नई दिल्ली। भारतीय राजनीति में दल-बदल का मुद्दा एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई के विश्लेषण में यह सवाल उठाया गया है कि क्या “कांग्रेस-मुक्त भारत” का नारा अब धीरे-धीरे “कांग्रेस-युक्त बीजेपी” में बदलता जा रहा है। आंकड़े क्या कहते हैं? पिछले एक दशक में 200 से अधिक सांसद और विधायक भारतीय जनता पार्टी में शामिल हुए हैं, जिनमें लगभग 40 प्रतिशत नेता भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से आए हैं। 2024 के आम चुनावों में भी बीजेपी के 100 से ज्यादा उम्मीदवार ऐसे थे, जो पहले अन्य दलों, खासकर कांग्रेस से जुड़े रहे। असम बना सबसे बड़ा उदाहरण असम की राजनीति इस बदलाव की सबसे स्पष्ट तस्वीर पेश करती है। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा खुद कांग्रेस से बीजेपी में आए और आज राज्य में पार्टी के सबसे प्रभावशाली चेहरों में गिने जाते हैं। हाल ही में कांग्रेस सांसद प्रद्युत बोरदोलोई का बीजेपी में शामिल होना भी इसी ट्रेंड का हिस्सा माना जा रहा है। विचारधारा से ज्यादा ‘सत्ता’ का महत्व विश्लेषण में कहा गया है कि अब राजनीति में विचारधारा की जगह सत्ता और अवसरवादिता ने ले ली है। जो नेता कभी बीजेपी की विचारधारा का विरोध करते थे, वही अब उसी का समर्थन करते नजर आते हैं। इससे राजनीतिक सीमाएं पहले की तुलना में कहीं ज्यादा धुंधली हो गई हैं। कांग्रेस की संगठनात्मक कमजोरी कांग्रेस की कमजोर होती संगठनात्मक पकड़ भी इस ट्रेंड की बड़ी वजह मानी जा रही है। कई राज्यों में पार्टी नेतृत्व को बनाए रखने और नए नेताओं को आगे लाने में असफल रही है, जिससे नेताओं के लिए दूसरे विकल्प तलाशना आसान हो गया है। लोकतंत्र पर क्या असर? दल-बदल का यह सिलसिला लोकतंत्र के लिए चुनौती बनता जा रहा है। जब कोई नेता एक पार्टी के टिकट पर जीतकर दूसरी पार्टी में चला जाता है, तो मतदाता का जनादेश कमजोर पड़ता है। हालांकि, कई मामलों में ऐसे नेताओं को दोबारा जीत मिलना यह भी दिखाता है कि मतदाता विकास और सत्ता के करीब रहने को प्राथमिकता दे रहे हैं। समाधान क्या हो सकता है? विशेषज्ञों का मानना है कि दल-बदल रोकने के लिए कड़े नियम जरूरी हैं। जैसे—दल बदलने वाले नेताओं को कुछ समय तक मंत्री बनने से रोकना या एंटी-डिफेक्शन कानून को और सख्त बनाना। लेकिन असली समाधान मजबूत विपक्ष और राजनीतिक सुधारों में ही छिपा है।
बिहार की सियासत इन दिनों नए मुख्यमंत्री के नाम को लेकर तेज चर्चाओं के दौर से गुजर रही है। Nitish Kumar द्वारा मुख्यमंत्री पद छोड़ने के संकेत के बाद सत्ता पक्ष में नए चेहरे को लेकर मंथन तेज हो गया है। इस बीच जहां पहले पिछड़ा, अतिपिछड़ा और दलित वर्ग के नेताओं की चर्चा थी, वहीं अब सवर्ण नेताओं के नाम भी रेस में शामिल होने लगे हैं। सवर्ण विधायकों का मजबूत आंकड़ा 2025 के विधानसभा चुनाव में NDA की जीत में सवर्ण विधायकों की अहम भूमिका रही। कुल 69 सवर्ण विधायक चुनकर आए, जिनमें- राजपूत: 32 विधायक भूमिहार: 23 विधायक ब्राह्मण: 12 विधायक कायस्थ: 2 विधायक संख्या बल के आधार पर सवर्ण वर्ग अपनी दावेदारी मजबूत बता रहा है। किन नेताओं के नाम चर्चा में? राजपूत वर्ग से Rajiv Pratap Rudy और जनार्दन सिग्रीवाल के नाम चर्चा में हैं। भूमिहार समुदाय से उपमुख्यमंत्री Vijay Kumar Sinha और रजनीश कुमार का नाम लिया जा रहा है। वहीं ब्राह्मण वर्ग से स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय की दावेदारी की चर्चा है। क्या सवर्ण मुख्यमंत्री बनना संभव है? मानना है कि मौजूदा राजनीतिक समीकरणों को देखते हुए सवर्ण मुख्यमंत्री बनने की संभावना काफी कम है। उनका कहना है कि बिहार की राजनीति लंबे समय से पिछड़ा, अतिपिछड़ा और दलित वर्ग के इर्द-गिर्द घूमती रही है, ऐसे में रणनीतिक रूप से NDA किसी सवर्ण चेहरे को मुख्यमंत्री बनाने से बच सकती है। राजनीतिक गणित क्या कहता है? विशेषज्ञों के अनुसार, सवर्ण नेताओं को सत्ता में संतुलन बनाए रखने के लिए अन्य महत्वपूर्ण पद दिए जा सकते हैं, लेकिन मुख्यमंत्री पद के लिए सामाजिक समीकरणों को प्राथमिकता दी जाएगी। फिलहाल बिहार की राजनीति में अटकलों का दौर जारी है और अंतिम फैसला पार्टी नेतृत्व और केंद्रीय रणनीति पर निर्भर करेगा।
राज्यसभा की 37 सीटों पर हुए चुनावों में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) ने शानदार प्रदर्शन करते हुए स्पष्ट बढ़त हासिल कर ली है। इस जीत के साथ ही उच्च सदन में NDA की कुल ताकत 135 के पार पहुंच गई है, जो बहुमत के आंकड़े से अधिक है। इससे केंद्र की सत्तारूढ़ सरकार को आने वाले समय में महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित कराने में बड़ी राहत मिलेगी। चुनाव परिणाम का पूरा निचोड़ इन 37 सीटों में से 26 सीटों पर निर्विरोध चुनाव हुआ, जिनमें NDA को 13 सीटें मिलीं। वहीं, जिन 11 सीटों पर मतदान हुआ, उनमें से 9 पर NDA ने जीत दर्ज की। कुल मिलाकर NDA ने 37 में से 22 सीटों पर कब्जा जमाया, जबकि विपक्ष के खाते में 15 सीटें आईं। राज्यों में NDA का दबदबा राज्यों के हिसाब से देखें तो NDA का प्रदर्शन काफी मजबूत रहा: महाराष्ट्र: 7 में से 6 सीटें बिहार: सभी 5 सीटें असम: सभी 3 सीटें ओडिशा: 4 में से 3 सीटें तमिलनाडु: 5 में से 2 सीटें पश्चिम बंगाल: 5 में से 1 सीट हरियाणा और छत्तीसगढ़: 2 में से 1-1 सीट इसके अलावा, मनोनीत सदस्य के रूप में पूर्व CJI रंजन गोगोई का कार्यकाल समाप्त होने के बाद उनकी सीट भी NDA के खाते में ही जुड़ने की संभावना है। राज्यसभा में BJP और NDA की स्थिति मजबूत भारतीय जनता पार्टी (BJP) पहले ही 100 से अधिक सीटों के साथ राज्यसभा की सबसे बड़ी पार्टी बनी हुई थी। ताजा नतीजों के बाद NDA गठबंधन की कुल संख्या 135 से ऊपर पहुंच गई है, जिससे अब सरकार को विधेयक पारित कराने के लिए विपक्ष पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। कांग्रेस के लिए राहत की खबर हालांकि विपक्ष को कुल 15 सीटें मिली हैं, लेकिन कांग्रेस के लिए राहत की बात यह है कि वह राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष का दर्जा बनाए रखने में सफल रही है। महिला आरक्षण बिल पर नजर इस मजबूत स्थिति का सीधा असर आगामी विधायी एजेंडे पर पड़ेगा। सरकार लोकसभा और विधानसभा में महिलाओं को 33% आरक्षण देने वाले ‘नारी वंदन अधिनियम’ को जल्द लागू करने की दिशा में कदम तेज कर सकती है। संभावना है कि आगामी सत्र में इस संबंध में संवैधानिक संशोधन पर चर्चा हो। सरकार का बढ़ा आत्मविश्वास राज्यसभा में बहुमत मिलने के बाद सरकार का आत्मविश्वास बढ़ा है। सूत्रों के अनुसार, सरकार विपक्षी दलों को साथ लेकर महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित कराने की रणनीति पर काम कर रही है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।