जयपुर: राजस्थान एंटी टेररिस्ट स्क्वॉड (ATS) ने जयपुर निवासी बबीता धाकड़ उर्फ खदीजा (38) को आतंकवाद से जुड़े गंभीर आरोपों में गिरफ्तार किया है। जांच एजेंसियों का दावा है कि महिला पाकिस्तान स्थित आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद (JeM) से जुड़े संदिग्धों के संपर्क में थी और सोशल मीडिया के जरिए कथित तौर पर आतंकी नेटवर्क को संवेदनशील जानकारी उपलब्ध करा रही थी। फिलहाल आरोपी महिला को पुलिस रिमांड पर लेकर पूछताछ की जा रही है। पहलगाम आतंकी हमले के बाद आतंकियों के संपर्क में आई एटीएस के अनुसार, महिला ने कथित तौर पर वर्ष 2025 के पहलगाम आतंकी हमले के बाद सोशल मीडिया पर पाकिस्तान और आतंकवादी संगठनों से जुड़ी सामग्री देखनी शुरू की। इसी दौरान उसकी पहचान पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) से जुड़े कई सोशल मीडिया अकाउंट्स और कथित आतंकी नेटवर्क से हुई। जांच एजेंसियों का दावा है कि इसी ऑनलाइन संपर्क के जरिए महिला धीरे-धीरे कट्टरपंथी नेटवर्क के प्रभाव में आ गई। मोबाइल जांच में मिले चैट, वीडियो और संदिग्ध संपर्क पुलिस के अनुसार, आरोपी के मोबाइल फोन और सोशल मीडिया अकाउंट की जांच में कई पाकिस्तानी नागरिकों तथा कथित आतंकी नेटवर्क से जुड़े चैट, वीडियो और संपर्क नंबर मिले हैं। जांच में यह भी आरोप सामने आया है कि महिला ने भारतीय मोबाइल नंबरों के OTP साझा किए, जिनका इस्तेमाल सोशल मीडिया अकाउंट संचालित करने में किया गया। इन सभी पहलुओं की फोरेंसिक जांच जारी है। ऑनलाइन दोस्ती से शादी तक पहुंचा मामला एटीएस की जांच के मुताबिक, महिला की ऑनलाइन पहचान अबू उबैदा नाम के एक व्यक्ति से हुई थी। दोनों के बीच लंबे समय तक चैटिंग और वीडियो कॉल होती रही। एफआईआर के अनुसार, अबू उबैदा ने महिला को इस्लाम अपनाने, नमाज पढ़ने और कुरान सीखने के लिए प्रेरित किया। आरोप है कि उसने महिला को पाकिस्तान आकर शादी करने और जैश-ए-मोहम्मद के लिए काम करने का प्रस्ताव भी दिया था। नेपाल के रास्ते पाकिस्तान जाने की थी कथित योजना पुलिस का दावा है कि आरोपी महिला, अबू उबैदा और एक ऑनलाइन मौलवी के बीच नेपाल के रास्ते सऊदी अरब या संयुक्त अरब अमीरात (UAE) होते हुए पाकिस्तान पहुंचने की योजना पर बातचीत हुई थी। जांच में यह भी सामने आया है कि यात्रा के खर्च की व्यवस्था के लिए क्रिप्टोकरेंसी के इस्तेमाल पर चर्चा हुई थी, जिसके बाद महिला ने इससे जुड़े कुछ मोबाइल एप्लिकेशन भी डाउनलोड किए थे। पुलिस रिमांड में जारी है पूछताछ राजस्थान एटीएस ने महिला को गिरफ्तार कर अदालत में पेश किया, जहां से उसे पुलिस रिमांड पर भेजा गया है। जांच एजेंसियां उसके मोबाइल, डिजिटल उपकरणों और ऑनलाइन गतिविधियों की विस्तृत फोरेंसिक जांच कर रही हैं। अधिकारियों का कहना है कि शुरुआती जांच में महिला के ऑनलाइन हनी ट्रैप के जरिए कट्टरपंथी नेटवर्क से जुड़ने के संकेत मिले हैं। मामले में लगाए गए सभी आरोपों की अंतिम पुष्टि विस्तृत जांच और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही की जाएगी।
नई दिल्ली: केंद्र सरकार ने वरिष्ठ भारतीय पुलिस सेवा (IPS) अधिकारी महेश दीक्षित को देश की प्रमुख खुफिया एजेंसी इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) का नया प्रमुख नियुक्त किया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता वाली मंत्रिमंडल की नियुक्ति समिति (ACC) ने उनके नाम को मंजूरी दे दी है। वह मौजूदा आईबी प्रमुख तपन डेका का स्थान लेंगे, जिनका कार्यकाल 30 जून को समाप्त हो रहा है। महेश दीक्षित की नियुक्ति ऐसे समय हुई है जब देश के सामने आतंकवाद, सीमा सुरक्षा, साइबर खतरे और आंतरिक सुरक्षा जैसी कई बड़ी चुनौतियां मौजूद हैं। ऐसे में उनके अनुभव को एजेंसी के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। महेश दीक्षित कौन हैं? महेश दीक्षित 1993 बैच के IPS अधिकारी हैं और आंध्र प्रदेश कैडर से संबंध रखते हैं। वर्तमान में वह इंटेलिजेंस ब्यूरो में स्पेशल डायरेक्टर के पद पर कार्यरत हैं, जो एजेंसी का दूसरा सबसे वरिष्ठ पद माना जाता है। दिलचस्प बात यह है कि पुलिस सेवा में आने से पहले वह पेशे से डॉक्टर थे। बाद में उन्होंने सिविल सेवा की राह चुनी और भारतीय पुलिस सेवा में शामिल होकर देश की आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान दिया। आंतरिक सुरक्षा में लंबा अनुभव महेश दीक्षित को खुफिया अभियानों और आंतरिक सुरक्षा मामलों का व्यापक अनुभव है। उन्होंने कई संवेदनशील क्षेत्रों में काम किया है और लंबे समय तक जम्मू-कश्मीर में राज्य खुफिया ब्यूरो के प्रमुख के रूप में अपनी सेवाएं दीं। इसके अलावा वह श्रीनगर में सहायक आसूचना ब्यूरो (Subsidiary Intelligence Bureau) के प्रमुख भी रह चुके हैं। सुरक्षा एजेंसियों के बीच उनका मजबूत जमीनी खुफिया नेटवर्क और आतंकवाद-रोधी रणनीतियों में अनुभव उनकी बड़ी ताकत माना जाता है। अनुच्छेद 370 के बाद निभाई अहम भूमिका अधिकारियों के अनुसार, जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद कानून-व्यवस्था बनाए रखने और सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने में महेश दीक्षित की महत्वपूर्ण भूमिका रही। इस दौरान उन्होंने विभिन्न सुरक्षा एजेंसियों के साथ समन्वय बनाकर कई संवेदनशील अभियानों का नेतृत्व किया। 'सफेदपोश' आतंकी नेटवर्क का किया था पर्दाफाश पिछले वर्ष महेश दीक्षित ने एक कथित 'सफेदपोश' आतंकी नेटवर्क का खुलासा करने में अहम भूमिका निभाई थी। बताया जाता है कि यह कार्रवाई श्रीनगर पुलिस से प्राप्त शुरुआती खुफिया जानकारी के आधार पर की गई थी। इस अभियान को आंतरिक सुरक्षा के लिहाज से बड़ी सफलता माना गया था। क्या है इंटेलिजेंस ब्यूरो की जिम्मेदारी? इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) भारत की सबसे पुरानी और प्रमुख घरेलू खुफिया एजेंसी है। इसका मुख्य कार्य देश की आंतरिक सुरक्षा, आतंकवाद-रोधी अभियान, जासूसी विरोधी गतिविधियों, कट्टरपंथी संगठनों की निगरानी, साइबर सुरक्षा खतरों और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों पर नजर रखना है। आईबी विभिन्न केंद्रीय और राज्य सुरक्षा एजेंसियों के साथ मिलकर खुफिया सूचनाएं साझा करती है और संभावित खतरों को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। तपन डेका की जगह संभालेंगे जिम्मेदारी महेश दीक्षित, मौजूदा आईबी प्रमुख तपन डेका का स्थान लेंगे। डेका, 1988 बैच के हिमाचल प्रदेश कैडर के IPS अधिकारी हैं। उन्हें वर्ष 2022 में आईबी प्रमुख नियुक्त किया गया था और बाद में उनके कार्यकाल को दो बार एक-एक वर्ष के लिए बढ़ाया गया। अब महेश दीक्षित के नेतृत्व में इंटेलिजेंस ब्यूरो देश की आंतरिक सुरक्षा से जुड़ी नई चुनौतियों से निपटने की जिम्मेदारी संभालेगा।
नई दिल्ली: राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने पाकिस्तान स्थित आतंकवादी शहजाद भट्टी से जुड़े आतंकी-गैंगस्टर नेटवर्क के खिलाफ बड़ा अभियान चलाते हुए पंजाब और हरियाणा में 18 स्थानों पर एक साथ छापेमारी की। एजेंसी की यह कार्रवाई दोनों राज्यों के नौ जिलों में की गई, जहां संदिग्धों के ठिकानों पर तलाशी लेकर कई महत्वपूर्ण साक्ष्य जुटाए गए। डिजिटल उपकरण और वित्तीय लेन-देन से जुड़े दस्तावेज जब्त एनआईए के अनुसार छापेमारी के दौरान कई डिजिटल उपकरण, दस्तावेज और अन्य महत्वपूर्ण सामग्री बरामद की गई है। प्रारंभिक जांच में संचार नेटवर्क, वित्तीय लेन-देन और संदिग्ध गतिविधियों से जुड़ी जानकारियां सामने आई हैं। एजेंसी ने बताया कि जब्त की गई सामग्री को फोरेंसिक और तकनीकी जांच के लिए भेजा गया है, ताकि नेटवर्क की कार्यप्रणाली और उसके अंतरराष्ट्रीय संपर्कों का पता लगाया जा सके। सहयोगियों और स्थानीय मॉड्यूल की पहचान पर फोकस एनआईए का कहना है कि इस कार्रवाई का मुख्य उद्देश्य शहजाद भट्टी के सहयोगियों और विभिन्न मामलों में शामिल अन्य संदिग्धों की पहचान करना है। जांच के दौरान कुछ व्यक्तियों को नोटिस जारी कर आगे की पूछताछ के लिए बुलाया गया है। एजेंसी को संदेह है कि यह नेटवर्क आतंकवादी गतिविधियों और संगठित अपराध के गठजोड़ के रूप में काम कर रहा था, जिसे सीमा पार से संचालित किया जा रहा था। रोजर संधू के घर ग्रेनेड हमले में सामने आया था नाम जांच एजेंसी के मुताबिक मार्च 2025 में जालंधर स्थित सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर रोजर संधू के आवास पर हुए ग्रेनेड हमले की साजिश में भी शहजाद भट्टी का नाम सामने आया था। इस मामले में एनआईए ने अप्रैल 2026 में शहजाद भट्टी और एक अन्य आरोपी के खिलाफ फरार आरोपी के रूप में आरोपपत्र दाखिल किया था। हरियाणा के विस्फोट मामलों से भी जुड़े तार एनआईए की जांच में यह भी सामने आया है कि नवंबर 2025 में हरियाणा के सिरसा स्थित महिला पुलिस थाने में हुए विस्फोट और जनवरी 2026 में अंबाला के बलदेव नगर पुलिस स्टेशन में हुए विस्फोट की साजिश रचने में भी भट्टी की कथित भूमिका रही है। सिरसा विस्फोट मामले में एजेंसी ने मई 2026 में शहजाद भट्टी, पाकिस्तान स्थित हैंडलर सोहेल अहमद समेत नौ आरोपियों के खिलाफ आरोपपत्र दायर किया था। अंबाला कार बम मामले में भी मिला कनेक्शन अंबाला के बलदेव नगर पुलिस स्टेशन से जुड़े कार बम विस्फोट मामले की जांच के दौरान गिरफ्तार किए गए एक आरोपी के शहजाद भट्टी से सीधे संपर्क होने के प्रमाण मिले थे। इसके बाद इस मामले को भी एनआईए ने अपनी व्यापक जांच में शामिल कर लिया। सीमा पार से आतंकी गतिविधियों की साजिश का खुलासा करने में जुटी NIA एनआईए का कहना है कि तीनों मामलों की जांच अभी जारी है। एजेंसी का लक्ष्य इन हमलों की पूरी साजिश का पर्दाफाश करना और पाकिस्तान से संचालित आतंकी-गैंगस्टर नेटवर्क के सभी सहयोगियों की पहचान करना है। जांच एजेंसी के अनुसार शुरुआती संकेत बताते हैं कि भारत में आतंकी गतिविधियों को अंजाम देने के लिए स्थानीय आपराधिक गिरोहों और मॉड्यूल का इस्तेमाल किया जा रहा था। इसी नेटवर्क की परतें खोलने के लिए आगे भी जांच जारी रहेगी।
वॉशिंगटन: अमेरिका की खुफिया एजेंसी सीआईए के एक पूर्व अधिकारी पर करोड़ों डॉलर की कथित धोखाधड़ी का आरोप लगा है। जांच एजेंसियों का दावा है कि पूर्व अधिकारी डेविड रश ने राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े एक गोपनीय कार्यक्रम का सहारा लेकर सरकारी संसाधनों का दुरुपयोग किया और करीब 4 करोड़ डॉलर (लगभग 382 करोड़ रुपये) की संपत्ति जुटा ली। मामला तब सुर्खियों में आया जब संघीय जांच एजेंसियों ने उनके घर पर छापेमारी की। अधिकारियों के अनुसार, तलाशी के दौरान बड़ी मात्रा में नकदी, सैकड़ों सोने की ईंटें और कई लग्जरी घड़ियां बरामद की गईं। फर्जी गोपनीय मिशन बनाकर किया कथित खेल अमेरिकी मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, डेविड रश पर आरोप है कि उन्होंने एक कथित फर्जी सरकारी कार्यक्रम तैयार किया और उसे राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े अत्यंत संवेदनशील मिशन के रूप में प्रस्तुत किया। जांचकर्ताओं का कहना है कि इस कार्यक्रम को "कंटिन्यूटी ऑफ गवर्नमेंट ऑपरेशंस" से जुड़ा बताया गया था। आमतौर पर इस तरह की योजनाएं युद्ध, बड़े आतंकी हमले, प्राकृतिक आपदा या राष्ट्रीय आपातकाल जैसी परिस्थितियों में सरकार के कामकाज को जारी रखने के लिए बनाई जाती हैं। अधिकारियों का आरोप है कि इसी संवेदनशील व्यवस्था की आड़ लेकर रश ने लंबे समय तक सरकारी संसाधनों और विशेष सुविधाओं तक पहुंच बनाई। छापेमारी में मिला सोने और नकदी का जखीरा संघीय जांच ब्यूरो (FBI) द्वारा वर्जीनिया स्थित आवास पर की गई छापेमारी में चौंकाने वाले खुलासे सामने आए। जांच एजेंसियों के अनुसार, घर से 303 सोने की ईंटें बरामद की गईं। इसके अलावा लगभग 20 लाख डॉलर नकद और कई महंगी लग्जरी घड़ियां भी मिलीं। अधिकारियों का मानना है कि बरामद संपत्ति कथित तौर पर उसी फर्जी कार्यक्रम के जरिए अर्जित की गई हो सकती है। संपत्ति के स्रोत और उससे जुड़े वित्तीय लेनदेन की जांच अभी जारी है। अदालत में 'मास्टर मैनिपुलेटर' बताया गया मामले की सुनवाई के दौरान सरकारी वकीलों ने डेविड रश को "मास्टर मैनिपुलेटर" करार दिया। अभियोजन पक्ष का आरोप है कि उन्होंने वर्षों तक अपने शैक्षणिक और पेशेवर रिकॉर्ड के बारे में भ्रामक जानकारी देकर विभिन्न सरकारी संस्थानों में प्रभावशाली पद हासिल किए। जांच एजेंसियों का दावा है कि रश ने अपने अनुभव और योग्यता को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया, जिससे उन्हें ऐसे संवेदनशील कार्यक्रमों तक पहुंच मिली जिनका दुरुपयोग बाद में किया गया। सहयोगियों की भूमिका की भी जांच अधिकारियों के अनुसार, यह भी जांच की जा रही है कि क्या इस कथित योजना में अन्य लोग भी शामिल थे। प्रारंभिक जांच में संकेत मिले हैं कि जिन सहयोगियों को इस कार्यक्रम से जोड़ा गया था, उन्हें कथित धोखाधड़ी की पूरी जानकारी नहीं थी। जांच एजेंसियां अब वित्तीय दस्तावेजों, ईमेल रिकॉर्ड और अन्य संचार माध्यमों की पड़ताल कर रही हैं। CIA की निगरानी व्यवस्था पर उठे सवाल मामले के सामने आने के बाद अमेरिकी खुफिया तंत्र की जवाबदेही और निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल उठने लगे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि आरोप सही साबित होते हैं, तो यह एक गंभीर संस्थागत विफलता मानी जाएगी। आलोचकों के अनुसार, राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े गोपनीय ढांचे का उपयोग कथित तौर पर वर्षों तक निजी लाभ के लिए किया जाना चिंताजनक है और इससे निगरानी तंत्र की कमजोरियां उजागर होती हैं। फिलहाल हिरासत में हैं डेविड रश मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, डेविड रश वर्तमान में हिरासत में हैं। अदालत ने उन्हें जमानत देने से इनकार कर दिया है। न्यायाधीश का मानना है कि मामले की गंभीरता और उपलब्ध संसाधनों को देखते हुए उनके फरार होने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। इसी आधार पर उन्हें फिलहाल हिरासत में रखने का आदेश दिया गया है। आगे और बढ़ सकती हैं मुश्किलें जांच एजेंसियों ने संकेत दिया है कि मामले की पड़ताल आगे बढ़ने के साथ डेविड रश पर अतिरिक्त आरोप भी लगाए जा सकते हैं। वित्तीय अनियमितताओं, धोखाधड़ी, सरकारी संसाधनों के दुरुपयोग और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े नियमों के उल्लंघन जैसे पहलुओं की अलग-अलग जांच की जा रही है। यदि आरोप अदालत में साबित होते हैं, तो यह हाल के वर्षों में अमेरिकी खुफिया तंत्र से जुड़े सबसे बड़े वित्तीय घोटालों में से एक माना जा सकता है।
अमेरिकी अधिकारियों ने ईरान को संवेदनशील तकनीकी उपकरण उपलब्ध कराने के आरोप में अमेरिकी-ईरानी कारोबारी जमशीद घोमी को गिरफ्तार किया है। जांच एजेंसियों का दावा है कि उन्होंने वर्षों तक अमेरिकी निर्यात प्रतिबंधों को दरकिनार करते हुए नेटवर्किंग और साइबर सुरक्षा से जुड़े उपकरण ईरान तक पहुंचाए। संघीय अधिकारियों के अनुसार, 63 वर्षीय घोमी कैलिफोर्निया के न्यूपोर्ट कोस्ट के निवासी हैं और तेहरान स्थित तकनीकी कंपनी फराज परदाज रायानेह (FPR) के संस्थापक एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं। निर्यात प्रतिबंधों को दरकिनार करने का आरोप अमेरिकी न्याय विभाग के मुताबिक, घोमी पर इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट (IEEPA) समेत कई संघीय कानूनों के उल्लंघन का आरोप लगाया गया है। जांचकर्ताओं का कहना है कि उन्होंने बिना आवश्यक सरकारी अनुमति के संवेदनशील अमेरिकी तकनीक ईरान भेजने के लिए एक संगठित तंत्र तैयार किया था। यूएई बना कथित ट्रांजिट हब अभियोजन पक्ष के अनुसार, उपकरणों को सीधे ईरान भेजने के बजाय पहले संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) स्थित कंपनियों और बिचौलियों तक पहुंचाया जाता था। वहां से उन्हें आगे ईरान भेजा जाता था। अधिकारियों का मानना है कि इस तरीके का इस्तेमाल वास्तविक खरीदारों और अंतिम उपयोगकर्ताओं की पहचान छिपाने के लिए किया गया। ऑनलाइन खरीदारी से शुरू हुआ ऑपरेशन जांच में सामने आया है कि शुरुआती दौर में कथित तौर पर ऑनलाइन प्लेटफॉर्म और डिजिटल भुगतान सेवाओं के माध्यम से बड़ी मात्रा में तकनीकी उपकरण खरीदे गए। बाद में अमेरिकी सप्लायरों से सीधे खरीदारी की गई और कई कंपनियों का उपयोग कर लेनदेन की वास्तविक प्रकृति को छिपाने का प्रयास किया गया। भारी मात्रा में हार्डवेयर भेजने का दावा संघीय जांच एजेंसियों का आरोप है कि कई वर्षों के दौरान बड़ी मात्रा में तकनीकी हार्डवेयर दुबई के रास्ते ईरान पहुंचाया गया। जांचकर्ताओं के अनुसार, शिपिंग रिकॉर्ड और दस्तावेजों में कथित रूप से गलत जानकारी दर्ज कर अंतिम गंतव्य को छिपाया गया। रक्षा और परमाणु संस्थानों तक पहुंचे उपकरण अदालती दस्तावेजों में दावा किया गया है कि भेजे गए कुछ उपकरण ईरान के परमाणु और रक्षा क्षेत्र से जुड़े संगठनों तक पहुंचे। अभियोजकों के अनुसार, इन संस्थाओं को नेटवर्किंग, संचार और एन्क्रिप्शन तकनीक उपलब्ध कराई गई हो सकती है। इन आरोपों की पुष्टि न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही होगी। पैसों के लेनदेन की भी जांच अमेरिकी एजेंसियां इस मामले से जुड़े वित्तीय लेनदेन की भी जांच कर रही हैं। आरोप है कि धन के प्रवाह को छिपाने के लिए शेल कंपनियों, जटिल कारोबारी संरचनाओं और कथित फर्जी दस्तावेजों का उपयोग किया गया। साथ ही आय और कारोबारी गतिविधियों से जुड़ी जानकारी को लेकर भी जांच जारी है। राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा गंभीर मामला अमेरिकी न्याय विभाग ने इस मामले को राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा विषय बताया है। विभाग का कहना है कि संवेदनशील तकनीक को प्रतिबंधित देशों तक पहुंचने से रोकना उसकी प्राथमिकता है। अधिकारियों ने संकेत दिया है कि ऐसे मामलों में आगे भी सख्त कार्रवाई की जाएगी। अदालत में साबित होंगे आरोप जमशीद घोमी के खिलाफ आरोपों की जांच और कानूनी प्रक्रिया जारी है। यदि अदालत में आरोप सिद्ध हो जाते हैं, तो उन्हें अमेरिकी संघीय कानूनों के तहत लंबी जेल की सजा हो सकती है। कानूनी सिद्धांतों के अनुसार अदालत में दोष साबित होने तक उन्हें निर्दोष माना जाएगा।
कोलकाता, एजेंसियां। पश्चिम बंगाल सरकार ने भारत-बांग्लादेश सीमा की सुरक्षा को और मजबूत बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। राज्य सरकार ने सीमा पर बाड़ लगाने और सुरक्षा ढांचे को सुदृढ़ करने के लिए सीमा सुरक्षा बल (BSF) को लगभग 32 एकड़ जमीन सौंप दी है। यह फैसला लंबे समय से लंबित था और अब राज्य कैबिनेट की मंजूरी के बाद इसे अमल में लाया जा रहा है। राज्य के पंचायत मंत्री दिलीप घोष ने कैबिनेट बैठक के बाद जानकारी देते हुए बताया कि बांग्लादेश सीमा से सटे विभिन्न इलाकों में स्थायी सीमा चौकियों और बाड़बंदी के निर्माण के लिए कुल 31.905 एकड़ भूमि बीएसएफ को हस्तांतरित की गई है। यह जमीन नौ अलग-अलग स्थानों पर स्थित है और इसका उपयोग सीमा सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने में किया जाएगा। मालदा, मुर्शिदाबाद और कूचबिहार में भी बनेगी नई चौकियां सरकार ने इसके अलावा मालदा, मुर्शिदाबाद और कूचबिहार जिलों में 1.53 एकड़ अतिरिक्त भूमि देने के प्रस्ताव को भी मंजूरी दी है। इस जमीन पर तीन नई स्थायी सीमा चौकियां बनाई जाएंगी। वहीं उत्तर दिनाजपुर जिले में 11 स्थानों पर 12.72 एकड़ भूमि उपलब्ध कराने का प्रस्ताव भी रखा गया है, जिससे सीमा पर बाड़ लगाने के कार्य में तेजी आएगी। हाईकोर्ट ने जताई थी नाराजगी सीमा सुरक्षा से जुड़ा यह मुद्दा लंबे समय से विवाद का विषय बना हुआ था। इससे पहले कलकत्ता हाईकोर्ट ने अंतरराष्ट्रीय सीमा पर बाड़बंदी के लिए भूमि हस्तांतरण में हो रही देरी पर राज्य सरकार की आलोचना की थी। अदालत ने सीमा सुरक्षा के महत्व को देखते हुए प्रक्रिया में तेजी लाने की जरूरत बताई थी। रेल परियोजना को भी मिली राहत कैबिनेट बैठक में एक अन्य महत्वपूर्ण निर्णय लेते हुए जलपाईगुड़ी जिले के नागराकाटा क्षेत्र में 20 एकड़ सरकारी जमीन वन विभाग को सौंपने का फैसला लिया गया। बाद में यह भूमि सेवक-रंगपो रेलवे लाइन परियोजना के लिए उपयोग की जाएगी। सरकार के इस फैसले को सीमा सुरक्षा, अवैध घुसपैठ रोकने और बुनियादी ढांचे के विकास की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है। इससे सीमा क्षेत्रों में निगरानी और सुरक्षा व्यवस्था को नई मजबूती मिलने की उम्मीद है।
पहलगाम आतंकी हमले की जांच में सुरक्षा एजेंसियों के हाथ एक महत्वपूर्ण सुराग लगा है, जिसने हमले के संभावित अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क की ओर संकेत किया है। राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) और जम्मू-कश्मीर पुलिस की जांच में पता चला है कि आतंकियों के पास से बरामद दो मोबाइल फोन पाकिस्तान में आयात की गई खेप का हिस्सा थे। हैरानी की बात यह है कि दोनों उपकरण वर्षों तक निष्क्रिय रहे और हमले से ठीक पहले सक्रिय किए गए। 22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम स्थित बैसरन घाटी में हुए आतंकी हमले में 26 लोगों की जान गई थी। इसके बाद शुरू हुई जांच के दौरान सुरक्षा बलों ने जुलाई 2025 में दाचीगाम के मुलनार महादेव क्षेत्र में मुठभेड़ में तीन आतंकियों को मार गिराया। मारे गए आतंकियों के पास से दो शाओमी रेडमी सीरीज के मोबाइल फोन बरामद हुए थे। पाकिस्तान से आयातित खेप का हिस्सा था मोबाइल जांच में सामने आया कि बरामद रेडमी 9टी मोबाइल वर्ष 2021 में पाकिस्तान पहुंची एक आयातित खेप का हिस्सा था। तकनीकी विश्लेषण से पता चला कि फोन पाकिस्तान पहुंचने के बाद कभी इस्तेमाल नहीं किया गया और पहली बार हमले की तैयारी के दौरान सक्रिय हुआ। दूसरा फोन, रेडमी नोट 12, भी पाकिस्तान से आयातित था और उसके उपयोग का पैटर्न भी लगभग समान पाया गया। जांच अधिकारियों का मानना है कि दोनों मोबाइल फोन विशेष उद्देश्य के लिए सुरक्षित रखे गए थे और बाद में आतंकियों तक पहुंचाए गए। मोबाइल में मिले नक्शे और तस्वीरें फोन से कोई कॉल रिकॉर्ड, चैट या संदेश बरामद नहीं हुए हैं, लेकिन जांचकर्ताओं को इनमें पहलगाम और उसके आसपास के क्षेत्रों के नक्शे तथा कई तस्वीरें मिली हैं। एक तस्वीर 30 मार्च 2025 की बताई जा रही है, जिससे संकेत मिलता है कि हमलावर घटना से कई सप्ताह पहले इलाके में डेरा डाले हुए थे। तस्वीरों में एक अस्थायी टेंट और अन्य सामान भी दिखाई दे रहे हैं, जिससे सुरक्षा एजेंसियों को हमले की पूर्व तैयारी के संबंध में अहम संकेत मिले हैं। आतंकियों ने अपनाई थी वैकल्पिक संचार प्रणाली प्रारंभिक जांच के अनुसार, आतंकी मोबाइल नेटवर्क या इंटरनेट आधारित संचार पर निर्भर नहीं थे। अधिकारियों का मानना है कि वे लंबी दूरी की रेडियो संचार प्रणाली का इस्तेमाल कर रहे थे, जिससे उनकी गतिविधियां डिजिटल निगरानी से काफी हद तक बची रहीं। जांच को मिली नई दिशा मोबाइल फोन की उत्पत्ति, उनका वर्षों तक निष्क्रिय रहना और फिर हमले से ठीक पहले सक्रिय होना जांच एजेंसियों के लिए महत्वपूर्ण कड़ी बन गया है। एनआईए और जम्मू-कश्मीर पुलिस अब यह पता लगाने में जुटी हैं कि ये उपकरण पाकिस्तान से आतंकियों तक कैसे पहुंचे और हमले की साजिश में उनकी क्या भूमिका रही। सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि इन डिजिटल सबूतों से हमले के पूरे नेटवर्क, उसके संचालकों और सीमा पार मौजूद संभावित समर्थन तंत्र तक पहुंचने में मदद मिल सकती है। जांच अधिकारियों का मानना है कि दोनों मोबाइल फोन विशेष उद्देश्य के लिए सुरक्षित रखे गए थे और बाद में आतंकियों तक पहुंचाए गए। मोबाइल में मिले नक्शे और तस्वीरें फोन से कोई कॉल रिकॉर्ड, चैट या संदेश बरामद नहीं हुए हैं, लेकिन जांचकर्ताओं को इनमें पहलगाम और उसके आसपास के क्षेत्रों के नक्शे तथा कई तस्वीरें मिली हैं। एक तस्वीर 30 मार्च 2025 की बताई जा रही है, जिससे संकेत मिलता है कि हमलावर घटना से कई सप्ताह पहले इलाके में डेरा डाले हुए थे। तस्वीरों में एक अस्थायी टेंट और अन्य सामान भी दिखाई दे रहे हैं, जिससे सुरक्षा एजेंसियों को हमले की पूर्व तैयारी के संबंध में अहम संकेत मिले हैं। आतंकियों ने अपनाई थी वैकल्पिक संचार प्रणाली प्रारंभिक जांच के अनुसार, आतंकी मोबाइल नेटवर्क या इंटरनेट आधारित संचार पर निर्भर नहीं थे। अधिकारियों का मानना है कि वे लंबी दूरी की रेडियो संचार प्रणाली का इस्तेमाल कर रहे थे, जिससे उनकी गतिविधियां डिजिटल निगरानी से काफी हद तक बची रहीं। जांच को मिली नई दिशा मोबाइल फोन की उत्पत्ति, उनका वर्षों तक निष्क्रिय रहना और फिर हमले से ठीक पहले सक्रिय होना जांच एजेंसियों के लिए महत्वपूर्ण कड़ी बन गया है। एनआईए और जम्मू-कश्मीर पुलिस अब यह पता लगाने में जुटी हैं कि ये उपकरण पाकिस्तान से आतंकियों तक कैसे पहुंचे और हमले की साजिश में उनकी क्या भूमिका रही। सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि इन डिजिटल सबूतों से हमले के पूरे नेटवर्क, उसके संचालकों और सीमा पार मौजूद संभावित समर्थन तंत्र तक पहुंचने में मदद मिल सकती है।
भारतीय नौसेना के 27वें प्रमुख के रूप में कार्यभार संभालने के बाद एडमिरल कृष्णा स्वामीनाथन ने कहा कि देश की सुरक्षा और समुद्री हितों की रक्षा उनकी सर्वोच्च प्राथमिकता होगी। उन्होंने कहा कि बदलते क्षेत्रीय सुरक्षा परिदृश्य के बीच नौसेना की युद्धक क्षमता को मजबूत बनाए रखने और तकनीकी आधुनिकीकरण को गति देने पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। एडमिरल स्वामीनाथन ने 31 मई को सेवानिवृत्त हुए एडमिरल Dinesh Kumar Tripathi का स्थान लिया। इससे पहले वह भारतीय नौसेना की पश्चिमी कमान के फ्लैग ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ के रूप में सेवाएं दे रहे थे। चार दशक का समृद्ध नौसैनिक अनुभव 1 जुलाई 1987 को भारतीय नौसेना में कमीशन प्राप्त करने वाले एडमिरल स्वामीनाथन कम्युनिकेशन और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर के विशेषज्ञ माने जाते हैं। लगभग चार दशक लंबे करियर में उन्होंने आईएनएस विद्युत, आईएनएस विनाश, आईएनएस कुलिश और विमानवाहक पोत आईएनएस विक्रमादित्य समेत कई महत्वपूर्ण युद्धपोतों की कमान संभाली है। नौसेना के आधुनिकीकरण पर रहेगा जोर पदभार ग्रहण करने के बाद मीडिया से बातचीत में उन्होंने कहा कि भारतीय नौसेना का नेतृत्व करना उनके लिए अत्यंत गौरव और जिम्मेदारी का विषय है। उन्होंने कहा कि मौजूदा क्षेत्रीय सुरक्षा वातावरण लगातार जटिल, चुनौतीपूर्ण और अप्रत्याशित होता जा रहा है, ऐसे में नौसेना को तकनीकी रूप से और अधिक सक्षम बनाना समय की आवश्यकता है। युद्धक क्षमता बनाए रखना प्राथमिक लक्ष्य एडमिरल स्वामीनाथन ने कहा कि उनकी सबसे बड़ी प्राथमिकता यह सुनिश्चित करना होगी कि भारतीय नौसेना हर परिस्थिति में देश की सुरक्षा और आर्थिक हितों की रक्षा करने में सक्षम रहे। उन्होंने कहा कि नौसेना अपनी परिचालन तैयारियों और युद्धक क्षमता को सर्वोच्च स्तर पर बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने एक बड़ी कार्रवाई करते हुए पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई और मुंबई अंडरवर्ल्ड से जुड़े एक संदिग्ध आतंकी मॉड्यूल का भंडाफोड़ किया है। इस अभियान के दौरान नौ संदिग्धों को गिरफ्तार किया गया है। पुलिस के अनुसार, आरोपियों के पास से हथियार और विस्फोटक सामग्री भी बरामद की गई है। यह कार्रवाई लंबे समय से चल रही खुफिया निगरानी और जांच के आधार पर की गई। महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों को निशाना बनाने की थी साजिश प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि गिरफ्तार आरोपी कथित तौर पर आईएसआई और अंडरवर्ल्ड से जुड़े तत्वों के निर्देश पर काम कर रहे थे। पुलिस के अनुसार, उनका मकसद राष्ट्रीय राजधानी में महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों और सुरक्षा से जुड़े ठिकानों को निशाना बनाना था। पूछताछ में यह भी जानकारी मिली है कि संदिग्ध पावर प्लांट, न्यूक्लियर प्लांट, बिजली घर, एयरपोर्ट और रेलवे स्टेशनों जैसे संवेदनशील स्थानों पर हमले की योजना बना रहे थे। खुफिया सूचना के बाद चला विशेष अभियान अधिकारियों ने बताया कि इस मॉड्यूल की गतिविधियों पर काफी समय से नजर रखी जा रही थी। संदिग्धों के नेटवर्क, संपर्कों और गतिविधियों के बारे में जानकारी जुटाने के बाद एक समन्वित अभियान चलाया गया, जिसके तहत सभी आरोपियों को गिरफ्तार किया गया। पुलिस का मानना है कि समय रहते की गई इस कार्रवाई से एक बड़ी साजिश को नाकाम कर दिया गया। नेटवर्क और फंडिंग की जांच जारी गिरफ्तार आरोपियों से लगातार पूछताछ की जा रही है। जांच एजेंसियां उनके पूरे नेटवर्क, अन्य सहयोगियों, फंडिंग स्रोतों और बरामद हथियारों व विस्फोटकों की सप्लाई चेन का पता लगाने में जुटी हैं। साथ ही विदेश में बैठे कथित संचालकों और सीमा पार कनेक्शन की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां सतर्क इस कार्रवाई को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। पुलिस और अन्य सुरक्षा एजेंसियां मामले की गहराई से जांच कर रही हैं ताकि किसी भी संभावित खतरे को पूरी तरह समाप्त किया जा सके और नेटवर्क से जुड़े अन्य लोगों की पहचान की जा सके।
अमेरिकी सेना ने पूर्वी प्रशांत महासागर में नशीले पदार्थों की तस्करी में कथित रूप से शामिल एक नाव पर हमला किया है। इस कार्रवाई में तीन लोगों की मौत हो गई। अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, इस सप्ताह ड्रग्स तस्करी के खिलाफ यह तीसरा सैन्य अभियान है। हालिया कार्रवाई के बाद इन अभियानों में मारे गए लोगों की कुल संख्या 200 के पार पहुंच गई है। ड्रग्स विरोधी अभियान के तहत हुई कार्रवाई अमेरिकी सेना की United States Southern Command (यूएस सदर्न कमांड) ने बताया कि यह कार्रवाई कैरिबियन सागर और पूर्वी प्रशांत महासागर में चल रहे व्यापक ड्रग्स विरोधी अभियान का हिस्सा थी। सेना का दावा है कि जिस नाव को निशाना बनाया गया, उसका इस्तेमाल नशीले पदार्थों की तस्करी के लिए किया जा रहा था। अधिकारियों ने यह भी कहा कि नाव का संचालन एक घोषित आतंकवादी संगठन से जुड़े तत्व कर रहे थे, इस दावे के समर्थन में कोई स्वतंत्र सबूत सार्वजनिक नहीं किया गया है। हमले का वीडियो भी किया गया जारी अमेरिकी सेना ने हमले का वीडियो भी जारी किया है। वीडियो में समुद्र में चल रही एक छोटी नाव दिखाई देती है, जिस पर मिसाइल या अन्य हथियार से हमला किया जाता है। हमले के बाद नाव आग के गोले में तब्दील होती नजर आती है। वीडियो के अगले हिस्से में जलती हुई नाव और उसके आसपास पानी में तैरते पैकेट दिखाई देते हैं। माना जा रहा है कि ये पैकेट तस्करी से जुड़े सामान या नशीले पदार्थ हो सकते हैं। सितंबर से जारी है सैन्य अभियान अमेरिकी सैन्य अधिकारियों के मुताबिक, सितंबर की शुरुआत से ड्रग्स तस्करी के खिलाफ लगातार अभियान चलाया जा रहा है। शुक्रवार की कार्रवाई के बाद इस अभियान में मारे गए लोगों की संख्या 202 तक पहुंच गई है। इससे पहले मंगलवार और बुधवार को भी दो अलग-अलग अभियानों में तस्करी से जुड़े जहाजों को निशाना बनाया गया था। ट्रंप प्रशासन का सख्त रुख Donald Trump प्रशासन ने हाल के महीनों में लैटिन अमेरिकी ड्रग कार्टेल के खिलाफ सख्त रुख अपनाया है। प्रशासन का कहना है कि अमेरिका में अवैध मादक पदार्थों की आपूर्ति के पीछे संगठित ड्रग कार्टेल की बड़ी भूमिका है और उनसे निपटने के लिए सैन्य कार्रवाई भी जरूरी हो सकती है। अमेरिकी अधिकारियों ने इन अभियानों को राष्ट्रीय सुरक्षा और मादक पदार्थों की तस्करी रोकने की रणनीति का हिस्सा बताया है। क्यूबा के अधिकारियों से भी हुई मुलाकात यूएस सदर्न कमांड ने बताया कि यह कार्रवाई लैटिन अमेरिका क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य कमांडर General Francis L. Donovan के निर्देश पर की गई। इसी दिन जनरल डोनोवन ने Guantanamo Bay Naval Base के पास क्यूबा के सैन्य अधिकारियों से भी मुलाकात की। बैठक में किन मुद्दों पर चर्चा हुई, इसकी विस्तृत जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई है। अभियानों पर उठ रहे सवाल ड्रग्स तस्करी के खिलाफ अमेरिकी कार्रवाई को लेकर समर्थन और आलोचना दोनों देखने को मिल रही है। समर्थकों का कहना है कि इससे अंतरराष्ट्रीय तस्करी नेटवर्क पर दबाव बढ़ेगा, जबकि आलोचकों का मानना है कि ऐसे अभियानों में पारदर्शिता और स्वतंत्र जांच की जरूरत है, खासकर तब जब सैन्य कार्रवाई में लोगों की जान जा रही हो।
Donald Trump और Xi Jinping के बीच हालिया बातचीत और रिश्तों में नरमी की चर्चाओं के बीच अमेरिका में चीन के खिलाफ बड़ा कदम उठाया गया है। अमेरिकी संसद में एक नया विधेयक पेश किया गया है, जिसका मकसद चीन की सेना और चीनी कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़ी कंपनियों पर तेजी से प्रतिबंध लगाना है। इस कदम को अमेरिका की चीन के खिलाफ रणनीतिक और आर्थिक सख्ती के रूप में देखा जा रहा है। क्या है CCP Sanctions Shot Clock Act? अमेरिका में रिपब्लिकन सांसद Rick Scott और Elise Stefanik ने ‘CCP Sanctions Shot Clock Act’ नाम का विधेयक पेश किया है। इस कानून के तहत अमेरिकी ट्रेजरी विभाग को उन चीनी कंपनियों और व्यक्तियों पर एक साल के भीतर कार्रवाई करनी होगी, जिन्हें अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा माना गया है। यह विधेयक वित्त वर्ष 2026 के National Defense Authorization Act में संशोधन के रूप में लाया गया है। अब तय समय सीमा में लगेगा बैन मौजूदा व्यवस्था में अमेरिकी राष्ट्रपति हर दो साल में उन चीनी कंपनियों और नागरिकों की रिपोर्ट जारी करते हैं, जिन्हें चीन के सैन्य-औद्योगिक नेटवर्क से जुड़ा माना जाता है। लेकिन अभी तक अमेरिकी ट्रेजरी विभाग पर इन संस्थाओं को प्रतिबंधित सूची में डालने की कोई तय समय सीमा नहीं थी। नए प्रस्ताव के अनुसार, राष्ट्रपति की रिपोर्ट आने के बाद ट्रेजरी विभाग को एक साल के भीतर संबंधित कंपनियों और व्यक्तियों को “Non-SDN Chinese Military-Industrial Complex Companies List” में शामिल करना होगा। इसके बाद इस सूची को आधिकारिक रूप से फेडरल रजिस्टर में प्रकाशित किया जाएगा। “कम्युनिस्ट चीन हमारा दुश्मन” सीनेटर रिक स्कॉट ने चीन पर बेहद सख्त बयान दिया। उन्होंने कहा कि चीन की कम्युनिस्ट पार्टी अमेरिका के लिए सीधा खतरा है और अब कार्रवाई में देरी नहीं होनी चाहिए। उन्होंने कहा, “जो संस्थाएं चीनी सैन्य हितों के लिए काम कर रही हैं, उन्हें अमेरिका में कारोबार करने की अनुमति नहीं मिलनी चाहिए। कम्युनिस्ट चीन हमारा दुश्मन है और अब उसी हिसाब से कार्रवाई का समय आ गया है।” चीन पर आर्थिक निर्भरता घटाने की रणनीति एलिस स्टेफानिक ने कहा कि यह कानून रिपब्लिकन पार्टी की उस बड़ी रणनीति का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य चीन से जुड़ी आर्थिक निर्भरता कम करना है। उन्होंने कहा कि चीन के सैन्य विस्तार और दुर्भावनापूर्ण गतिविधियों से जुड़ी कंपनियों के खिलाफ अमेरिका को तेजी से कार्रवाई करनी होगी। स्टेफानिक के मुताबिक, कांग्रेस पहले ही प्रशासन से ऐसी चीनी कंपनियों की रिपोर्ट मांग चुकी है, लेकिन कार्रवाई की रफ्तार धीमी रही। नया कानून इसी प्रक्रिया को तेज करने के लिए लाया गया है। ट्रंप-शी रिश्तों पर पड़ सकता है असर यह विधेयक ऐसे समय पेश किया गया है जब हाल ही में ट्रंप और शी जिनपिंग के बीच रिश्तों में सुधार की चर्चाएं हो रही थीं। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह कानून पास होता है, तो अमेरिका-चीन संबंधों में फिर तनाव बढ़ सकता है। खासकर तकनीक, रक्षा, चिप निर्माण और वैश्विक व्यापार से जुड़ी चीनी कंपनियों पर इसका बड़ा असर पड़ सकता है। वैश्विक बाजार पर भी दिख सकता है असर अमेरिका और चीन दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाएं हैं। ऐसे में दोनों देशों के बीच बढ़ती सख्ती का असर वैश्विक बाजार, सप्लाई चेन और निवेश माहौल पर भी पड़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले महीनों में अमेरिका चीन की सैन्य और टेक कंपनियों पर और ज्यादा आर्थिक दबाव बना सकता है, जिससे दोनों देशों के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा और तेज होने की संभावना है।
नागपुर स्थित Rashtriya Swayamsevak Sangh (RSS) मुख्यालय और हेडगेवार स्मृति मंदिर परिसर की कथित रेकी मामले में सुनवाई के दौरान कई अहम खुलासे हुए हैं। विशेष सत्र न्यायालय में पेश गवाही के अनुसार आरोपी रईस अहमद शेख को इस कथित साजिश के लिए विदेशी फंडिंग मिली थी और उसकी फ्लाइट टिकट अमेरिकी डॉलर में बुक कराई गई थी। मामले में यह जानकारी IndiGo एयरलाइंस की तत्कालीन एयरपोर्ट मैनेजर चारू वर्मा की गवाही के दौरान सामने आई। डॉलर में बुक हुआ था फ्लाइट टिकट अदालत में दी गई गवाही के मुताबिक, आरोपी रईस शेख की यात्रा के लिए इंडिगो फ्लाइट का भुगतान अमेरिकी डॉलर में किया गया था। इसके लिए “वर्डपे कार्ड” का इस्तेमाल हुआ था। जांच एजेंसियों के अनुसार, यह विदेशी फंडिंग से जुड़े संभावित नेटवर्क की ओर इशारा करता है। सरकारी पक्ष का दावा है कि रईस शेख एक प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन का सक्रिय सदस्य है और संगठन के निर्देश पर ही नागपुर पहुंचा था। श्रीनगर से मुंबई होते हुए पहुंचा नागपुर जांच के अनुसार, रईस शेख 13 जुलाई 2021 को श्रीनगर से मुंबई होते हुए नागपुर पहुंचा था। वहां उसने RSS मुख्यालय और हेडगेवार स्मृति मंदिर परिसर की कथित रेकी की। इसके बाद वह 15 जुलाई 2021 को नागपुर से दिल्ली होते हुए वापस श्रीनगर लौट गया था। कश्मीर पुलिस की पूछताछ में हुआ खुलासा सितंबर 2021 में कश्मीर पुलिस ने संदिग्ध गतिविधियों के आधार पर रईस शेख को हिरासत में लेकर पूछताछ की थी। अधिकारियों के मुताबिक, पूछताछ के दौरान उसने नागपुर में रेकी करने की बात कबूल की, जिसके बाद पूरी साजिश का खुलासा हुआ। मामले की जानकारी सामने आने के बाद Maharashtra Anti Terrorism Squad (ATS) ने उसे कश्मीर से गिरफ्तार कर ट्रांजिट रिमांड पर नागपुर लाया था। जमानत याचिकाएं बार-बार खारिज फिलहाल आरोपी नागपुर सेंट्रल जेल में बंद है। सुनवाई के दौरान उसकी पेशी वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए कराई गई। रईस शेख ने कई बार जमानत की मांग की, लेकिन अदालत ने अपराध की गंभीरता को देखते हुए उसकी सभी जमानत याचिकाएं खारिज कर दीं। जांच एजेंसियों के पास ‘पुख्ता सबूत’ सरकारी वकील ने अदालत को बताया कि जांच एजेंसियों के पास आरोपी के आतंकवादी संगठन से संबंधों और कथित गतिविधियों से जुड़े ठोस सबूत मौजूद हैं। मामले की जांच अभी भी जारी है और सुरक्षा एजेंसियां विदेशी फंडिंग नेटवर्क समेत कई पहलुओं की जांच कर रही हैं।
Operation Sindoor: ऑपरेशन सिंदूर के एक साल पूरे होने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारतीय सेना की बहादुरी और देश की आतंकवाद विरोधी नीति की सराहना की है. पीएम मोदी ने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर आतंकवाद के खिलाफ भारत के सख्त रुख, मजबूत इच्छाशक्ति और राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रति अटूट प्रतिबद्धता का प्रतीक है. प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत आतंकवाद और उसे समर्थन देने वाले नेटवर्क के खिलाफ अपनी लड़ाई में पूरी तरह अडिग है. उन्होंने कहा कि देश की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है और भारत हर आतंकी चुनौती का मुंहतोड़ जवाब देने में सक्षम है. भारतीय सेना के शौर्य को किया सलाम पीएम मोदी ने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय सशस्त्र बलों ने अद्भुत साहस, सटीक रणनीति और मजबूत समन्वय का परिचय दिया. उन्होंने पहलगाम आतंकी हमले का जिक्र करते हुए कहा कि निर्दोष नागरिकों की हत्या करने वालों को भारतीय सुरक्षा बलों ने करारा जवाब दिया. प्रधानमंत्री ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर लिखा कि पूरा देश भारतीय जवानों की वीरता और समर्पण को सलाम करता है. उन्होंने कहा कि इस अभियान ने दुनिया को भारतीय सेना की तैयारी, पेशेवर क्षमता और तीनों सेनाओं के मजबूत तालमेल की ताकत दिखायी. आत्मनिर्भर भारत की ताकत भी दिखी पीएम मोदी ने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर ने रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर भारत की बढ़ती क्षमता को भी सामने रखा. उन्होंने कहा कि आधुनिक सैन्य तकनीक, स्वदेशी रक्षा उपकरण और बेहतर समन्वय ने इस अभियान को सफल बनाने में अहम भूमिका निभायी. उन्होंने यह भी कहा कि भारतीय सुरक्षा बलों के बीच बढ़ती एकजुटता और सामरिक क्षमता आज देश की सबसे बड़ी ताकत बन चुकी है. क्यों शुरू किया गया था ऑपरेशन सिंदूर? ऑपरेशन सिंदूर भारतीय सेना, वायुसेना, नौसेना और सीमा सुरक्षा बल (BSF) द्वारा संयुक्त रूप से चलाया गया सैन्य अभियान था. यह ऑपरेशन 7 मई से 10 मई 2025 के बीच पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (POK) में आतंकवादी ठिकानों और सैन्य अड्डों को निशाना बनाकर अंजाम दिया गया था. यह कार्रवाई 22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले के जवाब में की गयी थी. उस हमले में 26 लोगों की मौत हुई थी, जिनमें ज्यादातर पर्यटक शामिल थे. आतंकवाद के खिलाफ भारत का संदेश प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर ने दुनिया को साफ संदेश दिया कि भारत अपनी संप्रभुता और नागरिकों की सुरक्षा से कोई समझौता नहीं करेगा. उन्होंने कहा कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में भारत पूरी मजबूती और दृढ़ता के साथ आगे बढ़ता रहेगा.
वेनेजुएला के राष्ट्रपति मादुरो को पकड़ने वाले मिशन से जुड़ा मामला अमेरिका के एक स्पेशल फोर्सेज सैनिक पर बेहद गंभीर आरोप लगे हैं। अभियोजन पक्ष के अनुसार, सैनिक ने वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को पकड़ने के गुप्त सैन्य अभियान से जुड़ी संवेदनशील जानकारी का इस्तेमाल कर ऑनलाइन सट्टेबाजी में 4 लाख डॉलर से अधिक की कमाई की। आरोपी की पहचान 38 वर्षीय गैनन केन वैन डाइक के रूप में हुई है। Polymarket पर लगाए सटीक दांव अधिकारियों के मुताबिक, वैन डाइक ने दिसंबर 2025 के अंत में prediction market प्लेटफॉर्म Polymarket पर अकाउंट बनाया। उन्होंने ऐसे सवालों पर करीब 13 दांव लगाए, जिनमें शामिल थे: क्या अमेरिकी सेना वेनेजुएला में मौजूद होगी? क्या 31 जनवरी 2026 तक मादुरो सत्ता से बाहर होंगे? गोपनीय जानकारी की बदौलत उनके सभी दांव बेहद सटीक साबित हुए। 4 लाख डॉलर से ज्यादा की कमाई अमेरिकी अभियोजकों का कहना है कि इन दांवों से वैन डाइक ने 400,000 डॉलर से अधिक का मुनाफा कमाया। ऑपरेशन के बाद उन्होंने कथित तौर पर: रकम का बड़ा हिस्सा विदेशी क्रिप्टो वॉल्ट में ट्रांसफर किया नया ब्रोकरेज अकाउंट खोला Polymarket से अपना अकाउंट डिलीट करने का अनुरोध भी किया यह कदम जांच एजेंसियों के शक को और मजबूत करता है। कौन-कौन से आरोप लगे? वैन डाइक पर कई गंभीर संघीय आरोप लगाए गए हैं, जिनमें शामिल हैं: गोपनीय सरकारी जानकारी का निजी लाभ के लिए उपयोग गैर-सार्वजनिक सरकारी सूचना की चोरी कमोडिटीज फ्रॉड वायर फ्रॉड अवैध वित्तीय लेनदेन दोष सिद्ध होने पर उन्हें कई वर्षों की जेल हो सकती है। FBI ने क्या कहा? FBI निदेशक ने इस मामले को बेहद गंभीर बताते हुए कहा कि एक सैनिक ने अपनी जिम्मेदारी का दुरुपयोग कर राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी जानकारी से निजी लाभ कमाने की कोशिश की। Polymarket ने खुद दी सूचना Polymarket ने बयान जारी कर कहा कि प्लेटफॉर्म पर संदिग्ध ट्रेडिंग गतिविधि पकड़ी गई थी। कंपनी ने तुरंत अमेरिकी न्याय विभाग को इसकी सूचना दी और जांच में पूरा सहयोग किया। "इनसाइडर ट्रेडिंग के लिए Polymarket में कोई जगह नहीं है।" सेना में ऊंचा पद संभाल रहे थे आरोपी वैन डाइक 2008 में अमेरिकी सेना में शामिल हुए थे और 2023 में मास्टर सार्जेंट बने थे। वे नॉर्थ कैरोलिना के फोर्ट ब्रैग में तैनात स्पेशल फोर्सेज समुदाय का हिस्सा थे। Prediction Markets पर बढ़ रही निगरानी हाल के महीनों में prediction markets को लेकर अमेरिकी नियामकों और कांग्रेस की चिंता बढ़ी है। यह मामला इस बात का बड़ा उदाहरण बन सकता है कि संवेदनशील सरकारी जानकारी का गलत इस्तेमाल किस तरह वित्तीय अपराध में बदल सकता है।
हाई-टेक वैज्ञानिकों की संदिग्ध मौतों से बढ़ी चिंता दुनिया की दो महाशक्तियों–अमेरिका और चीन–में रक्षा और तकनीकी क्षेत्र से जुड़े शीर्ष वैज्ञानिकों की रहस्यमयी मौतों और लापता होने की घटनाओं ने सुरक्षा एजेंसियों को सतर्क कर दिया है। ये वैज्ञानिक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, हाइपरसोनिक हथियार, न्यूक्लियर रिसर्च और स्पेस डिफेंस जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में काम कर रहे थे। रिपोर्ट्स के मुताबिक, इन घटनाओं ने अब राजनीतिक हलकों में भी बहस को जन्म दे दिया है। अमेरिका में 11 संदिग्ध घटनाओं की जांच वॉशिंगटन में कम से कम 11 मामलों की जांच चल रही है, जिनमें वैज्ञानिक या तो लापता हुए हैं या संदिग्ध परिस्थितियों में मृत पाए गए हैं। ये सभी मामले न्यूक्लियर टेक्नोलॉजी, स्पेस रिसर्च और एडवांस्ड हथियारों से जुड़े हैं। अमेरिकी राजनीतिक गलियारों में भी यह मुद्दा चर्चा का विषय बन गया है। कुछ नेताओं ने इसे संभावित “विदेशी ऑपरेशन” तक बताया है, हालांकि अब तक कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। एफबीआई (FBI) ने इन सभी मामलों की जांच शुरू कर दी है। चीन में भी लगातार हो रही वैज्ञानिकों की मौतें दूसरी ओर, चीन और अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार पिछले कुछ वर्षों में कम से कम 9 वैज्ञानिकों की मौतें संदिग्ध परिस्थितियों में हुई हैं। इनमें से कई मामले सड़क दुर्घटना, अचानक बीमारी या अस्पष्ट कारणों से जुड़े बताए गए हैं। इन वैज्ञानिकों की उम्र 26 से 68 वर्ष के बीच बताई गई है और वे सभी अत्याधुनिक सैन्य तकनीक से जुड़े प्रोजेक्ट्स पर काम कर रहे थे। “टॉप साइंटिस्ट गायब हो रहे हैं” – राजनीतिक बयानबाजी तेज अमेरिका में इस मुद्दे पर राजनीतिक बयान भी सामने आए हैं। रिपब्लिकन सांसद एरिक बर्लिसन ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा कि अमेरिका, चीन, रूस और ईरान जैसे देशों के बीच तकनीकी प्रतिस्पर्धा के बीच यह घटनाएं चिंता बढ़ाने वाली हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी इस मामले को “गंभीर” बताया है, हालांकि उन्होंने यह संभावना भी जताई कि यह महज संयोग हो सकता है। चीन के वैज्ञानिक की मौत पर उठे सवाल सबसे चर्चित मामलों में एक नाम फेंग यांगहे का है, जो चीन की नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ डिफेंस टेक्नोलॉजी में प्रोफेसर थे। उनकी मौत 2023 में बीजिंग में एक कार दुर्घटना में हुई बताई गई। रिपोर्ट्स के अनुसार, वह ताइवान से जुड़े सैन्य परिदृश्यों की AI सिमुलेशन पर काम कर रहे थे और देर रात एक बैठक से लौटते समय उनकी कार दुर्घटनाग्रस्त हो गई थी। संवेदनशील तकनीकी क्षेत्रों में काम करने वाले वैज्ञानिक अधिक प्रभावित विशेषज्ञों के अनुसार, जिन वैज्ञानिकों की मौत या लापता होने की घटनाएं सामने आई हैं, वे मुख्य रूप से इन क्षेत्रों से जुड़े थे: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और सैन्य सिमुलेशन हाइपरसोनिक हथियार तकनीक ड्रोन और स्वॉर्म टेक्नोलॉजी न्यूक्लियर और स्पेस डिफेंस रिसर्च हालांकि विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि कुछ मामले दुर्घटनाओं या प्राकृतिक कारणों से जुड़े हो सकते हैं। क्या यह सिर्फ संयोग या किसी बड़ी साजिश का हिस्सा? इन घटनाओं को लेकर सोशल मीडिया और विश्लेषकों के बीच कई तरह की अटकलें चल रही हैं। कुछ लोग इसे महज संयोग बता रहे हैं, जबकि कुछ इसे वैश्विक तकनीकी प्रतिस्पर्धा से जुड़ा गंभीर मुद्दा मान रहे हैं। फिलहाल किसी भी देश द्वारा किसी संगठित साजिश की पुष्टि नहीं हुई है। रहस्य गहराता जा रहा है, जांच जारी अमेरिका और चीन दोनों ही इस मामले की जांच में जुटे हैं। जैसे-जैसे नई घटनाएं सामने आ रही हैं, सुरक्षा एजेंसियों की चिंता भी बढ़ती जा रही है। यह मामला अभी पूरी तरह रहस्य बना हुआ है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर निगरानी में है।
शहीदों को पीएम मोदी ने दी श्रद्धांजलि प्रधानमंत्री Narendra Modi ने पहलगाम आतंकी हमले की पहली बरसी पर पीड़ितों को श्रद्धांजलि दी। उन्होंने कहा कि इस हमले में जान गंवाने वाले निर्दोष लोगों को देश कभी नहीं भूलेगा। प्रधानमंत्री ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा कि यह हमला देश की आत्मा को झकझोर देने वाला था और पीड़ित परिवारों के साथ पूरा देश खड़ा है। “भारत आतंक के सामने नहीं झुकेगा” पीएम मोदी ने अपने संदेश में साफ कहा कि भारत किसी भी तरह के आतंक के आगे नहीं झुकेगा। उन्होंने कहा कि आतंकियों की साजिशें कभी सफल नहीं होंगी और देश मजबूती से उनका मुकाबला करेगा। उन्होंने यह भी दोहराया कि देश दुख की इस घड़ी में एकजुट है और पीड़ित परिवारों के साथ खड़ा है। 2025 में हुआ था भीषण हमला 22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर के Pahalgam में आतंकियों ने हमला कर 26 लोगों की हत्या कर दी थी, जिनमें ज्यादातर पर्यटक शामिल थे। इस हमले ने पूरे देश को झकझोर दिया था और इसके बाद बड़े स्तर पर सुरक्षा और सैन्य कार्रवाई की गई थी। ऑपरेशन सिंदूर और महादेव से जवाब हमले के बाद भारत ने “ऑपरेशन सिंदूर” के तहत पाकिस्तान और पीओके में आतंकियों के ठिकानों पर कार्रवाई की थी। इस दौरान कई आतंकी ठिकानों को नष्ट किया गया और बड़ी संख्या में आतंकियों को मार गिराया गया। इसके बाद “ऑपरेशन महादेव” के तहत सुरक्षा बलों ने हमले में शामिल तीन आतंकियों को भी ढेर कर दिया। सुरक्षा बढ़ी, स्मारक बना हमले की बरसी को देखते हुए पहलगाम में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है। यहां अतिरिक्त सुरक्षाबल तैनात किए गए हैं और निगरानी बढ़ा दी गई है। हमले में मारे गए लोगों की याद में एक स्मारक भी बनाया गया है, जिसमें सभी 26 पीड़ितों के नाम दर्ज हैं। यह स्मारक लिद्दर नदी के किनारे बनाया गया है और लोगों के लिए श्रद्धांजलि का केंद्र बन गया है।
नई दिल्ली, 31 मार्च 2026: राष्ट्रीय राजधानी को दहलाने की एक बड़ी आतंकी साजिश को समय रहते नाकाम कर दिया गया है। दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने Lashkar-e-Taiba से जुड़े एक खतरनाक मॉड्यूल का पर्दाफाश करते हुए इसके मास्टरमाइंड Shabbir Ahmed Lone समेत कुल 8 आतंकियों को गिरफ्तार किया है। जांच में सामने आए खुलासे सुरक्षा एजेंसियों के लिए गंभीर चिंता का विषय हैं। मंदिरों और भीड़भाड़ वाले इलाकों पर थी नजर पूछताछ में शब्बीर अहमद लोन ने खुलासा किया कि उसने दिल्ली के प्रमुख धार्मिक स्थलों-Kalkaji Temple, Lotus Temple और Chhatarpur Temple-की रेकी कर इसकी जानकारी पाकिस्तान स्थित हैंडलर्स तक पहुंचाई थी। इसके अलावा राजधानी के सबसे व्यस्त व्यावसायिक केंद्र Connaught Place को भी निशाना बनाने की योजना थी। यहां की भीड़भाड़ और व्यावसायिक गतिविधियों को देखते हुए इसे संभावित हमले के लिए उपयुक्त माना गया था। ISI और नए आतंकी संगठन की साजिश जांच में यह भी सामने आया है कि Inter-Services Intelligence और लश्कर बांग्लादेश में The Resistance Front की तर्ज पर एक नया आतंकी संगठन खड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं। यह भारत के खिलाफ क्षेत्रीय स्तर पर आतंकवादी नेटवर्क को मजबूत करने की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। पोस्टरों से खुला नेटवर्क का सुराग इस पूरे मॉड्यूल का खुलासा 8 फरवरी 2026 को हुआ, जब Janpath Metro Station और अन्य इलाकों में पाकिस्तान समर्थक और भड़काऊ पोस्टर लगाए गए। इन पोस्टरों में कश्मीर से जुड़े संदेश और आतंकी Burhan Wani की तस्वीरें भी शामिल थीं। इसी सुराग के आधार पर जांच आगे बढ़ी और पूरे नेटवर्क का भंडाफोड़ हुआ। कई राज्यों में छापेमारी, अवैध घुसपैठ का खुलासा दिल्ली, कोलकाता और तमिलनाडु के तिरुप्पुर में एक साथ कार्रवाई करते हुए पुलिस ने कुल 8 आतंकियों को गिरफ्तार किया। इनमें से 7 बांग्लादेशी नागरिक बताए जा रहे हैं, जो अवैध रूप से भारत में दाखिल हुए थे। टेक्निकल सर्विलांस, सीसीटीवी फुटेज और ह्यूमन इंटेलिजेंस की मदद से इस नेटवर्क की परतें खोली गईं। अंततः 9 मार्च 2026 को शब्बीर अहमद लोन को दिल्ली के गाजीपुर इलाके से गिरफ्तार कर लिया गया। समय रहते टली बड़ी त्रासदी दिल्ली पुलिस का दावा है कि अगर यह मॉड्यूल सक्रिय हो जाता, तो देश में एक बड़ा आतंकी हमला हो सकता था। समय पर की गई कार्रवाई ने संभावित बड़े नुकसान को टाल दिया।
देश की सुरक्षा एजेंसियों को एक बड़ी कामयाबी मिली है। दिल्ली पुलिस स्पेशल सेल ने एक ऐसे आतंकी मॉड्यूल का पर्दाफाश किया है, जो राजधानी दिल्ली समेत कई बड़े शहरों को दहलाने की साजिश रच रहा था। इस मामले में गिरफ्तार हुआ मुख्य आरोपी शब्बीर अहमद लोन अब जांच एजेंसियों के रडार पर है। कौन है शब्बीर अहमद लोन? जम्मू-कश्मीर के श्रीनगर के कंगन इलाके का रहने वाला शब्बीर अहमद लोन एक संदिग्ध आतंकी है, जिसका संबंध पाकिस्तान समर्थित आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा से बताया जा रहा है। जांच एजेंसियों के अनुसार, वह संगठन के शीर्ष आतंकियों जैसे हाफिज सईद और जकी-उर-रहमान लखवी के संपर्क में रहा है। ISI से जुड़ा नेटवर्क और बांग्लादेश कनेक्शन जांच में सामने आया है कि यह पूरा मॉड्यूल पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI के समर्थन से चलाया जा रहा था। इसका संचालन बांग्लादेश से किया जा रहा था, जहां से भारत में आतंकियों की भर्ती, फंडिंग और साजिशों को अंजाम दिया जा रहा था। फरवरी 2026 में इसी नेटवर्क से जुड़े 8 लोगों को गिरफ्तार किया गया था, जिनमें 7 बांग्लादेशी नागरिक थे। ये सभी फर्जी दस्तावेजों के जरिए भारत में छिपे हुए थे। कैसे रची जा रही थी साजिश? जांच एजेंसियों के मुताबिक: फर्जी आधार कार्ड बनवाकर आतंकियों को भारत में छिपाया गया एन्क्रिप्टेड ऐप्स के जरिए संपर्क बनाए रखा गया दिल्ली समेत कई शहरों में रेकी की गई खास तौर पर लाल किला जैसे हाई-प्रोफाइल टारगेट को निशाना बनाने की योजना थी पहले भी रहा है आपराधिक रिकॉर्ड शब्बीर लोन को साल 2007 में भी हथियारों के साथ गिरफ्तार किया गया था। सजा काटने के बाद वह जमानत पर बाहर आया और फिर बांग्लादेश भाग गया, जहां से उसने दोबारा आतंकी नेटवर्क खड़ा किया। समय रहते टला बड़ा हमला जांच एजेंसियों का मानना है कि अगर समय पर कार्रवाई नहीं होती, तो देश में बड़ा आतंकी हमला हो सकता था। इस गिरफ्तारी ने एक बड़े खतरे को टाल दिया है और सुरक्षा एजेंसियों की सतर्कता को साबित किया है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।