बीजिंग: चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने भ्रष्टाचार और अनुशासनहीनता के खिलाफ जारी अभियान के तहत बड़ा कदम उठाते हुए नेशनल पीपल्स कांग्रेस (NPC) के 13 सदस्यों को उनके पदों से हटा दिया है। इनमें पीपल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) के छह वरिष्ठ सैन्य अधिकारी भी शामिल हैं। इस कार्रवाई को चीनी सेना में चल रहे व्यापक भ्रष्टाचार विरोधी अभियान का हिस्सा माना जा रहा है।
नेशनल पीपल्स कांग्रेस की ओर से जारी अधिसूचना में संबंधित अधिकारियों को पद से हटाने की पुष्टि की गई है। नोटिस में उनके खिलाफ कार्रवाई के विस्तृत कारणों का उल्लेख नहीं किया गया है।
विश्लेषकों का मानना है कि यह फैसला राष्ट्रपति शी जिनपिंग के लंबे समय से चल रहे भ्रष्टाचार विरोधी अभियान के तहत लिया गया है।
पद से हटाए गए छह वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों में शामिल हैं—
ये अधिकारी पीएलए के विभिन्न महत्वपूर्ण विभागों और कमांड में अहम जिम्मेदारियां संभाल चुके हैं, जिनमें थिएटर कमांड, साइबर स्पेस फोर्स और इक्विपमेंट डेवलपमेंट डिपार्टमेंट शामिल हैं।
रिपोर्टों के अनुसार, इन अधिकारियों की गतिविधियों को लेकर काफी समय से सवाल उठ रहे थे। कई अधिकारी लंबे समय से महत्वपूर्ण सार्वजनिक कार्यक्रमों और आधिकारिक आयोजनों से भी अनुपस्थित थे, जिसके बाद उनके खिलाफ कार्रवाई की अटकलें तेज हो गई थीं।
साल 2012 में सत्ता संभालने के बाद राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने चीन में व्यापक भ्रष्टाचार विरोधी अभियान शुरू किया था। इस अभियान के तहत अब तक हजारों सरकारी और सैन्य अधिकारियों के खिलाफ जांच और कार्रवाई की जा चुकी है।
पिछले कुछ वर्षों में विशेष रूप से पीएलए के शीर्ष नेतृत्व और रक्षा प्रतिष्ठान से जुड़े कई वरिष्ठ अधिकारियों को भी भ्रष्टाचार और अनुशासनहीनता के आरोपों में पद से हटाया गया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इन कार्रवाइयों का उद्देश्य केवल भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाना ही नहीं, बल्कि सेना पर केंद्रीय नेतृत्व का नियंत्रण और मजबूत करना भी है। शी जिनपिंग लगातार पीएलए को आधुनिक, अनुशासित और पार्टी के प्रति पूर्णतः जवाबदेह बनाने पर जोर देते रहे हैं।
चीन सरकार ने इस ताजा कार्रवाई के पीछे के विशिष्ट कारणों का सार्वजनिक रूप से खुलासा नहीं किया है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
तेहरान: ईरान की संसद के अध्यक्ष Mohammad Bagher Ghalibaf ने दावा किया है कि इजरायल किसी भी कीमत पर ईरान और अमेरिका के बीच हुए हालिया समझौते को सफल नहीं होने देना चाहता। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि अमेरिकी प्रशासन के भीतर भी इस समझौते को लेकर मतभेद मौजूद हैं। स्विट्जरलैंड की यात्रा से लौटने के बाद एक टीवी इंटरव्यू में गालिबाफ ने कहा कि तेहरान और वॉशिंगटन के बीच हुए 14 बिंदुओं वाले "इस्लामाबाद समझौते" को लागू करने की कोशिश की जा रही है, लेकिन इजरायल इसके रास्ते में बाधा डाल रहा है। 'इजरायल समझौते से घबराया हुआ है' ईरानी समाचार एजेंसी ISNA के अनुसार, गालिबाफ ने कहा कि यह समझौता लेबनान में युद्ध समाप्त करने, विस्थापित लोगों की वापसी सुनिश्चित करने और कब्जे वाले क्षेत्रों से सेना हटाने जैसे प्रावधानों पर आधारित है। उन्होंने आरोप लगाया कि इजरायल इस समझौते का विरोध इसलिए कर रहा है क्योंकि यह उसके और अमेरिका के लिए "हार का दस्तावेज" साबित होगा। गालिबाफ ने कहा कि समझौते पर सहमति बनने के बाद इजरायल ने लेबनान में अपनी सैन्य गतिविधियां तेज कर दीं, ताकि समझौते के क्रियान्वयन में बाधा उत्पन्न हो। लेबनान की संप्रभुता पर दिया जोर ईरानी संसद अध्यक्ष ने कहा कि समझौते के अनुसार लेबनान की सुरक्षा की जिम्मेदारी वहां की सरकार के पास होगी और देश की अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त सीमाओं का सम्मान किया जाएगा। उन्होंने कहा कि विस्थापित नागरिकों को अपने घर लौटने का अधिकार मिलना चाहिए और कब्जा किए गए इलाकों से सैन्य बलों की वापसी होनी चाहिए। 'अमेरिकी प्रशासन के भीतर भी मतभेद' गालिबाफ ने दावा किया कि समझौते को लेकर अमेरिकी प्रशासन के भीतर भी अलग-अलग राय है। उन्होंने अमेरिकी विदेश मंत्री Marco Rubio और उपराष्ट्रपति JD Vance का उल्लेख करते हुए कहा कि दोनों की प्राथमिकताएं अलग-अलग हैं। उनके अनुसार, हाल के दिनों में अमेरिकी अधिकारियों की कुछ गतिविधियां इस समझौते की भावना के अनुरूप नहीं थीं। दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं ईरान की ओर से किए गए इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। अमेरिका या इजरायल की ओर से भी इस संबंध में तत्काल कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। क्षेत्र में जारी तनाव के बीच अमेरिका, ईरान और इजरायल के बीच कूटनीतिक और सुरक्षा संबंधी घटनाक्रमों पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजर बनी हुई है।
यरुशलम: Benjamin Netanyahu ने ईरान को कड़ी चेतावनी देते हुए कहा है कि यदि आवश्यकता पड़ी तो इजरायल दोबारा सैन्य कार्रवाई करने से नहीं हिचकेगा। उनका यह बयान ऐसे समय आया है जब अमेरिका और ईरान के बीच परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय तनाव को लेकर कूटनीतिक बातचीत जारी है। तुर्की की सरकारी समाचार एजेंसी अनादोलु के अनुसार, एक इंटरव्यू में नेतन्याहू ने कहा कि इजरायल अपनी सुरक्षा के मामले में किसी अन्य देश पर निर्भर नहीं रहेगा और ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकने के लिए आवश्यक कदम उठाने को तैयार है। 'जरूरत पड़ी तो तीसरी बार भी करेंगे कार्रवाई' नेतन्याहू ने दावा किया कि ईरान के खिलाफ पहले की गई सैन्य कार्रवाइयों ने इजरायल को संभावित परमाणु खतरे से बचाया। उन्होंने कहा कि यदि इजरायल की सुरक्षा को फिर से खतरा महसूस हुआ, तो ईरान के खिलाफ एक और सैन्य अभियान शुरू किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि इजरायल अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में स्वतंत्र रूप से निर्णय लेगा और किसी भी संभावित खतरे का जवाब देने के लिए तैयार रहेगा। अमेरिका-ईरान वार्ता के बीच बढ़ा तनाव नेतन्याहू का बयान ऐसे समय आया है जब अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम करने और परमाणु मुद्दों पर सहमति बनाने के प्रयास जारी हैं। दोनों पक्ष संघर्षविराम को व्यापक राजनीतिक समझौते में बदलने की दिशा में बातचीत कर रहे हैं। इन वार्ताओं में क्षेत्रीय सुरक्षा, प्रतिबंधों में संभावित राहत और परमाणु कार्यक्रम से जुड़े मुद्दे प्रमुख एजेंडे में शामिल हैं। इजरायल ने दोहराया अपना रुख इजरायल पहले भी स्पष्ट कर चुका है कि वह ऐसे किसी भी समझौते से स्वयं को बाध्य नहीं मानेगा, जो उसकी दृष्टि में ईरान की सैन्य या परमाणु क्षमताओं को बढ़ावा देता हो। इजरायली नेतृत्व का कहना है कि देश की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है और आवश्यकता पड़ने पर वह एकतरफा कार्रवाई करने का अधिकार सुरक्षित रखता है। ट्रंप ने संयम बरतने की अपील की वहीं, Donald Trump ने सार्वजनिक रूप से सभी पक्षों से संयम बरतने की अपील की है। उन्होंने कहा है कि पश्चिम एशिया में दोबारा सैन्य तनाव बढ़ना किसी के हित में नहीं होगा और कूटनीतिक समाधान को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
पेरिस/लंदन: यूरोप इस समय भीषण गर्मी की चपेट में है। कई देशों में तापमान ने जून महीने के पुराने रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। असामान्य हीटवेव के चलते स्वास्थ्य सेवाओं पर दबाव बढ़ गया है, जबकि कई स्थानों पर स्कूल बंद करने और लोगों को घरों के भीतर रहने की सलाह दी गई है। सोशल मीडिया पर इस बीच ऐसे कई वीडियो वायरल हो रहे हैं, जिनमें लोग धूप में रखे तवे और पैन पर खाना पकाते दिखाई दे रहे हैं। इन वीडियो की स्वतंत्र और आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। इसलिए इनके दावों की सत्यता की पुष्टि नहीं की जा सकती। जून में ही टूटे गर्मी के रिकॉर्ड आमतौर पर यूरोप में सबसे अधिक गर्मी जुलाई के मध्य या महीने के अंत में पड़ती है, लेकिन इस बार जून के अंत में ही कई देशों में तापमान रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गया। रिपोर्टों के अनुसार: फ्रांस के पश्चिमी हिस्सों में तापमान 39 से 43 डिग्री सेल्सियस तक दर्ज किया गया। ब्रिटेन में जून का सबसे गर्म दिन रिकॉर्ड हुआ, जहां तापमान 36.1 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचा। स्पेन, जर्मनी, ऑस्ट्रिया, नीदरलैंड और स्विट्जरलैंड के कई हिस्सों में भी जून के पुराने तापमान रिकॉर्ड टूट गए। स्वास्थ्य सेवाओं पर बढ़ा दबाव भीषण गर्मी के कारण कई देशों में हीट स्ट्रोक और डिहाइड्रेशन के मामलों में बढ़ोतरी हुई है। अस्पतालों में मरीजों की संख्या बढ़ने से स्वास्थ्य सेवाओं पर अतिरिक्त दबाव देखा जा रहा है। विशेषज्ञों ने बुजुर्गों, बच्चों और पहले से बीमार लोगों को विशेष सावधानी बरतने की सलाह दी है। WHO ने जताई चिंता World Health Organization के महानिदेशक Tedros Adhanom Ghebreyesus ने कहा कि यूरोप दुनिया का सबसे तेजी से गर्म होने वाला महाद्वीप बन चुका है। उनके अनुसार: यूरोप में तापमान वैश्विक औसत की तुलना में लगभग दोगुनी गति से बढ़ रहा है। करीब 15 करोड़ लोग इस समय भीषण गर्मी से प्रभावित हैं। गर्मी के कारण सैकड़ों लोगों की मौत की खबरें सामने आई हैं। कई स्कूल बंद किए गए हैं और बिजली आपूर्ति पर भी भारी दबाव है। वायरल वीडियो पर क्या है सच्चाई? सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में दावा किया जा रहा है कि तेज धूप में तवे और पैन पर बिना गैस या चूल्हे के खाना पक रहा है। इन वीडियो की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है और यह स्पष्ट नहीं है कि इन्हें किन परिस्थितियों में रिकॉर्ड किया गया। इसलिए ऐसे दावों को सत्यापित तथ्य के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। जलवायु परिवर्तन पर फिर बढ़ी चिंता विशेषज्ञों का मानना है कि यूरोप में लगातार बढ़ती हीटवेव जलवायु परिवर्तन के गंभीर प्रभावों की ओर संकेत करती है। असामान्य तापमान, लंबे समय तक चलने वाली गर्मी और चरम मौसम की घटनाएं आने वाले वर्षों में और अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकती हैं।