रांची। पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र की राजनीति में अपनी मौजूदगी मजबूत करने के बाद भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) अब पंजाब में संगठन विस्तार और चुनावी जमीन तैयार करने में जुटी है। 2027 के विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए पार्टी राज्य में अपनी रणनीति को धार देने में लगी है। राजनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चा तेज है कि क्या पंजाब भी आने वाले समय में बंगाल की तरह भाजपा और विपक्ष के बीच सीधी राजनीतिक लड़ाई का केंद्र बनेगा। बीजेपी पंजाब में कानून-व्यवस्था, नशे की समस्या, किसानों से जुड़े मुद्दों और विकास के एजेंडे को प्रमुखता से उठा रही है। पार्टी का प्रयास शहरी क्षेत्रों के साथ-साथ ग्रामीण इलाकों में भी अपने संगठन को मजबूत करना है। इसके लिए बूथ स्तर तक कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने और नए चेहरों को जोड़ने की रणनीति पर काम किया जा रहा है। राघव चड्ढा फैक्टर पर नजर पंजाब की राजनीति में राघव चड्ढा का नाम लगातार चर्चा में बना हुआ है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आम आदमी पार्टी के प्रमुख चेहरों में रहे राघव चड्ढा को लेकर चल रही अटकलों ने राज्य की राजनीति को नई दिशा दी है। हालांकि, उनके राजनीतिक भविष्य को लेकर अलग-अलग दावे किए जा रहे हैं, लेकिन अभी तक किसी बड़े बदलाव की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। इसके बावजूद उनका नाम पंजाब की बदलती सियासी तस्वीर में अहम माना जा रहा है। क्या पंजाब में दोहराएगा बंगाल वाला समीकरण? विशेषज्ञों का कहना है कि पंजाब की राजनीतिक परिस्थितियां पश्चिम बंगाल से काफी अलग हैं। यहां आम आदमी पार्टी सत्ता में है, जबकि शिरोमणि अकाली दल, कांग्रेस और बीजेपी चार प्रमुख ताकतों के रूप में मैदान में हैं। ऐसे में बीजेपी के लिए चुनौती आसान नहीं होगी। फिर भी पार्टी संगठन का विस्तार, नए सामाजिक समीकरण और आक्रामक चुनावी रणनीति के जरिए खुद को मजबूत विकल्प के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रही है।आप के दो पूर्व नेता रेस में हैं। पंजाब की सियासी ताकत की बात करे तो पंजाब विधानसभा में कुल 117 सीटें हैं। विधानसभा में बीजेपी के दो MLA हैं।पंजाब में लोकसभा की कुल सीटें 13 हैं। बीजेपी के पास कोई सीट नहीं है।पंजाब में राज्यसभा की कुल सीटें सात हैं। इनमें छह बीजेपी के पास हैं। आप के दो पूर्व नेता हैं रेस में इधर पश्चिम बंगाल की जीत के बाद पंजाब को गंभीरता से ले रही बीजेपी राज्य को केंद्रीय मंत्रिमंडल फेरबदल में अधिक तवज्जो दे सकती है। चर्चा है कि पंजाब में AAP छोड़कर आए नेताओं को इनाम मिल सकता है। इनमें सेलिब्रेटी फेस राघव चड्ढा का नाम सबसे आगे है। उनके साथ अशोक मित्तल (लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी) का भी नाम चल रहा है। चर्चा है कि दोनों में किसी एक को मंत्री बनाया जा सकता है, लेकिन अभी फैसला नहीं हुआ है। रवनीत बिट्टू को बीजेपी चुनावों में झोंकना चाहती है। उनकी जगह पर हाल ही में मध्य प्रदेश से राज्यसभा सांसद बने तरुण चुघ को लाया जा सकता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के कद्दावर नेता चुघ पंजाब चुनाव में पार्टी को मजबूती देंगे। वह पंजाब से ही आते हैं। अब सभी की नजर इस बात पर टिकी है कि 2027 के विधानसभा चुनाव तक पंजाब की सियासत किस ओर करवट बैठती है ये तो आने वाला वक्त ही बताएगा। और क्या बीजेपी राज्य में वैसी ही राजनीतिक बढ़त हासिल कर पाएगी जैसी उसने बंगाल या अन्य राज्यों में दर्ज की है?
पुणे, एजेंसियां। चर्चित केतन अग्रवाल हत्याकांड की जांच अब निर्णायक मोड़ पर पहुंचती दिखाई दे रही है। पुलिस ने मामले के मुख्य आरोपी चेतन चौधरी का गेट (Gait) एनालिसिस कराने का फैसला लिया है। जांच एजेंसियों का मानना है कि इस वैज्ञानिक परीक्षण से हत्या वाले दिन चेतन की गतिविधियों और घटनास्थल पर उसकी मौजूदगी से जुड़े महत्वपूर्ण सुराग मिल सकते हैं। इसी कड़ी में पुलिस मंगलवार को चेतन को लेकर एक बार फिर लोहागढ़ किला पहुंची, जहां पूरे घटनाक्रम का पुनर्निर्माण (क्राइम सीन रीक्रिएशन) किया जाएगा। पुलिस हिरासत पांच दिन और बढ़ी सोमवार को महाराष्ट्र की एक अदालत ने मुख्य आरोपी सिया गोयल और चेतन चौधरी की पुलिस हिरासत पांच दिन के लिए बढ़ा दी। पुलिस ने अदालत को बताया कि मामले की जांच अभी जारी है और आरोपियों से पूछताछ के साथ-साथ घटनास्थल पर साक्ष्यों की पुष्टि के लिए उनका पुलिस हिरासत में रहना जरूरी है। पासपोर्ट जलाने का भी आरोप पुलिस जांच के अनुसार, सिया गोयल ने कथित तौर पर केतन का पासपोर्ट चोरी कर उसे फाड़कर जला दिया था। दावा है कि परिवार की प्रस्तावित बाली यात्रा को रोकने और केतन के साथ विदेश जाने से बचने के लिए उसने ऐसा किया। जांच में कार चालक के बयान को भी अहम माना जा रहा है, जिसने बताया कि यात्रा के दौरान सिया कुछ देर के लिए अकेले कार तक गई थी। हत्या की साजिश के मिले संकेत पुलिस का आरोप है कि 18 जून को लोहागढ़ किले पर केतन अग्रवाल को खाई में धक्का देकर हत्या की गई। शुरुआत में इसे हादसा माना गया था, लेकिन बाद की जांच में हत्या की आशंका सामने आई। पुलिस के मुताबिक, सिया और चेतन के बीच पिछले छह महीनों में 2,000 से अधिक फोन कॉल और लगभग 238 घंटे की बातचीत हुई थी। जांच एजेंसियों को शक है कि इन्हीं बातचीत के दौरान कथित साजिश रची गई। पुलिस यह भी दावा कर रही है कि घटना से पहले भी केतन को खाई में धक्का देने की एक असफल कोशिश की गई थी। अब गेट एनालिसिस, क्राइम सीन रीक्रिएशन और अन्य फॉरेंसिक जांच के आधार पर पुलिस इस हाई-प्रोफाइल मामले की कड़ियों को जोड़ने में जुटी है।
कोलकाता: पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के भीतर जारी कथित असंतोष और संगठनात्मक चुनौतियों ने अंतरराष्ट्रीय मीडिया का भी ध्यान अपनी ओर खींचा है। विभिन्न वैश्विक प्रकाशनों में प्रकाशित विश्लेषणों में पार्टी की मौजूदा स्थिति, नेतृत्व शैली और भविष्य की राजनीतिक संभावनाओं पर चर्चा की गई है। वैश्विक मीडिया में टीएमसी संकट पर चर्चा अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों में प्रकाशित रिपोर्टों और विश्लेषणों में टीएमसी के भीतर उभर रहे मतभेदों को पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम के रूप में देखा गया है। कई लेखों में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के लंबे राजनीतिक सफर और राज्य की राजनीति में उनकी भूमिका का उल्लेख करते हुए वर्तमान परिस्थितियों का आकलन किया गया है। विश्लेषकों ने ममता बनर्जी को एक संघर्षशील और जनाधार वाली नेता बताया है, जिन्होंने लंबे राजनीतिक संघर्ष के बाद राज्य में अपनी मजबूत पहचान बनाई। कुछ रिपोर्टों में पार्टी के भीतर नेतृत्व और संगठनात्मक फैसलों को लेकर उठ रहे सवालों का भी जिक्र किया गया है। संगठनात्मक चुनौतियों पर केंद्रित रहे विश्लेषण विदेशी मीडिया में प्रकाशित कुछ लेखों में दावा किया गया है कि पार्टी के भीतर बढ़ते मतभेदों और नेतृत्व को लेकर असंतोष ने संगठन के सामने नई चुनौतियां खड़ी की हैं। रिपोर्टों में यह भी कहा गया कि वरिष्ठ नेताओं और जमीनी कार्यकर्ताओं के बीच समन्वय बनाए रखना टीएमसी के लिए बड़ी परीक्षा बन सकता है। कुछ विश्लेषणों में चुनावी रणनीतियों और संगठनात्मक ढांचे में हुए बदलावों का भी उल्लेख किया गया है, जिन्हें पार्टी की वर्तमान स्थिति से जोड़कर देखा जा रहा है। राजनीतिक भविष्य को लेकर अलग-अलग राय अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक विश्लेषकों की राय इस मुद्दे पर बंटी हुई दिखाई देती है। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि टीएमसी अभी भी पश्चिम बंगाल की एक प्रमुख राजनीतिक ताकत बनी हुई है और पार्टी नेतृत्व के पास हालात संभालने का पर्याप्त अनुभव है। वहीं, कुछ अन्य विश्लेषकों का कहना है कि यदि संगठन के भीतर मतभेद बढ़ते हैं, तो इसका असर आगामी राजनीतिक समीकरणों पर पड़ सकता है। नेतृत्व और संगठन दोनों के लिए अहम दौर राजनीतिक जानकारों का मानना है कि मौजूदा परिस्थितियां टीएमसी नेतृत्व के लिए एक महत्वपूर्ण परीक्षा साबित हो सकती हैं। पार्टी को एकजुट बनाए रखना और कार्यकर्ताओं का विश्वास कायम रखना आने वाले समय में सबसे बड़ी चुनौती होगी। टीएमसी की ओर से अब तक पार्टी के भीतर किसी बड़े संकट की आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है। पार्टी नेतृत्व लगातार संगठन की एकता और मजबूती पर जोर देता रहा है। बंगाल की राजनीति पर बनी रहेगी नजर पश्चिम बंगाल की राजनीति में टीएमसी की भूमिका को देखते हुए राजनीतिक पर्यवेक्षक आने वाले दिनों के घटनाक्रम पर करीबी नजर बनाए हुए हैं। पार्टी के भीतर की स्थिति और नेतृत्व के फैसले न केवल राज्य बल्कि राष्ट्रीय राजनीति पर भी असर डाल सकते हैं।
पश्चिम बंगाल की राजनीति में सोनारपुर में हुई हिंसक घटना ने तृणमूल कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी को राजनीतिक बहस के केंद्र में ला खड़ा किया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह घटना केवल एक सुरक्षा चुनौती नहीं, बल्कि उनके नेतृत्व, जनसंपर्क क्षमता और राजनीतिक परिपक्वता की भी महत्वपूर्ण परीक्षा है। पहली बार खुले जन-विरोध का सामना अब तक अभिषेक बनर्जी की राजनीतिक यात्रा संगठनात्मक मजबूती और सत्ता के प्रभावशाली ढांचे के भीतर आगे बढ़ी है। सोनारपुर में उनके काफिले पर हुए हमले और विरोध प्रदर्शन ने उन्हें पहली बार सीधे सार्वजनिक आक्रोश के सामने ला खड़ा किया है। इस घटना ने राज्य की राजनीति में बढ़ते असंतोष और जनभावनाओं को लेकर नई चर्चा शुरू कर दी है। ममता बनर्जी के संघर्षपूर्ण राजनीतिक सफर से तुलना राजनीतिक पर्यवेक्षक इस घटना की तुलना मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के शुरुआती राजनीतिक जीवन से कर रहे हैं। ममता बनर्जी ने विपक्षी राजनीति के दौर में कई आंदोलनों, विरोध प्रदर्शनों और हमलों का सामना किया था और अक्सर ऐसे घटनाक्रमों को जनसमर्थन में बदलने में सफल रही थीं। विश्लेषकों का मानना है कि सोनारपुर की घटना अभिषेक बनर्जी के लिए भी वैसा ही निर्णायक मोड़ साबित हो सकती है। अब यह देखना होगा कि वे इस चुनौती का राजनीतिक रूप से किस प्रकार सामना करते हैं। पुराने संकेतों की याद राजनीतिक विश्लेषक 2023 के कुर्मी आंदोलन का भी उल्लेख कर रहे हैं, जब झाड़ग्राम में आंदोलनकारियों ने अभिषेक बनर्जी के काफिले का विरोध किया था। बाद में कुर्मी बहुल इलाकों में चुनावी परिणामों ने यह संकेत दिया कि स्थानीय असंतोष को नजरअंदाज करना राजनीतिक रूप से महंगा पड़ सकता है। सोनारपुर की घटना को भी कई विशेषज्ञ इसी व्यापक राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में देख रहे हैं। विशेषज्ञों की राय पूर्व सांसद जवाहर सरकार का कहना है कि यह अभिषेक बनर्जी के राजनीतिक जीवन की एक महत्वपूर्ण परीक्षा है। उनके अनुसार, जिन परिस्थितियों और चुनौतियों का सामना ममता बनर्जी दशकों से करती रही हैं, अभिषेक अब पहली बार उस राजनीतिक वास्तविकता से रूबरू हो रहे हैं। वहीं राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर मैदुल इस्लाम का मानना है कि किसी भी नेता की वास्तविक राजनीतिक पहचान केवल विरासत से नहीं, बल्कि कठिन परिस्थितियों में उसके व्यवहार और जनता से जुड़ाव से तय होती है। उनके अनुसार, यदि अभिषेक विरोध के बावजूद लोगों के बीच सक्रिय बने रहते हैं, तो यह उनके राजनीतिक व्यक्तित्व को नई मजबूती दे सकता है। आगे की राह सोनारपुर की घटना के बाद सबसे बड़ा सवाल यह है कि तृणमूल कांग्रेस और स्वयं अभिषेक बनर्जी इस घटनाक्रम को किस तरह संभालते हैं। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि उनकी प्रतिक्रिया और जनता के साथ संवाद की रणनीति ही तय करेगी कि यह घटना उनके लिए नुकसानदेह साबित होगी या फिर एक नए राजनीतिक अध्याय की शुरुआत बनेगी। फिलहाल इतना तय है कि सोनारपुर की घटना ने अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व को नए सिरे से परखने का अवसर और चुनौती दोनों पैदा कर दी है। आने वाले महीनों में इसका प्रभाव पश्चिम बंगाल की राजनीति पर भी देखने को मिल सकता है।
SIR Impact on Bengal Election 2026: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों के बाद अब राजनीतिक गलियारों में हार और जीत के कारणों को लेकर गहन चर्चा शुरू हो गयी है. तृणमूल कांग्रेस (TMC) की बड़ी हार के पीछे विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR (Special Intensive Revision) प्रक्रिया को एक अहम फैक्टर माना जा रहा है. चुनावी आंकड़ों के विश्लेषण में यह दावा किया जा रहा है कि जिन सीटों पर मतदाता सूची से सबसे ज्यादा नाम हटाये गये, वहां भाजपा को भारी फायदा मिला. मतदाता सूची में बड़े बदलाव और बदला चुनावी गणित चुनाव आयोग की ओर से चलायी गयी SIR प्रक्रिया के दौरान मतदाता सूची से मृत, डुप्लीकेट और कथित फर्जी मतदाताओं के नाम हटाये गये. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इसका सबसे ज्यादा असर उन सीटों पर पड़ा, जहां तृणमूल कांग्रेस का पारंपरिक वोट बैंक मजबूत माना जाता था. बताया जा रहा है कि बंगाल की 177 ऐसी विधानसभा सीटें थीं, जहां हटाये गये मतदाताओं की संख्या 2021 में टीएमसी की जीत के अंतर से अधिक थी. इन सीटों में से 140 से ज्यादा सीटों पर भाजपा ने जीत दर्ज की. इससे यह चर्चा तेज हो गयी है कि मतदाता सूची में बदलाव ने चुनावी नतीजों को प्रभावित किया. 15 हजार से ज्यादा नाम हटे, कई मंत्री हारे विश्लेषण के मुताबिक, करीब 50 सीटों पर 15 हजार से ज्यादा मतदाताओं के नाम हटाये गये थे. इन्हीं सीटों पर टीएमसी के कई बड़े नेताओं और मंत्रियों को हार का सामना करना पड़ा. भाजपा ने इन इलाकों में आक्रामक प्रचार और बूथ स्तर पर मजबूत रणनीति अपनायी, जिसका फायदा उसे चुनाव में मिला. SIR प्रक्रिया से कैसे बदला समीकरण? निर्वाचन आयोग की SIR प्रक्रिया में डिजिटल वेरिफिकेशन, आधार लिंकिंग और रिकॉर्ड मिलान के जरिए मतदाता सूची को अपडेट किया गया. इसके तहत मृत और पलायन कर चुके मतदाताओं के नाम हटाये गये. राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि इससे कथित फर्जी मतदान की संभावना कम हुई और चुनावी प्रक्रिया अधिक पारदर्शी बनी. दूसरी ओर, विपक्षी दलों ने इसे टीएमसी के चुनावी नेटवर्क पर बड़ा झटका बताया. ममता बनर्जी ने पहले ही जतायी थी आशंका चुनाव से पहले मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और टीएमसी नेताओं ने SIR प्रक्रिया पर सवाल उठाये थे. पार्टी का आरोप था कि उनके समर्थकों के नाम जानबूझकर मतदाता सूची से हटाये जा रहे हैं. हालांकि निर्वाचन आयोग ने इन आरोपों को खारिज करते हुए प्रक्रिया को पूरी तरह निष्पक्ष बताया था. अब चुनावी नतीजों के बाद राजनीतिक बहस और तेज हो गयी है. भाजपा का दावा है कि मतदाता सूची की सफाई से वास्तविक जनमत सामने आया, जबकि टीएमसी इसे अपने वोट बैंक को कमजोर करने की रणनीति बता रही है. भाजपा को मिला बड़ा फायदा राज्य में भाजपा ने 207 सीटों तक पहुंचकर ऐतिहासिक प्रदर्शन किया. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि SIR प्रक्रिया, सत्ताविरोधी माहौल और बूथ स्तर की मजबूत रणनीति ने भाजपा को बढ़त दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी. फिलहाल बंगाल की राजनीति में SIR प्रक्रिया सबसे बड़ा चर्चा का विषय बनी हुई है और आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर राजनीतिक टकराव और बढ़ने की संभावना है.
हैदराबाद, एजेंसियां। सनराइजर्स हैदराबाद ने पंजाब किंग्स को 33 रन से हराकर IPL 2026 पॉइंट्स टेबल में टॉप स्थान हासिल कर लिया। वहीं, पंजाब को इस सीजन में लगातार तीसरी हार का सामना करना पड़ा। इस हार के बाद टीम पहले स्थान से खिसककर दूसरे नंबर पर पहुंच गई। राजीव गांधी इंटरनेशनल स्टेडियम में पंजाब ने टॉस जीतकर पहले गेंदबाजी चुनी। इसके बाद हैदराबाद ने 20 ओवर में 3 विकेट पर 235 रन बनाए। जवाब में 236 रन के टारगेट का पीछा करते हुए पंजाब की टीम 20 ओवर में 7 विकेट पर 202 रन ही बना सकी। हैदराबाद की ओर से 2 फिफ्टी लगी पहले बैटिंग करने उतरी हैदराबाद के लिए हेनरिक क्लासन और ईशान किशन ने अर्धशतक लगाए। क्लासन ने 43 बॉल पर 69 और ईशान ने 32 बॉल पर 55 रन बनाए। दोनों के बीच तीसरे विकेट के लिए 88 रन की साझेदारी हुई। क्लासन और नीतीश रेड्डी (29*) के बीच चौथे विकेट के लिए 63 रन की साझेदारी हुई। इसके अलावा अभिषेक शर्मा (35) और ट्रैविस हेड (38) ने 55 रन की ओपनिंग पार्टनरशिप की। पंजाब के लिए लॉकी फर्ग्यूसन, विजयकुमार वैशाख, युजवेंद्र चहल को 1-1 विकेट मिला। काम ना आया कोनोली का शतक पंजाब का प्रदर्शन उम्मीद के मुताबिक नहीं रहा। टीम ने फील्डिंग के दौरान 3 कैच छोड़े, जबकि टारगेट का पीछा करते समय लगातार विकेट गंवाती रही। पंजाब के लिए कूपर कोनोली के अलावा कोई बल्लेबाज बड़ी पारी नहीं खेल सका। कोनोली ने 59 बॉल पर नाबाद 107 रन बनाए। उनके अलावा मार्कस स्टोयनिस ने 28 और सूर्यांश शेडगे ने 25 रन का योगदान दिया। हैदराबाद के लिए पैट कमिंस और शिवांग कुमार ने 2-2 विकेट लिए। नीतीश रेड्डी, ईशान मलिंगा और साकिब हुसैन को 1-1 विकेट मिला। पैट कमिंस प्लेयर ऑफ द् मैच चुने गये।
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों से पहले राज्य की राजनीति अपने चरम पर है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या ममता बनर्जी चौथी बार सत्ता में वापसी कर पाएंगी या इस बार बदलाव की हवा ‘नबान्न’ तक पहुंच जाएगी। करीब 15 वर्षों से सत्ता में काबिज तृणमूल कांग्रेस (TMC) के सामने इस बार बहुस्तरीय चुनौतियां खड़ी हैं, जो चुनावी नतीजों को प्रभावित कर सकती हैं। 1. भ्रष्टाचार के आरोप: छवि पर गहरा असर इस चुनाव में टीएमसी सरकार के खिलाफ सबसे बड़ा मुद्दा भ्रष्टाचार रहा है। शिक्षक भर्ती घोटाला राशन घोटाला कोयला तस्करी मामला इन मामलों में पार्टी के कई बड़े नेताओं की गिरफ्तारी और प्रवर्तन निदेशालय (ED) व केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) की लगातार कार्रवाई ने सरकार की साख को चोट पहुंचाई है। विपक्ष ने इसे “सिस्टमेटिक करप्शन” बताकर जनता के बीच मजबूत नैरेटिव बनाया है। ग्रामीण और शहरी दोनों इलाकों में यह मुद्दा चर्चा का केंद्र बना हुआ है। 2. महिला सुरक्षा और संदेशखाली जैसे विवाद महिला वोट बैंक टीएमसी की सबसे बड़ी ताकत रहा है, लेकिन हालिया घटनाओं ने इस आधार को कमजोर करने की कोशिश की है। संदेशखाली विवाद आरजी कर मेडिकल कॉलेज से जुड़े आरोप इन घटनाओं ने कानून-व्यवस्था और महिला सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने इसे बड़ा चुनावी मुद्दा बनाकर टीएमसी पर तीखा हमला बोला है। 3. एंटी-इन्कम्बेंसी: 15 साल की सत्ता का असर लगातार तीन कार्यकाल तक सत्ता में रहने के बाद एंटी-इन्कम्बेंसी का असर साफ दिखाई दे रहा है। जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं की दबंगई के आरोप ‘सिंडिकेट राज’ की शिकायतें स्थानीय प्रशासन पर भ्रष्टाचार के आरोप हालांकि, राज्य सरकार की योजनाएं–जैसे महिला और गरीब वर्ग के लिए आर्थिक सहायता–अब भी लोकप्रिय हैं, लेकिन प्रशासनिक स्तर पर असंतोष चुनावी समीकरण बदल सकता है। 4. भाजपा का उभार और बदला राजनीतिक संतुलन पश्चिम बंगाल की राजनीति में भारतीय जनता पार्टी (BJP) का तेजी से उभार टीएमसी के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गया है। 2011 में मामूली मौजूदगी 2021 में 77 सीटों के साथ मुख्य विपक्ष बूथ स्तर तक मजबूत संगठन उत्तर बंगाल, जंगलमहल और सीमावर्ती क्षेत्रों में भाजपा की पकड़ मजबूत हुई है। धार्मिक ध्रुवीकरण और हिंदुत्व की राजनीति ने पारंपरिक वोट बैंक को प्रभावित किया है, जिससे मुकाबला और कड़ा हो गया है। 5. युवाओं की नाराजगी और रोजगार संकट भर्ती घोटालों और सीमित रोजगार अवसरों ने युवाओं में निराशा पैदा की है। सरकारी नौकरियों में पारदर्शिता पर सवाल निजी क्षेत्र में सीमित अवसर औद्योगिक विकास की धीमी रफ्तार हालांकि ‘लक्ष्मी भंडार’ जैसी योजनाएं गरीब और महिला मतदाताओं को जोड़ने में सफल रही हैं, लेकिन शिक्षित युवा वर्ग बदलाव की तलाश में नजर आ रहा है। ममता बनर्जी का ‘फाइटर’ फैक्टर इन तमाम चुनौतियों के बावजूद ममता बनर्जी की सबसे बड़ी ताकत उनकी व्यक्तिगत छवि और जमीनी पकड़ है। संघर्षशील नेता की पहचान सीधे जनता से संवाद कल्याणकारी योजनाओं का व्यापक असर राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ममता बनर्जी आखिरी समय में चुनावी बाजी पलटने की क्षमता रखती हैं। 4 मई का फैसला तय करेगा भविष्य अब नजरें 4 मई पर टिकी हैं, जब चुनावी नतीजे सामने आएंगे। क्या ‘दीदी’ एक बार फिर सत्ता बचा लेंगी? या बंगाल में सत्ता परिवर्तन का नया अध्याय शुरू होगा?
नई दिल्ली। भारतीय राजनीति में दल-बदल का मुद्दा एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई के विश्लेषण में यह सवाल उठाया गया है कि क्या “कांग्रेस-मुक्त भारत” का नारा अब धीरे-धीरे “कांग्रेस-युक्त बीजेपी” में बदलता जा रहा है। आंकड़े क्या कहते हैं? पिछले एक दशक में 200 से अधिक सांसद और विधायक भारतीय जनता पार्टी में शामिल हुए हैं, जिनमें लगभग 40 प्रतिशत नेता भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से आए हैं। 2024 के आम चुनावों में भी बीजेपी के 100 से ज्यादा उम्मीदवार ऐसे थे, जो पहले अन्य दलों, खासकर कांग्रेस से जुड़े रहे। असम बना सबसे बड़ा उदाहरण असम की राजनीति इस बदलाव की सबसे स्पष्ट तस्वीर पेश करती है। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा खुद कांग्रेस से बीजेपी में आए और आज राज्य में पार्टी के सबसे प्रभावशाली चेहरों में गिने जाते हैं। हाल ही में कांग्रेस सांसद प्रद्युत बोरदोलोई का बीजेपी में शामिल होना भी इसी ट्रेंड का हिस्सा माना जा रहा है। विचारधारा से ज्यादा ‘सत्ता’ का महत्व विश्लेषण में कहा गया है कि अब राजनीति में विचारधारा की जगह सत्ता और अवसरवादिता ने ले ली है। जो नेता कभी बीजेपी की विचारधारा का विरोध करते थे, वही अब उसी का समर्थन करते नजर आते हैं। इससे राजनीतिक सीमाएं पहले की तुलना में कहीं ज्यादा धुंधली हो गई हैं। कांग्रेस की संगठनात्मक कमजोरी कांग्रेस की कमजोर होती संगठनात्मक पकड़ भी इस ट्रेंड की बड़ी वजह मानी जा रही है। कई राज्यों में पार्टी नेतृत्व को बनाए रखने और नए नेताओं को आगे लाने में असफल रही है, जिससे नेताओं के लिए दूसरे विकल्प तलाशना आसान हो गया है। लोकतंत्र पर क्या असर? दल-बदल का यह सिलसिला लोकतंत्र के लिए चुनौती बनता जा रहा है। जब कोई नेता एक पार्टी के टिकट पर जीतकर दूसरी पार्टी में चला जाता है, तो मतदाता का जनादेश कमजोर पड़ता है। हालांकि, कई मामलों में ऐसे नेताओं को दोबारा जीत मिलना यह भी दिखाता है कि मतदाता विकास और सत्ता के करीब रहने को प्राथमिकता दे रहे हैं। समाधान क्या हो सकता है? विशेषज्ञों का मानना है कि दल-बदल रोकने के लिए कड़े नियम जरूरी हैं। जैसे—दल बदलने वाले नेताओं को कुछ समय तक मंत्री बनने से रोकना या एंटी-डिफेक्शन कानून को और सख्त बनाना। लेकिन असली समाधान मजबूत विपक्ष और राजनीतिक सुधारों में ही छिपा है।
बिहार की सियासत इन दिनों नए मुख्यमंत्री के नाम को लेकर तेज चर्चाओं के दौर से गुजर रही है। Nitish Kumar द्वारा मुख्यमंत्री पद छोड़ने के संकेत के बाद सत्ता पक्ष में नए चेहरे को लेकर मंथन तेज हो गया है। इस बीच जहां पहले पिछड़ा, अतिपिछड़ा और दलित वर्ग के नेताओं की चर्चा थी, वहीं अब सवर्ण नेताओं के नाम भी रेस में शामिल होने लगे हैं। सवर्ण विधायकों का मजबूत आंकड़ा 2025 के विधानसभा चुनाव में NDA की जीत में सवर्ण विधायकों की अहम भूमिका रही। कुल 69 सवर्ण विधायक चुनकर आए, जिनमें- राजपूत: 32 विधायक भूमिहार: 23 विधायक ब्राह्मण: 12 विधायक कायस्थ: 2 विधायक संख्या बल के आधार पर सवर्ण वर्ग अपनी दावेदारी मजबूत बता रहा है। किन नेताओं के नाम चर्चा में? राजपूत वर्ग से Rajiv Pratap Rudy और जनार्दन सिग्रीवाल के नाम चर्चा में हैं। भूमिहार समुदाय से उपमुख्यमंत्री Vijay Kumar Sinha और रजनीश कुमार का नाम लिया जा रहा है। वहीं ब्राह्मण वर्ग से स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय की दावेदारी की चर्चा है। क्या सवर्ण मुख्यमंत्री बनना संभव है? मानना है कि मौजूदा राजनीतिक समीकरणों को देखते हुए सवर्ण मुख्यमंत्री बनने की संभावना काफी कम है। उनका कहना है कि बिहार की राजनीति लंबे समय से पिछड़ा, अतिपिछड़ा और दलित वर्ग के इर्द-गिर्द घूमती रही है, ऐसे में रणनीतिक रूप से NDA किसी सवर्ण चेहरे को मुख्यमंत्री बनाने से बच सकती है। राजनीतिक गणित क्या कहता है? विशेषज्ञों के अनुसार, सवर्ण नेताओं को सत्ता में संतुलन बनाए रखने के लिए अन्य महत्वपूर्ण पद दिए जा सकते हैं, लेकिन मुख्यमंत्री पद के लिए सामाजिक समीकरणों को प्राथमिकता दी जाएगी। फिलहाल बिहार की राजनीति में अटकलों का दौर जारी है और अंतिम फैसला पार्टी नेतृत्व और केंद्रीय रणनीति पर निर्भर करेगा।
राज्यसभा की 37 सीटों पर हुए चुनावों में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) ने शानदार प्रदर्शन करते हुए स्पष्ट बढ़त हासिल कर ली है। इस जीत के साथ ही उच्च सदन में NDA की कुल ताकत 135 के पार पहुंच गई है, जो बहुमत के आंकड़े से अधिक है। इससे केंद्र की सत्तारूढ़ सरकार को आने वाले समय में महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित कराने में बड़ी राहत मिलेगी। चुनाव परिणाम का पूरा निचोड़ इन 37 सीटों में से 26 सीटों पर निर्विरोध चुनाव हुआ, जिनमें NDA को 13 सीटें मिलीं। वहीं, जिन 11 सीटों पर मतदान हुआ, उनमें से 9 पर NDA ने जीत दर्ज की। कुल मिलाकर NDA ने 37 में से 22 सीटों पर कब्जा जमाया, जबकि विपक्ष के खाते में 15 सीटें आईं। राज्यों में NDA का दबदबा राज्यों के हिसाब से देखें तो NDA का प्रदर्शन काफी मजबूत रहा: महाराष्ट्र: 7 में से 6 सीटें बिहार: सभी 5 सीटें असम: सभी 3 सीटें ओडिशा: 4 में से 3 सीटें तमिलनाडु: 5 में से 2 सीटें पश्चिम बंगाल: 5 में से 1 सीट हरियाणा और छत्तीसगढ़: 2 में से 1-1 सीट इसके अलावा, मनोनीत सदस्य के रूप में पूर्व CJI रंजन गोगोई का कार्यकाल समाप्त होने के बाद उनकी सीट भी NDA के खाते में ही जुड़ने की संभावना है। राज्यसभा में BJP और NDA की स्थिति मजबूत भारतीय जनता पार्टी (BJP) पहले ही 100 से अधिक सीटों के साथ राज्यसभा की सबसे बड़ी पार्टी बनी हुई थी। ताजा नतीजों के बाद NDA गठबंधन की कुल संख्या 135 से ऊपर पहुंच गई है, जिससे अब सरकार को विधेयक पारित कराने के लिए विपक्ष पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। कांग्रेस के लिए राहत की खबर हालांकि विपक्ष को कुल 15 सीटें मिली हैं, लेकिन कांग्रेस के लिए राहत की बात यह है कि वह राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष का दर्जा बनाए रखने में सफल रही है। महिला आरक्षण बिल पर नजर इस मजबूत स्थिति का सीधा असर आगामी विधायी एजेंडे पर पड़ेगा। सरकार लोकसभा और विधानसभा में महिलाओं को 33% आरक्षण देने वाले ‘नारी वंदन अधिनियम’ को जल्द लागू करने की दिशा में कदम तेज कर सकती है। संभावना है कि आगामी सत्र में इस संबंध में संवैधानिक संशोधन पर चर्चा हो। सरकार का बढ़ा आत्मविश्वास राज्यसभा में बहुमत मिलने के बाद सरकार का आत्मविश्वास बढ़ा है। सूत्रों के अनुसार, सरकार विपक्षी दलों को साथ लेकर महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित कराने की रणनीति पर काम कर रही है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।