नागपुर स्थित Rashtriya Swayamsevak Sangh (RSS) मुख्यालय और हेडगेवार स्मृति मंदिर परिसर की कथित रेकी मामले में सुनवाई के दौरान कई अहम खुलासे हुए हैं। विशेष सत्र न्यायालय में पेश गवाही के अनुसार आरोपी रईस अहमद शेख को इस कथित साजिश के लिए विदेशी फंडिंग मिली थी और उसकी फ्लाइट टिकट अमेरिकी डॉलर में बुक कराई गई थी। मामले में यह जानकारी IndiGo एयरलाइंस की तत्कालीन एयरपोर्ट मैनेजर चारू वर्मा की गवाही के दौरान सामने आई। डॉलर में बुक हुआ था फ्लाइट टिकट अदालत में दी गई गवाही के मुताबिक, आरोपी रईस शेख की यात्रा के लिए इंडिगो फ्लाइट का भुगतान अमेरिकी डॉलर में किया गया था। इसके लिए “वर्डपे कार्ड” का इस्तेमाल हुआ था। जांच एजेंसियों के अनुसार, यह विदेशी फंडिंग से जुड़े संभावित नेटवर्क की ओर इशारा करता है। सरकारी पक्ष का दावा है कि रईस शेख एक प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन का सक्रिय सदस्य है और संगठन के निर्देश पर ही नागपुर पहुंचा था। श्रीनगर से मुंबई होते हुए पहुंचा नागपुर जांच के अनुसार, रईस शेख 13 जुलाई 2021 को श्रीनगर से मुंबई होते हुए नागपुर पहुंचा था। वहां उसने RSS मुख्यालय और हेडगेवार स्मृति मंदिर परिसर की कथित रेकी की। इसके बाद वह 15 जुलाई 2021 को नागपुर से दिल्ली होते हुए वापस श्रीनगर लौट गया था। कश्मीर पुलिस की पूछताछ में हुआ खुलासा सितंबर 2021 में कश्मीर पुलिस ने संदिग्ध गतिविधियों के आधार पर रईस शेख को हिरासत में लेकर पूछताछ की थी। अधिकारियों के मुताबिक, पूछताछ के दौरान उसने नागपुर में रेकी करने की बात कबूल की, जिसके बाद पूरी साजिश का खुलासा हुआ। मामले की जानकारी सामने आने के बाद Maharashtra Anti Terrorism Squad (ATS) ने उसे कश्मीर से गिरफ्तार कर ट्रांजिट रिमांड पर नागपुर लाया था। जमानत याचिकाएं बार-बार खारिज फिलहाल आरोपी नागपुर सेंट्रल जेल में बंद है। सुनवाई के दौरान उसकी पेशी वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए कराई गई। रईस शेख ने कई बार जमानत की मांग की, लेकिन अदालत ने अपराध की गंभीरता को देखते हुए उसकी सभी जमानत याचिकाएं खारिज कर दीं। जांच एजेंसियों के पास ‘पुख्ता सबूत’ सरकारी वकील ने अदालत को बताया कि जांच एजेंसियों के पास आरोपी के आतंकवादी संगठन से संबंधों और कथित गतिविधियों से जुड़े ठोस सबूत मौजूद हैं। मामले की जांच अभी भी जारी है और सुरक्षा एजेंसियां विदेशी फंडिंग नेटवर्क समेत कई पहलुओं की जांच कर रही हैं।
Operation Sindoor: ऑपरेशन सिंदूर के एक साल पूरे होने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारतीय सेना की बहादुरी और देश की आतंकवाद विरोधी नीति की सराहना की है. पीएम मोदी ने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर आतंकवाद के खिलाफ भारत के सख्त रुख, मजबूत इच्छाशक्ति और राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रति अटूट प्रतिबद्धता का प्रतीक है. प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत आतंकवाद और उसे समर्थन देने वाले नेटवर्क के खिलाफ अपनी लड़ाई में पूरी तरह अडिग है. उन्होंने कहा कि देश की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है और भारत हर आतंकी चुनौती का मुंहतोड़ जवाब देने में सक्षम है. भारतीय सेना के शौर्य को किया सलाम पीएम मोदी ने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय सशस्त्र बलों ने अद्भुत साहस, सटीक रणनीति और मजबूत समन्वय का परिचय दिया. उन्होंने पहलगाम आतंकी हमले का जिक्र करते हुए कहा कि निर्दोष नागरिकों की हत्या करने वालों को भारतीय सुरक्षा बलों ने करारा जवाब दिया. प्रधानमंत्री ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर लिखा कि पूरा देश भारतीय जवानों की वीरता और समर्पण को सलाम करता है. उन्होंने कहा कि इस अभियान ने दुनिया को भारतीय सेना की तैयारी, पेशेवर क्षमता और तीनों सेनाओं के मजबूत तालमेल की ताकत दिखायी. आत्मनिर्भर भारत की ताकत भी दिखी पीएम मोदी ने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर ने रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर भारत की बढ़ती क्षमता को भी सामने रखा. उन्होंने कहा कि आधुनिक सैन्य तकनीक, स्वदेशी रक्षा उपकरण और बेहतर समन्वय ने इस अभियान को सफल बनाने में अहम भूमिका निभायी. उन्होंने यह भी कहा कि भारतीय सुरक्षा बलों के बीच बढ़ती एकजुटता और सामरिक क्षमता आज देश की सबसे बड़ी ताकत बन चुकी है. क्यों शुरू किया गया था ऑपरेशन सिंदूर? ऑपरेशन सिंदूर भारतीय सेना, वायुसेना, नौसेना और सीमा सुरक्षा बल (BSF) द्वारा संयुक्त रूप से चलाया गया सैन्य अभियान था. यह ऑपरेशन 7 मई से 10 मई 2025 के बीच पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (POK) में आतंकवादी ठिकानों और सैन्य अड्डों को निशाना बनाकर अंजाम दिया गया था. यह कार्रवाई 22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले के जवाब में की गयी थी. उस हमले में 26 लोगों की मौत हुई थी, जिनमें ज्यादातर पर्यटक शामिल थे. आतंकवाद के खिलाफ भारत का संदेश प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर ने दुनिया को साफ संदेश दिया कि भारत अपनी संप्रभुता और नागरिकों की सुरक्षा से कोई समझौता नहीं करेगा. उन्होंने कहा कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में भारत पूरी मजबूती और दृढ़ता के साथ आगे बढ़ता रहेगा.
वेनेजुएला के राष्ट्रपति मादुरो को पकड़ने वाले मिशन से जुड़ा मामला अमेरिका के एक स्पेशल फोर्सेज सैनिक पर बेहद गंभीर आरोप लगे हैं। अभियोजन पक्ष के अनुसार, सैनिक ने वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को पकड़ने के गुप्त सैन्य अभियान से जुड़ी संवेदनशील जानकारी का इस्तेमाल कर ऑनलाइन सट्टेबाजी में 4 लाख डॉलर से अधिक की कमाई की। आरोपी की पहचान 38 वर्षीय गैनन केन वैन डाइक के रूप में हुई है। Polymarket पर लगाए सटीक दांव अधिकारियों के मुताबिक, वैन डाइक ने दिसंबर 2025 के अंत में prediction market प्लेटफॉर्म Polymarket पर अकाउंट बनाया। उन्होंने ऐसे सवालों पर करीब 13 दांव लगाए, जिनमें शामिल थे: क्या अमेरिकी सेना वेनेजुएला में मौजूद होगी? क्या 31 जनवरी 2026 तक मादुरो सत्ता से बाहर होंगे? गोपनीय जानकारी की बदौलत उनके सभी दांव बेहद सटीक साबित हुए। 4 लाख डॉलर से ज्यादा की कमाई अमेरिकी अभियोजकों का कहना है कि इन दांवों से वैन डाइक ने 400,000 डॉलर से अधिक का मुनाफा कमाया। ऑपरेशन के बाद उन्होंने कथित तौर पर: रकम का बड़ा हिस्सा विदेशी क्रिप्टो वॉल्ट में ट्रांसफर किया नया ब्रोकरेज अकाउंट खोला Polymarket से अपना अकाउंट डिलीट करने का अनुरोध भी किया यह कदम जांच एजेंसियों के शक को और मजबूत करता है। कौन-कौन से आरोप लगे? वैन डाइक पर कई गंभीर संघीय आरोप लगाए गए हैं, जिनमें शामिल हैं: गोपनीय सरकारी जानकारी का निजी लाभ के लिए उपयोग गैर-सार्वजनिक सरकारी सूचना की चोरी कमोडिटीज फ्रॉड वायर फ्रॉड अवैध वित्तीय लेनदेन दोष सिद्ध होने पर उन्हें कई वर्षों की जेल हो सकती है। FBI ने क्या कहा? FBI निदेशक ने इस मामले को बेहद गंभीर बताते हुए कहा कि एक सैनिक ने अपनी जिम्मेदारी का दुरुपयोग कर राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी जानकारी से निजी लाभ कमाने की कोशिश की। Polymarket ने खुद दी सूचना Polymarket ने बयान जारी कर कहा कि प्लेटफॉर्म पर संदिग्ध ट्रेडिंग गतिविधि पकड़ी गई थी। कंपनी ने तुरंत अमेरिकी न्याय विभाग को इसकी सूचना दी और जांच में पूरा सहयोग किया। "इनसाइडर ट्रेडिंग के लिए Polymarket में कोई जगह नहीं है।" सेना में ऊंचा पद संभाल रहे थे आरोपी वैन डाइक 2008 में अमेरिकी सेना में शामिल हुए थे और 2023 में मास्टर सार्जेंट बने थे। वे नॉर्थ कैरोलिना के फोर्ट ब्रैग में तैनात स्पेशल फोर्सेज समुदाय का हिस्सा थे। Prediction Markets पर बढ़ रही निगरानी हाल के महीनों में prediction markets को लेकर अमेरिकी नियामकों और कांग्रेस की चिंता बढ़ी है। यह मामला इस बात का बड़ा उदाहरण बन सकता है कि संवेदनशील सरकारी जानकारी का गलत इस्तेमाल किस तरह वित्तीय अपराध में बदल सकता है।
हाई-टेक वैज्ञानिकों की संदिग्ध मौतों से बढ़ी चिंता दुनिया की दो महाशक्तियों–अमेरिका और चीन–में रक्षा और तकनीकी क्षेत्र से जुड़े शीर्ष वैज्ञानिकों की रहस्यमयी मौतों और लापता होने की घटनाओं ने सुरक्षा एजेंसियों को सतर्क कर दिया है। ये वैज्ञानिक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, हाइपरसोनिक हथियार, न्यूक्लियर रिसर्च और स्पेस डिफेंस जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में काम कर रहे थे। रिपोर्ट्स के मुताबिक, इन घटनाओं ने अब राजनीतिक हलकों में भी बहस को जन्म दे दिया है। अमेरिका में 11 संदिग्ध घटनाओं की जांच वॉशिंगटन में कम से कम 11 मामलों की जांच चल रही है, जिनमें वैज्ञानिक या तो लापता हुए हैं या संदिग्ध परिस्थितियों में मृत पाए गए हैं। ये सभी मामले न्यूक्लियर टेक्नोलॉजी, स्पेस रिसर्च और एडवांस्ड हथियारों से जुड़े हैं। अमेरिकी राजनीतिक गलियारों में भी यह मुद्दा चर्चा का विषय बन गया है। कुछ नेताओं ने इसे संभावित “विदेशी ऑपरेशन” तक बताया है, हालांकि अब तक कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। एफबीआई (FBI) ने इन सभी मामलों की जांच शुरू कर दी है। चीन में भी लगातार हो रही वैज्ञानिकों की मौतें दूसरी ओर, चीन और अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार पिछले कुछ वर्षों में कम से कम 9 वैज्ञानिकों की मौतें संदिग्ध परिस्थितियों में हुई हैं। इनमें से कई मामले सड़क दुर्घटना, अचानक बीमारी या अस्पष्ट कारणों से जुड़े बताए गए हैं। इन वैज्ञानिकों की उम्र 26 से 68 वर्ष के बीच बताई गई है और वे सभी अत्याधुनिक सैन्य तकनीक से जुड़े प्रोजेक्ट्स पर काम कर रहे थे। “टॉप साइंटिस्ट गायब हो रहे हैं” – राजनीतिक बयानबाजी तेज अमेरिका में इस मुद्दे पर राजनीतिक बयान भी सामने आए हैं। रिपब्लिकन सांसद एरिक बर्लिसन ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा कि अमेरिका, चीन, रूस और ईरान जैसे देशों के बीच तकनीकी प्रतिस्पर्धा के बीच यह घटनाएं चिंता बढ़ाने वाली हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी इस मामले को “गंभीर” बताया है, हालांकि उन्होंने यह संभावना भी जताई कि यह महज संयोग हो सकता है। चीन के वैज्ञानिक की मौत पर उठे सवाल सबसे चर्चित मामलों में एक नाम फेंग यांगहे का है, जो चीन की नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ डिफेंस टेक्नोलॉजी में प्रोफेसर थे। उनकी मौत 2023 में बीजिंग में एक कार दुर्घटना में हुई बताई गई। रिपोर्ट्स के अनुसार, वह ताइवान से जुड़े सैन्य परिदृश्यों की AI सिमुलेशन पर काम कर रहे थे और देर रात एक बैठक से लौटते समय उनकी कार दुर्घटनाग्रस्त हो गई थी। संवेदनशील तकनीकी क्षेत्रों में काम करने वाले वैज्ञानिक अधिक प्रभावित विशेषज्ञों के अनुसार, जिन वैज्ञानिकों की मौत या लापता होने की घटनाएं सामने आई हैं, वे मुख्य रूप से इन क्षेत्रों से जुड़े थे: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और सैन्य सिमुलेशन हाइपरसोनिक हथियार तकनीक ड्रोन और स्वॉर्म टेक्नोलॉजी न्यूक्लियर और स्पेस डिफेंस रिसर्च हालांकि विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि कुछ मामले दुर्घटनाओं या प्राकृतिक कारणों से जुड़े हो सकते हैं। क्या यह सिर्फ संयोग या किसी बड़ी साजिश का हिस्सा? इन घटनाओं को लेकर सोशल मीडिया और विश्लेषकों के बीच कई तरह की अटकलें चल रही हैं। कुछ लोग इसे महज संयोग बता रहे हैं, जबकि कुछ इसे वैश्विक तकनीकी प्रतिस्पर्धा से जुड़ा गंभीर मुद्दा मान रहे हैं। फिलहाल किसी भी देश द्वारा किसी संगठित साजिश की पुष्टि नहीं हुई है। रहस्य गहराता जा रहा है, जांच जारी अमेरिका और चीन दोनों ही इस मामले की जांच में जुटे हैं। जैसे-जैसे नई घटनाएं सामने आ रही हैं, सुरक्षा एजेंसियों की चिंता भी बढ़ती जा रही है। यह मामला अभी पूरी तरह रहस्य बना हुआ है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर निगरानी में है।
शहीदों को पीएम मोदी ने दी श्रद्धांजलि प्रधानमंत्री Narendra Modi ने पहलगाम आतंकी हमले की पहली बरसी पर पीड़ितों को श्रद्धांजलि दी। उन्होंने कहा कि इस हमले में जान गंवाने वाले निर्दोष लोगों को देश कभी नहीं भूलेगा। प्रधानमंत्री ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा कि यह हमला देश की आत्मा को झकझोर देने वाला था और पीड़ित परिवारों के साथ पूरा देश खड़ा है। “भारत आतंक के सामने नहीं झुकेगा” पीएम मोदी ने अपने संदेश में साफ कहा कि भारत किसी भी तरह के आतंक के आगे नहीं झुकेगा। उन्होंने कहा कि आतंकियों की साजिशें कभी सफल नहीं होंगी और देश मजबूती से उनका मुकाबला करेगा। उन्होंने यह भी दोहराया कि देश दुख की इस घड़ी में एकजुट है और पीड़ित परिवारों के साथ खड़ा है। 2025 में हुआ था भीषण हमला 22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर के Pahalgam में आतंकियों ने हमला कर 26 लोगों की हत्या कर दी थी, जिनमें ज्यादातर पर्यटक शामिल थे। इस हमले ने पूरे देश को झकझोर दिया था और इसके बाद बड़े स्तर पर सुरक्षा और सैन्य कार्रवाई की गई थी। ऑपरेशन सिंदूर और महादेव से जवाब हमले के बाद भारत ने “ऑपरेशन सिंदूर” के तहत पाकिस्तान और पीओके में आतंकियों के ठिकानों पर कार्रवाई की थी। इस दौरान कई आतंकी ठिकानों को नष्ट किया गया और बड़ी संख्या में आतंकियों को मार गिराया गया। इसके बाद “ऑपरेशन महादेव” के तहत सुरक्षा बलों ने हमले में शामिल तीन आतंकियों को भी ढेर कर दिया। सुरक्षा बढ़ी, स्मारक बना हमले की बरसी को देखते हुए पहलगाम में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है। यहां अतिरिक्त सुरक्षाबल तैनात किए गए हैं और निगरानी बढ़ा दी गई है। हमले में मारे गए लोगों की याद में एक स्मारक भी बनाया गया है, जिसमें सभी 26 पीड़ितों के नाम दर्ज हैं। यह स्मारक लिद्दर नदी के किनारे बनाया गया है और लोगों के लिए श्रद्धांजलि का केंद्र बन गया है।
नई दिल्ली, 31 मार्च 2026: राष्ट्रीय राजधानी को दहलाने की एक बड़ी आतंकी साजिश को समय रहते नाकाम कर दिया गया है। दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने Lashkar-e-Taiba से जुड़े एक खतरनाक मॉड्यूल का पर्दाफाश करते हुए इसके मास्टरमाइंड Shabbir Ahmed Lone समेत कुल 8 आतंकियों को गिरफ्तार किया है। जांच में सामने आए खुलासे सुरक्षा एजेंसियों के लिए गंभीर चिंता का विषय हैं। मंदिरों और भीड़भाड़ वाले इलाकों पर थी नजर पूछताछ में शब्बीर अहमद लोन ने खुलासा किया कि उसने दिल्ली के प्रमुख धार्मिक स्थलों-Kalkaji Temple, Lotus Temple और Chhatarpur Temple-की रेकी कर इसकी जानकारी पाकिस्तान स्थित हैंडलर्स तक पहुंचाई थी। इसके अलावा राजधानी के सबसे व्यस्त व्यावसायिक केंद्र Connaught Place को भी निशाना बनाने की योजना थी। यहां की भीड़भाड़ और व्यावसायिक गतिविधियों को देखते हुए इसे संभावित हमले के लिए उपयुक्त माना गया था। ISI और नए आतंकी संगठन की साजिश जांच में यह भी सामने आया है कि Inter-Services Intelligence और लश्कर बांग्लादेश में The Resistance Front की तर्ज पर एक नया आतंकी संगठन खड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं। यह भारत के खिलाफ क्षेत्रीय स्तर पर आतंकवादी नेटवर्क को मजबूत करने की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। पोस्टरों से खुला नेटवर्क का सुराग इस पूरे मॉड्यूल का खुलासा 8 फरवरी 2026 को हुआ, जब Janpath Metro Station और अन्य इलाकों में पाकिस्तान समर्थक और भड़काऊ पोस्टर लगाए गए। इन पोस्टरों में कश्मीर से जुड़े संदेश और आतंकी Burhan Wani की तस्वीरें भी शामिल थीं। इसी सुराग के आधार पर जांच आगे बढ़ी और पूरे नेटवर्क का भंडाफोड़ हुआ। कई राज्यों में छापेमारी, अवैध घुसपैठ का खुलासा दिल्ली, कोलकाता और तमिलनाडु के तिरुप्पुर में एक साथ कार्रवाई करते हुए पुलिस ने कुल 8 आतंकियों को गिरफ्तार किया। इनमें से 7 बांग्लादेशी नागरिक बताए जा रहे हैं, जो अवैध रूप से भारत में दाखिल हुए थे। टेक्निकल सर्विलांस, सीसीटीवी फुटेज और ह्यूमन इंटेलिजेंस की मदद से इस नेटवर्क की परतें खोली गईं। अंततः 9 मार्च 2026 को शब्बीर अहमद लोन को दिल्ली के गाजीपुर इलाके से गिरफ्तार कर लिया गया। समय रहते टली बड़ी त्रासदी दिल्ली पुलिस का दावा है कि अगर यह मॉड्यूल सक्रिय हो जाता, तो देश में एक बड़ा आतंकी हमला हो सकता था। समय पर की गई कार्रवाई ने संभावित बड़े नुकसान को टाल दिया।
देश की सुरक्षा एजेंसियों को एक बड़ी कामयाबी मिली है। दिल्ली पुलिस स्पेशल सेल ने एक ऐसे आतंकी मॉड्यूल का पर्दाफाश किया है, जो राजधानी दिल्ली समेत कई बड़े शहरों को दहलाने की साजिश रच रहा था। इस मामले में गिरफ्तार हुआ मुख्य आरोपी शब्बीर अहमद लोन अब जांच एजेंसियों के रडार पर है। कौन है शब्बीर अहमद लोन? जम्मू-कश्मीर के श्रीनगर के कंगन इलाके का रहने वाला शब्बीर अहमद लोन एक संदिग्ध आतंकी है, जिसका संबंध पाकिस्तान समर्थित आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा से बताया जा रहा है। जांच एजेंसियों के अनुसार, वह संगठन के शीर्ष आतंकियों जैसे हाफिज सईद और जकी-उर-रहमान लखवी के संपर्क में रहा है। ISI से जुड़ा नेटवर्क और बांग्लादेश कनेक्शन जांच में सामने आया है कि यह पूरा मॉड्यूल पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI के समर्थन से चलाया जा रहा था। इसका संचालन बांग्लादेश से किया जा रहा था, जहां से भारत में आतंकियों की भर्ती, फंडिंग और साजिशों को अंजाम दिया जा रहा था। फरवरी 2026 में इसी नेटवर्क से जुड़े 8 लोगों को गिरफ्तार किया गया था, जिनमें 7 बांग्लादेशी नागरिक थे। ये सभी फर्जी दस्तावेजों के जरिए भारत में छिपे हुए थे। कैसे रची जा रही थी साजिश? जांच एजेंसियों के मुताबिक: फर्जी आधार कार्ड बनवाकर आतंकियों को भारत में छिपाया गया एन्क्रिप्टेड ऐप्स के जरिए संपर्क बनाए रखा गया दिल्ली समेत कई शहरों में रेकी की गई खास तौर पर लाल किला जैसे हाई-प्रोफाइल टारगेट को निशाना बनाने की योजना थी पहले भी रहा है आपराधिक रिकॉर्ड शब्बीर लोन को साल 2007 में भी हथियारों के साथ गिरफ्तार किया गया था। सजा काटने के बाद वह जमानत पर बाहर आया और फिर बांग्लादेश भाग गया, जहां से उसने दोबारा आतंकी नेटवर्क खड़ा किया। समय रहते टला बड़ा हमला जांच एजेंसियों का मानना है कि अगर समय पर कार्रवाई नहीं होती, तो देश में बड़ा आतंकी हमला हो सकता था। इस गिरफ्तारी ने एक बड़े खतरे को टाल दिया है और सुरक्षा एजेंसियों की सतर्कता को साबित किया है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।