Monsoon Fever Alert: बारिश के मौसम में होने वाला हर बुखार सामान्य वायरल नहीं होता। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि यह डेंगू, मलेरिया, टाइफाइड या अन्य संक्रमण का संकेत भी हो सकता है। सही समय पर जांच और इलाज गंभीर जटिलताओं से बचा सकता है।
मानसून के मौसम में तापमान में गिरावट और बढ़ी हुई नमी के कारण वायरस, बैक्टीरिया और मच्छरों से फैलने वाली बीमारियों का खतरा काफी बढ़ जाता है। ऐसे समय में तेज बुखार, बदन दर्द, कमजोरी और थकान जैसी समस्याएं आम हो जाती हैं। हालांकि, स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार हर बुखार को सामान्य वायरल फीवर मान लेना सुरक्षित नहीं है।
विशेषज्ञों का कहना है कि मानसून के दौरान कई लोग बिना जांच कराए खुद ही दवा लेना शुरू कर देते हैं, जिससे गंभीर बीमारियों की पहचान में देरी हो सकती है। यदि बुखार के साथ कुछ खास लक्षण दिखाई दें, तो यह डेंगू, मलेरिया, टाइफाइड या लेप्टोस्पायरोसिस जैसी बीमारियों का संकेत हो सकता है। ऐसे मामलों में समय पर जांच और सही इलाज बेहद जरूरी है।
सामान्य वायरल फीवर में 3 से 5 दिन तक हल्का बुखार, नाक बहना, गले में खराश और हल्की कमजोरी हो सकती है। लेकिन यदि बुखार लगातार बढ़ रहा हो या उसके साथ अन्य गंभीर लक्षण दिखाई दें, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए।
यदि निम्न में से कोई भी लक्षण दिखाई दें तो तुरंत डॉक्टर से जांच कराएं—
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
मुंबई, एजेंसियां। हड्डियों और जोड़ों में दर्द खेल-कूद, भारी व्यायाम या चोट के बाद होना सामान्य बात है। अधिकांश स्पोर्ट्स इंजरी आराम, बर्फ और उचित उपचार से कुछ हफ्तों में ठीक हो जाती हैं। लेकिन यदि दर्द लगातार बना रहे, समय के साथ बढ़े या रात में अधिक महसूस हो, तो यह किसी गंभीर समस्या का संकेत हो सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसे मामलों में बोन कैंसर जैसी दुर्लभ लेकिन गंभीर बीमारी की संभावना को भी ध्यान में रखते हुए डॉक्टर से जांच करानी चाहिए। मेडिकल ऑन्कोलॉजिस्ट के अनुसार मेडिकल ऑन्कोलॉजिस्ट के अनुसार, बोन कैंसर का सबसे सामान्य शुरुआती लक्षण लगातार बढ़ता हुआ हड्डियों का दर्द है। यदि दर्द आराम करने या दर्द निवारक दवाओं से भी कम न हो, प्रभावित हिस्से में सूजन या सख्त गांठ महसूस हो, या मामूली चोट से हड्डी टूट जाए, तो तुरंत चिकित्सकीय सलाह लेनी चाहिए। इसके अलावा, चलने-फिरने में कठिनाई, जोड़ों में अकड़न, सुन्नपन, झुनझुनी, बिना कारण वजन कम होना, अत्यधिक थकान, बार-बार बुखार और रात में अधिक पसीना आना भी चेतावनी के संकेत हो सकते हैं। विशेषज्ञों का कहना विशेषज्ञों का कहना है कि बच्चों और किशोरों में लंबे समय तक रहने वाले हड्डियों के दर्द को केवल ‘ग्रोइंग पेन’ या खेल की चोट मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। यदि दर्द कई सप्ताह तक बना रहे, रात में बढ़े या बिना किसी चोट के हो, तो जांच आवश्यक है। स्पोर्ट्स इंजरी का दर्द आमतौर पर किसी स्पष्ट चोट से जुड़ा होता है और समय के साथ कम हो जाता है, जबकि बोन ट्यूमर का दर्द धीरे-धीरे लगातार बढ़ता है और आराम से भी ठीक नहीं होता। डॉक्टर सलाह देते हैं डॉक्टर सलाह देते हैं कि यदि हड्डियों का दर्द कई सप्ताह तक बना रहे, बार-बार लौटे या सूजन के साथ हो, तो एक्स-रे, एमआरआई और आवश्यकता पड़ने पर बायोप्सी जैसी जांच करानी चाहिए। हालांकि, हड्डियों के दर्द के अधिकांश मामलों का कारण कैंसर नहीं होता, फिर भी समय पर जांच से गंभीर बीमारियों का जल्द पता लगाकर प्रभावी उपचार संभव हो सकता है।
नई दिल्ली: अगर घर का सामान्य खाना खाने के बाद भी आपको बार-बार गैस, पेट फूलना, भारीपन, एसिडिटी या खाना ठीक से न पचने जैसी समस्या होती है, तो इसे केवल पाचन संबंधी परेशानी समझकर नजरअंदाज न करें। विशेषज्ञों के अनुसार ये लक्षण प्राइमरी स्क्लेरोजिंग कोलांगाइटिस (Primary Sclerosing Cholangitis - PSC) जैसी गंभीर लिवर बीमारी का संकेत भी हो सकते हैं। यह एक दुर्लभ लेकिन धीरे-धीरे बढ़ने वाली बीमारी है, जिसमें लिवर के अंदर और बाहर मौजूद पित्त नलिकाओं (Bile Ducts) में सूजन और फाइब्रोसिस (स्कार टिश्यू) बनने लगता है। समय पर इलाज न मिलने पर यह लिवर सिरोसिस, लिवर फेलियर और बाइल डक्ट कैंसर जैसी गंभीर जटिलताओं का कारण बन सकती है। क्या है प्राइमरी स्क्लेरोजिंग कोलांगाइटिस (PSC)? विशेषज्ञों के अनुसार PSC एक क्रॉनिक कोलेस्टेटिक लिवर डिजीज है। इस बीमारी में पित्त नलिकाओं में लगातार सूजन बनी रहती है, जिससे वे धीरे-धीरे संकरी और कठोर होने लगती हैं। इस कारण पित्त (Bile) का सामान्य प्रवाह रुक जाता है। चूंकि पित्त वसा (Fat) को पचाने और शरीर से विषैले तत्व बाहर निकालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, इसलिए इसका प्रवाह बाधित होने पर लिवर को नुकसान पहुंचने लगता है। हालांकि इस बीमारी का सटीक कारण अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है, लेकिन इसे ऑटोइम्यून बीमारी माना जाता है। PSC होने पर शरीर में क्या होता है? जब पित्त का प्रवाह बाधित हो जाता है, तो— लिवर में सूजन बढ़ने लगती है। धीरे-धीरे फाइब्रोसिस और सिरोसिस का खतरा बढ़ जाता है। वसा के पाचन में परेशानी होती है। विटामिन A, D, E और K जैसे फैट-सॉल्युबल विटामिन का अवशोषण कम हो सकता है। शरीर में कमजोरी और पोषण की कमी होने लगती है। PSC के शुरुआती लक्षण शुरुआती चरण में कई लोगों में कोई स्पष्ट लक्षण दिखाई नहीं देते। कई बार इसका पता केवल ब्लड टेस्ट में लिवर एंजाइम बढ़ने से चलता है। समय के साथ ये लक्षण दिखाई दे सकते हैं— खाना ठीक से न पचना गैस और पेट में भारीपन लगातार थकान त्वचा में खुजली पेट के दाहिने ऊपरी हिस्से में दर्द भूख कम लगना बिना वजह वजन घटना आंखों और त्वचा का पीला पड़ना (पीलिया) संक्रमण होने पर बुखार या ठंड लगना यदि ये लक्षण लंबे समय तक बने रहें, तो गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट या हेपेटोलॉजिस्ट से जांच करानी चाहिए। किन लोगों में ज्यादा होता है खतरा? विशेषज्ञों के अनुसार निम्न परिस्थितियों में PSC का जोखिम बढ़ सकता है— परिवार में पहले किसी को यह बीमारी होना इंफ्लेमेटरी बाउल डिजीज (विशेषकर Ulcerative Colitis) 30 से 50 वर्ष की आयु पुरुषों में अपेक्षाकृत अधिक जोखिम कुछ आनुवंशिक (HLA) जीन परिवर्तन प्रतिरक्षा प्रणाली (Immune System) की असामान्य प्रतिक्रिया क्या इसका इलाज संभव है? फिलहाल PSC का ऐसा कोई इलाज उपलब्ध नहीं है जिससे बीमारी पूरी तरह समाप्त हो सके। उपचार का मुख्य उद्देश्य होता है— लक्षणों को नियंत्रित करना संक्रमण से बचाना लिवर को और अधिक नुकसान होने से रोकना जटिलताओं के जोखिम को कम करना गंभीर मामलों में लिवर ट्रांसप्लांट की आवश्यकता भी पड़ सकती है। कब डॉक्टर से संपर्क करें? यदि आपको लंबे समय से— खाना पचाने में परेशानी, लगातार गैस और पेट फूलना, त्वचा में खुजली, बार-बार थकान, पीलिया, या लिवर एंजाइम बढ़े होने की जानकारी मिले, तो बिना देरी किए विशेषज्ञ डॉक्टर से सलाह लें। समय पर जांच और उपचार से बीमारी की प्रगति को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।
लिवर को नुकसान केवल अल्कोहल से नहीं होता। जरूरत से ज्यादा पेनकिलर, प्रोसेस्ड फूड, ज्यादा चीनी, बिना सलाह के सप्लीमेंट्स और वायरल संक्रमण भी लिवर की सेहत पर गंभीर असर डाल सकते हैं। Liver Health Tips: जब भी लिवर को नुकसान पहुंचाने वाली चीजों की बात होती है, तो सबसे पहले शराब का नाम आता है। लेकिन स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, रोजमर्रा की कुछ सामान्य आदतें और खाद्य पदार्थ भी धीरे-धीरे लिवर को नुकसान पहुंचा सकते हैं। कई लोग अनजाने में ऐसी चीजों का नियमित सेवन करते हैं, जिससे समय के साथ फैटी लिवर, लिवर इंफ्लेमेशन और अन्य गंभीर समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है। 1. जरूरत से ज्यादा पेनकिलर का सेवन हल्के दर्द में बार-बार दर्द निवारक दवाएं लेना लिवर पर अतिरिक्त दबाव डाल सकता है। दवाओं का सेवन हमेशा डॉक्टर की सलाह के अनुसार ही करें। 2. ज्यादा चीनी और फ्रुक्टोज वाले फूड्स कोल्ड ड्रिंक, पैकेट वाले जूस, मिठाइयां और प्रोसेस्ड स्नैक्स में मौजूद अतिरिक्त शुगर लिवर में फैट जमा होने का कारण बन सकती है, जिससे नॉन-अल्कोहॉलिक फैटी लिवर डिजीज (NAFLD) का जोखिम बढ़ सकता है। 3. प्रोसेस्ड और जंक फूड बर्गर, पिज्जा, चिप्स और डीप-फ्राइड फूड्स में ट्रांस फैट और सैचुरेटेड फैट अधिक होता है। इनका नियमित सेवन लिवर में सूजन और फैट बढ़ाने में भूमिका निभा सकता है। 4. बिना सलाह के सप्लीमेंट्स लेना फिटनेस, बॉडीबिल्डिंग या वजन घटाने के नाम पर कई लोग बिना विशेषज्ञ की सलाह के सप्लीमेंट्स या स्टेरॉयड लेने लगते हैं। कुछ उत्पादों में मौजूद तत्व लिवर के लिए नुकसानदायक हो सकते हैं। 5. हेपेटाइटिस जैसी वायरल बीमारियों को नजरअंदाज करना हेपेटाइटिस B और C जैसे संक्रमण समय पर इलाज न मिलने पर लिवर को गंभीर नुकसान पहुंचा सकते हैं। इससे बचाव के लिए वैक्सीनेशन, सुरक्षित स्वास्थ्य आदतें और समय पर जांच जरूरी है। लिवर को स्वस्थ रखने के आसान उपाय संतुलित और पौष्टिक आहार लें। जंक फूड और शुगर का सेवन सीमित रखें। नियमित व्यायाम करें और स्वस्थ वजन बनाए रखें। डॉक्टर की सलाह के बिना दवाएं या सप्लीमेंट्स न लें। नियमित हेल्थ चेकअप कराएं। ध्यान दें: यह जानकारी केवल सामान्य स्वास्थ्य जागरूकता के लिए है। यदि आपको लगातार थकान, पीलिया, पेट में सूजन या अन्य लक्षण दिखाई दें, तो डॉक्टर से सलाह अवश्य लें।