रांची। कभी नक्सलवाद की गंभीर समस्या से जूझने वाला झारखंड अब लगभग नक्सल मुक्त होने की दिशा में पहुंच चुका है। राज्य में अब केवल कुछ इनामी नक्सली और छोटे समूह ही बचे हैं, जिनकी संगठनात्मक क्षमता और प्रभाव पहले की तुलना में काफी कमजोर हो चुका है। केंद्रीय सुरक्षा बलों और झारखंड पुलिस की संयुक्त कार्रवाई, लगातार अभियानों और जवानों के बलिदान ने राज्य में लाल आतंक की कमर तोड़ दी है। 14 वर्षों में हजारों गिरफ्तारियां और सैकड़ों सरेंडर पिछले 14 वर्षों के दौरान झारखंड पुलिस ने नक्सलवाद के खिलाफ व्यापक अभियान चलाए। इस अवधि में 225 से अधिक नक्सली मारे गए, 5,000 से ज्यादा गिरफ्तार किए गए और 300 से अधिक नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया। सुरक्षा बलों ने बड़ी मात्रा में हथियार, गोला-बारूद और आईईडी भी बरामद किए हैं। पुलिस के अनुसार, राज्य का अधिकांश हिस्सा नक्सली प्रभाव से मुक्त हो चुका है। वर्तमान में पश्चिम सिंहभूम जिले का सारंडा क्षेत्र ही ऐसा इलाका है जहां कुछ नक्सलियों की मौजूदगी बताई जाती है, लेकिन वहां भी उनकी गतिविधियां बेहद सीमित हो गई हैं। 2025 और 2026 रहे सबसे सफल वर्ष नक्सल विरोधी अभियानों के लिहाज से वर्ष 2025 और 2026 काफी अहम रहे हैं। वर्ष 2025 में 34 नक्सली मारे गए, जबकि 2026 में मई तक 22 नक्सली एनकाउंटर में ढेर किए जा चुके हैं। बूढ़ा पहाड़, पारसनाथ, लुगु पहाड़ी और बुलबुल जैसे कभी नक्सलियों के मजबूत गढ़ माने जाने वाले क्षेत्रों से भी उनका प्रभाव समाप्त कर दिया गया है। 2014 के बाद बदली रणनीति, मिली बड़ी सफलता झारखंड गठन के शुरुआती वर्षों में नक्सलियों का दबदबा काफी मजबूत था। वर्ष 2000 से 2012 तक राज्य के कई इलाकों में नक्सली संगठन खुलेआम सक्रिय थे। हालांकि 2014 के बाद पुलिस और केंद्रीय बलों ने रणनीति में बदलाव किया और लगातार आक्रामक अभियान चलाए। इसके परिणामस्वरूप कई शीर्ष नक्सली नेता मारे गए या गिरफ्तार किए गए। विशेषज्ञों का मानना है कि ऑपरेशन ग्रीन हंट और बाद के संयुक्त अभियानों ने नक्सलियों के आर्थिक और सैन्य नेटवर्क को गंभीर नुकसान पहुंचाया, जिससे उनका प्रभाव लगातार घटता गया। सफलता की राह में जवानों ने दी बड़ी कुर्बानी नक्सलवाद के खिलाफ इस लड़ाई में सुरक्षा बलों को भी भारी कीमत चुकानी पड़ी है। झारखंड राज्य गठन के बाद से अब तक 562 से अधिक पुलिसकर्मी और सुरक्षाकर्मी शहीद हो चुके हैं। वर्ष 2002 में सबसे अधिक 69 जवान शहीद हुए थे। हालांकि हाल के वर्षों में यह संख्या काफी कम हो गई है, जो सुरक्षा स्थिति में सुधार का संकेत है। घट रही हैं नक्सली घटनाएं झारखंड पुलिस के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2026 के शुरुआती महीनों में पूरे राज्य में नक्सली घटनाओं की संख्या बेहद कम रही है। जनवरी 2026 में केवल पांच मामले दर्ज किए गए, जबकि फरवरी से अप्रैल तक कुल 25 घटनाएं सामने आईं। इनमें अधिकांश मामले नक्सलियों की गिरफ्तारी, एनकाउंटर या हथियार बरामदगी से जुड़े थे। नक्सल मुक्त झारखंड की ओर बढ़ता राज्य लगातार आत्मसमर्पण, सफल अभियानों और घटती नक्सली गतिविधियों ने संकेत दिया है कि झारखंड नक्सलवाद के अंतिम चरण की लड़ाई लड़ रहा है। पुलिस और सुरक्षा बलों की रणनीति, स्थानीय सहयोग और जवानों के बलिदान ने राज्य को शांति और विकास की नई राह पर आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। अब उम्मीद की जा रही है कि आने वाले समय में झारखंड पूरी तरह नक्सल मुक्त राज्य के रूप में अपनी पहचान स्थापित करेगा।
रांची। झारखंड पुलिस को नक्सल विरोधी अभियान में बड़ी कामयाबी मिली है। प्रतिबंधित उग्रवादी संगठन पीएलएफआई (PLFI) के स्टेट चीफ और 10 लाख रुपये के इनामी नक्सली अमृत होरो उर्फ मेचो उर्फ सूर्या को रांची पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। पुलिस ने उसके पास से एक ऑटोमैटिक पिस्टल, चार जिंदा गोलियां, तीन मोबाइल फोन और संगठन से जुड़े नक्सली पर्चे बरामद किए हैं। रांची एसएसपी राकेश रंजन ने बताया कि पुलिस को गुप्त सूचना मिली थी कि अमृत होरो लापुंग थाना क्षेत्र के महुगांव जंगल में अपने साथियों के साथ मौजूद है और किसी बड़ी घटना को अंजाम देने की योजना बना रहा है। इसके बाद रूरल एसपी गौरव गोस्वामी के निर्देशन में और डीएसपी दीपक कुमार के नेतृत्व में विशेष छापेमारी टीम गठित की गई। जंगल में घेराबंदी कर की गई गिरफ्तारी पुलिस टीम ने देर रात जंगल इलाके में सर्च अभियान चलाया और घेराबंदी कर एक हथियारबंद व्यक्ति को पकड़ लिया। पूछताछ में उसने अपनी पहचान अमृत होरो के रूप में बताई। उसने यह भी स्वीकार किया कि वह पीएलएफआई का स्टेट चीफ है। 50 से ज्यादा मामलों में था वांटेड पुलिस के अनुसार अमृत होरो पिछले करीब 16 वर्षों से झारखंड के कई जिलों में सक्रिय था। उसके खिलाफ रांची, खूंटी, गुमला, लोहरदगा और पश्चिमी सिंहभूम समेत विभिन्न जिलों में 50 से अधिक आपराधिक मामले दर्ज हैं। इनमें हत्या, रंगदारी, लेवी वसूली, आगजनी और फायरिंग जैसे गंभीर अपराध शामिल हैं। पूछताछ में उसने खुलासा किया कि संगठन के नाम पर व्यवसायियों, ठेकेदारों और निर्माण कंपनियों से फोन और सोशल मीडिया के जरिए लेवी मांगी जाती थी। रकम नहीं देने पर जान से मारने की धमकी दी जाती थी। कई बड़ी घटनाओं में शामिल रहा अमृत होरो का नाम कई चर्चित घटनाओं में सामने आया था। पुलिस का दावा है कि उसकी गिरफ्तारी से पीएलएफआई संगठन को बड़ा झटका लगा है। एसएसपी राकेश रंजन ने कहा कि संगठन के शीर्ष नेतृत्व का लगभग सफाया हो चुका है और इससे उग्रवादी गतिविधियों पर नियंत्रण में मदद मिलेगी।
रामगढ़। झारखंड के रामगढ़ जिले में पुलिस ने संगठित अपराध के खिलाफ बड़ी कार्रवाई करते हुए राहुल दुबे गैंग से जुड़े छह अपराधियों को गिरफ्तार किया है। इसके अलावा एक किशोर को भी निरुद्ध किया गया है। पुलिस ने आरोपियों के पास से हथियार, जिंदा कारतूस, मोबाइल फोन और मोटरसाइकिल बरामद किए हैं। यह कार्रवाई पुलिस अधीक्षक मुकेश कुमार लुणायत के निर्देश पर पतरातु अनुमंडल पुलिस पदाधिकारी के नेतृत्व में गठित विशेष छापेमारी दल ने की। पुलिस के अनुसार अपराधी किसी बड़ी घटना को अंजाम देने की तैयारी में थे। गुप्त सूचना पर हुई छापेमारी पुलिस को 25 मई को गुप्त सूचना मिली थी कि पतरातु थाना क्षेत्र में कुछ अपराधी संगठित होकर किसी बड़ी वारदात की योजना बना रहे हैं। सूचना के सत्यापन के बाद पुलिस टीम ने त्वरित कार्रवाई करते हुए छापेमारी की और सभी आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया। छापेमारी के दौरान पुलिस ने एक देशी लोडेड पिस्टल, 34 जिंदा राउंड, दो मैगजीन, तीन मोटरसाइकिल और छह मोबाइल फोन बरामद किए। कई गोलीबारी मामलों में शामिल होने की बात कबूली पुलिस के मुताबिक गिरफ्तार अपराधियों ने पूछताछ में रेलवे फ्लाईओवर, ओसम डेयरी प्लांट और अल्ट्राटेक सीमेंट प्लांट में हुई गोलीबारी की घटनाओं में अपनी संलिप्तता स्वीकार की है। गिरफ्तार आरोपियों की पहचान विकास साव, विशाल कुमार, बिंदु कुमार रवि, हीरालाल कुमार, दिगंबर प्रजापति उर्फ डेगन और एहतेसाम अंसारी उर्फ दुलर्भ के रूप में हुई है। पुलिस ने बताया कि विकास साव और दिगंबर प्रजापति के खिलाफ पहले से कई गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हैं। न्यायिक अभिरक्षा में भेजे जाएंगे आरोपी इस मामले में पतरातु थाना कांड संख्या 126/26 के तहत विभिन्न धाराओं में केस दर्ज किया गया है। पुलिस सभी आरोपियों को न्यायिक अभिरक्षा में भेजने की प्रक्रिया पूरी कर रही है। कार्रवाई में एसडीपीओ पतरातु राघवेंद्र शर्मा समेत कई थाना प्रभारी और तकनीकी शाखा के पुलिसकर्मी शामिल थे।
मुंबई के करी रोड इलाके में स्थित जैन मंदिर में हुई 1.75 करोड़ रुपये के गहनों की चोरी के मामले को पुलिस ने महज 48 घंटे में सुलझाकर बड़ी सफलता हासिल की है। इस सनसनीखेज मामले में आरोपी को मध्य प्रदेश से गिरफ्तार कर लिया गया, जो नेपाल भागने की फिराक में था। क्या है पूरा मामला? जानकारी के अनुसार, 30 मार्च की तड़के सुबह आरोपी ने सुनसान का फायदा उठाते हुए कालाचौकी जैन मंदिर में घुसकर भगवान की मूर्तियों पर चढ़े सोने के आभूषण और हीरे जड़ा टीका चोरी कर लिया। सुबह मंदिर खुलने पर घटना का खुलासा हुआ, जिससे इलाके में हड़कंप मच गया। CCTV और एक गलती ने पकड़ा दिया आरोपी जांच के दौरान पुलिस ने 200 से 300 CCTV कैमरों की फुटेज खंगाली। आरोपी की मूवमेंट धीरे-धीरे ट्रेस की गई एक होटल में बैठकर की गई ऑनलाइन पेमेंट सबसे बड़ा सुराग बनी ट्रांजैक्शन से मोबाइल नंबर मिला कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) से लोकेशन ट्रैक हुई इन्हीं तकनीकी सबूतों के आधार पर पुलिस आरोपी तक पहुंच गई। नेपाल भागने की थी पूरी प्लानिंग पुलिस जांच में पता चला कि आरोपी मध्य प्रदेश पहुंच चुका था और नेपाल भागने की तैयारी कर रहा था। आरोपी अपनी बहन के घर पर छिपा था पुलिस ने इलाके को घेर लिया आरोपी ने छत से कूदकर भागने की कोशिश की लेकिन पुलिस ने उसे पकड़ लिया आरोपी का आपराधिक रिकॉर्ड गिरफ्तार आरोपी मध्य प्रदेश के भिंड जिले का रहने वाला है और चंबल क्षेत्र का शातिर अपराधी बताया जा रहा है। 18 से ज्यादा आपराधिक मामले दर्ज लूट, डकैती और आर्म्स एक्ट के केस शामिल चोरी का पूरा माल बरामद पुलिस की बड़ी कामयाबी मुंबई पुलिस की इस कार्रवाई को बड़ी सफलता माना जा रहा है। महज 48 घंटे में केस सुलझाना और आरोपी को पकड़ना पुलिस की तेज और तकनीकी जांच का उदाहरण है। निष्कर्ष यह मामला दिखाता है कि आधुनिक तकनीक और सतर्क जांच के जरिए बड़े से बड़े अपराध को भी कम समय में सुलझाया जा सकता है। साथ ही यह भी साफ है कि अपराधी कितनी भी योजना बना ले, एक छोटी सी गलती उसे पकड़वा सकती है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।