आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में नींद से जुड़ी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं। कई लोग रात में बार-बार नींद टूटने, खर्राटे आने या सुबह उठने के बाद भी थकान महसूस करने जैसी समस्याओं से जूझते हैं। अक्सर लोग इसे सामान्य मानकर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार यह ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एपनिया (OSA) जैसी गंभीर बीमारी का संकेत हो सकता है। स्लीप एपनिया केवल नींद की गुणवत्ता को प्रभावित नहीं करता, बल्कि धीरे-धीरे दिमाग की कार्यक्षमता, याददाश्त और मानसिक स्वास्थ्य पर भी गंभीर असर डाल सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय रहते इसका इलाज नहीं किया गया, तो यह ब्रेन टिश्यू को नुकसान पहुंचाने के साथ-साथ स्ट्रोक और डिमेंशिया जैसी गंभीर बीमारियों का खतरा भी बढ़ा सकता है। क्या है स्लीप एपनिया? ऑब्सट्रक्टिव स्लीप एपनिया एक ऐसी स्थिति है जिसमें सोते समय श्वसन मार्ग बार-बार आंशिक या पूरी तरह बंद हो जाता है। इसके कारण सांस लेने में रुकावट आती है और व्यक्ति की नींद बार-बार टूटती रहती है। कई बार मरीज को इसका एहसास भी नहीं होता, लेकिन उसका शरीर पूरी रात इस समस्या से जूझता रहता है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह रुकावट एक रात में दर्जनों या यहां तक कि सैकड़ों बार भी हो सकती है। दिमाग को कैसे पहुंचता है नुकसान? ऑक्सीजन की कमी बनती है सबसे बड़ा खतरा स्लीप एपनिया के दौरान शरीर और दिमाग को पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं मिल पाती। इस स्थिति को "इंटरमिटेंट हाइपोक्सिया" कहा जाता है। दिमाग को लगातार ऑक्सीजन की आवश्यकता होती है। जब बार-बार ऑक्सीजन की कमी होती है, तो मस्तिष्क की कोशिकाएं प्रभावित होने लगती हैं। खासकर वे हिस्से जो याददाश्त, ध्यान और निर्णय लेने की क्षमता को नियंत्रित करते हैं। रिसर्च में पाया गया है कि लंबे समय तक बिना इलाज वाले स्लीप एपनिया से हिप्पोकैम्पस और फ्रंटल कॉर्टेक्स जैसे महत्वपूर्ण ब्रेन क्षेत्रों में बदलाव हो सकते हैं। याददाश्त और सोचने की क्षमता पर असर स्लीप एपनिया से पीड़ित लोगों में अक्सर ये समस्याएं देखी जाती हैं— चीजें भूलना ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई निर्णय लेने में परेशानी मानसिक प्रतिक्रिया की गति धीमी होना पढ़ाई और काम में प्रदर्शन प्रभावित होना नींद की रिकवरी प्रक्रिया हो जाती है प्रभावित हर बार सांस रुकने पर शरीर हल्की अवस्था में जाग जाता है, जिसे मेडिकल भाषा में "अराउजल" कहा जाता है। इससे गहरी नींद और REM Sleep बार-बार बाधित होती है। यही वे चरण हैं जिनमें— दिमाग खुद की मरम्मत करता है यादें मजबूत होती हैं भावनात्मक संतुलन बनता है सीखने की क्षमता बेहतर होती है जब ये प्रक्रियाएं पूरी नहीं हो पातीं, तो व्यक्ति दिनभर थकान, चिड़चिड़ापन और सुस्ती महसूस करता है। बढ़ सकता है स्ट्रोक का खतरा विशेषज्ञों के अनुसार स्लीप एपनिया केवल नींद की बीमारी नहीं है, बल्कि यह रक्त वाहिकाओं को भी प्रभावित करता है। बार-बार ऑक्सीजन की कमी और फिर अचानक ऑक्सीजन मिलने की प्रक्रिया से— सूजन बढ़ती है ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस बढ़ता है हाई ब्लड प्रेशर का खतरा बढ़ता है हृदय रोगों की संभावना बढ़ती है इन सभी कारणों से स्ट्रोक और मस्तिष्क संबंधी गंभीर बीमारियों का खतरा भी बढ़ सकता है। अल्जाइमर और डिमेंशिया से भी जुड़ सकता है संबंध हाल के शोध बताते हैं कि लंबे समय तक अनुपचारित स्लीप एपनिया अल्जाइमर और अन्य न्यूरोडीजेनेरेटिव बीमारियों के जोखिम को बढ़ा सकता है। नींद में लगातार व्यवधान आने से दिमाग में जमा होने वाले हानिकारक प्रोटीन, जैसे बीटा-एमिलॉयड, ठीक तरह से साफ नहीं हो पाते। यही प्रोटीन आगे चलकर डिमेंशिया और अल्जाइमर से जुड़े पाए गए हैं। किन लक्षणों को बिल्कुल नजरअंदाज न करें? यदि आपको इनमें से कोई लक्षण दिखाई दे रहे हैं, तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है— तेज खर्राटे आना रात में बार-बार नींद खुलना सोते समय सांस रुकने जैसा महसूस होना सुबह सिरदर्द होना दिनभर अत्यधिक नींद आना लगातार थकान महसूस होना ध्यान और याददाश्त कमजोर होना क्या है इसका इलाज? अच्छी बात यह है कि स्लीप एपनिया का इलाज संभव है। विशेषज्ञ इसके लिए कई उपाय सुझाते हैं— CPAP (Continuous Positive Airway Pressure) थेरेपी वजन नियंत्रित करना नियमित व्यायाम धूम्रपान और शराब से दूरी ओरल डिवाइस का उपयोग सोने की सही पोजीशन अपनाना समय पर पहचान और उपचार से न केवल नींद की गुणवत्ता बेहतर होती है, बल्कि दिमाग को होने वाले लंबे समय के नुकसान से भी बचा जा सकता है।
Stress Side Effects: तनाव हमारी सेहत के लिए नुकसानदायक होता है, यह बात लगभग हर कोई जानता है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि केवल लंबे समय तक बना रहने वाला स्ट्रेस ही नहीं, बल्कि सिर्फ 3 से 5 मिनट का तनाव भी शरीर में कई नकारात्मक बदलाव पैदा कर सकता है। बार-बार होने वाला छोटा तनाव धीरे-धीरे दिल, दिमाग, इम्यूनिटी और पाचन तंत्र पर गहरा असर डाल सकता है। गुरुग्राम स्थित सीके बिड़ला हॉस्पिटल के एसोसिएट डायरेक्टर (इंटरनल मेडिसिन) डॉ. तुषार तायल के अनुसार, शरीर हर प्रकार के तनाव को एक खतरे की तरह लेता है और उसी के अनुसार प्रतिक्रिया देता है। तनाव के दौरान शरीर में क्या होता है? जब मस्तिष्क किसी चुनौती या खतरे को महसूस करता है, तो ब्रेन का एमिग्डाला सक्रिय हो जाता है। इसके बाद शरीर में एड्रेनालिन और कॉर्टिसोल जैसे स्ट्रेस हार्मोन रिलीज होने लगते हैं। इसके परिणामस्वरूप: हार्ट रेट बढ़ जाता है। ब्लड प्रेशर बढ़ने लगता है। पाचन प्रक्रिया धीमी हो जाती है। शरीर अधिक सतर्क हो जाता है। ऊर्जा मांसपेशियों की ओर केंद्रित हो जाती है। इस प्रक्रिया को "फाइट या फ्लाइट रिस्पॉन्स" कहा जाता है। असली खतरा कब शुरू होता है? कुछ मिनटों का तनाव सामान्य रूप से खत्म हो जाता है, लेकिन यदि दिनभर में बार-बार तनाव की स्थिति पैदा होती रहे, तो शरीर सामान्य अवस्था में लौट नहीं पाता। लगातार: काम का दबाव मोबाइल नोटिफिकेशन छोटी-छोटी बहसें डेडलाइन का तनाव इन सबकी वजह से कोर्टिसोल का स्तर लगातार ऊंचा बना रह सकता है। दिल पर पड़ता है असर शोध के अनुसार, बार-बार सक्रिय होने वाला स्ट्रेस रिस्पॉन्स: हाई ब्लड प्रेशर का खतरा बढ़ाता है। धमनियों में प्लाक जमने की संभावना बढ़ाता है। हृदय रोगों का जोखिम बढ़ा सकता है। वजन और नींद भी होती है प्रभावित कॉर्टिसोल का बढ़ा हुआ स्तर: भूख बढ़ा सकता है। मोटापे का कारण बन सकता है। नींद की गुणवत्ता खराब कर सकता है। व्यायाम करने की इच्छा कम कर सकता है। कमजोर हो सकती है इम्यूनिटी लगातार तनाव इम्यून सिस्टम की कार्यक्षमता को प्रभावित करता है। ऐसे लोगों में: बार-बार संक्रमण होने का खतरा बढ़ जाता है। बीमारी से रिकवरी में अधिक समय लग सकता है। गट हेल्थ पर भी पड़ता है असर बार-बार होने वाला तनाव: गट माइक्रोबायोम का संतुलन बिगाड़ सकता है। एसिडिटी और एसिड रिफ्लक्स बढ़ा सकता है। IBS (इरिटेबल बॉवेल सिंड्रोम) जैसी समस्याओं को ट्रिगर कर सकता है। मानसिक स्वास्थ्य पर भी पड़ सकता है प्रभाव लगातार छोटे-छोटे तनाव के एपिसोड से: एंग्जायटी बढ़ सकती है। भावनात्मक सहनशक्ति कम हो सकती है। डिप्रेशन का खतरा बढ़ सकता है। तनाव से राहत पाने के आसान उपाय विशेषज्ञों के अनुसार, छोटे-छोटे रिलैक्सेशन ब्रेक तनाव के प्रभाव को कम करने में मदद कर सकते हैं। अपनाएं ये आदतें गहरी डायाफ्रामिक ब्रीदिंग करें। 5 मिनट शांत बैठें। थोड़ी देर बाहर टहलें। स्क्रीन से कुछ समय का ब्रेक लें। पर्याप्त नींद और नियमित व्यायाम करें। इन छोटे प्रयासों से कोर्टिसोल का स्तर नियंत्रित रखने में मदद मिल सकती है और शरीर को अगली तनावपूर्ण स्थिति से पहले सामान्य होने का मौका मिलता है।
Weekend Therapy: सिर्फ छुट्टी नहीं, खुद को रीचार्ज करने का मौका है वीकेंड पूरे सप्ताह ऑफिस, पढ़ाई, बिजनेस और घरेलू जिम्मेदारियों के बीच लोग शारीरिक और मानसिक रूप से थक जाते हैं। ऐसे में वीकेंड केवल आराम का दिन नहीं, बल्कि खुद को फिर से ऊर्जा से भरने का अवसर भी होता है। हालांकि कई लोग शनिवार और रविवार का ज्यादातर समय मोबाइल चलाने या देर तक सोने में बिताते हैं, जिससे शरीर और दिमाग को वास्तविक आराम नहीं मिल पाता। यदि आप वीकेंड का सही उपयोग करें तो आने वाले सप्ताह की शुरुआत नई ऊर्जा और सकारात्मक सोच के साथ कर सकते हैं। 1. पूरी करें अधूरी नींद, लेकिन जरूरत से ज्यादा नहीं कामकाजी दिनों में अक्सर पर्याप्त नींद नहीं मिल पाती। वीकेंड पर शरीर को आराम देने के लिए अच्छी और गहरी नींद लेना जरूरी है। हालांकि बहुत ज्यादा देर तक सोना भी नुकसानदायक हो सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार सामान्य समय से एक-दो घंटे अधिक आराम करना शरीर और दिमाग को तरोताजा रखने के लिए पर्याप्त होता है। अच्छी नींद मानसिक तनाव कम करने और एकाग्रता बढ़ाने में मदद करती है। 2. कुछ घंटों के लिए करें डिजिटल डिटॉक्स मोबाइल, लैपटॉप और टीवी की स्क्रीन आज हमारी जिंदगी का बड़ा हिस्सा बन चुकी हैं। लगातार सोशल मीडिया और ईमेल्स देखने से दिमाग को आराम नहीं मिल पाता। वीकेंड पर कम से कम चार से पांच घंटे के लिए फोन और अन्य डिजिटल डिवाइस से दूरी बनाएं। डिजिटल डिटॉक्स से आंखों को आराम मिलता है और मानसिक तनाव भी कम होता है। 3. प्रकृति के करीब बिताएं समय बंद कमरों और व्यस्त शहरों की जिंदगी से निकलकर थोड़ी देर प्रकृति के बीच समय बिताना मानसिक स्वास्थ्य के लिए बेहद फायदेमंद है। सुबह या शाम किसी पार्क में टहलना, हरियाली के बीच बैठना या ताजी हवा में गहरी सांस लेना मन को शांति देता है। प्रकृति के संपर्क में रहने से सकारात्मक भावनाएं बढ़ती हैं और तनाव कम होता है। 4. अपने शौक को दें समय भागदौड़ भरी जिंदगी में लोग अक्सर अपने पसंदीदा शौक भूल जाते हैं। वीकेंड पर कुछ समय उन गतिविधियों के लिए निकालें जो आपको खुशी देती हैं। चाहे किताब पढ़ना हो, संगीत सुनना, पेंटिंग करना, गार्डनिंग करना या कोई नया हुनर सीखना—अपनी पसंद का काम करने से मन प्रसन्न रहता है और मानसिक दबाव कम होता है। 5. मसाज और गुनगुने पानी से दें शरीर को राहत लगातार काम करने से शरीर की मांसपेशियों में खिंचाव और थकान महसूस हो सकती है। ऐसे में गुनगुने पानी से स्नान करना या हल्के तेल से मसाज करना फायदेमंद साबित हो सकता है। इसके अलावा गुनगुने पानी में सेंधा नमक डालकर कुछ देर पैर डुबोकर बैठने से भी शरीर को आराम मिलता है। यह तरीका ब्लड सर्कुलेशन बेहतर करने और शारीरिक थकान कम करने में मदद करता है। 6. परिवार और दोस्तों के साथ बिताएं क्वालिटी टाइम काम का दबाव और व्यस्त दिनचर्या कई बार लोगों को भावनात्मक रूप से भी थका देती है। वीकेंड पर परिवार, दोस्तों या प्रियजनों के साथ समय बिताना मानसिक स्वास्थ्य के लिए बेहद जरूरी है। खुलकर बातचीत करना, हंसी-मजाक करना और पुरानी यादें साझा करना तनाव कम करने का प्रभावी तरीका माना जाता है। छोटी-छोटी आदतें बदल सकती हैं आपका पूरा वीकेंड वीकेंड का सही इस्तेमाल केवल आराम करने के लिए नहीं, बल्कि खुद को मानसिक और शारीरिक रूप से बेहतर बनाने के लिए भी किया जा सकता है। यदि आप अच्छी नींद, डिजिटल डिटॉक्स, प्रकृति के साथ समय, अपनी हॉबी, रिलैक्सेशन और अपनों के साथ बातचीत जैसी आदतों को अपनाते हैं, तो न सिर्फ आपकी थकान दूर होगी बल्कि आप नए सप्ताह की शुरुआत भी अधिक उत्साह और ऊर्जा के साथ कर पाएंगे।
नई दिल्ली: गर्मी के मौसम में डिहाइड्रेशन, थकान और स्किन संबंधी समस्याएं आम बात हैं, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि बढ़ता तापमान मानसिक स्वास्थ्य को भी प्रभावित कर सकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और अन्य स्वास्थ्य संस्थाओं के अनुसार, अत्यधिक गर्मी तनाव, चिड़चिड़ापन, एंग्जायटी और मानसिक थकान को बढ़ा सकती है। क्यों बिगड़ सकता है मानसिक स्वास्थ्य? विशेषज्ञों के अनुसार, जब तापमान बहुत अधिक बढ़ जाता है तो शरीर को अपना सामान्य तापमान बनाए रखने के लिए अतिरिक्त मेहनत करनी पड़ती है। इसका असर दिमाग की कार्यक्षमता पर भी पड़ सकता है। गर्मी के कारण शरीर में स्ट्रेस हार्मोन कॉर्टिसोल का स्तर बढ़ सकता है, जिससे व्यक्ति बेचैनी, गुस्सा या मानसिक थकान महसूस कर सकता है। कई शोधों में यह भी पाया गया है कि अत्यधिक गर्मी के दौरान मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी आपात स्थितियों और अस्पताल में भर्ती होने के मामलों में वृद्धि देखी जाती है। नींद और डिहाइड्रेशन भी बनते हैं समस्या गर्मी के मौसम में पर्याप्त नींद न मिलना, मूड स्विंग्स और एंग्जायटी जैसी समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है। वहीं डिहाइड्रेशन के कारण कमजोरी, एकाग्रता में कमी और काम पर फोकस करने में परेशानी हो सकती है। विशेषज्ञों के अनुसार, जो लोग पहले से मानसिक स्वास्थ्य से संबंधित दवाएं ले रहे हैं, वे गर्मी के प्रति अधिक संवेदनशील हो सकते हैं। ऐसे रखें मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान रोजाना पर्याप्त मात्रा में पानी पिएं। संतुलित और हल्का भोजन करें। मौसमी फलों और ताजे खाद्य पदार्थों को आहार में शामिल करें। नियमित योग, व्यायाम और मेडिटेशन करें। दोपहर की तेज धूप से बचें। प्रतिदिन 7 से 8 घंटे की पर्याप्त नींद लें। परिवार और दोस्तों के साथ समय बिताएं। अपनी भावनाओं को खुलकर व्यक्त करें और जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ की मदद लें। सेल्फ-केयर भी है जरूरी विशेषज्ञों का मानना है कि सेल्फ-केयर केवल आराम करने तक सीमित नहीं है, बल्कि अपनी मानसिक और भावनात्मक जरूरतों को समझना भी इसका महत्वपूर्ण हिस्सा है। यदि लंबे समय तक तनाव, चिंता या उदासी महसूस हो रही हो, तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए और समय रहते डॉक्टर या मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लेनी चाहिए।
आज के डिजिटल दौर में मोबाइल, लैपटॉप और टैबलेट हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुके हैं। सोशल मीडिया और इंटरनेट जहां नई चीजें सीखने और दुनिया से जुड़े रहने का अवसर देते हैं, वहीं इनका अत्यधिक इस्तेमाल शरीर और दिमाग पर गंभीर असर डाल सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि लगातार ऑनलाइन रहने की आदत मानसिक थकान को बढ़ा रही है और सिर्फ नींद लेने से इस समस्या से पूरी तरह राहत नहीं मिलती। कैलाश दीपक हॉस्पिटल के कंसल्टेंट न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. बिपिन कुमार शर्मा के अनुसार, लंबे समय तक स्क्रीन के संपर्क में रहने से मस्तिष्क को लगातार भारी मात्रा में जानकारी प्रोसेस करनी पड़ती है, जिससे मानसिक ऊर्जा तेजी से खत्म होने लगती है। क्यों थकने लगता है दिमाग? विशेषज्ञों के मुताबिक, लगातार मोबाइल और लैपटॉप इस्तेमाल करने से मस्तिष्क का प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स प्रभावित होता है। यह हिस्सा निर्णय लेने, ध्यान केंद्रित करने और भावनाओं को नियंत्रित करने के लिए जिम्मेदार होता है। जब यह हिस्सा लगातार ओवरलोड रहता है, तो व्यक्ति में निम्न समस्याएं दिखाई देने लगती हैं— ध्यान लगाने में कठिनाई चिड़चिड़ापन भावनात्मक सुन्नता लगातार थकान महसूस होना मानसिक तनाव बढ़ना डॉक्टरों का कहना है कि इस तरह की मानसिक थकान केवल अच्छी नींद से पूरी तरह दूर नहीं होती, बल्कि दिमाग को डिजिटल आराम (Digital Detox) की भी जरूरत होती है। कैसे बदल रहा है इंटरनेट हमारे दिमाग को? लगातार स्क्रॉलिंग और बार-बार ऐप्स बदलने की आदत मस्तिष्क को तेज उत्तेजनाओं का आदी बना देती है। इससे किसी एक काम पर लंबे समय तक फोकस बनाए रखना मुश्किल हो जाता है। इसके अलावा— नोटिफिकेशन और लाइक्स डोपामाइन को बार-बार सक्रिय करते हैं। धीरे-धीरे डिजिटल कंटेंट पर निर्भरता बढ़ने लगती है। आत्म-नियंत्रण और निर्णय क्षमता प्रभावित हो सकती है। रिसर्च के अनुसार, अत्यधिक इंटरनेट उपयोग मस्तिष्क के कुछ हिस्सों में ग्रे मैटर के घनत्व को भी प्रभावित कर सकता है। सिर्फ दिमाग ही नहीं, शरीर के अन्य अंग भी होते हैं प्रभावित आंखों पर असर लगातार स्क्रीन देखने से डिजिटल आई स्ट्रेन या कंप्यूटर विजन सिंड्रोम की समस्या हो सकती है। इसके लक्षण हैं— आंखों में सूखापन जलन धुंधला दिखाई देना सिरदर्द गर्दन और रीढ़ की हड्डी पर दबाव लंबे समय तक झुककर मोबाइल देखने से "टेक नेक" की समस्या हो सकती है, जिससे गर्दन और ऊपरी रीढ़ में दर्द बढ़ सकता है। मांसपेशियों में तनाव कीबोर्ड और टचस्क्रीन के लगातार उपयोग से कंधों, हाथों और कलाइयों में दर्द या रिपिटिटिव स्ट्रेन इंजरी की समस्या हो सकती है। दिल और वजन पर असर अधिक स्क्रीन टाइम शारीरिक गतिविधियों को कम कर देता है, जिससे— मोटापे का खतरा बढ़ता है ब्लड सर्कुलेशन प्रभावित होता है हृदय संबंधी बीमारियों का जोखिम बढ़ सकता है नींद और इम्यूनिटी पर प्रभाव स्क्रीन से निकलने वाली ब्लू लाइट नींद की गुणवत्ता को प्रभावित करती है, जिससे हार्मोनल संतुलन, मेटाबॉलिज्म और रोग प्रतिरोधक क्षमता पर भी असर पड़ सकता है। क्या करें? विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि— स्क्रीन टाइम सीमित करें। हर 30-40 मिनट में छोटा ब्रेक लें। सोने से कम से कम एक घंटा पहले मोबाइल का इस्तेमाल बंद करें। नियमित व्यायाम और आउटडोर गतिविधियों को दिनचर्या का हिस्सा बनाएं। समय-समय पर डिजिटल डिटॉक्स अपनाएं। विशेषज्ञों का मानना है कि तकनीक का संतुलित उपयोग ही बेहतर मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य की कुंजी है।
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में तनाव (Stress) लगभग हर व्यक्ति की दिनचर्या का हिस्सा बन गया है। नौकरी का दबाव, आर्थिक चुनौतियां, पारिवारिक जिम्मेदारियां और सोशल मीडिया का बढ़ता प्रभाव लोगों की मानसिक शांति को प्रभावित कर रहा है। हालांकि थोड़े समय का तनाव सामान्य माना जाता है, लेकिन जब यह लंबे समय तक बना रहता है तो मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य दोनों के लिए गंभीर खतरा बन सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार, लगातार तनाव न केवल व्यक्ति के व्यवहार और सोचने की क्षमता को प्रभावित करता है, बल्कि यह हृदय, पाचन तंत्र, नींद और शरीर की कई अन्य महत्वपूर्ण प्रक्रियाओं पर भी नकारात्मक असर डाल सकता है। तनाव का दिमाग पर क्या असर पड़ता है? 1. निर्णय लेने की क्षमता कमजोर हो सकती है लगातार तनाव के दौरान शरीर में कॉर्टिसोल (Cortisol) नामक हार्मोन का स्तर बढ़ जाता है। यह हार्मोन दिमाग के प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स को प्रभावित करता है, जो सोचने, समझने, निर्णय लेने और समस्याओं का समाधान खोजने के लिए जिम्मेदार होता है। ऐसी स्थिति में व्यक्ति छोटे-छोटे फैसले लेने में भी कठिनाई महसूस कर सकता है और गलत निर्णय लेने की संभावना बढ़ जाती है। 2. याददाश्त और सीखने की क्षमता प्रभावित होती है लंबे समय तक तनाव में रहने से दिमाग का हिप्पोकैम्पस हिस्सा प्रभावित हो सकता है, जो नई चीजें सीखने और याद रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इस कारण व्यक्ति को बातें भूलने, ध्यान भटकने और नई जानकारी को याद रखने में परेशानी होने लगती है। 3. चिंता और डिप्रेशन का खतरा शुरुआत में तनाव केवल बेचैनी, चिड़चिड़ापन या चिंता के रूप में दिखाई देता है, लेकिन समय के साथ यह गंभीर मानसिक समस्याओं का रूप ले सकता है। लगातार तनाव के कारण: एंग्जायटी बढ़ सकती है डिप्रेशन का खतरा बढ़ सकता है आत्मविश्वास कम हो सकता है भावनात्मक संतुलन बिगड़ सकता है 4. प्रोडक्टिविटी में गिरावट जब दिमाग लगातार तनाव में रहता है तो किसी भी काम में ध्यान लगाना मुश्किल हो जाता है। व्यक्ति जल्दी थक जाता है और उसकी कार्यक्षमता पर असर पड़ता है। इसका प्रभाव नौकरी, पढ़ाई और व्यक्तिगत जीवन सभी पर दिखाई देने लगता है। नींद पर पड़ता है सीधा असर तनाव की स्थिति में व्यक्ति अक्सर एक ही समस्या के बारे में बार-बार सोचता रहता है। इससे रात में नींद आने में देर हो सकती है या बार-बार नींद टूट सकती है। खराब नींद के कारण: दिनभर थकान महसूस होती है ऊर्जा कम हो जाती है चिड़चिड़ापन बढ़ जाता है मानसिक प्रदर्शन प्रभावित होता है तनाव का शरीर पर क्या प्रभाव पड़ता है? 1. हृदय रोग का खतरा बढ़ सकता है तनाव के दौरान दिल की धड़कन तेज हो जाती है और रक्तचाप बढ़ सकता है। यदि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहे तो हृदय संबंधी समस्याओं का जोखिम बढ़ सकता है। 2. मांसपेशियों में दर्द और अकड़न लगातार तनाव में रहने पर शरीर की मांसपेशियां तनावग्रस्त रहती हैं। इससे गर्दन, कंधों और पीठ में दर्द की समस्या हो सकती है। 3. पाचन तंत्र प्रभावित हो सकता है तनाव का असर सीधे हमारे पाचन तंत्र पर भी पड़ता है। इसके कारण: अपच गैस पेट दर्द कब्ज या दस्त जैसी समस्याएं उभर सकती हैं। 4. वजन बढ़ने का खतरा कई लोग तनाव के दौरान जरूरत से ज्यादा खाना खाने लगते हैं, जिसे इमोशनल ईटिंग कहा जाता है। इससे: कैलोरी का सेवन बढ़ता है वजन बढ़ सकता है मोटापे का खतरा बढ़ जाता है तनाव कम करने के आसान तरीके विशेषज्ञों के अनुसार तनाव को नियंत्रित करने के लिए कुछ सरल आदतें अपनाई जा सकती हैं: रोजाना 20-30 मिनट वॉक करें मेडिटेशन और योग का अभ्यास करें पर्याप्त नींद लें दोस्तों और परिवार से बातचीत करें पसंदीदा संगीत सुनें सोशल मीडिया का उपयोग सीमित करें प्रकृति के बीच समय बिताएं यदि तनाव लंबे समय तक बना रहे, रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित होने लगे या चिंता और उदासी लगातार महसूस हो, तो मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ या डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है। तनाव केवल मन की समस्या नहीं है, बल्कि यह पूरे शरीर को प्रभावित कर सकता है। इसलिए समय रहते इसके संकेतों को पहचानना और उचित कदम उठाना बेहद जरूरी है।
बाहर से सफल, अंदर से परेशान! जानिए हाई-फंक्शनिंग एंग्जायटी के 7 संकेत आज के कॉर्पोरेट दौर में व्यस्त रहना और लगातार बेहतर प्रदर्शन करना सफलता की निशानी माना जाता है। लेकिन कई बार यही सफलता अंदर ही अंदर मानसिक दबाव और चिंता को छिपा देती है। मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, हाई-फंक्शनिंग एंग्जायटी ऐसी स्थिति है जिसमें व्यक्ति बाहर से पूरी तरह सफल और आत्मविश्वासी दिखाई देता है, लेकिन भीतर लगातार चिंता, तनाव और असुरक्षा महसूस करता रहता है। हालांकि यह कोई आधिकारिक मेडिकल डायग्नोसिस नहीं है, फिर भी इसका असर व्यक्ति के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर गहरा पड़ सकता है। आइए जानते हैं इसके प्रमुख संकेतों के बारे में। 1. हर बात को लेकर जरूरत से ज्यादा सोचना यदि आप मीटिंग, बातचीत या भेजे गए ईमेल को बार-बार दिमाग में दोहराते रहते हैं और सोचते हैं कि इसे बेहतर तरीके से कैसे किया जा सकता था, तो यह हाई-फंक्शनिंग एंग्जायटी का संकेत हो सकता है। लगातार ओवरथिंकिंग मानसिक थकान बढ़ाती है। 2. परफेक्शनिस्ट बनने की आदत ऐसे लोग छोटी-सी गलती से भी डरते हैं और हर काम को बिल्कुल परफेक्ट करना चाहते हैं। खुद की लगातार आलोचना करना और हर निर्णय पर संदेह करना भी इसी का हिस्सा हो सकता है। 3. काम खत्म होने के बाद भी दिमाग का एक्टिव रहना ऑफिस से घर आने के बाद भी यदि आपका दिमाग काम, टारगेट और अधूरे प्रोजेक्ट्स के बारे में सोचता रहता है, तो यह मानसिक तनाव का संकेत है। ऐसे लोगों को काम और निजी जीवन के बीच संतुलन बनाने में कठिनाई होती है। 4. चिंता से बचने के लिए जरूरत से ज्यादा काम करना कई लोग तनाव और चिंता से बचने के लिए खुद को काम में पूरी तरह डुबो देते हैं। शुरुआत में यह उत्पादकता बढ़ाने जैसा लगता है, लेकिन धीरे-धीरे यही आदत बर्नआउट का कारण बन सकती है। 5. बार-बार होने वाले शारीरिक लक्षण मानसिक तनाव का असर शरीर पर भी दिखाई देता है। लगातार सिरदर्द, गर्दन या कंधों में दर्द, थकान, मांसपेशियों में तनाव और नींद की कमी जैसे लक्षण हाई-फंक्शनिंग एंग्जायटी से जुड़े हो सकते हैं। 6. हर चीज अपने नियंत्रण में रखने की इच्छा यदि आपको दूसरों को जिम्मेदारी सौंपने में परेशानी होती है और हर काम खुद मॉनिटर करने की जरूरत महसूस होती है, तो यह भी चिंता का संकेत हो सकता है। विशेष रूप से मैनेजमेंट या नेतृत्व की भूमिका निभाने वाले लोगों में यह व्यवहार अधिक देखा जाता है। 7. सफलता के बावजूद असफलता का डर कई बार व्यक्ति अच्छी नौकरी, प्रमोशन और उपलब्धियों के बावजूद खुद को योग्य नहीं मानता। उसे लगता है कि वह किसी भी समय असफल हो सकता है। इसे आमतौर पर "इम्पोस्टर सिंड्रोम" कहा जाता है, जो हाई-फंक्शनिंग एंग्जायटी का प्रमुख संकेत माना जाता है। क्यों नजर नहीं आती यह समस्या? समाज अक्सर केवल उपलब्धियों और परिणामों को महत्व देता है। ऐसे में जो लोग बाहर से सफल दिखाई देते हैं, उनकी मानसिक परेशानियां अक्सर अनदेखी रह जाती हैं। यही कारण है कि हाई-फंक्शनिंग एंग्जायटी को पहचानना मुश्किल हो जाता है। कब लेनी चाहिए विशेषज्ञ की मदद? यदि चिंता आपके दैनिक जीवन, रिश्तों, स्वास्थ्य या कामकाज को प्रभावित करने लगे, शारीरिक लक्षण लगातार बने रहें या आप भावनात्मक रूप से थका हुआ महसूस करें, तो मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लेना जरूरी हो सकता है। इन आसान तरीकों से करें प्रबंधन काम और निजी जीवन के बीच स्पष्ट सीमाएं तय करें। नियमित रूप से गहरी सांस लेने और रिलैक्सेशन तकनीकों का अभ्यास करें। ईमेल और मैसेज बार-बार चेक करने की आदत कम करें। पर्याप्त नींद और नियमित व्यायाम को दिनचर्या का हिस्सा बनाएं। जरूरत महसूस होने पर काउंसलिंग या थेरेपी की मदद लें। मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि हाई-फंक्शनिंग एंग्जायटी को समय रहते पहचानकर और सही कदम उठाकर बर्नआउट, तनाव और अन्य मानसिक समस्याओं से बचा जा सकता है।
एक नई स्टडी में सामने आया है कि गंभीर मानसिक बीमारियों (Serious Mental Illness - SMI) से जूझ रहे Veterans ने स्वास्थ्य निगरानी के लिए इस्तेमाल होने वाले Wearable Devices को काफी सकारात्मक तरीके से स्वीकार किया। शोधकर्ताओं का कहना है कि ये डिवाइस मरीजों की मानसिक और शारीरिक स्थिति पर लगातार नजर रखने में मदद कर सकते हैं, खासकर तब जब डॉक्टर की अपॉइंटमेंट्स के बीच लंबा अंतर हो। Veterans पर किया गया अध्ययन यह अध्ययन अमेरिका के Greater Los Angeles Veterans Affairs System के तहत इलाज करा रहे मरीजों पर किया गया। इसमें schizophrenia spectrum disorders, bipolar disorder और post-traumatic stress disorder (PTSD) से पीड़ित 15 Veterans को शामिल किया गया। प्रतिभागियों ने दो हफ्ते से लेकर एक महीने तक wearable health devices का इस्तेमाल किया। इसके बाद शोधकर्ताओं ने उनके अनुभवों को समझने के लिए विस्तृत इंटरव्यू किए। Sleep, Stress और Activity Monitoring से मिला फायदा स्टडी में शामिल कई मरीजों ने बताया कि wearable devices को अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में शामिल करना आसान था। इन डिवाइस की मदद से वे अपनी: नींद की गुणवत्ता (Sleep Patterns) Heart Rate Stress Levels Physical Activity Daily Step Count जैसी चीजों को ट्रैक कर पा रहे थे। कई प्रतिभागियों ने कहा कि इन आंकड़ों को देखने से उन्हें अपने स्वास्थ्य के प्रति ज्यादा जागरूकता मिली और स्वस्थ आदतें अपनाने की प्रेरणा भी मिली। कुछ मरीजों ने नियमित वॉक, एक्सरसाइज और बेहतर नींद की दिनचर्या बनाए रखने की बात कही। Privacy को लेकर नहीं दिखी चिंता स्टडी की एक अहम बात यह रही कि अधिकांश प्रतिभागियों ने Privacy या Location Tracking को लेकर कोई चिंता नहीं जताई। मरीजों का मानना था कि डॉक्टरों के साथ यह स्वास्थ्य डेटा साझा करने से बेहतर इलाज और सही निर्णय लेने में मदद मिल सकती है। शोधकर्ताओं ने कहा कि मरीजों ने Patient-Generated Health Data को Healthcare Providers के लिए उपयोगी माना। तकनीकी दिक्कतें बनी चुनौती हालांकि, लंबे समय तक wearable devices इस्तेमाल करने में कुछ चुनौतियां भी सामने आईं। प्रतिभागियों ने बताया कि: Smartphone Apps को समझना कभी-कभी मुश्किल था तकनीकी समस्याएं उपयोग में बाधा बनीं लंबे समय तक डिवाइस पहनना असहज महसूस हुआ कुछ लोगों को संदेह था कि डिवाइस मानसिक स्वास्थ्य के जटिल लक्षणों को सही तरीके से पकड़ पाएंगे या नहीं विशेष रूप से Anxiety और Relapse जैसे संकेतों को ट्रैक करने की क्षमता पर सवाल उठाए गए। भविष्य में Mental Healthcare बदल सकते हैं Wearables शोधकर्ताओं का मानना है कि अगर तकनीकी सहायता बेहतर की जाए और Mood Tracking, Medication Reminders जैसे फीचर्स जोड़े जाएं, तो यह तकनीक मानसिक स्वास्थ्य देखभाल में बड़ा बदलाव ला सकती है। हालांकि विशेषज्ञों ने कहा कि अभी बड़े स्तर पर और अध्ययन की जरूरत है ताकि यह समझा जा सके कि नियमित इलाज में Wearable Data को शामिल करने से मरीजों के Clinical Outcomes में कितना सुधार हो सकता है।
National Health Service से जुड़े एक बड़े अध्ययन में सामने आया है कि ऑनलाइन सिंगिंग और ब्रीदिंग प्रोग्राम “ENO Breathe” लंबे समय से Long COVID से जूझ रहे मरीजों के लिए काफी फायदेमंद साबित हो सकता है। रिसर्च के मुताबिक इस कार्यक्रम से सांस फूलने की समस्या, एंग्जायटी और जीवन की गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार देखा गया। क्या है ENO Breathe Programme? ENO Breathe एक 6 हफ्तों का ऑनलाइन breathing और wellbeing programme है, जिसमें singing techniques के जरिए लोगों को सांस लेने के बेहतर तरीके सिखाए जाते हैं। यह प्रोग्राम खासतौर पर उन लोगों के लिए तैयार किया गया, जिन्हें COVID-19 के बाद लंबे समय तक सांस लेने में दिक्कत और थकान जैसी समस्याएं बनी रहीं। यह अध्ययन ब्रिटेन के 51 Long COVID Clinics से जुड़े 1,413 मरीजों पर किया गया। इन मरीजों की औसत उम्र 49 साल थी और करीब 80 प्रतिशत प्रतिभागी महिलाएं थीं। अधिकतर लोग लगभग 415 दिनों से Long COVID के लक्षणों से जूझ रहे थे। सांस फूलने और Anxiety में दिखा सुधार रिसर्च में पाया गया कि ENO Breathe प्रोग्राम पूरा करने के बाद मरीजों में सांस फूलने की समस्या में काफी कमी आई। Dyspnoea-12 स्कोर में औसतन 4.29 अंकों का सुधार दर्ज किया गया। सीढ़ियां चढ़ने, चलने और दौड़ने जैसी गतिविधियों के दौरान भी मरीजों ने पहले के मुकाबले बेहतर सांस लेने की क्षमता महसूस की। साथ ही Anxiety और मानसिक तनाव में भी कमी देखने को मिली। हालांकि, आराम की स्थिति में सांस लेने की समस्या में कोई बड़ा बदलाव नहीं पाया गया। सभी उम्र और वर्ग के लोगों को मिला फायदा शोधकर्ताओं के अनुसार इस प्रोग्राम का असर उम्र, जेंडर, नस्ल या पहले से मौजूद अस्थमा जैसी बीमारियों के आधार पर अलग-अलग नहीं था। यानी लगभग सभी प्रतिभागियों को समान रूप से फायदा मिला। अध्ययन के दौरान कोई गंभीर साइड इफेक्ट भी सामने नहीं आया, जिससे इसे सुरक्षित और आसानी से अपनाए जाने वाला विकल्प माना जा रहा है। Long COVID मरीजों के लिए नई उम्मीद विशेषज्ञों का मानना है कि ENO Breathe जैसे ऑनलाइन प्रोग्राम Long COVID से जूझ रहे लोगों के लिए कम लागत और आसानी से उपलब्ध होने वाला प्रभावी समाधान बन सकते हैं। भविष्य में इसे chronic breathlessness यानी लंबे समय तक सांस लेने में परेशानी वाली अन्य बीमारियों में भी इस्तेमाल किया जा सकता है।
King’s College London और University of Porto के वैज्ञानिकों की नई रिसर्च में यह सामने आया है कि दिमाग में मौजूद Histamine केवल एलर्जी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मानसिक स्वास्थ्य, याददाश्त, भावनाओं और व्यवहार को भी गहराई से प्रभावित कर सकता है। शोधकर्ताओं ने पहली बार ऐसा विस्तृत “Brain Histamine Map” तैयार किया है, जो यह दिखाता है कि जीवन के अलग-अलग चरणों में Histamine से जुड़े जीन दिमाग के विकास, सोचने-समझने की क्षमता और मानसिक बीमारियों से कैसे जुड़े होते हैं। Histamine सिर्फ एलर्जी तक सीमित नहीं आमतौर पर Histamine को एलर्जी से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन वैज्ञानिकों के अनुसार यह दिमाग में एक महत्वपूर्ण न्यूरोमॉड्यूलेटर की तरह काम करता है। यह कई जरूरी कार्यों में भूमिका निभाता है, जैसे: भावनाओं को नियंत्रित करना नींद और जागने का चक्र याददाश्त व्यवहारिक लचीलापन सीखने की क्षमता लाखों डेटा पॉइंट्स का किया गया विश्लेषण इस रिसर्च में वैज्ञानिकों ने कई आधुनिक तकनीकों और डेटा सेट्स का इस्तेमाल किया। अध्ययन में शामिल थे: 49,495 brain cell nuclei का RNA sequencing analysis 24 से 57 वर्ष की उम्र के postmortem brain samples गर्भावस्था के 8 सप्ताह से लेकर 40 वर्ष तक के developmental brain data PET imaging और neurotransmitter receptor mapping इन सभी डेटा को मिलाकर वैज्ञानिकों ने दिमाग में Histamine सिस्टम का विस्तृत अध्ययन किया। मानसिक बीमारियों से मिला सीधा संबंध रिसर्च में पाया गया कि Histamine receptors का संबंध कई मानसिक और न्यूरोलॉजिकल समस्याओं से हो सकता है। वैज्ञानिकों ने Histamine expression patterns को इन स्थितियों से जुड़ा पाया: Attention Deficit Hyperactivity Disorder Major Depressive Disorder Schizophrenia Anorexia Nervosa शोधकर्ताओं के अनुसार दिमाग के frontal और limbic क्षेत्रों में Histamine activity ज्यादा देखी गई, जबकि occipital cortex में इसका स्तर कम पाया गया। उम्र के साथ बदलता है Histamine सिस्टम अध्ययन में यह भी सामने आया कि: Histidine decarboxylase नामक enzyme का स्तर शुरुआती विकास में सबसे ज्यादा था जबकि H3 receptor expression उम्र बढ़ने के साथ adulthood तक बढ़ता गया इससे संकेत मिलता है कि Histamine सिस्टम जीवनभर दिमाग के विकास और कार्यप्रणाली को प्रभावित कर सकता है। भविष्य में नई मानसिक स्वास्थ्य थेरेपी का रास्ता वैज्ञानिकों का मानना है कि यह रिसर्च मानसिक बीमारियों के इलाज में नई संभावनाएं खोल सकती है। यह “Brain Histamine Atlas” भविष्य में: Depression ADHD Schizophrenia Neurodevelopmental disorders के लिए targeted therapies विकसित करने में मदद कर सकता है। हालांकि विशेषज्ञों ने यह भी स्पष्ट किया कि अभी और रिसर्च की जरूरत है, ताकि यह समझा जा सके कि Histamine signaling को नियंत्रित करके मानसिक स्वास्थ्य उपचार को कितना बेहतर बनाया जा सकता है।
कनाडा में की गई एक नई जनसंख्या-आधारित स्टडी में यह सामने आया है कि अपेक्षाकृत कम स्तर का वायु प्रदूषण भी दिमागी सेहत पर नकारात्मक असर डाल सकता है। शोधकर्ताओं के अनुसार, लंबे समय तक फाइन पार्टिकुलेट मैटर (PM2.5) और नाइट्रोजन डाइऑक्साइड (NO₂) के संपर्क में रहने से संज्ञानात्मक क्षमता (cognitive performance) कमजोर हो सकती है और मस्तिष्क में “छुपी हुई” वेस्कुलर क्षति का खतरा बढ़ सकता है। क्या कहती है यह रिसर्च? यह अध्ययन Canadian Alliance for Healthy Hearts and Minds Cohort Study के डेटा पर आधारित है, जिसमें 2014 से 2018 के बीच 5 प्रांतों के 6,878 वयस्कों को शामिल किया गया। प्रतिभागियों की औसत उम्र लगभग 57.6 वर्ष थी, जिनमें 55% से अधिक महिलाएं थीं। शोध में वायु प्रदूषण के 5 साल के औसत एक्सपोजर को मापा गया और उसका असर दिमागी टेस्ट और MRI स्कैन पर देखा गया। प्रदूषण और दिमागी प्रदर्शन के बीच संबंध स्टडी में पाया गया कि: PM2.5 के हर 5 μg/m³ बढ़ने पर MoCA स्कोर में गिरावट देखी गई इसी तरह NO₂ के बढ़ने से भी मानसिक क्षमता परीक्षण के स्कोर कम हुए कार्य-आधारित स्मृति और स्पीड टेस्ट (Digit Symbol Substitution Test) पर भी नकारात्मक असर पाया गया शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि NO₂ के संपर्क से “covert vascular brain injury” यानी छुपी हुई मस्तिष्क रक्तवाहिका क्षति का जोखिम बढ़ सकता है। खास बात: कम प्रदूषण में भी असर यह अध्ययन इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इसमें शामिल क्षेत्रों में प्रदूषण स्तर अपेक्षाकृत कम था। इसके बावजूद दिमागी कार्यक्षमता पर असर देखा गया। इससे संकेत मिलता है कि: केवल अत्यधिक प्रदूषण ही नहीं, बल्कि कम स्तर का लंबे समय का संपर्क भी जोखिम पैदा कर सकता है अन्य फैक्टरों का सीमित असर स्टडी में यह भी देखा गया कि: कार्डियोवैस्कुलर रिस्क फैक्टर और ग्रीन स्पेस (हरियाली) इनका इस संबंध पर कोई बड़ा असर नहीं दिखा। सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए क्या संकेत? शोधकर्ताओं का कहना है कि यह निष्कर्ष इस ओर इशारा करते हैं कि: वायु प्रदूषण केवल फेफड़ों या दिल तक सीमित समस्या नहीं है यह सीधे तौर पर ब्रेन हेल्थ को भी प्रभावित कर सकता है लंबे समय में यह डिमेंशिया और अन्य न्यूरोलॉजिकल समस्याओं का जोखिम बढ़ा सकता है आगे की जरूरत वैज्ञानिकों ने सुझाव दिया है कि: लंबी अवधि के (longitudinal) अध्ययन जरूरी हैं यह समझना जरूरी है कि प्रदूषण कम करने से क्या वास्तव में ब्रेन डिक्लाइन को रोका जा सकता है
सोने से पहले एक छोटा टुकड़ा बन सकता है हेल्दी आदत अगर आपको रात में मीठा खाने की आदत है, तो डार्क चॉकलेट आपके लिए एक बेहतर विकल्प हो सकती है। हाल ही में सामने आई रिपोर्ट्स के अनुसार, सोने से पहले थोड़ी मात्रा में डार्क चॉकलेट खाने से शरीर को रिलैक्स महसूस हो सकता है और नींद की गुणवत्ता बेहतर हो सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि इसमें मौजूद कुछ पोषक तत्व शरीर में मेलाटोनिन और सेरोटोनिन जैसे हार्मोन को सपोर्ट करते हैं, जो बेहतर नींद और मानसिक शांति से जुड़े होते हैं। मेलाटोनिन और रिलैक्सेशन में कैसे करती है मदद? डार्क चॉकलेट में ट्रिप्टोफैन नामक तत्व पाया जाता है, जो शरीर में सेरोटोनिन और मेलाटोनिन के निर्माण में मदद करता है। मेलाटोनिन वह हार्मोन है जो शरीर की स्लीप साइकिल को नियंत्रित करता है। वहीं सेरोटोनिन मूड को बेहतर बनाने और तनाव कम करने में सहायक माना जाता है। इसके अलावा डार्क चॉकलेट में मैग्नीशियम भी भरपूर मात्रा में होता है। यह मिनरल मांसपेशियों को रिलैक्स करने और तनाव कम करने में मदद करता है, जिससे शरीर को आराम महसूस होता है। ब्लड सर्कुलेशन और मूड पर भी असर विशेषज्ञों के मुताबिक, डार्क चॉकलेट में मौजूद फ्लेवोनॉयड्स ब्लड फ्लो को बेहतर बनाने में मदद करते हैं। इससे दिमाग तक ऑक्सीजन की सप्लाई बेहतर होती है और मानसिक शांति महसूस हो सकती है। यही कारण है कि कई लोग रात में थोड़ी मात्रा में डार्क चॉकलेट खाने के बाद अधिक रिलैक्स महसूस करते हैं। क्या रात में चॉकलेट खाने से नींद खराब भी हो सकती है? हालांकि हर व्यक्ति पर इसका असर अलग हो सकता है। डार्क चॉकलेट में थोड़ी मात्रा में कैफीन भी मौजूद होती है। ऐसे में जो लोग कैफीन के प्रति ज्यादा संवेदनशील होते हैं, उन्हें रात में इसे खाने से नींद आने में परेशानी हो सकती है या बेचैनी महसूस हो सकती है। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि अगर आपको कॉफी या कैफीन वाली चीजों से जल्दी असर होता है, तो रात में बहुत ज्यादा डार्क चॉकलेट खाने से बचना चाहिए। वजन बढ़ने का डर कितना सही? पोषण विशेषज्ञों के अनुसार, सीमित मात्रा में डार्क चॉकलेट खाना वजन बढ़ाने का बड़ा कारण नहीं बनता। करीब 10 ग्राम डार्क चॉकलेट में लगभग 60 कैलोरी होती है। अगर इसे संतुलित मात्रा में लिया जाए, तो यह लो-कैलोरी डाइट में भी शामिल की जा सकती है। डार्क या मिल्क चॉकलेट, कौन बेहतर? डॉक्टर और न्यूट्रिशनिस्ट आमतौर पर 65-70 प्रतिशत या उससे ज्यादा कोको वाली डार्क चॉकलेट को बेहतर मानते हैं, क्योंकि इसमें चीनी कम और एंटीऑक्सीडेंट ज्यादा होते हैं। हालांकि इसमें कैफीन की मात्रा मिल्क चॉकलेट से थोड़ी अधिक होती है। अगर आपको कैफीन से दिक्कत नहीं होती, तो डार्क चॉकलेट बेहतर विकल्प मानी जाती है। वहीं कैफीन से संवेदनशील लोग कम मात्रा में मिल्क चॉकलेट चुन सकते हैं।
आज मनाई जा रही है अपरा एकादशी आज 13 मई 2026 को अपरा एकादशी का पावन व्रत रखा जा रहा है। हिंदू धर्म में यह एकादशी भगवान Vishnu को समर्पित मानी जाती है। इसे अचला एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन श्रद्धा और विधि-विधान से भगवान विष्णु की पूजा करने से व्यक्ति को अपार पुण्य, सुख-समृद्धि और मानसिक शांति प्राप्त होती है। कहा जाता है कि अपरा एकादशी का व्रत करने से अनजाने में हुए पापों से मुक्ति मिलती है और मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग खुलता है। पहली बार व्रत रखने वालों के लिए पूजा विधि, नियम और सावधानियों की जानकारी बेहद जरूरी मानी जाती है। अपरा एकादशी 2026: शुभ मुहूर्त और पारण समय एकादशी तिथि प्रारंभ: 12 मई 2026, दोपहर 2:52 बजे एकादशी तिथि समाप्त: 13 मई 2026, दोपहर 1:29 बजे व्रत पारण समय: 14 मई 2026, सुबह 5:31 बजे से 8:14 बजे तक उदयातिथि के अनुसार आज यानी 13 मई को व्रत रखा जा रहा है। इस बार अपरा एकादशी पर सर्वार्थसिद्धि योग का भी शुभ संयोग बन रहा है, जिससे इस दिन का धार्मिक महत्व और बढ़ गया है। भगवान विष्णु को प्रिय हैं ये रंग और भोग धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान विष्णु को पीला रंग अत्यंत प्रिय माना जाता है। इसलिए अपरा एकादशी के दिन पीले वस्त्र पहनना और पीली वस्तुएं अर्पित करना शुभ माना जाता है। प्रिय फूल पीले गेंदे के फूल कमल पीले गुलाब प्रिय भोग पीले फल केसरिया भात पीले रंग की मिठाइयां भोग में तुलसी दल अवश्य शामिल करना चाहिए, क्योंकि बिना तुलसी के भगवान विष्णु का भोग अधूरा माना जाता है। अपरा एकादशी पूजा विधि सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और व्रत का संकल्प लें। इसके बाद भगवान विष्णु की प्रतिमा या तस्वीर को पीले वस्त्र पर स्थापित करें। फिर पंचामृत से भगवान का अभिषेक करें। पूजा में पीले फूल, पीला चंदन और पीले वस्त्र अर्पित करें। दीपक और धूप जलाकर फल और मिठाई का भोग लगाएं। पूजा के दौरान विष्णु मंत्रों का जाप करें और बाद में विष्णु चालीसा व व्रत कथा का पाठ करें। अंत में आरती करके पूजा संपन्न करें। भगवान विष्णु के प्रमुख मंत्र ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥ कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने। प्रणत क्लेशनाशाय गोविन्दाय नमो नमः॥ नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि। तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्॥ अपरा एकादशी पर इन बातों का रखें विशेष ध्यान चावल खाना माना जाता है वर्जित एकादशी के दिन चावल का सेवन नहीं करना चाहिए। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन चावल खाना अशुभ माना गया है। सात्विक भोजन करें घर में प्याज, लहसुन, मांस और मदिरा का प्रयोग नहीं करना चाहिए। व्रत में सेंधा नमक का ही उपयोग करें। तुलसी दल न तोड़ें एकादशी के दिन तुलसी के पत्ते तोड़ना वर्जित माना जाता है। पूजा के लिए तुलसी दल दशमी तिथि को ही तोड़कर रख लेना चाहिए। क्रोध और विवाद से बचें इस दिन शांत मन से भगवान विष्णु का ध्यान करें। किसी की निंदा या अपशब्द बोलने से बचना चाहिए। दिन में न सोएं धार्मिक मान्यता है कि एकादशी पर दिन में सोने से व्रत का पूर्ण फल नहीं मिलता। इस समय को भजन-कीर्तन और धार्मिक पाठ में लगाना शुभ माना गया है।
बदल रही है नौकरी और सफलता की परिभाषा एक समय था जब प्रमोशन को करियर की सबसे बड़ी उपलब्धि माना जाता था। ऊंचा पद, ज्यादा वेतन और जिम्मेदारी सफलता की पहचान समझे जाते थे। लेकिन अब हालात तेजी से बदल रहे हैं। बढ़ते तनाव, डिजिटल दबाव और बिगड़ते वर्क-लाइफ बैलेंस के बीच कई कर्मचारी प्रमोशन लेने से भी बचने लगे हैं। आज बड़ी संख्या में प्रोफेशनल्स यह सोचने लगे हैं कि क्या ज्यादा पद और सैलरी वास्तव में मानसिक शांति और निजी जिंदगी की कीमत पर सही है। कर्मचारियों की संतुष्टि में आई बड़ी गिरावट Gallup की State of the Global Workplace 2026 रिपोर्ट के मुताबिक 2025 में वैश्विक कर्मचारी जुड़ाव (Employee Engagement) घटकर सिर्फ 20 प्रतिशत रह गया। यह 2020 के बाद सबसे निचला स्तर बताया गया है। रिपोर्ट के अनुसार कर्मचारियों में बढ़ती थकान और असंतोष के कारण वैश्विक अर्थव्यवस्था को लगभग 10 ट्रिलियन डॉलर की उत्पादकता का नुकसान हुआ। प्रमोशन अब इनाम नहीं, बोझ जैसा क्यों लग रहा? विशेषज्ञों का मानना है कि महामारी के बाद कर्मचारियों की प्राथमिकताएं बदल गई हैं। अब लोग केवल पद और वेतन नहीं, बल्कि मानसिक शांति, लचीलापन और निजी समय को ज्यादा महत्व दे रहे हैं। Instahyre के को-फाउंडर सरबोजित मलिक के मुताबिक आज के कर्मचारी काम में अर्थ, स्वतंत्रता और संतुलन चाहते हैं। उनका कहना है कि प्रमोशन की खुशी कुछ समय के लिए रहती है, लेकिन उसके साथ आने वाला तनाव लंबे समय तक बना रहता है। डिजिटल वर्क कल्चर ने बढ़ाया दबाव वर्क फ्रॉम होम और डिजिटल कार्य संस्कृति के बाद कर्मचारियों पर “हमेशा उपलब्ध रहने” का दबाव काफी बढ़ गया है। सीनियर पदों पर देर रात कॉल, लगातार ईमेल और निजी जीवन में काम का दखल आम हो गया है। Biz Staffing Comrade Pvt Ltd के मैनेजिंग पार्टनर पुनीत अरोड़ा के अनुसार आज प्रमोशन का मतलब कई लोगों के लिए ज्यादा काम और कम निजी समय बन गया है। उन्होंने बताया कि कई कर्मचारी अब मानसिक स्वास्थ्य और परिवार के समय को प्राथमिकता देते हुए नेतृत्व वाली भूमिकाएं तक ठुकरा रहे हैं। कंपनियों को बदलनी होगी सोच? विशेषज्ञों का मानना है कि कंपनियों को करियर ग्रोथ की पारंपरिक सोच बदलनी होगी। केवल लंबे घंटे काम करने और लगातार उपलब्ध रहने को सफलता मानना अब कर्मचारियों को स्वीकार नहीं है। अब कर्मचारी ऐसे प्रमोशन चाहते हैं जिनमें– बेहतर वर्क-लाइफ बैलेंस मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान लचीलापन सपोर्टिव कार्य संस्कृति वास्तविक नेतृत्व स्वतंत्रता जैसी सुविधाएं भी शामिल हों। भविष्य में कैसी होगी करियर ग्रोथ? कॉर्पोरेट दुनिया में अब सफलता की परिभाषा बदल रही है। कर्मचारी अब सिर्फ बड़ी सैलरी नहीं, बल्कि बेहतर जीवन गुणवत्ता भी चाहते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले समय में वही कंपनियां सफल होंगी जो कर्मचारियों को केवल पद नहीं, बल्कि संतुलित और स्वस्थ कार्य वातावरण भी देंगी। अब सवाल यह नहीं रह गया कि लोग आगे बढ़ना चाहते हैं या नहीं, बल्कि यह है कि क्या करियर ग्रोथ बिना थकान और मानसिक दबाव के संभव है।
भारतीय कर्मचारियों की तारीफ या ‘टॉक्सिक वर्क कल्चर’ का समर्थन? Burj Khalifa के डेवलपर और Emaar Properties के संस्थापक Mohamed Alabbar के एक बयान ने सोशल मीडिया पर नई बहस छेड़ दी है। उन्होंने कहा कि उन्हें भारतीय कर्मचारियों को नौकरी पर रखना पसंद है क्योंकि वे “रात 1 बजे भी फोन उठाते हैं” और उनका वर्क एथिक दुनिया में सबसे मजबूत है। यह टिप्पणी उन्होंने “Make It in the Emirates” समिट के दौरान की। अलब्बार ने कहा कि सफलता सिर्फ बुद्धिमानी से नहीं, बल्कि लगातार मेहनत, अनुशासन और जिम्मेदारी निभाने की आदत से मिलती है। उनके मुताबिक भारतीय प्रोफेशनल्स कठिन परिस्थितियों में भी काम के प्रति समर्पित रहते हैं और यही बात उन्हें अलग बनाती है। “हार्ड वर्क ही असली ताकत” अपने संबोधन में अलब्बार ने कहा कि किसी भी कंपनी की असली मजबूती उसके कर्मचारियों की मेहनत और संकट के समय उनकी प्रतिबद्धता से तय होती है। उन्होंने 2008 की आर्थिक मंदी और कोविड-19 महामारी का जिक्र करते हुए कहा कि वही कंपनियां टिक पाईं जिनकी टीमें मुश्किल हालात में भी काम करती रहीं। उन्होंने यह भी बताया कि संकट के समय उनकी कंपनी ने कर्मचारियों की नौकरी और सैलरी सुरक्षित रखने की कोशिश की थी, ताकि टीम का भरोसा बना रहे। सोशल मीडिया पर मिला मिला-जुला रिएक्शन हालांकि अलब्बार की टिप्पणी को कुछ लोगों ने भारतीय कर्मचारियों की मेहनत की सराहना माना, लेकिन सोशल मीडिया पर कई यूजर्स ने इसे “अनहेल्दी वर्क कल्चर” को बढ़ावा देने वाला बयान बताया। Reddit और X जैसे प्लेटफॉर्म पर यूजर्स ने कहा कि देर रात तक उपलब्ध रहना समर्पण नहीं बल्कि नौकरी का दबाव और असुरक्षा दिखाता है। कई लोगों ने लिखा कि भारतीय प्रोफेशनल्स को लंबे समय से “ओवरडिलीवर” करने के लिए तैयार किया जाता रहा है, जिससे निजी जीवन और मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित होता है। कुछ यूजर्स ने यह चिंता भी जताई कि विदेशी कंपनियां भारतीय कर्मचारियों से हर समय उपलब्ध रहने की उम्मीद करने लगी हैं, जिससे ओवरवर्क की समस्या और बढ़ सकती है। वर्क-लाइफ बैलेंस पर फिर शुरू हुई चर्चा भारत के आईटी, कंसल्टिंग और सर्विस सेक्टर के कर्मचारी दुनियाभर में अपनी मेहनत और मल्टीपल टाइम जोन में काम करने की क्षमता के लिए जाने जाते हैं। लेकिन HR एक्सपर्ट्स का मानना है कि लगातार उपलब्ध रहने की संस्कृति लंबे समय में बर्नआउट, तनाव और कर्मचारियों के नौकरी छोड़ने की दर बढ़ा सकती है। दुनिया के कई देशों में अब “Right to Disconnect” जैसे नियम लागू किए जा रहे हैं, जिनका मकसद कर्मचारियों को ऑफिस समय के बाद काम से अलग रहने का अधिकार देना है। भारत में अभी ऐसा कोई व्यापक कानून नहीं है, लेकिन नई पीढ़ी के कर्मचारी अब वर्क-लाइफ बैलेंस और मानसिक स्वास्थ्य को ज्यादा महत्व देने लगे हैं। बड़ा सवाल: मेहनत या सीमाओं की जरूरत? अलब्बार के बयान ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है–क्या भारतीय प्रोफेशनल्स को हमेशा “हर समय उपलब्ध” रहने वाली अपनी छवि बनाए रखनी चाहिए, या अब काम और निजी जीवन के बीच स्पष्ट सीमाएं तय करने का समय आ गया है?
मानसिक स्वास्थ्य उपचार के क्षेत्र में उभर रही साइकेडेलिक थेरेपी को लेकर मीडिया कवरेज पर एक नई रिसर्च ने महत्वपूर्ण सवाल खड़े किए हैं। Natural Language Processing के जरिए किए गए इस विश्लेषण में पाया गया कि 2017 से 2024 के बीच साइकेडेलिक उपचारों को पारंपरिक दवाओं की तुलना में अधिक सकारात्मक तरीके से प्रस्तुत किया गया। साइकेडेलिक थेरेपी को मिला ज्यादा सकारात्मक कवरेज अध्ययन में 6,805 मीडिया पब्लिकेशंस का विश्लेषण किया गया, जिसमें पाया गया कि डिप्रेशन और Post-Traumatic Stress Disorder जैसे मानसिक रोगों के इलाज में उपयोग होने वाली साइकेडेलिक थेरेपी को अधिक सकारात्मक भावनाओं और भाषा के साथ जोड़ा गया। इसके विपरीत, FDA-स्वीकृत एंटीडिप्रेसेंट दवाओं को अक्सर जोखिम, साइड इफेक्ट्स और नकारात्मक पहलुओं के संदर्भ में दिखाया गया। इससे यह संकेत मिलता है कि पारंपरिक उपचारों को अपेक्षाकृत अधिक आलोचनात्मक नजर से प्रस्तुत किया जा रहा है। क्या पूरी तरह सकारात्मक है कवरेज? हालांकि स्टडी में यह भी सामने आया कि साइकेडेलिक उपचारों की कवरेज पूरी तरह एकतरफा नहीं है। कुछ रिपोर्ट्स में इनके जोखिम और नकारात्मक पहलुओं को भी उजागर किया गया। वहीं, पारंपरिक एंटीडिप्रेसेंट्स को ‘रिवॉर्ड’ यानी लाभ से जुड़े संदर्भों में भी दिखाया गया। मरीजों की सोच पर पड़ सकता है असर विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की असंतुलित मीडिया कवरेज मरीजों की सोच और फैसलों को प्रभावित कर सकती है। अगर किसी नए उपचार को अधिक सकारात्मक और पुराने उपचार को अधिक नकारात्मक रूप में दिखाया जाता है, तो मरीज पारंपरिक दवाओं से दूरी बना सकते हैं या नए विकल्पों से अवास्तविक उम्मीदें रख सकते हैं। डॉक्टरों के लिए बढ़ी जिम्मेदारी इस स्थिति में स्वास्थ्य विशेषज्ञों के लिए यह जरूरी हो जाता है कि वे मरीजों को संतुलित और साक्ष्य-आधारित जानकारी दें। इससे मरीज सही निर्णय ले सकेंगे और उपचार प्रक्रिया पर भरोसा बना रहेगा। संतुलित रिपोर्टिंग की जरूरत यह अध्ययन इस बात पर जोर देता है कि मानसिक स्वास्थ्य जैसे संवेदनशील विषयों पर मीडिया की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। जैसे-जैसे साइकेडेलिक थेरेपी पर रिसर्च आगे बढ़ेगी, वैसे-वैसे संतुलित और तथ्य-आधारित रिपोर्टिंग जरूरी होगी ताकि आम लोगों को सही और पूरी जानकारी मिल सके।
हाल ही में प्रकाशित एक महत्वपूर्ण अध्ययन में यह सामने आया है कि लाइफस्टाइल फैक्टर्स का असर सिर्फ शारीरिक स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रोस्टेट कैंसर से जूझ रहे पुरुषों के मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य पर भी गहरा प्रभाव डालता है। इस रिसर्च में पाया गया कि रोजमर्रा की आदतें—जैसे व्यायाम, धूम्रपान और बॉडी वेट—सीधे तौर पर मरीजों की सोचने-समझने की क्षमता और मानसिक स्थिति को प्रभावित करती हैं। एक्सरसाइज से बेहतर हुआ दिमाग और मूड अध्ययन के अनुसार, जो मरीज नियमित रूप से शारीरिक गतिविधियों में शामिल रहे, उनकी कॉग्निटिव परफॉर्मेंस (सोचने और समझने की क्षमता) और भावनात्मक स्थिति बेहतर पाई गई। शोध में यह संबंध सांख्यिकीय रूप से महत्वपूर्ण (p<0.05) पाया गया, जिससे स्पष्ट होता है कि एक्सरसाइज न केवल शरीर बल्कि दिमाग को भी मजबूत बनाती है। स्मोकिंग और ज्यादा वजन बना खतरा इसके विपरीत, धूम्रपान करने वाले मरीजों में कॉग्निटिव स्कोर और मानसिक स्वास्थ्य दोनों ही कमजोर पाए गए। इसी तरह, जिन लोगों का BMI (बॉडी मास इंडेक्स) ज्यादा था, उनमें भी सोचने-समझने की क्षमता और भावनात्मक स्थिरता कम देखी गई। यह संकेत देता है कि खराब लाइफस्टाइल आदतें मानसिक गिरावट का कारण बन सकती हैं। हेल्दी लाइफस्टाइल से मिल सकता है फायदा रिसर्च में यह भी पाया गया कि जिन मरीजों की जीवनशैली संतुलित और स्वस्थ थी, उनके मानसिक और भावनात्मक स्कोर बेहतर थे। यह पैटर्न सभी परीक्षणों में लगातार देखने को मिला, जिससे यह स्पष्ट होता है कि लाइफस्टाइल में बदलाव कर मरीज अपनी स्थिति में सुधार ला सकते हैं। इलाज में बदलाव की जरूरत विशेषज्ञों का कहना है कि प्रोस्टेट कैंसर के मरीजों में मानसिक समस्याएं अक्सर नजरअंदाज कर दी जाती हैं। इस अध्ययन के नतीजे बताते हैं कि इलाज के दौरान लाइफस्टाइल सुधार—जैसे नियमित व्यायाम और वजन नियंत्रण—को भी प्राथमिकता देनी चाहिए। हालांकि, शोधकर्ताओं ने यह भी स्पष्ट किया है कि इन निष्कर्षों से सीधे कारण-परिणाम संबंध साबित नहीं होता, लेकिन इनके बीच मजबूत संबंध जरूर है। आगे की रिसर्च जरूरी अध्ययन के आधार पर विशेषज्ञों ने सुझाव दिया है कि भविष्य में और विस्तृत शोध किए जाने चाहिए, ताकि यह समझा जा सके कि किस तरह के लाइफस्टाइल बदलाव से मरीजों के मानसिक स्वास्थ्य में सबसे ज्यादा सुधार संभव है।
एक नई अंतरराष्ट्रीय स्टडी में यह सामने आया है कि डिप्रेशन और शारीरिक निष्क्रियता मिलकर बुजुर्गों में कई गंभीर बीमारियों के खतरे को तेजी से बढ़ा रहे हैं। खासतौर पर कार्डियोमेटाबोलिक मल्टीमॉर्बिडिटी–जिसमें डायबिटीज, हार्ट डिजीज और स्ट्रोक जैसी बीमारियां शामिल हैं–का जोखिम काफी बढ़ जाता है। 9 साल की स्टडी में चौंकाने वाले आंकड़े चीन में की गई इस लॉन्ग-टर्म स्टडी में 45 वर्ष या उससे अधिक उम्र के 2,661 लोगों को करीब 9 साल तक फॉलो किया गया। शुरुआत में सभी प्रतिभागी इन बीमारियों से मुक्त थे, लेकिन अध्ययन के दौरान 797 लोगों में कार्डियोमेटाबोलिक मल्टीमॉर्बिडिटी विकसित हो गई। डिप्रेशन और एक्सरसाइज की कमी का डबल असर स्टडी के मुताबिक, जिन लोगों को डिप्रेशन था और जो बिल्कुल भी तीव्र शारीरिक गतिविधि (VPA) नहीं करते थे, उनमें इस तरह की बीमारियों का खतरा सबसे ज्यादा पाया गया। यह भी सामने आया कि: डिप्रेशन वाले लेकिन एक्टिव लोग भी जोखिम में रहे बिना डिप्रेशन लेकिन निष्क्रिय लोग भी खतरे से बाहर नहीं थे यानी मानसिक स्वास्थ्य और फिजिकल एक्टिविटी–दोनों ही अलग-अलग तरीके से जोखिम बढ़ाते हैं। एक्सरसाइज से मिल सकती है आंशिक राहत अध्ययन में यह भी पाया गया कि नियमित शारीरिक गतिविधि, खासकर तेज एक्सरसाइज, इस जोखिम को कुछ हद तक कम कर सकती है। हालांकि यह पूरी तरह से खतरे को खत्म नहीं करती, लेकिन निष्क्रिय लोगों की तुलना में एक्टिव लोगों की स्थिति बेहतर पाई गई। क्यों है यह चिंता का विषय? विशेषज्ञों के अनुसार, कार्डियोमेटाबोलिक मल्टीमॉर्बिडिटी एक बार हो जाए तो इसे मैनेज करना बेहद मुश्किल होता है। ऐसे में शुरुआती स्तर पर ही डिप्रेशन और लाइफस्टाइल पर ध्यान देना जरूरी है। रोकथाम के लिए क्या करें? स्टडी का सबसे बड़ा संदेश यही है कि: मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान देना उतना ही जरूरी है जितना शारीरिक स्वास्थ्य नियमित व्यायाम को दिनचर्या का हिस्सा बनाना चाहिए उम्र बढ़ने के साथ हेल्थ चेकअप और एक्टिव लाइफस्टाइल अपनाना बेहद जरूरी है
सरायकेला। झारखंड के सरायकेला जिले से एक दर्दनाक घटना सामने आई है, जहां जंगली हाथियों के झुंड ने एक परिवार पर हमला कर दो लोगों की जान ले ली। यह घटना ईचागढ़ थाना क्षेत्र के हाड़ात गांव की है, जहां देर रात हाथियों का झुंड अचानक गांव में घुस आया। घर तोड़ा, परिवार को बनाया निशाना जानकारी के अनुसार, हाथियों ने कई घरों को नुकसान पहुंचाया और एक मकान को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया। इसी दौरान घर के अंदर सो रहे परिवार के पांच सदस्य हाथियों की चपेट में आ गए। अचानक हुए हमले से गांव में चीख-पुकार मच गई, लेकिन हाथियों के उग्र रूप के कारण ग्रामीण कुछ कर नहीं सके। मां-बेटी की मौके पर मौत हमले में चाइना देवी और उनकी 13 वर्षीय बेटी अमिता बाला की मौके पर ही मौत हो गई। वहीं परिवार के अन्य सदस्य—मोहन महतो और सतुला देवी—गंभीर रूप से घायल हो गए। घायलों को इलाज के लिए जमशेदपुर के अस्पताल में भर्ती कराया गया है, जहां उनकी हालत चिंताजनक बताई जा रही है। गांव में दहशत, प्रशासन से नाराजगी घटना के बाद पूरे इलाके में दहशत का माहौल है। ग्रामीणों ने वन विभाग की लापरवाही पर नाराजगी जताई है और समय पर कार्रवाई नहीं होने का आरोप लगाया है। सूचना मिलने पर वन विभाग की टीम मौके पर पहुंचकर जांच में जुट गई है। मुआवजे और सुरक्षा की मांग स्थानीय लोगों और जनप्रतिनिधियों ने सरकार से मृतकों के परिजनों को मुआवजा देने और क्षेत्र में हाथियों के प्रवेश को रोकने के लिए ठोस कदम उठाने की मांग की है। लगातार बढ़ रही ऐसी घटनाओं ने ग्रामीणों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
ब्रिटेन की महिला के फैसले ने फिर छेड़ी Assisted Dying पर वैश्विक बहस ब्रिटेन की एक महिला ने अपने इकलौते बेटे की मौत के गहरे सदमे से उबर न पाने के बाद स्विट्जरलैंड में Assisted Suicide का रास्ता चुना। इस घटना ने एक बार फिर दुनिया भर में Assisted Dying, कानून और नैतिकता को लेकर बहस तेज कर दी है। बेटे की मौत के बाद टूट गई थी जिंदगी 56 वर्षीय वेंडी डफी अपने इकलौते बेटे मार्कस की मौत के बाद पूरी तरह टूट गई थीं। मार्कस की 23 वर्ष की उम्र में भोजन के दौरान दम घुटने से मौत हो गई थी। इस हादसे ने वेंडी को मानसिक रूप से झकझोर कर रख दिया था। स्विट्जरलैंड के क्लिनिक में कराया Assisted Suicide वेंडी ने स्विट्जरलैंड के बेसल स्थित पेगासोस क्लिनिक में Assisted Suicide कराया। बताया जा रहा है कि इसके लिए उन्होंने लगभग 10 हजार पाउंड खर्च किए। क्लिनिक प्रशासन ने पुष्टि की कि पूरी प्रक्रिया उनकी इच्छा और कानूनी नियमों के तहत पूरी की गई। "मेरा जीवन, मेरा फैसला" मृत्यु से पहले वेंडी ने कहा था, "मैं मरना चाहती हूं। मेरे चेहरे पर मुस्कान होगी। यह मेरी जिंदगी है, मेरा फैसला है।" उनके इस बयान ने Assisted Dying पर चल रही बहस को और तेज कर दिया है। बेटे की टी-शर्ट पहनकर दी अंतिम विदाई वेंडी ने अपनी अंतिम यात्रा के दौरान अपने बेटे की टी-शर्ट पहनने की इच्छा जताई थी। उनका कहना था कि उसमें अभी भी बेटे की खुशबू बाकी है। उन्होंने अपने अंतिम पलों में एक पसंदीदा गीत बजाने की भी इच्छा व्यक्त की थी। ब्रिटेन में छिड़ी नई बहस ब्रिटेन में Assisted Suicide अभी भी अवैध है। ऐसे में वेंडी का स्विट्जरलैंड जाना "सुसाइड टूरिज्म" को लेकर नई बहस खड़ी कर रहा है। कुछ लोग इसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता मान रहे हैं, जबकि कई संगठनों ने इस पर गंभीर नैतिक सवाल उठाए हैं। कानून, नैतिकता और व्यक्तिगत अधिकार पर सवाल वेंडी डफी की कहानी ने यह सवाल फिर खड़ा कर दिया है कि क्या असहनीय मानसिक पीड़ा भी Assisted Dying का आधार हो सकती है। यह मामला दुनिया भर में कानून निर्माताओं और समाज के लिए नई चुनौती बन गया है।
नई दिल्ली: डिजिटल युग में स्मार्टफोन हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है, लेकिन इसका अत्यधिक इस्तेमाल अब मानसिक स्वास्थ्य के लिए खतरा बनता जा रहा है। हाल ही में सामने आए एक अध्ययन में पाया गया है कि स्मार्टफोन की लत युवा छात्रों में चिंता (Anxiety) और अवसाद (Depression) के बढ़ते स्तर से जुड़ी हुई है। करीब 2,000 युवाओं पर किए गए इस शोध में 1,846 विश्वविद्यालय के छात्रों को शामिल किया गया, जिनकी औसत उम्र 19.6 वर्ष थी। अध्ययन में यह स्पष्ट हुआ कि जिन छात्रों में स्मार्टफोन उपयोग की लत अधिक थी, उनमें मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएं भी ज्यादा देखने को मिलीं। कैसे मापी गई स्मार्टफोन की लत? शोधकर्ताओं ने स्मार्टफोन एडिक्शन को मापने के लिए “Smartphone Addiction Scale” का इस्तेमाल किया, साथ ही चिंता और अवसाद के स्तर को आंकने के लिए मान्यता प्राप्त टूल्स का उपयोग किया गया। परिणामों में पाया गया कि जो छात्र बार-बार फोन चेक करते हैं, फोन से अलग नहीं रह पाते हैं और जिनकी दिनचर्या इससे प्रभावित होती है, उनमें चिंता और डिप्रेशन के लक्षण काफी अधिक थे। पढ़ाई पर नहीं पड़ा सीधा असर दिलचस्प बात यह रही कि इस अध्ययन में स्मार्टफोन की लत और शैक्षणिक प्रदर्शन (Academic Performance) के बीच कोई सीधा संबंध नहीं पाया गया। यानी छात्रों के नंबर भले प्रभावित न हों, लेकिन उनकी मानसिक और भावनात्मक स्थिति पर इसका नकारात्मक असर पड़ सकता है। पब्लिक हेल्थ के लिए बढ़ती चिंता विशेषज्ञों का मानना है कि स्मार्टफोन की लत अब एक उभरती हुई सार्वजनिक स्वास्थ्य (Public Health) समस्या बनती जा रही है। युवा वर्ग, जो सबसे ज्यादा डिजिटल रूप से सक्रिय है, इस जोखिम के दायरे में सबसे आगे है। आज के समय में लगभग हर युवा के पास स्मार्टफोन है, ऐसे में यदि इसका मानसिक स्वास्थ्य पर थोड़ा भी नकारात्मक असर पड़ता है, तो यह बड़े स्तर पर गंभीर समस्या बन सकता है। शोध की सीमाएं भी समझना जरूरी हालांकि, शोधकर्ताओं ने यह भी स्पष्ट किया कि यह एक “क्रॉस-सेक्शनल स्टडी” है, इसलिए यह साबित नहीं किया जा सकता कि स्मार्टफोन की लत सीधे तौर पर चिंता और डिप्रेशन का कारण है। इसके पीछे अन्य कारण भी हो सकते हैं।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।