Iran conflict

Italian Prime Minister Giorgia Meloni addresses reporters amid controversy over Italy's role during the Iran conflict.
NATO चीफ के बयान से इटली में सियासी बवाल, PM जॉर्जिया मेलोनी ने दी सफाई; ईरान को भी कराया फोन

  रोम: ईरान संघर्ष के दौरान इटली की भूमिका को लेकर प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी और NATO महासचिव मार्क रुटे के बीच नया विवाद खड़ा हो गया है। रुटे के एक बयान के बाद इटली की राजनीति में हलचल मच गई, जिसके बाद मेलोनी सरकार को लगातार सफाई देनी पड़ी। प्रधानमंत्री ने साफ कहा कि इटली ने ईरान के खिलाफ किसी भी सैन्य अभियान में हिस्सा नहीं लिया और NATO प्रमुख के बयान से देश की भूमिका को लेकर गलत संदेश गया। यह विवाद ऐसे समय सामने आया है जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लगातार इटली और प्रधानमंत्री मेलोनी की आलोचना कर रहे हैं। ऐसे में रोम ने अपने रुख को स्पष्ट करने के लिए विदेश मंत्री से लेकर रक्षा मंत्री तक को सामने उतार दिया। कैसे शुरू हुआ पूरा विवाद? विवाद की शुरुआत तब हुई जब NATO महासचिव मार्क रुटे ने एक इंटरव्यू में दावा किया कि ईरान संघर्ष के दौरान इटली ने लगभग 500 अमेरिकी सैन्य विमानों को अपने सैन्य ठिकानों के इस्तेमाल की अनुमति देकर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। रुटे के इस बयान के बाद इटली में विपक्षी दलों ने मेलोनी सरकार को घेर लिया। विपक्ष का आरोप था कि सरकार लगातार यह दावा करती रही कि इटली युद्ध से दूर रहा, जबकि NATO प्रमुख का बयान कुछ और कहानी बता रहा है। मेलोनी बोलीं- इटली युद्ध का हिस्सा नहीं था फ्रांस-इटली शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी ने स्पष्ट किया कि इटली ने ईरान के खिलाफ किसी भी सैन्य कार्रवाई में भाग नहीं लिया। उन्होंने कहा कि इटली ने केवल अमेरिका के साथ पहले से मौजूद द्विपक्षीय समझौतों के तहत तकनीकी और लॉजिस्टिक सहयोग दिया था। उन्होंने इस बात से भी इनकार किया कि इटली की जमीन का इस्तेमाल ईरान पर सीधे हमले करने के लिए किया गया। मेलोनी ने कहा कि अगर इटली वास्तव में युद्ध का हिस्सा होता, तो अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप बार-बार इटली के सहयोग को लेकर नाराजगी जाहिर नहीं करते। NATO प्रमुख पर साधा निशाना मेलोनी ने कहा कि मार्क रुटे ने अलग-अलग तरह की सैन्य उड़ानों और तकनीकी सहयोग को एक साथ जोड़कर पेश किया, जिससे भ्रम की स्थिति पैदा हुई। उन्होंने कहा कि संभव है कि NATO प्रमुख आगामी शिखर सम्मेलन से पहले सहयोगी देशों की एकजुटता दिखाना चाहते हों, लेकिन ऐसे संवेदनशील मुद्दों पर बेहद सावधानी बरतनी चाहिए। ईरान से सीधे की गई बातचीत विवाद बढ़ने के बाद इटली के विदेश मंत्री एंटोनियो ताजानी ने ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची से फोन पर बात की। ताजानी ने ईरान को भरोसा दिलाया कि इटली किसी भी सैन्य अभियान का हिस्सा नहीं था और उसने अपने सैन्य अड्डों का इस्तेमाल ईरान के खिलाफ युद्ध कार्रवाई के लिए करने की अनुमति नहीं दी। इसके साथ ही उन्होंने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को पूरी तरह खोलने की अपील की ताकि वहां फंसे इटली के व्यापारिक जहाजों की आवाजाही फिर से सामान्य हो सके। रक्षा मंत्री ने भी पेश किए आंकड़े इटली के रक्षा मंत्री गुइडो क्रोसेटो ने भी सरकार का पक्ष रखते हुए कहा कि ऑपरेशन 'एपिक फ्यूरी' के दौरान सिगोनेला और एवियानो सैन्य ठिकानों से हुई उड़ानों की संख्या पिछले वर्षों की तुलना में काफी कम रही। उन्होंने कहा कि सरकार के पास इसके आधिकारिक आंकड़े मौजूद हैं और जरूरत पड़ने पर उन्हें सार्वजनिक भी किया जा सकता है। NATO ने भी दी सफाई विवाद बढ़ने के बाद NATO की ओर से भी स्पष्टीकरण जारी किया गया। NATO की प्रवक्ता एलिसन हार्ट ने कहा कि मार्क रुटे का बयान केवल तकनीकी और लॉजिस्टिक सुविधाओं के संदर्भ में था। उनका आशय यह बिल्कुल नहीं था कि इटली ने ईरान के खिलाफ सीधे सैन्य हमलों में भाग लिया। ईरान का कड़ा रुख इस पूरे घटनाक्रम के बीच ईरान ने भी सख्त प्रतिक्रिया दी। ईरान के उप विदेश मंत्री काज़ेम गरीबाबादी ने कहा कि यदि कोई देश किसी तीसरे देश को किसी अन्य राष्ट्र पर हमला करने के लिए अपनी जमीन उपलब्ध कराता है, तो उसे भी आक्रामक कार्रवाई माना जाना चाहिए। वहीं विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने कहा कि NATO प्रमुख के बयान में इटली और रोमानिया का नाम स्पष्ट रूप से लिया गया था। ट्रंप लगातार कर रहे हैं इटली की आलोचना अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पिछले कुछ समय से इटली के रुख की लगातार आलोचना कर रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि यूरोपीय सहयोगियों ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम को रोकने के अमेरिकी प्रयासों में पर्याप्त सहयोग नहीं दिया। ट्रंप ने यह भी दावा किया कि इटली ने अमेरिकी सैन्य विमानों को अपने रनवे और लैंडिंग स्ट्रिप के इस्तेमाल की अनुमति नहीं दी, जिससे अमेरिकी लॉजिस्टिक व्यवस्था प्रभावित हुई। G7 सम्मेलन के बाद और बढ़ी दूरी हालिया G7 शिखर सम्मेलन के बाद दोनों नेताओं के बीच जुबानी जंग और तेज हो गई। ट्रंप ने दावा किया था कि जॉर्जिया मेलोनी उनके साथ बार-बार तस्वीर खिंचवाना चाहती थीं और इटली में उनकी लोकप्रियता लगातार घट रही है। मेलोनी ने इन आरोपों को पूरी तरह खारिज करते हुए कहा कि उनकी लोकप्रियता किसी विदेशी नेता से रिश्तों पर नहीं, बल्कि इटली के राष्ट्रीय हितों की रक्षा पर आधारित है। उन्होंने ट्रंप की टिप्पणियों को "पूरी तरह मनगढ़ंत और अनावश्यक" बताया। क्यों अहम है यह विवाद? यह विवाद केवल इटली और NATO के बीच बयानबाजी तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे ईरान संघर्ष को लेकर पश्चिमी देशों के भीतर मौजूद मतभेद भी सामने आए हैं। एक ओर NATO सहयोगी देशों की एकजुटता दिखाने की कोशिश कर रहा है, वहीं दूसरी ओर इटली अपनी छवि को युद्ध से दूर रखने और ईरान के साथ राजनयिक संतुलन बनाए रखने की कोशिश में जुटा हुआ है।  

Deepshikha जून 26, 2026 0
US President Donald Trump meets NATO Secretary General Mark Rutte amid tensions over support for Iran-related military action.
पैसा नहीं, वफादारी चाहिए... ईरान युद्ध में साथ न देने पर NATO पर भड़के ट्रंप, मार्क रूटे ने दिया जवाब

  वॉशिंगटन: अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई के दौरान अपेक्षित समर्थन नहीं मिलने पर नाटो सहयोगी देशों पर नाराजगी जताई है। ट्रंप ने कहा कि अमेरिका को अपने सहयोगियों से आर्थिक मदद नहीं, बल्कि वफादारी और राजनीतिक समर्थन की उम्मीद थी। उनके इस बयान पर नाटो महासचिव Mark Rutte ने यूरोपीय देशों का बचाव करते हुए कहा कि गठबंधन के सदस्य अमेरिका के साथ खड़े रहे हैं और उन्होंने सुरक्षा संबंधी जिम्मेदारियों में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। व्हाइट हाउस में ट्रंप ने जताई नाराजगी व्हाइट हाउस के ओवल ऑफिस में नाटो प्रमुख मार्क रूटे के साथ बैठक के दौरान ट्रंप ने कहा कि ईरान के खिलाफ अभियान में अमेरिका ने अपने दम पर कार्रवाई की। उन्होंने कहा कि अमेरिका को सैन्य सहायता की जरूरत नहीं थी, लेकिन सहयोगी देशों की ओर से समर्थन का संकेत मिलना महत्वपूर्ण था। ट्रंप ने कहा कि यदि यूरोपीय देश यह कहते कि वे अमेरिका के साथ खड़े हैं या किसी भी तरह मदद के लिए तैयार हैं, तो यह गठबंधन की एकजुटता का संदेश होता। उन्होंने कहा कि इस मामले में उन्हें सहयोगियों से निराशा हाथ लगी। स्पेन, इटली, ब्रिटेन और जर्मनी पर साधा निशाना बैठक के दौरान ट्रंप ने कई नाटो देशों की आलोचना करते हुए कहा कि कुछ सदस्य देश सुरक्षा के लाभ तो उठाना चाहते हैं, लेकिन जिम्मेदारियों को साझा करने के लिए तैयार नहीं हैं। उन्होंने विशेष रूप से स्पेन, इटली, ब्रिटेन, जर्मनी और फ्रांस का उल्लेख करते हुए कहा कि कई देश रक्षा सहयोग और सामूहिक जिम्मेदारियों को लेकर अपेक्षित भूमिका नहीं निभा रहे हैं। ट्रंप ने आरोप लगाया कि कुछ सहयोगी देशों को लगता है कि वे बिना पर्याप्त योगदान दिए भी अमेरिकी सुरक्षा छतरी का लाभ ले सकते हैं। “हमें पैसे नहीं, वफादारी चाहिए” एक पत्रकार के सवाल के जवाब में ट्रंप ने कहा कि अमेरिका को सहयोगी देशों के धन की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने कहा कि दुनिया की सबसे शक्तिशाली सेना अमेरिका के पास है और उसे आर्थिक मदद की जरूरत नहीं पड़ती। ट्रंप ने कहा कि उनकी अपेक्षा केवल इतनी है कि जब अमेरिका अपने सहयोगियों की सुरक्षा के लिए आगे आए, तो बदले में उसे राजनीतिक और रणनीतिक समर्थन मिले। उन्होंने कहा कि यूरोप में तैनात हजारों अमेरिकी सैनिक वहां के देशों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए मौजूद हैं। नाटो प्रमुख मार्क रूटे ने किया सहयोगियों का बचाव ट्रंप की टिप्पणियों पर प्रतिक्रिया देते हुए नाटो महासचिव मार्क रूटे ने कहा कि यूरोपीय देशों ने अमेरिका का समर्थन किया है और ईरान की परमाणु गतिविधियों से पैदा होने वाला खतरा केवल मध्य पूर्व तक सीमित नहीं था, बल्कि वैश्विक सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा था। रूटे ने कहा कि अभियान के दौरान यूरोप स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने बताया कि यूरोपीय आधारभूत ढांचे और एयरबेस का उपयोग अमेरिकी अभियानों के लिए किया गया, जिससे मिशन को रणनीतिक सहायता मिली। रक्षा खर्च में बढ़ोतरी को बताया ‘ट्रंप ट्रिलियन’ मार्क रूटे ने दावा किया कि ट्रंप के पहले कार्यकाल के बाद से यूरोपीय देशों और कनाडा ने रक्षा बजट में भारी बढ़ोतरी की है। उन्होंने इस अतिरिक्त निवेश को “ट्रंप ट्रिलियन” का नाम देते हुए कहा कि सहयोगी देश धीरे-धीरे सुरक्षा बोझ साझा करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। रूटे के अनुसार, यूरोप और कनाडा ने रक्षा क्षेत्र में लगभग 1.2 ट्रिलियन डॉलर का अतिरिक्त निवेश किया है। इसके अलावा अमेरिकी रक्षा कंपनियों को भी बड़े पैमाने पर सैन्य उपकरणों के ऑर्डर दिए गए हैं। नाटो शिखर सम्मेलन से पहले बढ़ी बयानबाजी ट्रंप और रूटे के बीच यह सार्वजनिक मतभेद ऐसे समय सामने आया है, जब नाटो का अगला शिखर सम्मेलन 7-8 जुलाई को Ankara में आयोजित होने वाला है। सम्मेलन में गठबंधन के 32 सदस्य देशों के नेता भाग लेंगे और रक्षा खर्च, सामूहिक सुरक्षा तथा वैश्विक संकटों पर चर्चा करेंगे। विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप के ताजा बयान नाटो के भीतर रक्षा जिम्मेदारियों और अमेरिका की भूमिका को लेकर चल रही पुरानी बहस को फिर से तेज कर सकते हैं।  

Deepshikha जून 25, 2026 0
US Senate votes on proposal to limit President Trump's military powers regarding Iran conflict.
ईरान पर सैन्य कार्रवाई को लेकर ट्रंप प्रशासन को झटका, अमेरिकी सीनेट ने सीमित करने वाले प्रस्ताव को दी मंजूरी

  अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव के बीच अमेरिकी सीनेट ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सैन्य शक्तियों को सीमित करने से जुड़े एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। इस प्रस्ताव का उद्देश्य ईरान के खिलाफ किसी भी बड़े सैन्य अभियान में राष्ट्रपति की स्वतंत्र कार्रवाई पर नियंत्रण सुनिश्चित करना है। यह फैसला ऐसे समय आया है जब ट्रंप प्रशासन ईरान के साथ संभावित शांति समझौते और क्षेत्रीय स्थिरता को लेकर कूटनीतिक प्रयासों में भी जुटा हुआ है। 50-48 वोट से पारित हुआ प्रस्ताव मंगलवार को हुए मतदान में प्रस्ताव के पक्ष में 50 और विरोध में 48 वोट पड़े। दिलचस्प बात यह रही कि राष्ट्रपति ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी के चार सांसदों—रैंड पॉल, सुसान कॉलिन्स, लिसा मर्कोव्स्की और बिल कैसिडी—ने डेमोक्रेट सांसदों के साथ मिलकर प्रस्ताव का समर्थन किया। वहीं, डेमोक्रेट सांसद जॉन फेटरमैन ने प्रस्ताव के खिलाफ मतदान किया। इस मतदान ने अमेरिकी राजनीति में ईरान नीति को लेकर दोनों दलों के भीतर मौजूद मतभेदों को भी उजागर कर दिया। प्रतिनिधि सभा से भी मिल चुकी है मंजूरी इससे पहले अमेरिकी प्रतिनिधि सभा (हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स) भी इस प्रस्ताव को मंजूरी दे चुकी है। वहां यह प्रस्ताव 215-208 वोटों से पारित हुआ था। हाउस में भी कुछ रिपब्लिकन सांसदों ने पार्टी लाइन से अलग जाकर इसका समर्थन किया था। प्रस्ताव पारित होने के बाद राष्ट्रपति ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर इसकी आलोचना करते हुए समर्थक सांसदों को निशाने पर लिया था। क्या है इस प्रस्ताव का उद्देश्य? यह प्रस्ताव अमेरिकी संविधान में राष्ट्रपति और कांग्रेस के बीच युद्ध संबंधी शक्तियों के संतुलन से जुड़ा हुआ है। इसका मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि राष्ट्रपति किसी बड़े सैन्य संघर्ष में देश को शामिल करने से पहले कांग्रेस की स्वीकृति प्राप्त करें। अमेरिका में लंबे समय से यह बहस चलती रही है कि सैन्य कार्रवाई जैसे महत्वपूर्ण फैसलों में कांग्रेस की भूमिका को मजबूत किया जाना चाहिए, ताकि युद्ध संबंधी निर्णयों पर लोकतांत्रिक नियंत्रण बना रहे। क्या ट्रंप प्रशासन पर पड़ेगा कोई असर? राजनीतिक रूप से यह प्रस्ताव महत्वपूर्ण माना जा रहा है, लेकिन कानूनी दृष्टि से इसका प्रभाव सीमित है। यह एक "कॉनकरेंट रिजॉल्यूशन" है, जिसे कानून का दर्जा प्राप्त नहीं होता और न ही इसके लिए राष्ट्रपति की मंजूरी आवश्यक होती है। व्हाइट हाउस का कहना है कि इस प्रस्ताव का प्रशासन की सैन्य नीति पर कोई बाध्यकारी प्रभाव नहीं पड़ेगा। प्रशासन के अनुसार, यह केवल एक प्रतीकात्मक राजनीतिक संदेश है। व्हाइट हाउस ने बताया प्रतीकात्मक कदम व्हाइट हाउस के अधिकारियों ने प्रस्ताव को महज राजनीतिक अभिव्यक्ति बताया है। उनका कहना है कि राष्ट्रपति की संवैधानिक शक्तियों पर इसका कोई प्रत्यक्ष असर नहीं पड़ेगा और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े फैसले पहले की तरह कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्र में रहेंगे। प्रशासन ने यह भी दावा किया कि वर्तमान में ईरान के साथ किसी सक्रिय सैन्य संघर्ष की स्थिति नहीं है और हालिया युद्धविराम के बाद तनाव में कमी आई है। कांग्रेस में बढ़ रही सैन्य कार्रवाई को लेकर चिंता सीनेट में हुए इस मतदान ने संकेत दिया है कि कांग्रेस के कई सदस्य मध्य पूर्व में संभावित सैन्य तनाव को लेकर चिंतित हैं। सांसदों का एक वर्ग मानता है कि बिना कांग्रेस की मंजूरी के बड़े सैन्य कदम उठाने से क्षेत्रीय अस्थिरता बढ़ सकती है और अमेरिका लंबे संघर्ष में उलझ सकता है। इसी वजह से हाल के महीनों में ईरान से जुड़े युद्ध शक्तियों के मुद्दे पर कांग्रेस में कई बार बहस और मतदान हो चुके हैं। अमेरिका-ईरान वार्ता पर बनी हुई है नजर सीनेट के इस फैसले के बावजूद अमेरिका और ईरान के बीच कूटनीतिक बातचीत जारी है। दोनों देशों के बीच हाल में हुई वार्ताओं को क्षेत्रीय तनाव कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। विश्लेषकों का मानना है कि सीनेट का यह प्रस्ताव भले ही कानूनी रूप से बाध्यकारी न हो, लेकिन यह स्पष्ट संकेत देता है कि अमेरिकी संसद का एक बड़ा वर्ग ईरान के खिलाफ किसी भी संभावित सैन्य कार्रवाई पर अधिक राजनीतिक और संसदीय निगरानी चाहता है।  

Deepshikha जून 24, 2026 0
Military aircraft and economic charts highlighting the financial impact of the 108-day US-Iran conflict.
US-Iran War Cost: रोजाना लगभग ₹94,475 करोड़ का खर्च, 108 दिन के युद्ध ने अमेरिका को कितनी बड़ी आर्थिक चोट पहुंचाई?

US Iran War Cost: अमेरिका और ईरान के बीच 108 दिनों तक चले सैन्य संघर्ष के बाद दोनों देशों ने अंतरिम समझौते पर हस्ताक्षर कर दिए हैं। इसके साथ ही पश्चिम एशिया में लंबे समय से जारी तनाव फिलहाल थमता नजर आ रहा है। हालांकि इस युद्ध की कीमत दोनों देशों को भारी चुकानी पड़ी है, लेकिन आर्थिक मोर्चे पर अमेरिका को भी बड़ा नुकसान झेलना पड़ा है। रिपोर्ट्स के अनुसार, 28 फरवरी से शुरू होकर 16 जून तक चले इस संघर्ष के दौरान अमेरिका ने केवल सैन्य अभियानों पर ही लगभग 113 अरब डॉलर खर्च किए। वहीं कई विशेषज्ञों का मानना है कि प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष आर्थिक प्रभावों को जोड़ने पर कुल नुकसान 1 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है। शुरुआती छह दिनों में ही खर्च हुए 11.3 अरब डॉलर अमेरिकी रक्षा विभाग के आंकड़ों के मुताबिक युद्ध के शुरुआती छह दिनों में ही करीब 11.3 अरब डॉलर खर्च हो चुके थे। इसके बाद प्रतिदिन औसतन लगभग 1 अरब डॉलर (करीब ₹94,475 करोड़) का खर्च दर्ज किया गया। विशेषज्ञों का कहना है कि यह केवल सैन्य अभियानों का अनुमानित खर्च है। वास्तविक आर्थिक बोझ इससे कहीं अधिक हो सकता है। मिसाइल और सैन्य तैनाती पर भारी खर्च युद्ध के शुरुआती चरण में अमेरिका ने मिसाइलों, गोला-बारूद और रक्षा उपकरणों पर लगभग 25 अरब डॉलर खर्च किए। पैट्रियट मिसाइल की एक यूनिट की कीमत लगभग 40 लाख डॉलर बताई जाती है। खाड़ी क्षेत्र में अतिरिक्त सैनिकों की तैनाती और लॉजिस्टिक सपोर्ट पर भी अरबों डॉलर खर्च हुए। ट्रंप प्रशासन ने शुरुआत में इस युद्ध के लिए लगभग 200 अरब डॉलर के बजट की मांग की थी। अमेरिका पर कुल आर्थिक बोझ 1 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंचने का अनुमान अर्थशास्त्रियों और कई अमेरिकी नेताओं का मानना है कि युद्ध का असर केवल रक्षा बजट तक सीमित नहीं रहा। युद्ध के कारण: तेल की कीमतों में उछाल आया। ऊर्जा लागत बढ़ी। वैश्विक सप्लाई चेन प्रभावित हुई। अमेरिकी उपभोक्ताओं और कंपनियों पर अतिरिक्त आर्थिक दबाव पड़ा। कुछ अनुमानों के मुताबिक अमेरिका की अर्थव्यवस्था पर कुल प्रभाव 630 अरब डॉलर से लेकर 1 ट्रिलियन डॉलर तक हो सकता है। ईरान के पुनर्निर्माण पर भी भारी खर्च युद्ध में ईरान के कई महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे, तेल रिफाइनरियां और पावर ग्रिड प्रभावित हुए। इनके पुनर्निर्माण के लिए करीब 300 अरब डॉलर की आवश्यकता का अनुमान लगाया गया है। रिपोर्ट्स के अनुसार, अंतरिम समझौते के तहत अमेरिका ने इस पुनर्निर्माण प्रक्रिया में सहयोग करने पर सहमति जताई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का कहना है कि इस फंडिंग में खाड़ी देशों की भी भूमिका रहेगी। आम लोगों पर भी पड़ा असर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने का असर सीधे आम उपभोक्ताओं पर पड़ा। अनुमान है कि केवल ऊर्जा कीमतों में वृद्धि के कारण अमेरिकी नागरिकों को 40 अरब डॉलर से अधिक का अतिरिक्त आर्थिक बोझ उठाना पड़ा। हालांकि कई विश्लेषकों का मानना है कि वास्तविक नुकसान इससे कहीं अधिक हो सकता है। प्रमुख आंकड़े एक नजर में युद्ध की अवधि: 108 दिन सैन्य खर्च: लगभग 113 अरब डॉलर शुरुआती 6 दिनों का खर्च: 11.3 अरब डॉलर प्रतिदिन औसत खर्च: लगभग 1 अरब डॉलर ईरान के पुनर्निर्माण की अनुमानित लागत: 300 अरब डॉलर कुल संभावित आर्थिक प्रभाव: 1 ट्रिलियन डॉलर तक

surbhi जून 18, 2026 0
US House lawmakers voting on a resolution to limit President Trump's war powers regarding Iran
ट्रंप को अपनी पार्टी से झटका, ईरान युद्ध पर सैन्य शक्तियां सीमित करने का प्रस्ताव पास

  ईरान के साथ जारी सैन्य तनाव को लेकर अमेरिकी राजनीति में बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। अमेरिकी प्रतिनिधि सभा (हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स) ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की युद्ध संबंधी शक्तियों को सीमित करने वाला प्रस्ताव पारित कर दिया है। खास बात यह रही कि इस प्रस्ताव को पारित कराने में कुछ रिपब्लिकन सांसदों ने भी डेमोक्रेट्स का साथ दिया। 215-208 वोटों से पास हुआ प्रस्ताव बुधवार को हुए मतदान में प्रस्ताव 215 के मुकाबले 208 मतों से पारित हुआ। मतदान के दौरान रिपब्लिकन सांसद थॉमस मैसी, ब्रायन फिट्जपैट्रिक, टॉम बैरेट और वॉरेन डेविडसन ने पार्टी लाइन से हटकर प्रस्ताव के पक्ष में वोट दिया। इस नतीजे ने संकेत दिया है कि ईरान नीति को लेकर रिपब्लिकन पार्टी के भीतर भी मतभेद बढ़ रहे हैं। कांग्रेस की मंजूरी बिना युद्ध पर उठे सवाल विवाद की जड़ अमेरिकी सैन्य अभियान ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ है, जिसकी शुरुआत 28 फरवरी को हुई थी। आलोचकों का आरोप है कि व्हाइट हाउस ने इस सैन्य कार्रवाई के लिए कांग्रेस से औपचारिक मंजूरी नहीं ली। डेमोक्रेट सांसदों का कहना है कि अमेरिकी संविधान के अनुसार लंबे सैन्य अभियान के लिए कांग्रेस की स्वीकृति आवश्यक है। क्या है वॉर पावर्स रिजॉल्यूशन? प्रतिनिधि सभा द्वारा पारित यह प्रस्ताव ‘वॉर पावर्स रिजॉल्यूशन’ के तहत लाया गया है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि राष्ट्रपति कांग्रेस की अनुमति के बिना लंबे समय तक किसी सैन्य संघर्ष में अमेरिका को शामिल न रख सकें।  यह प्रस्ताव सीधे कानून नहीं बनता, लेकिन इसके जरिए राष्ट्रपति पर राजनीतिक और संवैधानिक दबाव बढ़ाया जा सकता है। अब सीनेट में होगी अगली परीक्षा हाउस से पारित होने के बाद यह प्रस्ताव अब सीनेट के पास जाएगा। वहां भी मंजूरी मिलने पर ट्रंप प्रशासन पर दबाव और बढ़ सकता है। अंतिम रूप से यह प्रस्ताव राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के लिए नहीं भेजा जाता और सामान्य परिस्थितियों में इसे कानून का दर्जा नहीं मिलता। डेमोक्रेट सांसद बोले- संविधान की रक्षा जरूरी प्रस्ताव पेश करने वाले न्यूयॉर्क के डेमोक्रेट सांसद ग्रेगरी मीक्स ने कहा कि कांग्रेस अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी निभा रही है। उन्होंने कहा कि जब कार्यपालिका संविधान के अनुरूप काम नहीं करती, तब विधायिका का दायित्व है कि वह नियंत्रण और संतुलन की भूमिका निभाए। पहले टल गया था मतदान, अब बदल गए हालात इस प्रस्ताव पर मतदान मई में होना था, लेकिन उस समय इसे टाल दिया गया था। डेमोक्रेट नेताओं ने आरोप लगाया था कि रिपब्लिकन नेतृत्व प्रस्ताव की संभावित सफलता से चिंतित था। अब कुछ रिपब्लिकन सांसदों के समर्थन के साथ प्रस्ताव पारित होने से राजनीतिक समीकरण बदलते दिखाई दे रहे हैं। रिपब्लिकन पार्टी के भीतर भी बढ़ रही असहमति ईरान नीति के अलावा हाल के महीनों में ट्रंप प्रशासन के कई प्रस्तावों पर रिपब्लिकन सांसदों के बीच मतभेद सामने आए हैं। विश्लेषकों का मानना है कि विदेश नीति और सरकारी खर्चों को लेकर पार्टी के भीतर अलग-अलग धड़े खुलकर सामने आने लगे हैं। स्पीकर माइक जॉनसन ने किया विरोध प्रतिनिधि सभा के स्पीकर माइक जॉनसन ने प्रस्ताव का विरोध करते हुए कहा कि राष्ट्रपति की शक्तियों पर इस तरह के प्रतिबंध अमेरिका की कूटनीतिक स्थिति को कमजोर कर सकते हैं। उनका तर्क था कि ईरान में सैन्य अभियान के उद्देश्य पूरे किए जा चुके हैं और अब शांति प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए राष्ट्रपति को पर्याप्त स्वतंत्रता मिलनी चाहिए। सैन्य अभियान की वैधानिक जांच भी शुरू इसी बीच पेंटागन, विदेश विभाग और यूएसएआईडी के महानिरीक्षकों ने ईरान से जुड़े सैन्य अभियान की संयुक्त समीक्षा शुरू कर दी है। निगरानी एजेंसियों का कहना है कि कानून के तहत 60 दिनों से अधिक समय तक चलने वाले सैन्य अभियानों की समीक्षा अनिवार्य होती है। इससे व्हाइट हाउस और कांग्रेस के बीच टकराव और तेज होने की संभावना जताई जा रही है।  

Deepshikha जून 4, 2026 0
Iranian airspace restrictions announced amid escalating tensions and fears of possible US military action
अमेरिकी हमले की आशंका के बीच अलर्ट मोड पर ईरान, बंद किया एयरस्पेस

Iran ने संभावित अमेरिकी सैन्य हमलों की आशंका के बीच अपना एयरस्पेस पूरी तरह बंद कर दिया है। क्षेत्र में बढ़ते तनाव और रुकती कूटनीतिक बातचीत के बीच यह फैसला लिया गया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, United States ईरान के खिलाफ नए सैन्य ऑपरेशन पर विचार कर रहा है। अमेरिकी हमले की तैयारी की रिपोर्ट अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, व्हाइट हाउस और रक्षा विभाग के भीतर ईरान के खिलाफ संभावित नए हमलों को लेकर चर्चा तेज हो गई है। सूत्रों का दावा है कि यदि अगले 24 घंटों में कोई बड़ी कूटनीतिक सफलता नहीं मिलती, तो राष्ट्रपति Donald Trump बड़े स्तर पर सैन्य कार्रवाई को मंजूरी दे सकते हैं। प्रशासन की ओर से अभी तक किसी अंतिम फैसले की औपचारिक पुष्टि नहीं की गई है। इसके बावजूद अमेरिकी सेना और खुफिया एजेंसियों के कई अधिकारियों ने अपनी मेमोरियल डे वीकेंड छुट्टियां रद्द कर दी हैं। ट्रंप ने रद्द किया वीकेंड कार्यक्रम तनावपूर्ण हालात के बीच राष्ट्रपति ट्रंप को न्यू जर्सी में अपना वीकेंड कार्यक्रम छोड़कर वॉशिंगटन लौटना पड़ा। उन्होंने सोशल मीडिया पोस्ट में कहा कि मौजूदा सरकारी परिस्थितियों के कारण उनका व्हाइट हाउस में रहना ज्यादा जरूरी है। ट्रंप ने यह भी संकेत दिया कि वह अपने बेटे डोनाल्ड ट्रंप जूनियर की शादी में शामिल नहीं हो पाएंगे। उन्होंने कहा कि देश की मौजूदा स्थिति को देखते हुए राष्ट्रीय जिम्मेदारियां प्राथमिकता हैं। ईरान-अमेरिका बातचीत फिर अटकी दोनों देशों के बीच अप्रत्यक्ष बातचीत जारी रहने के बावजूद शांति वार्ता फिलहाल ठप मानी जा रही है। विवाद की सबसे बड़ी वजह ईरान का संवर्धित यूरेनियम कार्यक्रम बना हुआ है। अमेरिका का कहना है कि ईरान को न केवल परमाणु हथियार विकसित करने से रोकना होगा, बल्कि उसके पास मौजूद संवर्धित यूरेनियम भी हटाना होगा। दूसरी ओर ईरान इस मांग को मानने के लिए तैयार नहीं है और अपने परमाणु कार्यक्रम को राष्ट्रीय अधिकार बता रहा है। सीजफायर के बावजूद कायम है तनाव अप्रैल में घोषित अस्थायी सीजफायर अब भी तकनीकी रूप से लागू है, लेकिन खाड़ी क्षेत्र में छिटपुट हमलों और सैन्य गतिविधियों की खबरें लगातार सामने आ रही हैं। इसी वजह से मध्य पूर्व में तनाव एक बार फिर बढ़ता दिखाई दे रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर कूटनीतिक बातचीत विफल रहती है, तो आने वाले दिनों में क्षेत्रीय संघर्ष और गहरा सकता है।  

surbhi मई 23, 2026 0
Donald Trump and Xi Jinping meet in Beijing for high-stakes talks on trade and global tensions
ट्रंप-शी जिनपिंग की बड़ी बैठक शुरू, व्यापार, ईरान युद्ध और ताइवान पर दुनिया की नजर

बीजिंग में शुरू हुई हाई-प्रोफाइल शिखर वार्ता Donald Trump और Xi Jinping के बीच गुरुवार को बीजिंग में दो दिवसीय अहम बैठक शुरू हुई। इस वार्ता में व्यापार समझौते, ईरान युद्ध और ताइवान को अमेरिकी हथियारों की बिक्री जैसे बड़े मुद्दों पर चर्चा हो रही है। ट्रंप ने इस बैठक को “अब तक की सबसे बड़ी समिट” बताया और शी जिनपिंग को महान नेता और अपना मित्र कहा। भव्य स्वागत के साथ हुई मुलाकात बैठक की शुरुआत बीजिंग के ग्रेट हॉल ऑफ द पीपल में हुई, जहां ट्रंप का भव्य स्वागत किया गया। दोनों नेताओं ने रेड कार्पेट पर हाथ मिलाया और गर्मजोशी से बातचीत की। चीनी सैनिकों की परेड और बच्चों द्वारा अमेरिकी-चीनी झंडे लहराने के बीच यह मुलाकात दुनिया भर में चर्चा का विषय बनी रही। व्यापार समझौता सबसे बड़ा मुद्दा अमेरिका और चीन के बीच पिछले कई महीनों से जारी व्यापार तनाव इस बैठक का सबसे अहम मुद्दा माना जा रहा है। पिछले साल दोनों देशों के बीच एक अस्थायी व्यापार समझौता हुआ था, जिसके तहत अमेरिका ने चीन पर भारी टैरिफ लगाने का फैसला टाल दिया था। अब अमेरिका चाहता है कि चीन अपने बाजार अमेरिकी कंपनियों के लिए ज्यादा खोले। ट्रंप के साथ इस दौरे पर कई बड़े कारोबारी भी पहुंचे हैं, जिनमें Elon Musk और Jensen Huang शामिल हैं। ईरान युद्ध पर भी चर्चा बैठक में मध्य पूर्व का तनाव भी बड़ा मुद्दा बना हुआ है। अमेरिका चाहता है कि चीन ईरान पर दबाव डाले ताकि युद्ध और तनाव कम किया जा सके। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि चीन ईरान के खिलाफ खुलकर कदम उठाने से बच सकता है, क्योंकि तेहरान को वह अमेरिका के खिलाफ रणनीतिक सहयोगी के रूप में देखता है। ताइवान पर बढ़ सकता है तनाव Taiwan को अमेरिकी हथियारों की बिक्री भी बैठक में संवेदनशील मुद्दा बनी हुई है। चीन ने हाल ही में अमेरिका के प्रस्तावित 14 अरब डॉलर के रक्षा पैकेज का विरोध किया है। बीजिंग का कहना है कि ताइवान चीन का हिस्सा है और बाहरी हस्तक्षेप स्वीकार नहीं किया जाएगा। ट्रंप पर घरेलू दबाव इस यात्रा को ट्रंप के लिए राजनीतिक रूप से भी बेहद अहम माना जा रहा है। मध्य पूर्व युद्ध और बढ़ती महंगाई के कारण उनकी लोकप्रियता प्रभावित हुई है। ऐसे में चीन दौरे को उनकी बड़ी कूटनीतिक परीक्षा माना जा रहा है। बदलता वैश्विक शक्ति संतुलन विशेषज्ञों का कहना है कि 2017 की तुलना में अब अमेरिका-चीन संबंधों का समीकरण काफी बदल चुका है। पहले जहां चीन अमेरिका को प्रभावित करने की कोशिश करता था, अब अमेरिका खुद चीन की वैश्विक ताकत को खुलकर स्वीकार करता दिख रहा है। दोनों नेताओं के बीच आने वाले दिनों में कई दौर की बातचीत और औपचारिक कार्यक्रम होने हैं, जिन पर पूरी दुनिया की नजर टिकी हुई है।  

surbhi मई 14, 2026 0
UAE denies Israeli claim of secret Benjamin Netanyahu visit during Iran conflict
नेतन्याहू के ‘गुप्त यूएई दौरे’ के दावे को अबू धाबी ने किया खारिज, कहा- ऐसा कुछ नहीं हुआ

इजरायल के दावे से मचा कूटनीतिक विवाद Benjamin Netanyahu के कार्यालय द्वारा किए गए एक बड़े दावे को संयुक्त अरब अमीरात ने सिरे से खारिज कर दिया है। इजरायल ने कहा था कि ईरान युद्ध के दौरान नेतन्याहू ने गुप्त रूप से यूएई का दौरा किया और राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद से मुलाकात की थी। हालांकि, United Arab Emirates ने तुरंत प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि ऐसा कोई दौरा या गुप्त बैठक नहीं हुई। इजरायल ने क्या दावा किया? इजरायली प्रधानमंत्री कार्यालय के अनुसार मार्च 26 को पश्चिम एशिया में युद्ध के चरम के दौरान नेतन्याहू ने यूएई के अल ऐन शहर में राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान से कई घंटों तक बातचीत की। इजरायल ने इस बैठक को दोनों देशों के रिश्तों में “ऐतिहासिक सफलता” बताया और कहा कि चर्चा क्षेत्रीय सुरक्षा और रणनीतिक सहयोग पर केंद्रित थी। यूएई ने जारी किया आधिकारिक बयान यूएई विदेश मंत्रालय ने आधिकारिक बयान जारी कर कहा कि नेतन्याहू के कथित दौरे और किसी इजरायली सैन्य प्रतिनिधिमंडल के आने की खबरें पूरी तरह गलत हैं। यूएई ने साफ कहा कि इजरायल के साथ उसके संबंध 2020 में हुए Abraham Accords के तहत खुले तौर पर संचालित होते हैं, न कि किसी गुप्त समझौते के जरिए। युद्ध के बीच बढ़ा सुरक्षा सहयोग हालांकि दोनों देशों के बयानों में विरोधाभास है, लेकिन रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि ईरान संघर्ष के दौरान इजरायल और यूएई के बीच सुरक्षा सहयोग बढ़ा था। सूत्रों के मुताबिक इजरायली खुफिया एजेंसी मोसाद के प्रमुख डेडी बरनेआ ने युद्ध के दौरान कम से कम दो बार यूएई का दौरा किया था। इन बैठकों में सैन्य और सुरक्षा मामलों पर समन्वय की चर्चा हुई। यूएई में तैनात किया गया था आयरन डोम अमेरिका के इजरायल में राजदूत माइक हकाबी ने भी दावा किया कि युद्ध के दौरान यूएई के अनुरोध पर इजरायल ने वहां अपनी आयरन डोम एयर डिफेंस प्रणाली और सैन्य कर्मियों को तैनात किया था। यह पहली बार था जब इजरायल की यह रक्षा प्रणाली विदेश में तैनात की गई। ईरान के हमलों से बढ़ा तनाव ईरान ने अमेरिका और इजरायल की सैन्य कार्रवाई के जवाब में खाड़ी देशों पर भी हमले किए थे। रिपोर्ट्स के अनुसार यूएई समेत कई देशों में ऊर्जा और नागरिक ढांचे को निशाना बनाया गया। सार्वजनिक दूरी, लेकिन रणनीतिक रिश्ते कायम 2020 के बाद से यूएई और इजरायल के बीच आर्थिक और सुरक्षा सहयोग तेजी से बढ़ा है। हालांकि, गाजा युद्ध और ईरान संकट के बीच यूएई सार्वजनिक रूप से इजरायल की सैन्य कार्रवाइयों से दूरी बनाने की कोशिश करता रहा है। इसी वजह से नेतन्याहू के गुप्त दौरे के दावे को लेकर दोनों देशों के बीच बयानबाजी ने नया कूटनीतिक विवाद खड़ा कर दिया है।  

surbhi मई 14, 2026 0
Donald Trump speaking to media amid rising US-Iran tensions and military conflict debate
“ये अमेरिकी कायर हैं...”, ईरान युद्ध के बीच ट्रंप का बड़ा बयान, आलोचकों पर साधा निशाना

Donald Trump ने ईरान के साथ जारी तनाव के बीच अमेरिका की सैन्य ताकत पर सवाल उठाने वालों पर तीखा हमला बोला है। चीन दौरे पर रवाना होने से पहले ट्रंप ने कहा कि जो लोग यह दावा कर रहे हैं कि ईरान सैन्य मोर्चे पर अमेरिका के खिलाफ बेहतर प्रदर्शन कर रहा है, वे “देशद्रोही” मानसिकता दिखा रहे हैं। ट्रंप ने कहा: “ये अमेरिकी कायर हैं जो हमारे देश के खिलाफ हैं।” उन्होंने आरोप लगाया कि ऐसे बयान ईरान को “झूठी उम्मीद” देते हैं, जबकि वास्तविक स्थिति बिल्कुल अलग है। “ईरान की नेवी और एयर फोर्स खत्म” ट्रंप ने दावा किया कि अमेरिकी सैन्य कार्रवाई ने ईरान की नौसैनिक और वायु सैन्य क्षमता को गंभीर नुकसान पहुंचाया है। उनके मुताबिक: ईरान के 159 नौसैनिक जहाज अब नष्ट हो चुके हैं ईरानी एयर फोर्स लगभग खत्म हो गई है सैन्य तकनीक और नेतृत्व को भारी नुकसान हुआ है हालांकि ट्रंप के इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। ईरान की आर्थिक स्थिति पर भी टिप्पणी ट्रंप ने कहा कि ईरान अब आर्थिक संकट की ओर बढ़ रहा है। उन्होंने कहा कि केवल “लूजर और एहसान फरामोश लोग” ही अमेरिका की सैन्य क्षमता पर सवाल उठा सकते हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति के इस बयान को घरेलू आलोचकों और विपक्षी नेताओं पर सीधा हमला माना जा रहा है। रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने भी किया बचाव इस बीच Pete Hegseth ने भी ट्रंप प्रशासन की सैन्य रणनीति का बचाव किया। सीनेट एप्रोप्रिएशन सबकमेटी के सामने पेश होते हुए उन्होंने कहा कि बढ़ती लागत और Strait of Hormuz में तनाव के बावजूद अमेरिका के पास अभी भी “सभी कार्ड” मौजूद हैं। इंडो-पैसिफिक सहयोगियों को संदेश पीट हेगसेथ ने Dan Caine के साथ सुनवाई के दौरान यह भी कहा कि अमेरिका इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में अपने सहयोगियों को भरोसा दिलाने की कोशिश कर रहा है। यह बयान ऐसे समय आया है जब ट्रंप का प्रस्तावित चीन दौरा वैश्विक राजनीति और सुरक्षा के लिहाज से बेहद अहम माना जा रहा है। बढ़ते तनाव से वैश्विक चिंता अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव ने वैश्विक बाजारों, तेल कीमतों और पश्चिम एशिया की सुरक्षा स्थिति को लेकर चिंताएं बढ़ा दी हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह संघर्ष और बढ़ा, तो इसका असर वैश्विक अर्थव्यवस्था और ऊर्जा आपूर्ति पर भी पड़ सकता है।  

surbhi मई 13, 2026 0
Pakistani airbase linked to reports of Iranian military aircraft shelter during US-Iran tensions.
पाकिस्तान पर दोहरा खेल खेलने के आरोप, ईरानी विमानों को शरण देने की रिपोर्ट से बढ़ा विवाद

अमेरिका और ईरान के बीच तनाव के दौरान पाकिस्तान की भूमिका को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि पाकिस्तान ने संघर्ष के दौरान चुपचाप ईरानी सैन्य और निगरानी विमानों को अपने एयरबेस पर शरण दी। इस खुलासे के बाद पाकिस्तान की विदेश नीति और उसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठने लगे हैं। रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिकी अधिकारियों ने आरोप लगाया है कि ईरान के कुछ विमान पाकिस्तान के नूर खान एयरबेस पर तैनात किए गए थे। इनमें ईरानी वायु सेना का RC-130 विमान भी शामिल बताया गया, जो टोही और खुफिया जानकारी जुटाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। यह विमान प्रसिद्ध लॉकहीड C-130 हरक्यूलिस का विशेष सैन्य संस्करण माना जाता है। पाकिस्तान ने आरोपों से किया इनकार हालांकि Pakistan ने इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है। पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने बयान जारी कर कहा कि एयरबेस पर मौजूद विमान राजनयिक और प्रशासनिक अधिकारियों से जुड़े थे, जो संघर्ष विराम वार्ता के दौरान वहां पहुंचे थे। इस्लामाबाद ने दावा किया कि इन विमानों की कोई सैन्य भूमिका नहीं थी और मीडिया रिपोर्ट भ्रामक अटकलों पर आधारित है। लेकिन अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान की भूमिका पर बहस तेज हो गई है। आलोचकों का कहना है कि एक ओर पाकिस्तान खुद को मध्यस्थ और निष्पक्ष देश के रूप में पेश कर रहा था, वहीं दूसरी ओर वह ईरान को अप्रत्यक्ष मदद भी पहुंचा रहा था। पाकिस्तान के पुराने रिकॉर्ड पर फिर उठे सवाल इस विवाद के बाद पाकिस्तान के अतीत को भी याद किया जा रहा है। पूर्व ISI प्रमुख Hamid Gul का वह चर्चित बयान फिर चर्चा में है जिसमें उन्होंने कहा था कि ISI ने पहले अमेरिका की मदद से सोवियत संघ को हराया और फिर अमेरिका को भी अफगानिस्तान में मात दी। विशेषज्ञों का मानना है कि अफगानिस्तान में तालिबान की वापसी और अमेरिकी सेना की वापसी के बाद भी अमेरिका पाकिस्तान की रणनीति को पूरी तरह समझ नहीं पाया है। कई विश्लेषकों का कहना है कि पाकिस्तान लंबे समय से अलग-अलग वैश्विक शक्तियों के बीच संतुलन बनाकर अपनी रणनीतिक स्थिति मजबूत करता रहा है। ट्रंप के करीबी नेता ने जताई चिंता इस मामले ने अमेरिकी राजनीति में भी हलचल बढ़ा दी है। अमेरिकी सीनेटर Lindsey Graham ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि अगर यह रिपोर्ट सही साबित होती है तो अमेरिका को ईरान और अन्य पक्षों के बीच मध्यस्थ के रूप में पाकिस्तान की भूमिका का पुनर्मूल्यांकन करना पड़ेगा। उन्होंने यह भी कहा कि पाकिस्तान के कुछ रक्षा अधिकारियों के इजरायल विरोधी बयानों को देखते हुए ऐसे आरोप पूरी तरह चौंकाने वाले नहीं हैं। क्षेत्रीय राजनीति में बढ़ सकता है असर विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इन आरोपों की पुष्टि होती है तो इसका असर अमेरिका-पाकिस्तान संबंधों, मध्य पूर्व की कूटनीति और क्षेत्रीय सुरक्षा समीकरणों पर पड़ सकता है। फिलहाल पाकिस्तान इन दावों को गलत बता रहा है, लेकिन इस मुद्दे ने एक बार फिर उसकी विदेश नीति और रणनीतिक विश्वसनीयता पर वैश्विक बहस छेड़ दी है।  

surbhi मई 12, 2026 0
Donald Trump and Xi Jinping meeting in Beijing amid Iran war and rising US-China tensions
ईरान युद्ध के बीच चीन जाएंगे डोनाल्ड ट्रंप, शी जिनपिंग से होगी अहम मुलाकात

अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump इस महीने चीन के दौरे पर जाएंगे, जहां उनकी मुलाकात चीनी राष्ट्रपति Xi Jinping से होगी। चीन के विदेश मंत्रालय ने इस यात्रा की आधिकारिक घोषणा करते हुए बताया कि ट्रंप 13 मई से 15 मई तक चीन में रहेंगे। बीजिंग में होगी अहम बैठक जानकारी के मुताबिक, Donald Trump बुधवार शाम बीजिंग पहुंचेंगे। गुरुवार को उनका औपचारिक स्वागत और द्विपक्षीय बैठक होगी। यात्रा शुक्रवार को समाप्त होगी। व्हाइट हाउस की चीफ डिप्टी प्रेस सेक्रेटरी Anna Kelly ने बताया कि इस यात्रा का उद्देश्य अमेरिका और चीन के बीच कूटनीतिक संबंधों को मजबूत करना है। ईरान युद्ध समेत कई मुद्दों पर चर्चा अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, ट्रंप और Xi Jinping के बीच कई बड़े वैश्विक मुद्दों पर चर्चा होगी। इनमें: Iran से जुड़ा तनाव और युद्ध ताइवान मुद्दा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) परमाणु हथियार नियंत्रण महत्वपूर्ण खनिज समझौते जैसे विषय शामिल हैं। युद्ध के कारण टली थी यात्रा यह दौरा पहले साल की शुरुआत में प्रस्तावित था, लेकिन Iran और अमेरिका-इजरायल तनाव के कारण इसे स्थगित कर दिया गया था। अब यह यात्रा ऐसे समय में हो रही है जब पश्चिम एशिया में हालात बेहद संवेदनशील बने हुए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप इस दौरे के जरिए चीन के साथ संवाद बढ़ाकर वैश्विक तनाव कम करने की कोशिश कर सकते हैं। चीन की टेक्नोलॉजी पर अमेरिका सख्त ट्रंप के चीन दौरे से पहले अमेरिका में चीनी टेक्नोलॉजी कंपनियों को लेकर बहस तेज हो गई है। अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, हाल ही में अमेरिका ने ईरान से कथित संबंधों के आरोप में कई चीनी कंपनियों पर नए प्रतिबंध लगाए हैं। CNN की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी विदेश विभाग ने चार कंपनियों पर प्रतिबंध लगाया, जिनमें तीन चीन की हैं। इन कंपनियों पर आरोप है कि उन्होंने सैटेलाइट इमेजरी उपलब्ध कराकर पश्चिम एशिया में ईरानी गतिविधियों को मदद पहुंचाई। तेल खरीद को लेकर भी बढ़ा विवाद अमेरिका ने हाल ही में ईरान से कच्चा तेल खरीदने के आरोप में कुछ चीनी रिफाइनरियों पर भी प्रतिबंध लगाए थे। इसके बाद चीन ने अपनी कंपनियों को अमेरिकी प्रतिबंधों का पालन न करने का संकेत दिया। Ministry of Foreign Affairs of the People's Republic of China ने कहा कि वह एकतरफा प्रतिबंधों का विरोध करता है और चीनी कंपनियों तथा नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करेगा। क्यों अहम मानी जा रही है यह यात्रा? विशेषज्ञों के मुताबिक, यह दौरा सिर्फ अमेरिका-चीन संबंधों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर वैश्विक राजनीति, व्यापार और पश्चिम एशिया की स्थिति पर भी पड़ सकता है। दुनिया की दो सबसे बड़ी शक्तियों के नेताओं की यह मुलाकात ऐसे समय में हो रही है, जब वैश्विक अर्थव्यवस्था, ऊर्जा बाजार और सुरक्षा हालात लगातार दबाव में हैं।  

surbhi मई 11, 2026 0
Donald Trump speaking on Middle East tensions and warning Iran over the Strait of Hormuz crisis
ट्रंप की ईरान को खुली चेतावनी, बोले- समझौता नहीं किया तो होगी भीषण बमबारी

Middle East Conflict: मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को एक बार फिर कड़ी चेतावनी दी है. ट्रंप ने कहा है कि अगर ईरान अमेरिका की शर्तों को नहीं मानता और होर्मुज स्ट्रेट को नहीं खोलता, तो उस पर पहले से ज्यादा तीव्र और ताकतवर बमबारी की जाएगी. डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर लिखा कि यदि ईरान तय शर्तों को स्वीकार कर लेता है, तो अमेरिकी सैन्य अभियान “ऑपरेशन एपिक फ्यूरी” को समाप्त कर दिया जाएगा और होर्मुज स्ट्रेट को ईरान सहित सभी देशों के लिए फिर से खोल दिया जाएगा. ट्रंप बोले- नहीं माने तो बरसेंगे बम ट्रंप ने अपने पोस्ट में साफ कहा कि अगर ईरान समझौते पर सहमत नहीं होता है, तो अमेरिका की सैन्य कार्रवाई और ज्यादा आक्रामक होगी. उन्होंने कहा कि अमेरिका किसी भी कीमत पर वैश्विक समुद्री व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति को बाधित नहीं होने देगा. उन्होंने लिखा कि “अगर ईरान सहमत नहीं होता, तो बमबारी पहले से कहीं अधिक ताकतवर होगी.” ट्रंप के इस बयान के बाद मिडिल ईस्ट में तनाव और बढ़ गया है. ईरान ने भी दी चेतावनी ट्रंप का यह बयान ईरानी संसद अध्यक्ष एमबी गालिबफ की टिप्पणी के बाद आया है. गालिबफ ने कहा था कि होर्मुज स्ट्रेट को लेकर “नया समीकरण” तैयार हो रहा है और अमेरिका की नाकाबंदी नीति उसके लिए भारी साबित होगी. उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा कि अमेरिका और उसके सहयोगियों ने युद्धविराम का उल्लंघन कर क्षेत्र में तनाव बढ़ाया है. ईरान ने आरोप लगाया कि नाकाबंदी की वजह से जहाजों, तेल और गैस आपूर्ति की सुरक्षा प्रभावित हुई है. प्रोजेक्ट फ्रीडम अस्थायी रूप से रोका गया इस बीच ट्रंप प्रशासन ने होर्मुज स्ट्रेट से जहाजों की सुरक्षित निकासी के लिए शुरू किये गये “प्रोजेक्ट फ्रीडम” को फिलहाल अस्थायी रूप से रोक दिया है. ट्रंप ने दावा किया कि अमेरिका और ईरान के बीच “पूर्ण और अंतिम समझौते” को लेकर बातचीत में कुछ प्रगति हुई है. उन्होंने कहा कि पाकिस्तान समेत कई देशों के अनुरोध और कूटनीतिक प्रयासों को देखते हुए यह फैसला लिया गया. हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि समुद्री नाकाबंदी अभी भी जारी रहेगी. पाकिस्तान ने ट्रंप को कहा धन्यवाद पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने ट्रंप के फैसले का स्वागत किया है. उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा कि ट्रंप का यह कदम क्षेत्रीय शांति और स्थिरता को बढ़ावा देगा. शहबाज शरीफ ने कहा कि पाकिस्तान हमेशा कूटनीति और संवाद के जरिए विवादों के समाधान का समर्थन करता है. उन्होंने उम्मीद जतायी कि अमेरिका और ईरान के बीच जारी बातचीत से स्थायी शांति का रास्ता निकलेगा. होर्मुज स्ट्रेट क्यों अहम? होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में से एक माना जाता है. वैश्विक तेल और गैस सप्लाई का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है. ऐसे में यहां बढ़ता तनाव पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था और ऊर्जा बाजार पर असर डाल सकता है.  

surbhi मई 7, 2026 0
Oil pump jacks operating in desert with OPEC+ production increase news concept background
तेल बाजार में नया मोड़: UAE के बाहर होते ही OPEC+ ने बढ़ाया उत्पादन, सप्लाई संतुलन की कोशिश तेज

वैश्विक ऊर्जा बाजार में एक अहम बदलाव देखने को मिल रहा है। OPEC+ ने कच्चे तेल के उत्पादन में बढ़ोतरी का फैसला किया है, जो ऐसे समय आया है जब सप्लाई चेन पहले से दबाव में है। खास बात यह है कि यह निर्णय संयुक्त अरब अमीरात के संगठन से अलग होने के तुरंत बाद लिया गया है, जिससे बाजार में नई रणनीतिक हलचल शुरू हो गई है। उत्पादन बढ़ाने का फैसला क्यों लिया गया? हाल ही में हुई वर्चुअल बैठक में सऊदी अरब और रूस समेत सात प्रमुख देशों–इराक, कुवैत, कजाकिस्तान, अल्जीरिया और ओमान–ने मिलकर यह तय किया कि जून 2026 से प्रतिदिन 1.88 लाख बैरल अतिरिक्त कच्चे तेल का उत्पादन किया जाएगा। यह फैसला पहले से लागू स्वैच्छिक कटौती (Voluntary Cuts) में ढील देने का हिस्सा है, जिसकी शुरुआत अप्रैल 2023 में हुई थी। अब इन देशों का लक्ष्य है कि वैश्विक बाजार में सप्लाई की कमी को कम किया जाए और कीमतों को स्थिर रखा जा सके। ईरान संघर्ष और सप्लाई संकट का असर 28 फरवरी से जारी ईरान से जुड़े संघर्ष ने तेल बाजार को अस्थिर कर दिया है। विशेष रूप से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज–जो दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्गों में से एक है–के प्रभावित होने से सप्लाई बुरी तरह बाधित हुई है। ऐसे में OPEC+ देशों का मानना है कि उत्पादन बढ़ाकर बाजार में संतुलन बनाया जा सकता है। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया है कि परिस्थितियों के अनुसार इस फैसले की समीक्षा की जाती रहेगी। क्या यह कदम कीमतों को काबू में रख पाएगा? विशेषज्ञों के अनुसार, उत्पादन बढ़ाने का यह कदम वैश्विक बाजार में राहत ला सकता है, लेकिन इसका असर पूरी तरह इस बात पर निर्भर करेगा कि भू-राजनीतिक हालात कितनी तेजी से बदलते हैं। इसके अलावा, जनवरी 2024 के बाद जिन देशों ने तय सीमा से अधिक उत्पादन किया है, उनके लिए यह मौका है कि वे अपनी अतिरिक्त उत्पादन की भरपाई कर सकें और Declaration of Cooperation के नियमों का पालन सुनिश्चित कर सकें। इस पूरी प्रक्रिया की निगरानी Joint Ministerial Monitoring Committee द्वारा की जाएगी। आगे क्या है रणनीति? OPEC+ देशों की अगली महत्वपूर्ण बैठक 7 जून 2026 को प्रस्तावित है। अब से संगठन हर महीने बैठक करेगा, ताकि बाजार की स्थिति–खासतौर पर कीमतों और सप्लाई–पर नजर रखी जा सके। फिलहाल संगठन “वेट एंड वॉच” की रणनीति पर काम कर रहा है, क्योंकि युद्ध और वैश्विक तनाव के चलते हालात तेजी से बदल सकते हैं।  

surbhi मई 4, 2026 0
US military personnel and armored vehicles at an American base in Germany amid troop withdrawal plans
US Troops Germany: जर्मनी से 5000 सैनिक वापस बुलाएगा अमेरिका, ईरान युद्ध पर ट्रंप-यूरोप में बढ़ी खाई

अमेरिका ने यूरोप में अपनी सैन्य रणनीति में बड़ा बदलाव करते हुए जर्मनी से 5,000 सैनिक वापस बुलाने का फैसला किया है। पेंटागन ने शुक्रवार को इसकी आधिकारिक घोषणा की। यह कदम ऐसे समय उठाया गया है, जब ईरान को लेकर जारी तनाव के बीच डोनाल्ड ट्रंप और यूरोपीय देशों के बीच मतभेद खुलकर सामने आ रहे हैं। 6-12 महीनों में पूरी होगी वापसी पेंटागन के अनुसार, सैनिकों की वापसी चरणबद्ध तरीके से अगले 6 से 12 महीनों में पूरी की जाएगी। इस फैसले के बाद यूरोप में तैनात अमेरिकी सैनिकों की संख्या घटकर 2022 से पहले के स्तर के करीब आ जाएगी। जर्मनी में अमेरिका की मजबूत सैन्य मौजूदगी जर्मनी में अमेरिका की सैन्य उपस्थिति यूरोप में सबसे बड़ी मानी जाती है। फिलहाल वहां करीब 35,000 अमेरिकी सैनिक तैनात हैं, जबकि पूरे यूरोप में यह संख्या 80,000 से 1,00,000 के बीच रहती है। जर्मनी में अमेरिका के कई अहम सैन्य ठिकाने मौजूद हैं, जिनमें: रामस्टीन एयर बेस – यूरोप में अमेरिकी वायुसेना का सबसे बड़ा केंद्र पैच बैरक्स – यूएस यूरोपियन और अफ्रीका कमांड का मुख्यालय विस्बाडेन – यूरोप-अफ्रीका कमान का संचालन केंद्र लैंडस्टुहल रीजनल मेडिकल सेंटर – अमेरिका के बाहर सबसे बड़ा सैन्य अस्पताल इसके अलावा ग्राफेनवोहर, होहेनफेल्स और स्पैंगडाहलेम जैसे कई बड़े ट्रेनिंग और एयर बेस भी यहीं स्थित हैं। क्यों बढ़ी अमेरिका-यूरोप में तकरार? यह फैसला ऐसे समय आया है, जब यूरोपीय देशों के साथ अमेरिका के रिश्तों में तनाव बढ़ रहा है। खासतौर पर जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज के उस बयान के बाद विवाद गहरा गया, जिसमें उन्होंने ईरान के साथ बातचीत में अमेरिका के “अपमानित” होने की बात कही थी। इस पर जवाब देते हुए डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि जर्मनी को ईरान पर टिप्पणी करने के बजाय यूक्रेन युद्ध खत्म करने और अपने आंतरिक हालात सुधारने पर ध्यान देना चाहिए। यूरोप के समर्थन की कमी पर नाराजगी रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिका इस बात से भी नाराज है कि कई यूरोपीय देशों ने ईरान के खिलाफ उसके सैन्य अभियानों में अपेक्षित समर्थन नहीं दिया। विशेष रूप से: स्पेन ने सहयोग से इनकार किया इटली ने भी सीमित समर्थन दिया इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी और अन्य नेताओं के साथ भी ट्रंप के मतभेद सामने आए हैं। नाटो सहयोगियों पर ट्रंप का आरोप डोनाल्ड ट्रंप लंबे समय से नाटो सहयोगियों पर आरोप लगाते रहे हैं कि वे अमेरिकी सुरक्षा ढांचे का फायदा उठाते हैं, लेकिन पर्याप्त योगदान नहीं करते। उन्होंने खास तौर पर होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों की सुरक्षा में यूरोपीय देशों की निष्क्रियता पर सवाल उठाए। ट्रांस-अटलांटिक रिश्तों पर असर विशेषज्ञों का मानना है कि जर्मनी से सैनिकों की वापसी का यह फैसला ट्रांस-अटलांटिक रिश्तों पर दबाव बढ़ा सकता है। अमेरिका चाहता है कि यूरोप अपनी सुरक्षा की जिम्मेदारी खुद उठाए और नाटो में ज्यादा खर्च करे।

surbhi मई 2, 2026 0
NATO headquarters flags with Spain and US flags symbolizing alliance tensions and diplomatic stance
स्पेन को NATO से बाहर नहीं किया जा सकता, अमेरिकी रिपोर्ट पर गठबंधन का बड़ा बयान

NATO ने साफ किया अपना रुख अमेरिका और स्पेन के बीच बढ़ते तनाव के बीच NATO ने स्पष्ट कर दिया है कि उसके नियमों में किसी सदस्य देश को निलंबित करने या बाहर निकालने का कोई प्रावधान नहीं है। यह बयान उस रिपोर्ट के बाद आया, जिसमें दावा किया गया था कि अमेरिका, ईरान युद्ध पर स्पेन के रुख से नाराज होकर उसके खिलाफ कार्रवाई पर विचार कर सकता है। क्या है पूरा मामला? रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी रक्षा विभाग के एक आंतरिक ईमेल में उन सहयोगी देशों के खिलाफ संभावित कदमों पर चर्चा की गई, जिन्होंने ईरान के खिलाफ अमेरिकी अभियान का खुलकर समर्थन नहीं किया। इस सूची में Spain का नाम प्रमुखता से सामने आया। स्पेन ने अपने सैन्य अड्डों का इस्तेमाल ईरान पर हमलों के लिए करने से इनकार कर दिया था। अमेरिका के दो महत्वपूर्ण सैन्य ठिकाने स्पेन में स्थित हैं। स्पेन के प्रधानमंत्री ने रिपोर्ट को किया खारिज स्पेन के प्रधानमंत्री Pedro Sánchez ने इस रिपोर्ट को गंभीरता से लेने से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि उनकी सरकार किसी लीक ईमेल के आधार पर नहीं, बल्कि आधिकारिक दस्तावेजों और अमेरिकी सरकार की औपचारिक नीति के आधार पर काम करती है। उन्होंने दोहराया कि स्पेन अपने सहयोगियों के साथ खड़ा है, लेकिन हमेशा अंतरराष्ट्रीय कानून के दायरे में। ट्रंप प्रशासन की नाराजगी अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump और रक्षा मंत्री Pete Hegseth लगातार यूरोपीय सहयोगियों पर निशाना साध रहे हैं। उनका आरोप है कि यूरोप अमेरिकी सुरक्षा पर निर्भर है, लेकिन संकट के समय पर्याप्त सहयोग नहीं करता। हेगसेथ ने कहा कि यूरोप को सिर्फ बयान देने के बजाय वास्तविक योगदान देना चाहिए। फॉकलैंड मुद्दे का भी जिक्र रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि अमेरिका, ब्रिटेन के फॉकलैंड द्वीपों पर अपने समर्थन की समीक्षा कर सकता है। यह द्वीप लंबे समय से Argentina और United Kingdom के बीच विवाद का केंद्र रहे हैं। यूरोपीय देशों ने दिखाई एकजुटता इटली की प्रधानमंत्री Giorgia Meloni ने NATO की एकता बनाए रखने पर जोर दिया। वहीं, जर्मनी ने भी स्पष्ट कहा कि स्पेन की सदस्यता पर कोई सवाल नहीं उठता। NATO में स्पेन की सदस्यता सुरक्षित हालिया विवाद के बावजूद, NATO के नियम स्पष्ट हैं। किसी सदस्य देश को संगठन से निकालना आसान नहीं है, और फिलहाल स्पेन की सदस्यता पर कोई खतरा नजर नहीं आता। हालांकि, इस घटनाक्रम ने अमेरिका और उसके यूरोपीय सहयोगियों के बीच बढ़ती खाई को जरूर उजागर कर दिया है।  

surbhi अप्रैल 25, 2026 0
Fuel station in Bangladesh with rising petrol diesel prices amid Middle East crisis and global oil surge
बांग्लादेश में पेट्रोल-डीजल महंगा, मिडिल ईस्ट युद्ध का सीधा असर

मिडिल ईस्ट में जारी संघर्ष का असर अब दक्षिण एशिया तक साफ दिखाई देने लगा है। Bangladesh ने पेट्रोल और डीजल की कीमतों में 10% से 15% तक की बढ़ोतरी कर दी है। वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में तेजी और सप्लाई चेन में बाधा के चलते यह फैसला लिया गया। नई कीमतें क्या हैं? ऊर्जा मंत्रालय की अधिसूचना के अनुसार नई दरें इस प्रकार हैं: पेट्रोल: 135 टका ($1.10) प्रति लीटर (पहले 116 टका) डीजल: 115 टका प्रति लीटर मिट्टी का तेल (केरोसिन): 130 टका प्रति लीटर क्यों बढ़ानी पड़ी कीमतें? सरकार के मुताबिक यह फैसला मजबूरी में लिया गया है। इसके पीछे कई बड़े कारण हैं: मिडिल ईस्ट संकट: Iran से जुड़ा युद्ध सात हफ्तों से जारी है, जिससे तेल आपूर्ति प्रभावित हुई है। महंगा आयात: समुद्री मार्गों पर असुरक्षा के कारण फ्रेट और इंश्योरेंस लागत बढ़ गई है। विदेशी मुद्रा पर दबाव: बांग्लादेश अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर है, जिससे उसका फॉरेक्स रिजर्व तेजी से घट रहा है। आम जनता पर असर ईंधन महंगा होने से सीधे तौर पर आम लोगों की जेब पर असर पड़ेगा: परिवहन महंगा: बस, ट्रक और अन्य वाहनों का किराया बढ़ सकता है। खाद्य महंगाई: डीजल महंगा होने से खेती और सप्लाई लागत बढ़ेगी, जिससे खाने-पीने की चीजें महंगी होंगी। पैनिक बाइंग: कई जगह पेट्रोल पंपों पर लंबी कतारें देखी जा रही हैं। अर्थव्यवस्था पर बढ़ता दबाव Dhaka पहले ही बढ़ते ऊर्जा बिल से जूझ रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, सरकार ने ईंधन आयात को बनाए रखने के लिए 2 बिलियन डॉलर से ज्यादा की अंतरराष्ट्रीय वित्तीय मदद की मांग की है। मिडिल ईस्ट का भू-राजनीतिक तनाव अब वैश्विक अर्थव्यवस्था पर सीधा असर डाल रहा है। बांग्लादेश में ईंधन कीमतों में बढ़ोतरी इसका ताजा उदाहरण है। अगर हालात नहीं सुधरे, तो आने वाले समय में महंगाई और आर्थिक दबाव और बढ़ सकता है।  

surbhi अप्रैल 20, 2026 0
Residents in Tehran amid rising US-Iran tensions and uncertainty after failed peace talks.
US-Iran तनाव के बीच बढ़ी चिंता: शांति वार्ता नाकाम, जंग की आशंका से डरे ईरानी नागरिक

  मध्य पूर्व में जारी तनाव के बीच ईरान और अमेरिका के बीच शांति वार्ता के विफल होने के बाद हालात और संवेदनशील हो गए हैं। पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में हुई बातचीत बिना किसी समझौते के समाप्त हो गई, जिससे दोनों देशों के बीच जारी युद्धविराम पर भी खतरा मंडराने लगा है। युद्धविराम पर संकट, सैन्य गतिविधियां तेज अमेरिकी सेना ने ईरानी बंदरगाहों से आने-जाने वाले जहाजों की निगरानी और संभावित नाकेबंदी के संकेत दिए हैं। इसके जवाब में ईरान ने खाड़ी क्षेत्र में कड़ी प्रतिक्रिया की चेतावनी दी है। बढ़ती सैन्य गतिविधियों के बीच किसी भी समय हालात बिगड़ने की आशंका जताई जा रही है। आम लोगों में डर और अनिश्चितता ईरान के शहर करज और राजधानी तेहरान में रहने वाले लोगों के बीच गहरी चिंता देखी जा रही है। एक स्थानीय युवक ने कहा कि उसे उम्मीद थी कि बातचीत से हल निकलेगा, लेकिन अब उसे लगता है कि युद्ध कभी भी दोबारा शुरू हो सकता है। वहीं, एक युवती ने उम्मीद जताई कि हालात जल्द सामान्य होंगे और बातचीत के जरिए समाधान निकलेगा। इंटरनेट बंदी से बढ़ी मुश्किलें ईरान में पिछले कई हफ्तों से इंटरनेट सेवाएं बाधित हैं, जिससे लोग बाहरी दुनिया से कट गए हैं। सरकार का कहना है कि यह कदम साइबर हमलों से बचाव के लिए उठाया गया है, लेकिन आम नागरिकों और व्यवसायों को इससे भारी नुकसान झेलना पड़ रहा है। कंटेंट क्रिएटर और छोटे कारोबारी खासतौर पर प्रभावित हुए हैं। एक स्थानीय नागरिक ने कहा, “कोई भी इस संघर्ष में नहीं जीत रहा है, लेकिन आम लोगों की जिंदगी जरूर मुश्किल हो गई है।” आर्थिक संकट और भविष्य की चिंता युद्ध और प्रतिबंधों के कारण ईरान की अर्थव्यवस्था पहले से ही दबाव में है। लोगों का कहना है कि भले ही युद्ध खत्म हो जाए, लेकिन कमजोर आर्थिक स्थिति के चलते जीवन आसान नहीं होगा। कुछ नागरिकों का मानना है कि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप घरेलू राजनीतिक कारणों से सख्त रुख अपनाए हुए हैं, जिससे समझौते की संभावना और कम हो गई है। शांति वार्ता के अगले दौर की कोई तारीख तय नहीं हुई है। ऐसे में ईरान के लोग अनिश्चितता, डर और उम्मीद के बीच जी रहे हैं। अगर जल्द कोई समाधान नहीं निकला, तो क्षेत्र में तनाव और बढ़ सकता है।  

surbhi अप्रैल 16, 2026 0
China warns US over Hormuz Strait blockade amid rising Middle East energy tensions and global oil concerns
Hormuz Blockade: चीन की अमेरिका को चेतावनी–‘दखल मत दो’, बढ़ा वैश्विक तनाव

मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच China ने United States को कड़ा संदेश दिया है। होर्मुज जलडमरूमध्य पर अमेरिकी नाकेबंदी के बाद चीन ने साफ कहा है कि वह उसके व्यापारिक और ऊर्जा हितों में दखल बर्दाश्त नहीं करेगा। चीन के रक्षा मंत्री का सख्त बयान चीन के रक्षा मंत्री Dong Jun ने चेतावनी देते हुए कहा: अमेरिका होर्मुज स्ट्रेट पर नाकेबंदी न करे चीन-ईरान संबंधों में हस्तक्षेप से बचे यह जलमार्ग चीन के लिए खुला रहना चाहिए उन्होंने कहा कि चीन के Iran के साथ महत्वपूर्ण ट्रेड और एनर्जी समझौते हैं, इसलिए किसी भी तरह की बाधा स्वीकार नहीं होगी। होर्मुज जलडमरूमध्य क्यों है अहम? Strait of Hormuz दुनिया के सबसे अहम समुद्री मार्गों में से एक है। चीन के लिए इसकी अहमियत: करीब 40% कच्चा तेल यहीं से आता है लगभग 30% LNG सप्लाई इसी रास्ते से होती है इसी वजह से चीन लगातार सीजफायर और स्थिरता की मांग कर रहा है। अमेरिका की नाकेबंदी से बढ़ा तनाव Donald Trump के निर्देश पर अमेरिका ने होर्मुज स्ट्रेट के जरिए Iran के बंदरगाहों तक जाने वाले समुद्री रास्तों पर नाकेबंदी लागू कर दी है। United States Central Command (CENTCOM) के मुताबिक: यह नाकेबंदी सभी जहाजों पर लागू होगी किसी देश के साथ भेदभाव नहीं किया जाएगा ईरानी पोर्ट्स से जुड़े हर समुद्री मार्ग पर निगरानी रहेगी पेट्रोडॉलर vs युआन की जंग? कुछ एक्सपर्ट्स का मानना है कि यह कदम सिर्फ सुरक्षा नहीं, बल्कि आर्थिक रणनीति भी हो सकता है। खाड़ी क्षेत्र में कुछ तेल सौदे युआन में हो रहे हैं यह पारंपरिक पेट्रोडॉलर सिस्टम को चुनौती देता है ऐसे में अमेरिका की कार्रवाई चीन की आर्थिक पकड़ को कमजोर करने की कोशिश भी मानी जा रही है सीजफायर के पक्ष में चीन तनाव के बीच चीन के विदेश मंत्रालय ने कहा: होर्मुज की सुरक्षा और स्थिरता पूरी दुनिया के हित में है बिना रुकावट जहाजों की आवाजाही जरूरी है सभी पक्षों को संयम बरतना चाहिए क्या आगे बढ़ेगा टकराव? अमेरिका की नाकेबंदी और चीन की चेतावनी के बाद हालात और संवेदनशील हो गए हैं। अगर कूटनीतिक हल नहीं निकला, तो इसका असर: वैश्विक तेल कीमतों सप्लाई चेन और अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर साफ तौर पर देखने को मिल सकता है।  

surbhi अप्रैल 14, 2026 0
Rajnath Singh addressing public event warning Pakistan amid Iran conflict and rising geopolitical tensions
ईरान युद्ध के बीच राजनाथ सिंह की चेतावनी: “पाकिस्तान ने हरकत की तो मिलेगा करारा जवाब”

नई दिल्ली/केरल: मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने पाकिस्तान को सख्त चेतावनी दी है। उन्होंने कहा कि अगर ईरान युद्ध की आड़ में पाकिस्तान कोई “गलत हरकत” करता है, तो भारत उसे पहले से भी ज्यादा कड़ा और निर्णायक जवाब देगा। “पड़ोसी देश साजिश कर सकता है” केरल में एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए रक्षा मंत्री ने कहा: “मौजूदा हालात में हमारा पड़ोसी देश साजिश कर सकता है, लेकिन भारत पूरी तरह तैयार है।” ऑपरेशन ‘सिंदूर’ की दिलाई याद राजनाथ सिंह ने पाकिस्तान को ऑपरेशन सिंदूर की याद दिलाते हुए कहा: भारतीय सेना ने सिर्फ 22 मिनट में जवाबी कार्रवाई की थी पाकिस्तान के अंदर घुसकर 9 आतंकी ठिकानों को तबाह किया गया इस कार्रवाई के बाद पाकिस्तान को सीज़फायर की मांग करनी पड़ी यह ऑपरेशन 22 अप्रैल 2025 को पहलगाम आतंकी हमले (25 पर्यटकों की मौत) के बाद शुरू हुआ था। ऊर्जा संकट पर भी दिया भरोसा रक्षा मंत्री ने साफ किया कि: देश में ईंधन और गैस की कोई कमी नहीं है भारत किसी भी ऊर्जा संकट से निपटने के लिए तैयार है होर्मुज जलडमरूमध्य पर नजर उन्होंने बताया कि: भारतीय नौसेना होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाले टैंकरों की सुरक्षा कर रही है सरकार पश्चिम एशिया की स्थिति पर करीबी नजर बनाए हुए है कूटनीतिक मोर्चे पर भी सक्रिय भारत राजनाथ सिंह ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने कूटनीतिक प्रयासों के जरिए खाड़ी क्षेत्र में भारत के हितों की रक्षा कर रहे हैं। पाकिस्तान के दावों पर सवाल पाकिस्तान खुद को अमेरिका-ईरान विवाद में मध्यस्थ बता रहा है लेकिन ईरान ने इन दावों को खारिज कर दिया, जिससे पाकिस्तान की स्थिति कमजोर दिख रही है

surbhi अप्रैल 2, 2026 0
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शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

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बिहार में असिस्टेंट प्रोफेसर बनने के नियम बदले, जानिए कब जरूरी होगा NET ?

abhishek singh जुलाई 2, 2026 0