वीकार नहीं किया, उसी के लिए 17 साल जेल में बिताए। अब 23 साल बाद उस अपराध के वास्तविक दोषी को सजा मिलने के बाद यह मामला फिर चर्चा में है। 2003 की घटना से शुरू हुई पूरी कहानी मामला वर्ष 2003 का है, जब ग्रेटर मैनचेस्टर में एक महिला के साथ दुष्कर्म की घटना हुई थी। जांच के दौरान पीड़िता ने पहचान परेड में एंड्रयू माल्किंसन की पहचान की, जिसके बाद उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। 2004 में अदालत ने माल्किंसन को दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई। उन्होंने शुरुआत से ही खुद को निर्दोष बताया और अपराध स्वीकार करने से इनकार कर दिया। बेगुनाही की जिद ने बढ़ाई जेल की अवधि माल्किंसन ने कभी अपराध स्वीकार नहीं किया। यही वजह रही कि उन्हें सजा में राहत नहीं मिली और वे 17 साल तक जेल में रहे। वर्ष 2020 में रिहा होने के बाद भी उनका नाम यौन अपराधियों के रजिस्टर में दर्ज रहा। रिहाई के बाद उन्होंने अपनी बेगुनाही साबित करने की कानूनी लड़ाई जारी रखी। डीएनए जांच ने पलट दिया पूरा मामला मामले में बड़ा मोड़ तब आया जब आधुनिक डीएनए तकनीक की मदद से पुराने सबूतों की दोबारा जांच कराई गई। जांच में मिले नए वैज्ञानिक साक्ष्य सीधे पॉल क्विन नामक व्यक्ति की ओर इशारा कर रहे थे। इसके बाद जुलाई 2023 में कोर्ट ऑफ अपील ने एंड्रयू माल्किंसन की सजा रद्द कर दी और उन्हें आधिकारिक रूप से निर्दोष घोषित कर दिया। 23 साल तक आजाद रहा असली अपराधी डीएनए सबूतों के आधार पर पॉल क्विन के खिलाफ मुकदमा चलाया गया। लंबी सुनवाई के बाद अदालत ने उसे दोषी करार देते हुए 21 साल की जेल की सजा सुनाई है। अदालत ने कहा कि क्विन ने अपनी स्वतंत्रता का लाभ उठाया, जबकि एक निर्दोष व्यक्ति वर्षों तक जेल में रहा। पीड़िता को दो बार देना पड़ा बयान मामले की पीड़िता को अलग-अलग समय पर दो मुकदमों में गवाही देनी पड़ी। अदालत ने उनके साहस की सराहना करते हुए उन्हें "असाधारण रूप से बहादुर" बताया। इस मामले ने न केवल न्यायिक भूल को उजागर किया, बल्कि पीड़िता के लंबे संघर्ष को भी सामने रखा। अब मुआवजे की लड़ाई लड़ रहे हैं माल्किंसन निर्दोष साबित होने के बाद माल्किंसन अब ब्रिटिश सरकार से मुआवजे की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि उनके जीवन के 17 महत्वपूर्ण वर्ष गलत सजा की वजह से बर्बाद हो गए। उनकी कानूनी टीम न्यायिक भूल के शिकार लोगों के लिए बेहतर मुआवजा व्यवस्था की भी मांग कर रही है। जांच के घेरे में पुलिस और न्यायिक संस्थाएं मामले के बाद पुलिस और न्यायिक संस्थाओं की भूमिका पर भी सवाल उठे हैं। समीक्षा रिपोर्ट में कई ऐसी कमियां सामने आईं, जिनकी वजह से माल्किंसन को वर्षों पहले ही निर्दोष साबित किया जा सकता था। ग्रेटर मैनचेस्टर पुलिस के कई अधिकारियों की भूमिका की जांच की जा रही है, जबकि कुछ वरिष्ठ अधिकारियों ने अपने पदों से इस्तीफा भी दिया है। ब्रिटेन के लिए बड़ा सबक एंड्रयू माल्किंसन का मामला केवल एक व्यक्ति की त्रासदी नहीं, बल्कि न्याय व्यवस्था की जवाबदेही का भी सवाल बन गया है। असली अपराधी को सजा मिल चुकी है, लेकिन माल्किंसन के जीवन के वे 17 साल वापस नहीं लौट सकते, जो उन्होंने एक ऐसे अपराध की सजा काटते हुए गंवा दिए, जिसे उन्होंने कभी किया ही नहीं था।  

Deepshikha जून 6, 2026 0
Lahore High Court upholds death sentences in Pakistan’s 2020 motorway gang rape case
मोटरवे गैंगरेप केस में दोषियों को राहत नहीं, हाई कोर्ट ने बरकरार रखी फांसी की सजा

  पाकिस्तान के चर्चित मोटरवे गैंगरेप मामले में दोषी ठहराए गए दो आरोपियों को बड़ा झटका लगा है। लाहौर हाई कोर्ट ने उनकी अपील खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई फांसी की सजा को बरकरार रखा है। वर्ष 2020 में हुई इस घटना ने पूरे पाकिस्तान को झकझोर दिया था और देशभर में व्यापक आक्रोश देखने को मिला था। रात के सफर के दौरान बच्चों के सामने हुई थी दरिंदगी 9 सितंबर 2020 को फ्रांसीसी-पाकिस्तानी मूल की एक महिला अपने तीन बच्चों के साथ सियालकोट-लाहौर मोटरवे से गुजर रही थी। देर रात कार का ईंधन खत्म होने के कारण परिवार सड़क किनारे फंस गया। इसी दौरान दो हमलावर वहां पहुंचे, कार का शीशा तोड़ा और महिला को जबरन बाहर खींच लिया। आरोपियों ने बच्चों के सामने हथियार के बल पर महिला के साथ सामूहिक दुष्कर्म किया। वारदात के बाद उन्होंने नकदी, गहने और बैंक कार्ड लूटकर मौके से फरार हो गए। डीएनए और मोबाइल डेटा बने गिरफ्तारी की सबसे बड़ी कड़ी घटना के बाद पुलिस ने व्यापक जांच शुरू की। मोबाइल फोन लोकेशन, कॉल रिकॉर्ड और घटनास्थल से मिले डीएनए नमूनों के आधार पर आरोपियों की पहचान की गई। जांच के दौरान पीड़िता ने भी दोनों आरोपियों की पहचान की थी। पुलिस के अनुसार, एक आरोपी शफकत अली ने मजिस्ट्रेट के समक्ष अपना अपराध स्वीकार करने वाला बयान भी दिया था। 2021 में सुनाई गई थी मौत की सजा मामले की सुनवाई के बाद मार्च 2021 में आतंकवाद निरोधक अदालत ने आबिद अली और शफकत अली को दोषी करार दिया था। अदालत ने दोनों को सामूहिक दुष्कर्म, अपहरण, डकैती और आतंकवाद से जुड़े अपराधों में फांसी की सजा सुनाई थी। इसके अलावा उन्हें अन्य मामलों में भी लंबी जेल की सजा दी गई थी। पुलिस अधिकारी के बयान ने भी खड़ा किया था विवाद घटना के बाद उस समय के लाहौर पुलिस प्रमुख उमर शेख का बयान भी विवादों में आ गया था। उन्होंने महिला के रात में यात्रा करने और दूसरा रास्ता न चुनने को लेकर टिप्पणी की थी। इस बयान की देशभर में आलोचना हुई और इसे पीड़िता को दोषी ठहराने की कोशिश बताया गया। बचाव पक्ष की दलीलें अदालत ने नहीं मानीं हाई कोर्ट में अपील करते हुए दोषियों के वकीलों ने कहा कि अभियोजन पक्ष की कहानी में कई विरोधाभास हैं और प्रस्तुत साक्ष्य पूरी तरह भरोसेमंद नहीं हैं। उन्होंने ट्रायल कोर्ट के फैसले को रद्द करने की मांग की। सरकारी पक्ष ने अदालत को बताया कि डीएनए रिपोर्ट, डिजिटल सबूत और गवाहियों के आधार पर आरोप पूरी तरह साबित होते हैं। अदालत ने इन दलीलों से सहमति जताते हुए कहा कि निचली अदालत के फैसले में हस्तक्षेप का कोई ठोस आधार नहीं है। हाई कोर्ट के फैसले के बाद मस्क की प्रतिक्रिया चर्चा में लाहौर हाई कोर्ट का फैसला आने के बाद अमेरिकी उद्योगपति Elon Musk ने सोशल मीडिया पर इसकी सराहना की। उन्होंने एक पोस्ट पर प्रतिक्रिया देते हुए पाकिस्तान को बधाई दी और कहा कि पश्चिमी देशों में भी ऐसे मामलों में कड़ी सजा का प्रावधान होना चाहिए। फैसले ने फिर छेड़ी सख्त सजा बनाम सुधार की बहस इस फैसले के बाद एक बार फिर अपराधियों को कठोर दंड देने और सुधारात्मक न्याय की अवधारणा पर बहस तेज हो गई है। जहां पाकिस्तान में अदालत ने अपराध की गंभीरता को देखते हुए फांसी की सजा बरकरार रखी, वहीं कई पश्चिमी देशों में मृत्युदंड समाप्त किया जा चुका है और वहां अपराधियों के पुनर्वास पर अधिक जोर दिया जाता है।  

Deepshikha जून 4, 2026 0
Taliban faces global criticism after Afghanistan introduces controversial marriage law affecting girls and women
अफगानिस्तान में तालिबान का नया विवाह कानून विवादों में, UN ने जताई ‘गंभीर चिंता’

Taliban सरकार द्वारा जारी नए विवाह संबंधी कानून को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तीखी आलोचना हो रही है। संयुक्त राष्ट्र ने कहा है कि इस कानून से बाल विवाह को कानूनी मान्यता मिलने का खतरा बढ़ गया है और इससे महिलाओं व लड़कियों के अधिकार और कमजोर होंगे। क्या है नया तालिबानी आदेश? अफगानिस्तान के न्याय मंत्रालय ने हाल ही में डिक्री नंबर 18 जारी की है, जिसका शीर्षक “पति-पत्नी के न्यायिक अलगाव” रखा गया है। इसमें विवाह, तलाक और वैवाहिक विवादों से जुड़े नियम तय किए गए हैं। सबसे विवादित प्रावधान यह है कि “युवावस्था” में पहुंच चुकी लड़की की चुप्पी को भी शादी के लिए उसकी सहमति माना जा सकता है। आलोचकों का कहना है कि इससे कम उम्र की लड़कियों की शादी को वैधता मिल सकती है और उनकी स्वतंत्र इच्छा को नजरअंदाज किया जा सकता है। UNAMA ने क्या कहा? United Nations Assistance Mission in Afghanistan (UNAMA) ने बयान जारी कर कहा कि इस कानून में उन लड़कियों के तलाक का भी जिक्र है जो कम उम्र में शादीशुदा हैं और अब युवावस्था में पहुंच चुकी हैं। संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि यह संकेत देता है कि तालिबान सरकार बाल विवाह को कानूनी रूप से स्वीकार कर रही है। UNAMA ने कहा कि यह कानून “पूर्ण और स्वतंत्र सहमति” के सिद्धांत को कमजोर करता है और बच्चों के हितों की रक्षा करने में विफल है। कानून में और क्या प्रावधान हैं? तालिबानी आदेश के मुताबिक, यदि किसी पिता या दादा ने किसी नाबालिग लड़की या लड़के की शादी बिना दहेज, बहुत कम दहेज या “गलत तरीके” से कर दी हो, तो ऐसी शादी को अमान्य घोषित किया जा सकता है। कानून में यह भी कहा गया है कि अगर किसी लड़की की शादी ऐसे व्यक्ति से कर दी गई हो जो उसके साथ खराब व्यवहार करता हो या बुरे फैसलों के लिए बदनाम हो, तो लड़की युवावस्था में पहुंचने के बाद अदालत में शादी रद्द कराने की मांग कर सकती है। आलोचना उस प्रावधान को लेकर ज्यादा हो रही है जिसमें कहा गया है कि अगर कोई महिला तलाक मांगती है और पति इनकार कर देता है, तो कई मामलों में पति की बात को प्राथमिकता दी जा सकती है, क्योंकि महिला के पास गवाह जुटाना मुश्किल होगा। तालिबान ने आरोपों को किया खारिज तालिबान सरकार ने संयुक्त राष्ट्र और मानवाधिकार संगठनों की आलोचना को खारिज करते हुए कहा है कि यह कानून इस्लामी सिद्धांतों के अनुरूप है। तालिबान का दावा है कि अफगानिस्तान में लड़कियों की जबरन शादी पहले से प्रतिबंधित है और नया आदेश केवल वैवाहिक मामलों के न्यायिक नियम तय करने के लिए लाया गया है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय संगठनों का कहना है कि व्यवहारिक रूप से यह कानून पुरुष अभिभावकों और पतियों को अधिक अधिकार देता है, जबकि लड़कियों की स्वतंत्र सहमति कमजोर पड़ती है। अफगानिस्तान में महिलाओं की स्थिति लगातार खराब Afghanistan में 2021 में तालिबान की सत्ता वापसी के बाद महिलाओं और लड़कियों पर कई कड़े प्रतिबंध लगाए गए हैं। लड़कियों की उच्च शिक्षा पर रोक, महिलाओं के कई नौकरियों में काम करने पर पाबंदी और सार्वजनिक जीवन में उनकी भागीदारी सीमित करने जैसे फैसले पहले ही वैश्विक आलोचना का कारण बन चुके हैं। वर्तमान में अफगानिस्तान में महिलाओं को स्कूल, कॉलेज, कई सरकारी और निजी नौकरियों, जिम, ब्यूटी सैलून और यहां तक कि कई सार्वजनिक पार्कों तक में प्रवेश से रोका जा चुका है। मानवाधिकार संगठनों की चेतावनी मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि किसी लड़की की “चुप्पी” को उसकी सहमति मानना बेहद खतरनाक सिद्धांत है। विशेषज्ञों के अनुसार, इससे परिवारों और स्थानीय दबाव के जरिए कम उम्र की लड़कियों की जबरन शादी आसान हो सकती है। उनका कहना है कि विवाह के लिए स्पष्ट और स्वतंत्र सहमति अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानून का मूल आधार है।  

surbhi मई 22, 2026 0
Pakistan Punjab Assembly debate over minority rights, temple and church funding, and welfare issues.
पाकिस्तान में हिंदुओं की अनदेखी पर बढ़ा विवाद, विधानसभा में उठा अल्पसंख्यकों के अधिकारों का मुद्दा

Pakistan के पंजाब प्रांत में अल्पसंख्यक समुदायों की उपेक्षा को लेकर राजनीतिक विवाद गहरा गया है। पंजाब विधानसभा में विधायकों ने सरकार पर आरोप लगाया कि 2025-26 के बजट में चर्चों और मंदिरों के संरक्षण के लिए कोई फंड आवंटित नहीं किया गया, जबकि अल्पसंख्यक बहुल इलाकों के विकास के लिए भी पर्याप्त राशि नहीं रखी गई। सत्तारूढ़ Pakistan Muslim League-Nawaz के सीनेटर Baba Falbus Christopher ने विधानसभा सत्र के दौरान कहा कि पंजाब में चर्चों और मंदिरों की मरम्मत व संरक्षण के लिए “एक भी पैसा” नहीं दिया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि ईसाई बहुल बस्तियों के विकास के लिए भी लगभग कोई बजट नहीं रखा गया। क्रिस्टोफर ने सरकार से मांग की कि 2026-27 के बजट में अल्पसंख्यक समुदायों के धार्मिक स्थलों और बुनियादी सुविधाओं के लिए पर्याप्त फंड आवंटित किया जाए। हिंदू विधायक ने उठाए सवाल वहीं Pakistan Peoples Party के हिंदू विधायक Basro Ji ने कहा कि दक्षिण पंजाब में बड़ी संख्या में हिंदू आबादी रहती है, लेकिन उनके लिए कोई ठोस कल्याणकारी योजना शुरू नहीं की गई। उन्होंने आरोप लगाया कि हिंदू इलाकों के विकास के लिए जो सीमित फंड रखा गया था, उसे बाद में वापस ले लिया गया। इससे समुदाय में नाराजगी बढ़ी है। स्पीकर ने भी जताई चिंता बहस के दौरान पंजाब विधानसभा के स्पीकर Malik Muhammad Ahmad Khan ने अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय के कामकाज पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि अल्पसंख्यक समुदाय आज भी: पीने के पानी सफाई स्वास्थ्य सुविधाओं जैसी बुनियादी जरूरतों से वंचित हैं। स्पीकर ने कहा कि विकास निधि का इस्तेमाल सबसे पहले इन जरूरी सुविधाओं पर होना चाहिए। मंत्री रमेश सिंह अरोड़ा की सफाई अल्पसंख्यक मामलों का मंत्रालय संभाल रहे Ramesh Singh Arora ने सरकार का बचाव करते हुए कहा कि अल्पसंख्यकों की समस्याएं 1947 से चली आ रही हैं और उन्हें “रातोंरात खत्म नहीं किया जा सकता।” उन्होंने दावा किया कि Maryam Nawaz सरकार ने पिछले दो वर्षों में अल्पसंख्यक मामलों के विभाग का बजट 300 प्रतिशत तक बढ़ाया है। हालांकि विपक्ष और अल्पसंख्यक प्रतिनिधियों का कहना है कि जमीनी स्तर पर अब भी हालात में ज्यादा सुधार दिखाई नहीं दे रहा। मानवाधिकार संगठनों ने जताई चिंता मानवाधिकार संगठन Minority Rights Group के अनुसार पाकिस्तान में हिंदू, ईसाई, अहमदी, सिख और कलाश जैसे अल्पसंख्यक समुदाय अक्सर गरीबी, भेदभाव और असुरक्षा के माहौल में जीवन बिताते हैं। संगठन का कहना है कि देश की लगभग 4 प्रतिशत आबादी होने के बावजूद इन समुदायों को कई बार “दूसरे दर्जे के नागरिक” जैसा व्यवहार झेलना पड़ता है। लगातार उठते रहे हैं अल्पसंख्यकों से जुड़े मुद्दे पाकिस्तान में लंबे समय से: धार्मिक स्थलों की सुरक्षा जबरन धर्मांतरण सामाजिक भेदभाव सीमित राजनीतिक प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दों को लेकर सवाल उठते रहे हैं। अब पंजाब विधानसभा में यह मामला जोर-शोर से उठने के बाद सरकार पर अल्पसंख्यकों के लिए ठोस कदम उठाने का दबाव बढ़ सकता है।  

surbhi मई 12, 2026 0
Former Philippine President Rodrigo Duterte faces ICC trial over crimes against humanity charges
फिलीपींस के पूर्व राष्ट्रपति रोड्रिगो दुतेर्ते पर ICC में ट्रायल तय: ‘क्राइम्स अगेंस्ट ह्यूमैनिटी’ मामले में बड़ा फैसला

द हेग में अंतरराष्ट्रीय अदालत ने आरोपों को दी मंजूरी अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (ICC) ने गुरुवार को फिलीपींस के पूर्व राष्ट्रपति रोड्रिगो दुतेर्ते के खिलाफ ‘मानवता के खिलाफ अपराध’ (crimes against humanity) के आरोपों को आगे बढ़ाने की अनुमति दे दी है। अदालत के जजों ने कहा कि उपलब्ध सबूत यह मानने के लिए पर्याप्त हैं कि उनके कार्यकाल में गंभीर मानवाधिकार उल्लंघन हुए। ड्रग्स के खिलाफ अभियान बना विवाद की जड़ रोड्रिगो दुतेर्ते पर आरोप है कि उनके कार्यकाल में चलाए गए “एंटी-ड्रग अभियान” के दौरान बड़े पैमाने पर हत्याएं हुईं। अभियोजकों के अनुसार, पुलिस और कथित हिट स्क्वॉड ने कई लोगों की हत्या की, जिन्हें सरकार ने अपराधी बताया था। रिपोर्ट्स के मुताबिक, इन कार्रवाइयों की शुरुआत उनके राष्ट्रपति बनने से पहले, डावाओ शहर के मेयर रहते हुए भी हुई थी। अदालत का बड़ा निष्कर्ष: “नीति बनाकर हत्या को बढ़ावा दिया गया” ICC के तीन जजों की पीठ ने अपने फैसले में कहा कि ऐसे “ठोस आधार” मौजूद हैं जिनसे यह साबित होता है कि दुतेर्ते ने कथित अपराधियों को “neutralise” करने की नीति विकसित और लागू की। अदालत के अनुसार, यह केवल कुछ घटनाएं नहीं थीं, बल्कि एक व्यवस्थित अभियान के संकेत मिलते हैं। हजारों मौतों का दावा, आंकड़ों में बड़ा अंतर इस पूरे अभियान में मौतों के आंकड़े अलग-अलग स्रोतों में भिन्न हैं: फिलीपींस पुलिस: लगभग 6,000 मौतें मानवाधिकार संगठन: 20,000 से 30,000 तक मौतों का अनुमान यह अंतर इस मामले को और अधिक विवादास्पद बनाता है। दुतेर्ते की सफाई और कानूनी लड़ाई 81 वर्षीय दुतेर्ते ने सभी आरोपों को खारिज किया है। उनके वकीलों का कहना है कि यह मामला “बिना पुष्टि वाले गवाहों” और संदिग्ध बयानों पर आधारित है। दुतेर्ते फिलहाल अदालत की कार्यवाही में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित नहीं हुए हैं और वीडियो कॉन्फ्रेंस के जरिए जुड़े रहे हैं। ICC का बड़ा कदम और अपीलें खारिज ICC की अपील पीठ ने पहले ही दुतेर्ते की उस याचिका को खारिज कर दिया था जिसमें कहा गया था कि फिलीपींस के कोर्ट से हटने के बाद ICC को इस मामले पर अधिकार नहीं है। इसके साथ ही अदालत ने यह भी माना कि अब मुकदमे की प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा सकती है। पीड़ित परिवारों की प्रतिक्रिया: “यह न्याय की शुरुआत है” फिलीपींस में इस फैसले का कई पीड़ित परिवारों ने स्वागत किया है। उनका कहना है कि यह निर्णय वर्षों से चले आ रहे दर्द और अन्याय के खिलाफ एक महत्वपूर्ण कदम है। कुछ परिवारों ने कहा कि अब उम्मीद है कि उनके प्रियजनों को आखिरकार न्याय मिल सकेगा। मानवाधिकार संगठनों ने भी इस फैसले को ऐतिहासिक बताया है। उनका कहना है कि यह संदेश देता है कि चाहे कोई भी नेता हो, गंभीर अपराधों से बच नहीं सकता। वैश्विक न्याय व्यवस्था के लिए अहम मामला रोड्रिगो दुतेर्ते का यह मामला अंतरराष्ट्रीय न्याय व्यवस्था के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यह ट्रायल इस बात की परीक्षा होगा कि वैश्विक स्तर पर सत्ता में रहे नेताओं को मानवाधिकार उल्लंघन के लिए कितनी जवाबदेही तय की जाती है।  

surbhi अप्रैल 24, 2026 0
Myanmar military leader announcing commutation of death sentences and prisoner release during national address ceremony
एक झटके में देश की सारी फांसी की सजा माफ! पड़ोसी देश के तानाशाह आर्मी चीफ ने राष्ट्रपति बनते सुनाया फैसला

म्यांमार में सत्ता परिवर्तन के बाद एक बड़ा और चौंकाने वाला फैसला सामने आया है। देश के नए राष्ट्रपति और सैन्य प्रमुख Min Aung Hlaing ने देशभर में फांसी की सजा पाए सभी कैदियों की सजा को उम्रकैद में बदलने का ऐलान किया है। यह फैसला उनके राष्ट्रपति बनने के महज एक हफ्ते के भीतर लिया गया, जिसे सरकार ‘मेल-मिलाप’ की दिशा में कदम बता रही है, जबकि आलोचक इसे छवि सुधारने की कोशिश मान रहे हैं। 2021 तख्तापलट के बाद पहली बड़ी राहत गौरतलब है कि फरवरी 2021 में सेना ने तख्तापलट कर लोकतांत्रिक सरकार को हटा दिया था। इसके बाद Myanmar में सैन्य शासन के खिलाफ आवाज उठाने वालों पर सख्त कार्रवाई हुई और कई लोगों को फांसी की सजा सुनाई गई। संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के अनुसार, सत्ता संभालने के बाद पहले ही साल में 130 से ज्यादा लोगों को मौत की सजा दी गई थी, हालांकि वास्तविक संख्या इससे अधिक हो सकती है। पूर्व राष्ट्रपति को भी मिली रिहाई इस आम माफी के तहत म्यांमार के पूर्व राष्ट्रपति Win Myint को भी रिहा कर दिया गया है। उन्हें तख्तापलट के बाद गिरफ्तार किया गया था और अब वे पूरी तरह आजाद हैं। हजारों कैदियों को राहत सरकार ने इस फैसले के साथ बड़े पैमाने पर कैदियों को राहत देने की भी घोषणा की है। रिपोर्ट के मुताबिक: 4,300 से ज्यादा कैदियों को रिहा किया जाएगा 179 विदेशी नागरिक भी रिहाई सूची में शामिल हैं 40 साल से कम सजा पाने वालों की सजा में एक-छठा तक की कमी की जाएगी त्योहार के मौके पर लिया गया फैसला यह फैसला म्यांमार के पारंपरिक नए साल ‘थिंगयान’ के मौके पर लिया गया, जब आमतौर पर कैदियों को माफी देने की परंपरा रही है। लोकतंत्र समर्थक संगठनों का कहना है कि यह कदम केवल अंतरराष्ट्रीय दबाव कम करने और सैन्य शासन को “नागरिक चेहरा” देने की रणनीति हो सकती है।  

surbhi अप्रैल 17, 2026 0
Former US soldier linked to covert assassination missions in Yemen under UAE contract revealed
पूर्व अमेरिकी सैनिक बना ‘भाड़े का हत्यारा’, UAE के लिए किए किल जॉब्स – करोड़ों की कमाई का खुलासा

एक चौंकाने वाले खुलासे में सामने आया है कि अमेरिकी सेना का एक पूर्व सैनिक कथित तौर पर भाड़े का हत्यारा बनकर संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के लिए टारगेटेड हत्याएं करता था। इस काम के बदले उसे हर महीने करोड़ों रुपये मिलते थे। क्या है पूरा मामला? एसोसिएटेड प्रेस (AP) की रिपोर्ट के अनुसार, पूर्व अमेरिकी सैनिक अब्राहम गोलन पर आरोप है कि उसने 2015 में यमन में हत्या के मिशन को अंजाम दिया यह ऑपरेशन कथित तौर पर UAE के इशारे पर किया गया था लक्ष्य थे राजनीतिक विरोधी और खास लोग बनाई निजी ‘किल टीम’ गोलन ने एक पूर्व नेवी सील इसैक गिलमोर के साथ मिलकर “Spear Operations Group” नाम की प्राइवेट मिलिट्री कंपनी बनाई इस टीम में ज्यादातर पूर्व अमेरिकी स्पेशल फोर्सेज के सदस्य शामिल थे कंपनी पर टारगेटेड असैसिनेशन (लक्षित हत्याओं) का कॉन्ट्रैक्ट लेने का आरोप है कितनी होती थी कमाई? रिपोर्ट्स के मुताबिक: हर महीने करीब 15 लाख डॉलर (लगभग 10 करोड़ रुपये) मिलते थे सफल मिशन पर अलग से बोनस भी दिया जाता था यमन सांसद ने लगाए गंभीर आरोप यमन के सांसद अंसाफ अली मायो ने आरोप लगाया कि: 2015 में उन्हें मारने की साजिश रची गई उनके दफ्तर में 29 दिसंबर 2015 को विस्फोटक लगाए गए धमाके से कुछ मिनट पहले ही वह बच निकले बाद में सुरक्षा कारणों से उन्हें यमन छोड़कर सऊदी अरब में शरण लेनी पड़ी। कानूनी कार्रवाई की तैयारी मायो अब अमेरिका में इन पूर्व सैनिकों पर केस कर सकते हैं Alien Tort Statute कानून के तहत विदेशी नागरिक भी अमेरिकी अदालत में मुकदमा दायर कर सकते हैं मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि यह मामला युद्ध अपराध और मानवता के खिलाफ अपराध से जुड़ा हो सकता है गोलन ने कबूला था मिशन अब्राहम गोलन ने 2018 में एक इंटरव्यू में स्वीकार किया था: “यमन में टारगेटेड असैसिनेशन प्रोग्राम था और मैं उसे चला रहा था।”  

surbhi अप्रैल 4, 2026 0
Rising violence in West Bank as Palestinians face attacks amid Iran-Israel conflict in the region.
ईरान से युद्ध के बीच वेस्ट बैंक में तेज हुए हमले, फिलिस्तीनियों की मौतों से उठा सवाल

  मध्य पूर्व में जारी तनाव के बीच Israel और Iran के बीच चल रहे संघर्ष का असर अब West Bank में भी साफ दिखाई देने लगा है। इजरायली कब्जे वाले इस क्षेत्र में फिलिस्तीनियों के खिलाफ हिंसक घटनाओं में तेजी आई है, जिससे स्थानीय आबादी में दहशत का माहौल है। रामल्लाह स्थित Palestinian Ministry of Health के अनुसार, इस महीने की शुरुआत से अब तक वेस्ट बैंक में छह फिलिस्तीनियों को गोली मारकर हत्या कर दी गई है। लगातार बढ़ती इन घटनाओं ने क्षेत्र में तनाव को और गहरा कर दिया है।   युद्ध के बीच बढ़ी हमलों की घटनाएं विश्लेषकों का मानना है कि ईरान-इजरायल युद्ध शुरू होने के बाद वेस्ट बैंक में बसने वाले इजरायली समूहों के हमलों में वृद्धि हुई है। मानवाधिकार संगठन B'Tselem का कहना है कि मौजूदा हालात में हिंसा की घटनाएं यह संकेत देती हैं कि युद्ध की स्थिति का फायदा उठाकर फिलिस्तीनियों पर दबाव बढ़ाया जा रहा है। स्थानीय लोगों के अनुसार, 28 फरवरी को इजरायल द्वारा ईरान के खिलाफ सैन्य अभियान शुरू करने के बाद हमलों की संख्या तेजी से बढ़ी है। संयुक्त राष्ट्र की एजेंसी OCHA के आंकड़ों के मुताबिक, अक्टूबर 2023 में गाजा युद्ध शुरू होने से लेकर हालिया संघर्ष तक 28 महीनों में बसने वालों की हिंसा में कम से कम 24 फिलिस्तीनियों की मौत हुई है।   वेस्ट बैंक में बढ़ता तनाव वेस्ट बैंक में लगभग 30 लाख फिलिस्तीनी रहते हैं, जबकि करीब पांच लाख इजरायली भी विभिन्न बस्तियों और चौकियों में बसे हुए हैं। अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार इन बस्तियों को अवैध माना जाता है, लेकिन इसके बावजूद यहां लगातार विस्तार और झड़पों की घटनाएं सामने आती रहती हैं। स्थानीय निवासी Ibrahim Hamayel ने बताया कि हाल ही में बसने वालों के एक समूह ने गांव के पास हमला किया, जहां कुछ लोग नकाब पहने हुए थे और उनके पास हथियार भी थे। झड़प के बाद इलाके में एक व्यक्ति की मौत हो गई और वहां अस्थायी स्मारक बनाए गए, जिन पर फिलिस्तीनी झंडे लगाए गए हैं।   सेना ने तीन मौतों की पुष्टि की इजरायली सेना ने बसने वालों की हिंसा की निंदा करते हुए तीन फिलिस्तीनियों की मौत की पुष्टि की है। इनमें से एक व्यक्ति की मौत दम घुटने से हुई बताई गई, हालांकि यह स्पष्ट नहीं किया गया कि यह आंसू गैस के कारण हुआ या किसी अन्य वजह से।   बढ़ रहा विस्थापन संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, 28 फरवरी को ईरान-इजरायल युद्ध शुरू होने के बाद से अब तक करीब 180 फिलिस्तीनियों को वेस्ट बैंक से बेदखल किया जा चुका है। वहीं 2026 की शुरुआत से अब तक लगभग 1,500 लोग अपने घरों से विस्थापित हो चुके हैं। यूरोपीय संघ ने भी इस स्थिति पर चिंता जताते हुए कहा है कि वेस्ट बैंक में बढ़ती हिंसा और संपत्तियों के नुकसान की घटनाएं अस्वीकार्य हैं। लगातार बढ़ रहे हमलों के कारण कई फिलिस्तीनी समुदायों की रोजी-रोटी और सुरक्षा पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है।  

surbhi मार्च 16, 2026 0
Supreme Court allows passive euthanasia for Ghaziabad man Harish Rana after 13 years in unconscious state.
सुप्रीम कोर्ट ने गाजियाबाद के हरीश राणा को दी पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति, 13 साल से अचेत बेटे के लिए माता-पिता ने लगाई थी गुहार

  देश में इच्छामृत्यु को लेकर एक बेहद संवेदनशील और ऐतिहासिक फैसला सामने आया है। Supreme Court of India ने गाजियाबाद के 31 वर्षीय Harish Rana को पैसिव यूथेनेशिया (इच्छामृत्यु) की अनुमति दे दी है। यह देश के उन दुर्लभ मामलों में से एक माना जा रहा है, जहां लंबे समय से अचेत अवस्था में जी रहे मरीज के लिए अदालत ने मानवीय आधार पर ऐसा फैसला सुनाया है। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि हरीश राणा के ठीक होने की कोई चिकित्सकीय संभावना नहीं बची है और उन्हें जीवनरक्षक उपकरणों पर बनाए रखना केवल पीड़ा को लंबा करने जैसा है।   13 साल से अचेत अवस्था में जीवन गाजियाबाद के रहने वाले हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में हैं। वर्ष 2013 में हुए एक हादसे के बाद से वे बिस्तर पर पड़े हैं और पूरी तरह दूसरों पर निर्भर हैं। डॉक्टरों के मुताबिक उनके मस्तिष्क को इतनी गंभीर चोट पहुंची थी कि उनके दिमाग की नसें लगभग निष्क्रिय हो चुकी हैं। वर्तमान में उनकी स्थिति ऐसी है कि वे न बोल सकते हैं, न सुन सकते हैं और न ही किसी चीज़ को महसूस कर पाते हैं। कभी-कभी पलक झपकना ही उनके जीवित होने का एकमात्र संकेत माना जाता है।   एक हादसे ने बदल दी पूरी जिंदगी हरीश राणा कभी एक होनहार और ऊर्जा से भरे युवा थे। वे Chandigarh University में सिविल इंजीनियरिंग के छात्र थे। पढ़ाई के साथ-साथ उन्हें बॉडीबिल्डिंग का भी शौक था और वे अपनी फिटनेस को लेकर बेहद सजग रहते थे। लेकिन 20 अगस्त 2013 को हुई एक दुर्घटना ने उनकी जिंदगी को पूरी तरह बदल दिया। उस दिन वे अपने पीजी (पेइंग गेस्ट) की चौथी मंजिल से अचानक नीचे गिर गए। इस हादसे में उनके सिर पर गंभीर चोट आई, जिसके बाद वे कोमा जैसी स्थिति में चले गए।   बेटे को बचाने के लिए माता-पिता का लंबा संघर्ष हादसे के बाद हरीश के पिता अशोक राणा और उनकी मां ने बेटे को बचाने के लिए हर संभव कोशिश की। इलाज के लिए उन्हें देश के कई बड़े अस्पतालों में ले जाया गया। हरीश का इलाज Postgraduate Institute of Medical Education and Research (पीजीआई चंडीगढ़), All India Institute of Medical Sciences (एम्स, नई दिल्ली) और कई निजी अस्पतालों में कराया गया। परिवार ने वर्षों तक उम्मीद नहीं छोड़ी, लेकिन डॉक्टरों ने साफ कर दिया कि हरीश के ठीक होने की संभावना लगभग समाप्त हो चुकी है।   माता-पिता की पीड़ा और अदालत का दरवाजा समय के साथ-साथ बेटे की हालत में कोई सुधार नहीं हुआ। 100 प्रतिशत दिव्यांगता से जूझ रहे अपने बेटे की दशा देखकर माता-पिता मानसिक रूप से टूट चुके थे। आखिरकार उन्होंने भारी मन से सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और अदालत से पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति देने की अपील की। उनका कहना था कि बेटे को इस तरह पीड़ा भरे जीवन में बनाए रखना मानवीय नहीं है। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने हरीश के माता-पिता से सीधे बातचीत भी की और उनकी भावनाओं तथा परिस्थितियों को समझने की कोशिश की। सभी मेडिकल रिपोर्ट और विशेषज्ञों की राय पर विचार करने के बाद अदालत ने यह फैसला सुनाया।   क्या होता है पैसिव यूथेनेशिया पैसिव यूथेनेशिया का मतलब होता है कि मरीज को जीवित रखने के लिए दिए जा रहे कृत्रिम जीवनरक्षक उपकरण या उपचार को हटा लिया जाए, ताकि प्राकृतिक रूप से जीवन की प्रक्रिया समाप्त हो सके। भारत में यह बेहद संवेदनशील और कानूनी रूप से नियंत्रित प्रक्रिया है, जिसे केवल विशेष परिस्थितियों में अदालत की अनुमति से ही लागू किया जा सकता है।   एक परिवार की पीड़ा की कहानी हरीश राणा का मामला केवल कानूनी या चिकित्सकीय बहस नहीं, बल्कि एक परिवार के लंबे संघर्ष और भावनात्मक पीड़ा की कहानी भी है। पिछले 13 वर्षों से माता-पिता ने उम्मीद के सहारे बेटे की देखभाल की, लेकिन जब सभी रास्ते बंद हो गए तो उन्होंने भारी मन से उसे इस अंतहीन पीड़ा से मुक्त करने का फैसला किया। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला देश में इच्छामृत्यु से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण मिसाल के रूप में देखा जा रहा है।  

surbhi मार्च 11, 2026 0
Popular post
शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

Top week

Sapna Jain Gogi Gang
राष्ट्रीय

दिल्ली में 50 लाख की रंगदारी की साजिश का खुलासा, कारोबारी की पत्नी निकली मास्टरमाइंड

abhishek singh जून 30, 2026 0