अयोध्या, एजेंसियां। श्रीराम जन्मभूमि मंदिर के दान राशि में कथित हेराफेरी के मामले में विशेष जांच दल (SIT) की जांच लगातार आगे बढ़ रही है। इस बीच ट्रस्ट से जुड़े रामशंकर यादव उर्फ टिन्नू यादव के अचानक सार्वजनिक रूप से सामने आकर बयान देने से मामले ने नया मोड़ ले लिया है। पिछले कई दिनों से चुप्पी साधे टिन्नू के वीडियो बयान और मीडिया इंटरव्यू के बाद इस पूरे घटनाक्रम को लेकर कई सवाल उठ रहे हैं। सूत्रों का मानना है कि यह कदम किसी सोची-समझी रणनीति का हिस्सा हो सकता है।
सूत्रों के मुताबिक जांच के दायरे में ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय, ट्रस्टी अनिल मिश्रा, टिन्नू यादव और मंदिर निर्माण से जुड़े गोपाल राव सहित कई लोग हैं। जांच एजेंसियां दान राशि के प्रबंधन, उसकी गणना और निगरानी से जुड़े सभी पहलुओं की पड़ताल कर रही हैं। बताया जा रहा है कि एसआईटी कई अधिकारियों और कर्मचारियों से बार-बार पूछताछ कर रही है।
जांच के दौरान एसआईटी को ऐसे संकेत मिले हैं जिनसे सीसीटीवी फुटेज से कथित छेड़छाड़ की आशंका जताई जा रही है। हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है। इसके अलावा दान राशि की गणना प्रक्रिया में शामिल बैंक कर्मियों की भूमिका और संभावित लापरवाही की भी जांच की जा रही है। सूत्रों के अनुसार बैंक कर्मचारी ट्रस्ट पदाधिकारियों के दबाव में होने के कारण कई मामलों में हस्तक्षेप नहीं कर सके।
एसआईटी अब तक 125 से अधिक लोगों से पूछताछ कर चुकी है और करीब 200 लोगों की सूची तैयार की गई है। टिन्नू यादव से भी लंबी पूछताछ हुई है, जिसमें उन्होंने दान राशि के प्रबंधन में अपनी भूमिका से इनकार करते हुए कुछ अन्य लोगों की जिम्मेदारी का उल्लेख किया है।
इसी बीच 19 जून को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का अयोध्या दौरा प्रस्तावित है। उनका यह दौरा ऐसे समय हो रहा है जब मंदिर की दान राशि में कथित गड़बड़ी की जांच जारी है। वहीं, इस मामले में एफआईआर दर्ज होगी या जांच पूरी होने के बाद आगे की कार्रवाई होगी, इस पर अभी स्थिति स्पष्ट नहीं है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
कोलकाता, एजेंसियां। अर्जेंटीना के स्टार फुटबॉलर लियोनेल मेस्सी के 2025 के कोलकाता दौरे से जुड़े कथित विवाद की जांच तेज हो गई है। पश्चिम बंगाल के पूर्व खेल मंत्री अरूप बिस्वास गुरुवार को बिधाननगर पुलिस कमिश्नरेट मुख्यालय पहुंचे और जांच अधिकारियों के सामने पेश हुए। पुलिस ने उन्हें इससे पहले तीन नोटिस जारी किए थे, जिसमें अंतिम नोटिस 13 जून को भेजा गया था। इसके बाद गुरुवार सुबह करीब 9:55 बजे उन्होंने पुलिस के समक्ष अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। टिकट कालाबाजारी और धोखाधड़ी के आरोप यह मामला कार्यक्रम के आयोजक सताद्रु दत्ता की शिकायत पर दर्ज किया गया है। शिकायत में अरूप बिस्वास पर टिकटों की कालाबाजारी, जबरन वसूली, धोखाधड़ी और आपराधिक धमकी जैसे गंभीर आरोप लगाए गए हैं। पुलिस इन आरोपों की जांच कर रही है और पूरे घटनाक्रम से जुड़े तथ्यों को खंगाल रही है। कार्यक्रम में मचा था हंगामा विवाद 13 दिसंबर 2025 को कोलकाता के साल्ट लेक स्टेडियम में आयोजित मेस्सी के कार्यक्रम से जुड़ा है। कार्यक्रम के दौरान बड़ी संख्या में दर्शकों ने अव्यवस्था और बदइंतजामी का आरोप लगाते हुए स्टेडियम के कुछ हिस्सों में तोड़फोड़ की थी। कई दर्शकों का कहना था कि महंगे टिकट खरीदने के बावजूद वे मेस्सी की एक झलक तक नहीं देख सके, क्योंकि मैदान पर मौजूद वीआईपी और प्रभावशाली लोगों की भीड़ ने उन्हें पूरी तरह घेर लिया था। बिस्वास ने आरोपों से किया इनकार अरूप बिस्वास ने अपने ऊपर लगे सभी आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि उनका कार्यक्रम के वित्तीय लेन-देन से कोई संबंध नहीं था। इससे पहले उन्होंने स्वास्थ्य कारणों का हवाला देते हुए पुलिस से पेशी के लिए दो सप्ताह का समय मांगा था। वहीं, कलकत्ता हाईकोर्ट ने उन्हें जांच में सहयोग करने का निर्देश देते हुए पुलिस की दंडात्मक कार्रवाई से सशर्त राहत दी थी। इस बीच, मेस्सी के भारत दौरे के आयोजक ने दावा किया है कि फुटबॉलर की कम्युनिकेशन टीम ने पुलिस को पत्र लिखकर कार्यक्रम में हुई अव्यवस्था के लिए अरूप बिस्वास को जिम्मेदार ठहराया है। मामले की जांच जारी है।
कोलकाता: पश्चिम बंगाल में स्कूली शिक्षा व्यवस्था में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। राज्य सरकार स्कूलों में प्रतिदिन योग सत्र शुरू करने पर विचार कर रही है। कैबिनेट मंत्री अग्निमित्रा पॉल ने कहा है कि छात्र-छात्राओं के शारीरिक और मानसिक विकास के लिए रोजाना योग को शिक्षा प्रणाली का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। रोजाना आधे घंटे के योग सत्र का प्रस्ताव अंतरराष्ट्रीय योग दिवस 2026 से पहले बिधाननगर नगर निगम के सहयोग से आयोजित एक योग कार्यक्रम में अग्निमित्रा पॉल और स्वास्थ्य मंत्री शारद्वत मुखर्जी ने हिस्सा लिया। इस कार्यक्रम में छह स्कूलों के छात्र-छात्राओं ने भी भाग लिया। इस दौरान अग्निमित्रा पॉल ने कहा कि सरकार स्कूलों में प्रतिदिन 30 मिनट का योग सत्र शुरू करने की योजना पर गंभीरता से विचार कर रही है और इसके लिए मुख्यमंत्री से औपचारिक अनुमति मांगी जाएगी। उन्होंने कहा, “योग केवल एक दिन का कार्यक्रम नहीं है। हमारी योजना है कि बच्चे जब स्कूल आएं, तो दिन का पहला आधा घंटा योग के लिए निर्धारित किया जाए। बच्चे राज्य और देश का भविष्य हैं, इसलिए उनका स्वस्थ और मानसिक रूप से मजबूत होना हमारी प्राथमिकता है।” एकाग्रता और मानसिक स्वास्थ्य के लिए जरूरी है योग मंत्री ने कहा कि योग विद्यार्थियों की एकाग्रता बढ़ाने, तनाव कम करने और मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। उनका मानना है कि नियमित योग अभ्यास से बच्चों में अनुशासन, आत्मविश्वास और सकारात्मक सोच विकसित होती है। 20 जून को कोलकाता आएंगे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अग्निमित्रा पॉल ने जानकारी दी कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 20 जून को ‘पश्चिम बंगाल दिवस’ समारोह में भाग लेने के लिए कोलकाता पहुंचेंगे। इसके अगले दिन, 21 जून को प्रधानमंत्री शहर में आयोजित अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के मुख्य कार्यक्रम में भी शामिल होंगे। योग दिवस से पहले राज्यव्यापी स्वच्छता अभियान स्वास्थ्य मंत्री शारद्वत मुखर्जी और अग्निमित्रा पॉल ने बताया कि योग दिवस से पहले पूरे पश्चिम बंगाल में ‘महा-स्वच्छता अभियान’ चलाया जाएगा। इस अभियान में स्कूलों के विद्यार्थी, सामाजिक संगठन, बुजुर्ग और आम नागरिक भाग लेंगे। सरकार का उद्देश्य योग और स्वच्छता के प्रति लोगों में जागरूकता बढ़ाना तथा स्वस्थ जीवनशैली को बढ़ावा देना है। योग को स्थायी व्यवस्था बनाने की तैयारी राज्य सरकार का मानना है कि यदि स्कूलों में योग को नियमित गतिविधि के रूप में लागू किया जाता है, तो इससे विद्यार्थियों के शारीरिक स्वास्थ्य के साथ-साथ उनकी मानसिक क्षमता और शैक्षणिक प्रदर्शन में भी सकारात्मक सुधार देखने को मिलेगा।
कोलकाता: झारखंड, ओडिशा और पश्चिम बंगाल में लंबे समय से सक्रिय रही 10 लाख रुपये की इनामी महिला नक्सली शकुंतला महतो ने कोलकाता में पुलिस के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया। महिला माओवादी ने लालबाजार स्थित कोलकाता पुलिस मुख्यालय में एक हथियार और 46 कारतूस के साथ सरेंडर किया। लालबाजार में किया आत्मसमर्पण, पुलिस ने दी जानकारी कोलकाता के पुलिस आयुक्त अजय कुमार नंद ने जानकारी दी कि शकुंतला महतो भाकपा (माओवादी) की जोनल कमेटी की सदस्य रही है और लंबे समय से पूर्वी भारत के नक्सल प्रभावित इलाकों में सक्रिय थी। उन्होंने बताया कि आत्मसमर्पण के बाद सरकार की नीति के अनुसार उसके पुनर्वास और कानूनी औपचारिकताओं की प्रक्रिया पूरी की जाएगी। 2001 में माओवादी संगठन से जुड़ी थी शकुंतला महतो जानकारी के अनुसार, झारग्राम जिले के बेलपहाड़ी की रहने वाली शकुंतला महतो वर्ष 2001 में माओवादी संगठन से जुड़ी थी। इसके बाद वह झारखंड, ओडिशा और पश्चिम बंगाल की सीमा से लगे कई नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में सक्रिय रही। हथियार छोड़ मुख्यधारा में लौटने की अपील आत्मसमर्पण के बाद शकुंतला महतो ने कहा कि उसने सरकार की पुनर्वास नीति और सुरक्षित भविष्य की उम्मीद में हिंसा का रास्ता छोड़ा है। उन्होंने अन्य माओवादियों से भी अपील की कि वे मुख्यधारा में लौट आएं और विकास की प्रक्रिया में शामिल हों। शकुंतला महतो ने कहा, “जो लोग अभी भी संगठन में हैं, वे हिंसा छोड़कर समाज में वापस आएं। सरकार पुनर्वास और बेहतर जीवन के अवसर दे रही है।” नक्सली नेटवर्क में महत्वपूर्ण भूमिका का दावा पुलिस अधिकारियों के अनुसार, शकुंतला महतो माओवादी संगठन के भीतर कई गतिविधियों और रणनीतिक योजनाओं में शामिल रही थी। उसे झारखंड और पश्चिम बंगाल के कई नक्सल गढ़ों में सक्रिय नेटवर्क का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता था। बेलपहाड़ी, घाटशिला और सारंडा में रही सक्रिय अधिकारियों ने बताया कि वह बेलपहाड़ी, दलमा, घाटशिला, पारसनाथ, बुंडू-तमाड़ और सारंडा जैसे नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में सक्रिय रही। पिछले कुछ वर्षों में सुरक्षा बलों की कार्रवाई के चलते कई माओवादी या तो मारे गए, गिरफ्तार हुए या आत्मसमर्पण करने को मजबूर हुए हैं। नक्सल आंदोलन पर प्रभाव, सरेंडर बढ़ने के संकेत पुलिस का मानना है कि लगातार हो रहे सरेंडर और गिरफ्तारियों से नक्सली नेटवर्क कमजोर हो रहा है। अधिकारियों ने उम्मीद जताई कि आने वाले समय में और भी माओवादी हिंसा का रास्ता छोड़कर मुख्यधारा में लौट सकते हैं।