तिरुवनंतपुरम, 4 मई: केरल विधानसभा चुनाव 2026 की मतगणना सोमवार सुबह शुरू होते ही राजनीतिक तस्वीर साफ होने लगी है। शुरुआती रुझानों में United Democratic Front (UDF) बढ़त बनाता नजर आ रहा है, जिससे Indian National Congress (कांग्रेस) खेमे में उत्साह है।
अब तक सामने आए शुरुआती रुझानों के अनुसार:
ये आंकड़े फिलहाल डाक मतपत्रों की गिनती पर आधारित हैं, जो कुल वोटों का लगभग 1.36% है।
कांग्रेस सांसद Shashi Tharoor ने कहा कि मतगणना के शुरुआती डेढ़ घंटे में ही रुझान स्पष्ट रूप से UDF के पक्ष में दिख रहे हैं। उन्होंने बताया कि LDF के कई मजबूत और लोकप्रिय नेता भी पीछे चल रहे हैं, जो राज्य में बदलाव के संकेत दे रहे हैं।
थरूर ने कहा, “केरल की जनता बधाई की हकदार है, क्योंकि उसने बदलाव का मन बना लिया है।” हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि अंतिम नतीजों से पहले कोई जश्न नहीं मनाया जाएगा।
Shashi Tharoor ने जोर देते हुए कहा कि सबसे जरूरी है कि राज्य में सरकार बदले और नीतियों में सुधार हो।
उन्होंने कहा कि:
शुरुआती रुझानों से यह संकेत मिल रहा है कि इस बार केरल में सत्ता परिवर्तन की संभावना बन रही है। हालांकि, अंतिम नतीजों के लिए अभी इंतजार करना होगा, क्योंकि आगे की गिनती में तस्वीर बदल भी सकती है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
कोलकाता, एजेंसियां। सुवेंदु अधिकारी शनिवार को पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी के पहले मुख्यमंत्री बन गए हैं। सुवेंदु ने बांग्ला में ईश्वर के नाम की शपथ ली। शपथ के बाद सुवेंदु, पीएम के पास गए और उन्हें झुककर प्रणाम किया। बंगाल के गवर्नर आरएन रवि ने सुवेंदु के अलावा 5 और विधायकों को मंत्री पद की शपथ दिलाई। इनमें दिलीप घोष, अग्निमित्रा पॉल, अशोक कीर्तनिया, खुदीराम टूडू और निषिथ प्रमाणिक शामिल रहे। दिग्गज हस्तियां मौजूद रहीं शपथ समारोह मे शपथ समारोह में PM मोदी, गृहमंत्री अमित शाह, NDA और BJP शासित राज्यों के 20 मुख्यमंत्री और मिथुन चक्रवर्ती मौजूद रहे। कार्यक्रम में सबसे पहले मोदी ने मंच पर रवींद्रनाथ टैगोर को उनकी जयंती पर श्रद्धाजंलि दी। इस दौरान पीएम ने भाजपा के 98 साल के कार्यकर्ता माखनलाल सरकार का सम्मान किया। मंच पर आते ही प्रधानमंत्री सीधे सरकार के पास गए, उन्हें शॉल ओढ़ाया और फिर उनके पैर छुए। जानिए शपथ लेने वाले मंत्रियों को 1. दिलीप घोष: खड़गपुर सदर सीट से दूसरी बार विधायक बन हैं। मेदिनीपुर लोकसभा सीट से सांसद चुने गए थे। वे BJP के महासचिव और प्रदेशाध्यक्ष भी रहे। उन्होंने इंजीनियरिंग में डिप्लोमा किया है। 2. अग्निमित्रा पॉल: अग्निमित्रा पॉल पश्चिम बंगाल की असनसोल दक्षिण विधानसभा सीट से BJP विधायक हैं। वे 2021 में पहली बार इस सीट से विधायक चुनी गई थीं। 2026 में दूसरी बार जीत दर्ज की। उन्होंने 2022 का आसनसोल लोकसभा उपचुनाव और 2024 का मेदिनीपुर लोकसभा चुनाव भी लड़ा, लेकिन दोनों चुनाव हार गईं। 3. अशोक कीर्तनिया: 52 साल के अशोक बनगांव उत्तर सीट से विधायक हैं। मतुआ समुदाय से आते हैं। राजनीतिज्ञ और व्यवसायी हैं। 4.खुदीराम टूडू: खुदीराम रानीबांध (ST) विधानसभा सीट से BJP विधायक हैं। वे पेशे से शिक्षक रहे हैं। 2026 विधानसभा चुनाव में उन्होंने TMC उम्मीदवार तनुश्री हांसदा को हराकर जीत दर्ज की। खुदीराम टुडू ग्रेजुएट हैं और लंबे समय से आदिवासी इलाकों में संगठन के साथ सक्रिय रहे हैं। 5. निषिथ प्रमाणिक: निषिथ मथाभांगा विधानसभा सीट से विधायक हैं। वे 2026 में पहली बार विधायक बने हैं। इससे पहले 2019 में कूचबिहार लोकसभा सीट से सांसद रहे। केंद्र में गृह राज्य मंत्री व युवा मामलों और खेल मंत्रालय में राज्य मंत्री रह चुके हैं। हालांकि 2024 लोकसभा चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा था।
Amit Shah on Mamata Banerjee Bhabanipur Loss: पश्चिम बंगाल की राजनीति में भवानीपुर सीट पर ममता बनर्जी की हार के बाद बयानबाजी तेज हो गई है. भाजपा विधायक दल की बैठक के बाद केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने तृणमूल कांग्रेस सुप्रीमो ममता बनर्जी पर तीखा हमला बोला. उन्होंने कहा कि इस बार शुभेंदु अधिकारी ने ममता बनर्जी को उनके ही घर में घुसकर हराया है. “नंदीग्राम में गई थीं चुनौती देने, अब भवानीपुर में मिली हार” कोलकाता में भाजपा नेताओं और विधायकों को संबोधित करते हुए अमित शाह ने ममता बनर्जी के पुराने बयान का जिक्र किया. शाह ने कहा कि 2021 में ममता बनर्जी खुद शुभेंदु अधिकारी के गढ़ नंदीग्राम में चुनाव लड़ने गई थीं और इसे अपनी राजनीतिक ताकत बताया था. उन्होंने तंज कसते हुए कहा, “दीदी कहती थीं कि वह शुभेंदु के गढ़ में जाकर लड़ रही हैं. लेकिन इस बार शुभेंदु दा ने उनके अपने घर भवानीपुर में जाकर उन्हें हरा दिया.” सोशल मीडिया पर वायरल हुआ बयान अमित शाह का यह बयान सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है. भाजपा समर्थक इसे बंगाल की राजनीति में बड़े बदलाव का संकेत बता रहे हैं, जबकि टीएमसी समर्थकों ने शाह के बयान को राजनीतिक उकसावे वाला करार दिया है. भवानीपुर में कैसे बदला चुनावी समीकरण? भवानीपुर सीट को लंबे समय से ममता बनर्जी का सबसे सुरक्षित गढ़ माना जाता रहा है. लेकिन 2026 विधानसभा चुनाव में भाजपा उम्मीदवार शुभेंदु अधिकारी ने यहां बड़ा उलटफेर करते हुए ममता बनर्जी को 15 हजार से ज्यादा वोटों से हराया. मतगणना के शुरुआती राउंड में ममता बढ़त बनाए हुए थीं, लेकिन बाद के चरणों में शुभेंदु अधिकारी लगातार आगे निकलते गए और अंत में निर्णायक जीत दर्ज की. “भ्रष्टाचार और परिवारवाद से तंग आ चुकी है जनता” अमित शाह ने दावा किया कि भवानीपुर की जनता ने भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद और तुष्टिकरण की राजनीति के खिलाफ वोट दिया है. उन्होंने कहा कि बंगाल में भाजपा की जीत सिर्फ सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि राजनीतिक संस्कृति में बदलाव का संकेत है. “शेरनी से भीगी बिल्ली” वाले बयान पर बढ़ा विवाद अपने भाषण में शाह ने ममता बनर्जी पर व्यक्तिगत तंज कसते हुए कहा कि जो नेता खुद को बंगाल की “शेरनी” बताती थीं, अब हार के बाद “भीगी बिल्ली” बन गई हैं. इस बयान के बाद राजनीतिक विवाद और गहरा गया है. टीएमसी नेताओं ने शाह की भाषा पर सवाल उठाए हैं, जबकि भाजपा इसे चुनावी जवाब बता रही है.
Tamil Nadu Govt Formation : तमिलनाडु में सरकार गठन को लेकर सियासी हलचल तेज हो गई है. एएमएमके (AMMK) ने विजय की पार्टी टीवीके (TVK) के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज कराई है. आरोप है कि टीवीके ने फर्जी समर्थन पत्र का इस्तेमाल कर यह दिखाने की कोशिश की कि एएमएमके उनकी सरकार को समर्थन दे रही है. इस विवाद ने राज्य की राजनीति को और गर्मा दिया है. पूरा मामला एएमएमके के इकलौते विधायक कामराज एस के समर्थन को लेकर खड़ा हुआ है. एएमएमके प्रमुख टीटीवी दिनाकरन ने आरोप लगाया कि टीवीके ने विधायक कामराज के समर्थन पत्र की “फर्जी कॉपी” राज्यपाल को सौंपी है. उन्होंने इसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया के खिलाफ बताते हुए कड़ी आपत्ति जताई और पुलिस में शिकायत दर्ज कराने की चेतावनी दी थी. अब इस मामले में औपचारिक शिकायत भी दर्ज करा दी गई है. TVK ने वीडियो जारी कर दिया जवाब विवाद बढ़ने के बाद टीवीके ने 8 मई की शाम एक वीडियो जारी किया. इस वीडियो में कथित तौर पर विधायक कामराज खुद टीवीके के समर्थन में चिट्ठी लिखते दिखाई दे रहे हैं. वीडियो में वह यह कहते भी नजर आते हैं कि उन्होंने एएमएमके नेतृत्व की जानकारी और मंजूरी के साथ टीवीके को समर्थन दिया है. टीवीके नेताओं ने इस वीडियो को सोशल मीडिया पर तेजी से शेयर करते हुए दावा किया कि दिनाकरन के आरोप पूरी तरह निराधार हैं. पार्टी का कहना है कि समर्थन पत्र पूरी तरह वैध है और इसे लेकर फैलाए जा रहे आरोप राजनीतिक साजिश का हिस्सा हैं. सरकार बनाने के लिए राज्यपाल से मिले विजय तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी टीवीके के अध्यक्ष चंद्रशेखर जोसफ विजय ने वामपंथी दलों के समर्थन के बाद राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ अर्लेकर से मुलाकात की. विजय ने सरकार बनाने का दावा पेश करते हुए राज्यपाल से सरकार गठन का न्योता देने की मांग की. बताया जा रहा है कि यह राज्यपाल के साथ विजय की तीसरी मुलाकात थी. हालांकि बहुमत के आंकड़े को लेकर अब भी सस्पेंस बना हुआ है और हर विधायक का समर्थन बेहद अहम माना जा रहा है. समर्थन पत्र विवाद से बढ़ा राजनीतिक संकट समर्थन पत्र को लेकर शुरू हुआ यह विवाद अब कानूनी और संवैधानिक मुद्दा बनता जा रहा है. एक ओर एएमएमके टीवीके पर फर्जीवाड़े का आरोप लगा रही है, वहीं टीवीके वीडियो जारी कर खुद को सही साबित करने में जुटी है. अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि पुलिस जांच में क्या सच सामने आता है और राज्यपाल किस दल को सरकार बनाने का मौका देते हैं. आने वाले दिनों में तमिलनाडु की राजनीति में यह मामला और बड़ा रूप ले सकता है.