रोम: ईरान संघर्ष के दौरान इटली की भूमिका को लेकर प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी और NATO महासचिव मार्क रुटे के बीच नया विवाद खड़ा हो गया है। रुटे के एक बयान के बाद इटली की राजनीति में हलचल मच गई, जिसके बाद मेलोनी सरकार को लगातार सफाई देनी पड़ी। प्रधानमंत्री ने साफ कहा कि इटली ने ईरान के खिलाफ किसी भी सैन्य अभियान में हिस्सा नहीं लिया और NATO प्रमुख के बयान से देश की भूमिका को लेकर गलत संदेश गया। यह विवाद ऐसे समय सामने आया है जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लगातार इटली और प्रधानमंत्री मेलोनी की आलोचना कर रहे हैं। ऐसे में रोम ने अपने रुख को स्पष्ट करने के लिए विदेश मंत्री से लेकर रक्षा मंत्री तक को सामने उतार दिया। कैसे शुरू हुआ पूरा विवाद? विवाद की शुरुआत तब हुई जब NATO महासचिव मार्क रुटे ने एक इंटरव्यू में दावा किया कि ईरान संघर्ष के दौरान इटली ने लगभग 500 अमेरिकी सैन्य विमानों को अपने सैन्य ठिकानों के इस्तेमाल की अनुमति देकर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। रुटे के इस बयान के बाद इटली में विपक्षी दलों ने मेलोनी सरकार को घेर लिया। विपक्ष का आरोप था कि सरकार लगातार यह दावा करती रही कि इटली युद्ध से दूर रहा, जबकि NATO प्रमुख का बयान कुछ और कहानी बता रहा है। मेलोनी बोलीं- इटली युद्ध का हिस्सा नहीं था फ्रांस-इटली शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी ने स्पष्ट किया कि इटली ने ईरान के खिलाफ किसी भी सैन्य कार्रवाई में भाग नहीं लिया। उन्होंने कहा कि इटली ने केवल अमेरिका के साथ पहले से मौजूद द्विपक्षीय समझौतों के तहत तकनीकी और लॉजिस्टिक सहयोग दिया था। उन्होंने इस बात से भी इनकार किया कि इटली की जमीन का इस्तेमाल ईरान पर सीधे हमले करने के लिए किया गया। मेलोनी ने कहा कि अगर इटली वास्तव में युद्ध का हिस्सा होता, तो अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप बार-बार इटली के सहयोग को लेकर नाराजगी जाहिर नहीं करते। NATO प्रमुख पर साधा निशाना मेलोनी ने कहा कि मार्क रुटे ने अलग-अलग तरह की सैन्य उड़ानों और तकनीकी सहयोग को एक साथ जोड़कर पेश किया, जिससे भ्रम की स्थिति पैदा हुई। उन्होंने कहा कि संभव है कि NATO प्रमुख आगामी शिखर सम्मेलन से पहले सहयोगी देशों की एकजुटता दिखाना चाहते हों, लेकिन ऐसे संवेदनशील मुद्दों पर बेहद सावधानी बरतनी चाहिए। ईरान से सीधे की गई बातचीत विवाद बढ़ने के बाद इटली के विदेश मंत्री एंटोनियो ताजानी ने ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची से फोन पर बात की। ताजानी ने ईरान को भरोसा दिलाया कि इटली किसी भी सैन्य अभियान का हिस्सा नहीं था और उसने अपने सैन्य अड्डों का इस्तेमाल ईरान के खिलाफ युद्ध कार्रवाई के लिए करने की अनुमति नहीं दी। इसके साथ ही उन्होंने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को पूरी तरह खोलने की अपील की ताकि वहां फंसे इटली के व्यापारिक जहाजों की आवाजाही फिर से सामान्य हो सके। रक्षा मंत्री ने भी पेश किए आंकड़े इटली के रक्षा मंत्री गुइडो क्रोसेटो ने भी सरकार का पक्ष रखते हुए कहा कि ऑपरेशन 'एपिक फ्यूरी' के दौरान सिगोनेला और एवियानो सैन्य ठिकानों से हुई उड़ानों की संख्या पिछले वर्षों की तुलना में काफी कम रही। उन्होंने कहा कि सरकार के पास इसके आधिकारिक आंकड़े मौजूद हैं और जरूरत पड़ने पर उन्हें सार्वजनिक भी किया जा सकता है। NATO ने भी दी सफाई विवाद बढ़ने के बाद NATO की ओर से भी स्पष्टीकरण जारी किया गया। NATO की प्रवक्ता एलिसन हार्ट ने कहा कि मार्क रुटे का बयान केवल तकनीकी और लॉजिस्टिक सुविधाओं के संदर्भ में था। उनका आशय यह बिल्कुल नहीं था कि इटली ने ईरान के खिलाफ सीधे सैन्य हमलों में भाग लिया। ईरान का कड़ा रुख इस पूरे घटनाक्रम के बीच ईरान ने भी सख्त प्रतिक्रिया दी। ईरान के उप विदेश मंत्री काज़ेम गरीबाबादी ने कहा कि यदि कोई देश किसी तीसरे देश को किसी अन्य राष्ट्र पर हमला करने के लिए अपनी जमीन उपलब्ध कराता है, तो उसे भी आक्रामक कार्रवाई माना जाना चाहिए। वहीं विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने कहा कि NATO प्रमुख के बयान में इटली और रोमानिया का नाम स्पष्ट रूप से लिया गया था। ट्रंप लगातार कर रहे हैं इटली की आलोचना अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पिछले कुछ समय से इटली के रुख की लगातार आलोचना कर रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि यूरोपीय सहयोगियों ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम को रोकने के अमेरिकी प्रयासों में पर्याप्त सहयोग नहीं दिया। ट्रंप ने यह भी दावा किया कि इटली ने अमेरिकी सैन्य विमानों को अपने रनवे और लैंडिंग स्ट्रिप के इस्तेमाल की अनुमति नहीं दी, जिससे अमेरिकी लॉजिस्टिक व्यवस्था प्रभावित हुई। G7 सम्मेलन के बाद और बढ़ी दूरी हालिया G7 शिखर सम्मेलन के बाद दोनों नेताओं के बीच जुबानी जंग और तेज हो गई। ट्रंप ने दावा किया था कि जॉर्जिया मेलोनी उनके साथ बार-बार तस्वीर खिंचवाना चाहती थीं और इटली में उनकी लोकप्रियता लगातार घट रही है। मेलोनी ने इन आरोपों को पूरी तरह खारिज करते हुए कहा कि उनकी लोकप्रियता किसी विदेशी नेता से रिश्तों पर नहीं, बल्कि इटली के राष्ट्रीय हितों की रक्षा पर आधारित है। उन्होंने ट्रंप की टिप्पणियों को "पूरी तरह मनगढ़ंत और अनावश्यक" बताया। क्यों अहम है यह विवाद? यह विवाद केवल इटली और NATO के बीच बयानबाजी तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे ईरान संघर्ष को लेकर पश्चिमी देशों के भीतर मौजूद मतभेद भी सामने आए हैं। एक ओर NATO सहयोगी देशों की एकजुटता दिखाने की कोशिश कर रहा है, वहीं दूसरी ओर इटली अपनी छवि को युद्ध से दूर रखने और ईरान के साथ राजनयिक संतुलन बनाए रखने की कोशिश में जुटा हुआ है।
वॉशिंगटन: अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई के दौरान अपेक्षित समर्थन नहीं मिलने पर नाटो सहयोगी देशों पर नाराजगी जताई है। ट्रंप ने कहा कि अमेरिका को अपने सहयोगियों से आर्थिक मदद नहीं, बल्कि वफादारी और राजनीतिक समर्थन की उम्मीद थी। उनके इस बयान पर नाटो महासचिव Mark Rutte ने यूरोपीय देशों का बचाव करते हुए कहा कि गठबंधन के सदस्य अमेरिका के साथ खड़े रहे हैं और उन्होंने सुरक्षा संबंधी जिम्मेदारियों में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। व्हाइट हाउस में ट्रंप ने जताई नाराजगी व्हाइट हाउस के ओवल ऑफिस में नाटो प्रमुख मार्क रूटे के साथ बैठक के दौरान ट्रंप ने कहा कि ईरान के खिलाफ अभियान में अमेरिका ने अपने दम पर कार्रवाई की। उन्होंने कहा कि अमेरिका को सैन्य सहायता की जरूरत नहीं थी, लेकिन सहयोगी देशों की ओर से समर्थन का संकेत मिलना महत्वपूर्ण था। ट्रंप ने कहा कि यदि यूरोपीय देश यह कहते कि वे अमेरिका के साथ खड़े हैं या किसी भी तरह मदद के लिए तैयार हैं, तो यह गठबंधन की एकजुटता का संदेश होता। उन्होंने कहा कि इस मामले में उन्हें सहयोगियों से निराशा हाथ लगी। स्पेन, इटली, ब्रिटेन और जर्मनी पर साधा निशाना बैठक के दौरान ट्रंप ने कई नाटो देशों की आलोचना करते हुए कहा कि कुछ सदस्य देश सुरक्षा के लाभ तो उठाना चाहते हैं, लेकिन जिम्मेदारियों को साझा करने के लिए तैयार नहीं हैं। उन्होंने विशेष रूप से स्पेन, इटली, ब्रिटेन, जर्मनी और फ्रांस का उल्लेख करते हुए कहा कि कई देश रक्षा सहयोग और सामूहिक जिम्मेदारियों को लेकर अपेक्षित भूमिका नहीं निभा रहे हैं। ट्रंप ने आरोप लगाया कि कुछ सहयोगी देशों को लगता है कि वे बिना पर्याप्त योगदान दिए भी अमेरिकी सुरक्षा छतरी का लाभ ले सकते हैं। “हमें पैसे नहीं, वफादारी चाहिए” एक पत्रकार के सवाल के जवाब में ट्रंप ने कहा कि अमेरिका को सहयोगी देशों के धन की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने कहा कि दुनिया की सबसे शक्तिशाली सेना अमेरिका के पास है और उसे आर्थिक मदद की जरूरत नहीं पड़ती। ट्रंप ने कहा कि उनकी अपेक्षा केवल इतनी है कि जब अमेरिका अपने सहयोगियों की सुरक्षा के लिए आगे आए, तो बदले में उसे राजनीतिक और रणनीतिक समर्थन मिले। उन्होंने कहा कि यूरोप में तैनात हजारों अमेरिकी सैनिक वहां के देशों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए मौजूद हैं। नाटो प्रमुख मार्क रूटे ने किया सहयोगियों का बचाव ट्रंप की टिप्पणियों पर प्रतिक्रिया देते हुए नाटो महासचिव मार्क रूटे ने कहा कि यूरोपीय देशों ने अमेरिका का समर्थन किया है और ईरान की परमाणु गतिविधियों से पैदा होने वाला खतरा केवल मध्य पूर्व तक सीमित नहीं था, बल्कि वैश्विक सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा था। रूटे ने कहा कि अभियान के दौरान यूरोप स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने बताया कि यूरोपीय आधारभूत ढांचे और एयरबेस का उपयोग अमेरिकी अभियानों के लिए किया गया, जिससे मिशन को रणनीतिक सहायता मिली। रक्षा खर्च में बढ़ोतरी को बताया ‘ट्रंप ट्रिलियन’ मार्क रूटे ने दावा किया कि ट्रंप के पहले कार्यकाल के बाद से यूरोपीय देशों और कनाडा ने रक्षा बजट में भारी बढ़ोतरी की है। उन्होंने इस अतिरिक्त निवेश को “ट्रंप ट्रिलियन” का नाम देते हुए कहा कि सहयोगी देश धीरे-धीरे सुरक्षा बोझ साझा करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। रूटे के अनुसार, यूरोप और कनाडा ने रक्षा क्षेत्र में लगभग 1.2 ट्रिलियन डॉलर का अतिरिक्त निवेश किया है। इसके अलावा अमेरिकी रक्षा कंपनियों को भी बड़े पैमाने पर सैन्य उपकरणों के ऑर्डर दिए गए हैं। नाटो शिखर सम्मेलन से पहले बढ़ी बयानबाजी ट्रंप और रूटे के बीच यह सार्वजनिक मतभेद ऐसे समय सामने आया है, जब नाटो का अगला शिखर सम्मेलन 7-8 जुलाई को Ankara में आयोजित होने वाला है। सम्मेलन में गठबंधन के 32 सदस्य देशों के नेता भाग लेंगे और रक्षा खर्च, सामूहिक सुरक्षा तथा वैश्विक संकटों पर चर्चा करेंगे। विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप के ताजा बयान नाटो के भीतर रक्षा जिम्मेदारियों और अमेरिका की भूमिका को लेकर चल रही पुरानी बहस को फिर से तेज कर सकते हैं।
रूस-यूक्रेन युद्ध को लेकर एक बार फिर कूटनीतिक हलचल तेज हो गई है। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने संकेत दिया है कि मॉस्को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के शांति प्रस्ताव के आधार पर यूक्रेन के साथ समझौते के लिए तैयार है। उन्होंने स्पष्ट किया कि किसी भी शांति समझौते के लिए यूक्रेन को कुछ महत्वपूर्ण शर्तें स्वीकार करनी होंगी। ट्रंप के प्रस्ताव पर रूस की सकारात्मक प्रतिक्रिया रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने कहा कि रूस शांतिपूर्ण समाधान चाहता है और वह उन प्रस्तावों पर आगे बढ़ने को तैयार है जिन पर अलास्का के एंकरेज में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ चर्चा हुई थी। पुतिन ने कहा कि यदि यूक्रेन भी इन प्रस्तावों को स्वीकार करता है तो संघर्ष का समाधान अपेक्षाकृत जल्दी संभव हो सकता है। उनके अनुसार, रूस बातचीत के रास्ते को बंद नहीं करना चाहता, लेकिन समझौता दोनों पक्षों की सहमति से ही संभव होगा। रूस की प्रमुख शर्तें क्या हैं? रूसी पक्ष के अनुसार संभावित समझौते के लिए कुछ प्रमुख मुद्दों पर सहमति आवश्यक होगी: यूक्रेन को डोनबास क्षेत्र पर रूस के नियंत्रण को स्वीकार करना होगा। खेरसोन और ज़ापोरिज्जिया क्षेत्रों में रूसी दावों को मान्यता देनी होगी। यूक्रेन को नाटो सदस्यता की दिशा में आगे नहीं बढ़ना होगा। सुरक्षा और सीमा संबंधी कुछ अन्य मुद्दों पर भी सहमति बनानी होगी। इन शर्तों पर यूक्रेन की ओर से अभी तक कोई सकारात्मक संकेत नहीं मिला है। जेलेंस्की ने पुतिन को लिखा खुला पत्र इस बीच यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की ने पुतिन को एक खुला पत्र लिखकर सीधे संवाद का प्रस्ताव दिया है। उन्होंने युद्ध समाप्त करने के लिए आमने-सामने बातचीत और पूर्ण युद्धविराम की आवश्यकता पर जोर दिया। जेलेंस्की ने कहा कि स्थायी शांति केवल प्रत्यक्ष वार्ता के माध्यम से ही संभव है। उन्होंने पुतिन को व्यक्तिगत बैठक का प्रस्ताव भी दिया है। रूस के राष्ट्रपति कार्यालय क्रेमलिन ने पुष्टि की है कि उसे यह पत्र प्राप्त हो चुका है। युद्ध के मैदान में रूस का दावा पुतिन ने दावा किया कि रूसी सेना विभिन्न मोर्चों पर लगातार बढ़त बनाए हुए है। उनके अनुसार, हाल के महीनों में रूस ने हजारों वर्ग किलोमीटर अतिरिक्त क्षेत्र पर नियंत्रण स्थापित किया है। रूसी राष्ट्रपति का कहना है कि लुहांस्क क्षेत्र पर लगभग पूर्ण नियंत्रण स्थापित हो चुका है, जबकि दोनेत्स्क और ज़ापोरिज्जिया के बड़े हिस्सों पर भी रूसी सेना का नियंत्रण है। यूरोप की भूमिका पर रूस का सवाल पुतिन ने यूरोपीय देशों की मध्यस्थता क्षमता पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि जो देश लंबे समय से रूस की रणनीतिक हार की बात करते रहे हैं, उनके लिए निष्पक्ष मध्यस्थ की भूमिका निभाना कठिन होगा। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि रूस यूरोपीय देशों के साथ संवाद के रास्ते बंद नहीं करना चाहता। शांति वार्ता में क्यों आया ठहराव? रूस और यूक्रेन के बीच जिनेवा, इस्तांबुल और अबू धाबी सहित कई स्थानों पर पहले भी वार्ताएं हो चुकी हैं, लेकिन कोई ठोस परिणाम नहीं निकल पाया। फरवरी 2022 में शुरू हुआ युद्ध अब चौथे वर्ष में प्रवेश कर चुका है और लाखों लोगों को प्रभावित कर चुका है। ट्रंप के प्रस्ताव, पुतिन की प्रतिक्रिया और जेलेंस्की की नई पहल के बाद एक बार फिर कूटनीतिक समाधान की संभावनाओं पर चर्चा तेज हो गई है। क्या जल्द खत्म हो सकता है युद्ध? विशेषज्ञों का मानना है कि शांति समझौते की संभावना तभी बढ़ेगी जब दोनों पक्ष अपनी-अपनी अधिकतम मांगों में लचीलापन दिखाएं। फिलहाल रूस और यूक्रेन के रुख में बड़ा अंतर बना हुआ है, लेकिन हालिया बयानों ने भविष्य में वार्ता की संभावना को पूरी तरह खत्म नहीं होने दिया है।
रूस की विदेश नीति, अंतरराष्ट्रीय विवादों और वैश्विक घटनाक्रमों पर जब भी मॉस्को का आधिकारिक पक्ष सामने आता है, तो सबसे प्रमुख चेहरों में मारिया जखारोवा का नाम शामिल होता है। अपनी स्पष्टवादी शैली, तीखी प्रतिक्रियाओं और मजबूत कूटनीतिक उपस्थिति के कारण वह रूस की सबसे चर्चित राजनयिकों में गिनी जाती हैं। पिछले एक दशक से अधिक समय से वह अंतरराष्ट्रीय मंचों पर रूस का पक्ष मजबूती से रख रही हैं और आज उन्हें रूसी विदेश मंत्रालय की सबसे प्रभावशाली आवाज माना जाता है। राजनयिक परिवार से निकलकर बनीं रूस की प्रमुख प्रवक्ता 24 दिसंबर 1975 को मॉस्को में जन्मीं मारिया जखारोवा का बचपन कूटनीतिक माहौल में बीता। उनके पिता सोवियत संघ की राजनयिक सेवा में कार्यरत थे और उनकी नियुक्ति चीन में होने के कारण मारिया ने अपने शुरुआती वर्ष बीजिंग में बिताए। उनकी मां इरीना जखारोवा कला इतिहासकार थीं और मॉस्को के प्रतिष्ठित संग्रहालयों से जुड़ी रहीं। सोवियत संघ के विघटन के बाद परिवार रूस लौट आया, जहां मारिया ने अपनी उच्च शिक्षा पूरी की और अंतरराष्ट्रीय मामलों की दुनिया में कदम रखा। पत्रकारिता से शुरू हुआ सफर, कूटनीति तक पहुंचीं मारिया जखारोवा ने मॉस्को स्टेट इंस्टीट्यूट ऑफ इंटरनेशनल रिलेशंस (MGIMO) से अंतरराष्ट्रीय पत्रकारिता और प्राच्य अध्ययन में शिक्षा प्राप्त की। वह रूसी, अंग्रेजी और चीनी भाषाओं में दक्ष हैं। पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने रूसी विदेश मंत्रालय की पत्रिका डिप्लोमैटिक बुलेटिन में संपादक के रूप में काम शुरू किया। यहीं से उनका सरकारी और कूटनीतिक करियर आगे बढ़ा और धीरे-धीरे उन्हें मंत्रालय में बड़ी जिम्मेदारियां मिलने लगीं। संयुक्त राष्ट्र में निभाई अहम भूमिका वर्ष 2005 से 2008 के बीच जखारोवा ने न्यूयॉर्क स्थित रूस के स्थायी मिशन में प्रेस सचिव के रूप में कार्य किया। इस दौरान उन्होंने अंतरराष्ट्रीय मीडिया के सामने रूस की नीतियों और दृष्टिकोण को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया। संयुक्त राष्ट्र में उनके कार्यकाल को उनके करियर का महत्वपूर्ण मोड़ माना जाता है, जहां उन्होंने वैश्विक कूटनीति के जटिल मुद्दों पर अनुभव हासिल किया। पहली महिला बनीं सूचना एवं प्रेस विभाग की निदेशक 2011 में उन्हें रूसी विदेश मंत्रालय के सूचना एवं प्रेस विभाग का उप निदेशक बनाया गया। चार वर्षों तक मीडिया रणनीति और अंतरराष्ट्रीय संचार व्यवस्था संभालने के बाद अगस्त 2015 में उन्हें विभाग का निदेशक नियुक्त किया गया। इस पद तक पहुंचने वाली वह पहली महिला बनीं। वर्तमान में वह विभाग की प्रमुख होने के साथ-साथ रूसी विदेश मंत्रालय की आधिकारिक प्रवक्ता भी हैं। टीवी डिबेट और सोशल मीडिया से बढ़ी लोकप्रियता मारिया जखारोवा केवल सरकारी अधिकारी नहीं, बल्कि रूस की सार्वजनिक कूटनीति का भी प्रमुख चेहरा हैं। वह नियमित रूप से टीवी कार्यक्रमों, प्रेस ब्रीफिंग और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर सक्रिय रहती हैं। यूक्रेन युद्ध, नाटो विस्तार, अमेरिका-रूस संबंधों और पश्चिमी देशों की नीतियों पर उनकी टिप्पणियां अक्सर अंतरराष्ट्रीय मीडिया की सुर्खियां बनती हैं। उनकी तेज और सीधी प्रतिक्रियाएं उन्हें अन्य राजनयिकों से अलग पहचान दिलाती हैं। अंतरराष्ट्रीय पहचान और प्रतिबंध 2016 में उन्हें दुनिया की 100 प्रभावशाली महिलाओं की सूची में शामिल किया गया था। वहीं फरवरी 2022 में यूक्रेन संघर्ष शुरू होने से पहले यूरोपीय संघ ने उन पर प्रतिबंध लगाए थे। यूरोपीय देशों ने उन पर रूस के आधिकारिक रुख और सैन्य कार्रवाई का समर्थन करने का आरोप लगाया था। इन प्रतिबंधों के बावजूद जखारोवा की भूमिका रूस की विदेश नीति में लगातार मजबूत बनी हुई है। क्यों मानी जाती हैं पुतिन प्रशासन की भरोसेमंद आवाज? करीब ढाई दशक लंबे करियर में मारिया जखारोवा ने खुद को रूस की सबसे प्रभावशाली कूटनीतिक हस्तियों में स्थापित किया है। राष्ट्रपति Vladimir Putin के लंबे शासनकाल के दौरान उनका कद लगातार बढ़ता गया है। विश्लेषकों का मानना है कि उनकी पेशेवर क्षमता, मीडिया प्रबंधन कौशल और सरकार के दृष्टिकोण को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करने की क्षमता ने उन्हें क्रेमलिन की सबसे भरोसेमंद सार्वजनिक आवाजों में शामिल कर दिया है। आज अंतरराष्ट्रीय राजनीति में रूस का आधिकारिक संदेश दुनिया तक पहुंचाने वाले प्रमुख चेहरों में मारिया जखारोवा सबसे आगे हैं।
अमेरिका ने यूरोप में अपनी सैन्य रणनीति में बड़ा बदलाव करते हुए जर्मनी से 5,000 सैनिक वापस बुलाने का फैसला किया है। पेंटागन ने शुक्रवार को इसकी आधिकारिक घोषणा की। यह कदम ऐसे समय उठाया गया है, जब ईरान को लेकर जारी तनाव के बीच डोनाल्ड ट्रंप और यूरोपीय देशों के बीच मतभेद खुलकर सामने आ रहे हैं। 6-12 महीनों में पूरी होगी वापसी पेंटागन के अनुसार, सैनिकों की वापसी चरणबद्ध तरीके से अगले 6 से 12 महीनों में पूरी की जाएगी। इस फैसले के बाद यूरोप में तैनात अमेरिकी सैनिकों की संख्या घटकर 2022 से पहले के स्तर के करीब आ जाएगी। जर्मनी में अमेरिका की मजबूत सैन्य मौजूदगी जर्मनी में अमेरिका की सैन्य उपस्थिति यूरोप में सबसे बड़ी मानी जाती है। फिलहाल वहां करीब 35,000 अमेरिकी सैनिक तैनात हैं, जबकि पूरे यूरोप में यह संख्या 80,000 से 1,00,000 के बीच रहती है। जर्मनी में अमेरिका के कई अहम सैन्य ठिकाने मौजूद हैं, जिनमें: रामस्टीन एयर बेस – यूरोप में अमेरिकी वायुसेना का सबसे बड़ा केंद्र पैच बैरक्स – यूएस यूरोपियन और अफ्रीका कमांड का मुख्यालय विस्बाडेन – यूरोप-अफ्रीका कमान का संचालन केंद्र लैंडस्टुहल रीजनल मेडिकल सेंटर – अमेरिका के बाहर सबसे बड़ा सैन्य अस्पताल इसके अलावा ग्राफेनवोहर, होहेनफेल्स और स्पैंगडाहलेम जैसे कई बड़े ट्रेनिंग और एयर बेस भी यहीं स्थित हैं। क्यों बढ़ी अमेरिका-यूरोप में तकरार? यह फैसला ऐसे समय आया है, जब यूरोपीय देशों के साथ अमेरिका के रिश्तों में तनाव बढ़ रहा है। खासतौर पर जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज के उस बयान के बाद विवाद गहरा गया, जिसमें उन्होंने ईरान के साथ बातचीत में अमेरिका के “अपमानित” होने की बात कही थी। इस पर जवाब देते हुए डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि जर्मनी को ईरान पर टिप्पणी करने के बजाय यूक्रेन युद्ध खत्म करने और अपने आंतरिक हालात सुधारने पर ध्यान देना चाहिए। यूरोप के समर्थन की कमी पर नाराजगी रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिका इस बात से भी नाराज है कि कई यूरोपीय देशों ने ईरान के खिलाफ उसके सैन्य अभियानों में अपेक्षित समर्थन नहीं दिया। विशेष रूप से: स्पेन ने सहयोग से इनकार किया इटली ने भी सीमित समर्थन दिया इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी और अन्य नेताओं के साथ भी ट्रंप के मतभेद सामने आए हैं। नाटो सहयोगियों पर ट्रंप का आरोप डोनाल्ड ट्रंप लंबे समय से नाटो सहयोगियों पर आरोप लगाते रहे हैं कि वे अमेरिकी सुरक्षा ढांचे का फायदा उठाते हैं, लेकिन पर्याप्त योगदान नहीं करते। उन्होंने खास तौर पर होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों की सुरक्षा में यूरोपीय देशों की निष्क्रियता पर सवाल उठाए। ट्रांस-अटलांटिक रिश्तों पर असर विशेषज्ञों का मानना है कि जर्मनी से सैनिकों की वापसी का यह फैसला ट्रांस-अटलांटिक रिश्तों पर दबाव बढ़ा सकता है। अमेरिका चाहता है कि यूरोप अपनी सुरक्षा की जिम्मेदारी खुद उठाए और नाटो में ज्यादा खर्च करे।
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ जारी तनाव के बीच अपने ही सहयोगी देशों पर सख्त रुख अपना लिया है। ट्रंप ने संकेत दिए हैं कि वे इटली और स्पेन में तैनात अमेरिकी सैनिकों की संख्या कम कर सकते हैं। इस बयान के बाद नाटो के भीतर हलचल तेज हो गई है। “साथ नहीं देंगे तो क्यों रखें फौज?” ओवल ऑफिस में पत्रकारों से बातचीत के दौरान ट्रंप ने साफ कहा कि अगर सहयोगी देश ईरान मुद्दे पर अमेरिका का साथ नहीं देते, तो वहां अमेरिकी सैनिकों की मौजूदगी पर सवाल उठना लाजिमी है। उन्होंने कहा, “शायद मैं ऐसा करूंगा… आखिर क्यों नहीं?” ट्रंप का आरोप है कि: इटली ने ईरान संकट में कोई खास सहयोग नहीं किया स्पेन का रवैया “बहुत खराब” रहा ईरान जंग से बढ़ी दरार यह विवाद तब गहराया जब अमेरिका और इजरायल ने मिलकर ईरान के खिलाफ सैन्य अभियान शुरू किया। नाटो के कई सदस्य देश इस युद्ध में सीधे शामिल होने से बच रहे हैं, जिससे ट्रंप नाराज हैं। ट्रंप चाहते हैं कि सहयोगी देश खासतौर पर: होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोलने में मदद करें समुद्री सुरक्षा और तेल सप्लाई बहाल करने में भूमिका निभाएं यूरोप में अमेरिकी सेना की मौजूदगी ताजा आंकड़ों (31 दिसंबर 2025) के अनुसार: जर्मनी: 36,436 अमेरिकी सैनिक इटली: 12,662 सैनिक स्पेन: 3,814 सैनिक ट्रंप का कहना है कि ये देश अपनी रक्षा पर पर्याप्त खर्च नहीं कर रहे और अमेरिका पर निर्भर हैं। मेलोनी पर सीधा हमला ट्रंप ने जॉर्जिया मेलोनी को भी निशाने पर लिया। उन्होंने कहा कि मेलोनी में ईरान मामले पर “साहस की कमी” है। वहीं, स्पेन को लेकर नाराजगी इतनी ज्यादा बताई जा रही है कि कुछ रिपोर्ट्स में अमेरिका द्वारा उसे नाटो से बाहर करने के विकल्पों पर विचार की बात कही गई है (हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं है)। जर्मनी से भी टकराव ट्रंप ने फ्रेडरिक मर्ज पर भी सोशल मीडिया के जरिए निशाना साधा। उन्होंने कहा कि जर्मनी को दूसरे देशों के मामलों में टिप्पणी करने के बजाय अपने देश की ऊर्जा और इमिग्रेशन समस्याओं पर ध्यान देना चाहिए। जर्मन नेतृत्व ने हालांकि साफ किया है कि: वे अमेरिका के साथ साझेदारी बनाए रखना चाहते हैं लेकिन सैन्य कार्रवाई के तरीके पर उनके अलग विचार हो सकते हैं यूरोप की प्रतिक्रिया जोहान वेडफुल ने कहा कि वे अमेरिकी सैनिकों की संभावित कटौती के लिए तैयार हैं और इस मुद्दे पर नाटो के भीतर चर्चा जारी है। यूरोपीय देशों का रुख फिलहाल संतुलन बनाए रखने का है–वे अमेरिका से दूरी भी नहीं बनाना चाहते और युद्ध में सीधे कूदने से भी बच रहे हैं। वैश्विक असर: तेल और बाजार पर दबाव ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई और होर्मुज जलडमरूमध्य में बाधा के कारण: वैश्विक तेल सप्लाई प्रभावित हुई है कीमतों में तेजी देखी जा रही है ऊर्जा संकट गहराने की आशंका बढ़ी है इसके अलावा स्पेन ने गाजा के लिए जा रहे सहायता जहाजों को रोकने पर इजरायल की आलोचना भी की है, जिससे अमेरिका और उसके सहयोगियों के बीच मतभेद और बढ़ गए हैं। क्या बदल सकता है NATO समीकरण? यह पूरा घटनाक्रम नाटो के अंदर नई दरारों की ओर इशारा करता है। अगर अमेरिका सच में यूरोप से अपनी सैन्य मौजूदगी कम करता है, तो: यूरोप को अपनी सुरक्षा रणनीति बदलनी पड़ेगी नाटो की एकजुटता पर असर पड़ सकता है वैश्विक शक्ति संतुलन में बदलाव आ सकता है
NATO ने साफ किया अपना रुख अमेरिका और स्पेन के बीच बढ़ते तनाव के बीच NATO ने स्पष्ट कर दिया है कि उसके नियमों में किसी सदस्य देश को निलंबित करने या बाहर निकालने का कोई प्रावधान नहीं है। यह बयान उस रिपोर्ट के बाद आया, जिसमें दावा किया गया था कि अमेरिका, ईरान युद्ध पर स्पेन के रुख से नाराज होकर उसके खिलाफ कार्रवाई पर विचार कर सकता है। क्या है पूरा मामला? रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी रक्षा विभाग के एक आंतरिक ईमेल में उन सहयोगी देशों के खिलाफ संभावित कदमों पर चर्चा की गई, जिन्होंने ईरान के खिलाफ अमेरिकी अभियान का खुलकर समर्थन नहीं किया। इस सूची में Spain का नाम प्रमुखता से सामने आया। स्पेन ने अपने सैन्य अड्डों का इस्तेमाल ईरान पर हमलों के लिए करने से इनकार कर दिया था। अमेरिका के दो महत्वपूर्ण सैन्य ठिकाने स्पेन में स्थित हैं। स्पेन के प्रधानमंत्री ने रिपोर्ट को किया खारिज स्पेन के प्रधानमंत्री Pedro Sánchez ने इस रिपोर्ट को गंभीरता से लेने से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि उनकी सरकार किसी लीक ईमेल के आधार पर नहीं, बल्कि आधिकारिक दस्तावेजों और अमेरिकी सरकार की औपचारिक नीति के आधार पर काम करती है। उन्होंने दोहराया कि स्पेन अपने सहयोगियों के साथ खड़ा है, लेकिन हमेशा अंतरराष्ट्रीय कानून के दायरे में। ट्रंप प्रशासन की नाराजगी अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump और रक्षा मंत्री Pete Hegseth लगातार यूरोपीय सहयोगियों पर निशाना साध रहे हैं। उनका आरोप है कि यूरोप अमेरिकी सुरक्षा पर निर्भर है, लेकिन संकट के समय पर्याप्त सहयोग नहीं करता। हेगसेथ ने कहा कि यूरोप को सिर्फ बयान देने के बजाय वास्तविक योगदान देना चाहिए। फॉकलैंड मुद्दे का भी जिक्र रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि अमेरिका, ब्रिटेन के फॉकलैंड द्वीपों पर अपने समर्थन की समीक्षा कर सकता है। यह द्वीप लंबे समय से Argentina और United Kingdom के बीच विवाद का केंद्र रहे हैं। यूरोपीय देशों ने दिखाई एकजुटता इटली की प्रधानमंत्री Giorgia Meloni ने NATO की एकता बनाए रखने पर जोर दिया। वहीं, जर्मनी ने भी स्पष्ट कहा कि स्पेन की सदस्यता पर कोई सवाल नहीं उठता। NATO में स्पेन की सदस्यता सुरक्षित हालिया विवाद के बावजूद, NATO के नियम स्पष्ट हैं। किसी सदस्य देश को संगठन से निकालना आसान नहीं है, और फिलहाल स्पेन की सदस्यता पर कोई खतरा नजर नहीं आता। हालांकि, इस घटनाक्रम ने अमेरिका और उसके यूरोपीय सहयोगियों के बीच बढ़ती खाई को जरूर उजागर कर दिया है।
हॉर्मुज संकट के बाद ट्रंप का तीखा बयान अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर NATO (नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गेनाइजेशन) पर कड़ा हमला बोला है। उन्होंने कहा कि जब हॉर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव चरम पर था, तब NATO ने कोई प्रभावी मदद नहीं की, लेकिन स्थिति सामान्य होने के बाद सहायता की पेशकश की गई। “अब आपकी मदद की जरूरत नहीं” – ट्रंप एरिजोना में आयोजित Turning Point USA कार्यक्रम के दौरान ट्रंप ने कहा कि NATO ने अमेरिका से तब संपर्क किया जब हालात लगभग स्थिर हो चुके थे। उन्होंने कहा कि अगर मदद चाहिए थी, तो “दो महीने पहले चाहिए थी, अब नहीं।” ट्रंप ने स्पष्ट शब्दों में कहा, “वे उस समय पूरी तरह बेकार साबित हुए जब हमें उनकी जरूरत थी। लेकिन सच यह है कि हमें उनकी जरूरत कभी नहीं थी, उन्हें हमारी जरूरत थी।” हॉर्मुज संकट और वैश्विक तनाव यह बयान उस समय आया है जब हाल ही में ईरान और अमेरिका के बीच तनाव के चलते हॉर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक सुर्खियों में रहा। यह वही समुद्री मार्ग है, जिससे दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत तेल और गैस का परिवहन होता है। हालांकि अब स्थिति कुछ हद तक स्थिर बताई जा रही है, लेकिन क्षेत्र में तनाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। नाटो को बताया ‘पेपर टाइगर’ ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट में NATO को “पेपर टाइगर” तक कह दिया। उन्होंने लिखा कि संकट के दौरान संगठन कमजोर और निष्क्रिय रहा, लेकिन अब जब स्थिति सुधर रही है, तो मदद की बात कर रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि अगर NATO को सहयोग करना ही है, तो वे “तेल ले जाने के लिए जहाज भर सकते हैं।” क्षेत्रीय देशों की तारीफ अपने बयान में ट्रंप ने खाड़ी क्षेत्र के कुछ देशों की तारीफ भी की। उन्होंने सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और कतर का उल्लेख करते हुए कहा कि इन देशों ने संकट के दौरान स्थिरता बनाए रखने में अहम भूमिका निभाई। ईरान और हॉर्मुज को लेकर स्थिति ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने पुष्टि की है कि युद्धविराम अवधि में सभी वाणिज्यिक जहाजों के लिए हॉर्मुज जलडमरूमध्य खुला रहेगा। हालांकि अमेरिका ने इस क्षेत्र में कड़ा रुख बनाए रखा है और नौसैनिक दबाव जारी है। ट्रंप का यह बयान एक बार फिर अमेरिका और NATO के बीच मतभेद को उजागर करता है। साथ ही यह भी दिखाता है कि हॉर्मुज संकट ने वैश्विक राजनीति, ऊर्जा सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय गठबंधनों पर गहरा असर डाला है।
पाकिस्तान में हुई लंबी शांति वार्ता के विफल होने के बाद अमेरिका के राष्ट्रपति Donald Trump ने ईरान के खिलाफ कड़ा रुख अपना लिया है। ट्रंप ने साफ कहा कि उन्हें इस बात की कोई चिंता नहीं है कि ईरान बातचीत की मेज पर लौटता है या नहीं, और दावा किया कि तेहरान की स्थिति इस समय बेहद कमजोर है। हॉर्मुज जलडमरूमध्य पर अमेरिकी कदम अमेरिकी नौसेना ने Strait of Hormuz में घेराबंदी की तैयारी शुरू कर दी है। इस रणनीतिक मार्ग से गुजरने वाले उन जहाजों को रोका जाएगा, जो ईरान के बंदरगाहों से जुड़े हैं। दुनिया का करीब 20% कच्चा तेल इसी रास्ते से गुजरता है फैसले के बाद वैश्विक बाजार में तेल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई न्यूक्लियर हथियार पर अमेरिका की दो टूक ट्रंप ने स्पष्ट कहा कि ईरान को किसी भी कीमत पर परमाणु हथियार नहीं बनाने दिया जाएगा। अमेरिका की प्रमुख मांगें हैं: यूरेनियम संवर्धन (Enrichment) पूरी तरह बंद हो क्षेत्रीय हथियारबंद समूहों को समर्थन रोका जाए सूत्रों के मुताबिक, वार्ता के दौरान ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम को जारी रखने के संकेत दिए थे, जिससे गतिरोध और गहरा गया। NATO पर भी ट्रंप का हमला अमेरिकी राष्ट्रपति ने NATO पर भी नाराजगी जताई। उन्होंने कहा: अमेरिका संगठन पर भारी खर्च करता है लेकिन संकट के समय सहयोग नहीं मिलता NATO की भूमिका की फिर से समीक्षा की जाएगी ईरान की चेतावनी ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड ने चेतावनी दी है कि अगर हॉर्मुज क्षेत्र में कोई सैन्य हस्तक्षेप हुआ, तो उसका कड़ा जवाब दिया जाएगा। स्थिति को संभालने के लिए Pakistan, European Union, Oman और Russia कूटनीतिक प्रयास कर रहे हैं। मिडिल ईस्ट में बढ़ा तनाव इस पूरे घटनाक्रम के बीच Israel की लेबनान में सैन्य गतिविधियों ने क्षेत्रीय तनाव को और बढ़ा दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर हालात जल्द नहीं संभले, तो इसका असर वैश्विक अर्थव्यवस्था और ऊर्जा बाजार पर लंबे समय तक पड़ सकता है।
मध्य पूर्व में जारी तनाव के बीच रूस ने ईरान और अमेरिका के बीच हुए सीजफायर का स्वागत तो किया, लेकिन साथ ही वॉशिंगटन और उसके सहयोगियों पर तीखा हमला भी बोला है। रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने साफ शब्दों में कहा कि यह संघर्ष अभी समाप्त नहीं हुआ है और क्षेत्र में हालात अब भी बेहद नाजुक बने हुए हैं। लावरोव ने कहा कि रूस मिडिल ईस्ट में स्थायी शांति चाहता है, जो किसी एक देश की दादागिरी पर नहीं बल्कि सभी क्षेत्रीय शक्तियों के संतुलन पर आधारित हो। उन्होंने चेतावनी दी कि सैन्य कार्रवाई के जरिए इस संकट का समाधान संभव नहीं है और अमेरिका का अभियान इतिहास में एक असफल प्रयास के रूप में दर्ज हो सकता है। रूस ने इस पूरे घटनाक्रम को पश्चिमी शक्तियों की कमजोरी के तौर पर भी पेश किया। NATO, European Union और ब्रिटेन की भूमिका पर सवाल उठाते हुए मॉस्को ने कहा कि ईरान को घेरने की रणनीति पूरी तरह विफल रही है। इससे पश्चिमी सैन्य गठबंधन की प्रभावशीलता पर गंभीर प्रश्न खड़े हो गए हैं। क्रेमलिन का मानना है कि भले ही पाकिस्तान में बातचीत और अस्थायी युद्धविराम की कोशिशें हो रही हैं, लेकिन जमीनी हालात अभी भी विस्फोटक हैं। रूस ने स्पष्ट किया कि “War Is Not Over” और क्षेत्र में संघर्ष की आशंका बनी हुई है। इस बीच, इस टकराव का आर्थिक पहलू भी चर्चा में है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में बाधा के कारण वैश्विक तेल और उर्वरक आपूर्ति प्रभावित हुई, जिसका सीधा लाभ रूस को मिला। दुनिया के बड़े ऊर्जा निर्यातकों में शामिल रूस की मांग अचानक बढ़ी और कीमतों में उछाल से उसकी अर्थव्यवस्था को मजबूती मिली। रूस ने यह भी संकेत दिया कि मिडिल ईस्ट की भू-राजनीति अब केवल अमेरिका के नियंत्रण में नहीं है। मॉस्को और चीन की बढ़ती सक्रियता ने इस क्षेत्र में शक्ति संतुलन को बदल दिया है। संयुक्त राष्ट्र में वीटो जैसे कदमों के जरिए यह साफ हो चुका है कि अब वैश्विक फैसले बहुध्रुवीय व्यवस्था में लिए जा रहे हैं। कुल मिलाकर, रूस का संदेश साफ है-ईरान सीजफायर के बावजूद संकट टला नहीं है, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन की नई लड़ाई शुरू हो चुकी है।
ईरान के साथ तनाव कम होने के बाद Donald Trump ने एक बार फिर वैश्विक राजनीति में हलचल मचा दी है। इस बार उन्होंने न सिर्फ NATO पर तीखा हमला बोला, बल्कि Greenland को लेकर अपनी पुरानी महत्वाकांक्षा को भी दोहराया। ईरान के बाद बदला अमेरिकी फोकस हाल ही में Iran के साथ हुए सीजफायर के बाद ट्रंप का रुख फिर आक्रामक नजर आया। उन्होंने दावा किया कि सैन्य अभियान के दौरान सहयोगी देशों से उम्मीद के मुताबिक समर्थन नहीं मिला, जिससे पश्चिमी गठबंधन की एकजुटता पर सवाल खड़े हो गए। NATO पर करारा हमला ट्रंप ने NATO को “पेपर टाइगर” बताते हुए कहा कि जब अमेरिका को जरूरत थी, तब सहयोगी देश साथ नहीं आए। उनका यह बयान न सिर्फ आलोचना, बल्कि NATO की विश्वसनीयता पर सीधा हमला माना जा रहा है। यह टिप्पणी ट्रंप की ‘America First’ नीति को फिर से उजागर करती है, जिसमें वह अंतरराष्ट्रीय गठबंधनों से ज्यादा एकतरफा रणनीति को प्राथमिकता देते हैं। ग्रीनलैंड पर फिर जताई दिलचस्पी ट्रंप ने सोशल मीडिया पर ग्रीनलैंड को लेकर टिप्पणी करते हुए अपनी पुरानी योजना की ओर इशारा किया। इससे पहले भी वह डेनमार्क से ग्रीनलैंड खरीदने का प्रस्ताव दे चुके हैं, जिसे खारिज कर दिया गया था। ग्रीनलैंड का महत्व सिर्फ भौगोलिक नहीं, बल्कि रणनीतिक भी है- आर्कटिक क्षेत्र में अहम स्थिति रूस और चीन की गतिविधियों पर नजर दुर्लभ खनिज और ऊर्जा संसाधन अमेरिकी सैन्य उपस्थिति की संभावनाएं ट्रांस-अटलांटिक रिश्तों पर असर ट्रंप के इस बयान से अमेरिका और यूरोपीय देशों के बीच तनाव बढ़ सकता है। NATO जैसे गठबंधन में भरोसे की कमी और कूटनीतिक खींचतान तेज होने की आशंका है। नई जियोपॉलिटिक्स की ओर संकेत विशेषज्ञ मानते हैं कि ट्रंप का यह रुख दिखाता है कि अमेरिका अब मिडिल ईस्ट के साथ-साथ आर्कटिक क्षेत्र में भी अपनी रणनीतिक पकड़ मजबूत करना चाहता है। यह बदलाव आने वाले समय में वैश्विक राजनीति को और जटिल बना सकता है। ईरान सीजफायर के तुरंत बाद ट्रंप का NATO और ग्रीनलैंड पर बयान साफ करता है कि अमेरिकी विदेश नीति में आक्रामकता और तेजी से बदलती प्राथमिकताएं बनी हुई हैं। ग्रीनलैंड का मुद्दा आने वाले समय में बड़ा कूटनीतिक विवाद बन सकता है।
वाशिंगटन,एजेंसियां। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर अपने सहयोगी देशों पर दबाव बढ़ाते हुए संकेत दिया है कि यदि नाटो देश होर्मुज स्ट्रेट को खुलवाने के लिए अमेरिका का साथ नहीं देते, तो यूक्रेन को हथियारों की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। इस बयान ने न सिर्फ यूरोप में बेचैनी बढ़ा दी है, बल्कि रूस-यूक्रेन युद्ध के समीकरणों को भी नया मोड़ दे दिया है। होर्मुज स्ट्रेट इस समय वैश्विक राजनीति और ऊर्जा सुरक्षा का सबसे संवेदनशील बिंदु बना हुआ है। दुनिया के तेल और गैस व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी समुद्री मार्ग से गुजरता है। अमेरिका और इजराइल के हमलों के बाद ईरान ने इस जलमार्ग पर प्रभावी दबाव बना दिया है, जिससे अंतरराष्ट्रीय शिपिंग और ऊर्जा बाजार में तनाव बढ़ गया है। ट्रंप चाहते हैं कि नाटो देश अमेरिका के नेतृत्व में एक सैन्य या नौसैनिक अभियान का हिस्सा बनें, लेकिन कई यूरोपीय देशों ने इसे “हमारा युद्ध नहीं” कहकर दूरी बना ली है। यूक्रेन बन सकता है दबाव की राजनीति का शिकार यूरोपीय देशों की इस हिचकिचाहट से नाराज ट्रंप अब यूक्रेन को दबाव के औजार के रूप में इस्तेमाल कर सकते हैं। यूक्रेन फरवरी 2022 से रूस के खिलाफ लगातार युद्ध लड़ रहा है और उसकी सैन्य क्षमता काफी हद तक पश्चिमी हथियारों और वित्तीय सहायता पर निर्भर रही है। यदि अमेरिका हथियारों की आपूर्ति या समर्थन कम करता है, तो इसका सीधा असर यूक्रेन की युद्ध क्षमता पर पड़ेगा। ऐसी स्थिति रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के लिए रणनीतिक बढ़त साबित हो सकती है। पश्चिमी मोर्चे पर कमजोरी आने का मतलब यह होगा कि रूस को सैन्य और मनोवैज्ञानिक दोनों स्तरों पर फायदा मिल सकता है। नाटो के भीतर बढ़ी बेचैनी रिपोर्टों के अनुसार, ट्रंप की चेतावनी के बाद नाटो के भीतर कूटनीतिक हलचल तेज हो गई है। नाटो महासचिव मार्क रूटे ने फ्रांस, जर्मनी और ब्रिटेन जैसे प्रमुख देशों के साथ एक संयुक्त बयान जारी करने की कोशिश की है, ताकि होर्मुज में सुरक्षित आवाजाही के समर्थन का संकेत दिया जा सके। माना जा रहा है कि यह कदम ट्रंप को शांत करने और यूक्रेन के लिए अमेरिकी समर्थन बनाए रखने की कोशिश का हिस्सा है। ट्रंप पहले भी नाटो को लेकर तीखी टिप्पणी कर चुके हैं। उनका आरोप है कि अमेरिका सहयोगियों की सुरक्षा करता है, लेकिन बदले में समान प्रतिबद्धता नहीं मिलती। हालांकि अमेरिका का नाटो से बाहर निकलना आसान नहीं है, लेकिन यूक्रेन की मदद रोकना ट्रंप के हाथ में एक प्रभावी राजनीतिक हथियार जरूर बन सकता है।
अमेरिका और ईरान के बीच जारी सैन्य संघर्ष अब निर्णायक मोड़ पर पहुंचता नजर आ रहा है। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने बड़ा बयान देते हुए कहा है कि अमेरिका अपने सैन्य लक्ष्यों को तय समय से पहले हासिल कर रहा है और अब ऑपरेशन अपने अंतिम पड़ाव में है। रुबियो ने कहा, “हम अपने हर लक्ष्य पर तय समय से आगे चल रहे हैं। अब हमें फिनिश लाइन साफ दिखाई दे रही है।” उन्होंने ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ को आधुनिक दौर का बेहद कुशल सैन्य अभियान बताते हुए कहा कि इसे इतिहास में इसकी टैक्टिकल क्षमता के लिए याद किया जाएगा। सैन्य लक्ष्यों को किया स्पष्ट रुबियो ने उन अटकलों को खारिज किया जिनमें कहा जा रहा था कि अमेरिका के लक्ष्य स्पष्ट नहीं हैं। उन्होंने बताया कि इस अभियान का उद्देश्य ईरान की वायुसेना, नौसेना, मिसाइल फैक्ट्रियों और लॉन्च सिस्टम को निष्क्रिय करना था, जिसमें अमेरिका को बड़ी सफलता मिली है। ईरान पर सख्त टिप्पणी विदेश मंत्री ने ईरान की तुलना उत्तर कोरिया से करते हुए कहा कि वह ऐसे रास्ते पर था, जहां उसकी मिसाइलें सीधे अमेरिका तक पहुंच सकती थीं। उन्होंने आरोप लगाया कि ईरान ने अपनी जनता के संसाधनों का इस्तेमाल विकास के बजाय हथियारों और आतंकवाद पर किया, जिससे देश की हालत खराब हो गई है। कूटनीति पर भी दिया जवाब युद्ध को लेकर उठ रही आलोचनाओं पर रुबियो ने कहा कि अमेरिका ने कूटनीतिक रास्तों को पूरी तरह अपनाया था। “राष्ट्रपति ट्रंप हमेशा बातचीत को प्राथमिकता देते हैं, लेकिन ईरान को बातचीत के नाम पर समय बर्बाद करने की अनुमति नहीं दी जा सकती,” उन्होंने कहा। रुबियो ने यह भी कहा कि ईरान के पास 60% संवर्धित यूरेनियम रखने का कोई उचित कारण नहीं है और यह सीधे तौर पर परमाणु हथियार कार्यक्रम की ओर इशारा करता है। होर्मुज और NATO पर सख्त रुख रुबियो ने होर्मुज जलडमरूमध्य को अंतरराष्ट्रीय जल क्षेत्र बताते हुए कहा कि वहां वाणिज्यिक जहाजों की आवाजाही रोकना अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन है। साथ ही NATO पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि अगर अमेरिका अपने हितों की रक्षा के लिए गठबंधन के तहत अपने यूरोपीय ठिकानों का इस्तेमाल नहीं कर सकता, तो यह व्यवस्था एकतरफा बनकर रह जाएगी।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।