King’s College London और University of Porto के वैज्ञानिकों की नई रिसर्च में यह सामने आया है कि दिमाग में मौजूद Histamine केवल एलर्जी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मानसिक स्वास्थ्य, याददाश्त, भावनाओं और व्यवहार को भी गहराई से प्रभावित कर सकता है। शोधकर्ताओं ने पहली बार ऐसा विस्तृत “Brain Histamine Map” तैयार किया है, जो यह दिखाता है कि जीवन के अलग-अलग चरणों में Histamine से जुड़े जीन दिमाग के विकास, सोचने-समझने की क्षमता और मानसिक बीमारियों से कैसे जुड़े होते हैं। Histamine सिर्फ एलर्जी तक सीमित नहीं आमतौर पर Histamine को एलर्जी से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन वैज्ञानिकों के अनुसार यह दिमाग में एक महत्वपूर्ण न्यूरोमॉड्यूलेटर की तरह काम करता है। यह कई जरूरी कार्यों में भूमिका निभाता है, जैसे: भावनाओं को नियंत्रित करना नींद और जागने का चक्र याददाश्त व्यवहारिक लचीलापन सीखने की क्षमता लाखों डेटा पॉइंट्स का किया गया विश्लेषण इस रिसर्च में वैज्ञानिकों ने कई आधुनिक तकनीकों और डेटा सेट्स का इस्तेमाल किया। अध्ययन में शामिल थे: 49,495 brain cell nuclei का RNA sequencing analysis 24 से 57 वर्ष की उम्र के postmortem brain samples गर्भावस्था के 8 सप्ताह से लेकर 40 वर्ष तक के developmental brain data PET imaging और neurotransmitter receptor mapping इन सभी डेटा को मिलाकर वैज्ञानिकों ने दिमाग में Histamine सिस्टम का विस्तृत अध्ययन किया। मानसिक बीमारियों से मिला सीधा संबंध रिसर्च में पाया गया कि Histamine receptors का संबंध कई मानसिक और न्यूरोलॉजिकल समस्याओं से हो सकता है। वैज्ञानिकों ने Histamine expression patterns को इन स्थितियों से जुड़ा पाया: Attention Deficit Hyperactivity Disorder Major Depressive Disorder Schizophrenia Anorexia Nervosa शोधकर्ताओं के अनुसार दिमाग के frontal और limbic क्षेत्रों में Histamine activity ज्यादा देखी गई, जबकि occipital cortex में इसका स्तर कम पाया गया। उम्र के साथ बदलता है Histamine सिस्टम अध्ययन में यह भी सामने आया कि: Histidine decarboxylase नामक enzyme का स्तर शुरुआती विकास में सबसे ज्यादा था जबकि H3 receptor expression उम्र बढ़ने के साथ adulthood तक बढ़ता गया इससे संकेत मिलता है कि Histamine सिस्टम जीवनभर दिमाग के विकास और कार्यप्रणाली को प्रभावित कर सकता है। भविष्य में नई मानसिक स्वास्थ्य थेरेपी का रास्ता वैज्ञानिकों का मानना है कि यह रिसर्च मानसिक बीमारियों के इलाज में नई संभावनाएं खोल सकती है। यह “Brain Histamine Atlas” भविष्य में: Depression ADHD Schizophrenia Neurodevelopmental disorders के लिए targeted therapies विकसित करने में मदद कर सकता है। हालांकि विशेषज्ञों ने यह भी स्पष्ट किया कि अभी और रिसर्च की जरूरत है, ताकि यह समझा जा सके कि Histamine signaling को नियंत्रित करके मानसिक स्वास्थ्य उपचार को कितना बेहतर बनाया जा सकता है।
कनाडा में की गई एक नई जनसंख्या-आधारित स्टडी में यह सामने आया है कि अपेक्षाकृत कम स्तर का वायु प्रदूषण भी दिमागी सेहत पर नकारात्मक असर डाल सकता है। शोधकर्ताओं के अनुसार, लंबे समय तक फाइन पार्टिकुलेट मैटर (PM2.5) और नाइट्रोजन डाइऑक्साइड (NO₂) के संपर्क में रहने से संज्ञानात्मक क्षमता (cognitive performance) कमजोर हो सकती है और मस्तिष्क में “छुपी हुई” वेस्कुलर क्षति का खतरा बढ़ सकता है। क्या कहती है यह रिसर्च? यह अध्ययन Canadian Alliance for Healthy Hearts and Minds Cohort Study के डेटा पर आधारित है, जिसमें 2014 से 2018 के बीच 5 प्रांतों के 6,878 वयस्कों को शामिल किया गया। प्रतिभागियों की औसत उम्र लगभग 57.6 वर्ष थी, जिनमें 55% से अधिक महिलाएं थीं। शोध में वायु प्रदूषण के 5 साल के औसत एक्सपोजर को मापा गया और उसका असर दिमागी टेस्ट और MRI स्कैन पर देखा गया। प्रदूषण और दिमागी प्रदर्शन के बीच संबंध स्टडी में पाया गया कि: PM2.5 के हर 5 μg/m³ बढ़ने पर MoCA स्कोर में गिरावट देखी गई इसी तरह NO₂ के बढ़ने से भी मानसिक क्षमता परीक्षण के स्कोर कम हुए कार्य-आधारित स्मृति और स्पीड टेस्ट (Digit Symbol Substitution Test) पर भी नकारात्मक असर पाया गया शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि NO₂ के संपर्क से “covert vascular brain injury” यानी छुपी हुई मस्तिष्क रक्तवाहिका क्षति का जोखिम बढ़ सकता है। खास बात: कम प्रदूषण में भी असर यह अध्ययन इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इसमें शामिल क्षेत्रों में प्रदूषण स्तर अपेक्षाकृत कम था। इसके बावजूद दिमागी कार्यक्षमता पर असर देखा गया। इससे संकेत मिलता है कि: केवल अत्यधिक प्रदूषण ही नहीं, बल्कि कम स्तर का लंबे समय का संपर्क भी जोखिम पैदा कर सकता है अन्य फैक्टरों का सीमित असर स्टडी में यह भी देखा गया कि: कार्डियोवैस्कुलर रिस्क फैक्टर और ग्रीन स्पेस (हरियाली) इनका इस संबंध पर कोई बड़ा असर नहीं दिखा। सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए क्या संकेत? शोधकर्ताओं का कहना है कि यह निष्कर्ष इस ओर इशारा करते हैं कि: वायु प्रदूषण केवल फेफड़ों या दिल तक सीमित समस्या नहीं है यह सीधे तौर पर ब्रेन हेल्थ को भी प्रभावित कर सकता है लंबे समय में यह डिमेंशिया और अन्य न्यूरोलॉजिकल समस्याओं का जोखिम बढ़ा सकता है आगे की जरूरत वैज्ञानिकों ने सुझाव दिया है कि: लंबी अवधि के (longitudinal) अध्ययन जरूरी हैं यह समझना जरूरी है कि प्रदूषण कम करने से क्या वास्तव में ब्रेन डिक्लाइन को रोका जा सकता है
सोने से पहले एक छोटा टुकड़ा बन सकता है हेल्दी आदत अगर आपको रात में मीठा खाने की आदत है, तो डार्क चॉकलेट आपके लिए एक बेहतर विकल्प हो सकती है। हाल ही में सामने आई रिपोर्ट्स के अनुसार, सोने से पहले थोड़ी मात्रा में डार्क चॉकलेट खाने से शरीर को रिलैक्स महसूस हो सकता है और नींद की गुणवत्ता बेहतर हो सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि इसमें मौजूद कुछ पोषक तत्व शरीर में मेलाटोनिन और सेरोटोनिन जैसे हार्मोन को सपोर्ट करते हैं, जो बेहतर नींद और मानसिक शांति से जुड़े होते हैं। मेलाटोनिन और रिलैक्सेशन में कैसे करती है मदद? डार्क चॉकलेट में ट्रिप्टोफैन नामक तत्व पाया जाता है, जो शरीर में सेरोटोनिन और मेलाटोनिन के निर्माण में मदद करता है। मेलाटोनिन वह हार्मोन है जो शरीर की स्लीप साइकिल को नियंत्रित करता है। वहीं सेरोटोनिन मूड को बेहतर बनाने और तनाव कम करने में सहायक माना जाता है। इसके अलावा डार्क चॉकलेट में मैग्नीशियम भी भरपूर मात्रा में होता है। यह मिनरल मांसपेशियों को रिलैक्स करने और तनाव कम करने में मदद करता है, जिससे शरीर को आराम महसूस होता है। ब्लड सर्कुलेशन और मूड पर भी असर विशेषज्ञों के मुताबिक, डार्क चॉकलेट में मौजूद फ्लेवोनॉयड्स ब्लड फ्लो को बेहतर बनाने में मदद करते हैं। इससे दिमाग तक ऑक्सीजन की सप्लाई बेहतर होती है और मानसिक शांति महसूस हो सकती है। यही कारण है कि कई लोग रात में थोड़ी मात्रा में डार्क चॉकलेट खाने के बाद अधिक रिलैक्स महसूस करते हैं। क्या रात में चॉकलेट खाने से नींद खराब भी हो सकती है? हालांकि हर व्यक्ति पर इसका असर अलग हो सकता है। डार्क चॉकलेट में थोड़ी मात्रा में कैफीन भी मौजूद होती है। ऐसे में जो लोग कैफीन के प्रति ज्यादा संवेदनशील होते हैं, उन्हें रात में इसे खाने से नींद आने में परेशानी हो सकती है या बेचैनी महसूस हो सकती है। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि अगर आपको कॉफी या कैफीन वाली चीजों से जल्दी असर होता है, तो रात में बहुत ज्यादा डार्क चॉकलेट खाने से बचना चाहिए। वजन बढ़ने का डर कितना सही? पोषण विशेषज्ञों के अनुसार, सीमित मात्रा में डार्क चॉकलेट खाना वजन बढ़ाने का बड़ा कारण नहीं बनता। करीब 10 ग्राम डार्क चॉकलेट में लगभग 60 कैलोरी होती है। अगर इसे संतुलित मात्रा में लिया जाए, तो यह लो-कैलोरी डाइट में भी शामिल की जा सकती है। डार्क या मिल्क चॉकलेट, कौन बेहतर? डॉक्टर और न्यूट्रिशनिस्ट आमतौर पर 65-70 प्रतिशत या उससे ज्यादा कोको वाली डार्क चॉकलेट को बेहतर मानते हैं, क्योंकि इसमें चीनी कम और एंटीऑक्सीडेंट ज्यादा होते हैं। हालांकि इसमें कैफीन की मात्रा मिल्क चॉकलेट से थोड़ी अधिक होती है। अगर आपको कैफीन से दिक्कत नहीं होती, तो डार्क चॉकलेट बेहतर विकल्प मानी जाती है। वहीं कैफीन से संवेदनशील लोग कम मात्रा में मिल्क चॉकलेट चुन सकते हैं।
आज मनाई जा रही है अपरा एकादशी आज 13 मई 2026 को अपरा एकादशी का पावन व्रत रखा जा रहा है। हिंदू धर्म में यह एकादशी भगवान Vishnu को समर्पित मानी जाती है। इसे अचला एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन श्रद्धा और विधि-विधान से भगवान विष्णु की पूजा करने से व्यक्ति को अपार पुण्य, सुख-समृद्धि और मानसिक शांति प्राप्त होती है। कहा जाता है कि अपरा एकादशी का व्रत करने से अनजाने में हुए पापों से मुक्ति मिलती है और मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग खुलता है। पहली बार व्रत रखने वालों के लिए पूजा विधि, नियम और सावधानियों की जानकारी बेहद जरूरी मानी जाती है। अपरा एकादशी 2026: शुभ मुहूर्त और पारण समय एकादशी तिथि प्रारंभ: 12 मई 2026, दोपहर 2:52 बजे एकादशी तिथि समाप्त: 13 मई 2026, दोपहर 1:29 बजे व्रत पारण समय: 14 मई 2026, सुबह 5:31 बजे से 8:14 बजे तक उदयातिथि के अनुसार आज यानी 13 मई को व्रत रखा जा रहा है। इस बार अपरा एकादशी पर सर्वार्थसिद्धि योग का भी शुभ संयोग बन रहा है, जिससे इस दिन का धार्मिक महत्व और बढ़ गया है। भगवान विष्णु को प्रिय हैं ये रंग और भोग धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान विष्णु को पीला रंग अत्यंत प्रिय माना जाता है। इसलिए अपरा एकादशी के दिन पीले वस्त्र पहनना और पीली वस्तुएं अर्पित करना शुभ माना जाता है। प्रिय फूल पीले गेंदे के फूल कमल पीले गुलाब प्रिय भोग पीले फल केसरिया भात पीले रंग की मिठाइयां भोग में तुलसी दल अवश्य शामिल करना चाहिए, क्योंकि बिना तुलसी के भगवान विष्णु का भोग अधूरा माना जाता है। अपरा एकादशी पूजा विधि सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और व्रत का संकल्प लें। इसके बाद भगवान विष्णु की प्रतिमा या तस्वीर को पीले वस्त्र पर स्थापित करें। फिर पंचामृत से भगवान का अभिषेक करें। पूजा में पीले फूल, पीला चंदन और पीले वस्त्र अर्पित करें। दीपक और धूप जलाकर फल और मिठाई का भोग लगाएं। पूजा के दौरान विष्णु मंत्रों का जाप करें और बाद में विष्णु चालीसा व व्रत कथा का पाठ करें। अंत में आरती करके पूजा संपन्न करें। भगवान विष्णु के प्रमुख मंत्र ॐ नमो भगवते वासुदेवाय॥ कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने। प्रणत क्लेशनाशाय गोविन्दाय नमो नमः॥ नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि। तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्॥ अपरा एकादशी पर इन बातों का रखें विशेष ध्यान चावल खाना माना जाता है वर्जित एकादशी के दिन चावल का सेवन नहीं करना चाहिए। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन चावल खाना अशुभ माना गया है। सात्विक भोजन करें घर में प्याज, लहसुन, मांस और मदिरा का प्रयोग नहीं करना चाहिए। व्रत में सेंधा नमक का ही उपयोग करें। तुलसी दल न तोड़ें एकादशी के दिन तुलसी के पत्ते तोड़ना वर्जित माना जाता है। पूजा के लिए तुलसी दल दशमी तिथि को ही तोड़कर रख लेना चाहिए। क्रोध और विवाद से बचें इस दिन शांत मन से भगवान विष्णु का ध्यान करें। किसी की निंदा या अपशब्द बोलने से बचना चाहिए। दिन में न सोएं धार्मिक मान्यता है कि एकादशी पर दिन में सोने से व्रत का पूर्ण फल नहीं मिलता। इस समय को भजन-कीर्तन और धार्मिक पाठ में लगाना शुभ माना गया है।
बदल रही है नौकरी और सफलता की परिभाषा एक समय था जब प्रमोशन को करियर की सबसे बड़ी उपलब्धि माना जाता था। ऊंचा पद, ज्यादा वेतन और जिम्मेदारी सफलता की पहचान समझे जाते थे। लेकिन अब हालात तेजी से बदल रहे हैं। बढ़ते तनाव, डिजिटल दबाव और बिगड़ते वर्क-लाइफ बैलेंस के बीच कई कर्मचारी प्रमोशन लेने से भी बचने लगे हैं। आज बड़ी संख्या में प्रोफेशनल्स यह सोचने लगे हैं कि क्या ज्यादा पद और सैलरी वास्तव में मानसिक शांति और निजी जिंदगी की कीमत पर सही है। कर्मचारियों की संतुष्टि में आई बड़ी गिरावट Gallup की State of the Global Workplace 2026 रिपोर्ट के मुताबिक 2025 में वैश्विक कर्मचारी जुड़ाव (Employee Engagement) घटकर सिर्फ 20 प्रतिशत रह गया। यह 2020 के बाद सबसे निचला स्तर बताया गया है। रिपोर्ट के अनुसार कर्मचारियों में बढ़ती थकान और असंतोष के कारण वैश्विक अर्थव्यवस्था को लगभग 10 ट्रिलियन डॉलर की उत्पादकता का नुकसान हुआ। प्रमोशन अब इनाम नहीं, बोझ जैसा क्यों लग रहा? विशेषज्ञों का मानना है कि महामारी के बाद कर्मचारियों की प्राथमिकताएं बदल गई हैं। अब लोग केवल पद और वेतन नहीं, बल्कि मानसिक शांति, लचीलापन और निजी समय को ज्यादा महत्व दे रहे हैं। Instahyre के को-फाउंडर सरबोजित मलिक के मुताबिक आज के कर्मचारी काम में अर्थ, स्वतंत्रता और संतुलन चाहते हैं। उनका कहना है कि प्रमोशन की खुशी कुछ समय के लिए रहती है, लेकिन उसके साथ आने वाला तनाव लंबे समय तक बना रहता है। डिजिटल वर्क कल्चर ने बढ़ाया दबाव वर्क फ्रॉम होम और डिजिटल कार्य संस्कृति के बाद कर्मचारियों पर “हमेशा उपलब्ध रहने” का दबाव काफी बढ़ गया है। सीनियर पदों पर देर रात कॉल, लगातार ईमेल और निजी जीवन में काम का दखल आम हो गया है। Biz Staffing Comrade Pvt Ltd के मैनेजिंग पार्टनर पुनीत अरोड़ा के अनुसार आज प्रमोशन का मतलब कई लोगों के लिए ज्यादा काम और कम निजी समय बन गया है। उन्होंने बताया कि कई कर्मचारी अब मानसिक स्वास्थ्य और परिवार के समय को प्राथमिकता देते हुए नेतृत्व वाली भूमिकाएं तक ठुकरा रहे हैं। कंपनियों को बदलनी होगी सोच? विशेषज्ञों का मानना है कि कंपनियों को करियर ग्रोथ की पारंपरिक सोच बदलनी होगी। केवल लंबे घंटे काम करने और लगातार उपलब्ध रहने को सफलता मानना अब कर्मचारियों को स्वीकार नहीं है। अब कर्मचारी ऐसे प्रमोशन चाहते हैं जिनमें– बेहतर वर्क-लाइफ बैलेंस मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान लचीलापन सपोर्टिव कार्य संस्कृति वास्तविक नेतृत्व स्वतंत्रता जैसी सुविधाएं भी शामिल हों। भविष्य में कैसी होगी करियर ग्रोथ? कॉर्पोरेट दुनिया में अब सफलता की परिभाषा बदल रही है। कर्मचारी अब सिर्फ बड़ी सैलरी नहीं, बल्कि बेहतर जीवन गुणवत्ता भी चाहते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले समय में वही कंपनियां सफल होंगी जो कर्मचारियों को केवल पद नहीं, बल्कि संतुलित और स्वस्थ कार्य वातावरण भी देंगी। अब सवाल यह नहीं रह गया कि लोग आगे बढ़ना चाहते हैं या नहीं, बल्कि यह है कि क्या करियर ग्रोथ बिना थकान और मानसिक दबाव के संभव है।
भारतीय कर्मचारियों की तारीफ या ‘टॉक्सिक वर्क कल्चर’ का समर्थन? Burj Khalifa के डेवलपर और Emaar Properties के संस्थापक Mohamed Alabbar के एक बयान ने सोशल मीडिया पर नई बहस छेड़ दी है। उन्होंने कहा कि उन्हें भारतीय कर्मचारियों को नौकरी पर रखना पसंद है क्योंकि वे “रात 1 बजे भी फोन उठाते हैं” और उनका वर्क एथिक दुनिया में सबसे मजबूत है। यह टिप्पणी उन्होंने “Make It in the Emirates” समिट के दौरान की। अलब्बार ने कहा कि सफलता सिर्फ बुद्धिमानी से नहीं, बल्कि लगातार मेहनत, अनुशासन और जिम्मेदारी निभाने की आदत से मिलती है। उनके मुताबिक भारतीय प्रोफेशनल्स कठिन परिस्थितियों में भी काम के प्रति समर्पित रहते हैं और यही बात उन्हें अलग बनाती है। “हार्ड वर्क ही असली ताकत” अपने संबोधन में अलब्बार ने कहा कि किसी भी कंपनी की असली मजबूती उसके कर्मचारियों की मेहनत और संकट के समय उनकी प्रतिबद्धता से तय होती है। उन्होंने 2008 की आर्थिक मंदी और कोविड-19 महामारी का जिक्र करते हुए कहा कि वही कंपनियां टिक पाईं जिनकी टीमें मुश्किल हालात में भी काम करती रहीं। उन्होंने यह भी बताया कि संकट के समय उनकी कंपनी ने कर्मचारियों की नौकरी और सैलरी सुरक्षित रखने की कोशिश की थी, ताकि टीम का भरोसा बना रहे। सोशल मीडिया पर मिला मिला-जुला रिएक्शन हालांकि अलब्बार की टिप्पणी को कुछ लोगों ने भारतीय कर्मचारियों की मेहनत की सराहना माना, लेकिन सोशल मीडिया पर कई यूजर्स ने इसे “अनहेल्दी वर्क कल्चर” को बढ़ावा देने वाला बयान बताया। Reddit और X जैसे प्लेटफॉर्म पर यूजर्स ने कहा कि देर रात तक उपलब्ध रहना समर्पण नहीं बल्कि नौकरी का दबाव और असुरक्षा दिखाता है। कई लोगों ने लिखा कि भारतीय प्रोफेशनल्स को लंबे समय से “ओवरडिलीवर” करने के लिए तैयार किया जाता रहा है, जिससे निजी जीवन और मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित होता है। कुछ यूजर्स ने यह चिंता भी जताई कि विदेशी कंपनियां भारतीय कर्मचारियों से हर समय उपलब्ध रहने की उम्मीद करने लगी हैं, जिससे ओवरवर्क की समस्या और बढ़ सकती है। वर्क-लाइफ बैलेंस पर फिर शुरू हुई चर्चा भारत के आईटी, कंसल्टिंग और सर्विस सेक्टर के कर्मचारी दुनियाभर में अपनी मेहनत और मल्टीपल टाइम जोन में काम करने की क्षमता के लिए जाने जाते हैं। लेकिन HR एक्सपर्ट्स का मानना है कि लगातार उपलब्ध रहने की संस्कृति लंबे समय में बर्नआउट, तनाव और कर्मचारियों के नौकरी छोड़ने की दर बढ़ा सकती है। दुनिया के कई देशों में अब “Right to Disconnect” जैसे नियम लागू किए जा रहे हैं, जिनका मकसद कर्मचारियों को ऑफिस समय के बाद काम से अलग रहने का अधिकार देना है। भारत में अभी ऐसा कोई व्यापक कानून नहीं है, लेकिन नई पीढ़ी के कर्मचारी अब वर्क-लाइफ बैलेंस और मानसिक स्वास्थ्य को ज्यादा महत्व देने लगे हैं। बड़ा सवाल: मेहनत या सीमाओं की जरूरत? अलब्बार के बयान ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है–क्या भारतीय प्रोफेशनल्स को हमेशा “हर समय उपलब्ध” रहने वाली अपनी छवि बनाए रखनी चाहिए, या अब काम और निजी जीवन के बीच स्पष्ट सीमाएं तय करने का समय आ गया है?
मानसिक स्वास्थ्य उपचार के क्षेत्र में उभर रही साइकेडेलिक थेरेपी को लेकर मीडिया कवरेज पर एक नई रिसर्च ने महत्वपूर्ण सवाल खड़े किए हैं। Natural Language Processing के जरिए किए गए इस विश्लेषण में पाया गया कि 2017 से 2024 के बीच साइकेडेलिक उपचारों को पारंपरिक दवाओं की तुलना में अधिक सकारात्मक तरीके से प्रस्तुत किया गया। साइकेडेलिक थेरेपी को मिला ज्यादा सकारात्मक कवरेज अध्ययन में 6,805 मीडिया पब्लिकेशंस का विश्लेषण किया गया, जिसमें पाया गया कि डिप्रेशन और Post-Traumatic Stress Disorder जैसे मानसिक रोगों के इलाज में उपयोग होने वाली साइकेडेलिक थेरेपी को अधिक सकारात्मक भावनाओं और भाषा के साथ जोड़ा गया। इसके विपरीत, FDA-स्वीकृत एंटीडिप्रेसेंट दवाओं को अक्सर जोखिम, साइड इफेक्ट्स और नकारात्मक पहलुओं के संदर्भ में दिखाया गया। इससे यह संकेत मिलता है कि पारंपरिक उपचारों को अपेक्षाकृत अधिक आलोचनात्मक नजर से प्रस्तुत किया जा रहा है। क्या पूरी तरह सकारात्मक है कवरेज? हालांकि स्टडी में यह भी सामने आया कि साइकेडेलिक उपचारों की कवरेज पूरी तरह एकतरफा नहीं है। कुछ रिपोर्ट्स में इनके जोखिम और नकारात्मक पहलुओं को भी उजागर किया गया। वहीं, पारंपरिक एंटीडिप्रेसेंट्स को ‘रिवॉर्ड’ यानी लाभ से जुड़े संदर्भों में भी दिखाया गया। मरीजों की सोच पर पड़ सकता है असर विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की असंतुलित मीडिया कवरेज मरीजों की सोच और फैसलों को प्रभावित कर सकती है। अगर किसी नए उपचार को अधिक सकारात्मक और पुराने उपचार को अधिक नकारात्मक रूप में दिखाया जाता है, तो मरीज पारंपरिक दवाओं से दूरी बना सकते हैं या नए विकल्पों से अवास्तविक उम्मीदें रख सकते हैं। डॉक्टरों के लिए बढ़ी जिम्मेदारी इस स्थिति में स्वास्थ्य विशेषज्ञों के लिए यह जरूरी हो जाता है कि वे मरीजों को संतुलित और साक्ष्य-आधारित जानकारी दें। इससे मरीज सही निर्णय ले सकेंगे और उपचार प्रक्रिया पर भरोसा बना रहेगा। संतुलित रिपोर्टिंग की जरूरत यह अध्ययन इस बात पर जोर देता है कि मानसिक स्वास्थ्य जैसे संवेदनशील विषयों पर मीडिया की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। जैसे-जैसे साइकेडेलिक थेरेपी पर रिसर्च आगे बढ़ेगी, वैसे-वैसे संतुलित और तथ्य-आधारित रिपोर्टिंग जरूरी होगी ताकि आम लोगों को सही और पूरी जानकारी मिल सके।
हाल ही में प्रकाशित एक महत्वपूर्ण अध्ययन में यह सामने आया है कि लाइफस्टाइल फैक्टर्स का असर सिर्फ शारीरिक स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रोस्टेट कैंसर से जूझ रहे पुरुषों के मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य पर भी गहरा प्रभाव डालता है। इस रिसर्च में पाया गया कि रोजमर्रा की आदतें—जैसे व्यायाम, धूम्रपान और बॉडी वेट—सीधे तौर पर मरीजों की सोचने-समझने की क्षमता और मानसिक स्थिति को प्रभावित करती हैं। एक्सरसाइज से बेहतर हुआ दिमाग और मूड अध्ययन के अनुसार, जो मरीज नियमित रूप से शारीरिक गतिविधियों में शामिल रहे, उनकी कॉग्निटिव परफॉर्मेंस (सोचने और समझने की क्षमता) और भावनात्मक स्थिति बेहतर पाई गई। शोध में यह संबंध सांख्यिकीय रूप से महत्वपूर्ण (p<0.05) पाया गया, जिससे स्पष्ट होता है कि एक्सरसाइज न केवल शरीर बल्कि दिमाग को भी मजबूत बनाती है। स्मोकिंग और ज्यादा वजन बना खतरा इसके विपरीत, धूम्रपान करने वाले मरीजों में कॉग्निटिव स्कोर और मानसिक स्वास्थ्य दोनों ही कमजोर पाए गए। इसी तरह, जिन लोगों का BMI (बॉडी मास इंडेक्स) ज्यादा था, उनमें भी सोचने-समझने की क्षमता और भावनात्मक स्थिरता कम देखी गई। यह संकेत देता है कि खराब लाइफस्टाइल आदतें मानसिक गिरावट का कारण बन सकती हैं। हेल्दी लाइफस्टाइल से मिल सकता है फायदा रिसर्च में यह भी पाया गया कि जिन मरीजों की जीवनशैली संतुलित और स्वस्थ थी, उनके मानसिक और भावनात्मक स्कोर बेहतर थे। यह पैटर्न सभी परीक्षणों में लगातार देखने को मिला, जिससे यह स्पष्ट होता है कि लाइफस्टाइल में बदलाव कर मरीज अपनी स्थिति में सुधार ला सकते हैं। इलाज में बदलाव की जरूरत विशेषज्ञों का कहना है कि प्रोस्टेट कैंसर के मरीजों में मानसिक समस्याएं अक्सर नजरअंदाज कर दी जाती हैं। इस अध्ययन के नतीजे बताते हैं कि इलाज के दौरान लाइफस्टाइल सुधार—जैसे नियमित व्यायाम और वजन नियंत्रण—को भी प्राथमिकता देनी चाहिए। हालांकि, शोधकर्ताओं ने यह भी स्पष्ट किया है कि इन निष्कर्षों से सीधे कारण-परिणाम संबंध साबित नहीं होता, लेकिन इनके बीच मजबूत संबंध जरूर है। आगे की रिसर्च जरूरी अध्ययन के आधार पर विशेषज्ञों ने सुझाव दिया है कि भविष्य में और विस्तृत शोध किए जाने चाहिए, ताकि यह समझा जा सके कि किस तरह के लाइफस्टाइल बदलाव से मरीजों के मानसिक स्वास्थ्य में सबसे ज्यादा सुधार संभव है।
एक नई अंतरराष्ट्रीय स्टडी में यह सामने आया है कि डिप्रेशन और शारीरिक निष्क्रियता मिलकर बुजुर्गों में कई गंभीर बीमारियों के खतरे को तेजी से बढ़ा रहे हैं। खासतौर पर कार्डियोमेटाबोलिक मल्टीमॉर्बिडिटी–जिसमें डायबिटीज, हार्ट डिजीज और स्ट्रोक जैसी बीमारियां शामिल हैं–का जोखिम काफी बढ़ जाता है। 9 साल की स्टडी में चौंकाने वाले आंकड़े चीन में की गई इस लॉन्ग-टर्म स्टडी में 45 वर्ष या उससे अधिक उम्र के 2,661 लोगों को करीब 9 साल तक फॉलो किया गया। शुरुआत में सभी प्रतिभागी इन बीमारियों से मुक्त थे, लेकिन अध्ययन के दौरान 797 लोगों में कार्डियोमेटाबोलिक मल्टीमॉर्बिडिटी विकसित हो गई। डिप्रेशन और एक्सरसाइज की कमी का डबल असर स्टडी के मुताबिक, जिन लोगों को डिप्रेशन था और जो बिल्कुल भी तीव्र शारीरिक गतिविधि (VPA) नहीं करते थे, उनमें इस तरह की बीमारियों का खतरा सबसे ज्यादा पाया गया। यह भी सामने आया कि: डिप्रेशन वाले लेकिन एक्टिव लोग भी जोखिम में रहे बिना डिप्रेशन लेकिन निष्क्रिय लोग भी खतरे से बाहर नहीं थे यानी मानसिक स्वास्थ्य और फिजिकल एक्टिविटी–दोनों ही अलग-अलग तरीके से जोखिम बढ़ाते हैं। एक्सरसाइज से मिल सकती है आंशिक राहत अध्ययन में यह भी पाया गया कि नियमित शारीरिक गतिविधि, खासकर तेज एक्सरसाइज, इस जोखिम को कुछ हद तक कम कर सकती है। हालांकि यह पूरी तरह से खतरे को खत्म नहीं करती, लेकिन निष्क्रिय लोगों की तुलना में एक्टिव लोगों की स्थिति बेहतर पाई गई। क्यों है यह चिंता का विषय? विशेषज्ञों के अनुसार, कार्डियोमेटाबोलिक मल्टीमॉर्बिडिटी एक बार हो जाए तो इसे मैनेज करना बेहद मुश्किल होता है। ऐसे में शुरुआती स्तर पर ही डिप्रेशन और लाइफस्टाइल पर ध्यान देना जरूरी है। रोकथाम के लिए क्या करें? स्टडी का सबसे बड़ा संदेश यही है कि: मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान देना उतना ही जरूरी है जितना शारीरिक स्वास्थ्य नियमित व्यायाम को दिनचर्या का हिस्सा बनाना चाहिए उम्र बढ़ने के साथ हेल्थ चेकअप और एक्टिव लाइफस्टाइल अपनाना बेहद जरूरी है
सरायकेला। झारखंड के सरायकेला जिले से एक दर्दनाक घटना सामने आई है, जहां जंगली हाथियों के झुंड ने एक परिवार पर हमला कर दो लोगों की जान ले ली। यह घटना ईचागढ़ थाना क्षेत्र के हाड़ात गांव की है, जहां देर रात हाथियों का झुंड अचानक गांव में घुस आया। घर तोड़ा, परिवार को बनाया निशाना जानकारी के अनुसार, हाथियों ने कई घरों को नुकसान पहुंचाया और एक मकान को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया। इसी दौरान घर के अंदर सो रहे परिवार के पांच सदस्य हाथियों की चपेट में आ गए। अचानक हुए हमले से गांव में चीख-पुकार मच गई, लेकिन हाथियों के उग्र रूप के कारण ग्रामीण कुछ कर नहीं सके। मां-बेटी की मौके पर मौत हमले में चाइना देवी और उनकी 13 वर्षीय बेटी अमिता बाला की मौके पर ही मौत हो गई। वहीं परिवार के अन्य सदस्य—मोहन महतो और सतुला देवी—गंभीर रूप से घायल हो गए। घायलों को इलाज के लिए जमशेदपुर के अस्पताल में भर्ती कराया गया है, जहां उनकी हालत चिंताजनक बताई जा रही है। गांव में दहशत, प्रशासन से नाराजगी घटना के बाद पूरे इलाके में दहशत का माहौल है। ग्रामीणों ने वन विभाग की लापरवाही पर नाराजगी जताई है और समय पर कार्रवाई नहीं होने का आरोप लगाया है। सूचना मिलने पर वन विभाग की टीम मौके पर पहुंचकर जांच में जुट गई है। मुआवजे और सुरक्षा की मांग स्थानीय लोगों और जनप्रतिनिधियों ने सरकार से मृतकों के परिजनों को मुआवजा देने और क्षेत्र में हाथियों के प्रवेश को रोकने के लिए ठोस कदम उठाने की मांग की है। लगातार बढ़ रही ऐसी घटनाओं ने ग्रामीणों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
ब्रिटेन की महिला के फैसले ने फिर छेड़ी Assisted Dying पर वैश्विक बहस ब्रिटेन की एक महिला ने अपने इकलौते बेटे की मौत के गहरे सदमे से उबर न पाने के बाद स्विट्जरलैंड में Assisted Suicide का रास्ता चुना। इस घटना ने एक बार फिर दुनिया भर में Assisted Dying, कानून और नैतिकता को लेकर बहस तेज कर दी है। बेटे की मौत के बाद टूट गई थी जिंदगी 56 वर्षीय वेंडी डफी अपने इकलौते बेटे मार्कस की मौत के बाद पूरी तरह टूट गई थीं। मार्कस की 23 वर्ष की उम्र में भोजन के दौरान दम घुटने से मौत हो गई थी। इस हादसे ने वेंडी को मानसिक रूप से झकझोर कर रख दिया था। स्विट्जरलैंड के क्लिनिक में कराया Assisted Suicide वेंडी ने स्विट्जरलैंड के बेसल स्थित पेगासोस क्लिनिक में Assisted Suicide कराया। बताया जा रहा है कि इसके लिए उन्होंने लगभग 10 हजार पाउंड खर्च किए। क्लिनिक प्रशासन ने पुष्टि की कि पूरी प्रक्रिया उनकी इच्छा और कानूनी नियमों के तहत पूरी की गई। "मेरा जीवन, मेरा फैसला" मृत्यु से पहले वेंडी ने कहा था, "मैं मरना चाहती हूं। मेरे चेहरे पर मुस्कान होगी। यह मेरी जिंदगी है, मेरा फैसला है।" उनके इस बयान ने Assisted Dying पर चल रही बहस को और तेज कर दिया है। बेटे की टी-शर्ट पहनकर दी अंतिम विदाई वेंडी ने अपनी अंतिम यात्रा के दौरान अपने बेटे की टी-शर्ट पहनने की इच्छा जताई थी। उनका कहना था कि उसमें अभी भी बेटे की खुशबू बाकी है। उन्होंने अपने अंतिम पलों में एक पसंदीदा गीत बजाने की भी इच्छा व्यक्त की थी। ब्रिटेन में छिड़ी नई बहस ब्रिटेन में Assisted Suicide अभी भी अवैध है। ऐसे में वेंडी का स्विट्जरलैंड जाना "सुसाइड टूरिज्म" को लेकर नई बहस खड़ी कर रहा है। कुछ लोग इसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता मान रहे हैं, जबकि कई संगठनों ने इस पर गंभीर नैतिक सवाल उठाए हैं। कानून, नैतिकता और व्यक्तिगत अधिकार पर सवाल वेंडी डफी की कहानी ने यह सवाल फिर खड़ा कर दिया है कि क्या असहनीय मानसिक पीड़ा भी Assisted Dying का आधार हो सकती है। यह मामला दुनिया भर में कानून निर्माताओं और समाज के लिए नई चुनौती बन गया है।
नई दिल्ली: डिजिटल युग में स्मार्टफोन हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है, लेकिन इसका अत्यधिक इस्तेमाल अब मानसिक स्वास्थ्य के लिए खतरा बनता जा रहा है। हाल ही में सामने आए एक अध्ययन में पाया गया है कि स्मार्टफोन की लत युवा छात्रों में चिंता (Anxiety) और अवसाद (Depression) के बढ़ते स्तर से जुड़ी हुई है। करीब 2,000 युवाओं पर किए गए इस शोध में 1,846 विश्वविद्यालय के छात्रों को शामिल किया गया, जिनकी औसत उम्र 19.6 वर्ष थी। अध्ययन में यह स्पष्ट हुआ कि जिन छात्रों में स्मार्टफोन उपयोग की लत अधिक थी, उनमें मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएं भी ज्यादा देखने को मिलीं। कैसे मापी गई स्मार्टफोन की लत? शोधकर्ताओं ने स्मार्टफोन एडिक्शन को मापने के लिए “Smartphone Addiction Scale” का इस्तेमाल किया, साथ ही चिंता और अवसाद के स्तर को आंकने के लिए मान्यता प्राप्त टूल्स का उपयोग किया गया। परिणामों में पाया गया कि जो छात्र बार-बार फोन चेक करते हैं, फोन से अलग नहीं रह पाते हैं और जिनकी दिनचर्या इससे प्रभावित होती है, उनमें चिंता और डिप्रेशन के लक्षण काफी अधिक थे। पढ़ाई पर नहीं पड़ा सीधा असर दिलचस्प बात यह रही कि इस अध्ययन में स्मार्टफोन की लत और शैक्षणिक प्रदर्शन (Academic Performance) के बीच कोई सीधा संबंध नहीं पाया गया। यानी छात्रों के नंबर भले प्रभावित न हों, लेकिन उनकी मानसिक और भावनात्मक स्थिति पर इसका नकारात्मक असर पड़ सकता है। पब्लिक हेल्थ के लिए बढ़ती चिंता विशेषज्ञों का मानना है कि स्मार्टफोन की लत अब एक उभरती हुई सार्वजनिक स्वास्थ्य (Public Health) समस्या बनती जा रही है। युवा वर्ग, जो सबसे ज्यादा डिजिटल रूप से सक्रिय है, इस जोखिम के दायरे में सबसे आगे है। आज के समय में लगभग हर युवा के पास स्मार्टफोन है, ऐसे में यदि इसका मानसिक स्वास्थ्य पर थोड़ा भी नकारात्मक असर पड़ता है, तो यह बड़े स्तर पर गंभीर समस्या बन सकता है। शोध की सीमाएं भी समझना जरूरी हालांकि, शोधकर्ताओं ने यह भी स्पष्ट किया कि यह एक “क्रॉस-सेक्शनल स्टडी” है, इसलिए यह साबित नहीं किया जा सकता कि स्मार्टफोन की लत सीधे तौर पर चिंता और डिप्रेशन का कारण है। इसके पीछे अन्य कारण भी हो सकते हैं।
आज की तेज रफ्तार जिंदगी में तनाव लगभग हर व्यक्ति की दिनचर्या का हिस्सा बन गया है। लंबे समय तक घर से काम करना, लगातार स्क्रीन के सामने बैठना और भागदौड़ भरी जीवनशैली हमारे शरीर और दिमाग दोनों पर दबाव डालती है। ऐसे में कई लोग तनाव से राहत पाने के लिए महंगे स्पा या थेरेपी का सहारा लेते हैं। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि कुछ सरल योगासन नियमित रूप से करने से भी शरीर और मन को वही सुकून मिल सकता है, जो एक महंगे स्पा से मिलता है। योग न केवल मानसिक तनाव को कम करता है बल्कि शरीर की मांसपेशियों में जमी थकान को भी दूर करता है। तनाव और चिंता कम करने में योग कैसे मदद करता है? योग एक प्राचीन अभ्यास है जो शरीर, मन और सांस के बीच संतुलन स्थापित करता है। जब हम योग करते हैं तो शरीर में कॉर्टिसोल (तनाव बढ़ाने वाला हार्मोन) का स्तर कम होने लगता है। इससे मन शांत होता है और मानसिक स्पष्टता बढ़ती है। इसके अलावा योगासन करने से शरीर की मांसपेशियों में जकड़न कम होती है, रक्त संचार बेहतर होता है और नींद की गुणवत्ता भी सुधरती है। यही कारण है कि नियमित योग अभ्यास तनाव प्रबंधन के लिए बेहद प्रभावी माना जाता है। नीचे दिए गए 5 सरल योगासन घर पर ही किए जा सकते हैं, जो तनाव और चिंता को कम करने में मददगार साबित हो सकते हैं। 1. बालासन (Child Pose) बालासन एक बेहद आरामदायक योग मुद्रा है, जो मन को तुरंत शांत करने में मदद करती है। कैसे करें: घुटनों के बल बैठ जाएं। शरीर को आगे की ओर झुकाते हुए माथा जमीन पर टिकाएं। दोनों हाथों को आगे की ओर फैला दें या शरीर के पास रखें। गहरी सांस लेते हुए 30–60 सेकंड तक इसी मुद्रा में रहें। फायदा: यह आसन पीठ, कंधों और गर्दन की थकान दूर करता है और मानसिक तनाव कम करता है। 2. मार्जरी-बीटलासन (Cat–Cow Pose) यह आसन रीढ़ की हड्डी को लचीला बनाता है और शरीर में जमा तनाव को कम करता है। कैसे करें: हाथ और घुटनों के बल टेबल पोज़िशन में आ जाएं। सांस लेते हुए पीठ को नीचे की ओर झुकाएं और सिर ऊपर उठाएं (काउ पोज़)। सांस छोड़ते हुए पीठ को गोल करें और ठुड्डी को छाती की ओर लाएं (कैट पोज़)। इसे 10–12 बार दोहराएं। फायदा: यह आसन रीढ़ को आराम देता है और लंबे समय तक बैठने से होने वाले तनाव को कम करता है। 3. उत्तानासन (Standing Forward Bend) यह आसन पूरे शरीर को स्ट्रेच करता है और दिमाग को शांत करता है। कैसे करें: सीधे खड़े हों और धीरे-धीरे आगे की ओर झुकें। हाथों को पैरों या जमीन के पास रखें। सिर को ढीला छोड़ दें और गहरी सांस लें। फायदा: इससे मस्तिष्क में रक्त संचार बढ़ता है और मानसिक तनाव कम होता है। 4. विपरीत करनी (Legs Up The Wall Pose) दिनभर की थकान और तनाव दूर करने के लिए यह बेहद सरल और प्रभावी आसन है। कैसे करें: दीवार के पास पीठ के बल लेट जाएं। दोनों पैरों को दीवार के सहारे ऊपर की ओर सीधा रखें। हाथों को आराम से बगल में रखें और गहरी सांस लें। 5–10 मिनट तक इसी स्थिति में रहें। फायदा: यह आसन शरीर को गहरा आराम देता है और दिमाग को शांत करता है। 5. शवासन (Corpse Pose) योग सत्र के अंत में किया जाने वाला यह आसन पूर्ण विश्राम के लिए जाना जाता है। कैसे करें: पीठ के बल सीधे लेट जाएं। हाथ और पैरों को हल्का फैला लें। आंखें बंद करके सांसों पर ध्यान दें। फायदा: यह आसन शरीर और मन को पूरी तरह रिलैक्स करता है और तनाव व चिंता को कम करता है। योग करते समय रखें ये छोटी-छोटी बातें शांत वातावरण में योग करें। हल्का संगीत या सुगंधित मोमबत्ती माहौल को और सुकूनभरा बना सकती है। हर आसन करते समय गहरी और धीमी सांस लें। नियमित अभ्यास से ही इसका पूरा लाभ मिलता है।
नियमित व्यायाम न केवल शरीर को फिट रखता है बल्कि दिमाग को भी तेज बनाने में अहम भूमिका निभाता है। हाल ही में हुई एक नई रिसर्च में सामने आया है कि जैसे-जैसे व्यक्ति की फिटनेस लेवल बढ़ती है, वैसे-वैसे एक्सरसाइज के बाद दिमाग को फायदा पहुंचाने वाले प्रोटीन का स्राव भी अधिक होता है। यह अध्ययन University College London के शोधकर्ताओं के नेतृत्व में किया गया और इसे प्रतिष्ठित जर्नल Brain Research में प्रकाशित किया गया है। फिटनेस बढ़ने से दिमाग को ज्यादा फायदा रिसर्च में शुरुआत में शारीरिक रूप से कम सक्रिय लोगों को शामिल किया गया। इन प्रतिभागियों को 12 सप्ताह तक सप्ताह में तीन बार साइकिलिंग करने का प्रशिक्षण दिया गया। अध्ययन के दौरान पाया गया कि जैसे-जैसे उनकी फिटनेस में सुधार हुआ, वैसे-वैसे एक्सरसाइज के बाद उनके शरीर में Brain‑Derived Neurotrophic Factor (BDNF) नामक प्रोटीन का स्तर भी बढ़ने लगा। यह प्रोटीन दिमाग की कार्यक्षमता को बेहतर बनाने में अहम भूमिका निभाता है। सिर्फ 15 मिनट की एक्सरसाइज भी है असरदार शोधकर्ताओं के अनुसार मध्यम से तेज गति वाली एरोबिक एक्सरसाइज के केवल 15 मिनट भी शरीर में BDNF रिलीज करने के लिए पर्याप्त होते हैं। BDNF दिमाग में नए न्यूरॉन (तंत्रिका कोशिकाएं) और नए सिनैप्स यानी कोशिकाओं के बीच कनेक्शन बनाने में मदद करता है। साथ ही यह पहले से मौजूद न्यूरॉन्स को स्वस्थ बनाए रखने में भी सहायक होता है। 12 हफ्तों में दिखा बड़ा बदलाव इस अध्ययन में यह भी पाया गया कि जो लोग पहले कम सक्रिय थे, वे अगर लगातार 12 हफ्तों तक नियमित एक्सरसाइज करते हैं तो उनका दिमाग एक छोटी-सी 15 मिनट की एक्सरसाइज पर भी ज्यादा सकारात्मक प्रतिक्रिया देने लगता है।
डिप्रेशन से जूझ रहे लोगों के लिए उम्मीद की नई किरण दुनियाभर में डिप्रेशन एक गंभीर मानसिक स्वास्थ्य समस्या बन चुका है। हर साल करोड़ों लोग इससे प्रभावित होते हैं, लेकिन महंगी थेरेपी, सामाजिक झिझक और विशेषज्ञों की कमी के कारण बहुत से मरीज समय पर इलाज नहीं करा पाते। इसी बीच एक नई रिसर्च ने उम्मीद की किरण दिखाई है। जर्नल Nature Human Behaviour में प्रकाशित 2026 के अध्ययन के अनुसार, सिर्फ 10 मिनट के मनोवैज्ञानिक अभ्यास भी डिप्रेशन के लक्षणों को कम करने में मदद कर सकते हैं और इसका असर एक महीने तक बना रह सकता है। 10 मिनट के छोटे अभ्यास से दिखा असर इस अध्ययन में वैज्ञानिकों ने अमेरिका के 7,505 वयस्कों को शामिल किया, जो डिप्रेशन के लक्षणों से जूझ रहे थे। शोधकर्ताओं ने इन प्रतिभागियों को अलग-अलग डिजिटल मानसिक स्वास्थ्य अभ्यासों के समूहों में बांटा। हर अभ्यास 10 मिनट से कम समय का था और इसमें ऐसे व्यावहारिक कौशल सिखाए गए, जो आमतौर पर मनोचिकित्सा (Psychotherapy) में इस्तेमाल किए जाते हैं। इन अभ्यासों में शामिल थे: नकारात्मक विचारों को नए नजरिए से देखना लक्ष्य तय करना और प्रेरणा बढ़ाना दूसरों की मदद करके जीवन के अर्थ को समझना प्रतिभागियों की मानसिक स्थिति का आकलन अभ्यास के तुरंत बाद और फिर एक महीने बाद किया गया। दो तकनीकों ने दिखाया सबसे बेहतर परिणाम अध्ययन में पाया गया कि कुछ अभ्यासों से लोगों में तुरंत उम्मीद और प्रेरणा बढ़ी। लेकिन दो विशेष तकनीकों ने लंबे समय तक असर दिखाया: नकारात्मक विचारों को नए और सकारात्मक नजरिए से समझने की मानसिक तकनीक। ध्यान केंद्रित करना इन तकनीकों का उपयोग करने वाले प्रतिभागियों में एक महीने बाद भी डिप्रेशन के लक्षणों में औसतन 4% अधिक कमी देखी गई, जो कंट्रोल ग्रुप के मुकाबले बेहतर थी। छोटे उपाय भी बन सकते हैं बड़ी मदद शोधकर्ताओं के अनुसार यह सुधार भले ही छोटा लगे, लेकिन इसका महत्व काफी बड़ा है। क्योंकि ऐसे छोटे डिजिटल अभ्यास लाखों लोगों तक आसानी से पहुंच सकते हैं, खासकर उन लोगों तक जिन्हें मानसिक स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध नहीं हैं। हालांकि वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया कि ये अभ्यास थेरेपी का विकल्प नहीं हैं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के लिए शुरुआती सहायक उपकरण के रूप में देखे जाने चाहिए। अन्य शोध भी देते हैं इसी तरह के संकेत मानसिक स्वास्थ्य पर छोटे-छोटे अभ्यासों के सकारात्मक प्रभाव को लेकर पहले भी कई अध्ययन सामने आ चुके हैं। 2024 में British Journal of Health Psychology में प्रकाशित एक अध्ययन में पाया गया कि रोजाना 10 मिनट की माइंडफुलनेस प्रैक्टिस से लोगों के मानसिक स्वास्थ्य में सुधार हुआ और डिप्रेशन व एंग्जायटी के लक्षण कम हुए। इसके अलावा National Institutes of Health की 2019 की समीक्षा में भी बताया गया कि शारीरिक गतिविधि और व्यायाम मूड बेहतर करने और डिप्रेशन के लक्षण घटाने में मदद कर सकते हैं। छोटे कदम भी बदल सकते हैं मानसिक स्थिति डिप्रेशन से जूझ रहे लोगों को अक्सर लगता है कि स्थिति से बाहर निकलना मुश्किल है। लेकिन यह नई रिसर्च बताती है कि छोटे-छोटे कदम भी बड़ा बदलाव ला सकते हैं। कभी-कभी सिर्फ 10 मिनट का मानसिक अभ्यास, नई सोच सीखना या किसी छोटे लक्ष्य पर काम करना भी मनोदशा को बेहतर बनाने की दिशा में पहला कदम बन सकता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि आने वाले समय में ऐसे छोटे लेकिन प्रभावी डिजिटल मानसिक स्वास्थ्य अभ्यास मानसिक स्वास्थ्य देखभाल का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकते हैं।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।