नई दिल्ली, एजेंसियां। मेडिकल साइंस में लगातार प्रगति के बावजूद आज भी कई ऐसी आम बीमारियां हैं जिनका कोई स्थायी इलाज उपलब्ध नहीं है। डॉक्टर इन रोगों में केवल लक्षणों को नियंत्रित करने और मरीज की स्थिति को संभालने के लिए दवाएं देते हैं। इनमें कुछ बीमारियां मच्छरों से फैलती हैं तो कुछ दिमाग और इम्यून सिस्टम को प्रभावित करती हैं। हर साल लाखों लोग इन बीमारियों से प्रभावित होते हैं।
क्या आपको पता है कि अब तक डेंगू का कोई इलाज उपलब्ध नहीं है। डॉक्टर केवल इसके लक्षणों जैसे बुखार, दर्द और प्लेटलेट्स में गिरावट की समस्या को ठीक करने के लिए दवा देते हैं।डेंगू एक वायरल संक्रमण है, जो एडीज मच्छर के काटने से फैलता है। इस बीमारी में प्लेटलेट्स तेजी से कम होने लगते हैं, जिससे ब्लीडिंग का खतरा बढ़ जाता है। इसके इलाज में मुख्य रूप से खूब पानी पीते रहने, पैरासिटामोल और पौष्टिक चीजों के सेवन की सलाह दी जाती है।
डेंगू की ही तरह चिकनगुनिया का भी कोई निश्चित इलाज उपलब्ध नहीं है।चिकनगुनिया भी एक वायरल बीमारी है, जो मच्छरों के जरिए फैलती है। इसमें तेज बुखार के साथ जोड़ों में दर्द होता है। इसके इलाज में केवल दर्द निवारक दवाएं, आराम करने की सलाह दी जाती है। इससे बचाव को लिए कोई खास दवा या वैक्सीन अब तक नहीं है।
रेबीज एक बेहद खतरनाक वायरल बीमारी है, जो संक्रमित कुत्ते और कुछ अन्य जानवरों के काटने से फैलती है। खास बात यह है कि लक्षण दिखने के बाद इसको ठीक नहीं किया जा सकता है। ये 100% जानलेवा मानी जाती है।रेबीज के कारण शुरुआत में बुखार, सिरदर्द और कमजोरी होती है। लेकिन बाद में यह दिमाग को प्रभावित करती है, जिससे मरीज को पानी से डर लगने लगता है।
रेबीज का एकमात्र बचाव समय पर वैक्सीन लगवाना है। अगर काटने के तुरंत बाद टीका लग जाए, तो बीमारी को रोका जा सकता है।
अल्जाइमर एक न्यूरोलॉजिकल बीमारी है, जिसमें धीरे-धीरे याददाश्त और सोचने की क्षमता कमजोर हो जाती है।
यह 60 साल से अधिक उम्र वाले बुजुर्गों में ज्यादा देखी जाती है। इसका भी कोई स्थाई इलाज नहीं है।
अल्जाइमर रोग में दिमाग की कोशिकाएं धीरे-धीरे नष्ट होती जाती हैं।
इसमें केवल लक्षणों को धीमा करने में मदद करने वाली दवाएं दी जाती हैं। बीमारी को पूरी तरह ठीक नहीं किया जा सकता।
मल्टीपल स्क्लेरोसिस एक ऑटोइम्यून बीमारी है, जिसमें शरीर का इम्यून सिस्टम खुद ही नर्वस सिस्टम पर हमला करने लगता है। इससे दिमाग और रीढ़ की हड्डी प्रभावित होती है।इस बीमारी के कारण कमजोरी, संतुलन बिगड़ने, नजर की समस्या और थकान जैसे लक्षण दिखाई देते हैं।
कुछ दवाएं इसकी प्रगति को धीमा करने में मदद करती हैं, लेकिन इसे पूरी तरह खत्म नहीं किया जा सकता।
हालांकि मेडिकल साइंस ने कई असाध्य बीमारियों का इलाज संभव बना दिया है, लेकिन अभी भी कुछ रोग ऐसे हैं जिनका स्थायी इलाज नहीं मिल पाया है। विशेषज्ञों के अनुसार, इन बीमारियों से बचाव और शुरुआती पहचान ही सबसे प्रभावी तरीका है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। मेडिकल साइंस में लगातार प्रगति के बावजूद आज भी कई ऐसी आम बीमारियां हैं जिनका कोई स्थायी इलाज उपलब्ध नहीं है। डॉक्टर इन रोगों में केवल लक्षणों को नियंत्रित करने और मरीज की स्थिति को संभालने के लिए दवाएं देते हैं। इनमें कुछ बीमारियां मच्छरों से फैलती हैं तो कुछ दिमाग और इम्यून सिस्टम को प्रभावित करती हैं। हर साल लाखों लोग इन बीमारियों से प्रभावित होते हैं। डेंगू क्या आपको पता है कि अब तक डेंगू का कोई इलाज उपलब्ध नहीं है। डॉक्टर केवल इसके लक्षणों जैसे बुखार, दर्द और प्लेटलेट्स में गिरावट की समस्या को ठीक करने के लिए दवा देते हैं।डेंगू एक वायरल संक्रमण है, जो एडीज मच्छर के काटने से फैलता है। इस बीमारी में प्लेटलेट्स तेजी से कम होने लगते हैं, जिससे ब्लीडिंग का खतरा बढ़ जाता है। इसके इलाज में मुख्य रूप से खूब पानी पीते रहने, पैरासिटामोल और पौष्टिक चीजों के सेवन की सलाह दी जाती है। चिकनगुनिया का भी नहीं है उपचार डेंगू की ही तरह चिकनगुनिया का भी कोई निश्चित इलाज उपलब्ध नहीं है।चिकनगुनिया भी एक वायरल बीमारी है, जो मच्छरों के जरिए फैलती है। इसमें तेज बुखार के साथ जोड़ों में दर्द होता है। इसके इलाज में केवल दर्द निवारक दवाएं, आराम करने की सलाह दी जाती है। इससे बचाव को लिए कोई खास दवा या वैक्सीन अब तक नहीं है। रेबीज रेबीज एक बेहद खतरनाक वायरल बीमारी है, जो संक्रमित कुत्ते और कुछ अन्य जानवरों के काटने से फैलती है। खास बात यह है कि लक्षण दिखने के बाद इसको ठीक नहीं किया जा सकता है। ये 100% जानलेवा मानी जाती है।रेबीज के कारण शुरुआत में बुखार, सिरदर्द और कमजोरी होती है। लेकिन बाद में यह दिमाग को प्रभावित करती है, जिससे मरीज को पानी से डर लगने लगता है। रेबीज का एकमात्र बचाव समय पर वैक्सीन लगवाना है। अगर काटने के तुरंत बाद टीका लग जाए, तो बीमारी को रोका जा सकता है। अल्जाइमर अल्जाइमर एक न्यूरोलॉजिकल बीमारी है, जिसमें धीरे-धीरे याददाश्त और सोचने की क्षमता कमजोर हो जाती है। यह 60 साल से अधिक उम्र वाले बुजुर्गों में ज्यादा देखी जाती है। इसका भी कोई स्थाई इलाज नहीं है। अल्जाइमर रोग में दिमाग की कोशिकाएं धीरे-धीरे नष्ट होती जाती हैं। इसमें केवल लक्षणों को धीमा करने में मदद करने वाली दवाएं दी जाती हैं। बीमारी को पूरी तरह ठीक नहीं किया जा सकता। मल्टीपल स्क्लेरोसिस की समस्या मल्टीपल स्क्लेरोसिस एक ऑटोइम्यून बीमारी है, जिसमें शरीर का इम्यून सिस्टम खुद ही नर्वस सिस्टम पर हमला करने लगता है। इससे दिमाग और रीढ़ की हड्डी प्रभावित होती है।इस बीमारी के कारण कमजोरी, संतुलन बिगड़ने, नजर की समस्या और थकान जैसे लक्षण दिखाई देते हैं। कुछ दवाएं इसकी प्रगति को धीमा करने में मदद करती हैं, लेकिन इसे पूरी तरह खत्म नहीं किया जा सकता। हालांकि मेडिकल साइंस ने कई असाध्य बीमारियों का इलाज संभव बना दिया है, लेकिन अभी भी कुछ रोग ऐसे हैं जिनका स्थायी इलाज नहीं मिल पाया है। विशेषज्ञों के अनुसार, इन बीमारियों से बचाव और शुरुआती पहचान ही सबसे प्रभावी तरीका है।
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में “परफेक्ट हेल्थ” पाने की चाहत लोगों को तेजी से सप्लीमेंट्स की ओर धकेल रही है। Ashwagandha, Magnesium और Vitamin D जैसे सप्लीमेंट्स इन दिनों खासा ट्रेंड में हैं। लेकिन सवाल यह है–क्या वास्तव में हर किसी को इनकी जरूरत है? सप्लीमेंट्स का बढ़ता चलन अमेरिका के आंकड़ों के मुताबिक, आधे से ज्यादा वयस्क किसी न किसी प्रकार का सप्लीमेंट लेते हैं और यह संख्या लगातार बढ़ रही है। बाजार में करीब 1 लाख से ज्यादा तरह के सप्लीमेंट्स मौजूद हैं–विटामिन्स से लेकर “डिटॉक्स” और “सुपरफूड” तक। लेकिन हैरानी की बात यह है कि इनमें से ज्यादातर सप्लीमेंट्स किसी सख्त मेडिकल अप्रूवल प्रक्रिया से नहीं गुजरते, जिससे इनके प्रभाव और सुरक्षा पर सवाल उठते हैं। क्या सच में जरूरी हैं ये सप्लीमेंट्स? विशेषज्ञों के अनुसार, सप्लीमेंट्स का काम केवल “पूरक” होना है, यानी जो पोषण आपकी डाइट से नहीं मिल पा रहा, उसे पूरा करना। यदि किसी व्यक्ति में किसी विटामिन या मिनरल की कमी पाई जाती है, तो सप्लीमेंट्स फायदेमंद हो सकते हैं लेकिन बिना जरूरत या बिना जांच के इन्हें लेना जरूरी नहीं है किन सप्लीमेंट्स पर सबसे ज्यादा भरोसा? कुछ डॉक्टरों के अनुसार, कुछ सप्लीमेंट्स पर अपेक्षाकृत ज्यादा भरोसा किया जा सकता है: Vitamin D: खासकर उन लोगों के लिए जो धूप कम लेते हैं Magnesium: नींद और मानसिक स्वास्थ्य में मदद कर सकता है Omega-3: दिल की सेहत के लिए (हालांकि इसके नतीजे मिश्रित हैं) हालांकि, इनकी डोज हर व्यक्ति के लिए अलग होती है और बिना डॉक्टर की सलाह के लेना सही नहीं माना जाता। Ashwagandha और ट्रेंडिंग सप्लीमेंट्स का सच Ashwagandha जैसे हर्बल सप्लीमेंट्स को तनाव कम करने और ऊर्जा बढ़ाने के लिए खूब प्रमोट किया जा रहा है, खासकर सोशल मीडिया पर। लेकिन विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि सोशल मीडिया पर मिली जानकारी अक्सर अधूरी या भ्रामक हो सकती है। साइड इफेक्ट्स भी हैं बड़ा खतरा एक अध्ययन के अनुसार, हर साल हजारों लोग सप्लीमेंट्स के साइड इफेक्ट्स के कारण अस्पताल पहुंचते हैं। वेट लॉस सप्लीमेंट्स सबसे ज्यादा खतरनाक पाए गए “डिटॉक्स” और “स्लीप” सप्लीमेंट्स भी जोखिम बढ़ा सकते हैं डॉक्टर क्या सलाह देते हैं? विशेषज्ञों का साफ कहना है: पहले अपनी डाइट सुधारें पर्याप्त नींद लें नियमित व्यायाम करें जरूरत हो तभी सप्लीमेंट्स लें क्योंकि कोई भी गोली अच्छी जीवनशैली की जगह नहीं ले सकती।
नई दिल्ली: युवाओं में तेजी से बढ़ते ई-सिगरेट (E-Cigarette) के इस्तेमाल को लेकर एक नया शोध सामने आया है, जिसने गंभीर चिंता बढ़ा दी है। अध्ययन के मुताबिक, 18 से 25 वर्ष के युवाओं में ई-सिगरेट का उपयोग शुरुआती संज्ञानात्मक गिरावट (Cognitive Decline) और डिमेंशिया के बढ़ते जोखिम से जुड़ा पाया गया है। यह शोध ऐसे समय में आया है जब दुनियाभर में किशोरों और युवाओं के बीच ई-सिगरेट का चलन तेजी से बढ़ रहा है। विशेषज्ञ पहले ही चेतावनी दे चुके हैं कि मस्तिष्क के विकास के महत्वपूर्ण चरणों में निकोटिन का प्रभाव सोचने-समझने की क्षमता पर नकारात्मक असर डाल सकता है। कैसे किया गया अध्ययन? इस क्रॉस-सेक्शनल स्टडी में थाईलैंड के 232 युवाओं को शामिल किया गया, जिन्हें दो समूहों में बांटा गया–ई-सिगरेट उपयोग करने वाले और नॉन-स्मोकर्स। शोधकर्ताओं ने मस्तिष्क की कार्यक्षमता को मापने के लिए Montreal Cognitive Assessment जैसे टूल्स का इस्तेमाल किया, साथ ही ADHD (Attention-Deficit/Hyperactivity Disorder) और इमोशनल इंटेलिजेंस से जुड़े पहलुओं का भी आकलन किया गया। क्या निकला निष्कर्ष? अध्ययन में पाया गया कि: ई-सिगरेट उपयोग करने वालों में डिमेंशिया के जोखिम वाले व्यक्तियों की संख्या काफी अधिक थी। जो युवा एक महीने के भीतर ई-सिगरेट छोड़ने की योजना नहीं बना रहे थे, उनमें जोखिम 6 गुना तक बढ़ा पाया गया। वहीं, छह महीने तक छोड़ने की कोई योजना न रखने वालों में यह जोखिम 4 गुना अधिक था। हालांकि, ADHD के लक्षण और इमोशनल इंटेलिजेंस के स्तर में दोनों समूहों के बीच कोई बड़ा अंतर नहीं पाया गया। शुरुआती संकेत, लेकिन खतरे की घंटी विशेषज्ञों का कहना है कि यह अध्ययन डिमेंशिया की पुष्टि नहीं करता, बल्कि इसके शुरुआती संकेतों की ओर इशारा करता है। यानी यह जोखिम भविष्य में गंभीर बीमारी का रूप ले सकता है। कारण और सीमाएं शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया कि यह एक क्रॉस-सेक्शनल स्टडी है, इसलिए यह तय नहीं किया जा सकता कि ई-सिगरेट सीधे तौर पर डिमेंशिया का कारण बनती है। इसके पीछे अन्य सामाजिक या व्यवहारिक कारण भी हो सकते हैं। क्यों जरूरी है सतर्कता? स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, अगर युवाओं में इस तरह के शुरुआती संज्ञानात्मक बदलाव बढ़ते हैं, तो भविष्य में यह सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है। इसलिए जरूरी है कि: युवाओं में ई-सिगरेट के नुकसान को लेकर जागरूकता बढ़ाई जाए निकोटिन की लत से बचने के लिए काउंसलिंग और रोकथाम कार्यक्रम चलाए जाएं आगे और लंबे समय तक चलने वाले शोध किए जाएं