पूजा विधि

Married women performing Vat Savitri Vrat puja around banyan tree
वट सावित्री व्रत 2026 कब है? जानें सही तिथि, पूजा का शुभ मुहूर्त और महत्व

Vat Savitri Vrat हिंदू धर्म का बेहद महत्वपूर्ण व्रत माना जाता है। यह व्रत विशेष रूप से विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी आयु, सुख-समृद्धि और अखंड सौभाग्य की कामना के लिए रखती हैं। धार्मिक मान्यता है कि इसी दिन माता सावित्री ने अपने तप, प्रेम और दृढ़ संकल्प से यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राण वापस प्राप्त किए थे। तभी से यह व्रत वैवाहिक सुख और समर्पण का प्रतीक माना जाता है। वट सावित्री व्रत 2026 कब है? पंचांग के अनुसार Vat Savitri Vrat ज्येष्ठ माह की अमावस्या तिथि को रखा जाता है। इस वर्ष व्रत की तिथि: व्रत: 16 मई 2026, शनिवार अमावस्या तिथि प्रारंभ: सुबह 05:12 बजे अमावस्या तिथि समाप्त: देर रात 01:31 बजे पूजा का शुभ मुहूर्त ज्योतिषाचार्य पंडित राकेश झा के अनुसार, वट वृक्ष की पूजा सुबह के समय करना विशेष फलदायी माना गया है। शुभ योग: सुबह 10:26 बजे तक सौभाग्य योग रहेगा इस दौरान पूजा और व्रत संबंधी धार्मिक कार्य करना अत्यंत शुभ माना जा रहा है। वट सावित्री व्रत का धार्मिक महत्व धार्मिक मान्यताओं के अनुसार: वट वृक्ष में Brahma, Vishnu और Shiva का वास माना जाता है। इसे “अक्षय वट” भी कहा जाता है। वट वृक्ष की पूजा करने से वैवाहिक जीवन में सुख-शांति बनी रहती है। इस दिन महिलाएं: व्रत रखती हैं वट वृक्ष की पूजा करती हैं सावित्री-सत्यवान की कथा सुनती हैं पति की लंबी आयु की कामना करती हैं वट सावित्री व्रत पूजा विधि Vat Savitri Vrat के दिन: सुबह जल्दी उठकर स्नान करें स्वच्छ वस्त्र धारण करें वट वृक्ष के पास जाकर जल अर्पित करें रोली, अक्षत, फूल और मिठाई चढ़ाएं पेड़ के चारों ओर कच्चा सूत लपेटें सावित्री-सत्यवान कथा का पाठ करें पति की लंबी आयु की प्रार्थना करें दान का भी है विशेष महत्व धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन: भोजन वस्त्र फल जरूरत की वस्तुएं दान करने से पुण्य फल की प्राप्ति होती है और परिवार में सुख-समृद्धि आती है।  

surbhi मई 15, 2026 0
Devotees puja Lord Hanuman with flowers and sindoor on Telugu Hanuman Jayanti festival
कब है तेलुगु हनुमान जयंती 2026? जानें तिथि, मुहूर्त और पूजा विधि

हनुमान जयंती भारत के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग तिथियों पर मनाई जाती है। जहां उत्तर भारत में यह पर्व चैत्र पूर्णिमा को मनाया जाता है, वहीं आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में तेलुगु हनुमान जयंती ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की दशमी तिथि को मनाई जाती है। साल 2026 में यह पर्व 12 मई (मंगलवार) को मनाया जाएगा। तिथि और मुहूर्त दशमी तिथि प्रारंभ: 11 मई 2026, दोपहर 3:24 बजे दशमी तिथि समाप्त: 12 मई 2026, दोपहर 2:52 बजे तेलुगु परंपरा के अनुसार, इस दिन व्रत, पूजा और विशेष अनुष्ठान किए जाते हैं। 41 दिनों की दीक्षा परंपरा आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में यह पर्व सिर्फ एक दिन का नहीं होता, बल्कि 41 दिनों की दीक्षा के रूप में मनाया जाता है। इस दीक्षा की शुरुआत: 2 अप्रैल 2026 समापन: 12 मई 2026 (हनुमान जयंती) भक्त इस अवधि में संयम, व्रत और विशेष पूजा का पालन करते हैं। दक्षिण भारत में हनुमान जी का महत्व हनुमान जी को भक्ति, शक्ति और संकटमोचन के रूप में पूजा जाता है। रामायण के अनुसार, कर्नाटक के अंजनाद्रि पर्वत को उनका जन्मस्थान माना जाता है। दक्षिण भारत में हनुमान जी को अलग-अलग नामों से जाना जाता है: कर्नाटक: हनुमंथा, आंजनेय आंध्र-तेलंगाना: हनुमंतुडु, आंजनेयुडु तमिलनाडु: आंजनेयार पूजा विधि (सरल तरीके से) सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और व्रत का संकल्प लें पूजा स्थान को साफ कर दीपक जलाएं हनुमान जी को सिंदूर, चोला, फूल, फल, पान, गुड़-चना अर्पित करें हनुमान चालीसा और सुंदरकांड का पाठ करें अंत में आरती कर प्रसाद बांटें विशेष महत्व तेलुगु हनुमान जयंती पर की गई पूजा से साहस, शक्ति और संकटों से मुक्ति की प्राप्ति मानी जाती है। अगर आप दक्षिण भारतीय परंपरा के अनुसार हनुमान जयंती मनाना चाहते हैं, तो 12 मई 2026 का दिन बेहद खास है। सही विधि और श्रद्धा से की गई पूजा जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और सफलता लाती है।  

surbhi मई 6, 2026 0
Goddess Baglamukhi holding demon’s tongue symbolizing power over speech and negativity in Hindu mythology
मां बगलामुखी शत्रु की जीभ क्यों खींचती हैं? जानें रहस्य और आध्यात्मिक अर्थ

  बगलामुखी जयंती 2026: क्या है खास Baglamukhi Jayanti इस वर्ष 24 अप्रैल को मनाई जाएगी। यह पर्व वैशाख शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को आता है। मां बगलामुखी, दस महाविद्याओं में आठवीं शक्ति मानी जाती हैं और उन्हें ‘पीतांबरा’ के नाम से भी जाना जाता है। उनका स्वरूप बेहद अनोखा है–एक हाथ से वे शत्रु की जीभ पकड़ती हैं और दूसरे हाथ में गदा धारण करती हैं। पौराणिक कथा: जब दुनिया पर आया संकट पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, सतयुग में एक भयंकर तूफान ने पूरे ब्रह्मांड को विनाश के कगार पर ला खड़ा किया। देवता भी इस संकट को रोकने में असमर्थ थे। तब Vishnu ने समाधान के लिए तपस्या की। इसी दौरान मदन नाम का एक असुर था, जिसे ‘वाक्-सिद्धि’ का वरदान मिला हुआ था। उसकी वाणी इतनी प्रभावशाली थी कि जो भी वह बोलता, वह सच हो जाता। धीरे-धीरे उसने इस शक्ति का दुरुपयोग करना शुरू कर दिया और अपने शब्दों से विनाश फैलाने लगा। मां बगलामुखी का प्राकट्य भगवान विष्णु की तपस्या से प्रसन्न होकर हरिद्रा सरोवर से दिव्य शक्ति प्रकट हुई–वह थीं Baglamukhi। उनका स्वरूप पीले रंग से आभामय था, इसलिए उन्हें ‘पीतांबरा’ कहा जाता है। जीभ खींचने के पीछे का रहस्य जब मां बगलामुखी का सामना मदन असुर से हुआ, तो वह अपने अहंकार में अपशब्द और विनाशकारी मंत्र बोलने लगा। तभी मां ने अपनी ‘स्तंभन शक्ति’ का उपयोग किया और उसकी जीभ पकड़कर बाहर खींच ली। जैसे ही उसकी जीभ थमी, उसकी वाणी की शक्ति समाप्त हो गई। इस तरह उसकी सबसे बड़ी ताकत निष्क्रिय हो गई और उसका अंत संभव हो सका। क्या है इसका आध्यात्मिक संदेश? मां बगलामुखी द्वारा जीभ खींचने का अर्थ केवल शत्रु को हराना नहीं है, बल्कि यह एक गहरा आध्यात्मिक संकेत भी देता है– वाणी पर नियंत्रण: जीभ हमारे शब्दों और विचारों का प्रतीक है। झूठ और छल का अंत: मां शत्रु की नकारात्मक वाणी को रोकती हैं। आंतरिक शुद्धि: यह अहंकार, क्रोध और नकारात्मक भावनाओं पर नियंत्रण का संदेश देता है। स्तंभन शक्ति: जीवन में बुरी शक्तियों को रोकने और संतुलन बनाए रखने का प्रतीक।   मां बगलामुखी का यह स्वरूप केवल भयावह नहीं, बल्कि अत्यंत गूढ़ और अर्थपूर्ण है। यह हमें सिखाता है कि सही समय पर वाणी और विचारों को नियंत्रित करना ही सबसे बड़ी शक्ति है। उनकी पूजा से न सिर्फ बाहरी शत्रुओं पर विजय मिलती है, बल्कि व्यक्ति अपने अंदर के नकारात्मक भावों पर भी काबू पा सकता है।  

surbhi अप्रैल 23, 2026 0
Devotees पूजा Lord Narasimha with lamps and flowers during Narasimha Jayanti ritual
नरसिंह चतुर्दशी 2026: कब है व्रत, जानें शुभ मुहूर्त और पूरी पूजा विधि

  कब है नरसिंह चतुर्दशी? नरसिंह चतुर्दशी, जिसे नरसिंह जयंती भी कहा जाता है, इस साल 30 अप्रैल 2026 (गुरुवार) को मनाई जाएगी। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इसी दिन भगवान विष्णु ने अपने चौथे अवतार भगवान नरसिंह के रूप में प्रकट होकर भक्त प्रह्लाद की रक्षा की थी। हिंदू पंचांग के मुताबिक: चतुर्दशी तिथि शुरू: 29 अप्रैल 2026, शाम 07:51 बजे चतुर्दशी तिथि समाप्त: 30 अप्रैल 2026, रात 09:12 बजे व्रत और पूजा: 30 अप्रैल (उदया तिथि के आधार पर) पूजा का शुभ मुहूर्त नरसिंह भगवान का प्राकट्य संध्या काल में हुआ था, इसलिए इस दिन शाम के समय पूजा करना सबसे शुभ माना जाता है। शुभ मुहूर्त: शाम 04:17 बजे से 06:56 बजे तक यह समय भगवान की आराधना और व्रत पूजन के लिए सर्वोत्तम माना गया है। कैसे करें पूजा? जानें आसान विधि नरसिंह चतुर्दशी के दिन विधि-विधान से पूजा करने से विशेष फल मिलता है। पूजा की प्रक्रिया इस प्रकार है: सुबह स्नान कर साफ और संभव हो तो पीले वस्त्र पहनें हाथ में जल और अक्षत लेकर व्रत का संकल्प लें भगवान नरसिंह और माता लक्ष्मी की प्रतिमा स्थापित करें पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद) से अभिषेक करें चंदन, पीले फूल, धूप और दीप अर्पित करें भगवान को केसरयुक्त दूध, फल और मिठाई का भोग लगाएं नरसिंह मंत्रों का जाप करें और प्रह्लाद कथा का पाठ करें अंत में कपूर से आरती कर पूजा पूर्ण करें धार्मिक महत्व और मान्यता मान्यता है कि इस दिन सच्चे मन से व्रत और पूजा करने से भय, बाधाएं और कष्ट दूर होते हैं। भगवान नरसिंह अपने भक्तों की रक्षा करते हैं और जीवन में सुख-समृद्धि प्रदान करते हैं। यह पर्व बुराई पर अच्छाई की जीत और भक्ति की शक्ति का प्रतीक माना जाता है।  

surbhi अप्रैल 22, 2026 0
Devotees performing Skanda Shashti puja with offerings and Lord Kartikeya idol on auspicious day
स्कंद षष्ठी 2026: 22 अप्रैल को मनाया जाएगा व्रत, जानें शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और महत्व

नई दिल्ली: हिंदू धर्म में भगवान कार्तिकेय (स्कंद) को समर्पित स्कंद षष्ठी का विशेष महत्व है। यह पर्व हर महीने शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाता है, लेकिन वैशाख मास की स्कंद षष्ठी का महत्व अधिक माना जाता है। साल 2026 में यह पर्व 22 अप्रैल, बुधवार को मनाया जाएगा। तिथि और शुभ मुहूर्त पंचांग के अनुसार: षष्ठी तिथि प्रारंभ: 22 अप्रैल 2026, सुबह 01:21 बजे षष्ठी तिथि समाप्त: 22 अप्रैल 2026, रात 10:47 बजे उदयातिथि के आधार पर व्रत और पूजा: 22 अप्रैल को ही पूजा विधि स्कंद षष्ठी के दिन भगवान कार्तिकेय की पूजा इस प्रकार करें: सुबह स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें और व्रत का संकल्प लें पूजा स्थान पर भगवान कार्तिकेय की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें साथ में भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करना भी शुभ माना जाता है जल, दूध और पंचामृत से अभिषेक करें चंदन, अक्षत, लाल फूल और धूप-दीप अर्पित करें मोर पंख चढ़ाना विशेष फलदायी माना जाता है ‘स्कंद षष्ठी कवच’ का पाठ करें और मंत्र जाप करें अंत में आरती कर प्रसाद वितरित करें स्कंद षष्ठी का महत्व पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इसी दिन भगवान कार्तिकेय ने तारकासुर नामक असुर का वध किया था। इसलिए यह पर्व बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि इस व्रत को रखने से: जीवन के कष्ट दूर होते हैं शत्रुओं पर विजय मिलती है आत्मविश्वास और साहस बढ़ता है संतान प्राप्ति की इच्छा पूरी होती है ज्योतिष के अनुसार, जिन लोगों की कुंडली में मंगल दोष होता है, उनके लिए यह व्रत विशेष रूप से लाभकारी माना जाता है।  

surbhi अप्रैल 21, 2026 0
Maa Baglamukhi puja with flowers and offerings
बगलामुखी जयंती 2026: कब है, जानें तिथि, मुहूर्त, पूजा विधि और महत्व

नई दिल्ली: हिंदू धर्म में Baglamukhi जयंती का विशेष महत्व है। दस महाविद्याओं में आठवीं महाविद्या मां बगलामुखी की जयंती इस साल 24 अप्रैल 2026 (शुक्रवार) को मनाई जाएगी। इस दिन श्रद्धालु व्रत रखकर माता की विधि-विधान से पूजा करते हैं। तिथि और शुभ मुहूर्त पंचांग के अनुसार: अष्टमी तिथि प्रारंभ: 23 अप्रैल 2026, रात 08:49 बजे अष्टमी तिथि समाप्त: 24 अप्रैल 2026, शाम 07:21 बजे उदयातिथि के अनुसार जयंती: 24 अप्रैल शुभ मुहूर्त: ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 04:19 से 05:03 तक अभिजीत मुहूर्त: सुबह 11:53 से दोपहर 12:46 तक पूजा विधि सुबह स्नान कर स्वच्छ (संभव हो तो पीले) वस्त्र धारण करें व्रत का संकल्प लें चौकी पर पीला कपड़ा बिछाकर मां बगलामुखी की तस्वीर/यंत्र स्थापित करें पीले फूल, हल्दी, चंदन, अक्षत और पीले फल अर्पित करें बेसन के लड्डू, केसरिया हलवा या पीले चावल का भोग लगाएं हल्दी की माला से बीज मंत्र का जाप करें मंत्र: “ॐ ह्लीं बगलामुखी सर्वदुष्टानां वाचं मुखं पदं स्तंभय, जिह्वाम् कीलय, बुद्धिं विनाशय ह्लीं ॐ स्वाहा।” अंत में माता की आरती करें धार्मिक महत्व मां बगलामुखी को ‘पीताम्बरा’ भी कहा जाता है, क्योंकि उन्हें पीला रंग अत्यंत प्रिय है। मान्यता है कि उनकी पूजा से: शत्रुओं पर विजय मिलती है वाणी और बुद्धि पर नियंत्रण आता है नकारात्मक ऊर्जा और बाधाएं दूर होती हैं प्रमुख सिद्धपीठ इस अवसर पर देश के प्रसिद्ध मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना होती है, जैसे: Nalkheda Baglamukhi Temple Pitambara Peeth Bankhandi Baglamukhi Temple इन स्थानों पर भक्त बड़ी संख्या में दर्शन और अनुष्ठान के लिए पहुंचते हैं।  

surbhi अप्रैल 21, 2026 0
Goddess Matangi devotional illustration with flowers, lamps and spiritual worship setup on Matangi Jayanti
मातंगी जयंती आज: जानें क्या करें और किन गलतियों से बचें, तभी मिलेगी माता की कृपा

आज पूरे देश में Matangi Jayanti श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाई जा रही है। वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को आने वाली यह जयंती मां Matangi को समर्पित होती है, जो दस महाविद्याओं में नौवीं स्वरूप मानी जाती हैं। उन्हें ज्ञान, कला, संगीत और वाणी की अधिष्ठात्री देवी माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन विधिपूर्वक पूजा और व्रत करने से भय दूर होता है, वाणी में मधुरता आती है और जीवन में सुख-समृद्धि का वास होता है। हालांकि, माता मातंगी की पूजा के नियम अन्य देवियों की तुलना में थोड़े विशेष माने जाते हैं, इसलिए कुछ बातों का खास ध्यान रखना जरूरी होता है। क्या न करें? मातंगी जयंती के दिन कुछ कार्यों से बचना बेहद जरूरी माना गया है: गंदगी न रखें: घर में साफ-सफाई का विशेष ध्यान रखें, क्योंकि माता को स्वच्छता प्रिय है। कला का अपमान न करें: किसी भी कलाकार, वाद्य यंत्र या किताब का अपमान करना अशुभ माना जाता है। वाणी पर नियंत्रण रखें: झूठ बोलना, अपशब्द कहना या विवाद करना माता को नाराज कर सकता है। तामसिक भोजन से दूरी: मांस, मदिरा, लहसुन-प्याज जैसे भोजन का सेवन न करें। अशुद्ध अवस्था में पूजा न करें: बिना स्नान किए या अशुद्ध मन से पूजा करने से फल नहीं मिलता। क्या करें? इस दिन कुछ विशेष कार्य करने से माता की कृपा प्राप्त होती है: नीम के पत्ते अर्पित करें: पूजा में नीम का विशेष महत्व है। संगीत और कला साधना करें: गायक या कलाकार अपने वाद्य यंत्रों का पूजन करें। दान-पुण्य करें: जरूरतमंदों को वस्त्र या सुहाग सामग्री दान करना शुभ होता है। मंत्र जाप करें: माता के बीज मंत्र का शांत मन से जाप करें। सात्विक भोजन करें: दिनभर सात्विक आहार का पालन करें। धार्मिक महत्व Matangi को ‘उच्छिष्ट चांडालिनी’ भी कहा जाता है, जिनकी साधना से व्यक्ति को वाणी सिद्धि, आत्मविश्वास और मानसिक स्पष्टता प्राप्त होती है। यह दिन विशेष रूप से कलाकारों, गायकों और विद्यार्थियों के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।  

surbhi अप्रैल 20, 2026 0
Tarpan rituals on Vaishakh Amavasya with traditional Hindu offerings and copper vessel
Vaishakh Amavasya 2026: तर्पण करते समय भूलकर भी न करें ये गलतियां, पितरों की कृपा पाने के लिए जानें जरूरी नियम

हिंदू धर्म में अमावस्या का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है, खासकर पितरों की शांति और मोक्ष के लिए। वर्ष 2026 में वैशाख अमावस्या आज यानी 17 अप्रैल, शुक्रवार को मनाई जा रही है। इस दिन तर्पण, पिंडदान और श्राद्ध कर्म करने से पितृ दोष से मुक्ति मिलती है और घर में सुख-समृद्धि का वास होता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, अमावस्या के दिन किए गए पितृ कर्म सीधे पितरों तक पहुंचते हैं। लेकिन कई बार लोग अनजाने में ऐसी गलतियां कर बैठते हैं, जिससे तर्पण का पूरा फल नहीं मिल पाता। ऐसे में जरूरी है कि तर्पण करते समय कुछ खास सावधानियों का पालन किया जाए। तर्पण करते समय इन बातों का रखें ध्यान 1. सही दिशा का चुनाव करें तर्पण करते समय हमेशा दक्षिण दिशा की ओर मुख करके बैठें। शास्त्रों में दक्षिण दिशा को पितरों की दिशा माना गया है। अन्य दिशा में किया गया तर्पण निष्फल हो सकता है। 2. काले तिल का प्रयोग जरूरी तर्पण के जल में काले तिल डालना अनिवार्य माना गया है। बिना तिल के किया गया तर्पण पितरों तक नहीं पहुंचता। ध्यान रखें कि केवल काले तिल का ही उपयोग करें। 3. तांबे के पात्र का उपयोग करें पितरों को जल अर्पित करने के लिए तांबे के बर्तन का प्रयोग श्रेष्ठ माना गया है। स्टील, प्लास्टिक या कांच के बर्तन से तर्पण करना शास्त्रों में उचित नहीं माना गया है। 4. शुभ समय का रखें ध्यान तर्पण का सबसे उपयुक्त समय दोपहर (मध्याह्न) का होता है। सुबह स्नान के बाद मध्याह्न में तर्पण करना शुभ माना जाता है, जबकि सूर्यास्त के बाद तर्पण वर्जित है। 5. संयमित व्यवहार अपनाएं अमावस्या के दिन क्रोध, विवाद और अपशब्दों से बचें। तर्पण करने वाले व्यक्ति को मांस, मदिरा, लहसुन और प्याज जैसे तामसिक भोजन से दूर रहना चाहिए। पितरों को प्रसन्न करने के लिए करें ये उपाय पीपल की पूजा करें अमावस्या के दिन पीपल के पेड़ पर जल चढ़ाएं और सरसों के तेल का दीपक जलाएं। मान्यता है कि पीपल में देवताओं और पितरों का वास होता है। पंचबलि भोग लगाएं भोजन बनाने के बाद गाय, कुत्ते, कौवे, चींटियों और देवताओं के लिए अन्न का अंश निकालना शुभ माना जाता है। दान का विशेष महत्व इस दिन तिल, गुड़, अनाज और वस्त्र का दान करने से पितर प्रसन्न होते हैं। इससे वंश वृद्धि, सुख-समृद्धि और आरोग्य का आशीर्वाद प्राप्त होता है। वैशाख अमावस्या का दिन पितरों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करने का विशेष अवसर होता है। इस दिन विधि-विधान से तर्पण और दान-पुण्य करने से जीवन में सकारात्मकता और शांति का संचार होता है। ऐसे में शास्त्रों में बताए गए नियमों का पालन कर आप पितरों की कृपा प्राप्त कर सकते हैं।  

surbhi अप्रैल 17, 2026 0
Lord Parshuram with flowers and lamp
परशुराम जयंती 2026: तिथि, शुभ मुहूर्त और पूजा विधि

हिंदू धर्म में भगवान परशुराम को भगवान विष्णु का छठा अवतार माना जाता है। वे धर्म की स्थापना और अधर्म के विनाश के प्रतीक हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, वे सप्त चिरंजीवियों में शामिल हैं, यानी आज भी जीवित माने जाते हैं। कब है परशुराम जयंती 2026? साल 2026 में परशुराम जयंती 19 अप्रैल, रविवार को मनाई जाएगी। इस दिन अक्षय तृतीया का पावन पर्व भी पड़ रहा है, जिससे इसका महत्व और बढ़ जाता है। तिथि और समय तृतीया तिथि प्रारंभ: 19 अप्रैल 2026, सुबह 10:49 बजे तृतीया तिथि समाप्त: 20 अप्रैल 2026, सुबह 07:27 बजे शुभ मुहूर्त प्रदोष काल (शाम का श्रेष्ठ समय): 06:49 PM से 08:12 PM मध्याह्न काल: पूरे दिन अक्षय तृतीया के कारण दान-पुण्य के लिए शुभ मान्यता है कि भगवान परशुराम का जन्म प्रदोष काल में हुआ था, इसलिए शाम का समय पूजा के लिए सबसे उत्तम माना जाता है। परशुराम जयंती का महत्व यह दिन शक्ति, साहस और धर्म के पालन का प्रतीक है। इस दिन विधि-विधान से पूजा करने पर: जीवन में सुख-समृद्धि आती है साहस और आत्मबल बढ़ता है पापों का नाश होता है दीर्घायु और आरोग्य का आशीर्वाद मिलता है अक्षय तृतीया के साथ होने के कारण इस दिन किया गया हर शुभ कार्य अक्षय फल देता है। कैसे करें पूजा? सुबह स्नान कर व्रत का संकल्प लें घर या मंदिर में भगवान परशुराम और विष्णु जी की प्रतिमा स्थापित करें पीले पुष्प, चंदन और मिठाई अर्पित करें शाम को घी का दीपक जलाकर मंत्र या चालीसा का पाठ करें अंत में आरती कर प्रसाद वितरित करें

surbhi अप्रैल 8, 2026 0
Masik Krishna Janmashtami with decorated idol and offerings.
मासिक कृष्ण जन्माष्टमी 2026: वैशाख माह में कब रखा जाएगा व्रत? जानें सही तिथि और शुभ मुहूर्त

हिंदू धर्म में प्रत्येक माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मासिक कृष्ण जन्माष्टमी का व्रत अत्यंत श्रद्धा के साथ रखा जाता है। यह दिन भगवान श्री कृष्ण की उपासना के लिए विशेष माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से पूजा करने पर जीवन में सुख-समृद्धि, मानसिक शांति और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है। कब है वैशाख मासिक कृष्ण जन्माष्टमी 2026? हिंदू पंचांग के अनुसार, वैशाख माह में कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि: आरंभ: 9 अप्रैल 2026, रात 9:19 बजे समापन: 10 अप्रैल 2026, सुबह 11:15 बजे निशिता काल (मध्यरात्रि पूजा) को ध्यान में रखते हुए यह व्रत 9 अप्रैल 2026, गुरुवार को रखा जाएगा। क्या है शुभ मुहूर्त? पूजा और व्रत के लिए प्रमुख शुभ समय इस प्रकार हैं: ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 4:38 बजे से 5:26 बजे तक अमृत काल: सुबह 6:07 बजे से 7:54 बजे तक अभिजीत मुहूर्त: दोपहर 12:03 बजे से 12:53 बजे तक इन मुहूर्तों में भगवान श्रीकृष्ण की पूजा करना अत्यंत फलदायी माना जाता है। व्रत और पूजा का महत्व धार्मिक मान्यताओं के अनुसार: भगवान श्रीकृष्ण की पूजा करने से सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है जीवन में मानसिक शांति और सकारात्मक ऊर्जा आती है संतान प्राप्ति की कामना रखने वालों के लिए यह व्रत विशेष लाभकारी माना जाता है पूजन के दौरान क्या करें? इस दिन भक्त: श्रीकृष्ण का अभिषेक करें माखन-मिश्री का भोग लगाएं “ॐ कृष्णाय नमः” और “हरे कृष्ण महामंत्र” का जाप करें आरती “आरती कुंजबिहारी की” का पाठ करें

surbhi अप्रैल 7, 2026 0
Lord Hanuman idol on Hanuman Jayanti with flowers
हनुमान जयंती 2026: ‘अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता’ क्यों कहलाते हैं हनुमान जी? जानें उनकी 8 सिद्धियां और 9 निधियां

देशभर में आज चैत्र पूर्णिमा के पावन अवसर पर हनुमान जयंती श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाई जा रही है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इसी दिन हनुमान जी का जन्म हुआ था। पवनपुत्र, रामभक्त और चिरंजीवी हनुमान जी को ‘अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता’ कहा जाता है, जिसका उल्लेख हनुमान चालीसा में भी मिलता है। भक्ति साहित्य के महान कवि गोस्वामी तुलसीदास ने लिखा- “अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता, अस वर दीन जानकी माता” मान्यता है कि माता सीता ने हनुमान जी को इन दिव्य शक्तियों और संपत्तियों का वरदान दिया था। क्या हैं हनुमान जी की 8 सिद्धियां? हनुमान जी के पास आठ अद्भुत दिव्य शक्तियां मानी जाती हैं, जिन्हें अष्ट सिद्धि कहा जाता है- अणिमा – स्वयं को अत्यंत सूक्ष्म बनाने की शक्ति महिमा – इच्छानुसार विशाल रूप धारण करने की शक्ति गरिमा – शरीर को अत्यधिक भारी बनाने की क्षमता लघिमा – शरीर को अत्यंत हल्का कर लेने की शक्ति प्राप्ति – किसी भी वस्तु को तुरंत प्राप्त कर लेने की शक्ति प्राकाम्य – कहीं भी जाने, आकाश में उड़ने या जल में रहने की क्षमता ईशित्व – दैवीय शक्तियों पर नियंत्रण रखने की क्षमता वशित्व – इंद्रियों और मन को वश में करने की शक्ति इन सिद्धियों के कारण हनुमान जी किसी भी रूप में प्रकट होकर असंभव कार्यों को संभव बना सकते हैं। क्या हैं 9 निधियां? नव निधियां दिव्य संपत्तियों का प्रतीक मानी जाती हैं, जो जीवन में समृद्धि और संतुलन का संकेत देती हैं- पद्म निधि – स्वर्ण-चांदी संग्रह और दान की प्रवृत्ति महापद्म निधि – धर्म कार्यों में धन का उपयोग नील निधि – कई पीढ़ियों तक चलने वाली संपत्ति मुकुंद निधि – राज्य और सत्ता से जुड़ी संपत्ति नंद निधि – परिवार और वंश को संभालने वाली संपत्ति मकर निधि – अस्त्र-शस्त्रों का संग्रह कच्छप निधि – स्वयं के उपयोग की संपत्ति शंख निधि – सीमित अवधि तक रहने वाली संपत्ति खर्व निधि – मिश्रित और विविध फल देने वाली संपत्ति भक्तों को क्या मिलता है हनुमान जी की कृपा से? धार्मिक मान्यता के अनुसार हनुमान चालीसा का नियमित पाठ करने से भक्तों को साहस, शक्ति और सफलता का आशीर्वाद मिलता है। हनुमान जी को ‘संकटमोचन’ कहा जाता है, क्योंकि उनकी कृपा से जीवन के कष्ट और बाधाएं दूर होती हैं।  

surbhi अप्रैल 2, 2026 0
Devotees offering prayers to Lord Vishnu during Vaishakh month with river bathing ritual at sunrise.
वैशाख मास 2026 कल से शुरू: क्यों है भगवान विष्णु को सबसे प्रिय यह पवित्र महीना?

हिंदू धर्म में हर महीने का अपना विशेष महत्व होता है, लेकिन वैशाख मास को अत्यंत पुण्यदायक और श्रेष्ठ माना गया है। 3 अप्रैल 2026 से वैशाख मास की शुरुआत हो रही है, जिसे धार्मिक ग्रंथों में मोक्ष प्रदान करने वाला और पापों का नाश करने वाला महीना बताया गया है। शास्त्रों, विशेषकर नारद पुराण और स्कंद पुराण में वैशाख मास की महिमा का विस्तार से वर्णन मिलता है। इन ग्रंथों के अनुसार, जिस प्रकार वेदों का स्थान सर्वोच्च है, उसी तरह सभी महीनों में वैशाख का स्थान श्रेष्ठ माना गया है। माधव मास: नाम में ही छिपी है महिमा वैशाख मास को ‘माधव मास’ भी कहा जाता है। ‘माधव’ भगवान विष्णु का एक प्रमुख नाम है। धार्मिक मान्यता है कि इस पूरे महीने में भगवान विष्णु जल में निवास करते हैं। यही कारण है कि इस दौरान सूर्योदय से पहले पवित्र नदियों में स्नान करना अत्यंत शुभ माना जाता है। मान्यता यह भी है कि जो व्यक्ति इस महीने में नियमपूर्वक भगवान विष्णु की पूजा करता है, उसे अश्वमेध यज्ञ के समान फल प्राप्त होता है। वैशाख में हुए भगवान विष्णु के प्रमुख अवतार इस पावन महीने में भगवान विष्णु के कई महत्वपूर्ण अवतार प्रकट हुए, जिससे इसका महत्व और बढ़ जाता है- परशुराम अवतार: वैशाख शुक्ल तृतीया (अक्षय तृतीया) को भगवान परशुराम का जन्म हुआ। नृसिंह अवतार: वैशाख चतुर्दशी को भक्त प्रह्लाद की रक्षा के लिए भगवान ने नृसिंह रूप धारण किया। कूर्म अवतार: समुद्र मंथन के दौरान भगवान ने कछुए का रूप लेकर मंदराचल पर्वत को सहारा दिया। इन दिव्य घटनाओं के कारण वैशाख मास को विष्णु भक्तों के लिए अत्यंत पावन और उत्सवमय माना जाता है। दान-पुण्य और सेवा का विशेष महत्व वैशाख मास केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि यह लोक कल्याण और सेवा का भी महीना है। गर्मी के इस समय में प्यासे लोगों को पानी पिलाना, प्याऊ लगवाना, पेड़ लगाना, सत्तू और पंखे का दान करना अत्यंत पुण्यदायक माना गया है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस महीने में किया गया दान सीधे भगवान विष्णु की सेवा के समान फल देता है। शास्त्रों का संदेश नारद पुराण में कहा गया है- “न वैशाख समो मासो, न सत्येन समं तपः” अर्थात् वैशाख के समान कोई महीना नहीं है और सत्य के समान कोई तप नहीं है।  

surbhi अप्रैल 2, 2026 0
Idol of Maa Kalaratri worshipped with lamps and flowers during Chaitra Navratri Day 7 ritual
चैत्र नवरात्रि 2026 Day 7: मां कालरात्रि की आराधना से मिटता है भय और नकारात्मकता, जानें पूजा विधि, मंत्र, भोग और महत्व

चैत्र नवरात्रि का सातवां दिन देवी शक्ति के उग्र और प्रभावशाली स्वरूप मां कालरात्रि की पूजा को समर्पित होता है। यह दिन विशेष रूप से भय, संकट और नकारात्मक ऊर्जा को समाप्त करने के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जो साधक सच्चे मन से मां कालरात्रि की आराधना करता है, उसके जीवन से भय और बाधाएं दूर होती हैं और साहस, शांति तथा सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। मां कालरात्रि का स्वरूप और आध्यात्मिक महत्व मां कालरात्रि का रूप अत्यंत तेजस्वी और अद्भुत माना जाता है। उनका वर्ण श्याम, केश खुले, गले में विद्युत समान चमकती माला और तीन नेत्र-यह स्वरूप भले ही उग्र दिखाई देता हो, लेकिन भक्तों के लिए वह सुरक्षा और कल्याण का प्रतीक हैं। इसी कारण उन्हें “शुभंकारी” भी कहा जाता है, जो अपने भक्तों को हर संकट से उबारती हैं और जीवन में नई ऊर्जा का संचार करती हैं। पूजा विधि: सरलता और श्रद्धा का विशेष महत्व नवरात्रि के सातवें दिन पूजा विधि को अत्यंत पवित्र और अनुशासित माना गया है: प्रातःकाल जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें पूजा स्थल को गंगाजल से शुद्ध करें मां कालरात्रि की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें रोली, कुमकुम, अक्षत, पुष्प, धूप और दीप अर्पित करें श्रद्धा और सादगी के साथ पूजा करें, दिखावे से बचें भोग और आरती का महत्व मां कालरात्रि को गुड़ और चना का भोग अर्पित करना अत्यंत शुभ माना जाता है। पूजा के बाद इसे प्रसाद के रूप में परिवार में बांटा जाता है। अंत में मां की आरती करना अनिवार्य माना गया है, जो पूजा को पूर्णता प्रदान करती है। मंत्र और शुभ रंग इस दिन मां कालरात्रि के बीज मंत्र का जाप विशेष फलदायी होता है: “ॐ ऐं ह्रीं क्लीं कालरात्र्यै नमः” नियमित मंत्र जाप से मन शांत होता है और नकारात्मक विचारों का नाश होता है। शुभ रंग के रूप में नीला रंग धारण करना उत्तम माना गया है, जो आत्मविश्वास और मानसिक संतुलन का प्रतीक है। पौराणिक कथा: बुराई पर अच्छाई की जीत पौराणिक कथा के अनुसार, जब दैत्य शुंभ-निशुंभ और रक्तबीज ने तीनों लोकों में आतंक फैलाया, तब देवी दुर्गा ने कालरात्रि का रूप धारण किया। रक्तबीज को यह वरदान था कि उसके रक्त की हर बूंद से नया राक्षस उत्पन्न होता था। मां कालरात्रि ने अद्भुत रणनीति से उसका वध किया और उसके रक्त को भूमि पर गिरने से पहले ही अपने मुख में समाहित कर लिया। इस प्रकार बुराई का अंत हुआ और देवताओं को मुक्ति मिली। यह कथा जीवन में साहस, धैर्य और बुद्धिमत्ता की शक्ति को दर्शाती है।  

surbhi मार्च 25, 2026 0
Young girls worshipped as Goddess Durga during Kanya Pujan ritual in Chaitra Navratri celebration
चैत्र नवरात्रि 2026: अष्टमी-नवमी पर कन्या पूजन का सही समय, विधि और उम्र के अनुसार मिलने वाले फल का पूरा विवरण

चैत्र नवरात्रि सनातन धर्म में शक्ति उपासना का सबसे महत्वपूर्ण पर्व माना जाता है। वर्ष 2026 में यह पावन पर्व 19 मार्च से शुरू होकर 27 मार्च तक मनाया जा रहा है। नौ दिनों तक मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की साधना के बाद अष्टमी और नवमी तिथि पर कन्या पूजन का विशेष महत्व होता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इन दिनों छोटी कन्याओं को देवी का स्वरूप मानकर पूजा जाता है और उनसे आशीर्वाद प्राप्त किया जाता है। कब करें कन्या पूजन? पंचांग के अनुसार, दुर्गाष्टमी (26 मार्च 2026): प्रातः 11:48 बजे तक कन्या पूजन करना शुभ रहेगा। महानवमी (26 मार्च 11:48 बजे से शुरू): यह तिथि 27 मार्च सुबह 10:06 बजे तक रहेगी। ऐसे में श्रद्धालु अपनी सुविधा अनुसार 26 या 27 मार्च को उदया तिथि के अनुसार कन्या पूजन कर सकते हैं। किस उम्र की कन्या का क्या महत्व? नवरात्रि में 2 से 10 वर्ष की कन्याओं को देवी के विभिन्न स्वरूप माना जाता है। प्रत्येक उम्र की कन्या की पूजा अलग-अलग फल प्रदान करती है: 2 वर्ष (कुमारी): दुख-दरिद्रता दूर, सुख-समृद्धि की प्राप्ति 3 वर्ष (त्रिमूर्ति): धन, सुख और समृद्धि का आशीर्वाद 4 वर्ष (कल्याणी): परिवार और कुल का कल्याण 5 वर्ष (रोहिणी): स्वास्थ्य और सौभाग्य 6 वर्ष (कालिका): बुद्धि, विद्या और विवेक 7 वर्ष (शाम्भवी): ऐश्वर्य और शक्ति 8 वर्ष (दुर्गा/शांभवी): विवाद और मुकदमों में सफलता 9 वर्ष (चंडिका/दुर्गा): शत्रुओं पर विजय और कार्य सिद्धि 10 वर्ष (सुभद्रा): सभी मनोकामनाओं की पूर्ति कैसे करें कन्या पूजन? कन्या पूजन की विधि सरल लेकिन अत्यंत श्रद्धापूर्ण होती है: अष्टमी या नवमी के दिन स्नान कर मां दुर्गा की पूजा करें। 9 कन्याओं और एक बालक (भैरव स्वरूप) को आमंत्रित करें। कन्याओं के चरण धोकर उनका तिलक करें और मौली बांधें। लाल चुनरी अर्पित करें और आसन पर बैठाएं। उन्हें पूरी, हलवा, चना, खीर आदि भोजन कराएं। अंत में उपहार, वस्त्र या दक्षिणा देकर आशीर्वाद लें। धार्मिक मान्यता है कि विधिपूर्वक किया गया कन्या पूजन जीवन में सुख, समृद्धि और सफलता का मार्ग प्रशस्त करता है।  

surbhi मार्च 25, 2026 0
Goddess Brahmacharini idol with diya, flowers and fruits during Navratri Day 2 worship rituals
नवरात्रि का दूसरा दिन: मां ब्रह्मचारिणी की पूजा से मिलेगा शांति और सौभाग्य का आशीर्वाद, जानें पूरी विधि, मंत्र और भोग

चैत्र नवरात्रि का दूसरा दिन पूरी श्रद्धा और आस्था के साथ मां ब्रह्मचारिणी को समर्पित होता है। 20 मार्च 2026 को जैसे ही इस पावन दिन की शुरुआत होती है, घर-घर में पूजा के साथ उम्मीद और सकारात्मक ऊर्जा का माहौल बन जाता है। मां ब्रह्मचारिणी को तप, संयम और साधना की देवी माना जाता है, जिनकी आराधना से जीवन में शांति, ज्ञान और स्थिरता आती है। ज्योतिषाचार्यों के अनुसार, यह दिन केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं बल्कि ग्रहों के संतुलन के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। खासतौर पर चंद्र और मंगल ग्रह से जुड़े दोषों को दूर करने में इस दिन की पूजा लाभकारी मानी जाती है। मां ब्रह्मचारिणी का महत्व और ज्योतिषीय संबंध मां ब्रह्मचारिणी नवदुर्गा का दूसरा स्वरूप हैं, जो कठोर तपस्या और आत्मसंयम का प्रतीक है। मान्यता है कि यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में चंद्र कमजोर हो या मानसिक अशांति बनी रहती हो, तो इस दिन सच्चे मन से पूजा करने से मन स्थिर होता है और निर्णय क्षमता मजबूत होती है। विद्यार्थियों और नौकरीपेशा लोगों के लिए यह दिन विशेष रूप से लाभकारी माना जाता है, क्योंकि इससे एकाग्रता और आत्मविश्वास में वृद्धि होती है। मां का दिव्य स्वरूप मां ब्रह्मचारिणी का स्वरूप अत्यंत सरल और शांत होता है। वे सफेद वस्त्र धारण करती हैं, एक हाथ में जपमाला और दूसरे में कमंडल रखती हैं। यह रूप तपस्या, ज्ञान और त्याग का प्रतीक है। ज्योतिष में सफेद रंग को चंद्र का प्रतीक माना गया है, इसलिए इस दिन सफेद या पीले वस्त्र पहनना शुभ माना जाता है। पूजा सामग्री सफेद या पीले फूल   घी का दीपक   चंदन, रोली, अक्षत   धूप-दीप   पान-सुपारी   फल (विशेषकर सेब, नाशपाती, पीले फल)   पूजा विधि प्रातः स्नान कर स्वच्छ पीले या सफेद वस्त्र धारण करें   पूजा स्थल को साफ कर मां की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें   दीपक जलाकर मां को फूल, फल और नैवेद्य अर्पित करें   शांत मन और पूर्ण श्रद्धा के साथ पूजा करें   जल्दबाजी से बचें, भाव और ध्यान सबसे महत्वपूर्ण होते हैं   मंत्र “ॐ ऐं ह्रीं क्लीं ब्रह्मचारिण्यै नमः” “दधाना कर पद्माभ्याम अक्षमाला कमण्डलू। देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा॥” ज्योतिष मान्यता है कि इन मंत्रों का 108 बार जाप करने से चंद्र और मंगल ग्रह संतुलित होते हैं, जिससे जीवन में स्थिरता और सकारात्मक ऊर्जा आती है। भोग और विशेष अर्पण मां ब्रह्मचारिणी को फल अत्यंत प्रिय हैं। सेब, नाशपाती और पीले फल चढ़ाना शुभ माना जाता है। साथ ही सफेद और पीले फूल अर्पित करने से सकारात्मक ऊर्जा में वृद्धि होती है।  

surbhi मार्च 20, 2026 0
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शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

Top week

Indian delegation at international cyber security meeting after India assumed CCDB chairmanship role
राष्ट्रीय

भारत को मिली बड़ी अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारी, संभाला CCDB के अध्यक्ष का पद

surbhi मई 15, 2026 0