Iran और United States के बीच कथित युद्ध को लेकर एक बड़ा दावा सामने आया है। अमेरिकी संसद से जुड़ी एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा जा रहा है कि ईरान पर 40 दिनों तक चले सैन्य अभियान के दौरान अमेरिका के 42 विमान या तो नष्ट हो गए या गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हुए। इस दावे के बाद वैश्विक स्तर पर अमेरिका की सैन्य क्षमता, युद्ध रणनीति और अभियान की वास्तविक कीमत को लेकर नई बहस शुरू हो गई है। क्या कहा गया रिपोर्ट में? रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका और Israel ने मिलकर ईरान के खिलाफ कथित “ऑपरेशन एपिक फ्यूरी” चलाया था। इस अभियान के तहत हवाई, समुद्री और मिसाइल हमले किए गए। बताया गया कि इस संघर्ष में अमेरिका को भारी सैन्य नुकसान उठाना पड़ा। रिपोर्ट में जिन सैन्य संसाधनों के नुकसान का दावा किया गया, उनमें शामिल हैं: चार F-15E स्ट्राइक ईगल लड़ाकू विमान, एक F-35A लाइटनिंग द्वितीय लड़ाकू विमान, एक ए-10 थंडरबोल्ट द्वितीय हमला विमान, सात KC-135 स्ट्रैटोटैंकर ईंधन भरने वाले विमान, एक E-3 सेंट्री एडब्ल्यूएसीएस विमान, दो एमसी-130जे कमांडो द्वितीय विशेष अभियान विमान, एक एचएच-60डब्ल्यू जॉली ग्रीन द्वितीय हेलीकॉप्टर, 24 एमक्यू-9 रीपर ड्रोन और एक एमक्यू-4सी ट्राइटन ड्रोन शामिल हैं. रिपोर्ट में कहा गया कि आंकड़े आगे बदल सकते हैं क्योंकि कई सूचनाएं अब भी गोपनीय हैं। 29 अरब डॉलर तक पहुंची युद्ध लागत रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी रक्षा विभाग की सुनवाई में पेंटागन के कार्यवाहक कंट्रोलर Jules W. Hurst III ने कहा कि ईरान में सैन्य अभियान की लागत लगभग 29 अरब डॉलर तक पहुंच गई। ईरान ने क्या कहा? ईरान के विदेश मंत्री Seyed Abbas Araghchi ने इस रिपोर्ट को लेकर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि अमेरिका ने खुद अपने भारी नुकसान को स्वीकार किया है। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा कि: “ईरान की सेना दुनिया की पहली सेना बनी जिसने F-35 लड़ाकू विमान को मार गिराया।” अराघची ने दावा किया कि ईरान ने इस युद्ध से कई रणनीतिक सबक सीखे हैं और भविष्य में दुनिया को “और बड़े सरप्राइज” देखने को मिल सकते हैं। F-35 को गिराने का दावा कितना बड़ा? F-35 Lightning II को दुनिया के सबसे उन्नत स्टेल्थ फाइटर जेट्स में गिना जाता है। यदि किसी देश द्वारा इसे मार गिराने का दावा सही साबित होता है, तो यह आधुनिक सैन्य इतिहास की बड़ी घटनाओं में शामिल हो सकता है। हालांकि अमेरिका की ओर से अब तक सार्वजनिक रूप से ऐसे किसी नुकसान की विस्तृत पुष्टि नहीं की गई है। वैश्विक स्तर पर बढ़ी चिंता विश्लेषकों का मानना है कि यदि रिपोर्ट में किए गए दावे सही हैं, तो यह मध्य पूर्व में शक्ति संतुलन और आधुनिक हवाई युद्ध की रणनीतियों पर बड़ा असर डाल सकता है। ईरान, अमेरिका और इजराइल के बीच बढ़ता तनाव पहले ही वैश्विक ऊर्जा बाजार, समुद्री सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय राजनीति को प्रभावित कर रहा है।
Strait of Hormuz में बढ़ते तनाव और Iran, United States तथा Israel के बीच जारी टकराव का असर अब पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर दिखाई देने लगा है। दुनिया के करीब 20 फीसदी कच्चे तेल की सप्लाई इसी समुद्री मार्ग से गुजरती है। जहाजों की आवाजाही प्रभावित होने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल आया है, जिसका सीधा असर पेट्रोल-डीजल के दामों पर पड़ रहा है। कई देशों में तेल की कीमतें आसमान पर हालिया आंकड़ों के अनुसार कई देशों में ईंधन की कीमतों में रिकॉर्ड बढ़ोतरी दर्ज की गई है। तेल की कीमतों में बढ़ोतरी Malaysia – 56% Pakistan – 55% United Arab Emirates – 52% United States – 45% Canada – 32% China – 22% United Kingdom – 19% रिपोर्ट्स के मुताबिक दुनिया के लगभग 85 देशों में ईंधन की कीमतें बढ़ी हैं। कई देशों में अभी और संशोधन बाकी हैं, इसलिए आने वाले हफ्तों में कीमतें और बढ़ सकती हैं। पाकिस्तान और मलेशिया में सबसे ज्यादा असर विशेषज्ञों के मुताबिक पाकिस्तान और मलेशिया जैसे देशों की अर्थव्यवस्था आयातित ईंधन पर काफी निर्भर है। ऐसे में वैश्विक सप्लाई चेन बाधित होने का असर वहां सबसे ज्यादा दिखाई दे रहा है। इन देशों में ट्रांसपोर्ट, बिजली और रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतों पर भी दबाव बढ़ने लगा है। अमेरिका और यूरोप में भी महंगाई का खतरा अमेरिका में पेट्रोल की कीमतों में करीब 45% तक बढ़ोतरी दर्ज की गई है। विश्लेषकों का मानना है कि यदि पश्चिम एशिया में तनाव जारी रहा तो ऊर्जा संकट और महंगाई दोनों बढ़ सकते हैं। United Kingdom और यूरोप के अन्य देशों में भी तेल की बढ़ती कीमतें आर्थिक चिंता का बड़ा कारण बन रही हैं। भारत में फिलहाल कीमतें स्थिर दूसरी ओर India में फिलहाल पेट्रोल-डीजल की कीमतों में कोई बड़ी बढ़ोतरी नहीं हुई है। Delhi समेत कई शहरों में पिछले करीब डेढ़ साल से ईंधन की कीमतें लगभग स्थिर बनी हुई हैं। आखिरी बड़ा बदलाव अक्टूबर 2024 में देखा गया था। रिपोर्ट्स के अनुसार इस दौरान भारत में पेट्रोल की कीमत में केवल मामूली बढ़ोतरी दर्ज हुई है। आने वाले दिनों में और बढ़ सकती है चिंता ऊर्जा विशेषज्ञों का कहना है कि यदि मिडिल ईस्ट में तनाव और बढ़ता है या होर्मुज स्ट्रेट लंबे समय तक प्रभावित रहता है, तो वैश्विक तेल बाजार में और अस्थिरता आ सकती है। इसका असर सिर्फ पेट्रोल-डीजल ही नहीं, बल्कि परिवहन, खाद्य पदार्थों और रोजमर्रा की जरूरतों की कीमतों पर भी पड़ सकता है।
अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने ईरान की ओर से भेजे गए नए शांति प्रस्ताव को पूरी तरह “अनएक्सेप्टेबल” यानी अस्वीकार्य करार दिया है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, ईरान ने अमेरिका के साथ करीब 10 हफ्तों से जारी तनाव और संघर्ष को खत्म करने के लिए कई शर्तें रखी थीं, जिनमें युद्ध के नुकसान का मुआवजा और होर्मुज स्ट्रेट पर ईरान के नियंत्रण को मान्यता देना शामिल है। पाकिस्तान के जरिए भेजा गया प्रस्ताव रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान ने अपना प्रस्ताव पाकिस्तान के माध्यम से अमेरिका तक पहुंचाया। प्रस्ताव में कहा गया कि अगर अमेरिका युद्ध रोकना चाहता है तो उसे पहले तत्काल संघर्षविराम लागू करना होगा और भविष्य में किसी भी नए हमले की गारंटी देनी होगी। ईरान ने यह भी मांग की कि युद्ध के दौरान हुए नुकसान की आर्थिक भरपाई की जाए। इसके साथ ही उसने Strait of Hormuz पर अपनी संप्रभुता को औपचारिक रूप से स्वीकार करने की बात कही। तेल प्रतिबंध हटाने की मांग ईरान ने प्रस्ताव में अमेरिकी वित्त विभाग के Office of Foreign Assets Control यानी OFAC द्वारा लगाए गए तेल निर्यात प्रतिबंधों में अस्थायी राहत की मांग भी रखी। तेहरान चाहता है कि कम से कम 30 दिनों के लिए उसके तेल निर्यात पर लगी पाबंदियां हटाई जाएं और समुद्री घेराबंदी समाप्त की जाए, ताकि उसकी अर्थव्यवस्था को राहत मिल सके। होर्मुज स्ट्रेट बना सबसे बड़ा मुद्दा दुनिया के सबसे अहम तेल व्यापार मार्गों में से एक Strait of Hormuz इस पूरे विवाद का केंद्र बन गया है। ईरान ने संकेत दिया है कि अगर अमेरिका उसकी कुछ शर्तें मान लेता है, तो इस रणनीतिक समुद्री मार्ग का प्रबंधन उसके नियंत्रण में रहेगा। हालांकि, ईरान ने यह स्पष्ट नहीं किया कि वह कौन-सी शर्तें हैं जिनके बदले वह क्षेत्रीय तनाव कम करने को तैयार होगा। परमाणु कार्यक्रम पर भी तनातनी The Wall Street Journal की रिपोर्ट के अनुसार, ईरान ने संकेत दिया है कि वह सीमित समय के लिए यूरेनियम संवर्धन रोकने को तैयार हो सकता है, लेकिन अमेरिका के 20 साल वाले प्रस्ताव को स्वीकार करने के पक्ष में नहीं है। तेहरान ने अपने परमाणु ठिकानों को खत्म करने की मांग को भी साफ तौर पर खारिज कर दिया है। इससे साफ है कि परमाणु कार्यक्रम को लेकर दोनों देशों के बीच अब भी गहरा मतभेद बना हुआ है। ट्रंप ने क्यों ठुकराया प्रस्ताव? अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने कहा कि ईरान की शर्तें अमेरिका के लिए स्वीकार्य नहीं हैं। उनका मानना है कि होर्मुज स्ट्रेट पर ईरान को ज्यादा नियंत्रण देना और मुआवजे की मांग मानना अमेरिकी रणनीतिक हितों के खिलाफ होगा।
अमेरिका और ईरान के बीच तनाव एक बार फिर खतरनाक मोड़ पर पहुंचता दिखाई दे रहा है. अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने दावा किया है कि होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजर रहे अमेरिकी नौसेना के तीन युद्धपोतों पर हमला किया गया. हालांकि उन्होंने कहा कि अमेरिकी जहाज सुरक्षित रहे, लेकिन जवाबी कार्रवाई में ईरानी हमलावरों को भारी नुकसान पहुंचाया गया. ट्रंप का दावा- अमेरिकी जहाजों पर हुआ हमला ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर पोस्ट करते हुए कहा कि अमेरिकी नौसेना के तीन आधुनिक डेस्ट्रॉयर युद्धपोत सफलतापूर्वक होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजर रहे थे, तभी उन पर हमला किया गया. उनके मुताबिक, अमेरिकी सेना ने तुरंत जवाबी कार्रवाई की और हमलावरों को भारी नुकसान पहुंचाया. हालांकि ट्रंप ने यह साफ नहीं किया कि हमला किस प्रकार का था और इसमें कितना नुकसान हुआ. अमेरिकी रक्षा विभाग की ओर से भी इस घटना को लेकर विस्तृत जानकारी अभी सामने नहीं आई है. ईरान को दी बड़ी धमकी ट्रंप ने ईरान को चेतावनी देते हुए कहा कि अगर तेहरान जल्द किसी समझौते पर हस्ताक्षर नहीं करता, तो अमेरिका भविष्य में और ज्यादा कठोर तथा हिंसक कार्रवाई कर सकता है. उन्होंने कहा कि अमेरिका अब भी डील के लिए तैयार है, लेकिन ईरान को तेजी से फैसला लेना होगा. ट्रंप के इस बयान के बाद पश्चिम एशिया में तनाव और बढ़ने की आशंका जताई जा रही है. विशेषज्ञों का मानना है कि अगर हालात जल्द नियंत्रित नहीं हुए, तो इसका असर वैश्विक तेल बाजार और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर भी पड़ सकता है. संघर्ष विराम के बाद फिर बढ़ा तनाव यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है, जब 8 अप्रैल को लागू संघर्ष विराम के बाद क्षेत्र में हालात कुछ शांत माने जा रहे थे. अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान के खिलाफ की गई सैन्य कार्रवाई के बाद दोनों पक्षों के बीच तनाव कुछ कम हुआ था, लेकिन अब फिर हालात बिगड़ते नजर आ रहे हैं. ईरान की सेना ने आरोप लगाया है कि अमेरिका ने होर्मुज जलडमरूमध्य में मौजूद एक ईरानी तेल टैंकर और दूसरे जहाज को निशाना बनाया. ईरानी सैन्य अधिकारियों का कहना है कि अमेरिकी कार्रवाई संघर्ष विराम का उल्लंघन है. ईरान का पलटवार का दावा ईरानी सेना के संयुक्त कमांड ने कहा कि उसने जवाबी कार्रवाई करते हुए होर्मुज जलडमरूमध्य के पूर्वी हिस्से और चाबहार बंदरगाह के दक्षिण में मौजूद अमेरिकी सैन्य जहाजों को निशाना बनाया. इसके अलावा ईरान ने अमेरिका पर किश्म द्वीप और बंदर खमीर व सीरिक जैसे तटीय इलाकों में हवाई हमले करने का भी आरोप लगाया है. ईरान का कहना है कि इन हमलों में नागरिक क्षेत्रों को भी नुकसान पहुंचा. परमाणु विवाद बना बड़ी वजह अमेरिका और ईरान के बीच जारी यह तनाव परमाणु कार्यक्रम को लेकर लंबे समय से चल रहे विवाद से भी जुड़ा हुआ है. वॉशिंगटन अभी भी ईरान से अपने प्रस्ताव पर जवाब का इंतजार कर रहा है. अमेरिका चाहता है कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम पर नई शर्तों को स्वीकार करे, जबकि तेहरान कई मुद्दों पर अब भी सख्त रुख अपनाए हुए है. वैश्विक बाजार पर पड़ सकता है असर होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे अहम तेल व्यापार मार्गों में गिना जाता है. यहां किसी भी तरह का सैन्य तनाव सीधे कच्चे तेल की कीमतों और वैश्विक सप्लाई चेन को प्रभावित करता है. विश्लेषकों का मानना है कि यदि अमेरिका और ईरान के बीच हालात और बिगड़ते हैं, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में बड़ा उछाल देखने को मिल सकता है.
मिडिल ईस्ट में जारी तनाव के बीच एक नई रिपोर्ट में दावा किया गया है कि ईरान ने अमेरिकी सैन्य ठिकानों को बड़ा नुकसान पहुंचाया है। रिपोर्ट के मुताबिक, ईरानी हमलों में 8 देशों में फैले अमेरिका के कम से कम 16 सैन्य ठिकाने क्षतिग्रस्त हुए हैं, जिससे क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य रणनीति और सुरक्षा तैयारियों पर सवाल खड़े हो गए हैं। CNN रिपोर्ट में बड़ा दावा CNN की रिपोर्ट के अनुसार, जांच और सैटेलाइट तस्वीरों से पता चला है कि ईरान ने हालिया हमलों में अमेरिका के कई अहम सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया। इन हमलों में खासतौर पर: एडवांस्ड रडार सिस्टम कम्युनिकेशन इंफ्रास्ट्रक्चर एयरक्राफ्ट और सपोर्ट सिस्टम को टारगेट किया गया। रिपोर्ट में कहा गया है कि कुछ ठिकाने इतने ज्यादा क्षतिग्रस्त हुए हैं कि वे फिलहाल आंशिक इस्तेमाल के लायक भी नहीं बचे। 8 देशों में फैले ठिकाने बने निशाना रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका के जिन सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया गया, वे मिडिल ईस्ट और खाड़ी क्षेत्र के 8 अलग-अलग देशों में स्थित हैं। हालांकि सभी देशों के नाम सार्वजनिक नहीं किए गए हैं, लेकिन यह अमेरिकी क्षेत्रीय सैन्य नेटवर्क के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है। इन ठिकानों का इस्तेमाल आमतौर पर: निगरानी अभियानों एयर ऑपरेशंस लॉजिस्टिक सपोर्ट क्षेत्रीय सुरक्षा समन्वय के लिए किया जाता है। मरम्मत या बंद? अमेरिका के सामने चुनौती रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी और खाड़ी देशों के अधिकारियों के बीच इस बात पर मतभेद है कि इन ठिकानों की मरम्मत की जाए या कुछ को स्थायी रूप से बंद कर दिया जाए। कुछ अधिकारी मानते हैं कि इन ठिकानों को दोबारा तैयार करना बेहद महंगा और समय लेने वाला होगा। वहीं, रणनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि इन बेस को छोड़ना अमेरिका के लिए क्षेत्रीय प्रभाव कम कर सकता है। महंगे सिस्टम को हुआ नुकसान ईरानी हमलों में जिन सिस्टम्स को नुकसान पहुंचा है, उनमें हाई-टेक रडार और कम्युनिकेशन नेटवर्क शामिल हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, ये सिस्टम सीमित संख्या में उपलब्ध होते हैं और इन्हें बदलना काफी महंगा साबित हो सकता है। यही वजह है कि इन हमलों को सिर्फ सामरिक नहीं, बल्कि आर्थिक झटका भी माना जा रहा है। युद्ध में अमेरिका का भारी खर्च पेंटागन के कंट्रोलर जूल्स जे हर्स्ट III ने अमेरिकी सांसदों को बताया कि ईरान के साथ संघर्ष में अब तक अमेरिका करीब 25 अरब डॉलर खर्च कर चुका है। हालांकि कुछ आकलनों के मुताबिक, वास्तविक खर्च 40 से 50 अरब डॉलर के बीच हो सकता है। अमेरिकी मौजूदगी पर उठे सवाल मिडिल ईस्ट में अमेरिका की सैन्य मौजूदगी लंबे समय से उसकी रणनीतिक नीति का हिस्सा रही है। लेकिन लगातार हमलों और बढ़ते खर्च ने इस मॉडल पर सवाल खड़े कर दिए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर ऐसे हमले जारी रहे, तो अमेरिका को क्षेत्र में अपनी सैन्य रणनीति पर दोबारा विचार करना पड़ सकता है। बढ़ता क्षेत्रीय तनाव ईरान और अमेरिका के बीच तनाव पहले से ही चरम पर है। परमाणु विवाद, समुद्री मार्गों पर नियंत्रण और क्षेत्रीय प्रभाव को लेकर दोनों देशों में टकराव लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर हुए हमलों ने स्थिति को और संवेदनशील बना दिया है। आगे क्या? फिलहाल अमेरिका की ओर से इन दावों पर कोई विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। लेकिन रिपोर्ट्स के बाद यह साफ है कि मिडिल ईस्ट में संघर्ष केवल राजनीतिक या आर्थिक नहीं, बल्कि अब सैन्य ढांचे को भी सीधे प्रभावित कर रहा है।
Iran US Tension: ईरान और अमेरिका के बीच संभावित बातचीत की अटकलों के बीच तेहरान ने सख्त रुख अपनाया है। ईरान ने साफ कर दिया है कि वह अमेरिकी दबाव और धमकियों के बीच किसी भी वार्ता को स्वीकार नहीं करेगा। ईरान का तीखा बयान ईरानी संसद (मजलिस) के स्पीकर Mohammad Bagher Ghalibaf ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर अमेरिका पर तीखा हमला बोला। उन्होंने लिखा: “ट्रंप घेराबंदी और युद्धविराम तोड़कर बातचीत की मेज़ को आत्मसमर्पण की मेज़ बनाना चाहते हैं या फिर युद्ध को सही ठहराना चाहते हैं।” ग़ालिबाफ़ ने साफ कहा कि ईरान “धमकियों के साये में बातचीत” नहीं करेगा। ‘मैदान-ए-जंग में नए पत्ते खोलने की तैयारी’ ग़ालिबाफ़ ने अपने बयान में संकेत दिया कि ईरान सैन्य विकल्पों के लिए भी तैयार है। उन्होंने कहा: “पिछले दो हफ्तों से हमने मैदान-ए-जंग में नए पत्ते खोलने की तैयारी कर ली है।” यह बयान ऐसे समय आया है जब क्षेत्र में तनाव लगातार बढ़ रहा है। ट्रंप की रणनीति पर सवाल अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump लगातार ईरान पर दबाव बना रहे हैं और समझौते की बात कर रहे हैं। लेकिन ईरान का आरोप है कि: अमेरिका एक तरफ बातचीत की बात करता है दूसरी तरफ सैन्य दबाव और नाकेबंदी जारी रखता है पाकिस्तान में वार्ता पर अनिश्चितता Islamabad में दूसरे दौर की बातचीत की तैयारियां चल रही हैं। अमेरिका ने अपना प्रतिनिधिमंडल भेजने की बात कही है। हालांकि, ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता Esmail Baghaei ने कहा: अभी तक वार्ता को लेकर कोई अंतिम फैसला नहीं लिया गया है ईरान फिलहाल स्थिति का आकलन कर रहा है पहले दौर की बातचीत का संदर्भ ईरान और अमेरिका के बीच पहले दौर की बातचीत पहले ही हो चुकी है, जिसमें Mohammad Bagher Ghalibaf ने ईरान का नेतृत्व किया था। हालांकि, वह वार्ता किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंच सकी।
US Iran War: ईरान और अमेरिका के बीच तनाव एक बार फिर बढ़ गया है। इस्लामाबाद में प्रस्तावित दूसरे दौर की वार्ता फिलहाल स्थगित हो गई है, क्योंकि ईरान ने स्पष्ट कर दिया है कि वह फिलहाल किसी भी बातचीत में शामिल होने के मूड में नहीं है। इसी बीच पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच फोन पर बातचीत की खबर सामने आई है। ईरान ने बातचीत से किया इनकार ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने साफ कहा है कि तेहरान के पास फिलहाल अमेरिका के साथ किसी भी नए दौर की वार्ता की कोई योजना नहीं है। यह बयान ऐसे समय आया है जब पाकिस्तान में शांति वार्ता की कोशिशें तेज थीं और मध्यस्थता की तैयारी चल रही थी। मुनीर-ट्रंप फोन कॉल में क्या हुआ? रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से फोन पर बातचीत की। इस बातचीत में बताया गया कि: होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव वार्ता के लिए सबसे बड़ा रोड़ा है ईरान की स्थिति के कारण बातचीत आगे बढ़ना मुश्किल हो रहा है बताया जा रहा है कि ट्रंप ने इस मुद्दे पर “गंभीरता से विचार करने” की बात कही है। होर्मुज संकट बना मुख्य वजह होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव लगातार बढ़ रहा है। अमेरिका और ईरान दोनों एक-दूसरे पर आरोप लगा रहे हैं। हाल ही में: अमेरिका ने ईरानी ध्वज वाले मालवाहक पोत को रोका ईरान ने इसे “समुद्री डकैती” बताया दोनों देशों के बीच समुद्री तनाव और बढ़ गया अमेरिकी कार्रवाई और ईरान की चेतावनी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के अनुसार, ईरानी जहाज “तुस्का” को रुकने की चेतावनी दी गई और फिर उसे नियंत्रित कर लिया गया। अमेरिका का दावा है कि: जहाज प्रतिबंधों से बचने की कोशिश कर रहा था अमेरिकी मरीन ने उसे सुरक्षित रूप से कब्जे में लिया वहीं ईरान ने इसे अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन बताते हुए कड़ी प्रतिक्रिया दी है। पहली बार नाकेबंदी के बाद बड़ी घटना अमेरिकी नाकेबंदी अभियान शुरू होने के बाद यह पहली बड़ी घटना है जब किसी ईरानी पोत को सीधे रोका गया है। ईरान का कहना है कि यह: समुद्री डकैती जैसा कदम है और युद्धविराम की शर्तों का उल्लंघन है सीजफायर पर भी खतरा ईरान और अमेरिका के बीच जारी 14 दिनों का सीजफायर 22 अप्रैल को खत्म हो रहा है। ऐसे में: वार्ता की अनिश्चितता बढ़ गई है होर्मुज तनाव ने स्थिति और जटिल बना दी है पाकिस्तान की मध्यस्थता पर भी सवाल उठ रहे हैं
Islamabad में अमेरिका और ईरान के बीच 21 घंटे चली हाई-लेवल बातचीत बिना किसी समझौते के खत्म हो गई। इस वार्ता के टूटने के बाद दोनों देशों के बीच तनाव और बढ़ गया है। अराघची का आरोप–अमेरिका ‘वादे से मुकरा’ ईरान के विदेश मंत्री Abbas Araghchi ने कहा कि समझौता लगभग तय था, लेकिन आखिरी समय में अमेरिका ने अपनी शर्तें बदल दीं। उन्होंने ‘मैक्सिमलिज्म’ का आरोप लगाते हुए कहा कि वॉशिंगटन ने जरूरत से ज्यादा मांग रखकर बातचीत को विफल कर दिया। अराघची ने सोशल मीडिया पर लिखा कि अगर अमेरिका अच्छी नीयत दिखाता, तो जवाब भी वैसा ही मिलता–लेकिन अब “दुश्मनी का जवाब दुश्मनी से दिया जाएगा।” जेडी वेंस का तंज अमेरिकी उपराष्ट्रपति JD Vance भी इस बैठक में शामिल थे। उन्होंने कहा कि कुछ मुद्दों पर सहमति बनी, लेकिन अंतिम समझौता नहीं हो सका। वेंस ने कहा कि यह विफलता अमेरिका से ज्यादा ईरान के लिए नुकसानदायक है। किन मुद्दों पर फंसी बात? रिपोर्ट्स के मुताबिक, बातचीत दो बड़े मुद्दों पर अटक गई: Strait of Hormuz पर नियंत्रण ईरान का परमाणु कार्यक्रम और यूरेनियम संवर्धन ईरानी मीडिया ने अमेरिकी रुख को ‘अवास्तविक’ बताया और कहा कि बुनियादी समझौते का ढांचा तक तैयार नहीं हो पाया। ट्रंप की धमकियों पर ईरान का जवाब ईरान की संसद के स्पीकर Mohammad Bagher Ghalibaf ने कहा कि Donald Trump की धमकियों का कोई असर नहीं होगा। उन्होंने चेतावनी दी–“अगर अमेरिका लड़ाई चाहता है, तो हम भी तैयार हैं, और अगर बातचीत करेगा तो हम भी तर्क से जवाब देंगे।”
ईरान के साथ कूटनीतिक बातचीत नाकाम रहने के बाद अमेरिका ने अब सैन्य दबाव बढ़ाने का रास्ता अपना लिया है। अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने Strait of Hormuz में ‘नेवी ब्लॉकेड’ लागू करने का ऐलान किया है। इस फैसले ने न सिर्फ मिडिल ईस्ट में तनाव बढ़ा दिया है, बल्कि यह भी सवाल उठने लगे हैं कि क्या यह कदम अमेरिकी सैनिकों के लिए नया खतरा पैदा कर सकता है। शनिवार को JD Vance की अगुवाई में एक अमेरिकी कूटनीतिक टीम ने ईरान के साथ तनाव कम करने और संभावित समझौते की दिशा में बातचीत की थी। इस्लामाबाद में करीब 20 घंटे तक चली इस वार्ता से उम्मीदें तो जगी थीं, लेकिन अंततः कोई ठोस नतीजा नहीं निकल पाया। इसके बाद ट्रंप ने रविवार को ट्रुथ सोशल पर कई पोस्ट करते हुए अपनी रणनीति सार्वजनिक की। ट्रंप ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अमेरिका ईरान के खिलाफ समुद्री नाकेबंदी करेगा। उन्होंने चेतावनी दी कि जो भी जहाज होर्मुज़ स्ट्रेट में “गैरकानूनी टोल” देगा, उसे खुले समुद्र में सुरक्षित मार्ग नहीं मिलेगा। इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिकी सेना सहयोगी देशों के जहाजों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए क्षेत्र में सक्रिय रहेगी और बारूदी सुरंगों को हटाने का अभियान जारी रखेगी। ट्रंप ने यह संकेत भी दिया कि जरूरत पड़ने पर ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई दोबारा शुरू की जा सकती है। हालांकि, इस सख्त रुख के पीछे की कूटनीतिक विफलता भी कम अहम नहीं है। वार्ता से जुड़े एक अमेरिकी अधिकारी के अनुसार, बातचीत सिर्फ ईरान के परमाणु कार्यक्रम तक सीमित नहीं थी। कई अन्य मुद्दों पर भी गहरे मतभेद थे, जिनमें होर्मुज़ क्षेत्र पर ईरान का प्रभाव और क्षेत्रीय प्रॉक्सी संगठनों को उसका समर्थन शामिल है। यमन में हूती विद्रोही और लेबनान में हिज़्बुल्लाह जैसे समूहों को लेकर अमेरिका की चिंताएं लंबे समय से बनी हुई हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि होर्मुज़ स्ट्रेट में किसी भी तरह की नाकेबंदी या सैन्य गतिविधि बेहद संवेदनशील मामला है। यह जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्गों में से एक है, जहां से वैश्विक कच्चे तेल का बड़ा हिस्सा गुजरता है। ऐसे में यहां किसी भी तरह का टकराव न सिर्फ क्षेत्रीय बल्कि वैश्विक स्तर पर भी गंभीर प्रभाव डाल सकता है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या यह रणनीति अमेरिकी सैनिकों को सीधे खतरे में डाल सकती है। कई रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि अगर ईरान इस कदम को उकसावे के रूप में देखता है, तो वह जवाबी कार्रवाई कर सकता है। ऐसी स्थिति में अमेरिकी नौसेना और वहां तैनात सैनिक सीधे निशाने पर आ सकते हैं। छोटे स्तर की झड़प भी बड़े सैन्य संघर्ष का रूप ले सकती है, जिससे पूरे क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ सकती है। इसके अलावा, इस फैसले का आर्थिक असर भी कम नहीं होगा। होर्मुज़ स्ट्रेट में किसी भी तरह की बाधा से वैश्विक तेल आपूर्ति प्रभावित हो सकती है, जिससे कीमतों में तेजी आ सकती है और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अस्थिरता बढ़ सकती है। ट्रंप का यह कदम एक हाई-रिस्क रणनीति के रूप में देखा जा रहा है। इससे ईरान पर दबाव तो जरूर बढ़ेगा, लेकिन इसके साथ ही अमेरिकी सैनिकों और पूरे मिडिल ईस्ट क्षेत्र की सुरक्षा पर भी गंभीर खतरे मंडरा सकते हैं। आने वाले दिनों में यह साफ होगा कि यह टकराव कूटनीति की ओर लौटता है या किसी बड़े सैन्य संघर्ष में बदल जाता है।
मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका ने Iran के खिलाफ अब तक का सबसे बड़ा समुद्री कदम उठाया है। United States Central Command (CENTCOM) ने आधिकारिक तौर पर घोषणा की है कि 13 अप्रैल (सोमवार) सुबह 10 बजे से ईरान के सभी बंदरगाहों पर आने-जाने वाले जहाजों पर नाकेबंदी लागू कर दी जाएगी। यह फैसला अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump के निर्देश के बाद लिया गया है और इसे ईरान पर आर्थिक व रणनीतिक दबाव बढ़ाने की बड़ी कार्रवाई के रूप में देखा जा रहा है। समुद्र से घेराबंदी: क्या है पूरा प्लान? अमेरिका की यह रणनीति सीधे ईरान के समुद्री व्यापार को निशाना बनाती है। CENTCOM के अनुसार: ईरान के सभी पोर्ट्स पर आने-जाने वाले जहाजों पर रोक लगेगी यह नियम हर देश के जहाजों पर समान रूप से लागू होगा जहाजों की पहचान, निगरानी और जरूरत पड़ने पर उन्हें रोका जाएगा ईरानी तटीय क्षेत्रों में भी कड़ी निगरानी रखी जाएगी इस कदम का मकसद ईरान की आर्थिक गतिविधियों को सीमित करना और उसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग करना है। हॉर्मुज स्ट्रेट: टकराव का सबसे बड़ा केंद्र इस पूरे घटनाक्रम का सबसे अहम बिंदु Strait of Hormuz है, जो दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में से एक है। दुनिया का लगभग 20% कच्चा तेल इसी रास्ते से गुजरता है यह खाड़ी देशों को वैश्विक बाजार से जोड़ता है यहां किसी भी सैन्य या रणनीतिक कार्रवाई का सीधा असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ता है CENTCOM ने स्पष्ट किया है कि गैर-ईरानी बंदरगाहों के लिए जाने वाले जहाजों को फिलहाल छूट दी जाएगी, लेकिन ईरान से जुड़े हर जहाज पर सख्त नजर रखी जाएगी। जहाजों के लिए चेतावनी और सुरक्षा निर्देश अमेरिकी नौसेना ने इस संवेदनशील स्थिति को देखते हुए सभी व्यापारिक जहाजों और शिपिंग कंपनियों के लिए एडवाइजरी जारी की है: ‘Notice to Mariners’ (आधिकारिक अलर्ट) को नियमित रूप से चेक करें Gulf of Oman और हॉर्मुज क्षेत्र में अतिरिक्त सतर्कता बरतें किसी भी आपात स्थिति में चैनल 16 पर अमेरिकी नौसेना से संपर्क करें जोखिम वाले क्षेत्रों से गुजरते समय वैकल्पिक मार्गों की योजना रखें पेट्रोडॉलर सिस्टम पर सीधा असर इस पूरी कार्रवाई के पीछे सिर्फ सैन्य नहीं, बल्कि आर्थिक रणनीति भी छिपी हुई है। राष्ट्रपति ट्रंप ने संकेत दिया है कि: कुछ जहाज डॉलर के बजाय दूसरी करेंसी (जैसे चीनी युआन) में लेन-देन कर रहे हैं यह लंबे समय से चले आ रहे पेट्रोडॉलर सिस्टम के लिए चुनौती है अमेरिका इस व्यवस्था को बनाए रखने के लिए सख्त कदम उठा रहा है पेट्रोडॉलर सिस्टम वह व्यवस्था है जिसमें दुनिया भर में कच्चे तेल का व्यापार मुख्य रूप से अमेरिकी डॉलर में होता है, जिससे अमेरिका को वैश्विक आर्थिक बढ़त मिलती है। चीन-ईरान समीकरण और अमेरिका की चिंता इस कदम का एक बड़ा लक्ष्य China और ईरान के बीच बढ़ती नजदीकियां भी हैं। चीन ईरान से बड़े पैमाने पर तेल खरीद रहा है दोनों देश डॉलर के विकल्प तलाश रहे हैं रणनीतिक और आर्थिक साझेदारी मजबूत हो रही है अमेरिका इसे अपने वैश्विक प्रभाव के लिए खतरा मानता है और इसी कारण अब दबाव की रणनीति अपना रहा है। बढ़ते तनाव के संभावित असर विशेषज्ञों का मानना है कि इस नाकेबंदी के दूरगामी परिणाम हो सकते हैं: कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल वैश्विक सप्लाई चेन में बाधा मिडिल ईस्ट में सैन्य टकराव का खतरा अंतरराष्ट्रीय व्यापार में अनिश्चितता इसके अलावा, अगर ईरान जवाबी कार्रवाई करता है, तो हालात और बिगड़ सकते हैं। क्या हो सकता है आगे? ईरान की ओर से सैन्य या आर्थिक प्रतिक्रिया संभव कूटनीतिक प्रयास तेज हो सकते हैं, लेकिन सफलता अनिश्चित अमेरिका अपनी नौसैनिक मौजूदगी और बढ़ा सकता है क्षेत्र में अन्य देशों की भूमिका भी अहम हो सकती है
पाकिस्तान में हुई लंबी शांति वार्ता के विफल होने के बाद अमेरिका के राष्ट्रपति Donald Trump ने ईरान के खिलाफ कड़ा रुख अपना लिया है। ट्रंप ने साफ कहा कि उन्हें इस बात की कोई चिंता नहीं है कि ईरान बातचीत की मेज पर लौटता है या नहीं, और दावा किया कि तेहरान की स्थिति इस समय बेहद कमजोर है। हॉर्मुज जलडमरूमध्य पर अमेरिकी कदम अमेरिकी नौसेना ने Strait of Hormuz में घेराबंदी की तैयारी शुरू कर दी है। इस रणनीतिक मार्ग से गुजरने वाले उन जहाजों को रोका जाएगा, जो ईरान के बंदरगाहों से जुड़े हैं। दुनिया का करीब 20% कच्चा तेल इसी रास्ते से गुजरता है फैसले के बाद वैश्विक बाजार में तेल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई न्यूक्लियर हथियार पर अमेरिका की दो टूक ट्रंप ने स्पष्ट कहा कि ईरान को किसी भी कीमत पर परमाणु हथियार नहीं बनाने दिया जाएगा। अमेरिका की प्रमुख मांगें हैं: यूरेनियम संवर्धन (Enrichment) पूरी तरह बंद हो क्षेत्रीय हथियारबंद समूहों को समर्थन रोका जाए सूत्रों के मुताबिक, वार्ता के दौरान ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम को जारी रखने के संकेत दिए थे, जिससे गतिरोध और गहरा गया। NATO पर भी ट्रंप का हमला अमेरिकी राष्ट्रपति ने NATO पर भी नाराजगी जताई। उन्होंने कहा: अमेरिका संगठन पर भारी खर्च करता है लेकिन संकट के समय सहयोग नहीं मिलता NATO की भूमिका की फिर से समीक्षा की जाएगी ईरान की चेतावनी ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड ने चेतावनी दी है कि अगर हॉर्मुज क्षेत्र में कोई सैन्य हस्तक्षेप हुआ, तो उसका कड़ा जवाब दिया जाएगा। स्थिति को संभालने के लिए Pakistan, European Union, Oman और Russia कूटनीतिक प्रयास कर रहे हैं। मिडिल ईस्ट में बढ़ा तनाव इस पूरे घटनाक्रम के बीच Israel की लेबनान में सैन्य गतिविधियों ने क्षेत्रीय तनाव को और बढ़ा दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर हालात जल्द नहीं संभले, तो इसका असर वैश्विक अर्थव्यवस्था और ऊर्जा बाजार पर लंबे समय तक पड़ सकता है।
अमेरिका और ईरान के बीच लंबे तनाव और हालिया संघर्षविराम के बाद अब अमेरिकी राजनीति में नया विवाद खड़ा हो गया है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर विपक्षी दबाव तेजी से बढ़ रहा है, जहां 85 से अधिक सांसदों ने उनके इस्तीफे की मांग कर दी है। क्यों उठी इस्तीफे की मांग? रिपोर्ट्स के अनुसार, डेमोक्रेटिक पार्टी के सांसदों का आरोप है कि: ट्रंप ने ईरान युद्ध को लेकर बार-बार अपनी रणनीति बदली उनकी भाषा और सार्वजनिक बयानबाजी पर सवाल उठे हालिया सोशल मीडिया पोस्ट को लेकर भी विवाद बढ़ा सांसदों का कहना है कि इन परिस्थितियों में राष्ट्रपति की निर्णय लेने की क्षमता पर सवाल खड़े होते हैं। 40 दिन के युद्ध के बाद सीजफायर अमेरिका-ईरान के बीच करीब 40 दिन तक चले तनाव के बाद संघर्षविराम हुआ। हालांकि इस दौरान: अमेरिका की अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ा वैश्विक स्तर पर तेल और सुरक्षा को लेकर चिंता बनी रही युद्ध खत्म होने के बाद भी अमेरिका के भीतर राजनीतिक माहौल शांत नहीं हुआ है। क्या है 25वां संशोधन? ट्रंप को हटाने के लिए अमेरिकी संविधान के 25वां संशोधन की चर्चा तेज हो गई है। इसकी धारा-4 के तहत: उपराष्ट्रपति और कैबिनेट के बहुमत राष्ट्रपति को “असमर्थ” घोषित कर सकते हैं इसके बाद उपराष्ट्रपति कार्यवाहक राष्ट्रपति बन सकता है अंतिम निर्णय के लिए कांग्रेस में दो-तिहाई बहुमत जरूरी होता है क्या सच में जा सकती है कुर्सी? विशेषज्ञों के अनुसार: सिर्फ 85 सांसदों की मांग से राष्ट्रपति को हटाना आसान नहीं है इसके लिए उपराष्ट्रपति और कैबिनेट का समर्थन जरूरी है साथ ही कांग्रेस में भारी बहुमत चाहिए इसलिए फिलहाल ट्रंप की कुर्सी पर तत्काल खतरा नहीं माना जा रहा, लेकिन राजनीतिक दबाव जरूर बढ़ गया है। आगे क्या? आने वाले दिनों में अमेरिकी राजनीति में टकराव बढ़ सकता है अगर विपक्ष और मजबूत होता है, तो संवैधानिक प्रक्रिया तेज हो सकती है फिलहाल यह मुद्दा राजनीतिक बहस का केंद्र बना हुआ है
ईरान में फंसे अमेरिकी एयरमैन को बचाने के लिए अमेरिका ने एक बेहद जटिल और जोखिम भरा रेस्क्यू ऑपरेशन चलाया, जिसमें सेना के साथ-साथ खुफिया एजेंसी CIA ने भी अहम भूमिका निभाई। यह मिशन इतना खतरनाक था कि इसे हाल के वर्षों के सबसे चुनौतीपूर्ण सैन्य अभियानों में से एक माना जा रहा है। कैसे शुरू हुई पूरी घटना? दरअसल, यह मामला तब शुरू हुआ जब दक्षिणी ईरान के ऊपर उड़ रहे अमेरिकी वायुसेना के एफ-15ई स्ट्राइक ईगल लड़ाकू विमान को मार गिराया गया। इस विमान में दो अधिकारी सवार थे-एक पायलट और एक वेपन्स सिस्टम्स ऑफिसर। हमले के बाद दोनों ने समय रहते इजेक्ट कर लिया। हालांकि, पायलट को उसी दिन सुरक्षित बचा लिया गया, लेकिन दूसरा क्रू सदस्य दुश्मन के इलाके में फंस गया और लापता हो गया। यह घटना इसलिए भी खास थी क्योंकि पिछले 20 सालों में पहली बार किसी अमेरिकी लड़ाकू विमान को दुश्मन ने मार गिराया था। CIA ने कैसे निभाई अहम भूमिका? अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस मिशन में CIA ने ग्राउंड इंटेलिजेंस जुटाने, लोकेशन ट्रैक करने और सुरक्षित रूट तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। दुश्मन इलाके में फंसे एयरमैन की सटीक लोकेशन का पता लगाना सबसे बड़ी चुनौती थी, जिसे CIA की मदद से संभव बनाया गया। CIA के इनपुट के आधार पर ही अमेरिकी स्पेशल फोर्सेज ने ऑपरेशन की रणनीति तैयार की और सही समय पर रेस्क्यू मिशन को अंजाम दिया। कैसे चला रेस्क्यू ऑपरेशन? इस हाई-रिस्क ऑपरेशन में अमेरिकी स्पेशल फोर्सेज के दर्जनों जवान शामिल थे। इसके अलावा लड़ाकू विमान और हेलिकॉप्टरों की मदद से एयर कवर और निकासी (Extraction) की योजना बनाई गई। रेस्क्यू टीम को ईरान के पहाड़ी और दुर्गम इलाके में पहुंचना पड़ा, जहां हर कदम पर दुश्मन की निगरानी और हमले का खतरा था। इसके बावजूद टीम ने साहस और सटीक रणनीति के दम पर एयरमैन तक पहुंच बनाई और उसे सुरक्षित बाहर निकाला। ट्रंप ने दी जानकारी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस सफल ऑपरेशन की जानकारी सोशल मीडिया पर साझा की। उन्होंने कहा, “हमने ईरान के पहाड़ों की गहराई से गंभीर रूप से घायल और बेहद बहादुर एफ-15 क्रू सदस्य को बचा लिया है।” बेहद खतरनाक था मिशन रिपोर्ट्स के अनुसार, एयरमैन गंभीर रूप से घायल था और दुश्मन के इलाके में फंसा हुआ था, जिससे मिशन और भी कठिन हो गया। खराब मौसम, दुर्गम इलाके और लगातार खतरे के बीच इस ऑपरेशन को अंजाम देना सेना के लिए बड़ी चुनौती थी। क्या है इस मिशन का महत्व? यह रेस्क्यू मिशन अमेरिकी सेना की त्वरित कार्रवाई, तकनीकी क्षमता और खुफिया समन्वय का बड़ा उदाहरण माना जा रहा है। CIA और सेना के बीच तालमेल ने यह साबित किया कि मुश्किल से मुश्किल हालात में भी अमेरिका अपने सैनिकों को वापस लाने के लिए हर संभव प्रयास करता है।
मिडिल ईस्ट में जारी तनावपूर्ण हालात के बीच ईरान ने बड़ा दावा करते हुए कहा है कि उसने एक और अमेरिकी एयरफोर्स के अत्याधुनिक F-35 लड़ाकू विमान को मार गिराया है। यह दावा ऐसे समय में सामने आया है, जब क्षेत्र में अमेरिका और ईरान के बीच टकराव लगातार बढ़ता जा रहा है। ईरान का दावा: पायलट के बचने की संभावना कम ईरान की अर्ध-सरकारी एजेंसी के अनुसार, देश की सेना के मुख्यालय ‘खतम अल-अंबिया’ के प्रवक्ता ने बताया कि F-35 को सफलतापूर्वक निशाना बनाया गया। साथ ही यह भी कहा गया कि हादसे में पायलट गंभीर रूप से घायल हुआ और उसके बचने की संभावना बेहद कम है। ईरान की ओर से कुछ तस्वीरें भी जारी की गई हैं, जिनमें कथित तौर पर विमान के मलबे को दिखाया गया है। अमेरिका की ओर से नहीं हुई पुष्टि हालांकि इस पूरे मामले पर अभी तक अमेरिकी सैन्य कमान United States Central Command की ओर से कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है। इससे पहले भी ईरान ने इसी तरह का दावा किया था, जिसे अमेरिका ने खारिज करते हुए कहा था कि विमान सुरक्षित लैंड कर गया था। कितना खतरनाक है F-35? F-35 Lightning II अमेरिका का पांचवीं पीढ़ी का अत्याधुनिक स्टील्थ लड़ाकू विमान है, जिसे दुनिया के सबसे उन्नत फाइटर जेट्स में गिना जाता है। इसकी सबसे बड़ी खासियत इसकी ‘स्टील्थ टेक्नोलॉजी’ है, जिससे यह दुश्मन के रडार से लगभग छिपा रहता है। यह विमान दुश्मन के भारी एयर डिफेंस सिस्टम को भेदने, सटीक हमले करने और मल्टी-रोल मिशन को अंजाम देने में सक्षम है। पहले भी हो चुका है ऐसा दावा ईरान इससे पहले 19 मार्च को भी एक F-35 को मार गिराने का दावा कर चुका है। हालांकि उस समय अमेरिका ने साफ कहा था कि विमान ने सुरक्षित इमरजेंसी लैंडिंग कर ली थी। ऐसे में इस बार भी स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं है और दोनों देशों के दावों के बीच सच्चाई की पुष्टि होना बाकी है। बढ़ सकता है वैश्विक तनाव विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह दावा सही साबित होता है, तो यह अमेरिका-ईरान तनाव को और बढ़ा सकता है। इसका असर न केवल मिडिल ईस्ट बल्कि वैश्विक सुरक्षा और कूटनीतिक समीकरणों पर भी पड़ सकता है।
मिडिल ईस्ट में जारी तनाव अब एक नए और खतरनाक मोड़ पर पहुंचता दिख रहा है। पानी और तेल मार्गों को लेकर पहले से जारी टकराव के बीच अब रणनीतिक पुलों को निशाना बनाने की आशंका बढ़ गई है। हालिया घटनाक्रम में अमेरिका द्वारा ईरान के एक महत्वपूर्ण पुल पर किए गए हमले ने इस संकट को और भड़का दिया है, जिसके बाद ईरान ने जवाबी कार्रवाई के संकेत दिए हैं। अमेरिका का हमला और बढ़ता तनाव रिपोर्ट्स के अनुसार, अमेरिकी हमले में ईरान के सबसे ऊंचे माने जा रहे B1 पुल को निशाना बनाया गया। यह पुल राजधानी तेहरान को करज शहर से जोड़ने वाला एक महत्वपूर्ण इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट था, जो अभी निर्माणाधीन था। इस हमले में कम से कम 8 लोगों की मौत और करीब 95 लोग घायल बताए जा रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस हमले के बाद कड़ा रुख अपनाते हुए ईरान को चेतावनी दी कि यदि वह वार्ता के लिए आगे नहीं आता, तो और भी कड़े कदम उठाए जा सकते हैं। ईरान का पलटवार: 8 अहम पुल निशाने पर हमले के बाद ईरान ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। ईरान की अर्ध-सरकारी एजेंसी के मुताबिक, इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने खाड़ी क्षेत्र और आसपास के देशों के 8 महत्वपूर्ण पुलों को संभावित निशाने के रूप में चिन्हित किया है। इनमें प्रमुख रूप से शामिल हैं: कुवैत का शेख जाबेर अल-अहमद अल-सबा सी ब्रिज UAE के शेख जायद, अल मकता और शेख खलीफा ब्रिज सऊदी अरब और बहरीन को जोड़ने वाला किंग फहद कॉज़वे जॉर्डन के किंग हुसैन, दामिया और अब्दौन ब्रिज यह सूची इस बात का संकेत है कि आने वाले दिनों में संघर्ष और व्यापक हो सकता है, जिससे पूरे खाड़ी क्षेत्र की कनेक्टिविटी और सप्लाई चेन प्रभावित हो सकती है। ईरान का सख्त संदेश ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने साफ कहा कि नागरिक ढांचे पर हमले ईरान को झुकाने में सफल नहीं होंगे। उन्होंने इसे विरोधी पक्ष की ‘नैतिक हार’ बताया और संकेत दिया कि जवाबी कार्रवाई की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। वैश्विक असर की आशंका विशेषज्ञों का मानना है कि अगर पुलों और इंफ्रास्ट्रक्चर पर हमले बढ़ते हैं, तो इसका असर केवल मिडिल ईस्ट तक सीमित नहीं रहेगा। यह वैश्विक व्यापार, तेल सप्लाई और समुद्री मार्गों को भी प्रभावित कर सकता है। खासकर खाड़ी क्षेत्र के पुल कई देशों के बीच व्यापार और लॉजिस्टिक्स की लाइफलाइन माने जाते हैं।
पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच एक गंभीर घटना सामने आई है। ईरानी सूत्रों के मुताबिक, United States की ओर से किए गए हवाई हमले में Iran के Mashhad International Airport पर खड़ा एक नागरिक विमान क्षतिग्रस्त हो गया। बताया जा रहा है कि यह विमान Mahan Air का था, जो भारत के New Delhi के लिए एक मानवीय मिशन के तहत रवाना होने वाला था। मानवीय मिशन पर था विमान रिपोर्ट्स के अनुसार, यह विमान दवाइयों और मेडिकल उपकरणों को लाने-ले जाने के मिशन का हिस्सा था। भारत और ईरान के बीच चल रहे मानवीय सहयोग के तहत इसे दिल्ली आना था। हालांकि, हमले के बाद यह मिशन बाधित हो गया है। इस पूरे मामले पर अभी तक अमेरिका की ओर से कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है। ईरान का कड़ा रुख: ‘यह युद्ध अपराध’ ईरान के नागरिक उड्डयन संगठन ने इस घटना को अंतरराष्ट्रीय कानून का गंभीर उल्लंघन बताते हुए “वॉर क्राइम” करार दिया है। ईरान ने Chicago Convention और Montreal Convention का हवाला देते हुए कहा कि किसी भी नागरिक विमान को निशाना बनाना अंतरराष्ट्रीय अपराध की श्रेणी में आता है। इसके अलावा, Geneva Conventions के तहत भी मानवीय मिशन से जुड़े नागरिक संसाधनों पर हमला करना युद्ध अपराध माना जा सकता है। अंतरराष्ट्रीय जांच की मांग ईरान ने अंतरराष्ट्रीय संगठनों से इस घटना की तत्काल जांच की मांग की है और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की अपील की है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह दावा सही साबित होता है, तो यह अंतरराष्ट्रीय नागरिक उड्डयन और मानवीय कानूनों के लिए एक बड़ा झटका होगा। बढ़ता खतरा: नागरिक उड्डयन पर असर यह घटना ऐसे समय में हुई है जब क्षेत्र में सैन्य संघर्ष तेज हो रहा है। इससे नागरिक विमानों की सुरक्षा पर भी सवाल उठने लगे हैं, खासकर उन इलाकों में जहां युद्ध जैसी स्थिति बनी हुई है।
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और Strait of Hormuz पर संकट के बीच बांग्लादेश गंभीर ईंधन संकट का सामना कर रहा है। ऐसे मुश्किल समय में भारत ने एक बार फिर पड़ोसी देश का साथ देते हुए डीजल की आपूर्ति कर राहत पहुंचाई है। पाइपलाइन के जरिए डीजल सप्लाई भारत ने Bangladesh को Numaligarh Refinery से पाइपलाइन के माध्यम से लगभग 7,000 टन डीजल की नई खेप भेजी है। इससे पहले भी हाल के दिनों में कई खेप भेजी जा चुकी हैं, जिससे कुल आपूर्ति बढ़कर लगभग 15,000 टन तक पहुंच गई है। यह सप्लाई India-Bangladesh Friendship Pipeline के जरिए की जा रही है, जो दोनों देशों के बीच ऊर्जा सहयोग का एक अहम उदाहरण है। क्यों बढ़ा संकट? Iran और अमेरिका के बीच तनाव के चलते होर्मुज जलडमरूमध्य पर असर पड़ा है, जिससे वैश्विक तेल सप्लाई प्रभावित हुई है। बांग्लादेश जैसे देश, जो समुद्री आयात पर निर्भर हैं, इस संकट से सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं। वहां ईंधन की कमी के साथ-साथ जमाखोरी भी एक बड़ी समस्या बन गई है। आंतरिक संकट ने बढ़ाई परेशानी बांग्लादेश में हालात और बिगड़ गए जब आठ जिलों में टैंकर कर्मचारियों ने हड़ताल शुरू कर दी। इससे दिनाजपुर, रंगपुर, निलफामारी समेत कई इलाकों में ईंधन आपूर्ति पूरी तरह ठप हो गई। इसका सीधा असर परिवहन व्यवस्था पर पड़ा है, जिससे आम लोगों की परेशानी बढ़ गई है। भारत-बांग्लादेश संबंधों की मिसाल भारत का यह कदम दोनों देशों के मजबूत रिश्तों को दर्शाता है। संकट के समय भारत ने त्वरित मदद देकर यह साबित किया है कि वह क्षेत्रीय स्थिरता और सहयोग के लिए प्रतिबद्ध है। ऊर्जा आपूर्ति जैसे संवेदनशील क्षेत्र में यह सहयोग बांग्लादेश के लिए बड़ी राहत लेकर आया है।
पश्चिम एशिया में जारी तनाव अब एक नए मोड़ पर पहुंचता दिख रहा है। ईरान और अमेरिका के बीच चल रहे संघर्ष के बीच एक अहम खबर सामने आई है-अगर अमेरिका जमीनी सैन्य कार्रवाई करता है, तो इजरायल उसमें सीधे तौर पर हिस्सा नहीं लेगा। इजरायली मीडिया की रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह फैसला क्षेत्रीय रणनीति और बढ़ते तनाव को ध्यान में रखते हुए लिया गया है। इससे संकेत मिलते हैं कि संभावित ग्राउंड ऑपरेशन में अमेरिका को अकेले ही आगे बढ़ना पड़ सकता है। इजरायल ने क्यों बनाई दूरी? विशेषज्ञों के अनुसार, इजरायल का यह रुख कई रणनीतिक कारणों से जुड़ा है: जमीनी युद्ध में उतरने से क्षेत्रीय संघर्ष और भड़क सकता है इजरायल पहले से ही अपनी सुरक्षा चुनौतियों से जूझ रहा है बड़े युद्ध में सीधे शामिल होने से राजनीतिक और सैन्य जोखिम बढ़ सकता है हालांकि यह स्पष्ट नहीं है कि इजरायल खुफिया या तकनीकी सहयोग देगा या नहीं। अमेरिका के लिए बढ़ी चुनौती अगर डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ईरान में ग्राउंड ऑपरेशन शुरू करता है, तो यह मिशन काफी जटिल और जोखिम भरा हो सकता है। बिना बड़े सहयोगी के जमीनी युद्ध कठिन होगा ईरान जैसे विशाल और मजबूत देश में सैन्य कार्रवाई आसान नहीं लॉजिस्टिक्स, संसाधन और रणनीति की बड़ी चुनौती अमेरिका ने पहले ही क्षेत्र में अपने एयरक्राफ्ट कैरियर, युद्धपोत और फाइटर जेट्स की संख्या बढ़ा दी है, जिससे दबाव की रणनीति अपनाई जा रही है। ईरान की ओर से भी सख्त रुख इस बीच IRGC (ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड) लगातार आक्रामक बयान दे रही है और अमेरिका को खुली चुनौती दे रही है। इससे यह साफ है कि अगर जमीनी युद्ध शुरू होता है, तो संघर्ष और भी उग्र हो सकता है। क्या होगा आगे? फिलहाल अमेरिका ने जमीनी सैनिक उतारने को लेकर कोई अंतिम फैसला नहीं लिया है। लेकिन मौजूदा हालात “तूफान से पहले की शांति” जैसे नजर आ रहे हैं। अगर हालात बिगड़ते हैं, तो यह संघर्ष केवल दो देशों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे क्षेत्र और वैश्विक राजनीति पर इसका असर पड़ सकता है।
मध्य पूर्व में जारी तनाव के बीच एक चौंकाने वाली रिपोर्ट सामने आई है। The New York Times की रिपोर्ट के अनुसार, ईरान द्वारा किए गए मिसाइल और ड्रोन हमलों में अमेरिका के कम से कम 13 सैन्य ठिकानों को भारी नुकसान पहुंचा है। हालात इतने बिगड़ गए हैं कि कई बेस अब संचालन के लायक नहीं बचे, जिससे अमेरिकी सैनिकों को अस्थायी रूप से होटल और दफ्तरों में शरण लेनी पड़ रही है। कुवैत में सबसे ज्यादा तबाही रिपोर्ट के मुताबिक कुवैत में स्थित अमेरिकी ठिकानों को सबसे अधिक नुकसान हुआ है। पोर्ट शुवैबा, अली अल सलेम एयर बेस और कैंप बुहरिंग जैसे प्रमुख ठिकानों पर हमलों से ऑपरेशनल सेंटर, विमानन ढांचा और ईंधन आपूर्ति सिस्टम गंभीर रूप से प्रभावित हुए हैं। इससे सैन्य आपूर्ति श्रृंखला और सुरक्षा व्यवस्था पर गहरा असर पड़ा है। कतर, बहरीन और सऊदी अरब भी निशाने पर ईरानी हमलों का असर केवल कुवैत तक सीमित नहीं रहा। अल उदेद एयर बेस (कतर) में स्थित अमेरिकी सेंट्रल कमांड के मुख्यालय का अर्ली वार्निंग रडार सिस्टम क्षतिग्रस्त हो गया। वहीं बहरीन में अमेरिकी फिफ्थ फ्लीट के संचार उपकरणों और सऊदी अरब के प्रिंस सुल्तान एयर बेस पर रिफ्यूलिंग टैंकरों को भी नुकसान पहुंचा है। ‘रिमोट वॉरफेयर’ की स्थिति सैन्य विशेषज्ञों के अनुसार, मौजूदा हालात ‘रिमोट वॉरफेयर’ का रूप ले चुके हैं, जहां सैनिक स्थायी बेस के बजाय अस्थायी ठिकानों से ऑपरेशन चला रहे हैं। इससे समन्वय और प्रतिक्रिया समय पर असर पड़ रहा है। सैनिकों को सुरक्षित स्थानों पर भेजा गया लगातार हमलों के चलते अमेरिकी सैनिकों को बेस से हटाकर अलग-अलग सुरक्षित स्थानों, जैसे होटल और कार्यालयों में ठहराया जा रहा है। इससे सैन्य संचालन में कठिनाई और जोखिम दोनों बढ़ गए हैं। ईरान की चेतावनी और जवाबी कार्रवाई Islamic Revolutionary Guard Corps ने अमेरिका और इजरायल को कड़ी चेतावनी दी है कि वे जमीनी युद्ध से बचें। साथ ही ईरान ने ‘ऑपरेशन ट्रू प्रॉमिस-4’ के तहत इजरायल के कई शहरों—हाइफा, डिमोना और तेल अवीव—पर मिसाइल हमलों का दावा किया है। अमेरिका की जवाबी तैयारी दूसरी ओर, Pentagon मिडिल ईस्ट में अपनी 82nd एयरबोर्न डिवीजन की तैनाती की तैयारी कर रहा है। यह यूनिट आपात स्थितियों में तेजी से कार्रवाई के लिए जानी जाती है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिका ईरान के रणनीतिक ठिकानों पर आगे और हमले करने की योजना बना रहा है। बढ़ता खतरा, टलती कूटनीति ईरान के विदेश मंत्री ने स्पष्ट किया है कि फिलहाल किसी भी युद्धविराम या समझौते का सवाल नहीं है। उनका कहना है कि देश ‘प्रतिरोध’ की नीति पर कायम रहेगा। ऐसे में क्षेत्र में तनाव और बढ़ने की आशंका है।
पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच युद्धविराम की कोशिशें अब तेज होती नजर आ रही हैं। ताजा रिपोर्ट्स के मुताबिक, JD Vance (अमेरिका के उपराष्ट्रपति) अगले तीन दिनों के भीतर Pakistan का दौरा कर सकते हैं। इस संभावित यात्रा का उद्देश्य Iran और United States के बीच चल रहे युद्ध को खत्म करने के लिए बातचीत को आगे बढ़ाना बताया जा रहा है। क्या कहती हैं रिपोर्ट्स? अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अमेरिकी प्रशासन पाकिस्तान में उच्चस्तरीय बैठक आयोजित करने की कोशिश कर रहा है, जिसमें जेडी वेंस की भागीदारी संभव है। हालांकि, अभी तक इस यात्रा की तारीख, स्थान और भागीदारी को लेकर अंतिम पुष्टि नहीं हुई है। ईरान ने किनसे बातचीत से किया इनकार? सूत्रों के मुताबिक, ईरान ने Steve Witkoff और Jared Kushner जैसे अमेरिकी दूतों के साथ दोबारा बातचीत करने से साफ इनकार कर दिया है। इसके बाद पाकिस्तान ने नए चेहरे के तौर पर जेडी वेंस का नाम आगे बढ़ाया है, जिससे वार्ता को नई दिशा मिल सके। पाकिस्तान क्यों बना रहा है खुद को मध्यस्थ? Shehbaz Sharif ने हाल ही में कहा था कि उनका देश “सार्थक और निर्णायक बातचीत” को संभव बनाने के लिए तैयार है। पाकिस्तान लगातार यह कोशिश कर रहा है कि वह अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाए और इस्लामाबाद को बातचीत का केंद्र बनाया जाए। व्हाइट हाउस का क्या रुख? व्हाइट हाउस ने फिलहाल इस यात्रा को लेकर कोई स्पष्ट पुष्टि नहीं की है। प्रेस सचिव ने कहा कि जेडी वेंस पहले से ही राष्ट्रीय सुरक्षा टीम का अहम हिस्सा हैं, लेकिन उनकी भूमिका में कोई बड़ा बदलाव नहीं हुआ है। साथ ही, अमेरिका ने यह भी साफ नहीं किया कि वह ईरान से किस स्तर पर बातचीत कर रहा है। क्या जल्द खत्म होगा युद्ध? विशेषज्ञों का मानना है कि अगर पाकिस्तान में यह वार्ता होती है, तो यह युद्धविराम की दिशा में एक बड़ा कदम साबित हो सकता है। हालांकि, दोनों देशों के बीच अविश्वास और सख्त रुख को देखते हुए बातचीत आसान नहीं मानी जा रही।
मध्य पूर्व में जारी तनाव के बीच ईरान ने अमेरिका के साथ युद्धविराम (ceasefire) बातचीत के लिए कड़ी शर्तें रख दी हैं। तेहरान ने साफ कहा है कि जब तक खाड़ी क्षेत्र (Gulf) में मौजूद सभी अमेरिकी सैन्य ठिकानों को बंद नहीं किया जाता और उस पर लगे सभी आर्थिक प्रतिबंध (sanctions) पूरी तरह नहीं हटाए जाते, तब तक वह किसी समझौते के लिए तैयार नहीं होगा। ईरान की मुख्य मांगें ईरान ने बातचीत से पहले कई अहम शर्तें सामने रखी हैं: खाड़ी देशों में मौजूद अमेरिकी सैन्य बेस पूरी तरह बंद किए जाएं ईरान पर लगे सभी आर्थिक प्रतिबंध हटाए जाएं युद्ध के दौरान हुए नुकसान के लिए वित्तीय मुआवजा दिया जाए हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) पर ईरान का अधिक नियंत्रण हो इस जलमार्ग से गुजरने वाले जहाजों से फीस वसूली का अधिकार भविष्य में किसी भी हमले को रोकने के लिए ठोस सुरक्षा गारंटी सख्ती के बीच नरमी के संकेत हालांकि सार्वजनिक तौर पर ईरान कड़ा रुख दिखा रहा है, लेकिन अंदरखाने कुछ लचीलापन भी दिख रहा है: 5 साल के लिए बैलिस्टिक मिसाइल प्रोग्राम रोकने पर विचार यूरेनियम संवर्धन (enrichment) कम करने की संभावना IAEA को सेंट्रीफ्यूज निरीक्षण की अनुमति 60% समृद्ध यूरेनियम के स्टॉक पर बातचीत की तैयारी हिज़्बुल्लाह, हमास जैसे प्रॉक्सी समूहों से समर्थन खत्म करने पर चर्चा ट्रंप के शांति प्रस्ताव पर शक अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा पेश किए गए 15-सूत्रीय शांति प्रस्ताव पर भी ईरान ने अविश्वास जताया है। ईरान का कहना है कि पहले भी कई बार बातचीत के बीच हमले हुए हैं, इसलिए वह “फिर से धोखा” नहीं खाना चाहता। क्यों है अविश्वास? पिछले साल जून में, परमाणु वार्ता से ठीक पहले इजरायल ने US समर्थन से हमला किया हाल ही में जेनेवा में बातचीत के बाद भी सैन्य कार्रवाई जारी रही कैसे शुरू हुआ युद्ध? ईरान-इजरायल-अमेरिका के बीच यह संघर्ष 28 फरवरी को शुरू हुआ, जब एक संयुक्त US-इजरायल हमले में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई और कई बड़े अधिकारी मारे गए। इसके जवाब में ईरान ने: इराक, कतर, UAE, बहरीन, कुवैत और सऊदी अरब में अमेरिकी ठिकानों पर मिसाइल और ड्रोन हमले किए भारी नुकसान ईरान में अब तक 2300 से ज्यादा लोगों की मौत इनमें 1300 से अधिक नागरिक करीब 200 बच्चे (12 साल से कम उम्र) भी शामिल
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।