दिल्ली में छात्रों के मुद्दे और कथित नीट धांधली को लेकर विपक्ष के प्रदर्शन के दौरान कांग्रेस नेता राहुल गांधी, प्रियंका गांधी वाड्रा और समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव समेत कई सांसदों को पुलिस ने हिरासत में लिया। प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) और प्रधानमंत्री आवास की ओर मार्च कर रहे विपक्षी नेताओं को पुलिस ने रास्ते में रोक दिया, जिसके बाद प्रदर्शन स्थल पर धक्का-मुक्की और नारेबाजी का माहौल बन गया। PM आवास के बाहर धरने पर बैठे विपक्षी नेता राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों के 30 से अधिक सांसद प्रधानमंत्री आवास के बाहर सड़क पर बैठ गए। उनके साथ प्रियंका गांधी, अखिलेश यादव और कई अन्य नेता भी मौजूद थे। प्रदर्शनकारियों ने छात्रों के साथ हुई पुलिस कार्रवाई की निष्पक्ष जांच और जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की। पुलिस से धक्का-मुक्की, राहुल के चेहरे पर चोट प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने नेताओं को हटाने के लिए सुरक्षा घेरा बनाया। इस दौरान राहुल गांधी और पुलिसकर्मियों के बीच धक्का-मुक्की हुई। घटनास्थल की तस्वीरों में राहुल गांधी के चेहरे पर चोट के निशान भी दिखाई दिए। पुलिस ने उन्हें हिरासत में लेकर बस के जरिए वहां से हटाया। प्रियंका गांधी को अलग ले गई पुलिस महिला पुलिसकर्मियों ने प्रियंका गांधी वाड्रा को भी हिरासत में लिया। उन्हें राहुल गांधी से अलग मंदिर मार्ग पुलिस स्टेशन ले जाया गया। प्रियंका गांधी ने हिरासत के दौरान पुलिस कार्रवाई का विरोध किया। विपक्ष की क्या थी मांग? विपक्षी दलों की मांग थी कि: संसद में नीट परीक्षा में कथित धांधली पर चर्चा कराई जाए। 20 जुलाई को संसद मार्च कर रहे छात्रों पर हुए लाठीचार्ज और पुलिस कार्रवाई की जांच हो। छात्रों के खिलाफ कार्रवाई करने वाले अधिकारियों पर सख्त कदम उठाए जाएं। हिरासत के बाद क्या है नियम? संसदीय परंपराओं के अनुसार, यदि किसी सांसद को हिरासत में लिया जाता है या गिरफ्तार किया जाता है, तो संबंधित एजेंसी को इसकी सूचना लोकसभा अध्यक्ष को देना आवश्यक होता है। प्रियंका गांधी का सरकार पर हमला रिहा होने के बाद प्रियंका गांधी ने केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि छात्रों की आवाज दबाने के लिए पुलिस का इस्तेमाल लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है। उन्होंने कहा कि छात्रों के साथ किया गया व्यवहार पूरी तरह अनुचित और अस्वीकार्य है। देर रात हुई रिहाई राहुल गांधी को हिरासत में लेने के बाद उत्तर दिल्ली स्थित छत्रसाल स्टेडियम, जिसे अस्थायी हिरासत केंद्र बनाया गया था, ले जाया गया। करीब तीन घंटे बाद रात लगभग 10 बजे उन्हें रिहा कर दिया गया। वहीं, प्रियंका गांधी को मंदिर मार्ग थाने में रखा गया, जहां उनसे मिलने सोनिया गांधी भी पहुंचीं। इसके बाद रात करीब 9:45 बजे प्रियंका गांधी को भी रिहा कर दिया गया। क्या सांसदों को गिरफ्तारी से छूट मिलती है? सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता और विधि विशेषज्ञों के अनुसार, यदि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए आवश्यक हो, तो पुलिस किसी भी व्यक्ति को हिरासत में ले सकती है। सांसद होने के कारण किसी व्यक्ति को गिरफ्तारी या हिरासत से स्वतः छूट नहीं मिलती। छात्रों के मुद्दे पर हुए इस प्रदर्शन के बाद राजधानी दिल्ली का राजनीतिक माहौल और गरमा गया है। विपक्ष ने सरकार पर छात्रों की आवाज दबाने का आरोप लगाया है, जबकि पुलिस का कहना है कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए आवश्यक कार्रवाई की गई।
अयोध्या, एजेंसियां। राम मंदिर में चढ़ावा चोरी के मामले में जांच तेज होने के बीच श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष गोविंद देव गिरी का एक वीडियो चर्चा में है। एबीपी न्यूज से बातचीत के दौरान जिम्मेदारी से जुड़े सवाल पूछे जाने पर वह नाराज हो गए। इस दौरान उनके समर्थकों और सुरक्षाकर्मियों ने पत्रकार का माइक हटाने और इंटरव्यू रोकने की भी कोशिश की। हालांकि बाद में स्थिति सामान्य होने पर कोषाध्यक्ष ने सवालों का जवाब दिया। जिम्मेदारी स्वीकार की, लेकिन गिनती से किया किनारा संवाददाता ने जब गोविंद देव गिरी से पूछा कि बतौर कोषाध्यक्ष क्या इस पूरे मामले में उनकी भी जिम्मेदारी बनती है, तो उन्होंने कहा कि ट्रस्ट के हर सदस्य की जिम्मेदारी होती है और उनकी भी जिम्मेदारी है। हालांकि इस्तीफे के सवाल पर उन्होंने साफ इनकार करते हुए कहा कि उनका दानपात्र (हुंडी) में होने वाली नकदी की गिनती से कोई संबंध नहीं है। उन्होंने कहा कि उनकी जिम्मेदारी केवल ट्रस्ट के खातों में आने वाले धन का लेखा-जोखा रखने तक सीमित है। चोरी मामले में अब तक दो इस्तीफे और आठ गिरफ्तारियां राम मंदिर में चढ़ावा चोरी का मामला सामने आने के बाद अब तक दो लोगों ने इस्तीफा दिया है, जबकि पुलिस आठ आरोपियों को गिरफ्तार कर चुकी है। मामले की जांच के लिए गठित विशेष जांच दल (एसआईटी) अपनी प्रारंभिक रिपोर्ट भी सौंप चुका है और जांच आगे बढ़ रही है। अखिलेश यादव की पोस्ट के बाद सामने आया था मामला यह मामला उस समय सुर्खियों में आया था जब समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया पर चढ़ावा चोरी का मुद्दा उठाया था। शुरुआत में ट्रस्ट ने आरोपों से इनकार किया था, लेकिन बाद में चोरी की पुष्टि होने पर एसआईटी जांच गठित की गई। जांच के दौरान ट्रस्ट के तत्कालीन महासचिव चंपत राय और सदस्य अनिल मिश्रा से भी पूछताछ की गई। फिलहाल पुलिस और एसआईटी पूरे मामले की जांच कर रही है।
कोलकाता: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस (TMC) की हार के बाद राज्य की राजनीति में लगातार हलचल बनी हुई है। इसी बीच समाजवादी पार्टी (सपा) की राज्यसभा सांसद Jaya Bachchan ने गुरुवार को तृणमूल कांग्रेस प्रमुख और पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री Mamata Banerjee से उनके कालीघाट स्थित आवास पर मुलाकात की। इस बैठक को विपक्षी राजनीति के लिहाज से अहम माना जा रहा है। बैठक में तृणमूल कांग्रेस के राज्यसभा सांसद Derek O'Brien भी मौजूद रहे। दोनों नेताओं के बीच हुई बातचीत के आधिकारिक विवरण सार्वजनिक नहीं किए गए हैं। क्यों महत्वपूर्ण मानी जा रही है यह मुलाकात? यह मुलाकात ऐसे समय हुई है जब हाल ही में समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता Kiranmoy Nanda ने कोलकाता दौरे के दौरान तृणमूल कांग्रेस की चुनावी हार के लिए ममता बनर्जी को जिम्मेदार ठहराया था। उन्होंने कहा था कि राज्य की जनता अब ममता बनर्जी को नहीं चाहती। नंदा के इस बयान के बाद विपक्षी गठबंधन के सहयोगी दलों के बीच रिश्तों को लेकर कई तरह की अटकलें लगाई जा रही थीं। चुनाव के बाद अखिलेश यादव भी पहुंचे थे कोलकाता पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष Akhilesh Yadav भी कोलकाता पहुंचे थे और उन्होंने ममता बनर्जी से उनके आवास पर मुलाकात की थी। उस समय इस मुलाकात को तृणमूल कांग्रेस के प्रति समर्थन और विपक्षी एकजुटता के संकेत के रूप में देखा गया था। अब जया बच्चन की मुलाकात ने एक बार फिर दोनों दलों के बीच राजनीतिक संवाद को लेकर चर्चाओं को तेज कर दिया है। राजनीतिक विश्लेषकों की राय राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि समाजवादी पार्टी के कुछ नेताओं की सार्वजनिक आलोचना के बावजूद शीर्ष नेतृत्व के स्तर पर संवाद जारी है। ऐसे में यह मुलाकात संकेत देती है कि विपक्षी दल भविष्य की राजनीतिक रणनीति और राष्ट्रीय मुद्दों पर सहयोग बनाए रखने के इच्छुक हैं। कुणाल घोष ने क्या कहा? तृणमूल कांग्रेस के नेता Kunal Ghosh ने बैठक के बाद कहा कि ममता बनर्जी और जया बच्चन के बीच लंबे समय से व्यक्तिगत और राजनीतिक संबंध हैं। उन्होंने बताया कि दोनों नेताओं के बीच राष्ट्रीय मुद्दों और मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों पर चर्चा हुई तथा राष्ट्रहित के मुद्दों पर मिलकर काम करने की प्रतिबद्धता दोहराई गई। बैठक में किसी विशेष राजनीतिक रणनीति या भविष्य के गठबंधन को लेकर दोनों दलों की ओर से कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है।
उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर सियासी हलचल तेज हो गई है। योगी सरकार में मंत्री और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (SBSP) के अध्यक्ष Om Prakash Rajbhar ने समाजवादी पार्टी (सपा) को लेकर बड़ा दावा किया है। उन्होंने कहा कि Samajwadi Party में जल्द बड़ी टूट हो सकती है और उसके कई सांसद भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) तथा एनडीए के संपर्क में हैं। राजभर ने दावा किया कि हाल के दिनों में अन्य विपक्षी दलों में हुई टूट के बाद अब सपा के भीतर भी असंतोष बढ़ रहा है और इसका असर संसद के आगामी मानसून सत्र में दिखाई दे सकता है। 'कई सांसद भाजपा के संपर्क में' एएनआई से बातचीत में ओम प्रकाश राजभर ने कहा कि पूर्वांचल के पिछड़े और दलित समुदाय से आने वाले सपा के कई सांसद पार्टी की कार्यशैली से असंतुष्ट हैं। उन्होंने दावा किया कि ये नेता भाजपा और एनडीए के साथ आने के इच्छुक हैं। राजभर ने कहा, "टीएमसी और शिवसेना (यूबीटी) के बाद अब समाजवादी पार्टी में भी बड़ी टूट देखने को मिल सकती है। कई सांसद हमारे मंत्रियों और भाजपा नेतृत्व के संपर्क में हैं।" मानसून सत्र में दिख सकता है असर सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी प्रमुख ने दावा किया कि संसद के मानसून सत्र के दौरान सपा में बिखराव सामने आ सकता है। उनके अनुसार, कई सांसद विपक्ष का साथ छोड़कर एनडीए में शामिल हो सकते हैं। उन्होंने इशारों में कहा कि सपा प्रमुख Akhilesh Yadav की कार्यशैली को लेकर पार्टी के भीतर असंतोष बढ़ रहा है, जिसके कारण कई नेता वैकल्पिक राजनीतिक रास्ते तलाश रहे हैं। अखिलेश यादव का पलटवार ओम प्रकाश राजभर के दावे पर समाजवादी पार्टी ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने इन दावों को सिरे से खारिज करते हुए राजभर पर पलटवार किया। अखिलेश यादव ने कहा, "भविष्यवाणी करने वाले पहले अपनी पार्टी की भविष्यवाणी करें। पता नहीं इस बार भाजपा उन्हें 75 सीटें दे रही है, 50 सीटें दे रही है या फिर केवल आश्वासन ही मिलेगा।" उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि ओम प्रकाश राजभर ने पहले भी भाजपा गठबंधन में ज्यादा सीटें मिलने की अफवाह फैलाकर राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश की थी। यूपी की राजनीति में बढ़ी अटकलें ओम प्रकाश राजभर के दावों की अभी तक कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है और न ही समाजवादी पार्टी के किसी सांसद ने पार्टी छोड़ने के संकेत दिए हैं। इसके बावजूद उनके बयान ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में नई अटकलों को जन्म दे दिया है। लोकसभा चुनाव के बाद विपक्षी दलों में संभावित पुनर्संरेखण और दल-बदल की चर्चाओं के बीच राजभर का यह बयान आने वाले महीनों में प्रदेश की सियासत को और गर्मा सकता है।
लखनऊ/गोरखपुर: समाजवादी पार्टी (सपा) ने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारियां तेज कर दी हैं। पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के गढ़ गोरखपुर में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को चुनौती देने का बड़ा ऐलान किया है। उन्होंने कहा कि इस बार समाजवादी पार्टी गोरखपुर में बीजेपी को शून्य पर लाने के लिए पूरी ताकत से काम करेगी। गोरखपुर में कार्यकर्ता सम्मेलन की तैयारी लखनऊ में पार्टी की बैठक के दौरान अखिलेश यादव ने कहा कि जल्द ही गोरखपुर में सपा कार्यकर्ताओं का बड़ा सम्मेलन आयोजित किया जाएगा। उन्होंने बताया कि प्रदेश अध्यक्ष श्याम लाल पाल जल्द ही सम्मेलन की तारीख की घोषणा करेंगे। अखिलेश यादव ने कहा, "हमने संकल्प लिया है कि 2027 के विधानसभा चुनाव में गोरखपुर में बीजेपी को कड़ी चुनौती देंगे। जहां भी हमारी कमियां हैं, उन्हें दूर किया जाएगा और संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत किया जाएगा।" कार्यकर्ताओं के सम्मान की बात सपा प्रमुख ने कहा कि पार्टी अपने प्रत्येक कार्यकर्ता के सम्मान और उनके सुख-दुख में भागीदारी के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने कहा कि मजबूत संगठन और कार्यकर्ताओं की एकजुटता के दम पर पार्टी 2027 के चुनाव में बेहतर प्रदर्शन करेगी। शिक्षा, स्वास्थ्य और कानून-व्यवस्था पर योगी सरकार को घेरा अखिलेश यादव ने योगी सरकार के दस साल के कार्यकाल पर सवाल उठाते हुए कहा कि भाजपा सरकार ने शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं को कमजोर किया है। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रदेश में अपराध की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं और सरकार जनता से किए गए वादों को पूरा करने में असफल रही है। उन्होंने कहा, "भाजपा ने झूठे वादे करके जनता को गुमराह करने का काम किया है। प्रदेश के लोग बदलाव चाहते हैं और समाजवादी पार्टी उनकी उम्मीदों पर खरा उतरने के लिए तैयार है।" ओपी राजभर के बयान पर भी किया पलटवार सपा प्रमुख ने मंत्री ओपी राजभर के हालिया बयान पर भी तंज कसा। उन्होंने शायराना अंदाज में कहा, "दाना और गाना, कब तक चलेगा ये अफसाना।" अखिलेश यादव के इस बयान को 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले गोरखपुर समेत पूर्वांचल में सपा की आक्रामक चुनावी रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है। अब सभी की नजरें गोरखपुर में होने वाले प्रस्तावित कार्यकर्ता सम्मेलन और सपा की आगे की राजनीतिक रणनीति पर टिकी हैं।
नई दिल्ली: विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ (INDIA) की महत्वपूर्ण बैठक में एक ओर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के खिलाफ साझा रणनीति बनाने पर जोर दिया गया, वहीं दूसरी ओर गठबंधन के भीतर मौजूद कुछ पुराने मतभेद भी सामने आए। बैठक में शामिल नेताओं ने केंद्र की मोदी सरकार के खिलाफ संयुक्त रूप से संघर्ष जारी रखने की प्रतिबद्धता दोहराई, साथ ही भविष्य की राजनीतिक रणनीति और संगठनात्मक मजबूती पर भी चर्चा की। बैठक में कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने कहा कि भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) का प्रभावी मुकाबला करने के लिए विपक्षी दलों का एकजुट रहना आवश्यक है। उन्होंने नागरिक समाज के आंदोलनों से जुड़ाव बढ़ाने और गठबंधन के संगठनात्मक ढांचे को मजबूत करने पर बल दिया। कांग्रेस से ‘बड़ा दिल’ दिखाने की अपील समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने गठबंधन सहयोगियों के बीच बेहतर तालमेल की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि विभिन्न राज्यों में भाजपा के खिलाफ सबसे मजबूत विपक्षी दल को समर्थन देने के लिए कांग्रेस को उदार रवैया अपनाना चाहिए। अखिलेश ने यह भी कहा कि किसी चुनावी हार या जीत के आधार पर जल्दबाजी में राजनीतिक निष्कर्ष नहीं निकाले जाने चाहिए। 2029 के लिए अभी से तैयारी का सुझाव राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के नेता तेजस्वी यादव ने बैठक में कहा कि विपक्ष को केवल वर्तमान राजनीतिक चुनौतियों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। उन्होंने 2029 के लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए अभी से व्यापक रणनीति बनाने और लगातार जनसंपर्क अभियान चलाने की आवश्यकता बताई। नियमित समन्वय बैठकों की मांग वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से बैठक में शामिल हुए शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) प्रमुख उद्धव ठाकरे ने गठबंधन सहयोगियों के बीच नियमित बैठकों का सुझाव दिया। उन्होंने कहा कि हालिया चुनावी अनुभवों से यह स्पष्ट हुआ है कि बेहतर समन्वय विपक्ष की सबसे बड़ी आवश्यकता है। CJP अभियान पर भी हुई चर्चा बैठक के दौरान कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) अभियान का भी उल्लेख हुआ। सूत्रों के अनुसार, जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने इस अभियान के प्रति सकारात्मक रुख दिखाते हुए कहा कि यदि कोई जन-अभियान लोगों के बीच लोकप्रिय हो रहा है तो उससे संवाद किया जाना चाहिए। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद पवार गुट) की नेता सुप्रिया सुले और पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती ने इस अभियान के अचानक उभार और इसकी वैचारिक पृष्ठभूमि को लेकर सवाल उठाए। कांग्रेस की ओर से इस विषय पर कोई औपचारिक टिप्पणी नहीं की गई। DMK ने गठबंधन से दूरी बनाई बैठक से पहले द्रविड़ मुनेत्र कषगम (DMK) ने स्पष्ट कर दिया कि वह अब INDIA गठबंधन का हिस्सा नहीं है। पार्टी प्रवक्ता टीकेएस एलंगोवन ने कहा कि तमिलनाडु की बदलती राजनीतिक परिस्थितियों और कांग्रेस के साथ मतभेदों के चलते पार्टी ने यह निर्णय लिया है। उन्होंने कहा कि राज्य में पूर्व सहयोगी दल अब अलग राजनीतिक व्यवस्था का हिस्सा हैं, ऐसे में DMK स्वतंत्र रूप से अपनी राजनीतिक दिशा तय करेगी। उन्होंने भविष्य में किसी व्यापक धर्मनिरपेक्ष और भाजपा-विरोधी मंच की संभावना से इनकार नहीं किया। आम आदमी पार्टी ने भी दोहराई दूरी आम आदमी पार्टी (AAP) ने भी एक बार फिर स्पष्ट किया कि वह INDIA गठबंधन का हिस्सा नहीं है। राज्यसभा सांसद संजय सिंह ने कहा कि पार्टी पहले ही गठबंधन से अलग होने का निर्णय सार्वजनिक कर चुकी है। AAP की मुख्य प्रवक्ता प्रियंका कक्कड़ ने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि पार्टी का प्राथमिक उद्देश्य राष्ट्रीय हितों की बजाय अपने राजनीतिक हितों को आगे बढ़ाना रहा है। उन्होंने कांग्रेस के साथ भविष्य में किसी संभावित गठबंधन की संभावना को भी खारिज कर दिया। केरल को लेकर कांग्रेस-वाम दलों में तकरार बैठक में वाम दलों ने केरल विधानसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस नेताओं द्वारा लगाए गए आरोपों पर नाराजगी व्यक्त की। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) के महासचिव डी. राजा ने कहा कि राष्ट्रीय स्तर पर सहयोगी होने के बावजूद वाम दलों पर सार्वजनिक हमले उचित नहीं थे। सूत्रों के अनुसार, राहुल गांधी ने इस मुद्दे पर सफाई देते हुए कहा कि केरल में उठाए गए विषय राज्य कांग्रेस की चुनावी रणनीति का हिस्सा थे। बैठक में मौजूद कई नेताओं ने सुझाव दिया कि पुराने विवादों को पीछे छोड़कर भाजपा के खिलाफ साझा संघर्ष पर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए। भाजपा के खिलाफ साझा संघर्ष पर जोर बैठक का समापन विपक्षी एकता और समन्वय को मजबूत करने के संदेश के साथ हुआ। नेताओं ने माना कि भाजपा के बढ़ते राजनीतिक प्रभाव का मुकाबला करने के लिए विपक्षी दलों के बीच विश्वास, संवाद और साझा रणनीति पहले से कहीं अधिक जरूरी है।
नई दिल्ली: विपक्षी गठबंधन INDIA (इंडियन नेशनल डेवलपमेंटल इंक्लूसिव अलायंस) ने केंद्र सरकार के खिलाफ साझा मोर्चा मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। सोमवार (8 जून) को नई दिल्ली के कॉन्स्टीट्यूशन क्लब में आयोजित बैठक में 23 विपक्षी दलों के नेताओं ने हिस्सा लिया और कई राष्ट्रीय मुद्दों पर सरकार को घेरने की रणनीति तैयार की। बैठक के बाद कांग्रेस अध्यक्ष Mallikarjun Kharge ने कहा कि गठबंधन पांच प्रमुख मुद्दों पर एकजुट होकर संघर्ष करेगा और इन विषयों को राष्ट्रीय स्तर पर उठाएगा। NEET और CBSE विवाद पर शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग बैठक में NEET-UG परीक्षा और CBSE की ऑन-स्क्रीन मार्किंग (OSM) प्रणाली को लेकर गंभीर चिंता जताई गई। विपक्षी दलों ने आरोप लगाया कि परीक्षा प्रक्रिया में अनियमितताओं ने लाखों छात्रों के भविष्य को प्रभावित किया है। INDIA गठबंधन ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री Dharmendra Pradhan से तत्काल इस्तीफे की मांग करते हुए कहा कि छात्रों और अभिभावकों का भरोसा बहाल करने के लिए जवाबदेही तय होना जरूरी है। मतदाता सूची और चुनावी प्रक्रिया पर उठाए सवाल बैठक में चुनावी पारदर्शिता को लेकर भी चर्चा हुई। गठबंधन के नेताओं ने मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों, विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) और चुनावी निष्पक्षता से जुड़े मुद्दों पर चिंता व्यक्त की। इस संबंध में INDIA गठबंधन ने निर्णय लिया कि वह Surya Kant को पत्र लिखकर चुनावी प्रक्रियाओं की निष्पक्षता सुनिश्चित करने की मांग करेगा। बेरोजगारी और महंगाई पर सर्वदलीय बैठक की मांग विपक्षी दलों ने केंद्र सरकार से देश की आर्थिक स्थिति, बढ़ती बेरोजगारी, महंगाई और किसानों की समस्याओं पर चर्चा के लिए तत्काल सर्वदलीय बैठक बुलाने की मांग की। गठबंधन का कहना है कि इन मुद्दों का असर सीधे आम जनता पर पड़ रहा है और इन पर व्यापक राजनीतिक संवाद की आवश्यकता है। मानसून सत्र के लिए विपक्ष की तैयारी बैठक में संसद के आगामी मानसून सत्र को लेकर भी रणनीति बनाई गई। विपक्षी दलों ने तय किया कि सत्र के दौरान समन्वय बनाए रखने के लिए प्रतिदिन नेता प्रतिपक्ष के कार्यालय में बैठक आयोजित की जाएगी। इसके अलावा गठबंधन की नियमित बैठकों का सिलसिला जारी रखने पर सहमति बनी है। निर्णय लिया गया कि INDIA गठबंधन की अगली बैठक हैदराबाद में आयोजित की जाएगी। बैठक में शामिल हुए प्रमुख नेता बैठक में कांग्रेस की ओर से Sonia Gandhi, Rahul Gandhi और मल्लिकार्जुन खरगे मौजूद रहे। इसके अलावा Mamata Banerjee, Akhilesh Yadav, Tejashwi Yadav, Supriya Sule और Uddhav Thackeray समेत कई वरिष्ठ नेता शामिल हुए। वहीं Omar Abdullah, Mehbooba Mufti, D Raja और Dipankar Bhattacharya ने भी बैठक में भाग लिया। DMK और AAP ने बनाई दूरी बैठक में Dravida Munnetra Kazhagam और Aam Aadmi Party शामिल नहीं हुईं। AAP पहले ही सार्वजनिक रूप से INDIA गठबंधन से दूरी बना चुकी है, जबकि DMK ने राजनीतिक कारणों का हवाला देते हुए बैठक में शामिल नहीं होने का फैसला किया था। भाजपा के बढ़ते प्रभाव के खिलाफ विपक्षी एकता पर जोर बैठक के दौरान नेताओं ने देश में भाजपा के बढ़ते राजनीतिक प्रभाव और विपक्षी दलों के सामने मौजूद चुनौतियों पर भी चर्चा की। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने सभी सहयोगी दलों से एकजुटता बनाए रखने और केंद्र सरकार की नीतियों के खिलाफ साझा संघर्ष जारी रखने की अपील की। गठबंधन नेताओं का मानना है कि आगामी राजनीतिक और संसदीय चुनौतियों का सामना करने के लिए विपक्षी एकता को और मजबूत करना समय की आवश्यकता है।
नई दिल्ली: विपक्षी दलों के गठबंधन INDIA (इंडियन नेशनल डेवलपमेंटल इन्क्लूसिव अलायंस) की सोमवार को राजधानी दिल्ली में अहम बैठक होने जा रही है। लोकसभा चुनाव के बाद यह गठबंधन की पहली बड़ी बैठक होगी, जिसमें 23 राजनीतिक दलों के शामिल होने की पुष्टि की गई है। बैठक का मुख्य उद्देश्य केंद्र की मोदी सरकार के खिलाफ साझा रणनीति तैयार करना और आगामी चुनावों के लिए विपक्षी एकजुटता को मजबूत करना बताया जा रहा है। बैठक नई दिल्ली के कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में आयोजित होगी। कांग्रेस महासचिव Jairam Ramesh ने कहा कि विचारधारात्मक और क्षेत्रीय विविधताओं के बावजूद गठबंधन पूरी तरह एकजुट है और सभी दल साझा राजनीतिक उद्देश्यों के साथ बैठक में भाग ले रहे हैं। कई दिग्गज नेताओं के शामिल होने की संभावना बैठक में कांग्रेस नेता Rahul Gandhi और Mallikarjun Kharge, तृणमूल कांग्रेस प्रमुख Mamata Banerjee, Abhishek Banerjee, समाजवादी पार्टी अध्यक्ष Akhilesh Yadav, राजद नेता Tejashwi Yadav तथा शिवसेना (यूबीटी) प्रमुख Uddhav Thackeray समेत कई वरिष्ठ नेताओं के शामिल होने की संभावना है। साझा रणनीति और चुनावी तैयारियों पर फोकस सूत्रों के मुताबिक बैठक में आगामी विधानसभा चुनावों और 2029 लोकसभा चुनाव की तैयारियों को लेकर चर्चा होगी। विपक्षी दल भाजपा और केंद्र सरकार के खिलाफ साझा राजनीतिक एजेंडा तैयार करने की कोशिश कर सकते हैं। बैठक में महंगाई, बेरोजगारी, परीक्षा और भर्ती प्रक्रियाओं से जुड़े मुद्दों सहित कई राष्ट्रीय विषयों को लेकर संयुक्त अभियान चलाने पर भी विचार हो सकता है। गठबंधन के भीतर मतभेद भी रहेंगे चर्चा में बैठक में विपक्षी दलों के बीच हाल के दिनों में उभरे मतभेदों पर भी चर्चा होने की संभावना है। विशेष रूप से कांग्रेस और वाम दलों के बीच कुछ राज्यों में चुनावी रणनीति को लेकर सामने आए विवादों पर बातचीत हो सकती है। सूत्रों का कहना है कि सहयोगी दल चाहते हैं कि गठबंधन के भीतर संवाद बढ़े और सार्वजनिक स्तर पर होने वाले आरोप-प्रत्यारोप से बचा जाए। कुछ प्रमुख दल रह सकते हैं दूर रिपोर्टों के अनुसार, कुछ सहयोगी दल इस बैठक में शामिल नहीं हो सकते। कांग्रेस का कहना है कि जो दल बैठक में मौजूद नहीं रहेंगे, वे भी गठबंधन के व्यापक राजनीतिक उद्देश्यों के समर्थन में बने हुए हैं। बीजेपी ने उठाए विपक्षी एकता पर सवाल बैठक से पहले भाजपा ने INDIA गठबंधन की एकजुटता पर सवाल खड़े किए हैं। भाजपा नेताओं का कहना है कि विपक्षी गठबंधन के भीतर कई मुद्दों पर मतभेद मौजूद हैं और साझा नेतृत्व को लेकर भी स्पष्टता नहीं है। विपक्षी दलों का दावा है कि लोकतांत्रिक मूल्यों और संवैधानिक मुद्दों पर वे एकजुट हैं तथा बैठक का उद्देश्य इसी एकता को और मजबूत करना है। लोकसभा चुनाव के बाद पहली बड़ी राजनीतिक बैठक INDIA गठबंधन की पिछली प्रमुख बैठक लोकसभा चुनाव 2024 के अंतिम चरण के मतदान से पहले हुई थी। इसके बाद पहली बार इतने बड़े स्तर पर विपक्षी दल एक मंच पर जुट रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों की नजर इस बैठक पर टिकी हुई है, क्योंकि इससे आने वाले वर्षों में विपक्ष की रणनीति और दिशा का संकेत मिल सकता है।
पश्चिम बंगाल की राजनीति में बड़ा उलटफेर देखने को मिला है। 2026 विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद Mamata Banerjee अब विपक्षी INDIA गठबंधन को फिर से सक्रिय करने की कोशिश में जुट गई हैं। खबर है कि तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ने विपक्षी दलों की एक अहम बैठक बुलाने की पहल की है, जिससे राष्ट्रीय राजनीति में नई हलचल शुरू हो गई है। भवानीपुर में हार ने बढ़ाई मुश्किल करीब 15 साल तक West Bengal की सत्ता पर काबिज रहीं ममता बनर्जी इस बार न सिर्फ सरकार गंवा बैठीं, बल्कि अपने पारंपरिक गढ़ भवानीपुर सीट से भी चुनाव हार गईं। उन्हें बीजेपी नेता Suvendu Adhikari ने मात दी। 2021 में 215 सीटें जीतने वाली टीएमसी 2026 में महज 80 सीटों तक सिमट गई। राजनीतिक जानकार मानते हैं कि इस हार के बाद ममता अब राष्ट्रीय स्तर पर अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए विपक्षी दलों से रिश्ते सुधारना चाहती हैं। कांग्रेस ने क्या कहा? पश्चिम बंगाल प्रदेश कांग्रेस के महासचिव Ashutosh Chatterjee ने कहा कि INDIA गठबंधन को लेकर कोई भी अंतिम फैसला All India Congress Committee यानी AICC लेगी। उन्होंने साफ कहा कि प्रदेश स्तर पर निर्णय कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष शुभंकर सरकार की राय से होगा। हालांकि उन्होंने ममता बनर्जी पर तीखा हमला भी बोला। चटर्जी ने आरोप लगाया कि टीएमसी शासन के दौरान कांग्रेस कार्यकर्ताओं की हत्या हुई, उन्हें झूठे मामलों में फंसाया गया और पंचायत चुनावों में हिंसा हुई। उन्होंने कहा कि विपक्षी एकता की बात करने से पहले ममता बनर्जी को इन सवालों का जवाब देना होगा। INDIA गठबंधन में बढ़ी उलझन ममता बनर्जी की बैठक की अपील के बावजूद गठबंधन के भीतर तालमेल की कमी साफ दिखाई दे रही है। कांग्रेस और Samajwadi Party दोनों ने फिलहाल इस बैठक की जानकारी से इनकार किया है। सूत्रों के मुताबिक, अगर ममता सीधे Akhilesh Yadav से बात करती हैं, तभी जून में बैठक संभव हो सकती है। उधर, चुनाव के दौरान Rahul Gandhi ने ममता पर तीखे हमले किए थे, लेकिन हार के बाद उन्होंने चुनाव नतीजों को बीजेपी और चुनाव आयोग की “वोट चोरी” से जोड़ते हुए ममता के प्रति नरम रुख दिखाया। DMK की नाराजगी ने बढ़ाई टेंशन INDIA गठबंधन के सामने सिर्फ बंगाल की चुनौती नहीं है। दक्षिण भारत से भी गठबंधन के लिए परेशान करने वाली खबर आई है। तमिलनाडु में Dravida Munnetra Kazhagam यानी DMK कांग्रेस से नाराज बताई जा रही है। वजह यह है कि कांग्रेस ने अभिनेता विजय की पार्टी Tamilaga Vettri Kazhagam को समर्थन दिया है। इसके बाद DMK ने संसद में कांग्रेस से अलग बैठने की मांग तक कर दी है। अब सवाल उठ रहा है कि क्या DMK आगे भी INDIA गठबंधन का हिस्सा बनी रहेगी? बीजेपी का डर या विपक्षी मजबूरी? राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विपक्षी दलों के बीच भले ही मतभेद बढ़ रहे हों, लेकिन बीजेपी के खिलाफ एकजुट रहने की मजबूरी उन्हें साथ बनाए हुए है। ममता बनर्जी भी इसी रणनीति पर आगे बढ़ती दिख रही हैं। बंगाल में सत्ता गंवाने के बाद अब उनके लिए संसद और राष्ट्रीय राजनीति में मजबूत उपस्थिति बनाए रखना बड़ी चुनौती बन गया है। ऐसे में कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों का समर्थन उनके लिए बेहद अहम माना जा रहा है।
लखनऊ में नम आंखों से दी गई अंतिम विदाई Prateek Yadav की अंतिम यात्रा गुरुवार को लखनऊ में भारी भीड़ और गमगीन माहौल के बीच निकाली गई। पूर्व मुख्यमंत्री Mulayam Singh Yadav के छोटे बेटे प्रतीक यादव के पार्थिव शरीर को बैकुंठधाम श्मशान घाट के लिए रवाना किया गया। अंतिम यात्रा में हजारों समर्थक, समाजवादी पार्टी कार्यकर्ता और कई बड़े राजनीतिक नेता शामिल हुए। शव वाहन पर लगी थी पेट्स के साथ तस्वीर प्रतीक यादव की अंतिम यात्रा के दौरान शव वाहन को फूलों से सजाया गया था। वाहन पर उनके पालतू जानवरों के साथ की तस्वीर भी लगाई गई थी, जिसने लोगों को भावुक कर दिया। अंतिम दर्शन के लिए बड़ी संख्या में लोग सुबह से ही उनके आवास पर जुटे रहे। कई नेताओं ने दी श्रद्धांजलि Dimple Yadav ने प्रतीक यादव को अंतिम श्रद्धांजलि दी। वहीं उत्तर प्रदेश के डिप्टी सीएम Keshav Prasad Maurya, मंत्री Om Prakash Rajbhar और भाजपा नेता प्रदीप सिंह समेत कई नेताओं ने अपर्णा यादव के आवास पहुंचकर शोक व्यक्त किया। बुधवार को मुख्यमंत्री Yogi Adityanath भी अपर्णा यादव के घर पहुंचे थे और परिवार को सांत्वना दी थी। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में सामने आई ये बात जानकारी के अनुसार, प्रतीक यादव का बुधवार सुबह निधन हुआ था। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में फेफड़ों की नसों में खून का थक्का जमने यानी पल्मोनरी एम्बोलिज्म के कारण कार्डियक अरेस्ट से मौत होने की बात सामने आई है। रिपोर्ट में शरीर और सिर पर कुछ चोटों के निशान भी मिलने की जानकारी दी गई है। इनमें कुछ चोटें पुरानी बताई जा रही हैं, जबकि कुछ हाल की थीं। आगे की जांच के लिए विसरा और अन्य नमूनों को सुरक्षित रखा गया है। राजनीति से दूर रखते थे खुद को प्रतीक यादव ने ब्रिटेन की Leeds University से पढ़ाई की थी। यादव परिवार से जुड़े होने के बावजूद उन्होंने राजनीति से दूरी बनाए रखी। वे रियल एस्टेट और फिटनेस बिजनेस से जुड़े थे और लग्जरी कारों के शौकीन माने जाते थे। उनके निधन के बाद समाजवादी पार्टी समर्थकों और यादव परिवार में शोक की लहर है।
उत्तर प्रदेश की राजनीति से जुड़ी एक बड़ी खबर सामने आई है। समाजवादी पार्टी के संस्थापक Mulayam Singh Yadav के छोटे बेटे और Akhilesh Yadav के सौतेले भाई Prateek Yadav का बुधवार को निधन हो गया। वह 38 वर्ष के थे। परिवार और राजनीतिक गलियारों में उनके निधन की खबर से शोक की लहर फैल गई है। प्रतीक यादव भारतीय जनता पार्टी से जुड़ी नेता Aparna Yadav के पति थे। सूत्रों के अनुसार, बुधवार सुबह उन्हें लखनऊ के सिविल अस्पताल ले जाया गया था, लेकिन डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। कुछ समय से चल रहे थे बीमार परिवार के करीबी सूत्रों के मुताबिक, प्रतीक यादव पिछले कुछ समय से स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से जूझ रहे थे। कुछ सप्ताह पहले उन्हें लखनऊ के एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया था। उस दौरान अखिलेश यादव भी उनसे मिलने पहुंचे थे। तबीयत में हल्का सुधार होने के बाद उन्हें घर वापस लाया गया था। अस्पताल अधिकारियों ने बताया कि जब उन्हें अस्पताल लाया गया, तब उनके शरीर में कोई हलचल नहीं थी। डॉक्टरों ने जांच के बाद उन्हें मृत घोषित कर दिया। कड़ी सुरक्षा के बीच हुआ पोस्टमार्टम निधन के बाद प्रतीक यादव के शव को पोस्टमार्टम के लिए King George's Medical University भेजा गया। यहां डॉक्टरों के पैनल ने कड़ी सुरक्षा और वीडियोग्राफी के बीच पोस्टमार्टम किया। पोस्टमार्टम हाउस के बाहर भारी संख्या में पुलिस बल तैनात किया गया था। इस दौरान परिवार के सदस्य और करीबी लोग भी वहां मौजूद रहे। अखिलेश यादव ने याद किया आखिरी मुलाकात अखिलेश यादव पोस्टमार्टम सेंटर पहुंचे और डॉक्टरों से बातचीत की। मीडिया से बात करते हुए उन्होंने प्रतीक यादव को “बहुत अच्छा इंसान” बताया। उन्होंने कहा कि प्रतीक अपने स्वास्थ्य और कारोबार को लेकर काफी सजग रहते थे। अखिलेश यादव ने बताया कि करीब दो महीने पहले उनकी प्रतीक से मुलाकात हुई थी, जिसमें उन्होंने उन्हें कारोबार पर ध्यान देने की सलाह दी थी। उन्होंने यह भी कहा कि व्यापार में नुकसान और मानसिक दबाव किसी व्यक्ति को अंदर से प्रभावित कर सकता है। राजनीति से दूर, बिजनेस और फिटनेस में सक्रिय थे प्रतीक हालांकि प्रतीक यादव देश के बड़े राजनीतिक परिवार से ताल्लुक रखते थे, लेकिन उन्होंने सक्रिय राजनीति से दूरी बनाए रखी। उन्होंने ब्रिटेन की University of Leeds से पढ़ाई की थी और रियल एस्टेट व फिटनेस बिजनेस से जुड़े थे। लखनऊ में वह ‘The Fitness Planet’ नाम से जिम भी चलाते थे और फिटनेस इंडस्ट्री में काफी सक्रिय थे। इसके अलावा वह ‘Jeev Ashray’ नाम की संस्था से भी जुड़े थे, जो आवारा कुत्तों के इलाज, भोजन और देखभाल का काम करती थी। पत्नी अपर्णा यादव के साथ विवाद भी आया था सामने इस साल की शुरुआत में प्रतीक यादव और अपर्णा यादव के रिश्तों को लेकर भी चर्चा हुई थी। जनवरी में प्रतीक ने सोशल मीडिया पर कुछ पोस्ट कर वैवाहिक विवाद की बात कही थी और तलाक लेने की बात भी लिखी थी। हालांकि बाद में दोनों के बीच सुलह हो गई थी। प्रतीक यादव ने सोशल मीडिया पर वीडियो साझा कर कहा था कि आपसी बातचीत के बाद विवाद खत्म हो गया है। इसके बाद उन्होंने परिवार के साथ छुट्टियों की तस्वीरें भी साझा की थीं। नेताओं ने जताया शोक प्रतीक यादव के निधन पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री Yogi Adityanath समेत कई नेताओं ने शोक व्यक्त किया। उपमुख्यमंत्री Keshav Prasad Maurya, भाजपा प्रदेश अध्यक्ष Pankaj Chaudhary और पूर्व सांसद Brij Bhushan Sharan Singh ने भी दुख जताया।
समाजवादी पार्टी प्रमुख Akhilesh Yadav ने एक बार फिर राजनीतिक संकेतों से भरी पोस्ट कर सियासी हलचल तेज कर दी है. अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर M. K. Stalin और Mamata Banerjee के साथ अपनी तस्वीरें साझा करते हुए कांग्रेस पर इशारों में निशाना साधा. उन्होंने पोस्ट में लिखा, “हम वो नहीं जो मुश्किलों में साथ छोड़ दें.” इस एक लाइन को विपक्षी राजनीति और हाल के चुनावी घटनाक्रम से जोड़कर देखा जा रहा है. कांग्रेस के फैसले के बाद बढ़ी सियासी चर्चा अखिलेश यादव की यह पोस्ट ऐसे समय आई है जब तमिलनाडु में कांग्रेस ने चुनाव बाद डीएमके से दूरी बनाते हुए टीवीके (TVK) को समर्थन देने का फैसला किया है. कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव डीएमके के साथ मिलकर लड़ा था, लेकिन नतीजों के बाद पार्टी ने अपना रुख बदल लिया. तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में टीवीके सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है, हालांकि उसे स्पष्ट बहुमत नहीं मिला. इसके बाद सरकार गठन को लेकर लगातार राजनीतिक जोड़तोड़ जारी है. बंगाल के संदर्भ में भी बड़ा संदेश अखिलेश यादव की पोस्ट को पश्चिम बंगाल की राजनीति से भी जोड़कर देखा जा रहा है. हाल ही में पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस की हार के बाद कांग्रेस नेताओं के कुछ बयानों पर विपक्षी दलों के बीच असहजता देखी गई थी. इसी बीच लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष Rahul Gandhi ने भी कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं को नसीहत दी थी कि वे तृणमूल कांग्रेस की हार का मजाक न उड़ाएं. विपक्षी एकता पर नया संदेश? राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अखिलेश यादव की यह पोस्ट विपक्षी दलों के बीच भरोसे और साथ निभाने का संदेश देने की कोशिश है. ममता बनर्जी और स्टालिन दोनों ही INDIA गठबंधन के प्रमुख चेहरे माने जाते हैं, ऐसे में अखिलेश का यह बयान कांग्रेस की रणनीति पर अप्रत्यक्ष टिप्पणी के रूप में देखा जा रहा है. तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल के हालिया राजनीतिक घटनाक्रमों के बीच यह पोस्ट विपक्षी राजनीति में नए समीकरणों की ओर भी इशारा कर रही है.
भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष Nitin Nabin ने अपने पहले टीवी इंटरव्यू में विपक्ष पर जोरदार हमला बोला है। एबीपी न्यूज को दिए इस एक्सक्लूसिव इंटरव्यू में उन्होंने समाजवादी पार्टी के प्रमुख Akhilesh Yadav, कांग्रेस नेता Rahul Gandhi और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री Mamata Banerjee को निशाने पर लिया। उनके बयानों ने एक बार फिर राजनीतिक माहौल को गरमा दिया है। अखिलेश यादव पर ‘टोपी’ वाला तंज इंटरव्यू के दौरान जब उनसे उत्तर प्रदेश की राजनीति और समाजवादी पार्टी के प्रदर्शन पर सवाल पूछा गया, तो नितिन नवीन ने सीधे तौर पर अखिलेश यादव की राजनीतिक शैली पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा: “आजकल अखिलेश यादव ने टोपी पहनना थोड़ा कम कर दिया है” “पहले ये लोग हर जगह टोपी पहनकर जाते थे” यह बयान केवल एक प्रतीकात्मक टिप्पणी नहीं, बल्कि विपक्ष की कथित “पहचान आधारित राजनीति” पर निशाना माना जा रहा है। उन्होंने ‘पीडीए’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) जैसे नारों पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि इससे उनकी सोच और राजनीति का अंदाजा लगाया जा सकता है। ‘टोपी’ और वोट बैंक की राजनीति पर जवाब जब इंटरव्यू में उनसे पूछा गया कि क्या बीजेपी “टोपी पहनने वालों” को पसंद नहीं करती, तो उन्होंने सफाई देते हुए कहा: “हमें टोपी से कोई दिक्कत नहीं है, हमें ढोंग से दिक्कत है” “जो लोग केवल दिखावे के लिए पहचान का इस्तेमाल करते हैं, उनसे समस्या है” उन्होंने आगे यह भी कहा कि: तीन तलाक कानून के बाद बड़ी संख्या में मुस्लिम महिलाओं ने बीजेपी को समर्थन दिया इससे यह साबित होता है कि बीजेपी का समर्थन किसी एक समुदाय तक सीमित नहीं है राहुल गांधी पर भी साधा निशाना नितिन नवीन ने Rahul Gandhi और अखिलेश यादव के पुराने राजनीतिक समीकरणों का जिक्र करते हुए कहा कि: दोनों नेताओं ने पहले कई संयुक्त रैलियां और अभियान चलाए लेकिन इन अभियानों का जनता पर कोई ठोस असर नहीं पड़ा उन्होंने कहा कि केवल रैलियां और जुलूस निकालने से जनता का विश्वास नहीं जीता जा सकता। ममता बनर्जी पर गंभीर आरोप पश्चिम बंगाल की राजनीति पर बोलते हुए नितिन नवीन ने Mamata Banerjee सरकार पर तीखा हमला किया। उन्होंने आरोप लगाया कि: राज्य में अवैध घुसपैठ एक बड़ी समस्या बन चुकी है “बांग्लादेशी घुसपैठिए” भारत में आकर बस गए हैं इन लोगों को चिन्हित कर वापस भेजने (डिपोर्ट) की जरूरत है यह बयान ऐसे समय में आया है जब बंगाल में चुनावी माहौल अपने चरम पर है और सुरक्षा तथा पहचान के मुद्दे प्रमुख बने हुए हैं। चुनावी रणनीति या राजनीतिक हमला? विश्लेषकों का मानना है कि नितिन नवीन के ये बयान: सीधे तौर पर विपक्ष की सामाजिक और राजनीतिक रणनीति पर हमला हैं चुनावी माहौल को प्रभावित करने की कोशिश भी माने जा सकते हैं “टोपी” जैसे प्रतीकों पर टिप्पणी अक्सर संवेदनशील मानी जाती है, क्योंकि यह पहचान और समुदाय से जुड़े मुद्दों को छूती है। क्या हो सकता है राजनीतिक असर? इस बयान के बाद: समाजवादी पार्टी और अन्य विपक्षी दल पलटवार कर सकते हैं मुद्दा चुनावी सभाओं और मीडिया बहस का केंद्र बन सकता है
नई दिल्ली: Amit Shah ने संसद में परिसीमन को लेकर उठ रही आशंकाओं पर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने साफ कहा कि नए परिसीमन के बाद दक्षिण भारत के राज्यों का प्रतिनिधित्व कम नहीं होगा, बल्कि इसमें बढ़ोतरी होगी। शाह ने विपक्ष के दावों को “भ्रम फैलाने वाला” बताते हुए लोकसभा में पांच बिंदुओं के जरिए अपनी बात रखी। 5 पॉइंट्स में समझाया - कैसे बढ़ेगा प्रतिनिधित्व गृह मंत्री ने आंकड़ों के साथ बताया कि दक्षिणी राज्यों को किसी तरह का नुकसान नहीं होगा: कर्नाटक: वर्तमान में 28 सीटें (5.15%) हैं, जो बढ़कर 42 सीटें हो जाएंगी (5.14%) आंध्र प्रदेश: 25 सीटों से बढ़कर 38 सीटें (4.65%) तेलंगाना: 17 सीटों से बढ़कर 26 सीटें (3.18%) तमिलनाडु: 39 सीटों से बढ़कर 59 सीटें (7.23%) केरल: 20 सीटों से बढ़कर 30 सीटें (3.67%) कुल प्रतिनिधित्व भी बढ़ेगा Amit Shah ने बताया कि फिलहाल दक्षिणी राज्यों से 129 सांसद लोकसभा में आते हैं, जो कुल 23.76% है। परिसीमन के बाद यह संख्या बढ़कर 195 सीट हो जाएगी और हिस्सा लगभग 24% तक पहुंच जाएगा। यानी सीटें भी बढ़ेंगी और हिस्सेदारी भी लगभग स्थिर रहेगी। विपक्ष के आरोपों पर पलटवार कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra की ओर से परिसीमन आयोग में पक्षपात की आशंका जताने पर शाह ने कहा कि सरकार ने किसी कानून में बदलाव नहीं किया है। उन्होंने तंज करते हुए कहा कि अगर पहले किसी सरकार ने इसमें हेरफेर किया होगा, तो वह अलग बात है, लेकिन मौजूदा सरकार ऐसा नहीं करेगी। 2029 से पहले लागू नहीं होगा परिसीमन शाह ने यह भी स्पष्ट किया कि परिसीमन प्रक्रिया 2029 से पहले लागू नहीं होगी। जब तक आयोग की रिपोर्ट संसद और राष्ट्रपति की मंजूरी से पास नहीं होती, तब तक चुनाव पुरानी व्यवस्था के तहत ही होंगे। राजनीतिक बयानबाजी भी तेज समाजवादी पार्टी प्रमुख Akhilesh Yadav पर कटाक्ष करते हुए शाह ने कहा कि 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को लेकर उन्हें चिंता करने की जरूरत नहीं है, हालांकि जीत का दावा अलग बात है। सरकार का दावा है कि परिसीमन से दक्षिण भारत का प्रतिनिधित्व कम नहीं होगा, बल्कि संख्या में वृद्धि के साथ संतुलन बना रहेगा। हालांकि, इस मुद्दे पर राजनीतिक बहस अभी भी जारी है और आने वाले समय में यह बड़ा चुनावी मुद्दा बन सकता है।
महिला आरक्षण को लेकर देश की राजनीति एक बार फिर गरमा गई है। समाजवादी पार्टी (सपा) के अध्यक्ष Akhilesh Yadav ने केंद्र सरकार की पहल पर सवाल उठाते हुए इसे “पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) के अधिकारों को खत्म करने की साजिश” करार दिया है। केंद्र सरकार द्वारा इस मुद्दे पर तेजी दिखाते हुए विशेष संसदीय सत्र बुलाए जाने के बीच अखिलेश यादव ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X (पूर्व में ट्विटर)’ पर लंबी पोस्ट लिखकर भाजपा पर तीखा हमला बोला। “जल्दबाजी में लाया जा रहा है बिल” Akhilesh Yadav ने कहा कि महिला आरक्षण को जिस तरह जल्दबाजी में लाया जा रहा है, उससे केंद्र सरकार की मंशा पर सवाल खड़े होते हैं। उन्होंने लिखा कि भाजपा को अब “वोटरों का अकाल” पड़ गया है, इसलिए नए वर्गों को अपने पक्ष में लाने के लिए यह कदम उठाया जा रहा है। “जब पुराने समर्थक भाजपा से दूर हो रहे हैं, तब हर बार नए लोगों को लुभाने के लिए ऐसे फैसले लिए जाते हैं,” उन्होंने कहा। जनगणना और जातिगत आरक्षण का मुद्दा सपा प्रमुख ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार जानबूझकर जनगणना टाल रही है। उनके मुताबिक, “अगर जनगणना होगी तो जातिगत जनगणना की मांग भी उठेगी और उसके आधार पर आरक्षण की बात भी सामने आएगी, जिसे भाजपा कभी लागू नहीं करना चाहती।” उन्होंने कहा कि महिला आरक्षण बिल इसी बड़े राजनीतिक समीकरण का हिस्सा है। PDA के अधिकारों पर चोट का आरोप अखिलेश यादव ने अपने “PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक)” फार्मूले का जिक्र करते हुए कहा कि इसमें “A” यानी आधी आबादी (महिलाएं) भी शामिल हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि यह बिल वास्तव में PDA वर्ग के अधिकारों को कमजोर करने की साजिश है, जिससे सामाजिक न्याय का संतुलन बिगड़ सकता है। महिलाओं की स्थिति पर भी उठाए सवाल सपा प्रमुख ने भाजपा सरकार में महिलाओं की स्थिति पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि महंगाई, बढ़ती गैस सिलेंडर कीमतें और रोजमर्रा के खर्चों ने महिलाओं की रसोई पर सीधा असर डाला है। “भाजपा सरकार में सबसे ज्यादा परेशान अगर कोई है, तो वो महिलाएं ही हैं,” उन्होंने कहा। उन्होंने शिक्षा व्यवस्था पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि सरकारी स्कूलों की स्थिति खराब हो रही है, जिससे महिलाओं के बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है। जमीनी उदाहरण देकर घेरा Akhilesh Yadav ने मेरठ और नोएडा की महिलाओं का जिक्र करते हुए कहा कि उनके दर्द को समझना जरूरी है। उन्होंने सुझाव दिया कि अगर सरकार इस बिल को लेकर गंभीर है, तो इसे आम महिलाओं के बीच जाकर घोषित करना चाहिए, ताकि उनकी वास्तविक समस्याओं को समझा जा सके। “चुनावी चाल है महिला आरक्षण” सपा अध्यक्ष ने आरोप लगाया कि भाजपा अक्सर चुनाव से पहले इस तरह के बड़े मुद्दे उठाकर जनता का ध्यान भटकाने की कोशिश करती है। उन्होंने कहा कि इस बार भी महिलाओं को केंद्र में रखकर वही “पुरानी राजनीतिक चाल” चली जा रही है, लेकिन जनता अब जागरूक हो चुकी है। महिला आरक्षण को लेकर Akhilesh Yadav का यह बयान स्पष्ट करता है कि आने वाले समय में यह मुद्दा राष्ट्रीय राजनीति में बड़ा चुनावी विमर्श बनने वाला है। सपा इसे सामाजिक न्याय और PDA के अधिकारों से जोड़कर पेश कर रही है, जबकि केंद्र सरकार इसे महिलाओं के सशक्तिकरण के रूप में सामने रख रही है।
नोएडा: Noida में वेतन वृद्धि को लेकर शुरू हुआ श्रमिकों का आंदोलन अब सियासी मुद्दा बन गया है। प्रदर्शन के बीच समाजवादी पार्टी और कांग्रेस ने मजदूरों के समर्थन में सरकार पर निशाना साधा है, जबकि प्रशासन का दावा है कि स्थिति अब नियंत्रण में है। अखिलेश यादव का सरकार पर हमला Akhilesh Yadav ने कहा कि फैक्ट्री श्रमिकों के बाद अब घरेलू कामगार भी सड़कों पर उतर आए हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि बढ़ती महंगाई और गलत नीतियों के कारण मजदूर और मध्यम वर्ग दोनों परेशान हैं। राहुल गांधी का समर्थन वहीं Rahul Gandhi ने कहा कि नोएडा की घटना मजदूरों की मजबूरी की आवाज है। उन्होंने कहा कि ₹12,000 की सैलरी में गुजारा मुश्किल है और ₹20,000 वेतन की मांग जायज है। प्रशासन का बड़ा फैसला गौतमबुद्ध नगर की डीएम Medha Roopam ने बताया कि: श्रमिकों की वेतन वृद्धि की मांग मान ली गई है 10 तारीख से पहले वेतन देने के निर्देश समय पर बोनस देने का भी फैसला सरकार ने हाल ही में मजदूरी में बढ़ोतरी का ऐलान भी किया है। पुलिस का दावा – हालात काबू में पुलिस अधिकारियों के मुताबिक: छिटपुट घटनाओं को छोड़कर स्थिति नियंत्रण में है कई इलाकों में फ्लैग मार्च किया जा रहा है हिंसा के मामलों में 300 से ज्यादा लोगों को हिरासत में लिया गया है क्यों भड़का प्रदर्शन? कम वेतन और लंबे काम के घंटे बढ़ती महंगाई और जीवन-यापन का खर्च बेहतर वेतन (₹18-20 हजार) की मांग हाल के दिनों में हजारों श्रमिक सड़कों पर उतरे और कुछ जगहों पर हिंसा भी देखने को मिली। नोएडा में श्रमिकों का यह आंदोलन अब सिर्फ वेतन का मुद्दा नहीं रहा, बल्कि राजनीतिक बहस का केंद्र बन गया है। एक ओर सरकार ने वेतन बढ़ाने जैसे कदम उठाए हैं, वहीं विपक्ष इसे मजदूरों की नाराजगी बता रहा है। आने वाले दिनों में यह मुद्दा और गर्माने की संभावना है।
Swami Avimukteshwaranand Saraswati ने कहा है कि उन्हें किसी भी राजनीतिक दल द्वारा चुनाव में इस्तेमाल करना संभव नहीं है। उनका कहना है कि वे किसी पार्टी के लिए नहीं, बल्कि गंगा संरक्षण और गोरक्षा जैसे धार्मिक व सामाजिक मुद्दों के लिए काम कर रहे हैं, जो पहले से ही Bharatiya Janata Party के भी प्रमुख विषय रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि यदि भाजपा चाहे तो इन मुद्दों पर उनका समर्थन कर सकती है। शंकराचार्य ने स्पष्ट किया कि न Samajwadi Party और न ही Indian National Congress इतनी चतुर है कि उन्हें चुनावी राजनीति में इस्तेमाल कर सके। गोरक्षा के लिए ‘धर्मयुद्ध’ का ऐलान लखनऊ के हासेमऊ स्थित एक गोशाला में आयोजित कार्यक्रम के दौरान शंकराचार्य ने गोरक्षा के लिए धर्मयुद्ध का आह्वान किया। इसी मौके पर उन्होंने “गो प्रतिष्ठा जनजागरण अभियान” की शुरुआत करते हुए चतुरंगिणी सेना बनाने की घोषणा की। उन्होंने कहा कि गाय की रक्षा के लिए समाज को संगठित होना होगा और जो लोग गाय को कष्ट पहुंचाते हैं, वे उनके अनुसार “वृत्रासुर” की श्रेणी में आते हैं। शंकराचार्य ने सरकारी गोशालाओं में गायों की स्थिति को लेकर भी चिंता जताई। चतुरंगिणी सेना का उद्देश्य शंकराचार्य ने चतुरंगिणी सेना का अर्थ समझाते हुए कहा कि यह चार प्रमुख शक्तियों पर आधारित होगी- बुद्धि का बल बाहुबल धनबल समर्पित सहयोगियों का बल उन्होंने बताया कि इसमें साधु-संतों के साथ आम लोग भी शामिल होंगे और इसकी प्रेरणा चारों वेदों, प्रमुख संप्रदायों और चार पीठों के सहयोग से मिलेगी। अखिलेश यादव ने लिया आशीर्वाद इस बीच Akhilesh Yadav ने लखनऊ में शंकराचार्य से मुलाकात कर उनका आशीर्वाद लिया। दोनों के बीच करीब एक घंटे तक बातचीत हुई। मुलाकात के बाद मीडिया से बात करते हुए अखिलेश यादव ने कहा कि किसी भी नए काम की शुरुआत से पहले संत-महात्माओं का आशीर्वाद लेना भारतीय परंपरा का हिस्सा है। उन्होंने कहा कि शंकराचार्य के आशीर्वाद से “नकली संतों का अंत” होगा और धर्म के नाम पर लोगों को गुमराह करने वालों का पर्दाफाश होगा। अखिलेश का भाजपा पर हमला मुलाकात के दौरान अखिलेश यादव ने कई राजनीतिक मुद्दों पर भी टिप्पणी की। उन्होंने दावा किया कि समाजवादी सरकार के समय गोरक्षा के लिए कई कदम उठाए गए थे, जिनमें कन्नौज में राज्य का पहला गाय के दूध का प्लांट स्थापित करना भी शामिल था। उन्होंने आरोप लगाया कि वर्तमान सरकार ने उस प्लांट को बंद कर दिया। इसके अलावा रसोई गैस संकट को लेकर भी उन्होंने केंद्र सरकार को जिम्मेदार ठहराया और कहा कि गलत नीतियों की वजह से लोगों को लकड़ी के चूल्हे पर खाना बनाने की स्थिति पैदा हो रही है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।