West Bengal सरकार ने राज्य की OBC आरक्षण व्यवस्था में बड़ा बदलाव करते हुए आरक्षण को 17% से घटाकर 7% कर दिया है। नई सूची के अनुसार अब केवल 66 जातियां ही OBC आरक्षण के दायरे में रहेंगी। इसके साथ ही धर्म आधारित वर्गीकरण की व्यवस्था भी समाप्त कर दी गई है। राज्य सरकार का कहना है कि यह फैसला Calcutta High Court के 2024 के आदेश के आधार पर लिया गया है। हाईकोर्ट ने 2010 से 2012 के बीच OBC सूची में 77 अतिरिक्त जातियों को शामिल करने की प्रक्रिया को अवैध और असंवैधानिक बताया था। हालांकि, 2010 से पहले OBC सूची में शामिल जातियों का दर्जा बरकरार रहेगा। साथ ही, पहले से OBC कोटे के तहत नौकरी पा चुके लोगों की नियुक्तियों पर भी इस फैसले का कोई असर नहीं पड़ेगा। ममता सरकार की OBC-A और OBC-B व्यवस्था खत्म Mamata Banerjee सरकार ने पहले OBC आरक्षण को दो वर्गों में बांटा था। OBC-A को 10% और OBC-B को 7% आरक्षण दिया जा रहा था। इसी दौरान कई नई जातियों को भी सूची में शामिल किया गया था। इसी व्यवस्था को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए कलकत्ता हाईकोर्ट ने 2024 में फैसला सुनाया था। कोर्ट के आदेश के बाद 2010 के बाद जारी करीब 12 लाख OBC प्रमाणपत्र रद्द हो गए थे। नई सूची में किन जातियों को मिला स्थान नई OBC सूची में कपाली, कुर्मी, सुध्राधार, कर्मकार, सूत्रधार, स्वर्णकार, नाई, तांती, धनुक, कसाई, खंडायत, तुरहा, देवांग और गोआला जैसी जातियां शामिल हैं। वहीं पहाड़िया, हज्जाम और चौधुली जैसे तीन मुस्लिम समुदायों को भी सूची में रखा गया है। राज्य मंत्री Agnimitra Paul ने कैबिनेट बैठक के बाद कहा कि सरकार OBC ढांचे की नई समीक्षा करेगी। इसके लिए जांच समिति बनाई जाएगी और जरूरत पड़ने पर कानूनी प्रक्रिया के तहत कुछ समूहों को दोबारा सूची में शामिल किया जा सकता है। बंगाल कैबिनेट के 7 बड़े फैसले सरकारी नौकरियों में उम्र सीमा 5 साल बढ़ी राज्य कैबिनेट ने सरकारी नौकरियों के लिए अधिकतम आयु सीमा 5 साल बढ़ाने का फैसला किया है। अब ग्रुप-A पदों के लिए उम्र सीमा 41 साल, ग्रुप-B के लिए 44 साल और ग्रुप C-D के लिए 45 साल होगी। यह नियम 11 मई से लागू होगा। भ्रष्टाचार जांच के लिए रिटायर्ड जज की कमेटी सरकार ने संस्थागत भ्रष्टाचार की जांच के लिए Justice Bishwajit Basu की अध्यक्षता में जांच पैनल बनाने को मंजूरी दी है। यह कमेटी सरकारी योजनाओं, निर्माण कार्यों और सेवा वितरण में कथित घोटालों की जांच करेगी। महिलाओं और बच्चियों पर अत्याचार की जांच महिलाओं, बच्चियों, SC-ST और अल्पसंख्यक समुदाय से जुड़े मामलों की जांच के लिए Justice Samapti Chatterjee की अध्यक्षता में दूसरी कमेटी बनाई जाएगी। शिकायत दर्ज कराने के लिए पोर्टल, ईमेल और व्हाट्सऐप सुविधा उपलब्ध कराई जाएगी। धार्मिक आधार पर मिलने वाला मानदेय बंद राज्य सरकार ने 1 जून से इमाम, मुअज्जिन और पुजारियों को दिए जाने वाले सरकारी मानदेय को बंद करने का फैसला लिया है। अभी तक इमामों को 3000 रुपए और मुअज्जिन तथा पुजारियों को 2000 रुपए मासिक सहायता दी जाती थी। महिलाओं को हर महीने 3000 रुपए कैबिनेट ने ‘अन्नपूर्णा योजना’ को मंजूरी दी है। इसके तहत महिलाओं को हर महीने 3000 रुपए की आर्थिक सहायता दी जाएगी। योजना का लाभ सीधे बैंक खातों में भेजा जाएगा। महिलाओं के लिए सरकारी बसों में मुफ्त यात्रा 1 जून से महिलाओं को सरकारी बसों में मुफ्त यात्रा की सुविधा मिलेगी। हालांकि सरकार ने फिलहाल बसों की संख्या बढ़ाने की कोई घोषणा नहीं की है। 7वें वेतन आयोग को मंजूरी राज्य सरकार ने कर्मचारियों के वेतन संशोधन के लिए 7वें राज्य वेतन आयोग के गठन को मंजूरी दे दी है। इसका लाभ सरकारी कर्मचारियों के साथ नगर निकायों और सरकारी शिक्षण संस्थानों के कर्मचारियों को भी मिलेगा।
नई दिल्ली में राजनीतिक हलचल तेज, विपक्ष ने सरकार पर लगाए गंभीर आरोप भारत में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी बढ़ाने के लिए लाया गया महत्वपूर्ण बिल संसद में पास नहीं हो सका। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार के लिए यह बड़ा झटका माना जा रहा है, क्योंकि 12 साल के शासन में पहली बार कोई संवैधानिक संशोधन प्रस्ताव अटक गया है। इस पूरे मामले के पीछे “परिसीमन (Delimitation)” को लेकर चला विवाद मुख्य कारण बताया जा रहा है। सरकार ने लोकसभा में महिलाओं को एक-तिहाई आरक्षण देने वाले बिल को परिसीमन प्रक्रिया से जोड़ दिया था, जिसके बाद विपक्ष ने इसे लोकतंत्र पर हमला करार दिया। महिला आरक्षण और परिसीमन विवाद ने बढ़ाई टकराव की स्थिति यह विधेयक महिलाओं को संसद और विधानसभा में 33 प्रतिशत आरक्षण देने के उद्देश्य से लाया गया था। लेकिन इसे 2011 की जनगणना के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों के पुनर्निर्धारण (परिसीमन) से जोड़ दिया गया। विपक्ष का कहना है कि यह कदम महिलाओं के अधिकारों के बजाय राजनीतिक सीमाओं को बदलने की कोशिश है। संसद में नहीं मिला दो-तिहाई बहुमत यह एक संवैधानिक संशोधन विधेयक था, जिसके लिए दो-तिहाई बहुमत जरूरी था। मतदान में सरकार को 298 वोट मिले, जबकि 230 सांसदों ने इसका विरोध किया। पर्याप्त समर्थन न मिलने के कारण यह बिल पारित नहीं हो सका। विपक्ष का तीखा हमला: ‘लोकतंत्र पर हमला’ विपक्षी दलों ने सरकार पर गंभीर आरोप लगाए। कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी ने इसे लोकतंत्र पर खुला हमला बताया। वहीं गौरव गोगोई ने कहा कि सरकार परिसीमन को “पीछे के दरवाजे” से लागू करने की कोशिश कर रही है। राहुल गांधी ने कहा कि यह बिल महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए नहीं बल्कि राजनीतिक नक्शा बदलने का प्रयास है। उत्तर-दक्षिण भारत के बीच बढ़ा राजनीतिक तनाव परिसीमन मुद्दा लंबे समय से भारत में संवेदनशील माना जाता है। दक्षिण भारत के राज्य जैसे तमिलनाडु और केरल को डर है कि जनसंख्या के आधार पर सीटें बढ़ने से उनकी राजनीतिक हिस्सेदारी घट जाएगी। वहीं उत्तर भारत के अधिक जनसंख्या वाले राज्यों को इसका फायदा मिल सकता है। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने इसे “दंडात्मक कदम” बताते हुए विरोध जताया। सरकार का पक्ष: जनसंख्या के आधार पर न्याय जरूरी गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि बढ़ती जनसंख्या के अनुसार निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्निर्धारण जरूरी है ताकि हर वोट का समान मूल्य हो। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी कहा कि यह अवसर महिलाओं के हित में है और इसे राजनीतिक नजरिए से नहीं देखना चाहिए। आगे क्या होगा? महिला आरक्षण बिल पहले ही 2023 में पारित हो चुका है, लेकिन इसके लागू होने में 2029 तक की देरी है। अब परिसीमन विवाद के चलते इसकी प्रक्रिया और भी जटिल हो गई है। राजनीतिक दलों के बीच टकराव आगे और बढ़ने की संभावना है।
सुप्रीम कोर्ट ने अनुसूचित जाति (SC) के दर्जे को लेकर बड़ा और अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई व्यक्ति हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म छोड़कर किसी अन्य धर्म को अपनाता है, तो उसका SC दर्जा तुरंत समाप्त हो जाएगा। हालांकि, दोबारा इन धर्मों में लौटने पर कुछ शर्तों के साथ यह दर्जा फिर से मिल सकता है। कोर्ट ने क्या कहा? जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस मनमोहन की बेंच ने आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए कहा कि संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 के अनुसार केवल हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म के लोगों को ही SC का दर्जा मिल सकता है। अन्य धर्म अपनाने पर यह दर्जा स्वतः समाप्त हो जाता है। SC दर्जा दोबारा कैसे मिलेगा? सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि SC दर्जा दोबारा पाने के लिए तीन शर्तें पूरी करना अनिवार्य है: मूल जाति का प्रमाण व्यक्ति को यह साबित करना होगा कि वह मूल रूप से SC सूची में शामिल जाति में जन्मा है। धर्म में वास्तविक वापसी उसे यह दिखाना होगा कि उसने सच में हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म को फिर से अपना लिया है और पूर्व धर्म को पूरी तरह छोड़ दिया है। समुदाय की स्वीकृति संबंधित जाति के लोगों द्वारा उसे दोबारा स्वीकार किया जाना भी जरूरी होगा। क्या है मामला? यह मामला पादरी सी. आनंद से जुड़ा है, जिनका जन्म SC परिवार में हुआ था लेकिन बाद में उन्होंने ईसाई धर्म अपना लिया। उन्होंने एक हमले के मामले में SC/ST एक्ट के तहत केस दर्ज कराया था। आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि धर्म परिवर्तन के बाद व्यक्ति SC का लाभ नहीं ले सकता। सुप्रीम कोर्ट ने इसी फैसले को सही ठहराया। फैसले का असर इस निर्णय से यह साफ हो गया है कि: SC दर्जा धर्म से जुड़ा हुआ है धर्म बदलने पर आरक्षण और कानूनी लाभ समाप्त हो जाते हैं वापसी के लिए तय शर्तों का पालन जरूरी है
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।