उत्तर प्रदेश की न्यायिक व्यवस्था में बड़ा प्रशासनिक बदलाव किया गया है। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक साथ 1,086 न्यायिक अधिकारियों के तबादले का आदेश जारी किया है। इस व्यापक ट्रांसफर को राज्य की अदालतों में लंबित मामलों को कम करने और कार्यप्रणाली को अधिक प्रभावी बनाने की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है।
जारी आदेश के अनुसार:
इन सभी न्यायिक अधिकारियों के कार्यक्षेत्र में बदलाव किया गया है। यह हाल के दिनों में दूसरी बार है जब इतनी बड़ी संख्या में ट्रांसफर किए गए हैं।
सूत्रों के अनुसार, इस कदम का मुख्य उद्देश्य:
न्यायपालिका में समय-समय पर इस तरह के ट्रांसफर सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा होते हैं, लेकिन इतनी बड़ी संख्या में तबादले यह संकेत देते हैं कि सिस्टम को अधिक प्रभावी बनाने पर जोर दिया जा रहा है।
यह पूरा फैसला अरुण भंसाली के निर्देश पर लिया गया है। आदेश में स्पष्ट किया गया है कि सभी न्यायिक अधिकारी 15 अप्रैल तक अपनी नई पोस्टिंग पर कार्यभार संभाल लें।
इस ट्रांसफर के तहत कुछ अहम पदों पर भी बदलाव किए गए हैं। बुलंदशहर के ADJ वरुण मोहित निगम को हाई कोर्ट में रजिस्ट्रार (लिस्टिंग) नियुक्त किया गया है, जो न्यायिक कार्यों के संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस बड़े पैमाने के ट्रांसफर से:
हालांकि, इतने बड़े बदलाव के बाद शुरुआती दिनों में प्रशासनिक समन्वय की चुनौतियां भी सामने आ सकती हैं।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
श्री विजयपुरम, एजेंसियां। अंडमान सागर में हाल ही में हुई नाव दुर्घटना ने एक बार फिर अवैध समुद्री प्रवास की भयावह सच्चाई को उजागर कर दिया है। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार, मलेशिया की ओर जा रही एक नाव के पलटने से करीब 250 लोग लापता हो गए हैं, जिनमें अधिकांश रोहिंग्या शरणार्थी और बांग्लादेशी नागरिक शामिल हैं। यह घटना इस खतरनाक रूट पर लगातार बढ़ते जोखिम को दर्शाती है। म्यांमार से पलायन और शरणार्थी संकट 2017 में म्यांमार के रखाइन प्रांत में सैन्य कार्रवाई के बाद लाखों रोहिंग्या मुसलमानों को अपने घर छोड़ने पड़े। 1982 के नागरिकता कानून के कारण पहले से ही अधिकारों से वंचित इस समुदाय को व्यापक हिंसा का सामना करना पड़ा। इसके बाद 10 लाख से अधिक लोग बांग्लादेश, भारत, मलेशिया और थाईलैंड जैसे देशों में शरण लेने को मजबूर हुए। आज भी लाखों शरणार्थी बांग्लादेश के कॉक्स बाजार स्थित कुटुपालोंग जैसे विशाल कैंपों में कठिन परिस्थितियों में जीवन बिता रहे हैं। तस्करी नेटवर्क और ‘घोस्ट शिप’ का खतरनाक खेल अवैध प्रवास का यह नेटवर्क बेहद संगठित और खतरनाक है। तस्कर बांग्लादेश के टेकनाफ क्षेत्र से शरणार्थियों को छोटी नावों में बैठाकर समुद्र के रास्ते भेजते हैं। आगे चलकर उन्हें बड़ी मछली पकड़ने वाली नावों में ठूंस दिया जाता है। समुद्र में पहुंचने के बाद तस्कर जहाजों के ट्रैकिंग सिस्टम (AIS) को बंद कर देते हैं, जिसे ‘गोइंग डार्क’ कहा जाता है। इससे जहाज पूरी तरह रडार से गायब हो जाते हैं और किसी दुर्घटना की स्थिति में बचाव लगभग असंभव हो जाता है। हर पांच में से एक व्यक्ति मौत या लापता 2025-2026 के आंकड़े बताते हैं कि इस खतरनाक यात्रा में हर पांच में से एक व्यक्ति या तो मारा जाता है या लापता हो जाता है। पिछले साल ही 600 से अधिक मौतों की पुष्टि हुई, जबकि वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक हो सकती है। 2014 से अब तक दुनिया भर में समुद्री प्रवास के दौरान 36,000 से ज्यादा लोगों की मौत दर्ज की गई है, जिनमें सबसे ज्यादा हादसे भूमध्य सागर में हुए हैं। दुनिया की बड़ी समुद्री त्रासदियां इतिहास में भी कई भयावह घटनाएं दर्ज हैं, जैसे 2015 में भूमध्य सागर में 800 से अधिक लोगों की मौत, 2023 में ग्रीस के पास 650 शरणार्थियों की जान जाना, और 2001 में ऑस्ट्रेलिया के रास्ते SIEV-X नाव हादसा जिसमें 353 लोगों की मौत हुई थी। समाधान की जरूरत विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक शरणार्थियों के लिए सुरक्षित और कानूनी रास्ते नहीं बनाए जाएंगे, तब तक लोग इन खतरनाक मार्गों का सहारा लेते रहेंगे। अंडमान सागर आज केवल एक जलमार्ग नहीं, बल्कि हजारों मजबूर जिंदगियों के लिए मौत का रास्ता बन चुका है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। भारतीय उद्योग जगत के लिए 17 अप्रैल 2026 का दिन खास रहा, जब गौतम अडानी एक बार फिर एशिया के सबसे अमीर व्यक्ति बन गए। ब्लूमबर्ग बिलियनेयर्स इंडेक्स के ताजा आंकड़ों के अनुसार, उन्होंने मुकेश अंबानी को पीछे छोड़ दिया। नेटवर्थ में तेज उछाल रिपोर्ट के मुताबिक, गौतम अडानी की कुल संपत्ति बढ़कर 92.6 बिलियन डॉलर हो गई है, जिससे वे वैश्विक स्तर पर 19वें स्थान पर पहुंच गए हैं। वहीं मुकेश अंबानी 90.8 बिलियन डॉलर के साथ 20वें स्थान पर खिसक गए। एक ही दिन में अडानी की संपत्ति में 3.56 बिलियन डॉलर की वृद्धि दर्ज की गई, जो बाजार में तेजी का परिणाम है। शेयर बाजार में तेजी बना मुख्य कारण अडानी समूह की कंपनियों Adani Total Gas, Adani Ports और Adani Power के शेयरों में लगातार मजबूती देखी गई। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि बुनियादी ढांचे और नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र में विस्तार ने निवेशकों का भरोसा बढ़ाया है। इसके विपरीत, Reliance Industries के प्रदर्शन में उतार-चढ़ाव के कारण अंबानी की संपत्ति में इस साल 16.9 बिलियन डॉलर की गिरावट आई है। वैश्विक अमीरों की सूची में स्थिति वैश्विक स्तर पर एलन मस्क 656 बिलियन डॉलर के साथ पहले स्थान पर बने हुए हैं। उनके बाद लैरी पेज और जेफ बेजोस का स्थान है। वहीं बर्नार्ड अरनॉल्ट को इस वर्ष सबसे ज्यादा नुकसान हुआ है। भारतीय उद्योगपतियों की मजबूत मौजूदगी भारतीय अरबपतियों में लक्ष्मी मित्तल, शिव नाडर और सावित्री जिंदल भी वैश्विक सूची में मजबूत स्थिति में हैं। विशेषज्ञों के अनुसार अडानी और अंबानी के बीच संपत्ति का अंतर केवल 1.8 बिलियन डॉलर है। ऐसे में आने वाले समय में बाजार के उतार-चढ़ाव के साथ यह प्रतिस्पर्धा और भी दिलचस्प हो सकती है।
नई दिल्ली: संसद में इन दिनों परिसीमन (Delimitation) को लेकर जोरदार बहस जारी है। Narendra Modi ने लोकसभा में इसे नारी शक्ति और समान प्रतिनिधित्व से जोड़ा, जबकि विपक्ष इसे राजनीतिक फायदे से जोड़कर देख रहा है। ऐसे में सवाल उठ रहा है–आखिर परिसीमन है क्या और इसे लेकर विवाद क्यों है? क्या है परिसीमन? परिसीमन एक संवैधानिक प्रक्रिया है, जिसके तहत: लोकसभा और राज्य विधानसभाओं की सीटों की संख्या तय की जाती है चुनाव क्षेत्रों (constituencies) की सीमाएं बदली जाती हैं यह सुनिश्चित किया जाता है कि हर क्षेत्र में जनसंख्या के आधार पर समान प्रतिनिधित्व हो सीधे शब्दों में, ताकि हर वोट की कीमत बराबर रहे–न ज्यादा, न कम। परिसीमन की जरूरत क्यों पड़ती है? भारत जैसे बड़े देश में जनसंख्या लगातार बदलती रहती है। ऐसे में: कुछ क्षेत्रों की आबादी तेजी से बढ़ जाती है लेकिन सीटें वही रहती हैं इससे उन क्षेत्रों के लोगों का प्रतिनिधित्व कम हो जाता है। इसी असंतुलन को ठीक करने के लिए परिसीमन किया जाता है–ताकि हर सांसद या विधायक लगभग बराबर संख्या में लोगों का प्रतिनिधित्व करे। कैसे होता है परिसीमन? परिसीमन एक तय प्रक्रिया से गुजरता है: जनगणना (Census) होती है सरकार परिसीमन आयोग (Delimitation Commission) बनाती है आयोग जनसंख्या के आधार पर सीटों और सीमाओं का निर्धारण करता है जनता और राजनीतिक दलों से सुझाव लिए जाते हैं अंतिम निर्णय लागू किया जाता है इस आयोग के फैसले को आमतौर पर अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती। संविधान क्या कहता है? भारतीय संविधान में परिसीमन का स्पष्ट प्रावधान है: अनुच्छेद 81 – लोकसभा सीटों से जुड़ा अनुच्छेद 170 – राज्य विधानसभाओं से जुड़ा अनुच्छेद 82 – हर जनगणना के बाद परिसीमन का प्रावधान अब तक कितनी बार हुआ परिसीमन? आजादी के बाद भारत में अब तक 4 बार परिसीमन हुआ: 1952 1963 1973 2002 1976 में 42वें संविधान संशोधन के जरिए लोकसभा सीटों की संख्या “फ्रीज” कर दी गई थी। 2002 में सिर्फ सीमाएं बदली गईं, सीटों की संख्या नहीं बढ़ी। अब विवाद क्यों? मौजूदा विवाद की सबसे बड़ी वजह है–जनसंख्या आधारित परिसीमन। दक्षिण भारत के राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर काम किया उत्तर भारत के राज्यों में आबादी ज्यादा तेजी से बढ़ी अगर सिर्फ जनसंख्या के आधार पर सीटें बढ़ेंगी, तो: दक्षिण के राज्यों का प्रतिनिधित्व कम हो सकता है उत्तर के राज्यों को ज्यादा सीटें मिल सकती हैं इसी वजह से दक्षिणी राज्यों में चिंता और विरोध देखने को मिल रहा है। सरकार vs विपक्ष Narendra Modi का कहना है कि यह समान प्रतिनिधित्व और महिला आरक्षण लागू करने की दिशा में कदम है विपक्ष का आरोप है कि सरकार राजनीतिक लाभ के लिए परिसीमन का इस्तेमाल करना चाहती है