Supreme Court India

Supreme Court of India building highlighting landmark ruling on SC status and religious conversion
धर्म परिवर्तन पर SC दर्जा खत्म, वापसी के लिए 3 शर्तें जरूरी: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने अनुसूचित जाति (SC) के दर्जे को लेकर बड़ा और अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई व्यक्ति हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म छोड़कर किसी अन्य धर्म को अपनाता है, तो उसका SC दर्जा तुरंत समाप्त हो जाएगा। हालांकि, दोबारा इन धर्मों में लौटने पर कुछ शर्तों के साथ यह दर्जा फिर से मिल सकता है। कोर्ट ने क्या कहा? जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस मनमोहन की बेंच ने आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए कहा कि संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 के अनुसार केवल हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म के लोगों को ही SC का दर्जा मिल सकता है। अन्य धर्म अपनाने पर यह दर्जा स्वतः समाप्त हो जाता है। SC दर्जा दोबारा कैसे मिलेगा? सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि SC दर्जा दोबारा पाने के लिए तीन शर्तें पूरी करना अनिवार्य है: मूल जाति का प्रमाण व्यक्ति को यह साबित करना होगा कि वह मूल रूप से SC सूची में शामिल जाति में जन्मा है। धर्म में वास्तविक वापसी उसे यह दिखाना होगा कि उसने सच में हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म को फिर से अपना लिया है और पूर्व धर्म को पूरी तरह छोड़ दिया है। समुदाय की स्वीकृति संबंधित जाति के लोगों द्वारा उसे दोबारा स्वीकार किया जाना भी जरूरी होगा। क्या है मामला? यह मामला पादरी सी. आनंद से जुड़ा है, जिनका जन्म SC परिवार में हुआ था लेकिन बाद में उन्होंने ईसाई धर्म अपना लिया। उन्होंने एक हमले के मामले में SC/ST एक्ट के तहत केस दर्ज कराया था। आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि धर्म परिवर्तन के बाद व्यक्ति SC का लाभ नहीं ले सकता। सुप्रीम कोर्ट ने इसी फैसले को सही ठहराया। फैसले का असर इस निर्णय से यह साफ हो गया है कि: SC दर्जा धर्म से जुड़ा हुआ है धर्म बदलने पर आरक्षण और कानूनी लाभ समाप्त हो जाते हैं वापसी के लिए तय शर्तों का पालन जरूरी है

surbhi मार्च 25, 2026 0
Supreme Court of India emphasizing paternity leave and father’s role in child development
पितृत्व अवकाश पर सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी: ‘बच्चे के विकास में पिता की भूमिका भी उतनी ही जरूरी’

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने पितृत्व अवकाश (Paternity Leave) को लेकर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए केंद्र सरकार से इसे सामाजिक सुरक्षा लाभ के रूप में मान्यता देने पर विचार करने को कहा है। अदालत ने स्पष्ट किया कि बच्चे के शुरुआती विकास में जहां मां की भूमिका केंद्रीय होती है, वहीं पिता की भागीदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। साझा जिम्मेदारी है पालन-पोषण न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और आर महादेवन की पीठ ने कहा कि माता-पिता बनना किसी एक व्यक्ति की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि यह एक साझा दायित्व है। बच्चे के भावनात्मक, मानसिक और शारीरिक विकास में दोनों की सक्रिय भागीदारी आवश्यक है। शुरुआती समय को बताया सबसे अहम अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि बच्चे के जीवन के शुरुआती महीने और साल सबसे संवेदनशील होते हैं। इसी दौरान माता-पिता के साथ उसका भावनात्मक जुड़ाव मजबूत होता है। यदि पिता को इस समय बच्चे के साथ रहने का अवसर नहीं मिलता, तो यह न सिर्फ बच्चे बल्कि पिता के लिए भी एक महत्वपूर्ण अनुभव की कमी बन सकता है। मां के लिए भी जरूरी है पिता का सहयोग सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि बच्चे के जन्म या गोद लेने के शुरुआती समय में पिता की मौजूदगी मां के लिए भी बेहद जरूरी होती है। पितृत्व अवकाश से पिता न केवल बच्चे की देखभाल में सक्रिय भूमिका निभा सकते हैं, बल्कि पारिवारिक जिम्मेदारियों को भी बेहतर ढंग से साझा कर सकते हैं। लैंगिक समानता की दिशा में कदम अदालत ने माना कि पितृत्व अवकाश की व्यवस्था समाज में पारंपरिक सोच को बदलने में सहायक होगी। इससे यह धारणा कमजोर होगी कि बच्चों की देखभाल केवल महिलाओं की जिम्मेदारी है। साथ ही, कार्यस्थल और परिवार दोनों में लैंगिक समानता को बढ़ावा मिलेगा। संदर्भ: गोद लेने से जुड़े मामले की सुनवाई यह टिप्पणी उस मामले की सुनवाई के दौरान आई, जिसमें गोद लेने वाली महिलाओं को मातृत्व अवकाश देने से जुड़े नियम को चुनौती दी गई थी। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि गोद लेने वाली मां को बच्चे की उम्र की परवाह किए बिना 12 सप्ताह का मातृत्व अवकाश मिलना चाहिए। कुल मिलाकर, सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी परिवार व्यवस्था और कार्यस्थल नीतियों में संतुलन लाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण संकेत मानी जा रही है।  

surbhi मार्च 18, 2026 0
Supreme Court building symbolizing landmark maternity leave rights for adoptive mothers in India
गोद लेने वाली माताओं के अधिकारों पर सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: अब 3 महीने से बड़े बच्चे को अपनाने पर भी मिलेगा मातृत्व अवकाश

देश में कामकाजी महिलाओं के अधिकारों को नई मजबूती देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि तीन महीने से अधिक उम्र के बच्चे को गोद लेने वाली महिलाओं को भी मातृत्व अवकाश (Maternity Leave) से वंचित नहीं किया जा सकता। यह निर्णय न केवल दत्तक माताओं के अधिकारों को मान्यता देता है, बल्कि परिवार की बदलती परिभाषा को भी कानूनी संरक्षण प्रदान करता है।   क्या है सुप्रीम कोर्ट का फैसला? न्यायमूर्ति जस्टिस जे. बी. पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने कहा कि मातृत्व अवकाश केवल जैविक माताओं तक सीमित नहीं हो सकता। अदालत ने कहा कि: 3 महीने से अधिक उम्र के बच्चे को गोद लेने पर भी मातृत्व अवकाश देना अनिवार्य है   मातृत्व संरक्षण एक मौलिक मानवाधिकार है   गैर-जैविक तरीके से परिवार बनाना भी समान रूप से वैध है   कानून की किस धारा को ठहराया असंवैधानिक? अदालत ने सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 की धारा 60(4) को असंवैधानिक करार दिया। यह प्रावधान केवल उन दत्तक माताओं को मातृत्व अवकाश देता था, जो 3 महीने से कम उम्र के बच्चे को गोद लेती थीं। कोर्ट ने इसे संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (जीवन और गरिमा का अधिकार) का उल्लंघन बताया।   अदालत की महत्वपूर्ण टिप्पणियां “गोद लिया हुआ बच्चा और जैविक बच्चा अलग नहीं हैं”   “प्रजनन संबंधी स्वायत्तता (Reproductive Autonomy) केवल जैविक प्रक्रिया तक सीमित नहीं”   “कानून का उद्देश्य महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा है, न कि भेदभाव करना”   कैसे शुरू हुआ यह मामला? यह मामला कर्नाटक की वकील हमसानंदिनी नंदूरी की याचिका से जुड़ा है, जिन्होंने इस प्रावधान को चुनौती दी थी। उन्होंने 2017 में दो बच्चों को गोद लिया था, लेकिन उम्र सीमा के कारण उन्हें सीमित अवकाश मिला। याचिका में कहा गया कि यह कानून दत्तक माताओं और बच्चों के साथ भेदभाव करता है।   पितृत्व अवकाश पर भी टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से यह भी आग्रह किया कि वह पितृत्व अवकाश (Paternity Leave) पर भी नीति बनाने पर विचार करे, ताकि बच्चों की देखभाल में दोनों अभिभावकों की समान भूमिका सुनिश्चित हो सके।   देशभर में क्या होगा असर? इस फैसले के बाद: सभी कामकाजी दत्तक माताओं को समान मातृत्व लाभ मिलेगा   गोद लेने को लेकर सामाजिक स्वीकार्यता बढ़ेगी   कार्यस्थलों पर लैंगिक समानता को बढ़ावा मिलेगा   यह फैसला भारतीय समाज में परिवार और मातृत्व की परिभाषा को व्यापक बनाते हुए एक बड़ी संवैधानिक और सामाजिक प्रगति के रूप में देखा जा रहा है।

surbhi मार्च 17, 2026 0
पीरियड्स लीव पर सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी, अनिवार्य छुट्टी की याचिका पर सुनवाई से इनकार
पीरियड्स लीव पर सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी, अनिवार्य छुट्टी की याचिका पर सुनवाई से इनकार

नई दिल्ली, एजेंसियां। सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं और छात्राओं के लिए देशभर में मासिक धर्म (पीरियड्स) अवकाश की राष्ट्रीय नीति बनाने की मांग वाली जनहित याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि इसे कानून के जरिए अनिवार्य बनाने से महिलाओं के रोजगार के अवसर प्रभावित हो सकते हैं। सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश Surya Kant और जस्टिस Joymalya Bagchi की पीठ ने टिप्पणी करते हुए कहा कि अगर पीरियड्स लीव को अनिवार्य बना दिया गया तो नियोक्ता महिलाओं को नौकरी देने से कतराने लग सकते हैं। इससे महिलाओं के प्रति लैंगिक रूढ़िवादिता भी बढ़ सकती है। अदालत ने क्या कहा? पीठ ने कहा कि मासिक धर्म को किसी कमजोरी या हीनता के रूप में पेश करना सही नहीं है। हालांकि अदालत ने यह भी कहा कि संबंधित सक्षम प्राधिकारी इस विषय पर याचिकाकर्ता द्वारा दिए गए प्रतिनिधित्व पर विचार कर सकते हैं और सभी पक्षों से चर्चा के बाद नीति बनाने की संभावना पर फैसला ले सकते हैं। किसने दायर की थी याचिका? यह जनहित याचिका Shailendra Mani Tripathi ने दायर की थी। इसमें कामकाजी महिलाओं और छात्राओं के लिए देशभर में मासिक धर्म अवकाश की राष्ट्रीय नीति बनाने की मांग की गई थी। केरल का दिया गया उदाहरण सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता M. R. Shamshad ने बताया कि Kerala सहित कुछ राज्यों और निजी कंपनियों में महिलाओं को स्वैच्छिक रूप से पीरियड्स लीव दी जा रही है। हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया कि स्वैच्छिक रूप से दी गई सुविधाएं अच्छी हैं, लेकिन इसे कानून के जरिए अनिवार्य बनाने से सामाजिक और पेशेवर प्रभाव पड़ सकते हैं। इसी के साथ सुप्रीम कोर्ट ने याचिका का निपटारा करते हुए संबंधित अधिकारियों को इस मुद्दे पर उचित निर्णय लेने का निर्देश दिया।

Ranjan Kumar Tiwari मार्च 13, 2026 0
Supreme Court of India hearing plea on removal of names from West Bengal voter list
पश्चिम बंगाल SIR मामला: मतदाता सूची से नाम हटाने पर नई याचिका, सुप्रीम कोर्ट सुनवाई को तैयार

  पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची से नाम हटाने को लेकर चल रहे विवाद के बीच Supreme Court of India ने एक नई याचिका पर सुनवाई करने की सहमति दे दी है। यह मामला स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के दौरान कुछ मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से हटाए जाने से जुड़ा है। याचिका में दावा किया गया है कि कई ऐसे लोगों के नाम सूची से हटा दिए गए हैं जो पहले चुनावों में वोट डाल चुके हैं, लेकिन अब उनके दस्तावेजों को स्वीकार नहीं किया जा रहा है। मामले की सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकील Menaka Guruswamy ने अदालत से कहा कि कई मतदाताओं के पास वैध दस्तावेज मौजूद हैं, इसके बावजूद Election Commission of India ने उन्हें स्वीकार नहीं किया और उनके नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। उन्होंने अदालत से इस मामले की जल्द सुनवाई की मांग की। इस पर सुनवाई कर रहे मुख्य न्यायाधीश Surya Kant की पीठ ने कहा कि मौजूदा व्यवस्था के तहत सुप्रीम कोर्ट सीधे तौर पर न्यायिक अधिकारियों के फैसलों पर अपील की तरह नहीं बैठ सकता। हालांकि वकील ने दलील दी कि कानून की धारा 23 और 24 के तहत अपील का प्रावधान मौजूद है और इस मामले को मुख्य याचिका के साथ जोड़ा जा सकता है। अदालत ने इस दलील पर विचार करते हुए कहा कि इस याचिका पर मंगलवार को मुख्य मामले के साथ सुनवाई की जाएगी। अब इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की अगली सुनवाई पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं।  

surbhi मार्च 9, 2026 0
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शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा 2025 का रिजल्ट घोषित, अनुज अग्निहोत्री बने टॉपर, 958 उम्मीदवार सफल

UPSC CSE Result 2025: देश की सबसे प्रतिष्ठित परीक्षाओं में से एक Civil Services Examination का अंतिम परिणाम जारी कर दिया गया है। Union Public Service Commission ने शुक्रवार 6 मार्च 2026 को UPSC सिविल सेवा परीक्षा 2025 का फाइनल रिजल्ट घोषित किया। इस परीक्षा में अनुज अग्निहोत्री ने पहला स्थान हासिल किया है। परीक्षा में शामिल हुए उम्मीदवार अब आयोग की आधिकारिक वेबसाइट UPSC Official Website पर जाकर फाइनल मेरिट लिस्ट देख सकते हैं। 958 उम्मीदवारों का हुआ चयन यूपीएससी द्वारा जारी फाइनल रिजल्ट के अनुसार इस वर्ष कुल 958 उम्मीदवारों ने सफलता हासिल की है। चयनित उम्मीदवारों की नियुक्ति विभिन्न केंद्रीय सेवाओं में उनकी रैंक और पसंद के आधार पर की जाएगी। फाइनल रिजल्ट उम्मीदवारों के लिखित परीक्षा (Main Exam) और पर्सनैलिटी टेस्ट (Interview) में प्रदर्शन के आधार पर तैयार किया गया है। इन प्रतिष्ठित सेवाओं के लिए होता है चयन यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा के माध्यम से देश की कई प्रतिष्ठित सेवाओं के लिए अधिकारियों का चयन किया जाता है। इनमें प्रमुख रूप से शामिल हैं— भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS)   भारतीय पुलिस सेवा (IPS)   भारतीय विदेश सेवा (IFS)   भारतीय राजस्व सेवा (IRS)   भारतीय व्यापार सेवा सहित अन्य ग्रुप A और ग्रुप B सेवाएं   979 पदों को भरने का लक्ष्य सिविल सेवा परीक्षा 2025 के माध्यम से केंद्र सरकार के विभिन्न विभागों में कुल 979 रिक्त पदों को भरा जाना है। ऐसे चेक करें UPSC CSE 2025 का रिजल्ट उम्मीदवार नीचे दिए गए स्टेप्स के माध्यम से अपना रिजल्ट देख सकते हैं— आधिकारिक वेबसाइट upsc.gov.in पर जाएं   होमपेज पर “Examination” टैब पर क्लिक करें   “Active Examinations” या “What’s New” सेक्शन में जाएं   Civil Services Examination Final Result 2025 लिंक पर क्लिक करें   मेरिट लिस्ट की PDF खुल जाएगी   Ctrl + F दबाकर अपना नाम या रोल नंबर सर्च करें   15 दिन में जारी होगी मार्कशीट यूपीएससी के अनुसार सभी उम्मीदवारों की मार्कशीट रिजल्ट जारी होने के 15 दिनों के भीतर आयोग की वेबसाइट पर अपलोड कर दी जाएगी। उम्मीदवार इसे 30 दिनों तक ऑनलाइन डाउनलोड कर सकेंगे। पिछले साल का कट-ऑफ पिछले वर्ष का अंतिम कट-ऑफ इस प्रकार था— जनरल: 87.98   EWS: 85.92   OBC: 87.28   SC: 79.03   ST: 74.23   आयु सीमा क्या है यूपीएससी की अधिसूचना के अनुसार उम्मीदवार की आयु 1 अगस्त 2024 तक कम से कम 21 वर्ष और अधिकतम 32 वर्ष होनी चाहिए। यानी उम्मीदवार का जन्म 2 अगस्त 1992 से 1 अगस्त 2003 के बीच होना चाहिए। यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा भारत की सबसे कठिन और प्रतिष्ठित प्रतियोगी परीक्षाओं में से एक मानी जाती है। हर साल लाखों उम्मीदवार इस परीक्षा में शामिल होते हैं, लेकिन तीन चरणों—प्रारंभिक परीक्षा, मुख्य परीक्षा और इंटरव्यू—को पार कर बहुत कम उम्मीदवार ही अंतिम सूची में जगह बना पाते हैं। UPSC CSE 2025 टॉप-20 उम्मीदवारों की सूची रैंक रोल नंबर नाम 1 1131589 अनुज अग्निहोत्री 2 4000040 राजेश्वरी सुवे एम 3 3512521 अकांश ढुल 4 0834732 राघव झुनझुनवाला 5 0409847 ईशान भटनागर 6 6410067 जिनिया अरोड़ा 7 0818306 ए आर राजा मोहिद्दीन 8 0843487 पक्षल सेक्रेटरी 9 0831647 आस्था जैन 10 1523945 उज्ज्वल प्रियांक 11 1512091 यशस्वी राज वर्धन 12 0840280 अक्षित भारद्वाज 13 7813999 अनन्या शर्मा 14 5402316 सुरभि यादव 15 3507500 सिमरनदीप कौर 16 0867445 मोनिका श्रीवास्तव 17 0829589 चितवन जैन 18 5604518 श्रुति आर 19 0105602 निसार दिशांत अमृतलाल 20 6630448 रवि राज

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surbhi मार्च 31, 2026 0