रांची। राजधानी रांची में सरहुल पर्व के अवसर पर उत्साह और आस्था का अनोखा संगम देखने को मिला। इस मौके पर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन अपनी पत्नी और विधायक कल्पना सोरेन के साथ करमटोली स्थित आदिवासी कॉलेज छात्रावास परिसर पहुंचे। यहां आयोजित सरहुल महोत्सव में उन्होंने पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ पूजा-अर्चना कर राज्य की सुख-समृद्धि की कामना की। पारंपरिक पूजा और सांस्कृतिक उत्सव महोत्सव के दौरान मुख्यमंत्री ने आदिवासी परंपराओं के अनुसार पूजा में भाग लिया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए, जहां मांदर की थाप और पारंपरिक गीतों ने माहौल को जीवंत बना दिया। सीएम खुद मांदर बजाते और लोगों के साथ उत्सव में शामिल होते नजर आए, जिससे कार्यक्रम में उत्साह और बढ़ गया। प्रकृति को बताया जीवन का आधार अपने संबोधन में हेमंत सोरेन ने कहा कि सरहुल केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि प्रकृति और मानव जीवन के गहरे संबंध को समझने का अवसर है। उन्होंने कहा कि प्रकृति ही जीवन का आधार है सभी जीव-जंतुओं और मानव अस्तित्व की जड़ें प्रकृति से ही जुड़ी हैं। परंपराओं को आगे बढ़ाने की अपील मुख्यमंत्री ने लोगों से अपील की कि वे अपने पूर्वजों द्वारा दी गई समृद्ध परंपराओं को आगे बढ़ाएं। उन्होंने कहा कि आने वाली पीढ़ियों को भी इन सांस्कृतिक मूल्यों से जोड़ना जरूरी है। आधुनिक जीवनशैली के बीच प्रकृति से जुड़ाव बनाए रखना समय की जरूरत है। प्रकृति संरक्षण का दिया संदेश सीएम ने कहा कि अगर प्रकृति सुरक्षित रहेगी, तभी मानव जीवन भी सुरक्षित रहेगा। उन्होंने लोगों से पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक रहने की अपील की। सरहुल जैसे पर्व समाज को एकजुट कर प्रकृति के प्रति सम्मान और जिम्मेदारी का संदेश देते हैं। शुभकामनाएं और सहभागिता इस अवसर पर मुख्यमंत्री ने सभी राज्यवासियों को सरहुल की शुभकामनाएं दीं। कार्यक्रम में अन्य जनप्रतिनिधियों ने भी भाग लिया और लोगों के सुख-शांति व समृद्धि की कामना की।
चैती नवरात्र पर गूंजा भक्ति का माहौल झारखंड के रामगढ़ जिले के गिद्दी क्षेत्र में चैती नवरात्र के पहले दिन से नौ दिवसीय महायज्ञ की भव्य शुरुआत हो गई है। हर वर्ष की तरह इस बार भी श्रद्धा और उत्साह के साथ यह धार्मिक आयोजन शुरू हुआ, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल हुए। रैलीगढ़ा से निकली भव्य कलश यात्रा महायज्ञ की शुरुआत से पहले रैलीगढ़ा स्थित शिव मंदिर से भव्य कलश यात्रा निकाली गई। इस यात्रा का उद्घाटन थाना प्रभारी राणा भानु प्रताप सिंह और महायज्ञ समिति के अध्यक्ष अवधेश कुमार उपाध्याय ने किया। कलश यात्रा में सैकड़ों महिलाएं सिर पर कलश लेकर गाजे-बाजे और जयकारों के साथ शामिल हुईं। पूरे क्षेत्र में भक्ति गीतों और धार्मिक नारों से माहौल भक्तिमय हो गया। दामोदर तट पर वैदिक अनुष्ठान कलश यात्रा दामोदर नदी के तट पर पहुंची, जहां यज्ञाचार्य जीवन पांडेय के नेतृत्व में यजमान सुदामा शर्मा और प्रमिला देवी द्वारा विधिवत पूजा-अर्चना कराई गई। इस दौरान वरुण पूजन सहित कई धार्मिक अनुष्ठान वैदिक मंत्रोच्चार के बीच संपन्न हुए। इसके बाद श्रद्धालु पवित्र जल लेकर यज्ञ मंडप की ओर लौटे। यज्ञ मंडप में शुरू हुआ धार्मिक अनुष्ठान यज्ञ मंडप पहुंचने के बाद मंडप प्रवेश समेत कई धार्मिक विधियां पूरी की गईं। पूरे क्षेत्र में मंत्रोच्चार और भक्ति की ध्वनि गूंजती रही। यज्ञाचार्य ने बताया कि शुक्रवार से श्रद्धालु यज्ञ मंडप की परिक्रमा करेंगे, जो पूरे नौ दिनों तक जारी रहेगी। 27 मार्च को पूर्णाहुति, 28 को भंडारा महायज्ञ समिति के अनुसार, इस धार्मिक अनुष्ठान की पूर्णाहुति 27 मार्च को हवन के साथ की जाएगी। इसके अगले दिन 28 मार्च को भव्य भंडारे का आयोजन होगा, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के शामिल होने की संभावना है। युवाओं की अहम भूमिका इस आयोजन को सफल बनाने में स्थानीय युवाओं की सक्रिय भागीदारी देखने को मिल रही है। कई युवा सदस्य पूरी निष्ठा के साथ व्यवस्था संभाल रहे हैं, जिससे महायज्ञ का आयोजन सुव्यवस्थित तरीके से चल रहा है।
झारखंड के खरसावां क्षेत्र में आयोजित दो दिवसीय पांच कुंडीय गायत्री महायज्ञ का समापन श्रद्धा और भक्ति के माहौल में भव्य पूर्णाहुति के साथ हुआ। बड़ाबांबो स्थित हुडीबाबा शिव मंदिर परिसर में हुए इस आयोजन ने पूरे इलाके को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दिया। गायत्री मंत्रों के सामूहिक उच्चारण और हवन-पूजन से वातावरण भक्तिमय बना रहा। हवन-पूजन और दीप यज्ञ से भक्तिमय माहौल मंगलवार को श्रद्धालुओं ने वेदमाता गायत्री का आह्वान करते हुए पांच कुंडों में विधि-विधान से हवन-पूजन किया। इस दौरान दीप यज्ञ का भी आयोजन हुआ, जिसमें बड़ी संख्या में लोगों ने भाग लिया। शाम को पूर्णाहुति के साथ महायज्ञ का समापन हुआ। पूरे आयोजन में अनुशासन और श्रद्धा का अद्भुत संगम देखने को मिला। दीक्षा संस्कार और 16 संस्कारों की जानकारी महायज्ञ के दौरान 19 श्रद्धालुओं को गायत्री मंत्र की दीक्षा दी गई। साथ ही भारतीय परंपरा के 16 संस्कारों के महत्व को विस्तार से समझाया गया। कार्यक्रम में: 2 बच्चों का नामकरण संस्कार 1 पुंशवन संस्कार 2 माताओं का गर्भधारण संस्कार भी संपन्न कराए गए। इन संस्कारों के माध्यम से समाज को भारतीय संस्कृति से जोड़ने का संदेश दिया गया। संस्कारों से ही मजबूत बनता है समाज शांतिकुंज हरिद्वार के प्रतिनिधि संतोष संगम ने कहा कि अच्छे संस्कार ही एक सशक्त समाज की नींव होते हैं। उन्होंने चरित्र निर्माण पर जोर देते हुए कहा कि सदविचारों को जीवन में उतारना ही सच्ची साधना है। गायत्री मंत्र के महत्व पर विशेष जोर वक्ताओं ने गायत्री मंत्र के आध्यात्मिक और वैज्ञानिक महत्व को विस्तार से बताया। श्रद्धालुओं से अपील की गई कि वे प्रतिदिन गायत्री महामंत्र का जाप करें और साधना, स्वाध्याय व शिक्षा के माध्यम से आत्मविकास करें। भारतीय संस्कृति के मूल तत्व अपनाने की अपील कार्यक्रम में ‘गौ, गंगा, गीता, गायत्री और गुरु’ को भारतीय संस्कृति के आधार स्तंभ बताते हुए इन्हें जीवन में अपनाने का संदेश दिया गया। वक्ताओं ने कहा कि इन मूल्यों के संरक्षण से समाज को सही दिशा मिलती है। नारी शक्ति के सशक्तिकरण पर जोर इस आयोजन का मुख्य उद्देश्य नारी शक्ति संवर्धन भी रहा। महिलाओं की भूमिका को रेखांकित करते हुए उन्हें आत्मनिर्भर बनने और समाज में सक्रिय भागीदारी निभाने के लिए प्रेरित किया गया। कहा गया कि सशक्त नारी ही मजबूत समाज की पहचान है। आस्था और भक्ति का अद्भुत संगम पूरे महायज्ञ के दौरान बड़ाबांबो क्षेत्र में आस्था का अद्भुत दृश्य देखने को मिला। सामूहिक गायत्री मंत्र जाप से वातावरण गूंज उठा और श्रद्धालु आध्यात्मिक ऊर्जा से सराबोर हो गए। गणमान्य लोगों की रही मौजूदगी इस धार्मिक आयोजन में गायत्री परिवार से जुड़े कई प्रमुख लोग और स्थानीय गणमान्य व्यक्ति शामिल हुए। उनकी उपस्थिति ने कार्यक्रम को और भी गरिमामय बना दिया। धार्मिक आयोजन से मिला सामाजिक संदेश इस महायज्ञ के जरिए सिर्फ पूजा-अर्चना ही नहीं, बल्कि समाज को सकारात्मक दिशा देने का संदेश भी दिया गया। संस्कार, नैतिकता और सदाचार को अपनाकर जीवन को बेहतर बनाने की प्रेरणा दी गई।
भारत की लोक आस्था से जुड़ा पवित्र पर्व चैती छठ वर्ष 2026 में 22 मार्च से प्रारंभ होकर 25 मार्च तक चार दिनों तक श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाएगा। सूर्य देव और छठी मैया को समर्पित यह व्रत विशेष रूप से बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश और झारखंड में अत्यंत श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। इसे सुख-समृद्धि, संतान प्राप्ति और परिवार की खुशहाली का प्रतीक माना जाता है। चैत्र मास में मनाया जाने वाला यह छठ पर्व कार्तिक छठ की तरह ही महत्वपूर्ण होता है। व्रती पूरे नियम और संयम के साथ इस कठिन व्रत को करते हैं, जिसमें 36 घंटे का निर्जल उपवास भी शामिल होता है। चैती छठ 2026: चार दिनों का पूरा कार्यक्रम 1. नहाय-खाय (22 मार्च 2026, रविवार) चैती छठ की शुरुआत नहाय-खाय से होती है। इस दिन व्रती सुबह स्नान कर शुद्धता के साथ भगवान सूर्य और कुल देवता की पूजा करते हैं। भोजन में कद्दू-भात (कद्दू की सब्जी और चावल) को प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है। 2. खरना (23 मार्च 2026, सोमवार) दूसरे दिन खरना होता है, जो छठ व्रत का सबसे महत्वपूर्ण चरण माना जाता है। इस दिन व्रती दिनभर उपवास रखते हैं और शाम को गुड़ की खीर व रोटी का भोग लगाकर प्रसाद ग्रहण करते हैं। इसके बाद 36 घंटे का निर्जल व्रत शुरू हो जाता है। 3. संध्या अर्घ्य (24 मार्च 2026, मंगलवार) तीसरे दिन डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। इस वर्ष सूर्यास्त का समय लगभग शाम 6:34 बजे रहेगा। व्रती नदी, तालाब या घाटों पर सूप में फल, ठेकुआ और अन्य पूजन सामग्री लेकर सूर्य देव की आराधना करते हैं। 4. उषा अर्घ्य (25 मार्च 2026, बुधवार) चौथे और अंतिम दिन उगते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। सूर्योदय का समय लगभग सुबह 6:20 बजे रहेगा। इसी के साथ व्रत का पारण होता है और छठ महापर्व संपन्न होता है। चैती छठ का धार्मिक महत्व चैती छठ को प्रकृति, सूर्य ऊर्जा और जल तत्व की उपासना का पर्व माना जाता है। हिंदू मान्यता के अनुसार सूर्य देव को प्रत्यक्ष देवता कहा गया है, जिनकी पूजा से जीवन में ऊर्जा, स्वास्थ्य और समृद्धि आती है। छठी मैया को संतान की रक्षा और परिवार की सुख-शांति की देवी माना जाता है। यही कारण है कि यह व्रत विशेष रूप से महिलाओं द्वारा परिवार की खुशहाली और संतान की लंबी उम्र के लिए रखा जाता है। यह पर्व संयम, शुद्धता और प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने का संदेश देता है।
रांची। झारखंड में मनाया जाने वाला सरहुल पर्व आदिवासी समाज की संस्कृति, परंपरा और प्रकृति के प्रति आस्था का प्रतीक है। यह केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सामुदायिक एकता और सांस्कृतिक पहचान को मजबूत करने वाला महत्वपूर्ण पर्व है। हर साल बसंत ऋतु में यह त्योहार बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। झारखंड के गांवों से लेकर राजधानी रांची तक सरहुल की तैयारियां जोरों से चलती हैं। इस पर्व के दौरान प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की जाती है और सामूहिक रूप से पूजा-अर्चना, गीत-संगीत और नृत्य का आयोजन होता है। पहला हैं मुंडा समाज का बहा पोरोब मुंडा समुदाय में सरहुल को “बाहा पोरोब” कहा जाता है। यह पर्व सखुआ, साल या सरजोम वृक्ष के नीचे स्थित सरना स्थल पर मनाया जाता है। पूजा की सारी धार्मिक विधियां पुरोहित द्वारा संपन्न की जाती हैं। जब सखुआ के पेड़ों पर फूल आ जाते हैं, तब गांव के लोग एक निर्धारित तिथि पर बहा पोरोब मनाते हैं। इस पर्व से पहले गांव के पहान (पुरोहित) उपवास रखते हैं। पूजा के दौरान सबसे पहले सिंगबोंगा परमेश्वर, फिर पूर्वजों और ग्राम देवता की आराधना की जाती है। पूजा समाप्त होने के बाद लोग नाचते-गाते हुए पहान को उनके घर तक पहुंचाते हैं। दूसरा हैं हो समुदाय का बा पोरोब हो समुदाय में इस पर्व को “बा पोरोब” कहा जाता है, जिसका अर्थ फूलों का त्योहार होता है। यह पर्व तीन दिनों तक मनाया जाता है। पहले दिन “बा गुरि” के दौरान नए घड़े में तैयार भोजन को मृत आत्माओं, पूर्वजों और ग्राम देवता को अर्पित किया जाता है। दूसरे दिन जंगल से साल के पेड़ की डालियां फूलों सहित लाकर पूजा की जाती है और इन्हें घर के आंगन या चौखट पर लगाया जाता है। तीसरे दिन “बा बसि” में पूजन सामग्री का विसर्जन किया जाता है और रात में सामूहिक नृत्य-गान होता है। तीसरा हैं उरांव समाज का खेखेल बेंजा उरांव समुदाय में सरहुल के दिन सूर्य और धरती के प्रतीकात्मक विवाह की परंपरा निभाई जाती है, जिसे “खेखेल बेंजा” कहा जाता है। इस अनुष्ठान का प्रतिनिधित्व उरांव पुरोहित नयगस और उनकी पत्नी नगयिनी करते हैं। सरहुल पूजा से पहले धरती को कुंवारी कन्या के रूप में माना जाता है। पूजा के दौरान पहान सरना स्थल पर तीन मुर्गों की बलि देते हैं और खिचड़ी बनाकर प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है। साथ ही पहान घड़े के पानी के आधार पर उस वर्ष की बारिश का अनुमान भी लगाते हैं। चौथा हैं संथाल समाज का बाहा पर्व संथाल समुदाय में सरहुल को “बाहा” पर्व के रूप में मनाया जाता है। इस समुदाय में साल और महुआ के पेड़ों को देवता का रूप मानकर पूजा की जाती है। यह पर्व फागुन महीने में शुरू होकर पूरे महीने चलता है। पूजा के दौरान जाहेरथान (पूजा स्थल) में पारंपरिक विधि से ईष्ट देव की आराधना की जाती है। मुर्गा बलि के बाद खिचड़ी का प्रसाद बांटा जाता है। बाहा नृत्य इस पर्व की खास पहचान है, जिसमें महिलाएं नृत्य करती हैं और पुरुष पारंपरिक वाद्ययंत्र बजाते हैं। पांचवा हैं खड़िया समुदाय का जांकोर पर्व खड़िया समुदाय इस पर्व को “जांकोर” के नाम से मनाता है। इसका अर्थ है फलों और बीजों के क्रमिक विकास का उत्सव। यह पर्व फागुन पूर्णिमा से एक दिन पहले शुरू होता है। इस दौरान पुरुष शिकार के लिए जाते हैं और शाम को दो नए घड़ों में पानी लाकर रखा जाता है। अगले दिन पहान पूजा के बाद बलि देते हैं और घड़े के पानी को देखकर वर्षा का अनुमान लगाते हैं। सरहुल के दौरान पूरे गांव में उत्सव का माहौल रहता है। दिनभर की मेहनत के बाद रात में गांव के लोग अखड़ा में एकत्र होकर मांदर और नगाड़े की थाप पर नृत्य करते हैं। बसंत ऋतु में मनाया जाने वाला यह पर्व खुशियों और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। इस समय प्रकृति अपने यौवन पर होती है और जंगल फल-फूल से भर जाते हैं। आदिवासी समाज का मानना है कि प्रकृति कभी किसी को भूखा नहीं रहने देती, इसलिए सरहुल पर्व प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने का भी एक माध्यम है।
रांची। “जे नाची से बांची”, जिसका अर्थ है “जो नाचेगा वही बचेगा।” इस कहावत के माध्यम से यह संदेश दिया जाता है कि लोकनृत्य और सांस्कृतिक परंपराएं ही समाज की पहचान और अस्तित्व को जीवित रखती हैं। झारखंड में मनाया जाने वाला सरहुल पर्व केवल प्रकृति पूजा का त्योहार ही नहीं, बल्कि आदिवासी संस्कृति और परंपराओं का जीवंत उत्सव भी है। इस पर्व के दौरान लोकनृत्य, गीत-संगीत और पारंपरिक वेशभूषा की विशेष झलक देखने को मिलती है। सरहुल का अर्थ और परंपरा प्रकृति पर्व सरहुल दो शब्दों से मिलकर बना है-‘सर’ और ‘हूल’। ‘सर’ का अर्थ है सखुआ या साल का फूल, जबकि ‘हूल’ का अर्थ क्रांति या परिवर्तन से जुड़ा माना जाता है। इस तरह सखुआ फूल के खिलने के साथ प्रकृति में आने वाले नए बदलाव को ही सरहुल कहा जाता है। यह पर्व झारखंड के अलावा ओडिशा, पश्चिम बंगाल और छत्तीसगढ़ के आदिवासी क्षेत्रों में भी मनाया जाता है। मुंडारी, संथाली और हो भाषा में इसे ‘बा’ या ‘बाहा पोरोब’ कहा जाता है, जबकि खड़िया भाषा में ‘जांकोर’ और कुड़ुख भाषा में ‘खद्दी’ या ‘खेखेल बेंजा’ कहा जाता है। पूजा की विधि और पाहन की भूमिका इस पूजा की खास बात यह है कि मुख्य पूजा गांव के धर्मगुरु, जिन्हें ‘पाहन’ कहा जाता है, उनके द्वारा कराई जाती है। पाहन सरना स्थल पर विधि-विधान से सर्वोच्च देवता सिंगबोंगा यानी सृष्टिकर्ता देवता की पूजा करते हैं और गांव की सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। इस दौरान ग्राम देवता को रंगा हुआ मुर्गा अर्पित करने की परंपरा भी निभाई जाती है। पूजा के माध्यम से पाहन गांव को बुरी शक्तियों और नकारात्मक प्रभावों से सुरक्षित रखने की प्रार्थना करते हैं।सरहुल पर्व से जुड़ी एक अनोखी परंपरा भी है। वर्षा की भविष्यवाणी की परंपरा पूजा के बाद शाम को विभिन्न मौजा के पाहनों के द्वारा ढोल-मांदर बजाते हुए कुएं या तालाब से दो घड़ा पानी लाकर जल रखाई की रस्म निभाई जाती है। गांव के नदी, तालाब या कुएं से दो घड़े में पानी लाकर सरना स्थल की उत्तर और दक्षिण दिशा में रखा जाता है। पानी की गहराई को साल के तने से नापा जाता है। जिसके बाद दूसरे दिन घड़े में पानी को उसी तने से ही नापा जाता है। घड़े में पानी के कम होने या नहीं होने की स्थिति पर उस साल वर्षा का पूर्वानुमान लगाया जाता है। झारखंड और आसपास के आदिवासी क्षेत्रों में मनाया जाने वाला सरहुल पर्व प्रकृति और संस्कृति से जुड़ा एक महत्वपूर्ण त्योहार है। इस पर्व में विशेष रूप से सखुआ (साल) के पेड़ की पूजा की जाती है। केकड़ा पकड़ने की अनोखी परंपरा इस पर्व से एक दिन पहले उपवास रखकर केकड़ा और मछली पकड़ने की परंपरा निभाई जाती है। कई जगहों पर घर के नए दामाद या बेटे तालाब से केकड़ा पकड़ते हैं। उस केकड़े को साल के पत्तों में लपेटकर घर में सुरक्षित रखा जाता है। बाद में आषाढ़ महीने में बीज बोने के समय केकड़े का चूर्ण बनाकर बीज के साथ खेतों में मिलाया जाता है। मान्यता है कि इससे फसल अच्छी होती है और खेतों में समृद्धि आती है। लोकनृत्य और पारंपरिक परिधान इस दिन बैगा पुजार द्वारा घड़े में खिचड़ी पकाया जाता है। इसकी मान्यता है कि घड़े के जिस ओर से खिचड़ी उबलना शुरू करता है। उसी ओर से बरसात का आगमन होता है। इसके बाद जब बैगा पुजार लोग खिचड़ी खाते हैं, तो उनके पीछे की ओर आग जला दिया जाता है। इसका मतलब यह होता है कि अगर बैगा पुजार आग की गर्मी को बर्दाश्त करते हुए शांतिपूर्ण ढंग से खिचड़ी खाते हैं, तो गांव में सुख-शांति रहती है और जहां आग या गर्मी को बर्दाश्त नहीं कर पाते हैं, तो गांव में मच्छर, बीमारी सहित अन्य प्रकार का कहर बढ़ जाता है। इसलिए सरहुल सरना पूजा आदिवासियों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। फूलखोसी के साथ सरहुल का समापन अंत में फूलखोसी के साथ सरहुल का समापन होता है। फूलखोसी के मौके पर पहान अपने घर में साल यानी सरई फूल अर्पित करते हैं। इस दौरान अन्न भंडार, संदूक समेत घर के सभी दरवाजों पर पुष्प अर्पित किया जाता है। घर में पूजा के बाद पुरोहित ग्राम भ्रमण पर निकलते हैं। वे हर घर में जाकर सरई फूल देते हैं इस दौरान घर के लोग पाहन का पैर धोकर सम्मान करते हैं। उनके माथे पर सरसो तेल लगाया जाता है। इसके बाद ही सरहुल की विशाल शोभायात्रा निकाली जाती है।
रांची। आदिवासी समाज में एक कहावत प्रचलित है “सेनगे सुसुन, काजिगे दुरंग”, जिसका अर्थ है कि जहां चलना ही नृत्य है और बोलना ही गीत-संगीत है। झारखंड की जीवनशैली में नृत्य, गीत और सामूहिक उत्सव का विशेष महत्व है। आज इस वीडियो में जिस त्योहार की बात करेंगे वो खेतों में नई फसल, जंगलों में खिले फूल और मौसम की नई शुरुआत के साथ खुशियों और उम्मीद का संदेश लेकर आता है। वसंत ऋतु में मनाया जाने वाला आदिवासी समाज के सबसे महत्वपूर्ण त्योहारों में से एक है सरहुल। इस दिन सरई यानी कि सखुआ पेड़ की खास तौर से पूजा की जाती है। महाभारत युद्ध से जुड़ी कथा सरहुल से जुड़ी काफी सारी कहानियां लोकप्रिय है लेकिन बहुत लोगों को ये नहीं पता है कि इस दिन पूजे जाने वाले सखुआ पेड़ के पीछे क्या कहानी है? दरअसल इसकी कहानी महाभारत युद्ध से जुड़ी है। ऐसा माना जाता है कि जब महाभारत युद्ध चल रहा था तो मुंडा जनजातीय लोगों ने कौरव सेना की तरफ से लड़ाई में हिस्सा लिया था। इस युद्ध में कई जनजातीय योद्धा वीरगति को प्राप्त हो गए। उनकी पहचान के लिए उनके शवों को साल यानी सखुआ के पत्तों और शाखाओं से ढक दिया गया था।कहानी के अनुसार आश्चर्यजनक बात यह थी कि जिन शवों को सखुआ के पत्तों से ढका गया था, वे लंबे समय तक सुरक्षित रहे और जल्दी नहीं सड़े, जबकि अन्य पत्तों से ढके शव सड़ने लगे। इस घटना के बाद आदिवासी समाज में सखुआ के पेड़ के प्रति गहरी आस्था विकसित हो गई। उनकी यही आस्था वर्तमान रुप में सरहुल पर्व के रूप में जाना जाता है। सरहुल की पूजा और परंपराएं सरहुल आदिवासी समाज की परंपरा, संस्कृति और जीवनशैली से गहराई से जुड़ा हुआ है। इस समाज में खेती-बाड़ी, नए पत्तों का उपयोग और कई शुभ कार्य सरहुल पर्व के बाद ही शुरू किए जाते हैं। आदिवासी समाज हमेशा से ही प्रकृति का पूजक रहा है, ये पर्व न सिर्फ पर्यावरण को बचाने का त्योहार है। बल्कि संस्कृति, सभ्यता, एकता और अखंडता को भी बनाये रखने का प्रेरणा देता है। सरहुल के अवसर पर झारखंड के विभिन्न गांवों और शहरों में नृत्य उत्सव आयोजित किए जाते हैं। मांदर, ढोल और नगाड़े की थाप पर युवक-युवतियां सामूहिक नृत्य करते हैं। इस दौरान महिलाएं सफेद रंग की लाल किनारी वाली पारंपरिक साड़ी पहनती हैं। सफेद रंग को पवित्रता और शालीनता का प्रतीक माना जाता है, जबकि लाल रंग संघर्ष और ऊर्जा का प्रतीक है। आदिवासी मान्यताओं के अनुसार सफेद रंग सर्वोच्च देवता सिंगबोंगा और लाल रंग ईष्टदेव बुरुबोंगा यानी पहाड़ी देवता का प्रतीक है। इसी कारण सरना स्थल पर फहराया जाने वाला झंडा भी लाल और सफेद रंग का होता है।
चैत्र पर्व के साथ सजेगा छऊ महोत्सव झारखंड के Seraikela में इस साल भी पारंपरिक चैत्र पर्व सह छऊ महोत्सव का भव्य आयोजन किया जाएगा। यह महोत्सव 11 से 13 अप्रैल तक आयोजित होगा, जिसमें देश-विदेश में प्रसिद्ध Seraikela Chhau Dance की विभिन्न शैलियों का आकर्षक प्रदर्शन देखने को मिलेगा। इस आयोजन में सरायकेला, खरसावां और मानभूम शैली के छऊ नृत्य के साथ-साथ अन्य राज्यों की लोक कलाओं की भी प्रस्तुति दी जाएगी, जिससे यह सांस्कृतिक उत्सव और भी खास बन जाएगा। तैयारियों को लेकर प्रशासनिक बैठक महोत्सव की तैयारियों को लेकर शुक्रवार को अनुमंडल कार्यालय में एक अहम बैठक आयोजित की गई। बैठक की अध्यक्षता अनुमंडल पदाधिकारी Abhinav Prakash ने की। बैठक में तय किया गया कि इस बार महोत्सव को पारंपरिक और भव्य रूप में आयोजित किया जाएगा, ताकि क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत को व्यापक मंच मिल सके। पद्मश्री कलाकारों को मिलेगा सम्मान आयोजन समिति ने निर्णय लिया है कि महोत्सव के दौरान छऊ नृत्य से जुड़े पद्मश्री पुरस्कार प्राप्त कलाकारों और उनके परिजनों को सम्मानित किया जाएगा। इसके अलावा विभिन्न राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय पुरस्कारों से सम्मानित छऊ गुरुओं और कलाकारों को भी मंच पर विशेष सम्मान दिया जाएगा, जिससे युवा पीढ़ी को इस कला से जुड़ने की प्रेरणा मिले। 5 अप्रैल से भैरव पूजा के साथ शुरुआत चैत्र पर्व की औपचारिक शुरुआत 5 अप्रैल को भैरव पूजा से होगी। स्थानीय भैरव स्थान पर पूजा-अर्चना के बाद पारंपरिक अनुष्ठानों की श्रृंखला शुरू होगी। इसके तहत- 9 अप्रैल: झुमकेश्वरी पूजा 10 अप्रैल: यात्रा घट 11 अप्रैल: वृंदावनी घट 12 अप्रैल: गौरयाभार घट 13 अप्रैल: कालिका घट पूजा पर्व का समापन 14 अप्रैल को पाट संक्रांति के साथ किया जाएगा। ग्रामीण छऊ दलों के बीच होगी प्रतियोगिता महोत्सव से पहले 6 से 8 अप्रैल तक ग्रामीण छऊ नृत्य दलों की प्रतियोगिता आयोजित की जाएगी। 6 अप्रैल: सरायकेला शैली 7 अप्रैल: मानभूम शैली 8 अप्रैल: खरसावां शैली इन प्रतियोगिताओं के जरिए स्थानीय कलाकारों को अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर मिलेगा। बैठक में कई गणमान्य लोग रहे मौजूद बैठक में नगर पंचायत अध्यक्ष और आर्टिस्ट एसोसिएशन के संरक्षक Manoj Choudhary, Pratap Aditya Singhdeo, बीडीओ Yasmita Singh, कला केंद्र के समन्वयक Sudip Kavi, एसोसिएशन के सचिव Bhola Mahanti सहित कई कलाकार और जनप्रतिनिधि उपस्थित थे। आयोजन समिति का कहना है कि इस महोत्सव के जरिए क्षेत्रीय संस्कृति और पारंपरिक छऊ नृत्य को राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दिलाने का प्रयास किया जाएगा।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
UPSC CSE Result 2025: देश की सबसे प्रतिष्ठित परीक्षाओं में से एक Civil Services Examination का अंतिम परिणाम जारी कर दिया गया है। Union Public Service Commission ने शुक्रवार 6 मार्च 2026 को UPSC सिविल सेवा परीक्षा 2025 का फाइनल रिजल्ट घोषित किया। इस परीक्षा में अनुज अग्निहोत्री ने पहला स्थान हासिल किया है। परीक्षा में शामिल हुए उम्मीदवार अब आयोग की आधिकारिक वेबसाइट UPSC Official Website पर जाकर फाइनल मेरिट लिस्ट देख सकते हैं। 958 उम्मीदवारों का हुआ चयन यूपीएससी द्वारा जारी फाइनल रिजल्ट के अनुसार इस वर्ष कुल 958 उम्मीदवारों ने सफलता हासिल की है। चयनित उम्मीदवारों की नियुक्ति विभिन्न केंद्रीय सेवाओं में उनकी रैंक और पसंद के आधार पर की जाएगी। फाइनल रिजल्ट उम्मीदवारों के लिखित परीक्षा (Main Exam) और पर्सनैलिटी टेस्ट (Interview) में प्रदर्शन के आधार पर तैयार किया गया है। इन प्रतिष्ठित सेवाओं के लिए होता है चयन यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा के माध्यम से देश की कई प्रतिष्ठित सेवाओं के लिए अधिकारियों का चयन किया जाता है। इनमें प्रमुख रूप से शामिल हैं— भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) भारतीय पुलिस सेवा (IPS) भारतीय विदेश सेवा (IFS) भारतीय राजस्व सेवा (IRS) भारतीय व्यापार सेवा सहित अन्य ग्रुप A और ग्रुप B सेवाएं 979 पदों को भरने का लक्ष्य सिविल सेवा परीक्षा 2025 के माध्यम से केंद्र सरकार के विभिन्न विभागों में कुल 979 रिक्त पदों को भरा जाना है। ऐसे चेक करें UPSC CSE 2025 का रिजल्ट उम्मीदवार नीचे दिए गए स्टेप्स के माध्यम से अपना रिजल्ट देख सकते हैं— आधिकारिक वेबसाइट upsc.gov.in पर जाएं होमपेज पर “Examination” टैब पर क्लिक करें “Active Examinations” या “What’s New” सेक्शन में जाएं Civil Services Examination Final Result 2025 लिंक पर क्लिक करें मेरिट लिस्ट की PDF खुल जाएगी Ctrl + F दबाकर अपना नाम या रोल नंबर सर्च करें 15 दिन में जारी होगी मार्कशीट यूपीएससी के अनुसार सभी उम्मीदवारों की मार्कशीट रिजल्ट जारी होने के 15 दिनों के भीतर आयोग की वेबसाइट पर अपलोड कर दी जाएगी। उम्मीदवार इसे 30 दिनों तक ऑनलाइन डाउनलोड कर सकेंगे। पिछले साल का कट-ऑफ पिछले वर्ष का अंतिम कट-ऑफ इस प्रकार था— जनरल: 87.98 EWS: 85.92 OBC: 87.28 SC: 79.03 ST: 74.23 आयु सीमा क्या है यूपीएससी की अधिसूचना के अनुसार उम्मीदवार की आयु 1 अगस्त 2024 तक कम से कम 21 वर्ष और अधिकतम 32 वर्ष होनी चाहिए। यानी उम्मीदवार का जन्म 2 अगस्त 1992 से 1 अगस्त 2003 के बीच होना चाहिए। यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा भारत की सबसे कठिन और प्रतिष्ठित प्रतियोगी परीक्षाओं में से एक मानी जाती है। हर साल लाखों उम्मीदवार इस परीक्षा में शामिल होते हैं, लेकिन तीन चरणों—प्रारंभिक परीक्षा, मुख्य परीक्षा और इंटरव्यू—को पार कर बहुत कम उम्मीदवार ही अंतिम सूची में जगह बना पाते हैं। UPSC CSE 2025 टॉप-20 उम्मीदवारों की सूची रैंक रोल नंबर नाम 1 1131589 अनुज अग्निहोत्री 2 4000040 राजेश्वरी सुवे एम 3 3512521 अकांश ढुल 4 0834732 राघव झुनझुनवाला 5 0409847 ईशान भटनागर 6 6410067 जिनिया अरोड़ा 7 0818306 ए आर राजा मोहिद्दीन 8 0843487 पक्षल सेक्रेटरी 9 0831647 आस्था जैन 10 1523945 उज्ज्वल प्रियांक 11 1512091 यशस्वी राज वर्धन 12 0840280 अक्षित भारद्वाज 13 7813999 अनन्या शर्मा 14 5402316 सुरभि यादव 15 3507500 सिमरनदीप कौर 16 0867445 मोनिका श्रीवास्तव 17 0829589 चितवन जैन 18 5604518 श्रुति आर 19 0105602 निसार दिशांत अमृतलाल 20 6630448 रवि राज