शौकिया स्तर के फुटबॉल खिलाड़ियों पर किए गए एक नए वैज्ञानिक अध्ययन में यह संकेत मिला है कि मैच के दौरान बार-बार की जाने वाली ‘हेडिंग’ (ball heading) गतिविधि से मस्तिष्क से जुड़े कुछ बायोमार्कर्स में अस्थायी बदलाव हो सकते हैं। यह बदलाव न्यूरल इंजरी और ब्रेन इंटेग्रिटी से जुड़े संकेतकों में देखा गया है, जिससे खेल सुरक्षा को लेकर नई बहस शुरू हो गई है।
यह रिसर्च नीदरलैंड्स में आयोजित शौकिया पुरुष फुटबॉल खिलाड़ियों पर आधारित एक केस-स्टडी है, जिसमें मैच के दौरान और बाद में खिलाड़ियों के रक्त नमूनों का विश्लेषण किया गया।
अध्ययन में पाया गया कि मैच के तुरंत बाद उन खिलाड़ियों में, जिन्होंने हेडिंग की थी, कुछ खास प्रोटीन स्तरों में बढ़ोतरी देखी गई, जो मस्तिष्क पर हल्के लेकिन मापने योग्य प्रभाव का संकेत देते हैं।
इस अध्ययन में 300 से अधिक शौकिया खिलाड़ियों को शामिल किया गया। खिलाड़ियों के ब्लड सैंपल तीन चरणों में लिए गए-
इसके साथ ही वीडियो एनालिसिस और हार्ट रेट ट्रैकिंग के जरिए यह भी रिकॉर्ड किया गया कि किस खिलाड़ी ने कितनी बार हेडिंग की और उसकी तीव्रता क्या थी।
शोध में पाया गया कि:
विशेष रूप से S100B और phosphorylated tau 217 जैसे बायोमार्कर्स में बदलाव दर्ज किया गया, जो मस्तिष्क की कोशिकाओं से जुड़े संकेतक माने जाते हैं।
शोधकर्ताओं का कहना है कि यह प्रभाव अस्थायी है, लेकिन यह इस बात का संकेत देता है कि बार-बार की जाने वाली हेडिंग से मस्तिष्क पर दबाव पड़ सकता है। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि लंबे समय तक इसके प्रभाव को समझने के लिए और विस्तृत अध्ययन की जरूरत है।
वैज्ञानिकों के अनुसार, पेशेवर और शौकिया दोनों स्तरों पर लगातार हेडिंग की आदत से जुड़ी संभावित न्यूरोलॉजिकल जोखिमों पर और शोध जरूरी है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
शौकिया स्तर के फुटबॉल खिलाड़ियों पर किए गए एक नए वैज्ञानिक अध्ययन में यह संकेत मिला है कि मैच के दौरान बार-बार की जाने वाली ‘हेडिंग’ (ball heading) गतिविधि से मस्तिष्क से जुड़े कुछ बायोमार्कर्स में अस्थायी बदलाव हो सकते हैं। यह बदलाव न्यूरल इंजरी और ब्रेन इंटेग्रिटी से जुड़े संकेतकों में देखा गया है, जिससे खेल सुरक्षा को लेकर नई बहस शुरू हो गई है। क्या कहता है नया अध्ययन? यह रिसर्च नीदरलैंड्स में आयोजित शौकिया पुरुष फुटबॉल खिलाड़ियों पर आधारित एक केस-स्टडी है, जिसमें मैच के दौरान और बाद में खिलाड़ियों के रक्त नमूनों का विश्लेषण किया गया। अध्ययन में पाया गया कि मैच के तुरंत बाद उन खिलाड़ियों में, जिन्होंने हेडिंग की थी, कुछ खास प्रोटीन स्तरों में बढ़ोतरी देखी गई, जो मस्तिष्क पर हल्के लेकिन मापने योग्य प्रभाव का संकेत देते हैं। कैसे किया गया शोध? इस अध्ययन में 300 से अधिक शौकिया खिलाड़ियों को शामिल किया गया। खिलाड़ियों के ब्लड सैंपल तीन चरणों में लिए गए- मैच से पहले मैच के तुरंत बाद (1 घंटे के भीतर) 24 से 48 घंटे बाद इसके साथ ही वीडियो एनालिसिस और हार्ट रेट ट्रैकिंग के जरिए यह भी रिकॉर्ड किया गया कि किस खिलाड़ी ने कितनी बार हेडिंग की और उसकी तीव्रता क्या थी। क्या मिले प्रमुख नतीजे? शोध में पाया गया कि: लगभग 72% खिलाड़ियों ने मैच के दौरान हेडिंग की औसतन प्रति खिलाड़ी लगभग 2 हेडिंग दर्ज की गई अधिक हेडिंग करने वालों में न्यूरल डैमेज से जुड़े बायोमार्कर्स में अधिक बढ़ोतरी देखी गई यह प्रभाव 24–48 घंटे के भीतर सामान्य हो गया विशेष रूप से S100B और phosphorylated tau 217 जैसे बायोमार्कर्स में बदलाव दर्ज किया गया, जो मस्तिष्क की कोशिकाओं से जुड़े संकेतक माने जाते हैं। विशेषज्ञों की राय और चिंता शोधकर्ताओं का कहना है कि यह प्रभाव अस्थायी है, लेकिन यह इस बात का संकेत देता है कि बार-बार की जाने वाली हेडिंग से मस्तिष्क पर दबाव पड़ सकता है। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि लंबे समय तक इसके प्रभाव को समझने के लिए और विस्तृत अध्ययन की जरूरत है। वैज्ञानिकों के अनुसार, पेशेवर और शौकिया दोनों स्तरों पर लगातार हेडिंग की आदत से जुड़ी संभावित न्यूरोलॉजिकल जोखिमों पर और शोध जरूरी है।
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में घंटों कुर्सी पर बैठना, लैपटॉप और मोबाइल स्क्रीन पर झुके रहना और शारीरिक गतिविधियों की कमी हमारे शरीर को धीरे-धीरे अकड़ा हुआ बना देती है। कमर दर्द, कंधों में जकड़न, टाइट हैमस्ट्रिंग और खराब पोश्चर जैसी समस्याएं अब बेहद आम हो चुकी हैं। ऐसे में योग न केवल शरीर को लचीला बनाने में मदद करता है, बल्कि मानसिक तनाव को कम करने और शरीर की मूवमेंट को बेहतर बनाने में भी कारगर साबित होता है। विशेषज्ञों के मुताबिक, Flexibility का मतलब सिर्फ स्प्लिट्स करना या कठिन योगासन करना नहीं है। असली उद्देश्य है रोजमर्रा की जिंदगी में शरीर को बिना दर्द और जकड़न के आसानी से मूव कर पाना। नियमित योग अभ्यास से शरीर की Mobility बेहतर होती है, यानी जोड़ों और मांसपेशियों की मूवमेंट अधिक सहज हो जाती है। वेलनेस एक्सपर्ट्स का कहना है कि शुरुआत करने वालों को योग को किसी प्रतियोगिता की तरह नहीं लेना चाहिए। शरीर को जबरदस्ती स्ट्रेच करने के बजाय धीरे-धीरे कंट्रोल्ड मूवमेंट पर ध्यान देना जरूरी है। शरीर में जकड़न क्यों होती है? लंबे समय तक बैठे रहने से हिप फ्लेक्सर्स टाइट हो जाते हैं। लगातार स्क्रीन देखने से गर्दन और कंधों पर दबाव बढ़ता है और पोश्चर बिगड़ता है। वहीं, एक्सरसाइज और स्ट्रेचिंग की कमी जोड़ों की मूवमेंट को सीमित कर देती है। यही वजह है कि आजकल Flexibility और Mobility दोनों पर एक साथ काम करने की सलाह दी जाती है। विशेषज्ञों के अनुसार, शुरुआती लोगों में सबसे ज्यादा जकड़न इन हिस्सों में देखने को मिलती है: Hips Hamstrings Shoulders Spine Ankles इन हिस्सों की जकड़न के कारण आगे झुकना, बैठना, स्क्वाट करना और लंबे समय तक चलना तक मुश्किल हो सकता है। Yoga करने का सही समय क्या है? योग करने का कोई एक तय समय नहीं है। यह आपकी दिनचर्या और शरीर की जरूरत पर निर्भर करता है। सुबह योग करने से शरीर की stiffness कम होती है और एनर्जी मिलती है। शाम को योग करने से दिनभर की थकान और तनाव कम होता है। Workout के after stretching करने से muscles ज्यादा effectively खुलती हैं क्योंकि शरीर पहले से warm होता है। Beginners के लिए 5 आसान Yoga Poses 1. Cat-Cow Pose यह pose spine को gently activate करता है और लंबे समय तक बैठने से हुई stiffness को कम करने में मदद करता है। कैसे करें: हाथों और घुटनों के बल आएं। सांस अंदर लेते हुए पेट नीचे करें और छाती ऊपर उठाएं। सांस छोड़ते हुए पीठ को गोल करें और ठुड्डी अंदर की ओर लाएं। इसे 8–10 बार धीरे-धीरे दोहराएं। 2. Downward Facing Dog यह pose shoulders, calves, hamstrings और spine को stretch करता है। कैसे करें: हाथ और पैरों के बल शरीर को उल्टे V आकार में उठाएं। घुटनों को थोड़ा मोड़कर रखें। Spine को लंबा करने पर फोकस करें। Beginner Tip: अगर heels जमीन तक नहीं पहुंचतीं तो चिंता न करें। शुरुआत में knees bend रखना बिल्कुल ठीक है। 3. Low Lunge यह pose लंबे समय तक बैठने से tight हुए hips और lower back को खोलने में मदद करता है। कैसे करें: एक पैर आगे रखें और दूसरा घुटना जमीन पर टिकाएं। Front knee को ankle के ऊपर रखें। धीरे-धीरे hips को आगे की तरफ ले जाएं। 20–30 सेकंड तक hold करें। 4. Cobra Pose यह pose chest और shoulders खोलता है, posture सुधारता है और spine को मजबूत बनाता है। कैसे करें: पेट के बल लेट जाएं। हथेलियों को ribs के पास रखें। सांस लेते हुए धीरे-धीरे chest उठाएं। कंधों को relaxed रखें। Beginner Tip: हाथों पर ज्यादा जोर देने के बजाय back muscles का इस्तेमाल करें। 5. Child’s Pose यह pose शरीर और दिमाग दोनों को रिलैक्स करता है और recovery में मदद करता है। कैसे करें: घुटनों के बल बैठें। शरीर को आगे की ओर झुकाएं। माथे को जमीन या cushion पर टिकाएं। 6–10 गहरी सांसों तक इसी स्थिति में रहें। Beginners को किन बातों का ध्यान रखना चाहिए? विशेषज्ञों के अनुसार, सबसे बड़ी गलती है शरीर को जरूरत से ज्यादा push करना। Yoga कभी भी दर्द देने वाला नहीं होना चाहिए। इन गलतियों से बचें: जबरदस्ती deep stretch करना Joints को lock करना Bounce करते हुए stretch करना बिना तैयारी के difficult backbends और inversions करना अगर कोई pose blocked महसूस हो तो शरीर को force करने के बजाय modifications का इस्तेमाल करें। कितनी बार Yoga करना चाहिए? विशेषज्ञों के मुताबिक, लंबे sessions से ज्यादा जरूरी है consistency। रोज सिर्फ 10–15 मिनट योग करने से भी शरीर की flexibility, posture और mobility में बड़ा बदलाव आ सकता है। अगर समय हो तो 45–60 मिनट का complete session जिसमें breathing exercises और relaxation शामिल हों, और भी बेहतर माना जाता है। योग की शुरुआत करने के लिए आपको सिर्फ थोड़ा-सा खाली स्थान, एक योग मैट और नियमित अभ्यास की जरूरत है। धीरे-धीरे शरीर खुद बेहतर तरीके से respond करने लगता है।
Primary Sclerosing Cholangitis (PSC) जैसी गंभीर लिवर बीमारी के जोखिम का पहले से ज्यादा सटीक अनुमान लगाने में अब नई इमेजिंग तकनीक मदद कर सकती है। एक अंतरराष्ट्रीय मल्टी-सेंटर स्टडी में दावा किया गया है कि Quantitative MRCP यानी मैग्नेटिक रेजोनेंस कोलांजियोपैंक्रियाटोग्राफी आधारित नई तकनीक PSC मरीजों में बीमारी की गंभीरता और भविष्य के जोखिम को बेहतर तरीके से पहचान सकती है। क्या है PSC बीमारी? Primary Sclerosing Cholangitis एक क्रॉनिक लिवर डिजीज है, जिसमें बाइल डक्ट्स यानी पित्त नलिकाओं में सूजन और फाइब्रोसिस होने लगता है। इससे धीरे-धीरे: लिवर को नुकसान पहुंचता है बाइल डक्ट्स संकरी हो जाती हैं और कैंसर का खतरा बढ़ जाता है इस बीमारी में: Cholangiocarcinoma (बाइल डक्ट कैंसर) और Gallbladder Carcinoma (गॉलब्लैडर कैंसर) का जोखिम भी बढ़ जाता है। रिपोर्ट के मुताबिक PSC का पता चलने के बाद मरीजों में लिवर ट्रांसप्लांट या मृत्यु तक का औसत समय लगभग 13 से 21 साल माना जाता है। फिलहाल लिवर ट्रांसप्लांट ही इसका एकमात्र स्थायी इलाज है। स्टडी में क्या सामने आया? इस रिसर्च में 457 PSC मरीजों के Quantitative MRCP डेटा का विश्लेषण किया गया। इनमें से 320 मरीजों पर विस्तृत प्रोग्नोस्टिक एनालिसिस किया गया। शोधकर्ताओं ने एक नया रिस्क मॉडल तैयार किया जिसमें: MRCP इमेजिंग डेटा उम्र Inflammatory Bowel Disease की स्थिति लिवर बायोकेमिस्ट्री और बाइल डक्ट्स में बदलाव जैसे फैक्टर्स शामिल किए गए। पुराने स्कोरिंग सिस्टम से बेहतर निकला मॉडल रिसर्च में पाया गया कि Quantitative MRCP आधारित नया मॉडल PSC के जोखिम का अनुमान लगाने में मौजूदा कई स्कोरिंग सिस्टम्स से बेहतर साबित हुआ। यह मॉडल: MayoRisk Score और अन्य पारंपरिक प्रोग्नोस्टिक मॉडल्स से ज्यादा सटीक पाया गया। Bootstrap analysis में qmAOM मॉडल का प्रदर्शन: qmAOM: 0.82 AOM: 0.75 M+BA: 0.70 रिकॉर्ड किया गया। डॉक्टरों को कैसे मिलेगा फायदा? अभी तक PSC की जांच में इस्तेमाल होने वाले कई रेडियोलॉजिकल स्कोरिंग सिस्टम डॉक्टरों की विजुअल व्याख्या पर निर्भर करते हैं। इससे अलग-अलग विशेषज्ञों के बीच रिपोर्टिंग में अंतर आ सकता है। लेकिन नई MRCP+ तकनीक: एल्गोरिदम आधारित है ऑब्जेक्टिव डेटा देती है और इंटरऑब्जर्वर वैरिएशन कम करती है यानी मरीज की स्थिति का ज्यादा भरोसेमंद आकलन संभव हो सकता है। दवा रिसर्च में भी मिल सकती है मदद शोधकर्ताओं का मानना है कि यह तकनीक भविष्य में: PSC के लिए नई दवाओं के ट्रायल क्लिनिकल रिसर्च और प्रोग्नोस्टिक टूल्स को बेहतर बनाने में मदद कर सकती है।