US-Iran Attack Hormuz Strait: अमेरिका और ईरान के बीच तनाव एक बार फिर खुलकर सामने आ गया है। होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजर रहे एक वाणिज्यिक मालवाहक जहाज पर ड्रोन हमले के आरोप के बाद अमेरिका ने ईरान के मिसाइल, ड्रोन भंडारण ठिकानों और तटीय रडार केंद्रों पर हवाई हमले किए। जवाब में ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाने का दावा किया। ताजा घटनाक्रम के बाद दुनिया के सबसे अहम समुद्री व्यापारिक मार्गों में शामिल होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की आवाजाही एक बार फिर बाधित हो गई है। ड्रोन हमले के बाद अमेरिका की बड़ी सैन्य कार्रवाई अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) ने शनिवार को जारी बयान में कहा कि उसकी सेना ने ईरान के मिसाइल और ड्रोन भंडारण केंद्रों के साथ-साथ तटीय रडार साइट्स पर सटीक हवाई हमले किए। अमेरिकी सेना के अनुसार यह कार्रवाई 25 जून को M/V Ever Lovely नामक सिंगापुर के झंडे वाले मालवाहक जहाज पर हुए कथित ड्रोन हमले के जवाब में की गई। CENTCOM ने कहा कि होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले व्यावसायिक जहाजों की सुरक्षा सुनिश्चित करना उसकी प्राथमिकता है और अमेरिकी बल लगातार समुद्री यातायात की सुरक्षा के लिए सहयोग कर रहे हैं। कार्रवाई के बाद अमेरिकी सेना ने हमलों का 37 सेकंड का वीडियो भी जारी किया। अमेरिका ने ईरान पर लगाया युद्धविराम उल्लंघन का आरोप अमेरिका का दावा है कि मालवाहक जहाज ओमान के तट के पास होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजर रहा था, तभी उस पर ड्रोन हमला किया गया। अमेरिकी अधिकारियों ने इसे अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून और युद्धविराम समझौते का उल्लंघन बताया। CENTCOM ने कहा कि व्यावसायिक जहाजों को निशाना बनाना नौवहन की स्वतंत्रता पर हमला है और इससे वैश्विक व्यापार प्रभावित होता है। हमलों की जगह का खुलासा नहीं अमेरिका ने यह नहीं बताया कि ईरान के किन-किन ठिकानों को निशाना बनाया गया। उधर ईरानी सरकारी मीडिया ने दावा किया कि दक्षिणी बंदरगाह शहर सिरिक के ताहेरोयेह घाट के पास देर रात विस्फोटों की आवाज सुनी गई। सैन्य सूत्रों के हवाले से कहा गया कि क्षेत्र में किसी प्रोजेक्टाइल के गिरने से धमाके हुए। ट्रंप बोले- युद्धविराम का 'मूर्खतापूर्ण उल्लंघन' अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कथित ड्रोन हमले को युद्धविराम समझौते का "मूर्खतापूर्ण उल्लंघन" बताया। उन्होंने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म Truth Social पर लिखा कि एक ड्रोन ने बेहद महंगे मालवाहक जहाज को सीधे निशाना बनाया, जबकि तीन अन्य ड्रोन को मार गिराया गया। ट्रंप ने इससे पहले कहा था कि युद्धविराम का मतलब पूरी तरह गोलीबारी बंद होना नहीं, बल्कि हिंसा में कमी आना है। ताजा घटनाओं ने दोनों देशों के बीच तनाव को फिर बढ़ा दिया है। जेडी वेंस ने दी सख्त चेतावनी अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने कहा कि यदि ईरान की ओर से दोबारा हमला किया गया तो अमेरिका उसका कड़ा जवाब देगा। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा कि यदि ईरान को समझौते के किसी पहलू पर आपत्ति है तो बातचीत का रास्ता अपनाना चाहिए, लेकिन हिंसा का जवाब हिंसा से ही दिया जाएगा। ईरान का पलटवार, अमेरिकी ठिकानों पर हमले का दावा अमेरिकी कार्रवाई के कुछ ही समय बाद ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने दावा किया कि उसने खाड़ी क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर जवाबी हमला किया है। IRGC ने चेतावनी दी कि यदि अमेरिका ने फिर किसी प्रकार की सैन्य कार्रवाई की तो उसका जवाब पहले से कहीं अधिक व्यापक होगा। ईरान ने यह भी आरोप लगाया कि अमेरिका ने शांति समझौते के अनुच्छेद-5 का उल्लंघन किया है। ईरान का कहना है कि जिस मालवाहक जहाज को निशाना बनाया गया, उसने होर्मुज जलडमरूमध्य में बिना अनुमति निर्धारित मार्ग से अलग रास्ता अपनाया था। फिर ठप हुआ होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत तेल और गैस का परिवहन होर्मुज जलडमरूमध्य से होता है। फरवरी में संघर्ष शुरू होने के बाद यहां समुद्री यातायात लगभग ठप हो गया था। बाद में युद्धविराम के बाद सीमित स्तर पर जहाजों की आवाजाही दोबारा शुरू हुई थी। अब ताजा हमलों और जवाबी कार्रवाई के बाद एक बार फिर जहाजों की आवाजाही प्रभावित हुई है, जिससे वैश्विक ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर असर पड़ने की आशंका बढ़ गई है। अप्रैल से लागू है युद्धविराम अमेरिका और ईरान के बीच 8 अप्रैल से युद्धविराम लागू है। इसके बावजूद बीच-बीच में समुद्री सुरक्षा और सैन्य गतिविधियों को लेकर तनाव बना हुआ है। दोनों देशों के बीच 17 जून को 14 सूत्रीय शांति समझौते पर सहमति बनी थी, जिसमें सैन्य गतिविधियां रोकने और 60 दिनों के भीतर व्यापक समझौते की दिशा में आगे बढ़ने का फैसला किया गया था। स्विट्जरलैंड में दोनों देशों के प्रतिनिधियों के बीच पहली दौर की वार्ता भी हो चुकी है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार 28 और 29 जून को स्विट्जरलैंड के बर्गेनस्टॉक में दूसरे दौर की वार्ता प्रस्तावित है, जहां स्थायी शांति समझौते के अगले चरण पर चर्चा की जाएगी।
वॉशिंगटन/तेहरान: अमेरिका और ईरान के बीच एक बार फिर सैन्य तनाव बढ़ गया है। शुक्रवार को अमेरिका ने आरोप लगाया कि ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य में एक वाणिज्यिक मालवाहक जहाज पर हमला किया। इसके कुछ ही समय बाद अमेरिकी सेना ने ईरान के भीतर कई सैन्य ठिकानों पर हवाई हमले किए। जवाब में ईरान ने भी क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाते हुए जवाबी कार्रवाई की। यह घटनाक्रम दोनों देशों के बीच स्विट्जरलैंड में हुए हालिया समझौते के बाद पहली प्रत्यक्ष सैन्य भिड़ंत माना जा रहा है, जिससे पश्चिम एशिया में तनाव एक बार फिर बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। कार्गो जहाज पर हमले के बाद अमेरिका की कार्रवाई अमेरिका का आरोप है कि ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजर रहे एक कमर्शियल कार्गो शिप पर हमला किया। इस घटना के बाद अमेरिकी सेना ने ईरान के भीतर ड्रोन और मिसाइल से जुड़े सैन्य ठिकानों पर सटीक हवाई हमले किए। अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) ने बयान जारी कर कहा कि कार्रवाई के दौरान चुनिंदा सैन्य लक्ष्यों को निशाना बनाया गया। हालांकि, हमलों में हुए नुकसान या हताहतों की विस्तृत जानकारी अभी सार्वजनिक नहीं की गई है। IRGC का पलटवार, अमेरिकी ठिकानों पर हमला अमेरिकी हमलों के कुछ ही देर बाद ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने जवाबी कार्रवाई करते हुए क्षेत्र में मौजूद कई अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर हमला करने का दावा किया। ईरान ने कहा कि अमेरिका की सैन्य कार्रवाई का "कड़ा और निर्णायक जवाब" दिया जाएगा। किन-किन ठिकानों को निशाना बनाया गया और इस हमले में कितना नुकसान हुआ, इसकी आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है। ट्रंप ने पहले ही दिए थे जवाबी कार्रवाई के संकेत अमेरिकी सैन्य कार्रवाई से पहले राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी ईरान के खिलाफ संभावित जवाबी कदम के संकेत दिए थे। जब पत्रकारों ने उनसे पूछा कि क्या अमेरिका कार्गो जहाज पर हुए हमले का जवाब देगा, तो ट्रंप ने कहा, "आपको जल्द ही पता चल जाएगा।" इसके कुछ समय बाद अमेरिकी सेना ने ईरान के भीतर सैन्य कार्रवाई शुरू कर दी। क्षेत्र में बढ़ा तनाव अमेरिका और ईरान के बीच ताजा सैन्य कार्रवाई ने पश्चिम एशिया में तनाव को फिर बढ़ा दिया है। दोनों देशों के बीच हाल के महीनों में तनाव कम करने के प्रयास किए जा रहे थे, लेकिन इस घटनाक्रम के बाद क्षेत्रीय सुरक्षा और समुद्री व्यापार को लेकर नई चिंताएं पैदा हो गई हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि दोनों देशों के बीच सैन्य जवाबी कार्रवाई का सिलसिला जारी रहता है, तो इसका असर पूरे पश्चिम एशिया की सुरक्षा स्थिति और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर भी पड़ सकता है।
युद्धविराम की दिशा में बड़ी प्रगति, समझौते का मसौदा तैयार अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव और सैन्य संघर्ष को समाप्त करने की दिशा में बड़ा कदम उठाया गया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, दोनों देशों ने शांति समझौते के एक ड्राफ्ट (मसौदा) के शब्दों पर सहमति बना ली है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने दावा किया है कि समझौते का अंतिम मसौदा तैयार हो चुका है और मध्यस्थ देश इसे अंतिम रूप देने में जुटे हैं। उन्होंने कहा कि क्षेत्र में शांति स्थापित करने की दिशा में यह अब तक की सबसे महत्वपूर्ण प्रगति है और समझौता पहले से कहीं ज्यादा करीब दिखाई दे रहा है। ट्रंप और ईरान के विदेश मंत्री ने भी दिए सकारात्मक संकेत अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने भी संकेत दिया है कि दोनों देशों के बीच समझौता जल्द हो सकता है। वहीं ईरान के विदेश मंत्री Abbas Araghchi ने कहा कि किसी समझौते के इतने करीब दोनों देश पहले कभी नहीं पहुंचे थे। हालांकि ईरानी अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि मसौदा अभी आंतरिक समीक्षा के दौर से गुजर रहा है और अंतिम मंजूरी मिलना बाकी है। क्या जल्द होगा समझौते पर हस्ताक्षर? ईरान की ओर से संकेत मिले हैं कि आने वाले दिनों में एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर हो सकते हैं। दिलचस्प बात यह है कि हस्ताक्षर किसी आमने-सामने बैठक के बजाय ऑनलाइन या दूरस्थ माध्यम से भी किए जा सकते हैं। सूत्रों के अनुसार, इस प्रारंभिक समझौते का मुख्य उद्देश्य युद्ध को समाप्त करना और क्षेत्रीय स्थिरता बहाल करना है। परमाणु कार्यक्रम से जुड़े मुद्दों को फिलहाल इस समझौते से अलग रखा गया है और उन पर बाद में अलग चरण में बातचीत की जाएगी। किन मुद्दों पर अब भी बनी हुई है असहमति? हालांकि बातचीत में काफी प्रगति हुई है, लेकिन कुछ महत्वपूर्ण मुद्दों पर दोनों पक्षों के बीच मतभेद बने हुए हैं। ईरान चाहता है कि उस पर लगे आर्थिक प्रतिबंधों में राहत मिले और विदेशों में जमा उसकी संपत्तियां मुक्त की जाएं। दूसरी ओर अमेरिका का कहना है कि किसी भी राहत से पहले ईरान को अपने परमाणु कार्यक्रम से जुड़े कुछ कदम उठाने होंगे। यही कारण है कि अंतिम समझौते से पहले कुछ शर्तों पर और बातचीत हो सकती है। भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह समझौता? इस संभावित समझौते का भारत पर भी सीधा असर पड़ सकता है। रिपोर्ट्स के अनुसार, समझौते में Strait of Hormuz को फिर से पूरी तरह खोलने की दिशा में कदम शामिल हो सकते हैं। यह समुद्री मार्ग दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्गों में से एक है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आयात करता है। यदि इस क्षेत्र में तनाव कम होता है और जहाजों की आवाजाही सामान्य होती है, तो तेल की कीमतों में स्थिरता आने की संभावना बढ़ जाएगी। इजरायल अभी भी बातचीत का हिस्सा नहीं रिपोर्ट्स के अनुसार, Israel इस वार्ता प्रक्रिया का हिस्सा नहीं है। इजरायली नेतृत्व पहले ही संकेत दे चुका है कि वह अपनी सैन्य कार्रवाई जारी रख सकता है और जरूरत पड़ने पर स्वतंत्र रूप से फैसले लेने का अधिकार सुरक्षित रखता है। अगले कुछ दिन होंगे बेहद अहम कूटनीतिक सूत्रों का मानना है कि यदि अमेरिका और ईरान के भीतर सभी स्तरों पर मंजूरी मिल जाती है, तो आने वाले कुछ दिनों में आधिकारिक समझौते की घोषणा हो सकती है। इससे पश्चिम एशिया में जारी तनाव कम होने, वैश्विक ऊर्जा बाजार को राहत मिलने और अंतरराष्ट्रीय व्यापार मार्गों की सुरक्षा बहाल होने की उम्मीद बढ़ जाएगी।
वॉशिंगटन/तेहरान: पश्चिम एशिया में अमेरिका और ईरान के बीच तनाव एक बार फिर खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ की सख्त चेतावनी के कुछ घंटों बाद अमेरिकी सेना ने ईरान के कई रणनीतिक ठिकानों पर सैन्य कार्रवाई की। हमलों के बाद दक्षिणी ईरान के विभिन्न क्षेत्रों में विस्फोटों की खबरें सामने आई हैं, जबकि तेहरान ने जवाबी कदम उठाते हुए होर्मुज स्ट्रेट को बंद करने की घोषणा कर दी है। स्थानीय मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, सिरिक, मिनाब, बंदर अब्बास, क़ेश्म द्वीप और गोर्गान समेत कई इलाकों में विस्फोटों की आवाजें सुनी गईं। हालात की गंभीरता को देखते हुए ईरान ने कई संवेदनशील क्षेत्रों में अपने एयर डिफेंस सिस्टम सक्रिय कर दिए हैं और सुरक्षा एजेंसियों को हाई अलर्ट पर रखा गया है। ट्रंप प्रशासन की चेतावनी के बाद हुई कार्रवाई अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने पहले ही संकेत दिया था कि यदि ईरान अपने रवैये में बदलाव नहीं करता, तो उसके महत्वपूर्ण सैन्य और रणनीतिक ठिकानों को निशाना बनाया जाएगा। अमेरिकी हमले उसी चेतावनी के बाद किए गए, जिससे दोनों देशों के बीच टकराव और गहरा गया है। ईरान ने बंद किया होर्मुज स्ट्रेट अमेरिकी हमलों के बाद ईरान के संयुक्त सैन्य कमान ने गुरुवार को घोषणा की कि वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण होर्मुज स्ट्रेट को तत्काल प्रभाव से बंद किया जा रहा है। सैन्य अधिकारियों ने कहा कि अब इस समुद्री मार्ग से किसी भी तेल टैंकर या व्यावसायिक जहाज को गुजरने की अनुमति नहीं दी जाएगी। ईरान ने चेतावनी दी कि प्रतिबंध के बावजूद इस मार्ग का इस्तेमाल करने की कोशिश करने वाले जहाजों के खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है। घोषणा के कुछ समय बाद ईरानी मीडिया ने दावा किया कि होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने का प्रयास कर रहे दो जहाजों को इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने रोक दिया। अमेरिका ने किया ईरानी दावों का खंडन अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) ने ईरान के दावों को खारिज करते हुए कहा है कि होर्मुज जलडमरूमध्य में समुद्री यातायात जारी है और अंतरराष्ट्रीय नौवहन गतिविधियों पर फिलहाल कोई व्यापक असर नहीं पड़ा है। वैश्विक ऊर्जा बाजार पर पड़ सकता है असर विशेषज्ञों का मानना है कि यदि होर्मुज स्ट्रेट में तनाव लगातार बढ़ता है, तो इसका सीधा प्रभाव वैश्विक तेल आपूर्ति और ऊर्जा बाजारों पर पड़ सकता है। दुनिया के बड़े हिस्से का कच्चा तेल इसी समुद्री मार्ग से होकर गुजरता है। ऐसे में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता सैन्य टकराव अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के लिए भी चिंता का विषय बन गया है। फिलहाल दोनों देशों की ओर से आक्रामक बयानबाजी जारी है और क्षेत्रीय हालात पर दुनिया की नजरें टिकी हुई हैं।
वॉशिंगटन/तेहरान: पश्चिम एशिया में तनाव एक बार फिर बढ़ गया है। अमेरिकी प्रशासन द्वारा यह दावा किए जाने के बाद कि ईरान ने अमेरिकी सेना के एक अपाचे हेलीकॉप्टर को निशाना बनाया, अमेरिका ने होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास ईरानी सैन्य ठिकानों पर जवाबी कार्रवाई की है। वहीं ईरान ने भी अमेरिका को कड़ी चेतावनी देते हुए कहा है कि किसी भी सैन्य कार्रवाई का उचित जवाब दिया जाएगा। दक्षिणी ईरान में कई स्थानों पर हमले अमेरिकी कार्रवाई के बाद दक्षिणी ईरान के विभिन्न इलाकों से विस्फोटों की खबरें सामने आई हैं। ईरानी मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, होर्मोजगान प्रांत, बंदर अब्बास, सीरिक क्षेत्र और केश्म द्वीप के आसपास कई धमाकों की आवाजें सुनी गईं। स्थानीय रिपोर्ट्स के मुताबिक, कुछ हमले रणनीतिक सैन्य ठिकानों और निगरानी प्रणालियों को निशाना बनाकर किए गए। बताया जा रहा है कि कार्रवाई में लड़ाकू विमानों का इस्तेमाल किया गया। हेलीकॉप्टर हादसे के बाद बढ़ा तनाव पूरा घटनाक्रम उस समय शुरू हुआ जब अमेरिकी अधिकारियों ने दावा किया कि होर्मुज जलडमरूमध्य के ऊपर गश्त के दौरान एक अमेरिकी अपाचे हेलीकॉप्टर पर हमला किया गया। अमेरिका का आरोप है कि हेलीकॉप्टर को एक ईरानी ड्रोन ने निशाना बनाया। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि हेलीकॉप्टर में सवार दोनों पायलट सुरक्षित हैं और उन्हें सफलतापूर्वक बचा लिया गया। उन्होंने संकेत दिया था कि अमेरिका इस घटना का जवाब देगा। एयर डिफेंस सिस्टम बने निशाना अमेरिकी सैन्य अधिकारियों के अनुसार, जवाबी कार्रवाई में ईरान के कई एयर डिफेंस सिस्टम, रडार प्रतिष्ठानों और निगरानी ठिकानों को निशाना बनाया गया। अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) ने इस अभियान को "आत्मरक्षा में उठाया गया कदम" बताया है। अमेरिकी पक्ष का कहना है कि यह कार्रवाई क्षेत्र में तैनात अमेरिकी सैन्य बलों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के उद्देश्य से की गई। ईरान ने दी सख्त प्रतिक्रिया ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने अमेरिकी हमलों के बाद कड़ा रुख अपनाया है। उन्होंने कहा कि ईरान किसी भी सैन्य दबाव या धमकी के आगे झुकने वाला नहीं है और देश की सशस्त्र सेनाएं हर चुनौती का जवाब देने के लिए तैयार हैं। अराघची ने विदेशी सैन्य बलों को क्षेत्र छोड़ने की सलाह देते हुए कहा कि बाहरी हस्तक्षेप क्षेत्रीय अस्थिरता को बढ़ाता है और इससे गंभीर परिणाम हो सकते हैं। पहले भी दिया था जवाबी कार्रवाई का संकेत ईरानी मीडिया ने हमलों से पहले सैन्य सूत्रों के हवाले से कहा था कि यदि हेलीकॉप्टर घटना को आधार बनाकर ईरान के खिलाफ कोई नई सैन्य कार्रवाई की गई तो उसका "निर्णायक जवाब" दिया जाएगा। ईरान ने अमेरिकी आरोपों को लेकर आधिकारिक तौर पर विस्तृत प्रतिक्रिया नहीं दी है और हेलीकॉप्टर गिराने के दावे पर भी स्पष्ट टिप्पणी से परहेज किया है। वैश्विक बाजारों की बढ़ी चिंता अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चिंता बढ़ा दी है। होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्गों में से एक माना जाता है। ऐसे में क्षेत्र में किसी भी सैन्य टकराव का असर वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय बाजारों पर पड़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि दोनों देशों के बीच तनाव और बढ़ता है, तो इसका प्रभाव पूरे पश्चिम एशिया की सुरक्षा व्यवस्था और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर देखने को मिल सकता है।
मिडिल ईस्ट में तनाव एक बार फिर बढ़ता नजर आ रहा है। होर्मुज जलडमरूमध्य के पास शनिवार को अमेरिका और ईरान के बीच सैन्य गतिविधियां तेज हो गईं। अमेरिकी सेना ने दावा किया है कि उसने ईरान की ओर से भेजे गए कई ड्रोन को मार गिराया, जिसके बाद ईरानी तटीय निगरानी ठिकानों पर जवाबी कार्रवाई की गई। होर्मुज की ओर बढ़ रहे थे ड्रोन: अमेरिकी सेना अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) के अनुसार, कम से कम चार एकतरफा हमलावर ड्रोन होर्मुज जलडमरूमध्य की दिशा में बढ़ रहे थे। अमेरिकी अधिकारियों का दावा है कि ये ड्रोन क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी सैन्य संसाधनों या अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक जहाजों के लिए खतरा बन सकते थे। सेंटकॉम ने कहा कि समुद्री सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए ड्रोन को नष्ट करना आवश्यक था। ड्रोन हमले के बाद रडार ठिकानों पर कार्रवाई अमेरिकी सेना के मुताबिक, ड्रोन को निष्क्रिय करने के बाद ईरान के गोरुक और क़ेश्म द्वीप स्थित तटीय निगरानी रडार केंद्रों को निशाना बनाया गया। अमेरिकी पक्ष ने इसे आत्मरक्षा और समुद्री मार्ग की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए उठाया गया कदम बताया है। सेंटकॉम ने कहा कि क्षेत्र में तैनात अमेरिकी बल किसी भी संभावित खतरे का जवाब देने के लिए पूरी तरह तैयार हैं। ईरान ने चेतावनी फायरिंग का दावा किया दूसरी ओर, ईरान की अर्ध-सरकारी समाचार एजेंसी मेहर ने दावा किया कि ईरानी बलों ने होर्मुज जलडमरूमध्य के निकट समुद्री क्षेत्र में चेतावनी स्वरूप गोलियां चलाईं। रिपोर्ट के अनुसार यह गतिविधि लारक द्वीप के आसपास हुई, जो बंदर अब्बास बंदरगाह के निकट स्थित है। हईरान की ओर से इस संबंध में विस्तृत आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है। संघर्ष विराम के बावजूद जारी है तनाव हाल के महीनों में दोनों देशों के बीच संघर्ष विराम और कूटनीतिक वार्ताओं की कोशिशें हुई हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर तनाव कम होता नहीं दिख रहा। वॉशिंगटन और तेहरान लगातार एक-दूसरे पर समझौतों के उल्लंघन के आरोप लगाते रहे हैं। विश्लेषकों का मानना है कि ऐसी घटनाएं क्षेत्रीय स्थिरता और चल रही वार्ताओं को प्रभावित कर सकती हैं। वैश्विक तेल आपूर्ति के लिए अहम है होर्मुज होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में से एक माना जाता है। वैश्विक तेल निर्यात का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से होकर गुजरता है। यही कारण है कि इस क्षेत्र में किसी भी सैन्य गतिविधि का असर अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजारों, तेल की कीमतों और वैश्विक शिपिंग सेक्टर पर पड़ सकता है। ट्रंप का दावा- ईरान की सैन्य क्षमता को भारी नुकसान इस बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि हालिया अमेरिकी हमलों से ईरान की सैन्य क्षमता को गंभीर नुकसान पहुंचा है। एक इंटरव्यू में ट्रंप ने कहा कि ईरान के कई ड्रोन निर्माण केंद्र, लॉन्चिंग सुविधाएं और मिसाइल उत्पादन से जुड़े अहम ठिकाने नष्ट कर दिए गए हैं। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि ईरान के पास अब भी कुछ मिसाइल और ड्रोन क्षमता मौजूद है। वार्ता जारी, लेकिन मतभेद बरकरार तनाव के बीच दोनों देशों के बीच कूटनीतिक बातचीत भी जारी है। ईरान का कहना है कि कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर अब भी गतिरोध बना हुआ है। तेहरान ने अमेरिका पर अपने कुछ वादों को पूरा न करने का आरोप लगाया है, जिनमें ईरान की जमी हुई विदेशी संपत्तियों को मुक्त कराने की मांग भी शामिल है। फिलहाल दोनों देशों के बीच किसी व्यापक समझौते की संभावना पर स्थिति स्पष्ट नहीं है।
अमेरिका और इजरायल के लगातार सैन्य हमलों के बावजूद ईरान की मिसाइल क्षमता पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। हालिया सैटेलाइट तस्वीरों के विश्लेषण में दावा किया गया है कि ईरान ने अपने अधिकांश भूमिगत मिसाइल अड्डों तक पहुंच बहाल कर ली है और युद्ध के दौरान क्षतिग्रस्त हुई कई सुरंगों के प्रवेश द्वार दोबारा खोल दिए हैं। 69 में से 50 सुरंगों के रास्ते फिर खुले रिपोर्ट के मुताबिक, संघर्ष के दौरान 18 भूमिगत मिसाइल ठिकानों पर हुए हमलों में कुल 69 सुरंग प्रवेश मार्ग प्रभावित हुए थे। इनमें से 50 प्रवेश द्वारों को ईरान ने साफ कर फिर से चालू कर दिया है। सैटेलाइट तस्वीरों में बुलडोजर, लोडर और डंप ट्रक जैसे भारी उपकरण मलबा हटाते और क्षतिग्रस्त रास्तों को बहाल करते दिखाई दिए हैं। हमलों के बाद शुरू हुआ मरम्मत अभियान अमेरिका और इजरायल ने हमलों के दौरान मिसाइल ठिकानों के प्रवेश मार्ग, लॉन्चिंग इंफ्रास्ट्रक्चर और संपर्क सड़कों को मुख्य निशाना बनाया था। कई सुरंगों के मुहाने मलबे से बंद हो गए थे और पहुंच मार्गों पर बड़े गड्ढे बन गए थे। युद्धविराम लागू होने के बाद ईरान ने इन इलाकों में तेजी से मरम्मत कार्य शुरू कर दिया। मिसाइल भंडार अब भी सुरक्षित होने का अनुमान विश्लेषकों का मानना है कि सुरंगों के प्रवेश द्वारों को नुकसान पहुंचाना अपेक्षाकृत आसान होता है, लेकिन पहाड़ों और चट्टानों की गहराई में छिपाए गए मिसाइल भंडार को पूरी तरह नष्ट करना कहीं अधिक मुश्किल है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि हमलों के बावजूद ईरान की बड़ी संख्या में मिसाइलें सुरक्षित बची हो सकती हैं। विशेषज्ञों का अनुमान है कि ईरान के पास अब भी लगभग 1,000 मिसाइलें भूमिगत सुविधाओं में मौजूद हो सकती हैं। सैटेलाइट तस्वीरों में दिखी तेजी से बहाली युद्धविराम के बाद ली गई नई तस्वीरों में कई मिसाइल अड्डों पर बड़े पैमाने पर मरम्मत कार्य दिखाई दिया है। इस्फहान के पास स्थित एक मिसाइल स्थल पर डंप ट्रकों और निर्माण मशीनों को क्षतिग्रस्त रास्तों की मरम्मत करते देखा गया। खोमेन क्षेत्र की एक अन्य सुविधा में कम से कम 10 निर्माण वाहन एक साथ काम करते नजर आए, जहां बंद हो चुके सुरंग मार्गों को फिर से खोला जा रहा था। विश्लेषकों का कहना है कि मरम्मत की यह गति दिखाती है कि साधारण निर्माण संसाधनों के जरिए भी सैन्य हमलों के असर को अपेक्षाकृत कम समय में काफी हद तक कम किया जा सकता है। विशेषज्ञों ने क्या कहा? जेम्स मार्टिन सेंटर फॉर नॉनप्रोलिफरेशन स्टडीज के रिसर्च एसोसिएट सैम लेयर के अनुसार, जब तक ईरान के पास मिसाइल लॉन्चर और प्रशिक्षित ऑपरेटर मौजूद हैं, तब तक उसकी मिसाइल क्षमता को पूरी तरह खत्म नहीं माना जा सकता। उन्होंने कहा कि मौजूदा मिसाइल भंडार को लॉन्चरों से जोड़ने में कोई बड़ी तकनीकी बाधा नहीं है, इसलिए ईरान अभी भी जवाबी कार्रवाई करने की क्षमता रखता है। मिसाइल कार्यक्रम रहा हमलों का मुख्य लक्ष्य अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने संघर्ष के दौरान कई बार कहा था कि ईरान के मिसाइल कार्यक्रम को कमजोर करना अभियान का प्रमुख उद्देश्य है। अमेरिका और इजरायल ने केवल मिसाइल अड्डों को ही नहीं, बल्कि मिसाइल निर्माण से जुड़े कारखानों, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण केंद्रों और रॉकेट ईंधन सुविधाओं को भी निशाना बनाया था। ताजा सैटेलाइट तस्वीरों और विशेषज्ञों के आकलन से संकेत मिल रहे हैं कि ईरान अपनी सैन्य संरचना और मिसाइल नेटवर्क के महत्वपूर्ण हिस्सों को दोबारा सक्रिय करने की दिशा में तेजी से काम कर रहा है। युद्ध खत्म नहीं, तनाव बरकरार अमेरिका और ईरान के बीच अब तक कोई औपचारिक शांति समझौता नहीं हुआ है। 28 फरवरी से शुरू हुआ संघर्ष चौथे महीने में प्रवेश कर चुका है। ऐसे में ईरान की भूमिगत मिसाइल क्षमताओं की बहाली की खबरें क्षेत्रीय सुरक्षा और पश्चिम एशिया की रणनीतिक स्थिति को लेकर नई चिंताएं पैदा कर रही हैं।
Donald Trump ने ईरान संकट और बढ़ते वैश्विक तनाव के बीच अपने बेटे Donald Trump Jr. की शादी में शामिल होने को लेकर बड़ा बयान दिया है। ट्रंप ने कहा कि मौजूदा परिस्थितियों में उनके लिए शादी में जाना आसान नहीं है और चाहे वह जाएं या नहीं, दोनों ही हालात में मीडिया उन्हें निशाना बनाएगा। पत्रकारों से क्या बोले ट्रंप? व्हाइट हाउस के ओवल ऑफिस में पत्रकारों से बातचीत के दौरान ट्रंप ने कहा कि वह अपने बेटे की शादी में शामिल होने की कोशिश करेंगे, लेकिन फिलहाल समय सही नहीं लग रहा। उन्होंने मजाकिया अंदाज में कहा, “अगर मैं शादी में जाता हूं, तो मुझे मारा जाएगा। अगर नहीं जाता हूं, तो फेक न्यूज मुझे छोड़ने वाली नहीं है।” ट्रंप ने संकेत दिया कि Iran से जुड़े मौजूदा तनाव और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा हालात उनकी प्राथमिकता बने हुए हैं। बहामास में होगी निजी शादी रिपोर्ट्स के मुताबिक, डोनल्ड ट्रंप जूनियर इस सप्ताहांत Bahamas में एक निजी समारोह में मॉडल और सोशलाइट Bettina Anderson के साथ शादी के बंधन में बंध सकते हैं। बताया जा रहा है कि समारोह को बेहद निजी रखा गया है और इसमें केवल करीबी परिवार के सदस्यों तथा दोस्तों को ही आमंत्रित किया गया है। सुरक्षा और राजनीति बनी बड़ी वजह अमेरिकी राष्ट्रपति ने संकेत दिया कि उनकी मौजूदगी से सुरक्षा व्यवस्था और राजनीतिक चर्चाएं और बढ़ सकती हैं। उन्होंने कहा कि शादी में शामिल होने या न होने, दोनों स्थितियों में मीडिया आलोचना करेगा। ट्रंप ने इसे “ऐसी स्थिति जिसमें मैं जीत नहीं सकता” बताया। कैंप डेविड में हुई थी सगाई डोनल्ड ट्रंप जूनियर ने दिसंबर में अपनी सगाई का ऐलान किया था। रिपोर्ट्स के अनुसार, दोनों की सगाई Camp David में हुई थी। बाद में बेटिना एंडरसन ने Mar-a-Lago में एक ब्राइडल शावर कार्यक्रम भी आयोजित किया था। ट्रंप जूनियर की दूसरी शादी यह डोनल्ड ट्रंप जूनियर की दूसरी शादी होगी। इससे पहले उनकी शादी Vanessa Trump से हुई थी, जिनसे उनके पांच बच्चे हैं। दोनों का 2018 में तलाक हो गया था। हाल ही में वैनेसा ट्रंप ने खुलासा किया था कि उन्हें ब्रेस्ट कैंसर हुआ है। इसके अलावा ट्रंप जूनियर की सगाई पहले Kimberly Guilfoyle से भी हुई थी, लेकिन 2024 में दोनों का रिश्ता खत्म हो गया। ईरान संकट पर टिकी दुनिया की नजर ट्रंप का यह बयान ऐसे समय आया है जब अमेरिका और ईरान के बीच तनाव लगातार बढ़ रहा है। होर्मुज जलडमरूमध्य, तेल आपूर्ति और परमाणु कार्यक्रम को लेकर दोनों देशों के बीच टकराव गहराता जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दिनों में अमेरिकी राष्ट्रपति की विदेश नीति और सुरक्षा प्राथमिकताएं निजी कार्यक्रमों पर भारी पड़ सकती हैं।
United States और Iran के बीच बढ़ते तनाव का असर अब सिर्फ सैन्य मोर्चे तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसका आर्थिक दबाव भी तेजी से बढ़ रहा है। United States Department of Defense (पेंटागन) ने हाल ही में इस संघर्ष की लागत 29 अरब डॉलर बताई है। खास बात यह है कि दो हफ्ते पहले यही अनुमान 25 अरब डॉलर था। यानी केवल 14 दिनों में खर्च का अनुमान 4 अरब डॉलर बढ़ गया। अमेरिकी रक्षा अधिकारियों के अनुसार नए आंकड़ों में हथियारों की मरम्मत, पुराने उपकरणों को बदलने और सैन्य ऑपरेशन की लागत को शामिल किया गया है। विशेषज्ञ बोले- असली खर्च कहीं ज्यादा हो सकता है हालांकि कई विशेषज्ञ मानते हैं कि सरकार द्वारा बताए जा रहे आंकड़े वास्तविक लागत से काफी कम हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार पहले जारी किए गए 25 अरब डॉलर के अनुमान में मध्य पूर्व में अमेरिकी सैन्य ठिकानों को हुए नुकसान और उनकी मरम्मत का खर्च पूरी तरह शामिल नहीं था। इसी वजह से अब यह बहस तेज हो गई है कि क्या अमेरिकी प्रशासन जनता के सामने युद्ध की वास्तविक आर्थिक तस्वीर नहीं रख रहा। हार्वर्ड विशेषज्ञ ने जताई 1 ट्रिलियन डॉलर खर्च की आशंका Harvard Kennedy School की सार्वजनिक नीति विशेषज्ञ Linda Bilmes ने चेतावनी दी है कि यह युद्ध अमेरिकी टैक्सपेयर्स पर कम से कम 1 ट्रिलियन डॉलर का बोझ डाल सकता है। उनके मुताबिक इतिहास बताता है कि युद्धों की वास्तविक लागत शुरुआती अनुमानों से कई गुना ज्यादा होती है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि इराक युद्ध को शुरू में सस्ता बताया गया था, लेकिन बाद में उसकी लागत 5 ट्रिलियन डॉलर से ज्यादा पहुंच गई। क्यों तेजी से बढ़ रहा है सैन्य खर्च? विशेषज्ञों के अनुसार युद्ध की लागत कई स्तरों पर बढ़ती है। अल्पकालिक खर्च मिसाइल और बम इंटरसेप्टर सिस्टम लड़ाकू विमानों का रखरखाव सैनिकों का वेतन और तैनाती सबसे महंगी चीज- हथियारों की रिप्लेसमेंट कॉस्ट उदाहरण के तौर पर, सेना के स्टॉक में मौजूद Tomahawk missile की पुरानी लागत करीब 20 लाख डॉलर थी, लेकिन अब उसी मिसाइल को दोबारा बनाने या खरीदने में 35 लाख डॉलर तक खर्च हो रहा है। दीर्घकालिक खर्च सैन्य ठिकानों की मरम्मत नई रक्षा तकनीकों की खरीद मध्य पूर्व में तैनात लगभग 55,000 अमेरिकी सैनिकों की स्वास्थ्य सेवाएं पूर्व सैनिक कल्याण (Veterans Care) विशेषज्ञों का कहना है कि युद्ध खत्म होने के बाद भी इसका आर्थिक बोझ कई वर्षों तक बना रहता है। आम अमेरिकी नागरिक पर भी पड़ रहा असर युद्ध का असर अब अमेरिकी आम जनता की जिंदगी में भी दिखाई देने लगा है। ऊर्जा संकट और पश्चिम एशिया में तनाव के कारण तेल की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं। अमेरिकी ऊर्जा विभाग के मुताबिक कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बनी रह सकती हैं। आर्थिक विश्लेषकों का कहना है कि अगर तनाव कम नहीं हुआ तो अमेरिका में पेट्रोल की औसत कीमत 5 डॉलर प्रति गैलन तक पहुंच सकती है। इसका सीधा असर महंगाई, ट्रांसपोर्ट खर्च और रोजमर्रा की जरूरतों पर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।
Iran और United States के बीच तनाव एक बार फिर खतरनाक मोड़ पर पहुंचता दिखाई दे रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump द्वारा ईरान के ताजा शांति प्रस्ताव को खारिज किए जाने के बाद तेहरान ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। ईरान ने साफ चेतावनी दी है कि अगर उस पर हमला हुआ, तो उसके सशस्त्र बल “हमलावर को सबक सिखाने” के लिए पूरी तरह तैयार हैं। ट्रंप ने क्या कहा? वॉशिंगटन में पत्रकारों से बातचीत के दौरान ट्रंप ने ईरान के प्रस्ताव को “अस्वीकार्य” बताते हुए खारिज कर दिया। उन्होंने कहा: “यह युद्धविराम गंभीर लाइफ सपोर्ट पर है।” ट्रंप ने हालात की तुलना ऐसे मरीज से की जिसकी “जीवित रहने की संभावना सिर्फ एक प्रतिशत” बची हो। अमेरिकी राष्ट्रपति के इस बयान के बाद मिडिल ईस्ट में तनाव और बढ़ गया है। ईरान ने दी जवाबी चेतावनी ट्रंप की टिप्पणी पर प्रतिक्रिया देते हुए ईरानी संसद के स्पीकर Mohammad Bagher Ghalibaf ने कहा कि ईरान किसी भी संघर्ष के लिए तैयार है। उन्होंने X पर लिखा: “हमारे सशस्त्र बल किसी भी हमले का जवाब देने और हमलावर को सबक सिखाने के लिए तैयार हैं।” उन्होंने यह भी कहा कि “खराब रणनीति और गलत फैसलों का परिणाम हमेशा बुरा ही होता है।” ईरान के प्रस्ताव में क्या था? ईरानी विदेश मंत्रालय के मुताबिक, तेहरान ने जो प्रस्ताव दिया था उसमें: ईरानी बंदरगाहों की अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी खत्म करने पूरे क्षेत्र में सैन्य अभियान रोकने लेबनान में Hezbollah को निशाना बनाने वाले हमलों पर रोक विदेशों में फ्रीज ईरानी संपत्तियों को जारी करने जैसी मांगें शामिल थीं। ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता Esmail Baghaei ने कहा: “हमने किसी तरह की रियायत नहीं मांगी, सिर्फ ईरान के वैध अधिकारों की मांग की है।” होर्मुज स्ट्रेट पर बढ़ा दबाव तनाव का असर वैश्विक ऊर्जा बाजारों पर भी दिखाई देने लगा है। Strait of Hormuz में पहले से चल रही रुकावटों के कारण तेल बाजार दबाव में हैं। अगर स्थिति और बिगड़ती है, तो: कच्चे तेल की कीमतों में बड़ा उछाल वैश्विक सप्लाई चेन पर असर पेट्रोल-डीजल महंगा होना खाद्य और परिवहन लागत बढ़ना जैसे असर देखने को मिल सकते हैं। क्यों बढ़ रहा है तनाव? विशेषज्ञों के मुताबिक दोनों देशों के बीच मुख्य विवाद: ईरान के परमाणु कार्यक्रम अमेरिकी प्रतिबंध मिडिल ईस्ट में सैन्य मौजूदगी इजरायल और हिजबुल्ला को लेकर टकराव को लेकर है। हालिया बयानबाजी से साफ है कि फिलहाल दोनों पक्ष पीछे हटने के मूड में नहीं दिख रहे हैं। ऐसे में मिडिल ईस्ट में अस्थिरता और बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।
अमेरिका और Iran के बीच बढ़ता तनाव अगर खुले युद्ध में बदलता है, तो इसका असर सिर्फ पेट्रोल-डीजल तक सीमित नहीं रहेगा। दुनिया की खाद्य सप्लाई, खेती-किसानी और आम लोगों की थाली तक पर इसका गहरा असर पड़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह संकट 2022 के रूस-यूक्रेन युद्ध से भी बड़ा साबित हो सकता है, क्योंकि इस बार मामला दुनिया की सबसे अहम ऊर्जा सप्लाई रूट्स में से एक Strait of Hormuz से जुड़ा है। दुनिया का बड़ा हिस्सा यहीं से तेल और गैस प्राप्त करता है। कैसे बढ़ेगा खाद्य संकट? आधुनिक खेती पूरी तरह तीन चीजों पर निर्भर है: ईंधन (डीजल, पेट्रोल) उर्वरक (फर्टिलाइजर) ट्रांसपोर्ट सप्लाई चेन अगर युद्ध के कारण तेल सप्लाई बाधित होती है, तो: ट्रैक्टर और सिंचाई की लागत बढ़ेगी खाद बनाने वाली फैक्ट्रियों की लागत कई गुना बढ़ जाएगी माल ढुलाई महंगी होगी खेत से मंडी तक अनाज पहुंचाना मुश्किल हो जाएगा यानी खेती से लेकर खाने की प्लेट तक हर चरण प्रभावित होगा। खाद का संकट क्यों सबसे खतरनाक? Saudi Aramco के CEO Amin Nasser ने चेतावनी दी है कि दुनिया पहले से ही “एनर्जी सप्लाई शॉक” का सामना कर रही है। अगर हालात बिगड़े, तो असर कई साल तक रह सकता है। फर्टिलाइजर उद्योग प्राकृतिक गैस और तेल पर काफी निर्भर करता है। खाड़ी क्षेत्र में तनाव बढ़ने का मतलब है: यूरिया और अन्य खाद की कीमतों में भारी उछाल गरीब देशों में खाद की कमी अगली फसलों की पैदावार में गिरावट यही वजह है कि विशेषज्ञ 2027 तक असर बने रहने की आशंका जता रहे हैं। गरीब देशों पर सबसे ज्यादा असर United Nations Office for Project Services ने भी चेतावनी दी है कि अगर तनाव लंबा चला, तो करोड़ों लोग खाद्य संकट की चपेट में आ सकते हैं। जो देश खाद्यान्न आयात पर निर्भर हैं, वहां हालात सबसे खराब हो सकते हैं, क्योंकि: युद्ध के समय देश अनाज निर्यात रोक सकते हैं अंतरराष्ट्रीय बाजार में गेहूं-चावल की कमी हो सकती है शिपिंग और बीमा खर्च कई गुना बढ़ जाएगा ऐसी स्थिति में अफ्रीका, दक्षिण एशिया और मध्य-पूर्व के गरीब देशों में भुखमरी का खतरा तेजी से बढ़ सकता है। हॉर्मुज स्ट्रेट क्यों है इतना अहम? Strait of Hormuz दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण समुद्री तेल रूट्स में से एक है। यहां तनाव बढ़ने का मतलब: तेल टैंकरों की आवाजाही प्रभावित होना शिपिंग कंपनियों का जोखिम बढ़ना वैश्विक सप्लाई चेन टूटना अगर यह रास्ता असुरक्षित होता है, तो सिर्फ तेल ही नहीं, खाद्यान्न और जरूरी सामान की वैश्विक ढुलाई भी प्रभावित होगी। आम लोगों पर क्या असर पड़ेगा? अगर युद्ध लंबा चला, तो दुनिया भर में: पेट्रोल-डीजल महंगा LPG और गैस सिलेंडर महंगे सब्जियां और अनाज महंगे दूध, अंडे और खाने की चीजों की कमी ट्रांसपोर्ट और बिजली खर्च में बढ़ोतरी जैसी समस्याएं देखने को मिल सकती हैं। क्या दुनिया तैयार है? विशेषज्ञ मानते हैं कि कोविड महामारी और रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद वैश्विक सप्लाई चेन पहले ही कमजोर हो चुकी है। ऐसे में अमेरिका-ईरान युद्ध दुनिया की अर्थव्यवस्था को एक और बड़े झटके में धकेल सकता है। सबसे बड़ी चिंता यही है कि अगर खाद और ईंधन की सप्लाई लंबे समय तक प्रभावित हुई, तो इसका असर सिर्फ कुछ महीनों का नहीं बल्कि कई सालों तक दिखाई दे सकता है।
ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव के बीच एक नई रिपोर्ट ने पाकिस्तान की भूमिका को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। अमेरिकी अधिकारियों के हवाले से आई एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि पाकिस्तान ने अपने नूर खान एयरबेस पर ईरानी सैन्य विमानों को उतरने की अनुमति दी थी, ताकि उन्हें संभावित अमेरिकी हमलों से बचाया जा सके। रिपोर्ट के मुताबिक, यह घटनाक्रम उस समय हुआ जब पाकिस्तान खुद को तेहरान और वॉशिंगटन के बीच मध्यस्थ के तौर पर पेश कर रहा था। क्या है दावा? अमेरिकी अधिकारियों के हवाले से आई रिपोर्ट में कहा गया है कि अप्रैल की शुरुआत में, जब अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने सीजफायर की घोषणा की, उसके तुरंत बाद ईरान ने अपने कई सैन्य विमान पाकिस्तान भेजे। बताया गया कि ये विमान रावलपिंडी स्थित नूर खान एयरबेस (PAF Base Nur Khan) पर उतारे गए। रिपोर्ट में दावा है कि इनमें ईरानी एयरफोर्स का RC-130 जासूसी विमान भी शामिल था। अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि ईरान ने अपने सैन्य संसाधनों को सुरक्षित रखने के लिए यह कदम उठाया। पाकिस्तान की भूमिका पर उठे सवाल इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद अमेरिका में भी प्रतिक्रिया देखने को मिली। अमेरिकी सीनेटर Lindsey Graham ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर कहा कि अगर यह रिपोर्ट सही है, तो पाकिस्तान की भूमिका पर दोबारा गंभीरता से विचार करने की जरूरत होगी। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान के कुछ रक्षा अधिकारियों के पहले के इजरायल विरोधी बयानों को देखते हुए ऐसी खबर पूरी तरह असंभव नहीं लगती। ग्राहम के बयान के बाद इस मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा तेज हो गई है। पाकिस्तान ने क्या कहा? हालांकि पाकिस्तान ने इन दावों को पूरी तरह खारिज किया है। पाकिस्तान के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि नूर खान एयरबेस घनी आबादी वाले इलाके में स्थित है, इसलिए वहां ऐसी किसी गतिविधि को गुप्त रखना संभव नहीं है। पाकिस्तानी अधिकारी ने दावा किया कि एयरबेस पर ईरानी सैन्य विमानों के उतरने की खबरें गलत और भ्रामक हैं। अफगानिस्तान भेजे गए कुछ नागरिक विमान रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि ईरान ने अपने कुछ नागरिक विमानों को अफगानिस्तान भेजा था। हालांकि अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक यह स्पष्ट नहीं है कि उन विमानों में सैन्य संसाधन भी शामिल थे या नहीं। क्यों अहम है यह मामला? अगर ये दावे सही साबित होते हैं, तो इससे कई बड़े सवाल खड़े हो सकते हैं— क्या पाकिस्तान पर्दे के पीछे ईरान की मदद कर रहा था? क्या उसकी मध्यस्थ की भूमिका निष्पक्ष थी? क्या इससे अमेरिका-पाकिस्तान संबंधों पर असर पड़ेगा? फिलहाल इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन रिपोर्ट ने पश्चिम एशिया की मौजूदा भू-राजनीतिक स्थिति को लेकर नई बहस जरूर छेड़ दी है।
US Iran War and Insider Trading in Share Market: अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव के बीच अब शेयर और कमोडिटी बाजार में इनसाइडर ट्रेडिंग के आरोपों ने नया विवाद खड़ा कर दिया है. सवाल उठ रहे हैं कि क्या कुछ लोगों को युद्ध और संभावित समझौते से जुड़ी अंदरूनी जानकारी पहले से थी, जिसके आधार पर करोड़ों डॉलर का मुनाफा कमाया गया. 70 मिनट में हुआ बड़ा खेल रिपोर्ट्स के मुताबिक, 6 मई की सुबह अमेरिकी समयानुसार करीब 3:40 बजे अचानक भारी मात्रा में क्रूड ऑयल “शॉर्ट” कॉन्ट्रैक्ट खरीदे गये. “शॉर्ट” ट्रेडिंग का मतलब होता है कि निवेशक यह दांव लगाता है कि किसी वस्तु की कीमत गिरने वाली है. बताया जा रहा है कि करीब 10,000 क्रूड ऑयल शॉर्ट कॉन्ट्रैक्ट खरीदे गये, जिनकी कुल वैल्यू लगभग 920 मिलियन डॉलर यानी हजारों करोड़ रुपये थी. बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि इतनी बड़ी ट्रेडिंग सामान्य परिस्थितियों में बेहद असामान्य मानी जाती है. 70 मिनट बाद आयी बड़ी खबर इन सौदों के लगभग 70 मिनट बाद अमेरिकी मीडिया प्लेटफॉर्म Axios की रिपोर्ट सामने आयी, जिसमें दावा किया गया कि अमेरिका और ईरान युद्ध समाप्त करने के लिए 14 सूत्रीय समझौते के करीब पहुंच चुके हैं. इस खबर के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में भारी गिरावट आयी. सुबह 7 बजे तक क्रूड ऑयल की कीमतें 12 प्रतिशत से ज्यादा नीचे चली गयीं. रिपोर्ट के अनुसार, जिन लोगों ने पहले से शॉर्ट पोजिशन ली थी, उन्हें इस गिरावट से लगभग 125 मिलियन डॉलर यानी करीब 1,000 करोड़ रुपये का मुनाफा हुआ. फिर अचानक पलटा बाजार हालांकि मामला यहीं खत्म नहीं हुआ. कुछ ही समय बाद ईरान ने “पर्शियन गल्फ स्ट्रेट अथॉरिटी” से जुड़ा बड़ा कदम उठाया, जिसके बाद तेल की कीमतों में फिर उछाल आ गया. तेल की कीमतें अचानक लगभग 8 प्रतिशत तक चढ़ गयीं. इस तेज उतार-चढ़ाव ने बाजार में और ज्यादा संदेह पैदा कर दिया. इनसाइडर ट्रेडिंग के आरोप क्यों लग रहे? सोशल मीडिया और वित्तीय जगत में अब यह सवाल उठ रहा है कि क्या कुछ ट्रेडर्स को संभावित डील की जानकारी पहले से थी? क्योंकि जिस समय इतनी बड़ी शॉर्ट ट्रेडिंग की गयी, उस समय तक सार्वजनिक रूप से ऐसी कोई खबर सामने नहीं आयी थी जो तेल की कीमतों में बड़ी गिरावट का संकेत देती. मार्केट विश्लेषकों का कहना है कि अगर किसी को गोपनीय कूटनीतिक बातचीत या संभावित समझौते की जानकारी पहले से थी और उसी आधार पर ट्रेडिंग की गयी, तो यह इनसाइडर ट्रेडिंग के दायरे में आ सकता है. कोबेसी लेटर ने उठाये सवाल ग्लोबल मार्केट पर नजर रखने वाले प्लेटफॉर्म “कोबेसी लेटर” ने इस पूरे घटनाक्रम को सार्वजनिक किया. उनके अनुसार, इतनी बड़ी मात्रा में अचानक की गयी ट्रेडिंग ने बाजार में गंभीर सवाल खड़े कर दिये हैं. हालांकि अब तक अमेरिकी प्रशासन या नियामक एजेंसियों की ओर से इस मामले पर कोई आधिकारिक जांच की घोषणा नहीं की गयी है. युद्ध और बाजार का खतरनाक रिश्ता विशेषज्ञों का कहना है कि भू-राजनीतिक तनाव और युद्ध की स्थिति अक्सर वैश्विक बाजारों को प्रभावित करती है. तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव से कुछ निवेशक भारी मुनाफा कमाते हैं, लेकिन अगर इसमें अंदरूनी जानकारी का इस्तेमाल हो, तो यह गंभीर वित्तीय अपराध माना जाता है.
अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बीच कूटनीतिक प्रयासों पर अनिश्चितता गहराती जा रही है। इसी बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बड़ा दावा करते हुए कहा है कि ईरान के परमाणु ठिकानों को “पूरी तरह तबाह” कर दिया गया है, जिससे बातचीत की संभावनाओं पर भी असर पड़ सकता है। ‘ऑपरेशन मिडनाइट हैमर’ का दावा ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर कहा कि “ऑपरेशन मिडनाइट हैमर” के तहत ईरान के परमाणु ठिकानों को खाक कर दिया गया है। उनके मुताबिक, इन ठिकानों को दोबारा उपयोग में लाना अब बेहद मुश्किल होगा और इसके लिए लंबा समय लगेगा। उन्होंने इस दौरान अमेरिकी मीडिया–खासकर CNN–पर भी निशाना साधते हुए “फेक न्यूज” करार दिया और आरोप लगाया कि उनकी उपलब्धियों को जानबूझकर कम करके दिखाया जा रहा है। ईरान का पलटवार–‘धमकियों में बातचीत नहीं’ ईरान ने ट्रंप के इन दावों और दबाव की रणनीति को सिरे से खारिज कर दिया है। ईरानी संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बगेर गालिबाफ ने कहा कि अमेरिका बातचीत को “आत्मसमर्पण” में बदलना चाहता है, जिसे तेहरान कभी स्वीकार नहीं करेगा। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर हालात बिगड़ते हैं, तो ईरान भी अपने नए सैन्य कदम उठाने के लिए तैयार है और “मैदान-ए-जंग में नए पत्ते खोल सकता है।” सीजफायर पर भी असमंजस इस बीच ट्रंप ने संकेत दिए हैं कि 22 अप्रैल को खत्म हो रहे युद्धविराम को आगे बढ़ाने के पक्ष में वे नहीं हैं। इससे क्षेत्र में फिर से टकराव बढ़ने की आशंका गहरा गई है। हालांकि पहले यह योजना थी कि अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल–जिसमें जेडी वेंस और जैरेड कुशनर जैसे नाम शामिल थे–इस्लामाबाद जाकर बातचीत करेगा, लेकिन ईरान की अनिच्छा के कारण यह पहल अधर में लटकी हुई है। बढ़ता तनाव, घटती बातचीत की उम्मीद एक तरफ अमेरिका सैन्य दबाव बढ़ा रहा है, तो दूसरी ओर ईरान सख्त रुख अपनाए हुए है। ऐसे में साफ संकेत मिल रहे हैं कि फिलहाल कूटनीतिक रास्ता मुश्किल होता जा रहा है और हालात फिर से टकराव की ओर बढ़ सकते हैं।
Iran US Ceasefire: ईरान और अमेरिका के बीच जारी 14 दिनों का युद्धविराम 22 अप्रैल को खत्म होने वाला है। ऐसे में दोनों देशों के बीच नए दौर की बातचीत की तैयारी तेज हो गई है। लेकिन होर्मुज जलडमरूमध्य में बढ़ते तनाव और ईरानी जहाज की कथित जब्ती के बाद हालात फिर से अनिश्चित हो गए हैं। पाकिस्तान इस बातचीत का मध्यस्थ बनकर एक बार फिर शांति वार्ता कराने की कोशिश कर रहा है, लेकिन मौजूदा हालात इसे मुश्किल बना रहे हैं। होर्मुज तनाव से बढ़ी चिंता हाल ही में अमेरिका द्वारा एक ईरानी ध्वज वाले मालवाहक जहाज को रोककर जब्त करने के बाद ईरान ने कड़ा विरोध जताया है। अमेरिका का दावा है कि यह जहाज उसके लगाए गए प्रतिबंधों से बचने की कोशिश कर रहा था। इस कार्रवाई के बाद ईरान की संयुक्त सैन्य कमान ने जवाबी कार्रवाई की चेतावनी दी है। वहीं, ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने पाकिस्तान के विदेश मंत्री से बातचीत में कहा कि अमेरिका का रवैया “दोहरा और अस्थिर” है। ईरान का सख्त रुख: अभी कोई वार्ता नहीं ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने स्पष्ट कर दिया है कि फिलहाल अमेरिका के साथ किसी भी तरह की बातचीत की कोई योजना नहीं है। उन्होंने कहा: “अभी हमारे पास अगले दौर की वार्ता के लिए कोई निर्णय नहीं है।” यह बयान उस समय आया है जब पाकिस्तान में दूसरे दौर की बातचीत की तैयारी चल रही थी। ट्रंप की चेतावनी से बढ़ा तनाव अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि अमेरिका ने ईरान को एक “बेहतरीन डील” दी है और अब फैसला ईरान को करना है। ट्रंप ने चेतावनी देते हुए कहा: ईरान या तो समझौता करे या फिर “तबाही” के लिए तैयार रहे अमेरिकी सेना ईरान के पावर प्लांट और पुलों को निशाना बना सकती है उनके इस बयान ने तनाव और बढ़ा दिया है। बातचीत में सबसे बड़ा रोड़ा क्या है? ईरान का आरोप है कि अमेरिका लगातार युद्धविराम की शर्तों का उल्लंघन कर रहा है। इनमें शामिल हैं: ईरानी जहाजों पर कार्रवाई समुद्री रास्तों पर दबाव क्षेत्रीय संघर्षों में हस्तक्षेप ईरान का कहना है कि इन हालात में बातचीत का माहौल नहीं बन पा रहा है। पाकिस्तान की कूटनीतिक कोशिशें तेज पाकिस्तान एक बार फिर मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है। पिछले 24 घंटों में पाकिस्तान ने अमेरिका और ईरान दोनों से संपर्क तेज कर दिए हैं। पाक गृह मंत्री मोहसिन नकवी ने ईरानी दूतावास का दौरा किया ईरान को बातचीत के लिए मनाने की कोशिश जारी दूसरे दौर की बैठक की तैयारी चल रही है पहली वार्ता रही थी बेनतीजा 11–12 अप्रैल को इस्लामाबाद में दोनों देशों के बीच 21 घंटे लंबी बातचीत हुई थी, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला। अब सभी की नजरें दूसरे दौर की संभावित बैठक पर टिकी हैं, जो या तो तनाव कम कर सकती है या हालात और बिगाड़ सकती है।
मिडिल ईस्ट में हालात तेजी से बिगड़ते नजर आ रहे हैं। Gulf of Oman में United States और Iran के बीच सीधा सैन्य टकराव जैसी स्थिति बन गई है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिका द्वारा ईरानी मर्चेंट शिप पर कार्रवाई के बाद तेहरान ने जवाबी कदम उठाते हुए अमेरिकी युद्धपोतों की ओर ड्रोन भेजे हैं। क्या हुआ ओमान की खाड़ी में? ईरानी मीडिया के हवाले से सामने आई जानकारी के अनुसार: अमेरिकी सेना ने ईरान के एक व्यापारिक जहाज़ को निशाना बनाया जहाज़ को रोककर उसे वापस ईरानी समुद्री सीमा में भेजने की कोशिश की गई इस कार्रवाई को ईरान ने “उकसावे वाली” कार्रवाई बताया इसके जवाब में: ईरान की सेना और Islamic Revolutionary Guard Corps (IRGC) ने अमेरिकी युद्धपोतों की दिशा में ड्रोन तैनात किए IRGC का दावा है कि अमेरिकी नौसेना को पीछे हटने पर मजबूर होना पड़ा हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि सीमित है, जिससे स्थिति और धुंधली बनी हुई है। होर्मुज और खाड़ी की रणनीतिक अहमियत Strait of Hormuz और Gulf of Oman वैश्विक तेल व्यापार के सबसे अहम मार्गों में गिने जाते हैं। दुनिया के बड़े हिस्से का कच्चा तेल इसी रास्ते से गुजरता है यहां किसी भी तरह का सैन्य टकराव सीधे तेल कीमतों और सप्लाई पर असर डाल सकता है इसी वजह से इस क्षेत्र में बढ़ती हर गतिविधि को वैश्विक स्तर पर गंभीरता से देखा जा रहा है। जहाज़ ‘टूस्का’ पर कार्रवाई अमेरिका ने एक और बड़ा दावा करते हुए कहा कि उसने ‘टूस्का’ नाम के ईरानी जहाज़ को रोक लिया है। United States Central Command (CENTCOM) के अनुसार कई बार चेतावनी देने के बाद भी जहाज़ नहीं रुका इसके बाद अमेरिकी युद्धपोत USS Spruance ने उसके इंजन रूम पर फायरिंग की जहाज़ को निष्क्रिय कर अमेरिका ने अपने कब्जे में ले लिया इस कार्रवाई की पुष्टि Donald Trump ने भी की है। ईरान का पलटवार और आरोप ईरान ने इस पूरी घटना को “समुद्री डकैती” करार दिया है। तेहरान का कहना है कि अमेरिका अंतरराष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन कर रहा है IRGC ने चेतावनी दी है कि अगर नाकेबंदी जारी रही तो होर्मुज पूरी तरह बंद रहेगा साथ ही, ईरान ने कुछ विदेशी टैंकरों को भी रास्ते से वापस भेजा है, जिससे तनाव और बढ़ गया है। सीजफायर पर भी सवाल ईरान ने आरोप लगाया है कि 8 अप्रैल को घोषित युद्धविराम का अमेरिका ने उल्लंघन किया है। तेहरान का कहना है कि पहले अमेरिका अपनी नाकेबंदी हटाए तभी किसी भी तरह की बातचीत संभव होगी यानी कूटनीतिक रास्ते फिलहाल कमजोर पड़ते दिख रहे हैं। क्या बढ़ सकता है युद्ध? विशेषज्ञ मानते हैं कि हालात बेहद नाजुक हैं: दोनों देशों की सेनाएं आमने-सामने हैं छोटे-छोटे टकराव बड़े संघर्ष में बदल सकते हैं ड्रोन, नौसैनिक कार्रवाई और नाकेबंदी–तीनों मिलकर जोखिम बढ़ा रहे हैं ओमान की खाड़ी में हुआ यह घटनाक्रम सिर्फ एक क्षेत्रीय झड़प नहीं, बल्कि वैश्विक संकट का संकेत हो सकता है। एक ओर अमेरिका अपनी सैन्य ताकत दिखा रहा है, तो दूसरी ओर ईरान भी पीछे हटने को तैयार नहीं है। अब दुनिया की नजर इस बात पर है कि: क्या यह टकराव कूटनीति से सुलझेगा या फिर मिडिल ईस्ट एक बड़े युद्ध की ओर बढ़ रहा है
अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बीच Donald Trump ने एक बार फिर कड़ा रुख अपनाते हुए तेहरान को अंतिम चेतावनी दी है। ट्रंप ने साफ कहा है कि यदि Iran अमेरिका द्वारा प्रस्तावित समझौते को स्वीकार नहीं करता है, तो उसे गंभीर परिणाम भुगतने होंगे। साथ ही उन्होंने यह भी बताया कि अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल बातचीत के लिए Islamabad जाएगा। ट्रंप का दोहरा संदेश: बातचीत भी, कार्रवाई की धमकी भी ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर पोस्ट करते हुए ईरान पर संघर्षविराम उल्लंघन का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि Strait of Hormuz में हुई गोलीबारी युद्धविराम समझौते के खिलाफ है, जिसमें फ्रांस और यूनाइटेड किंगडम के जहाजों को निशाना बनाया गया। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर समझौता नहीं हुआ तो अमेरिका ईरान के पावर प्लांट और अहम इंफ्रास्ट्रक्चर को निशाना बना सकता है। हालांकि, इसके साथ ही उन्होंने बातचीत का दरवाजा भी खुला रखा और कहा कि “हमने एक निष्पक्ष और उचित समझौता प्रस्तावित किया है।” पाकिस्तान में होगा अगला दौर ट्रंप के मुताबिक, अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल सोमवार को पाकिस्तान पहुंचेगा और मंगलवार से वार्ता शुरू हो सकती है। इस प्रतिनिधिमंडल में Jared Kushner और Steve Witkoff शामिल हैं। इससे पहले भी दोनों देशों के बीच बातचीत हो चुकी है, लेकिन कोई ठोस नतीजा नहीं निकला। “ईरान घुटने टेक देगा” – ट्रंप ट्रंप ने अपने बयान में कहा कि ईरान अमेरिका के सामने ज्यादा देर टिक नहीं पाएगा और उसे अंततः समझौता करना ही होगा। उन्होंने कहा कि अगर ईरान नहीं मानता, तो अमेरिका वह कदम उठाएगा जो पिछले दशकों में नहीं उठाए गए। सीजफायर की डेडलाइन नजदीक गौरतलब है कि अमेरिका और ईरान के बीच 8 अप्रैल को 14 दिनों का संघर्षविराम लागू हुआ था, जो 22 अप्रैल को समाप्त हो रहा है। ऐसे में आने वाले कुछ दिन दोनों देशों के रिश्तों के लिए बेहद अहम माने जा रहे हैं। वैश्विक असर की आशंका विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह तनाव और बढ़ता है, तो इसका असर वैश्विक तेल सप्लाई और मध्य पूर्व की स्थिरता पर पड़ सकता है, खासकर Strait of Hormuz जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग पर।
अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को साफ चेतावनी दी है कि अगर बुधवार तक कोई बड़ा समझौता नहीं होता, तो युद्धविराम खत्म किया जा सकता है। उन्होंने संकेत दिया कि हालात बिगड़े तो एक बार फिर सैन्य कार्रवाई शुरू हो सकती है। “फिर शुरू हो सकती हैं बमबारी” – ट्रंप एयर फोर्स वन में पत्रकारों से बातचीत के दौरान ट्रंप ने कहा कि स्थिति अभी पूरी तरह स्थिर नहीं है। उन्होंने कहा कि अगर समझौता नहीं हुआ, तो “हमें फिर से बमबारी शुरू करनी पड़ सकती है।” साथ ही उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि ईरान के बंदरगाहों पर लगा प्रतिबंध फिलहाल जारी रहेगा। ईरान-अमेरिका बातचीत में गतिरोध दोनों देशों के बीच चल रही कूटनीतिक कोशिशें अभी तक किसी नतीजे पर नहीं पहुंची हैं। हाल ही में पाकिस्तान में हुई अप्रत्यक्ष बातचीत भी विफल रही, जिससे तनाव और बढ़ गया है। प्रमुख मुद्दों पर दोनों पक्षों के बीच गहरी असहमति बनी हुई है। हॉर्मुज जलडमरूमध्य बना तनाव का केंद्र हॉर्मुज जलडमरूमध्य, जहां से दुनिया के करीब 20% तेल और गैस की आपूर्ति होती है, वह इस विवाद का मुख्य केंद्र बना हुआ है। अमेरिका का कहना है कि यह मार्ग सुरक्षित और खुला है, जबकि ईरान बार-बार चेतावनी दे रहा है कि दबाव बढ़ा तो रास्ता प्रभावित हो सकता है। नौसेना नाकेबंदी और बढ़ता तनाव अमेरिका ने अप्रैल के मध्य से ईरानी बंदरगाहों पर समुद्री नाकेबंदी लागू कर रखी है, जिससे जहाजों की आवाजाही पर असर पड़ा है। ईरान ने इसे अवैध और उकसाने वाला कदम बताया है। वैश्विक बाजारों में चिंता तनाव बढ़ने के साथ ही वैश्विक तेल बाजारों में भी चिंता का माहौल है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर स्थिति और बिगड़ी तो तेल आपूर्ति पर बड़ा असर पड़ सकता है और ऊर्जा बाजार अस्थिर हो सकता है। बुधवार की डेडलाइन अब पूरी दुनिया के लिए अहम बन गई है। अगर बातचीत सफल नहीं होती, तो मध्य पूर्व में तनाव और बढ़ सकता है, जिसका असर वैश्विक शांति और अर्थव्यवस्था दोनों पर पड़ेगा।
ईरान के बयान से बढ़ी उलझन हॉर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर एक बड़ा बयान सामने आया है। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कहा कि युद्धविराम अवधि के दौरान यह समुद्री रास्ता सभी वाणिज्यिक जहाजों के लिए “पूरी तरह खुला” रहेगा। लेकिन इसी घोषणा के बाद स्थिति और अधिक जटिल हो गई है। ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड की सख्त शर्तें ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड ने साफ किया है कि इस मार्ग से गुजरने वाले हर जहाज को पहले उनकी अनुमति लेनी होगी। साथ ही तय मार्ग का ही उपयोग करना होगा। सैन्य जहाजों के प्रवेश पर अब भी रोक जारी है। इसे गार्ड ने “नई व्यवस्था” बताया है। ईरान के अंदर ही बयान पर असहमति ईरान के ही कुछ सरकारी मीडिया संस्थानों ने विदेश मंत्री के बयान पर सवाल उठाए हैं। तस्नीम न्यूज ने इसे “अधूरा और भ्रम पैदा करने वाला” बताया, जबकि मेहर न्यूज ने कहा कि रणनीतिक हालात को देखते हुए यह मार्ग पूरी तरह बंद रहना चाहिए। अमेरिका और ट्रंप का दावा अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया पर दावा किया कि हॉर्मुज जलडमरूमध्य पूरी तरह खुल चुका है और उन्होंने ईरान को धन्यवाद भी दिया। हालांकि बाद में उन्होंने यह भी कहा कि समुद्री नाकेबंदी तब तक जारी रहेगी जब तक समझौता पूरा नहीं हो जाता। तेल बाजार पर असर इस घोषणा के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट देखी गई है। रिपोर्ट के अनुसार, तेल कीमतें करीब 10 प्रतिशत तक नीचे आ गई हैं, जिससे वैश्विक ऊर्जा बाजार पर बड़ा असर पड़ा है। हॉर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर ईरान के अलग-अलग बयानों और सैन्य शर्तों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भ्रम की स्थिति पैदा कर दी है। इससे वैश्विक व्यापार और तेल बाजार पर आने वाले दिनों में भी असर देखने को मिल सकता है।
वॉशिंगटन, एजेंसियां। पश्चिम एशिया में जारी भारी तनाव के बीच अमेरिका और ईरान के संबंध अब युद्ध के मुहाने पर पहुंच गए हैं। इस्लामाबाद में परमाणु कार्यक्रम को लेकर चल रही उच्च स्तरीय शांति वार्ता के पूरी तरह विफल होने के बाद, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के खिलाफ सख्त कदम उठाने का फैसला किया है। राष्ट्रपति के आदेश पर, 13 अप्रैल 2026 से ईरानी बंदरगाहों की पूर्ण समुद्री नाकेबंदी (Blockade) लागू कर दी गई है। यह कार्रवाई भारतीय समयानुसार सोमवार शाम 7:30 बजे से प्रभावी हो गई है, जिसका सीधा असर अरब की खाड़ी और ओमान की खाड़ी के व्यापारिक मार्गों पर पड़ेगा। परमाणु वार्ता की विफलता और नाकेबंदी का निर्णय अमेरिका और ईरान के बीच पिछले कुछ समय से चल रही हाई-स्टेक बातचीत का कोई ठोस नतीजा नहीं निकल सका। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने स्पष्ट किया कि हालांकि अन्य कई मोर्चों पर दोनों देशों के बीच प्रगति हुई थी, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा 'परमाणु कार्यक्रम' था, जिस पर कोई समझौता नहीं हो पाया। ट्रंप ने बताया कि ईरान अपने परमाणु लक्ष्यों को छोड़ने के लिए तैयार नहीं है, जिसके कारण वाशिंगटन को यह कठोर कदम उठाने पर मजबूर होना पड़ा। अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) ने इस सैन्य आदेश की पुष्टि करते हुए कहा कि ईरानी बंदरगाहों में आने-जाने वाले सभी जहाजों को टारगेट किया जाएगा। यह नाकेबंदी बिना किसी भेदभाव के सभी देशों के जहाजों पर लागू होगी। हालांकि, सेना ने यह भी स्पष्ट किया है कि होर्मुज स्ट्रेट से होकर गैर-ईरानी बंदरगाहों की ओर जाने वाले अंतरराष्ट्रीय जहाजों को अमेरिकी सेना द्वारा नहीं रोका जाएगा। 'प्रोटेक्शन फीस' और नौसैनिक माइंस पर तकरार इस नाकेबंदी के पीछे ईरान द्वारा जहाजों से वसूले जा रहे कथित 'अवैध टोल' को भी एक बड़ी वजह माना जा रहा है। राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान पर होर्मुज स्ट्रेट में 'वर्ल्ड एक्सटॉर्शन' (वैश्विक उगाही) करने का गंभीर आरोप लगाया है। उन्होंने कहा कि ईरान समुद्री माइंस बिछाने की धमकी देकर अंतरराष्ट्रीय जहाजों को डरा रहा है और उनसे सुरक्षा के नाम पर अवैध वसूली कर रहा है। ट्रंप ने कड़े लहजे में कहा कि जो कोई भी इस गैर-कानूनी टोल का भुगतान करेगा, उसे खुले समुद्र में सुरक्षित रास्ता नहीं दिया जाएगा। इंस्टीट्यूट फॉर द स्टडी ऑफ वॉर के विश्लेषकों का कहना है कि ईरान ने कुछ शिपिंग लेन को 'खतरनाक क्षेत्र' घोषित कर जहाजों को अपने जलक्षेत्र में प्रवेश के लिए मजबूर किया, जहां से सुरक्षा शुल्क वसूला गया। अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून के तहत इस तरह की वसूली को 'प्रोटेक्शन रैकेट' माना गया है। इसके जवाब में, अमेरिकी नौसेना के विध्वंसक जहाज 'यूएसएस फ्रैंक ई. पीटरसन' और 'यूएसएस माइकल मर्फी' ने होर्मुज स्ट्रेट में गश्त शुरू कर दी है ताकि समुद्री माइंस को हटाया जा सके और जहाजों को सुरक्षित रास्ता दिया जा सके। ईरान की प्रतिक्रिया और अंतरराष्ट्रीय शांति प्रयास दूसरी ओर, तेहरान ने अमेरिका के इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए नाकेबंदी को अनुचित बताया है। ईरान के विदेश मंत्री सईद अब्बास अराघची ने कहा कि ईरान ने शांति बहाली के लिए नेक नीयती से बातचीत की थी और वे समझौते के बेहद करीब पहुंच चुके थे। अराघची ने अमेरिका पर 'अत्यधिक मांगों' का आरोप लगाते हुए कहा कि दुश्मनी का जवाब दुश्मनी से ही पैदा होता है। उन्होंने चेतावनी दी कि इस तरह की नाकेबंदी से हालात और भी ज्यादा बिगड़ सकते हैं। इस बीच, वैश्विक स्तर पर तनाव कम करने की कोशिशें भी जारी हैं। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने ईरानी राष्ट्रपति पेजेश्कियान से फोन पर चर्चा कर शांति प्रयासों में मदद की पेशकश की है। एडमिरल ब्रैड कूपर के अनुसार, अमेरिकी नौसेना जल्द ही सुरक्षित नेविगेशन रूट्स को नागरिक शिपिंग के लिए साझा करेगी। फिलहाल, पूरी दुनिया की नजरें होर्मुज स्ट्रेट पर टिकी हैं, क्योंकि इस नाकेबंदी से वैश्विक तेल आपूर्ति और बीमा दरों में भारी उछाल आने की आशंका बढ़ गई है।
US–Iran–Israel War Update: इजरायल के लेबनान पर हमले जारी रहने के बीच ईरान के नए सर्वोच्च नेता मुज्तबा खामेनेई का अहम बयान सामने आया है। उन्होंने साफ किया कि ईरान युद्ध नहीं चाहता, लेकिन अपने अधिकारों से पीछे भी नहीं हटेगा। क्या बोले खामेनेई? “हमने युद्ध नहीं चाहा और हम इसे नहीं चाहते…” “लेकिन किसी भी परिस्थिति में अपने अधिकार नहीं छोड़ेंगे” “इस संघर्ष में शामिल सभी पक्षों को हम एक ही मानते हैं” उनके इस बयान को सीधे तौर पर लेबनान में इजरायल के हमलों से जोड़कर देखा जा रहा है। इजरायल का रुख अब भी सख्त इजरायली पीएम पहले ही कह चुके हैं: “लेबनान में कोई सीजफायर लागू नहीं” हिज़्बुल्लाह के खिलाफ सैन्य कार्रवाई जारी होर्मुज स्ट्रेट पर चेतावनी खामेनेई ने बड़ा संकेत देते हुए कहा: ईरान होर्मुज स्ट्रेट को संभालने का तरीका बदल सकता है जनता से अपील: सड़कों पर आकर अपनी आवाज उठाएं इसका सीधा असर वैश्विक तेल सप्लाई पर पड़ सकता है। बैकग्राउंड क्या है? 28 फरवरी को युद्ध की शुरुआत के दिन ही अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत इसके बाद मुज्तबा खामेनेई बने नए सुप्रीम लीडर अभी तक सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आए, सिर्फ लिखित संदेशों के जरिए संवाद हेल्थ को लेकर भी अटकलें कुछ रिपोर्ट्स में दावा: खामेनेई कोमा जैसी स्थिति में है ईरान के कोम शहर में इलाज जारी हालांकि, सरकार की ओर से कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।