फ़्रांस के एवियन शहर में आयोजित जी-7 शिखर सम्मेलन इस बार भारत के लिए महज़ एक अंतरराष्ट्रीय मंच नहीं था, बल्कि यह एक बेहद संवेदनशील कूटनीतिक परीक्षा भी थी। एक तरफ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप थे, और दूसरी तरफ उन तीन भारतीय नाविकों की मौत का ताज़ा ज़ख्म, जिनकी जान हाल ही में अमेरिकी सेना के हमले में गई थी। स्लोवाकिया के दौरे के बाद अतिथि देश के रूप में फ्रांस पहुंचे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वैश्विक मंच से नाविकों की सुरक्षा का मुद्दा तो उठाया, लेकिन अमेरिका का सीधा नाम लेने से परहेज़ किया। इसी कूटनीतिक सावधानी ने देश के भीतर एक बड़े राजनीतिक तूफ़ान को जन्म दे दिया है।
पीएम मोदी ने वैश्विक नेताओं के सामने स्पष्ट किया कि पश्चिम एशिया के हालिया संघर्ष ने न केवल वैश्विक अर्थव्यवस्था को चोट पहुंचाई है, बल्कि भारत के कई नागरिकों को अपनी जान गंवानी पड़ी है। होर्मुज़ स्ट्रेट में उपजे हालात और नाविकों के डर पर चिंता जताते हुए उन्होंने कहा, "आज की दुनिया पहले से कहीं अधिक आपस में जुड़ी है।"
ऊर्जा, डेटा और सप्लाई चेन की सुरक्षा का ज़िक्र करते हुए पीएम ने एक कूटनीतिक संदेश दिया कि, "आज सबसे अहम रणनीतिक संपत्ति कोई खनिज, टेक्नोलॉजी या बाज़ार नहीं है बल्कि आपसी विश्वास है।" उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि भागीदार देशों को "टेक्नोलॉजी और सप्लाई चेन को हथियार के तौर पर नहीं" बल्कि दुनिया की भलाई के लिए इस्तेमाल करना चाहिए।
यह पूरा विवाद 28 फ़रवरी को शुरू हुए अमेरिका-ईरान तनाव से जुड़ा है, जब ईरान ने होर्मुज़ स्ट्रेट की नाकाबंदी कर दी थी। जवाब में अमेरिका ने भी अपनी नौसेना उतार दी। इसी तनातनी के बीच 9 जून को ओमान के तट के पास 24 भारतीय क्रू सदस्यों वाले वाणिज्यिक जहाज़ 'सेटेबेलो' पर अमेरिकी सेना ने हमला कर दिया। 21 लोगों को सुरक्षित निकाल लिया गया, लेकिन तीन भारतीयों—आदित्य शर्मा, शिवानंद चौरसिया और परनाला सुरेश—को अपनी जान गंवानी पड़ी। खाड़ी क्षेत्र में दो अन्य भारतीय जहाज़ों को भी निशाना बनाया गया था।
भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने इस घटना पर अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो के सामने "कड़ा विरोध" जताते हुए कहा था कि इस तरह का "घातक हमला उचित नहीं" है। लेकिन अमेरिका का रुख बेहद अड़ियल रहा। रुबियो ने सख्त लहजे में स्पष्ट किया, "खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी नाकेबंदी का उल्लंघन और ईरानी तेल की अवैध ढुलाई बर्दाश्त नहीं की जाएगी।" हालांकि, अब दोनों देशों के बीच 4 महीने से चल रहे संघर्ष को रोकने के लिए एक शांति समझौते की घोषणा हो चुकी है और ट्रंप ने जल्द ही होर्मुज़ से जहाजों की आवाजाही सामान्य होने का दावा किया है।
अमेरिका के इस रुख और पीएम मोदी के भाषण को लेकर भारतीय विपक्ष बेहद आक्रामक है। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (X) पर लिखा, "अमेरिकी हमलों में तीन भारतीय नाविकों की हत्या के चंद दिन बाद न अफ़सोस, न माफ़ी। उल्टा अमेरिका ने आदेश देना जारी रखा है।" उन्होंने पीएम मोदी पर सीधा निशाना साधते हुए कहा, "एक आज़ाद देश इस तरह की भाषा कभी नहीं सहेगा। लेकिन हमारे कॉम्प्रोमाइज्ड पीएम वो देश के सम्मान की रक्षा नहीं करेंगे।"
कांग्रेस नेता सुप्रिया श्रीनेत ने भी इस मुद्दे पर तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने लिखा, "जी-7 मीटिंग में अपने संबोधन के अंत में प्रधानमंत्री मोदी ने देश का सिर झुका दिया।" उन्होंने पीएम के बयान को 'कायराना' और शहीदों का अपमान बताते हुए कहा कि हिन्दुस्तान के तीन नाविकों की हत्या के बाद भी पीएम अमेरिका का नाम लेने की हिम्मत नहीं जुटा पाए। श्रीनेत ने पूछा, "मृतकों का नाम आदित्य शर्मा, शिवानंद चौरसिया, परनाला सुरेश था... इतना सम्मान तो देना चाहिए था। जो अपने देश का ना हुआ वह किसका होगा? लानत है मोदी जी!"
वहीं, आम आदमी पार्टी के नेता संजय सिंह ने भी ट्रंप और मोदी की मुलाकात पर तंज कसा। उन्होंने कहा, "ग़ज़ब की बेशर्मी है भाई अमेरिकी सेना ने हमारे तीन जहाजों पर मिसाइल से हमला किया, तीन भारतीयों की हत्या कर दी। लेकिन लाल आंखें दिखाना तो दूर, मोदी ट्रंप के साथ 'हीं हीं खी खी' कर रहे हैं।"
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
फ़्रांस के एवियन शहर में आयोजित जी-7 शिखर सम्मेलन इस बार भारत के लिए महज़ एक अंतरराष्ट्रीय मंच नहीं था, बल्कि यह एक बेहद संवेदनशील कूटनीतिक परीक्षा भी थी। एक तरफ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप थे, और दूसरी तरफ उन तीन भारतीय नाविकों की मौत का ताज़ा ज़ख्म, जिनकी जान हाल ही में अमेरिकी सेना के हमले में गई थी। स्लोवाकिया के दौरे के बाद अतिथि देश के रूप में फ्रांस पहुंचे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वैश्विक मंच से नाविकों की सुरक्षा का मुद्दा तो उठाया, लेकिन अमेरिका का सीधा नाम लेने से परहेज़ किया। इसी कूटनीतिक सावधानी ने देश के भीतर एक बड़े राजनीतिक तूफ़ान को जन्म दे दिया है। वैश्विक मंच से पीएम का कूटनीतिक संदेश पीएम मोदी ने वैश्विक नेताओं के सामने स्पष्ट किया कि पश्चिम एशिया के हालिया संघर्ष ने न केवल वैश्विक अर्थव्यवस्था को चोट पहुंचाई है, बल्कि भारत के कई नागरिकों को अपनी जान गंवानी पड़ी है। होर्मुज़ स्ट्रेट में उपजे हालात और नाविकों के डर पर चिंता जताते हुए उन्होंने कहा, "आज की दुनिया पहले से कहीं अधिक आपस में जुड़ी है।" ऊर्जा, डेटा और सप्लाई चेन की सुरक्षा का ज़िक्र करते हुए पीएम ने एक कूटनीतिक संदेश दिया कि, "आज सबसे अहम रणनीतिक संपत्ति कोई खनिज, टेक्नोलॉजी या बाज़ार नहीं है बल्कि आपसी विश्वास है।" उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि भागीदार देशों को "टेक्नोलॉजी और सप्लाई चेन को हथियार के तौर पर नहीं" बल्कि दुनिया की भलाई के लिए इस्तेमाल करना चाहिए। क्या है 'सेटेबेलो' का विवाद और अमेरिका का अड़ियल रुख? यह पूरा विवाद 28 फ़रवरी को शुरू हुए अमेरिका-ईरान तनाव से जुड़ा है, जब ईरान ने होर्मुज़ स्ट्रेट की नाकाबंदी कर दी थी। जवाब में अमेरिका ने भी अपनी नौसेना उतार दी। इसी तनातनी के बीच 9 जून को ओमान के तट के पास 24 भारतीय क्रू सदस्यों वाले वाणिज्यिक जहाज़ 'सेटेबेलो' पर अमेरिकी सेना ने हमला कर दिया। 21 लोगों को सुरक्षित निकाल लिया गया, लेकिन तीन भारतीयों—आदित्य शर्मा, शिवानंद चौरसिया और परनाला सुरेश—को अपनी जान गंवानी पड़ी। खाड़ी क्षेत्र में दो अन्य भारतीय जहाज़ों को भी निशाना बनाया गया था। भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने इस घटना पर अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो के सामने "कड़ा विरोध" जताते हुए कहा था कि इस तरह का "घातक हमला उचित नहीं" है। लेकिन अमेरिका का रुख बेहद अड़ियल रहा। रुबियो ने सख्त लहजे में स्पष्ट किया, "खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी नाकेबंदी का उल्लंघन और ईरानी तेल की अवैध ढुलाई बर्दाश्त नहीं की जाएगी।" हालांकि, अब दोनों देशों के बीच 4 महीने से चल रहे संघर्ष को रोकने के लिए एक शांति समझौते की घोषणा हो चुकी है और ट्रंप ने जल्द ही होर्मुज़ से जहाजों की आवाजाही सामान्य होने का दावा किया है। विपक्ष का तीखा प्रहार: 'देश का सिर झुका दिया' अमेरिका के इस रुख और पीएम मोदी के भाषण को लेकर भारतीय विपक्ष बेहद आक्रामक है। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (X) पर लिखा, "अमेरिकी हमलों में तीन भारतीय नाविकों की हत्या के चंद दिन बाद न अफ़सोस, न माफ़ी। उल्टा अमेरिका ने आदेश देना जारी रखा है।" उन्होंने पीएम मोदी पर सीधा निशाना साधते हुए कहा, "एक आज़ाद देश इस तरह की भाषा कभी नहीं सहेगा। लेकिन हमारे कॉम्प्रोमाइज्ड पीएम वो देश के सम्मान की रक्षा नहीं करेंगे।" कांग्रेस नेता सुप्रिया श्रीनेत ने भी इस मुद्दे पर तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने लिखा, "जी-7 मीटिंग में अपने संबोधन के अंत में प्रधानमंत्री मोदी ने देश का सिर झुका दिया।" उन्होंने पीएम के बयान को 'कायराना' और शहीदों का अपमान बताते हुए कहा कि हिन्दुस्तान के तीन नाविकों की हत्या के बाद भी पीएम अमेरिका का नाम लेने की हिम्मत नहीं जुटा पाए। श्रीनेत ने पूछा, "मृतकों का नाम आदित्य शर्मा, शिवानंद चौरसिया, परनाला सुरेश था... इतना सम्मान तो देना चाहिए था। जो अपने देश का ना हुआ वह किसका होगा? लानत है मोदी जी!" वहीं, आम आदमी पार्टी के नेता संजय सिंह ने भी ट्रंप और मोदी की मुलाकात पर तंज कसा। उन्होंने कहा, "ग़ज़ब की बेशर्मी है भाई अमेरिकी सेना ने हमारे तीन जहाजों पर मिसाइल से हमला किया, तीन भारतीयों की हत्या कर दी। लेकिन लाल आंखें दिखाना तो दूर, मोदी ट्रंप के साथ 'हीं हीं खी खी' कर रहे हैं।"
श्रीनगर: 3 जुलाई से शुरू होने वाली अमरनाथ यात्रा से पहले जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा व्यवस्था अभूतपूर्व स्तर पर कड़ी कर दी गई है। अनंतनाग पुलिस ने पहलगाम और आसपास के इलाकों में घर-घर तलाशी अभियान शुरू कर दिया है, ताकि आतंकी घुसपैठ की किसी भी कोशिश को समय रहते नाकाम किया जा सके। सुरक्षा एजेंसियां यात्रा मार्ग से जुड़े प्रत्येक व्यक्ति की पहचान और पृष्ठभूमि की जांच कर रही हैं। इसके तहत घोड़ा संचालकों, ड्राइवरों, पिट्ठुओं और फोटोग्राफरों को अलग-अलग QR कोड वाले पहचान पत्र जारी किए गए हैं। बिना QR-ID यात्रियों के साथ नहीं जा सकेगा कोई पुलिस ने स्पष्ट किया है कि अब बिना वैध QR कोड और पहचान पत्र के कोई भी व्यक्ति यात्रियों के साथ पहाड़ पर नहीं जा सकेगा। सुरक्षा बल प्रत्येक आईडी कार्ड को स्कैन कर उसका सत्यापन कर रहे हैं, जिससे फर्जी पहचान के जरिए यात्रा मार्ग में प्रवेश की संभावना समाप्त हो सके। 2017 के आतंकी हमले से लिया सबक सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के पीछे वर्ष 2017 की वह घटना भी है, जब 10 जुलाई को अनंतनाग में अमरनाथ यात्रियों की बस पर आतंकियों ने अंधाधुंध फायरिंग की थी। इस हमले में आठ श्रद्धालुओं की मौत हो गई थी, जबकि 19 अन्य घायल हुए थे। जांच में सामने आया था कि आतंकियों को स्थानीय स्तर पर मदद मिली थी और कुछ संदिग्ध लोग यात्रियों के बीच घुसपैठ करने में सफल रहे थे। इसी अनुभव को ध्यान में रखते हुए इस बार यात्रा से जुड़े प्रत्येक व्यक्ति का विस्तृत सत्यापन किया जा रहा है। QR सिस्टम से रहेगा हर गतिविधि का रिकॉर्ड सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार, QR कोड आधारित व्यवस्था से प्रत्येक घोड़ा संचालक, पिट्ठू, ड्राइवर और सेवा प्रदाता का पूरा डिजिटल रिकॉर्ड उपलब्ध रहेगा। किसी भी संदिग्ध गतिविधि या गड़बड़ी की स्थिति में संबंधित व्यक्ति की तुरंत पहचान कर कार्रवाई की जा सकेगी। स्थानीय लोगों ने किया स्वागत घोड़ा संचालकों और वाहन चालकों ने इस पहल का स्वागत करते हुए कहा कि QR कोड प्रणाली से न केवल उनकी पहचान सुनिश्चित हुई है, बल्कि इससे श्रद्धालुओं का भरोसा भी बढ़ेगा। उन्होंने कहा कि अब फर्जी सेवा प्रदाताओं और ठगी की घटनाओं पर भी अंकुश लगेगा। 3 जुलाई से शुरू होगी 57 दिन की अमरनाथ यात्रा इस वर्ष अमरनाथ यात्रा 3 जुलाई 2026 से शुरू होकर 28 अगस्त 2026 (रक्षाबंधन) तक चलेगी। कुल 57 दिनों तक चलने वाली इस यात्रा के लिए ऑनलाइन पंजीकरण प्रक्रिया 15 अप्रैल 2026 से शुरू हो चुकी है। प्रशासन को इस वर्ष भी लाखों श्रद्धालुओं के पवित्र गुफा तक पहुंचने की उम्मीद है।
नीट पेपर लीक मामले के आरोपी यश यादव को दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। कोर्ट ने उसे 21 जून को होने वाली दोबारा आयोजित NEET-UG परीक्षा में शामिल होने की अनुमति दे दी है। इसके साथ ही अदालत ने यश यादव को अपनी बहन की शादी में शामिल होने की भी इजाजत प्रदान की है। कोर्ट ने शिक्षा को बताया मौलिक अधिकार मामले की सुनवाई के दौरान राउज एवेन्यू कोर्ट ने कहा कि शिक्षा प्रत्येक व्यक्ति का मौलिक अधिकार है और किसी भी व्यक्ति को इस अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता। इसी आधार पर अदालत ने यश यादव को परीक्षा देने की अनुमति प्रदान की। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यश यादव को पुलिस हिरासत और सुरक्षा निगरानी में परीक्षा केंद्र ले जाया जाएगा। पढ़ाई के लिए किताबें रखने की भी मिली थी अनुमति यश यादव ने इससे पहले अदालत से पढ़ाई के लिए किताबें अपने पास रखने की अनुमति मांगी थी। 2 जून को कोर्ट ने उसकी इस मांग को स्वीकार कर लिया था, ताकि वह आगामी परीक्षा की तैयारी कर सके। यश यादव की वकील अंबिका यादव ने अदालत में कहा था कि वह एक मेधावी छात्र है और उसने 3 मई को आयोजित नीट-यूजी परीक्षा दी थी। परीक्षा स्थगित होने के बाद अब 21 जून को दोबारा आयोजित की जा रही है, इसलिए उसे परीक्षा में शामिल होने का अवसर दिया जाना चाहिए। नीट पेपर लीक मामले में आरोपी है यश यादव यश यादव नीट पेपर लीक मामले में गिरफ्तार किए गए पांच आरोपियों में से एक है। मामले की जांच अभी जारी है और आरोपी के खिलाफ कानूनी प्रक्रिया भी चल रही है। अदालत ने माना कि आपराधिक मामले में आरोपी होने मात्र से किसी छात्र के शिक्षा के अधिकार को पूरी तरह खत्म नहीं किया जा सकता।