शिक्षा

Charles Richter Story

भूकंप की भाषा दुनिया को समझाने वाले वैज्ञानिक: जानिए चार्ल्स रिक्टर की प्रेरणादायक कहानी

surbhi मई 11, 2026 0
Charles Richter portrait with earthquake wave graph and Richter Scale scientific illustration
Charles Richter And Richter Scale

कैसे एक खगोल वैज्ञानिक का सपना बना भूकंप विज्ञान की बड़ी खोज

दुनिया में जब भी कहीं भूकंप आता है, उसकी तीव्रता मापने के लिए सबसे पहले जिस नाम का जिक्र होता है, वह है “रिक्टर स्केल”। इस पैमाने को विकसित करने वाले महान वैज्ञानिक थे Charles Francis Richter। उन्होंने जर्मन वैज्ञानिक Beno Gutenberg के साथ मिलकर 1935 में इस तकनीक को विकसित किया, जिसने भूकंप विज्ञान की दिशा ही बदल दी।

आज पूरी दुनिया भूकंप की ताकत को समझने के लिए रिक्टर स्केल का इस्तेमाल करती है, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि चार्ल्स रिक्टर कभी खगोल वैज्ञानिक बनना चाहते थे।

बचपन से विज्ञान में थी गहरी रुचि

चार्ल्स फ्रांसिस रिक्टर का जन्म 26 अप्रैल 1900 को अमेरिका के ओहायो राज्य के ग्रामीण इलाके हैमिल्टन में हुआ था। बचपन में ही उनके माता-पिता अलग हो गए, जिसके बाद उनका परिवार कैलिफोर्निया चला गया।

विज्ञान और गणित में उनकी रुचि शुरू से ही काफी गहरी थी। उन्होंने Stanford University से भौतिकी में स्नातक की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद California Institute of Technology से सैद्धांतिक भौतिकी में पीएचडी हासिल की।

खगोल विज्ञान से सीस्मोलॉजी तक का सफर

रिक्टर का सपना अंतरिक्ष और तारों का अध्ययन करने का था, लेकिन किस्मत उन्हें भूकंप विज्ञान यानी सीस्मोलॉजी की दुनिया में ले आई।

कैल्टेक की सिस्मोलॉजिकल लैब में काम करते समय उन्होंने भूकंप की तरंगों और उनके पैटर्न का अध्ययन शुरू किया। उस दौर में भूकंप की तीव्रता को “मरकाली स्केल” से समझा जाता था, जिसमें लोगों द्वारा महसूस किए गए झटकों और नुकसान के आधार पर आंकलन किया जाता था।

रिक्टर को यह तरीका पूरी तरह वैज्ञानिक नहीं लगा। वे चाहते थे कि भूकंप को ऊर्जा के आधार पर मापा जाए, ठीक वैसे ही जैसे किसी वस्तु का वजन किया जाता है। यही सोच आगे चलकर रिक्टर स्केल की नींव बनी।

1935 में दुनिया को मिला रिक्टर स्केल

साल 1935 में चार्ल्स रिक्टर और बेनो गुटेनबर्ग ने मिलकर “रिक्टर स्केल” विकसित किया। इस स्केल ने पहली बार वैज्ञानिक तरीके से भूकंप की तीव्रता मापने का रास्ता तैयार किया।

इस खोज के बाद दुनियाभर में भूकंप मापने की प्रक्रिया अधिक सटीक और भरोसेमंद हो गई। रिक्टर स्केल ने वैज्ञानिकों को यह समझने में मदद की कि किसी भूकंप में कितनी ऊर्जा निकलती है और उसका प्रभाव कितना बड़ा हो सकता है।

आपदा प्रबंधन में भी दिया बड़ा योगदान

चार्ल्स रिक्टर सिर्फ वैज्ञानिक खोज तक सीमित नहीं रहे। उन्होंने भूकंप से बचाव के लिए मजबूत बिल्डिंग कोड और आपदा तैयारी पर भी जोर दिया।

उन्होंने “Seismicity of the Earth” और “Elementary Seismology” जैसी महत्वपूर्ण किताबें लिखीं, जो आज भी भूकंप विज्ञान के क्षेत्र में अहम मानी जाती हैं।

अपने ही नाम से दूरी बनाते थे रिक्टर

दिलचस्प बात यह है कि पूरी दुनिया जिस “रिक्टर स्केल” के नाम से उन्हें याद करती है, खुद चार्ल्स रिक्टर इस नाम से ज्यादा सहज नहीं थे। वे हमेशा अपने सहयोगी बेनो गुटेनबर्ग का जिक्र करते थे और कहते थे कि यह खोज केवल उनकी अकेली मेहनत का परिणाम नहीं थी।

विज्ञान की दुनिया में अमर हो गया नाम

चार्ल्स रिक्टर का निधन 30 सितंबर 1985 को हुआ, लेकिन उनकी खोज आज भी दुनिया को भूकंप की ताकत समझाने का सबसे बड़ा माध्यम बनी हुई है।

उनके सम्मान में Seismological Society of America ने युवा वैज्ञानिकों के लिए “Charles Richter Early Career Award” भी शुरू किया, ताकि नई पीढ़ी विज्ञान के क्षेत्र में आगे बढ़ सके।

 

Popular post
शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

शिक्षा

View more
Charles Richter portrait with earthquake wave graph and Richter Scale scientific illustration
भूकंप की भाषा दुनिया को समझाने वाले वैज्ञानिक: जानिए चार्ल्स रिक्टर की प्रेरणादायक कहानी

कैसे एक खगोल वैज्ञानिक का सपना बना भूकंप विज्ञान की बड़ी खोज दुनिया में जब भी कहीं भूकंप आता है, उसकी तीव्रता मापने के लिए सबसे पहले जिस नाम का जिक्र होता है, वह है “रिक्टर स्केल”। इस पैमाने को विकसित करने वाले महान वैज्ञानिक थे Charles Francis Richter। उन्होंने जर्मन वैज्ञानिक Beno Gutenberg के साथ मिलकर 1935 में इस तकनीक को विकसित किया, जिसने भूकंप विज्ञान की दिशा ही बदल दी। आज पूरी दुनिया भूकंप की ताकत को समझने के लिए रिक्टर स्केल का इस्तेमाल करती है, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि चार्ल्स रिक्टर कभी खगोल वैज्ञानिक बनना चाहते थे। बचपन से विज्ञान में थी गहरी रुचि चार्ल्स फ्रांसिस रिक्टर का जन्म 26 अप्रैल 1900 को अमेरिका के ओहायो राज्य के ग्रामीण इलाके हैमिल्टन में हुआ था। बचपन में ही उनके माता-पिता अलग हो गए, जिसके बाद उनका परिवार कैलिफोर्निया चला गया। विज्ञान और गणित में उनकी रुचि शुरू से ही काफी गहरी थी। उन्होंने Stanford University से भौतिकी में स्नातक की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद California Institute of Technology से सैद्धांतिक भौतिकी में पीएचडी हासिल की। खगोल विज्ञान से सीस्मोलॉजी तक का सफर रिक्टर का सपना अंतरिक्ष और तारों का अध्ययन करने का था, लेकिन किस्मत उन्हें भूकंप विज्ञान यानी सीस्मोलॉजी की दुनिया में ले आई। कैल्टेक की सिस्मोलॉजिकल लैब में काम करते समय उन्होंने भूकंप की तरंगों और उनके पैटर्न का अध्ययन शुरू किया। उस दौर में भूकंप की तीव्रता को “मरकाली स्केल” से समझा जाता था, जिसमें लोगों द्वारा महसूस किए गए झटकों और नुकसान के आधार पर आंकलन किया जाता था। रिक्टर को यह तरीका पूरी तरह वैज्ञानिक नहीं लगा। वे चाहते थे कि भूकंप को ऊर्जा के आधार पर मापा जाए, ठीक वैसे ही जैसे किसी वस्तु का वजन किया जाता है। यही सोच आगे चलकर रिक्टर स्केल की नींव बनी। 1935 में दुनिया को मिला रिक्टर स्केल साल 1935 में चार्ल्स रिक्टर और बेनो गुटेनबर्ग ने मिलकर “रिक्टर स्केल” विकसित किया। इस स्केल ने पहली बार वैज्ञानिक तरीके से भूकंप की तीव्रता मापने का रास्ता तैयार किया। इस खोज के बाद दुनियाभर में भूकंप मापने की प्रक्रिया अधिक सटीक और भरोसेमंद हो गई। रिक्टर स्केल ने वैज्ञानिकों को यह समझने में मदद की कि किसी भूकंप में कितनी ऊर्जा निकलती है और उसका प्रभाव कितना बड़ा हो सकता है। आपदा प्रबंधन में भी दिया बड़ा योगदान चार्ल्स रिक्टर सिर्फ वैज्ञानिक खोज तक सीमित नहीं रहे। उन्होंने भूकंप से बचाव के लिए मजबूत बिल्डिंग कोड और आपदा तैयारी पर भी जोर दिया। उन्होंने “Seismicity of the Earth” और “Elementary Seismology” जैसी महत्वपूर्ण किताबें लिखीं, जो आज भी भूकंप विज्ञान के क्षेत्र में अहम मानी जाती हैं। अपने ही नाम से दूरी बनाते थे रिक्टर दिलचस्प बात यह है कि पूरी दुनिया जिस “रिक्टर स्केल” के नाम से उन्हें याद करती है, खुद चार्ल्स रिक्टर इस नाम से ज्यादा सहज नहीं थे। वे हमेशा अपने सहयोगी बेनो गुटेनबर्ग का जिक्र करते थे और कहते थे कि यह खोज केवल उनकी अकेली मेहनत का परिणाम नहीं थी। विज्ञान की दुनिया में अमर हो गया नाम चार्ल्स रिक्टर का निधन 30 सितंबर 1985 को हुआ, लेकिन उनकी खोज आज भी दुनिया को भूकंप की ताकत समझाने का सबसे बड़ा माध्यम बनी हुई है। उनके सम्मान में Seismological Society of America ने युवा वैज्ञानिकों के लिए “Charles Richter Early Career Award” भी शुरू किया, ताकि नई पीढ़ी विज्ञान के क्षेत्र में आगे बढ़ सके।  

surbhi मई 11, 2026 0
UPSC CDS 1 Result 2026 notification displayed with shortlisted candidates for SSB interview round

Union Public Service Commission ने जारी किया CDS 1 परीक्षा का रिजल्ट, 8826 उम्मीदवार इंटरव्यू के लिए चयनित

West Bengal Madhyamik Result 2026 declared with Abhirup Bhadra securing top rank in board exams

WB Board 10th Result 2026 Out:86.83% छात्र पास, अभिरूप भद्रा बने टॉपर

CUET UG 2026 candidates checking updated NTA notice about exam city changes and revised rules

CUET UG 2026: NTA ने 24 घंटे में बदला फैसला, परीक्षा शहर बदलने पर नया नोटिस जारी

BPSC 72nd Combined Exam 2026 notification for Bihar DC DSP recruitment online application process starts
बिहार में DC, DSP बनने का मौका, BPSC 72वीं परीक्षा 2026 के लिए आवेदन शुरू, 1186 पदों पर होगी भर्ती

Bihar Public Service Commission ने सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहे युवाओं के लिए बड़ा अवसर दिया है। BPSC 72वीं संयुक्त प्रतियोगिता परीक्षा 2026 के तहत DC, DSP समेत कई प्रशासनिक पदों पर भर्ती निकाली गई है। आयोग ने भर्ती का आधिकारिक नोटिफिकेशन जारी कर दिया है और ऑनलाइन आवेदन प्रक्रिया 7 मई 2026 से शुरू हो चुकी है। इस भर्ती अभियान के जरिए कुल 1186 पदों पर नियुक्तियां की जाएंगी। इनमें 1033 पद विभिन्न प्रशासनिक सेवाओं के लिए हैं, जबकि 153 पद फाइनेंशियल एडमिनिस्ट्रेटिव ऑफिसर और अन्य विभागीय पदों के लिए निर्धारित किए गए हैं। ऐसे उम्मीदवार जो प्रशासनिक सेवाओं में करियर बनाना चाहते हैं, उनके लिए यह परीक्षा बेहद अहम मानी जा रही है। आवेदन की अंतिम तारीख ऑनलाइन आवेदन की आखिरी तारीख 31 मई 2026 तय की गई है। उम्मीदवारों को इसी तारीख तक परीक्षा शुल्क भी जमा करना होगा। प्रारंभिक परीक्षा की तारीख फिलहाल घोषित नहीं की गई है, लेकिन आयोग जल्द ही इसका शेड्यूल जारी कर सकता है। कौन कर सकता है आवेदन? इस भर्ती के लिए मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय से किसी भी विषय में ग्रेजुएशन पास उम्मीदवार आवेदन कर सकते हैं। अलग-अलग पदों के लिए पात्रता और आयु सीमा से जुड़ी विस्तृत जानकारी आधिकारिक नोटिफिकेशन में उपलब्ध है। ऐसे करें आवेदन सबसे पहले आधिकारिक वेबसाइट पर जाएं। होमपेज पर BPSC 72nd Exam 2026 लिंक पर क्लिक करें। न्यू रजिस्ट्रेशन करके बेसिक जानकारी भरें। लॉगिन कर आवेदन फॉर्म पूरा करें। जरूरी दस्तावेज अपलोड करें। आवेदन शुल्क जमा करें। फॉर्म सबमिट कर उसका प्रिंटआउट सुरक्षित रख लें। चयन प्रक्रिया भर्ती प्रक्रिया तीन चरणों में पूरी होगी– प्रारंभिक परीक्षा (Prelims) मुख्य परीक्षा (Mains) इंटरव्यू प्रीलिम्स परीक्षा केवल क्वालिफाइंग होगी, जबकि अंतिम मेरिट मेंस परीक्षा और इंटरव्यू के आधार पर तैयार की जाएगी। ऐसे में अभ्यर्थियों को अभी से रणनीतिक तैयारी शुरू करने की सलाह दी जा रही है। BPSC की इस बड़ी भर्ती से बिहार के हजारों युवाओं को प्रशासनिक सेवाओं में करियर बनाने का मौका मिलेगा। खासतौर पर DC और DSP जैसे प्रतिष्ठित पदों के लिए प्रतियोगिता काफी कड़ी रहने की उम्मीद है।  

surbhi मई 7, 2026 0
Students checking NEET counselling process on laptop with documents and college choice list

NEET काउंसलिंग का पूरा खेल समझिए: सही रणनीति से ही मिलेगी मनचाही सीट

Students checking BSE Odisha 10th Result 2026 online on official website and DigiLocker

BSE Odisha 10th Result 2026: आज शाम 4 बजे जारी होगा मैट्रिक रिजल्ट, ऐसे करें आसानी से चेक

IIM Ranchi campus celebrates entry into QS Executive MBA Rankings 2026 globally

IIM रांची का ग्लोबल मंच पर परचम: QS Executive MBA Ranking 2026 में पहली बार बनाई जगह

ugc net june 2026 application
29 अप्रैल से शुरू हुए UGC NET जून के आवेदन

 नई दिल्ली, एजेंसियां। नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) ने UGC NET जून 2026 परीक्षा के लिए ऑनलाइन आवेदन प्रक्रिया 29 अप्रैल 2026 से शुरू कर दी है। यह परीक्षा उन अभ्यर्थियों के लिए आयोजित की जाती है जो असिस्टेंट प्रोफेसर बनने या जूनियर रिसर्च फेलोशिप (JRF) प्राप्त करने की इच्छा रखते हैं। इच्छुक उम्मीदवार आधिकारिक वेबसाइट पर जाकर आवेदन कर सकते हैं। आवेदन की अंतिम तिथि 20 मई 2026 निर्धारित की गई है।   परीक्षा तिथियां और महत्वपूर्ण शेड्यूल UGC NET जून 2026 परीक्षा का आयोजन 22 जून से 30 जून 2026 के बीच किया जाएगा। इससे पहले उम्मीदवारों के लिए कई महत्वपूर्ण चरण पूरे किए जाएंगे। • आवेदन की अंतिम तिथि: 20 मई 2026  • फीस जमा करने की अंतिम तिथि: 20 मई 2026  • करेक्शन विंडो: 22 से 24 मई 2026  • एग्जाम सिटी स्लिप जारी: 10 जून 2026  • एडमिट कार्ड जारी: 15 जून 2026  • परीक्षा तिथि: 22 से 30 जून 2026  उम्मीदवारों को सलाह दी गई है कि वे सभी तारीखों का ध्यान रखते हुए समय पर अपनी तैयारी और आवेदन प्रक्रिया पूरी करें।   आवेदन शुल्क (Application Fee) इस परीक्षा के लिए आवेदन शुल्क श्रेणी के अनुसार अलग-अलग तय किया गया है। • सामान्य (General) वर्ग: ₹1150  • ईडब्ल्यूएस और ओबीसी (NCL): ₹600  • एससी, एसटी और दिव्यांग उम्मीदवार: ₹325  फीस का भुगतान केवल ऑनलाइन माध्यम से किया जा सकता है।   शैक्षणिक योग्यता और आयु सीमा UGC NET 2026 में आवेदन करने के लिए उम्मीदवार के पास किसी मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय से मास्टर डिग्री होना आवश्यक है। • सामान्य वर्ग के लिए न्यूनतम 55% अंक जरूरी हैं।  • आरक्षित वर्ग के लिए यह सीमा 50% है।  • चार वर्षीय स्नातक डिग्री धारक भी आवेदन कर सकते हैं, बशर्ते उनके पास कम से कम 75% अंक हों।  जूनियर रिसर्च फेलोशिप (JRF) के लिए अधिकतम आयु सीमा 30 वर्ष निर्धारित की गई है, जबकि आरक्षित वर्ग को सरकारी नियमों के अनुसार छूट प्रदान की जाती है।   आवेदन प्रक्रिया और परीक्षा पैटर्न आवेदन प्रक्रिया पूरी तरह ऑनलाइन है। उम्मीदवारों को पहले रजिस्ट्रेशन करना होगा, फिर व्यक्तिगत और शैक्षणिक जानकारी भरनी होगी। इसके बाद फीस जमा करके फॉर्म सबमिट करना होगा और कन्फर्मेशन पेज डाउनलोड करना जरूरी है।यह परीक्षा कंप्यूटर आधारित (CBT) मोड में आयोजित होगी और कुल 85 विषयों को कवर करेगी।

Anjali Kumari अप्रैल 30, 2026 0
Students checking CGBSE 10th 12th results online on laptop after result announcement

CGBSE CG Board Result 2026: आज जारी होंगे 10वीं-12वीं के नतीजे, ऐसे करें चेक

JTET exam update

भोजपुरी, मगही,अंगिका के छात्र नहीं दे सकेंगे JTET परीक्षा

Professional working on AI, coding on laptop with data graphs and futuristic interface

AI का दौर: इन 6 स्किल्स से बनाएं मजबूत करियर, लाखों से करोड़ों तक कमाई का मौका

0 Comments