पटना, एजेंसियां। बिहार की राजनीति में उस समय हलचल मच गई जब जेडीडी सुप्रीमो Tej Pratap Yadav ने अपने आवास पर चोरी होने की शिकायत दर्ज कराई। सोमवार देर रात वे खुद सचिवालय थाना पहुंचे और एफआईआर दर्ज कराई। शिकायत के अनुसार, उनके घर से करीब 20 लाख रुपये नकद और कई कीमती सामान चोरी हो गए हैं। निजी सहायक पर लगाया गंभीर आरोप तेज प्रताप यादव ने अपने निजी सहायक मोतीलाल राय पर चोरी का आरोप लगाया है। एफआईआर में उन्होंने कहा है कि अलमारी में रखी पार्टी फंड की लगभग 20 लाख रुपये की राशि, दो तोला सोने की चेन, एक सोने की अंगूठी, चार आईफोन 17 प्रो मैक्स, एक मैकबुक, एक आईपैड, एक लेनोवो लैपटॉप, चार पेन ड्राइव और दो हार्ड डिस्क गायब हैं। ड्राइवर और सहयोगी बने प्रत्यक्षदर्शी एफआईआर के अनुसार, 22 जून की रात करीब 11:30 बजे उनके ड्राइवर अनिल यादव और सहयोगी विशाल ने मोतीलाल राय को एक बैग लेकर आवास की बाउंड्री फांदकर भागते हुए देखा। तेज प्रताप का दावा है कि दोनों इस घटना के प्रत्यक्षदर्शी हैं और चोरी में मोतीलाल राय की संलिप्तता की पुष्टि कर सकते हैं। पुलिस ने शुरू की जांच शिकायत मिलने के बाद पुलिस ने मामला दर्ज कर लिया है और जांच शुरू कर दी है। आवास के सीसीटीवी फुटेज खंगाले जा रहे हैं तथा आरोपी के संभावित ठिकानों पर छापेमारी की जा रही है। पुलिस का कहना है कि मामले की हर पहलू से जांच की जा रही है और जल्द ही आरोपित को गिरफ्तार करने का प्रयास किया जाएगा। राजनीतिक गलियारों में चर्चा तेज इस घटना के बाद बिहार की राजनीति में भी चर्चाओं का दौर शुरू हो गया है। तेज प्रताप यादव ने कहा कि उन्हें आरोपी पर पूरा भरोसा था, लेकिन उसी भरोसे का फायदा उठाकर कथित तौर पर चोरी की वारदात को अंजाम दिया गया। अब सभी की नजर पुलिस जांच और आगे की कार्रवाई पर टिकी है।
पटना, एजेंसियां। ज्ञान बिंदु कोचिंग एकेडमी के निदेशक रौशन आनंद के भाई प्रिंस यादव की नेपाल में हुई मौत का मामला अब राजनीतिक रंग लेता जा रहा है। इस घटना को लेकर जनशक्ति जनता दल (जेजेडी) के प्रमुख तेज प्रताप यादव ने मीडिया से बातचीत के दौरान शिक्षक खान सर पर गंभीर आरोप लगाए हैं। हालांकि, इन आरोपों की अब तक किसी जांच एजेंसी या पुलिस ने पुष्टि नहीं की है और मामले की जांच जारी है। तेज प्रताप ने क्या कहा मीडिया से बातचीत में तेज प्रताप यादव ने घटना को बेहद दुखद बताते हुए कहा कि यदि किसी पर आरोप लगाया जाना है तो वह खान सर हैं। उन्होंने दावा किया कि हत्या उनके इशारे पर कराई गई है और इस मामले में उनके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। हालांकि, उन्होंने अपने आरोपों के समर्थन में कोई सार्वजनिक साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया। फिलहाल पुलिस की ओर से भी इस संबंध में कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है। एक्स पर भी की न्याय की मांग इससे पहले तेज प्रताप यादव ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट कर प्रिंस यादव की मौत पर शोक व्यक्त किया था। उन्होंने सरकार और प्रशासन से इस मामले में शामिल सभी दोषियों की जल्द गिरफ्तारी और कड़ी कानूनी कार्रवाई की मांग की। साथ ही उन्होंने यह भी आग्रह किया कि जेल में बंद रौशन आनंद को मानवीय आधार पर अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिए पेरोल या अस्थायी रिहाई दी जाए। तेजस्वी यादव ने मांगी उच्चस्तरीय जांच वहीं, नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने भी इस मामले की निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच की मांग की है। उन्होंने कहा कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट जल्द सार्वजनिक की जानी चाहिए ताकि मौत के वास्तविक कारण स्पष्ट हो सकें। उन्होंने यह भी कहा कि हाल के दिनों में कोचिंग संस्थानों से जुड़े विवाद शिक्षा जगत के लिए चिंता का विषय हैं और पूरे मामले में पुलिस की कार्रवाई पारदर्शी होनी चाहिए। फिलहाल पुलिस सभी पहलुओं से मामले की जांच कर रही है। जांच पूरी होने और आधिकारिक निष्कर्ष सामने आने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि प्रिंस यादव की मौत किन परिस्थितियों में हुई और इसके लिए कौन जिम्मेदार है। तब तक मामले में लगाए गए सभी आरोप जांच के अधीन हैं।
पटना, एजेंसियां। बिहार में राबड़ी देवी के कंगन का मामला सियासी बवाल बन गया है। राबड़ी देवी द्वारा भोजपुरी लोकगायक छोटू छलिया को कंगन भेंट किए जाने का के बाद यह राजनीतिक विवाद उभरा है। JDU की ओर से कंगन पर सवाल उठाए गए और ED जांच की मांग की गई। वहीं इस पर पलटवार करते हुए RJD MLC सुनील सिंह ने कहा है कि राबड़ी देवी कभी डायमंड ज्वेलरी नहीं पहनती हैं। उन्होंने कहा कि हर चमकने वाली चीज हीरा नहीं होती। बिना पूरी जानकारी के विपक्ष इस मामले को हवा दे रहा है। छोटू छलिया बड़े स्टार नही सुनील सिंह ने कहा कि छोटू छलिया कोई बड़े भोजपुरी स्टार नहीं हैं। वे आर्थिक तंगी से जूझ रहे हैं। उन्होंने दावा किया कि कलाकार अक्सर खुद को चर्चा में लाने के लिए बढ़ा-चढ़ाकर बातें करते हैं। बता दें कि लालू प्रसाद यादव के 79वें जन्मदिन समारोह के दौरान छोटू छलिया ने तेजस्वी यादव के बेटे इराज लालू यादव पर सोहर गीत प्रस्तुत किया था, जिससे खुश होकर राबड़ी देवी ने अपने हाथों के कंगन उन्हें उपहार स्वरूप दिए थे। JDU ने की ED जांच की मांग कंगन मिलने के बाद छोटू छलिया ने इसे हीरे का कंगन बताते हुए अपने जीवन का सबसे बड़ा सम्मान कहा था। इसी बयान के बाद JDU ने मामले को लेकर कई सवाल खड़े किए हैं। पार्टी प्रवक्ता नीरज कुमार ने कंगन की खरीद रसीद सार्वजनिक करने की भी मांग की है। साथ ही उन्होंने गहनों की खरीद में टैक्स और GST भुगतान की जांच कराने और पूरे मामले की ED से जांच कराने की मांग भी उठाई है।
पटना, एजेंसियां। बिहार की राजनीति में एक बार फिर सुरक्षा का मुद्दा गरमा गया है। राष्ट्रीय जनता दल (RJD) प्रमुख लालू प्रसाद यादव , पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी और नेता प्रतिपक्ष तेजश्वी यादव द्वारा अपनी सुरक्षा लौटाए जाने के बाद राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। इस बीच सिंगापुर में मौजूद लालू प्रसाद की बेटी रोहिणी आचार्य ने बिहार सरकार और मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी पर तीखा हमला बोला है। रोहिणी आचार्य ने आरोप लगाया कि लालू प्रसाद यादव और राबड़ी देवी की सुरक्षा में कटौती का फैसला राजनीतिक दुर्भावना से प्रेरित है। उन्होंने कहा कि सुरक्षा कम करने के बाद औपचारिक रूप से सुरक्षा बनाए रखने का कोई औचित्य नहीं रह जाता। इसी कारण राबड़ी देवी ने अपने आधिकारिक आवास से सुरक्षाकर्मियों को वापस भेजने का फैसला किया। ‘करोड़ों लोग हैं लालू परिवार का सुरक्षा कवच’ रोहिणी ने अपने बयान में कहा कि बिहार की करोड़ों जनता ही लालू परिवार की असली सुरक्षा है। उन्होंने चेतावनी भरे अंदाज में कहा कि यदि लालू प्रसाद, राबड़ी देवी या परिवार के किसी भी सदस्य को कोई नुकसान पहुंचता है, तो उसके परिणामों की जिम्मेदारी सरकार पर होगी। उन्होंने राजद समर्थकों से भी अपील की कि वे बड़ी संख्या में राबड़ी देवी के आवास पहुंचकर अपना समर्थन दर्ज कराएं। जेडीयू का पलटवार, नीरज कुमार ने उठाए सवाल दूसरी ओर, नीरज कुमार ने रोहिणी के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि राबड़ी देवी को अभी भी जेड प्लस सुरक्षा प्राप्त है। उन्होंने दावा किया कि सुरक्षाकर्मियों को औपचारिक प्रक्रिया के बिना वापस भेजा गया। नीरज कुमार ने यह भी कहा कि यदि परिवार सरकारी सुविधाएं छोड़ना चाहता है तो अन्य सुविधाओं पर भी पुनर्विचार कर सकता है। लालू परिवार की सुरक्षा को लेकर शुरू हुआ यह विवाद अब बिहार की राजनीति में नया मुद्दा बनता जा रहा है, जिस पर सत्ता पक्ष और विपक्ष आमने-सामने आ गए हैं।
पटना: भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने बिहार विधान परिषद चुनाव 2026 के लिए अपने उम्मीदवारों की घोषणा कर दी है। पार्टी की केंद्रीय चुनाव समिति ने चार नामों पर अंतिम मुहर लगाते हुए उन्हें चुनाव मैदान में उतारने का फैसला किया है। घोषित उम्मीदवारों में पवन सिंह, डॉ. संजय मयूख, अनिल कुमार ठाकुर और शीला पंडित शामिल हैं। बीजेपी ने जारी की उम्मीदवारों की सूची भाजपा द्वारा जारी सूची के अनुसार, डॉ. संजय मयूख को एक बार फिर विधान परिषद चुनाव का टिकट दिया गया है। वहीं पवन सिंह, अनिल कुमार ठाकुर और शीला पंडित को पहली बार पार्टी ने विधान परिषद के लिए उम्मीदवार बनाया है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि उम्मीदवारों के चयन में पार्टी ने सामाजिक संतुलन साधने की कोशिश की है। चार उम्मीदवारों में दो सवर्ण और दो अति पिछड़ा वर्ग से आते हैं। जदयू ने भी उतारे चार उम्मीदवार राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के सहयोगी दल जनता दल यूनाइटेड (जदयू) ने भी अपने चार उम्मीदवारों की घोषणा कर दी है। पार्टी ने निशांत कुमार, भारती मंडल, ललन प्रसाद और शिवरानी देवी को चुनाव मैदान में उतारा है। जदयू के चारों उम्मीदवार नए चेहरे हैं और पहली बार किसी सदन के सदस्य बनने की दौड़ में शामिल होंगे। सामाजिक समीकरण पर एनडीए का फोकस एनडीए के घोषित आठ उम्मीदवारों में पांच अति पिछड़ा वर्ग से हैं। भाजपा ने जहां दो सवर्ण और दो अति पिछड़ा वर्ग के नेताओं को मौका दिया है, वहीं जदयू ने भी सामाजिक प्रतिनिधित्व को ध्यान में रखते हुए अपने उम्मीदवारों का चयन किया है। संजय मयूख तीसरी बार मैदान में भाजपा उम्मीदवारों में डॉ. संजय मयूख सबसे अनुभवी चेहरा हैं। पार्टी ने उन पर लगातार तीसरी बार भरोसा जताया है। यदि वे चुनाव जीतते हैं तो एक बार फिर विधान परिषद में भाजपा का प्रतिनिधित्व करेंगे। 9 सीटों के लिए होगा चुनाव 243 सदस्यीय बिहार विधानसभा के आधार पर विधान परिषद की 9 सीटों के लिए चुनाव कराया जाएगा। चुनावी गणित के अनुसार किसी उम्मीदवार को जीत दर्ज करने के लिए लगभग 25 विधायकों की पहली वरीयता का समर्थन चाहिए होगा। यदि पहली वरीयता के मतों से सभी सीटों का फैसला नहीं होता है, तो दूसरी वरीयता के वोटों की गिनती की जाती है, जिससे अंतिम परिणाम प्रभावित हो सकता है। एनडीए को आठ सीटों पर बढ़त का भरोसा विधानसभा में वर्तमान संख्या बल को देखते हुए एनडीए मजबूत स्थिति में दिखाई दे रहा है। जदयू, भाजपा और अन्य सहयोगी दलों को मिलाकर गठबंधन के पास लगभग 202 विधायक हैं, जिसके आधार पर एनडीए को 9 में से 8 सीटें जीतने की उम्मीद है। वहीं महागठबंधन के पास लगभग 41 विधायक हैं, जो उसे कम से कम एक सीट जीतने की स्थिति में रखते हैं। ऐसे में चुनावी मुकाबले का केंद्र दूसरी वरीयता के वोट और दलों की रणनीति पर रहेगा।
पटना, एजेंसियां। बिहार की राजनीति में सरकारी आवास आवंटन को लेकर चल रहे विवाद ने नया मोड़ ले लिया है। विधान परिषद में नेता प्रतिपक्ष राबड़ी देवी के सरकारी बंले को लेकर जारी बहस के बीच जनशक्ति जनता दल (JJD) के राष्ट्रीय अध्यक्ष तेज प्रताप यादव ने अपनी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि उनकी मां राबड़ी देवी उनके लिए सम्मान का विषय हैं और सार्वजनिक जीवन में मर्यादा तथा शालीनता बनाए रखना सभी नेताओं की जिम्मेदारी है। सोशल मीडिया पर साझा की AI जनरेटेड तस्वीर तेज प्रताप यादव ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी और राबड़ी देवी की एक AI जनरेटेड तस्वीर साझा की। तस्वीर के साथ उन्होंने संदेश दिया कि लोकतंत्र में मतभेद होना स्वाभाविक है, लेकिन राजनीतिक संवाद की भाषा हमेशा सम्मानजनक होनी चाहिए। उन्होंने नेताओं से संयमित शब्दों के प्रयोग की अपील भी की। ‘परिवार और मातृ सम्मान सर्वोपरि’ अपने संदेश में तेज प्रताप ने कहा कि परिवार और विशेष रूप से मां का सम्मान उनके लिए सर्वोच्च है। उन्होंने राजनीतिक दलों और नेताओं को व्यक्तिगत टिप्पणियों से बचने की सलाह देते हुए कहा कि राजनीतिक विमर्श गरिमा और शिष्टाचार के दायरे में होना चाहिए। उनका यह बयान सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है। मुख्यमंत्री ने आवास आवंटन पर दी थी सफाई इससे पहले मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने विधान परिषद में आवास आवंटन को लेकर स्थिति स्पष्ट की थी। उन्होंने कहा था कि नेता प्रतिपक्ष के रूप में राबड़ी देवी को 39 हार्डिंग रोड स्थित सरकारी आवास आवंटित किया गया है, जबकि वे वर्तमान में 10 सर्कुलर रोड स्थित आवास में रह रही हैं। वहीं, नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव को एक पोलो रोड स्थित आवास आवंटित बताया गया है। राजनीतिक बयानबाजी हुई तेज सरकारी आवासों के उपयोग और आवंटन को लेकर शुरू हुआ विवाद अब राजनीतिक बयानबाजी का रूप ले चुका है। विभिन्न दल अपने-अपने तर्क पेश कर रहे हैं और मामला लगातार चर्चा में बना हुआ है। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर राजनीतिक गतिविधियां और तेज होने की संभावना है।
पटना, एजेंसियां। बिहार की पूर्व मुख्यमंत्री और बिहार विधान परिषद में नेता प्रतिपक्ष राबड़ी देवी को एक बार फिर पटना स्थित सरकारी आवास 10, सर्कुलर रोड खाली करने का नोटिस जारी किया गया है। भवन निर्माण विभाग ने स्पष्ट निर्देश देते हुए कहा है कि उन्हें आवंटित नया सरकारी आवास ग्रहण कर पुराने बंगले को तत्काल खाली करना होगा। फिलहाल राबड़ी देवी अपने परिवार के साथ बिहार से बाहर हैं, जहां वह अपने पोते का जन्मदिन मनाने गई हैं। मंत्री नंदकिशोर राम को मिला आवास सरकारी आदेश के अनुसार, पटना केंद्रीय पूल के अंतर्गत आने वाला 10, सर्कुलर रोड अब बिहार सरकार के डेयरी, मत्स्य एवं पशु संसाधन विभाग के मंत्री नंदकिशोर राम को आवंटित कर दिया गया है। इस संबंध में विभाग ने 27 मई 2026 को आधिकारिक पत्र जारी किया था। हालांकि, बंगला अभी तक खाली नहीं होने के कारण नए आवंटन पर अमल नहीं हो पाया है। पहले भी जारी हो चुका है आदेश विभाग ने बताया कि 25 नवंबर 2025 को ही राबड़ी देवी को बिहार विधान परिषद में नेता प्रतिपक्ष के पद के अनुरूप 39, हार्डिंग रोड स्थित सरकारी आवास आवंटित किया गया था। इसके बाद कई बार उन्हें पुराने आवास को खाली करने के लिए कहा गया, लेकिन अब तक उन्होंने 10, सर्कुलर रोड का कब्जा नहीं छोड़ा है। ताजा नोटिस में विभाग ने दोबारा निर्देश दिया है कि राबड़ी देवी जल्द से जल्द हार्डिंग रोड स्थित आवास का कब्जा लें और वर्तमान में उपयोग कर रहे बंगले को खाली करें। विभाग के अनुसार, सक्षम प्राधिकार से मंजूरी मिलने के बाद आगे की कार्रवाई के लिए पत्र जारी कर दिया गया है। पहले भी उठा था विवाद राबड़ी देवी और राजद की ओर से पहले भी इस नोटिस का विरोध किया जा चुका है। आवास खाली करने के मुद्दे पर राजनीतिक बयानबाजी भी हुई थी। हालांकि सरकार का कहना है कि यह पूरी तरह प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा है और नियमों के अनुसार आवासों का पुनः आवंटन किया जाता है। प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा है बदलाव भवन निर्माण विभाग के अधिकारियों के मुताबिक, मंत्रियों, जनप्रतिनिधियों और वरिष्ठ अधिकारियों के सरकारी आवासों में समय-समय पर आवश्यकता और पात्रता के आधार पर बदलाव किए जाते हैं। इसलिए 10 सर्कुलर रोड का नया आवंटन कोई असामान्य फैसला नहीं है, बल्कि सरकार की नियमित प्रशासनिक व्यवस्था का हिस्सा है। अब सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि राबड़ी देवी विभाग के निर्देशों का पालन करते हुए कब तक 10 सर्कुलर रोड का बंगला खाली करती हैं और नए आवंटित आवास में शिफ्ट होती हैं।
इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने गाजा पट्टी के 70 प्रतिशत हिस्से पर सैन्य नियंत्रण स्थापित करने का संकेत देकर पश्चिम एशिया में तनाव और बढ़ा दिया है। वेस्ट बैंक में आयोजित एक कॉन्फ्रेंस के दौरान नेतन्याहू ने कहा कि इजराइली सेना धीरे-धीरे गाजा के बड़े हिस्से को अपने नियंत्रण में ले रही है और अब सैन्य दबाव को और बढ़ाया जाएगा। नेतन्याहू बोले- “एक-एक कदम आगे बढ़ेंगे” कॉन्फ्रेंस में बोलते हुए नेतन्याहू ने कहा, “हम इस समय हमास को दबा रहे हैं। पहले हम गाजा के 50 प्रतिशत हिस्से को नियंत्रित कर रहे थे, अब यह बढ़कर 60 प्रतिशत हो चुका है।” उन्होंने आगे कहा कि उन्होंने सैन्य नियंत्रण को और बढ़ाने का आदेश दिया है। इसी दौरान भीड़ में मौजूद कुछ लोगों ने “100 प्रतिशत” कब्जे की मांग करते हुए नारे लगाए। इस पर नेतन्याहू ने जवाब दिया, “एक-एक कदम आगे बढ़ते हैं। पहले 70 प्रतिशत तक पहुंचते हैं। फिलहाल वहीं से शुरुआत करते हैं।” सीजफायर समझौते के खिलाफ माना जा रहा कदम विशेषज्ञों और अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों का मानना है कि इजराइल का यह कदम अक्टूबर 2025 में हुए युद्धविराम समझौते की शर्तों के विपरीत है। समझौते के तहत इजराइली सेना को एक तय “येलो लाइन” के पीछे हटना था। उस समय गाजा का लगभग 53 प्रतिशत हिस्सा इजराइली नियंत्रण में माना जा रहा था। हालांकि हमास का आरोप है कि इजराइल धीरे-धीरे इस सीमा को आगे बढ़ा रहा है और अब गाजा के लगभग 60 से 64 प्रतिशत हिस्से पर उसका नियंत्रण हो चुका है। शांति वार्ता ठप, दोनों पक्ष आमने-सामने इजराइल और हमास के बीच जारी शांति योजना के अगले चरण में हमास के हथियार छोड़ने और इजराइली सेना की वापसी का प्रस्ताव शामिल है। लेकिन दोनों पक्षों के बीच बातचीत फिलहाल पूरी तरह ठप पड़ी हुई है। इजराइल का कहना है कि वह हमास को पूरी तरह कमजोर किए बिना पीछे नहीं हटेगा, जबकि हमास इजराइली सैन्य कार्रवाई को युद्धविराम समझौते का उल्लंघन बता रहा है। गाजा में मानवीय संकट और गहरा सकता है विशेषज्ञों का कहना है कि अगर इजराइल गाजा के 70 प्रतिशत हिस्से पर नियंत्रण स्थापित कर लेता है, तो वहां मानवीय संकट और गंभीर हो सकता है। द गार्डियन की रिपोर्ट के मुताबिक, ऐसी स्थिति में गाजा की करीब 22 लाख आबादी को कुल जमीन के एक-तिहाई से भी कम हिस्से में रहने को मजबूर होना पड़ सकता है। युद्ध, बमबारी और लगातार विस्थापन के कारण गाजा के ज्यादातर इलाके पहले ही तबाह हो चुके हैं। “हर खाली जगह पर टेंट लगे हैं” यूरोपियन काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस के विजिटिंग फेलो मुहम्मद शेहादा ने कहा कि हालात पहले से ही बेहद खराब हैं। उन्होंने कहा, “हर खाली जगह पर विस्थापित परिवारों के टेंट लगे हुए हैं। अगर इलाका और छोटा हो गया, तो बड़ी संख्या में लोगों के पास रहने की जगह नहीं बचेगी।” सीजफायर के बाद भी जारी हैं हमले इजराइल और हमास के बीच अक्टूबर 2025 में युद्धविराम लागू हुआ था, लेकिन इसके बावजूद गाजा में सैन्य कार्रवाई पूरी तरह नहीं रुकी। गाजा के स्वास्थ्य अधिकारियों के अनुसार, सीजफायर लागू होने के बाद से अब तक करीब 900 फिलिस्तीनी मारे जा चुके हैं। इजराइली सेना ने “येलो लाइन” के आसपास के बड़े इलाके को नो-मैन्स-लैंड घोषित कर दिया है, जहां किसी भी गतिविधि को खतरा मानते हुए कार्रवाई की जा रही है। संयुक्त राष्ट्र ने भी जताई चिंता संयुक्त राष्ट्र की हालिया ब्रीफिंग में उत्तरी गाजा के जबालिया इलाके में इजराइली टैंकों की बढ़ती आवाजाही और ड्रोन हमलों को लेकर चिंता जताई गई है। रिपोर्ट के मुताबिक, क्षेत्र में किसी भी संदिग्ध हलचल को निशाना बनाया जा रहा है, जिससे आम नागरिकों में भय और असुरक्षा बढ़ रही है। अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ने की संभावना गाजा में बढ़ती सैन्य कार्रवाई और संभावित क्षेत्रीय कब्जे की रणनीति को लेकर इजराइल पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ सकता है। मानवाधिकार संगठनों और कई देशों ने पहले भी गाजा में नागरिकों की स्थिति को लेकर चिंता जताई है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर स्थिति इसी तरह आगे बढ़ती रही, तो पश्चिम एशिया में संघर्ष और अधिक व्यापक रूप ले सकता है।
पटना, एजेंसियां। राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव शुक्रवार 29 मई को रात 11 बजे सिंगापुर के लिए रवाना होंगे। वे दिल्ली से सिंगापुर के लिए फ्लाईट पकड़ेंगे। जानकारी के अनुसार लालू प्रसाद रूटीन हेल्थ चेकअप के लिए सिंगापुर जा रहे हैं। उनकी एक बेटी रोहिणी आचार्य सिंगापुर में ही रहती है। लालू प्रसाद 10 जून तक भारत लौट आयेंगे। 11 जून को लालू प्रसाद का जन्मदिन है, लिहाजा उनकी वापसी की तारीख 10 जून मानी जा रही है। रोहिणी की वापसी का प्रयास करेंगे चर्चा है कि सिंगापुर यात्रा के दौरान लालू प्रसाद अपनी पुत्री रोहिणी आचार्य को वापस पार्टी में लाने का भी प्रयास करेंगे। बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान रोहिणी आचार्य पार्टी से और अपने भाई तेजस्वी यादव से नाराज हो गयीं थी। लालू प्रसाद रोहिणी को राजद में संगठन के किसी पद की जिम्मेदारी दी जा सकती है। इधर, एक चर्चा यह भी है कि लालू प्रसाद के बडे बेटे तेजप्रताप यादव को पार्टी में वापस लाया जायेगा। उन्हें बिहार विधान परिषद में एमएसली बनाया जा सकता है। सन आफ लालू प्रसाद ने की पुष्टि इधर, लालू प्रसाद के बेहद करीबी और सन आफ लालू प्रसाद के नाम से चर्चित राजद नेता इरफान अहमद अंसारी ने लालू प्रसाद के सिंगापुर जाने की पुष्टि की है। उन्होंने कहा कि रोहिणी आचार्या को पार्टी में वापस लाया जा रहा है।
पटना, एजेंसियां। बिहार विधान परिषद की 10 सीटों लिए चुनाव की घोषणा कर दी गई है। चुनाव आयोग ने मंगलवार को इसकी सूचना जारी की। पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की खाली सीट समेत नौ अन्य सदस्यों का कार्यकाल 28 जून को समाप्त हो रहा है। इन सभी सीटों पर 18 जून को मतदान कराया जाएगा। पहली जून को विधिवत अधिसूचना जारी होगी। इसके साथ ही नामांकन का कार्य आरंभ हो जाएगा। चुनाव का पूरा शेड्यूल पहली जून से आठ जून तक नामांकन होगा। नौ जून को नामांकन पत्रों की जांच की जाएगी। 11 जून तक नाम वापसी का समय है। दस नामांकन होने की स्थिति में 11 जून को नाम वापसी की समय खत्म हो जाने के बाद निर्विरोध निर्वाचन की घोषणा कर दी जाएगी। दस से अधिक नामांकन की स्थिति में 18 जून को मतदान कराया जाएगा। विधानसभा कोटे की इन दस सीटों के लिए 18 जून को सुबह 9 बजे से शाम 4 बजे तक वोट डाला जाएगा। शाम चार बजे के बाद मतों की गिनती होगी और परिणाम जारी होगा। इनके कार्यकाल हो रहे खत्म डॉ. कुमुद वर्मा, प्रो. गुलाम गौस, मो. फारूख, भीषम साहनी, श्रीभगवान सिंह कुशवाहा, संजय प्रकाश, समीकर कुमार सिंह, सम्राट चौधरी और सुनीरल कुमार सिंह का कार्यकाल 28 जून को खत्म हो रहा है। इन पदों पर द्विवार्षिक चुनाव कराए जायेंगे। पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की खाली सीट को भरे जाने के लिए भी उप चुनाव कराने की घोषणा की गई है। इस सीट पर भी 18 जून को जरूरत पड़ने पर वोट कराए जायेंगे। एनडीए से दो मंत्रियों की एंट्री तयः बिहार विधानसभा कोटे से विधान परिषद की 10 सीटों पर 18 जून को होने वाले चुनाव में सबसे बड़ा झटका कांग्रेस को लगना तय माना जा रहा है। विधानसभा में संख्या बल कमजोर होने के कारण कांग्रेस इस बार अपने कोटे से एक भी सदस्य विधान परिषद नहीं भेज पाएगी। कांग्रेस के विधान पार्षद डॉ. समीर कुमार सिंह का कार्यकाल 28 जून को समाप्त हो रहा है। उनके कार्यकाल खत्म होने के बाद परिषद में कांग्रेस के सिर्फ दो सदस्य ही बचेंगे। इसी प्रकार राजद को भी एक सीट का नुकसान उठाना पड़ेगा। उसके दो सदस्य रिटायर हो रहे है, जबकि विधानसभा में संख्या बल के आधार पर पार्टी मात्र एक सदस्य को ही विधान परिषद भेज सकेगी। चुनाव में सबसे अधिक जदयू कोटे की पांच सीटे विधान परिषद की जिन 10 सीटों का कार्यकाल जून में समाप्त हो रहा है, उनमें सबसे अधिक पांच सीटें जदयू कोटे की हैं। भाजपा और राजद के दो-दो सदस्य रिटायर हो रहे हैं। एनडीए कोटे से दो मंत्रियों का विधान परिषद पहुंचना लगभग तय माना जा रहा है। इनमें स्वास्थ्य मंत्री निशांत और पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश का नाम है। भाजपा कोटे से मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी और संजय प्रकाश की सीटों का कार्यकाल भी 28 जून को समाप्त हो रहा है, लेकिन भाजपा अभी यह तय नहीं कर पाई है कि इन सीटों पर किन चेहरों को मौका दिया जाएगा। जदयू की जिन सीटों पर चुनाव होना है, उनमें कुमुद वर्मा, गुलाम गौस, भीष्म सहनी और श्रीभगवान सिंह कुशवाहा के इस्तीफे से रिक्त सीटें शामिल हैं। इसके अलावा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के इस्तीफे से खाली हुई सीट पर भी उपचुनाव कराया जाना है।
पटना की विशेष अदालत में पेश हुए राजद नेता Tejashwi Yadav ने गुरुवार को कोरोना काल में दर्ज नियम उल्लंघन मामले में पटना स्थित MP-MLA कोर्ट में आत्मसमर्पण किया। अदालत में पेश होने के बाद उन्होंने जमानत की अर्जी दाखिल की, जिस पर सुनवाई करते हुए विशेष न्यायाधीश प्रवीण कुमार मालवीय की अदालत ने उन्हें जमानत दे दी। यह मामला कोरोना महामारी के दौरान लागू सरकारी दिशा-निर्देशों और प्रतिबंधों के उल्लंघन से जुड़ा बताया जा रहा है। अदालत में सरेंडर के बाद कानूनी प्रक्रिया पूरी की गई और फिर राहत देते हुए उन्हें बेल प्रदान कर दी गई। कोरोना काल में दर्ज हुआ था मामला जानकारी के अनुसार, कोरोना संक्रमण के दौरान लागू प्रतिबंधों और प्रशासनिक आदेशों का पालन नहीं करने को लेकर यह केस दर्ज किया गया था। मामले में अदालत की ओर से पूर्व में भी कार्रवाई की प्रक्रिया जारी थी। गुरुवार को अदालत में पेश होकर तेजस्वी यादव ने न्यायालय के समक्ष आत्मसमर्पण किया। इसके बाद उनके वकीलों की ओर से जमानत याचिका दायर की गई, जिसे अदालत ने स्वीकार कर लिया। राजनीतिक हलकों में चर्चा तेज राजद नेता के अदालत पहुंचने के बाद बिहार की राजनीतिक गलियारों में इस मामले को लेकर चर्चा तेज हो गई है। हालांकि अदालत से जमानत मिलने के बाद फिलहाल उन्हें बड़ी राहत मिल गई है।
बिहार : पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव की वोटिंग खत्म होते ही बिहार की सियासत में हलचल तेज हो गई है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की सरकार के मंत्रिमंडल विस्तार को लेकर चर्चाएं जोर पकड़ रही हैं। सूत्रों के मुताबिक 3 मई या 6 मई को नए मंत्रियों को शपथ दिलाई जा सकती है। शपथ की तारीख पर मंथन राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि कैबिनेट विस्तार की तारीख भारतीय जनता पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व की रणनीति पर निर्भर करेगी। पश्चिम बंगाल से मिलने वाले राजनीतिक फीडबैक के आधार पर अंतिम फैसला लिया जा सकता है। अगर स्थिति अनुकूल रही तो 6 मई को विस्तार संभव है, जबकि किसी भी अनिश्चितता की स्थिति में यह प्रक्रिया 3 मई को पहले ही पूरी की जा सकती है। कितने मंत्री बन सकते हैं? बिहार में मुख्यमंत्री समेत अधिकतम 36 मंत्री बनाए जा सकते हैं। हालांकि, सभी पद एक साथ भरे जाने की संभावना कम है। पहले की तरह कुछ सीटें खाली रखी जा सकती हैं, ताकि भविष्य में राजनीतिक संतुलन साधा जा सके। क्या होगा सीट बंटवारे का फॉर्मूला? नई सरकार में भले ही मुख्यमंत्री भाजपा से हों, लेकिन जनता दल यूनाइटेड को ज्यादा प्रतिनिधित्व मिलने की संभावना जताई जा रही है। पुराने फॉर्मूले के तहत जदयू को संख्या और अहम मंत्रालयों में प्राथमिकता मिल सकती है। चर्चा है कि भाजपा के करीब 14 और जदयू के 15 मंत्री बनाए जा सकते हैं। किन नेताओं की हो सकती है वापसी? पूर्व डिप्टी सीएम विजय कुमार सिन्हा की वापसी लगभग तय मानी जा रही है। उन्हें कौन सा विभाग मिलेगा, इसे लेकर अभी अटकलें जारी हैं। राजस्व, भूमि सुधार और पथ निर्माण जैसे बड़े मंत्रालयों पर उनकी दावेदारी मानी जा रही है। सहयोगी दलों को भी मिलेगा मौका एनडीए के सहयोगी दलों को भी कैबिनेट में प्रतिनिधित्व मिलने की संभावना है। लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास), हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा और राष्ट्रीय लोक मोर्चा को पहले की तरह जगह मिल सकती है। इन दलों से जुड़े प्रमुख नेता जैसे जीतन राम मांझी, चिराग पासवान और उपेंद्र कुशवाहा के करीबी चेहरों को मौका मिलने की संभावना जताई जा रही है। नजरें पहली कैबिनेट पर अब बिहार की राजनीति में सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि सम्राट चौधरी अपनी पहली कैबिनेट में किन चेहरों को शामिल करते हैं और कौन से अहम विभाग किस दल के हिस्से में जाते हैं।
बिहार में अतिक्रमण के खिलाफ चल रहे सख्त बुलडोजर अभियान के बीच एक ऐसी घटना सामने आई है, जिसने इस कार्रवाई को लेकर सरकार के रुख को और स्पष्ट कर दिया है। राज्य के मुख्यमंत्री Samrat Choudhary के अपने ही घर के बाहर बनी सीढ़ी पर बुलडोजर चला दिया गया। इस कार्रवाई के बाद मुख्यमंत्री ने साफ शब्दों में कहा कि कानून सबके लिए एक समान है—चाहे आम आदमी हो या खुद मुख्यमंत्री। अपने ही घर पर चला बुलडोजर पटना के पास अपने गृहक्षेत्र तारापुर में एक सभा को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री ने खुलासा किया कि करीब एक सप्ताह पहले उनके घर पर भी अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई हुई। उनके घर के बाहर बनी सीढ़ी को तोड़ दिया गया, क्योंकि वह सरकारी जमीन पर बनी हुई थी। उन्होंने कहा, “जब मेरा घर नियमों के दायरे में आ सकता है, तो किसी और को छूट कैसे मिल सकती है।” ‘गलत है तो गलत है’—CM का स्पष्ट संदेश मुख्यमंत्री ने दो टूक कहा कि अतिक्रमण करने वाला चाहे कोई भी हो, उसके खिलाफ कार्रवाई होगी। उन्होंने यह भी जोड़ा कि निजी जमीन पर निर्माण करने वालों को डरने की जरूरत नहीं है, लेकिन सरकारी जमीन पर कब्जा बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। इस बयान के जरिए उन्होंने यह संकेत दिया कि सरकार ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति पर सख्ती से अमल कर रही है। कब और क्यों शुरू हुआ अभियान? बिहार में अतिक्रमण हटाने का अभियान नवंबर 2025 के अंत में नई सरकार बनने के बाद तेज हुआ। इसकी शुरुआत समस्तीपुर से हुई और फिर पटना, मुजफ्फरपुर, लखीसराय, सीतामढ़ी और तारापुर समेत कई शहरों में इसे लागू किया गया। इस अभियान का मुख्य उद्देश्य सड़कों को चौड़ा करना, ट्रैफिक जाम से राहत दिलाना और सरकारी जमीन को अवैध कब्जों से मुक्त कराना है। कोर्ट के आदेश के बाद बढ़ी सख्ती इस अभियान को और गति तब मिली जब पटना हाईकोर्ट ने अतिक्रमण के मुद्दे पर सख्त रुख अपनाया। इसके बाद राज्य सरकार ने 31 जनवरी 2026 तक विशेष ड्राइव चलाने और 1 अप्रैल 2026 से बड़े स्तर पर कार्रवाई करने के निर्देश दिए। क्या है इसका व्यापक असर? मुख्यमंत्री के घर पर कार्रवाई ने यह स्पष्ट संदेश दिया है कि कानून के सामने सभी बराबर हैं। इससे प्रशासनिक सख्ती को लेकर जनता में एक मजबूत संकेत गया है कि नियमों का उल्लंघन किसी भी स्तर पर स्वीकार नहीं किया जाएगा।
बिहार विधानसभा में आज होने वाला फ्लोर टेस्ट मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी की सरकार के लिए औपचारिकता हो सकता है, लेकिन नेता प्रतिपक्ष Tejashwi Yadav के लिए यह किसी बड़ी राजनीतिक परीक्षा से कम नहीं है। असली सवाल सरकार के बहुमत का नहीं, बल्कि RJD और महागठबंधन की एकजुटता का है। पिछले झटकों ने बढ़ाई चिंता तेजस्वी यादव के लिए चिंता की वजह भी साफ है। पिछले फ्लोर टेस्ट और राज्यसभा चुनाव में RJD के कई विधायकों ने क्रॉस वोटिंग या पाला बदलकर महागठबंधन को बड़ा झटका दिया था। इससे उनकी नेतृत्व क्षमता पर सवाल उठे थे। 35 विधायकों को साथ रखना चुनौती इस समय महागठबंधन के पास सिर्फ 35 विधायक हैं। ऐसे में एक भी विधायक का टूटना विपक्ष के लिए बड़ा राजनीतिक नुकसान साबित हो सकता है। तेजस्वी के सामने सरकार गिराने से ज्यादा अपनी टीम को एकजुट रखने की चुनौती है। सम्राट की जीत तय, तेजस्वी की साख दांव पर Samrat Choudhary के नेतृत्व वाली NDA सरकार के पास पर्याप्त बहुमत है। ऐसे में फ्लोर टेस्ट का नतीजा लगभग तय माना जा रहा है। लेकिन अगर महागठबंधन के सभी विधायक एकजुट रहते हैं, तो यह तेजस्वी के लिए बड़ी राजनीतिक जीत होगी। बिहार की राजनीति को मिलेगा बड़ा संदेश अगर इस बार भी कोई विधायक पाला बदलता है, तो इसका असर सिर्फ आज के फ्लोर टेस्ट तक सीमित नहीं रहेगा। यह 2026 और आगे की बिहार राजनीति में तेजस्वी की रणनीति और पकड़ पर भी सवाल खड़े करेगा। इसलिए कहा जा रहा है कि यह सरकार का नहीं, बल्कि तेजस्वी यादव की साख का फ्लोर टेस्ट है।
पटना, एजेंसियां। बिहार की राजनीति में एक अहम बदलाव सामने आया है। Shravan Kumar को जनता दल (यूनाइटेड) विधायक दल का नया नेता चुना गया है। उनके नाम पर मुहर लगने के बाद विधानसभा ने आधिकारिक नोटिफिकेशन भी जारी कर दिया है। यह फैसला Nitish Kumar की मंजूरी के बाद लिया गया। नीतीश कुमार के इस्तीफे के बाद खाली था पद दरअसल, नीतीश कुमार के इस्तीफे के बाद विधायक दल के नेता का पद खाली हो गया था। इसको लेकर मुख्यमंत्री आवास में जेडीयू विधायकों की बैठक हुई, जहां सर्वसम्मति से श्रवण कुमार के नाम पर सहमति बनी। इसके बाद पार्टी नेतृत्व ने इस पर अंतिम मुहर लगा दी। जिम्मेदारी से पहले बढ़ाई गई सुरक्षा दिलचस्प रूप से, श्रवण कुमार की जिम्मेदारी बढ़ने से पहले ही उनकी सुरक्षा बढ़ा दी गई थी। बिहार सरकार ने उन्हें Y+ श्रेणी की सुरक्षा प्रदान की, जिससे उनके बढ़ते राजनीतिक कद के संकेत पहले ही मिल गए थे। निशांत कुमार ने दी बधाई इस मौके पर निशांत कुमार भी जेडीयू कार्यालय पहुंचे और कार्यकर्ताओं से मुलाकात की। उन्होंने श्रवण कुमार को नई जिम्मेदारी के लिए बधाई देते हुए इसे पार्टी के लिए सकारात्मक कदम बताया। 2030 तक 200 सीटों का लक्ष्य बैठक में पार्टी ने भविष्य की रणनीति भी तय की। जेडीयू ने 2030 तक 200 सीटें जीतने का लक्ष्य रखा है। नीतीश कुमार ने कहा कि वे पूरे बिहार का दौरा करेंगे और संगठन को मजबूत करने के लिए लगातार काम करेंगे। तीन अहम प्रस्ताव हुए पारित बैठक में तीन महत्वपूर्ण प्रस्ताव पारित किए गए, जिनमें दो डिप्टी सीएम बनाए जाने का स्वागत, विधायक दल के नेता के चयन के लिए नीतीश कुमार को अधिकृत करना और उनके 20 साल के कार्यकाल की सराहना शामिल है। बदलते सियासी समीकरण के संकेत श्रवण कुमार की ताजपोशी को जेडीयू में नए राजनीतिक समीकरणों की शुरुआत माना जा रहा है। आने वाले समय में इसका असर बिहार की राजनीति में साफ दिखाई दे सकता है।
पटना: बिहार की राजनीति में इन दिनों कैबिनेट विस्तार को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। जानकारी के मुताबिक, पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव खत्म होते ही मुख्यमंत्री Samrat Choudhary अपनी कैबिनेट का विस्तार कर सकते हैं। इससे राज्य की राजनीति में बड़े बदलाव के संकेत मिल रहे हैं। चुनाव के बाद होगा बड़ा फैसला सूत्रों के अनुसार, अभी भाजपा के कई बड़े नेता बंगाल चुनाव में व्यस्त हैं। जैसे ही चुनावी प्रक्रिया पूरी होगी, बिहार में कैबिनेट विस्तार को अंतिम रूप दिया जा सकता है। फिलहाल सरकार का कामकाज मुख्यमंत्री के साथ उपमुख्यमंत्री Vijay Kumar Choudhary और Bijendra Prasad Yadav संभाल रहे हैं। 36 मंत्रियों की सीमा संवैधानिक नियमों के तहत बिहार में अधिकतम 36 मंत्री ही बनाए जा सकते हैं। ऐसे में: जातीय संतुलन क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व राजनीतिक समीकरण इन सभी को साधना सरकार के लिए चुनौतीपूर्ण होगा। कुछ मंत्रियों की हो सकती है छुट्टी कैबिनेट विस्तार के दौरान कुछ पुराने चेहरों को बाहर का रास्ता दिखाया जा सकता है। कमजोर प्रदर्शन वाले मंत्रियों पर गाज गिर सकती है नए चेहरों को मौका देकर सरकार संदेश देना चाहती है जवाबदेही और प्रदर्शन को प्राथमिकता दी जाएगी भाजपा का बढ़ सकता है दबदबा इस बार कैबिनेट में एक बड़ा बदलाव यह हो सकता है कि भाजपा की हिस्सेदारी बढ़े। कई अहम विभाग अभी मुख्यमंत्री के पास हैं विस्तार के बाद इनका बंटवारा सहयोगी दलों में होगा इससे सत्ता संतुलन में बदलाव देखने को मिल सकता है। सहयोगी दलों की भी अहम भूमिका मंत्रिमंडल में शामिल होने वाले कुछ नाम सहयोगी दलों पर निर्भर करेंगे: Upendra Kushwaha अपने खेमे से नाम तय करेंगे Chirag Paswan के पास LJP (रामविलास) कोटे का फैसला रहेगा बिहार कैबिनेट विस्तार सिर्फ एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि बड़ा राजनीतिक संदेश भी होगा। इससे यह तय होगा कि आने वाले समय में राज्य की राजनीति किस दिशा में जाएगी और किन चेहरों पर सरकार भरोसा जताती है।
बिहार की राजनीति में एक बड़े बदलाव के साथ Samrat Choudhary ने मुख्यमंत्री पद की कमान संभाल ली है। एनडीए विधायक दल की बैठक में Nitish Kumar ने उन्हें अपना उत्तराधिकारी घोषित कर एक नई राजनीतिक पारी की शुरुआत कर दी। हालांकि सत्ता तक पहुंचने का यह सफर जितना ऐतिहासिक है, आगे का रास्ता उतना ही कठिन नजर आता है। सवाल यह है कि क्या सम्राट चौधरी इस “कांटों के ताज” को संभालकर इसे “सुनहरे मौके” में बदल पाएंगे? भ्रष्टाचार: सबसे बड़ी चुनौती बिहार में भ्रष्टाचार लंबे समय से एक जड़ जमाई समस्या रही है। सरकारें बदलीं, लेकिन सिस्टम में पारदर्शिता पूरी तरह स्थापित नहीं हो सकी। Samrat Choudhary के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वे “जीरो टॉलरेंस” नीति को जमीन पर उतारें। सरकारी दफ्तरों में रिश्वतखोरी रोकना CSR फंड और सरकारी योजनाओं का सही उपयोग एक पारदर्शी और जवाबदेह प्रशासनिक सिस्टम तैयार करना अगर इसमें सफलता मिलती है, तो उनकी सरकार की साख मजबूत होगी, वरना यह मुद्दा विपक्ष के लिए बड़ा हथियार बनेगा। कानून-व्यवस्था: ‘सुशासन’ की असली परीक्षा Nitish Kumar के शासन की सबसे बड़ी पहचान कानून-व्यवस्था में सुधार रही थी, लेकिन हाल के वर्षों में अपराध के मामलों में बढ़ोतरी चिंता का विषय बनी। हत्या, लूट और महिला अपराध पुलिस व्यवस्था पर सवाल निवेश और विकास पर असर सम्राट चौधरी पहले गृह विभाग संभाल चुके हैं, ऐसे में अब उनसे ठोस सुधार की उम्मीद और भी बढ़ गई है। अगर कानून-व्यवस्था सुधरती है तो बिहार में निवेश और रोजगार के अवसर बढ़ेंगे, लेकिन विफलता NDA की छवि को नुकसान पहुंचा सकती है। शिक्षा और स्वास्थ्य: ढांचा बनाम गुणवत्ता बिहार में स्कूल, कॉलेज और अस्पतालों का ढांचा तो बढ़ा है, लेकिन गुणवत्ता अब भी बड़ी चुनौती है। शिक्षकों और डॉक्टरों की भारी कमी विश्वविद्यालयों की गिरती साख सरकारी अस्पतालों में सुविधाओं का अभाव Samrat Choudhary के सामने यह अवसर है कि वे सिर्फ इन्फ्रास्ट्रक्चर ही नहीं, बल्कि सेवाओं की गुणवत्ता पर भी ध्यान दें। अगर इसमें सुधार होता है, तो राज्य का “ह्यूमन कैपिटल” मजबूत होगा और पलायन कम हो सकता है। विवादों की छाया और विपक्ष का हमला मुख्यमंत्री बनते ही सम्राट चौधरी के पुराने विवाद भी सुर्खियों में आ गए हैं। कम उम्र में मंत्री बनने का मामला शैक्षणिक डिग्री पर सवाल विपक्ष, खासकर Tejashwi Yadav के नेतृत्व वाली आरजेडी, इन मुद्दों को लगातार उठाकर सरकार को घेरने की कोशिश करेगी। ऐसे में सम्राट के लिए सबसे बड़ा जवाब “काम” ही होगा, जिससे जनता का ध्यान विवादों से हट सके। नीतीश की विरासत: सबसे बड़ी कसौटी 20 साल तक बिहार की राजनीति में Nitish Kumar ने “सुशासन” की जो छवि बनाई, वह किसी भी नए मुख्यमंत्री के लिए एक बड़ी चुनौती है। भ्रष्टाचार पर व्यक्तिगत आरोपों का अभाव प्रशासनिक नियंत्रण विकास और कानून-व्यवस्था का संतुलन सम्राट चौधरी को न सिर्फ इस विरासत को बनाए रखना होगा, बल्कि उससे आगे भी बढ़ना होगा। मौका भी, जोखिम भी Samrat Choudhary के सामने यह एक “डबल एज्ड स्वॉर्ड” की तरह है– मौका: नई छवि गढ़ने का अवसर केंद्र और राज्य के तालमेल से विकास युवा नेतृत्व के रूप में पहचान जोखिम: अपेक्षाओं पर खरा न उतरना विपक्ष के हमलों में घिरना NDA की छवि पर असर बिहार की सत्ता संभालना जितना बड़ा अवसर है, उतनी ही बड़ी जिम्मेदारी भी। अगर Samrat Choudhary भ्रष्टाचार, कानून-व्यवस्था और बुनियादी सेवाओं में सुधार कर पाते हैं, तो वे राज्य के राजनीतिक इतिहास में अपनी अलग पहचान बना सकते हैं। लेकिन अगर वे इन चुनौतियों से पार नहीं पा सके, तो यह “सुनहरा मौका” राजनीतिक जोखिम में भी बदल सकता है।
पटना: बिहार की राजनीति में एक बड़ा बदलाव सामने आया है। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के वरिष्ठ नेता Samrat Choudhary ने मुख्यमंत्री पद की शपथ लेकर राज्य की कमान संभाल ली है। इसके साथ ही वे बिहार के 24वें मुख्यमंत्री बन गए हैं। राजधानी पटना के लोक भवन में आयोजित भव्य शपथ ग्रहण समारोह में राज्यपाल Syed Ata Hasnain ने उन्हें पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई। यह शपथ ग्रहण समारोह राजनीतिक दृष्टि से बेहद अहम माना जा रहा है, क्योंकि इसके साथ ही बिहार में एनडीए सरकार का नया स्वरूप सामने आया है। समारोह में Nitish Kumar, J. P. Nadda, Chirag Paswan समेत कई बड़े नेता मौजूद रहे, जिसने इस बदलाव के राजनीतिक महत्व को और भी बढ़ा दिया। शपथ से पहले आस्था, फिर सत्ता मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने से पहले Samrat Choudhary पटना के राजवंशी नगर स्थित पंचरूपी हनुमान मंदिर पहुंचे, जहां उन्होंने पूजा-अर्चना कर आशीर्वाद लिया। सुबह से ही सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए थे और समारोह स्थल पर बड़ी संख्या में समर्थक और कार्यकर्ता मौजूद रहे। दो डिप्टी CM के साथ बना संतुलन नई सरकार में जदयू के दो वरिष्ठ नेताओं को उपमुख्यमंत्री बनाया गया है– Bijendra Prasad Yadav Vijay Kumar Chaudhary दोनों नेताओं ने राज्यपाल के समक्ष शपथ लेकर अपनी नई जिम्मेदारी संभाली। यह फैसला एनडीए के भीतर राजनीतिक और प्रशासनिक संतुलन बनाए रखने की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। “नीतीश से सीखा, अब आगे बढ़ाएंगे बिहार” शपथ से पहले मीडिया से बातचीत में Samrat Choudhary ने कहा कि: उन्हें पार्टी ने राज्य की सेवा का अवसर दिया है वे लगभग 30 वर्षों से राजनीति में सक्रिय हैं उन्होंने Nitish Kumar के साथ काम करते हुए प्रशासन चलाने का अनुभव हासिल किया उन्होंने यह भी कहा कि “समृद्ध बिहार” का जो सपना देखा गया है, उसे नई सरकार और मजबूती से आगे बढ़ाएगी। बीजेंद्र यादव: अनुभव और निरंतरता का चेहरा डिप्टी सीएम बने Bijendra Prasad Yadav बिहार की राजनीति के सबसे अनुभवी नेताओं में गिने जाते हैं। सुपौल से लगातार नौवीं बार विधायक 1990 में पहली बार विधानसभा पहुंचे जेपी आंदोलन से जुड़ाव संगठन और प्रशासन दोनों में मजबूत पकड़ उनकी नियुक्ति से सरकार को स्थिरता और अनुभव का लाभ मिलने की उम्मीद है। विजय चौधरी: ‘संकटमोचक’ की नई जिम्मेदारी दूसरे डिप्टी सीएम Vijay Kumar Chaudhary को Nitish Kumar का सबसे भरोसेमंद सहयोगी माना जाता है। पूर्व विधानसभा अध्यक्ष कई अहम विभागों का अनुभव प्रशासनिक मामलों में दक्ष राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, वे सरकार के भीतर तालमेल और संकट प्रबंधन की अहम कड़ी साबित होंगे। नई सरकार के सामने चुनौतियां और उम्मीदें नई सरकार के सामने कई बड़ी चुनौतियां होंगी: रोजगार और उद्योग को बढ़ावा देना शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था में सुधार बुनियादी ढांचे का विस्तार कानून-व्यवस्था को मजबूत रखना वहीं, जनता को उम्मीद है कि नई टीम “डबल इंजन” सरकार के जरिए विकास की रफ्तार तेज करेगी। एनडीए का नया राजनीतिक संदेश इस शपथ ग्रहण के साथ यह साफ संदेश गया है कि: भाजपा अब बिहार में नेतृत्व की भूमिका में है जेडीयू के अनुभवी नेताओं को सरकार में मजबूत स्थान दिया गया है गठबंधन के भीतर संतुलन बनाए रखने पर खास ध्यान दिया गया है बिहार में सत्ता का यह बदलाव सिर्फ नेतृत्व परिवर्तन नहीं, बल्कि राजनीतिक रणनीति, अनुभव और संतुलन का नया अध्याय है। Samrat Choudhary के नेतृत्व में और Bijendra Prasad Yadav व Vijay Kumar Chaudhary के अनुभव के साथ अब नजर इस बात पर होगी कि यह नई सरकार राज्य को विकास और स्थिरता के नए रास्ते पर कितनी तेजी से आगे बढ़ा पाती है।
पटना: बिहार की राजनीति में आज बड़ा बदलाव देखने को मिला, जब वरिष्ठ जेडीयू नेता Vijay Kumar Chaudhary ने डिप्टी मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। राजधानी पटना में आयोजित शपथ ग्रहण समारोह पर पूरे राज्य की नजरें टिकी रहीं। इस नई सियासी तस्वीर में एक तरफ Samrat Choudhary ने मुख्यमंत्री पद की शपथ लेकर नई शुरुआत की, वहीं दूसरी ओर Nitish Kumar के करीबी और भरोसेमंद सहयोगी विजय चौधरी को डिप्टी सीएम की बड़ी जिम्मेदारी सौंपी गई है। नीतीश के भरोसेमंद को मिली कमान राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा है कि Nitish Kumar ने सरकार के संतुलन और स्थिरता को बनाए रखने के लिए अपने सबसे अनुभवी नेता को आगे किया है। शपथ से पहले मीडिया से बातचीत में Vijay Kumar Chaudhary भावुक नजर आए। उन्होंने कहा कि उनकी पूरी राजनीति नीतीश कुमार के नेतृत्व में रही है और यह जिम्मेदारी उनके विश्वास का परिणाम है। अनुभव और प्रशासनिक पकड़ विजय चौधरी: बिहार विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष रह चुके हैं कई अहम विभागों की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं जटिल प्रशासनिक मामलों को सुलझाने में माहिर माने जाते हैं इसी कारण उन्हें सरकार का “क्राइसिस मैनेजर” भी कहा जाता है। नई सरकार में क्या होगी भूमिका? नई सरकार में Vijay Kumar Chaudhary की भूमिका बेहद अहम मानी जा रही है। बीजेपी नेतृत्व और जेडीयू के बीच तालमेल बैठाना प्रशासनिक फैसलों में स्थिरता बनाए रखना विकास योजनाओं को जमीन पर लागू करना विश्लेषकों का मानना है कि जहां Samrat Choudhary के पास ऊर्जा है, वहीं विजय चौधरी के पास अनुभव का मजबूत आधार है। विकास पर रहेगा फोकस डिप्टी सीएम बनने के बाद विजय चौधरी ने संकेत दिए कि सरकार: शिक्षा, वित्त और बुनियादी ढांचे पर खास ध्यान देगी “न्याय के साथ विकास” की नीति को आगे बढ़ाएगी एनडीए सरकार का नया संतुलन इस शपथ के साथ बिहार में एनडीए सरकार का नया स्वरूप सामने आया है। Vijay Kumar Chaudhary की नियुक्ति से यह संदेश गया है कि जेडीयू अब भी सरकार में मजबूत भूमिका निभा रही है। बिहार की सियासत में यह बदलाव केवल पदों का फेरबदल नहीं, बल्कि रणनीति और संतुलन का नया अध्याय है। अब नजर इस बात पर रहेगी कि विजय चौधरी अपने अनुभव के दम पर सरकार को कितनी मजबूती देते हैं और राज्य के विकास को नई दिशा कैसे देते हैं।
पटना: Bihar में नई सरकार के गठन से पहले ही बड़ा प्रशासनिक फेरबदल देखने को मिला है। मुख्यमंत्री Nitish Kumar के करीबी माने जाने वाले कई आईएएस और आईपीएस अधिकारियों को केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर भेज दिया गया है। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब नीतीश कुमार के इस्तीफे और नई सरकार के गठन की प्रक्रिया जारी है। क्या है पूरा मामला: केंद्र सरकार ने अधिसूचना जारी कर बिहार कैडर के कई IAS और IPS अधिकारियों को केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर बुलाया पहली सूची में मुख्यमंत्री के करीबी अधिकारियों के नाम शामिल दूसरी सूची भी जल्द जारी होने की संभावना किन अधिकारियों को मिली केंद्रीय जिम्मेदारी: 2003 बैच के IAS Anupam Kumar को ऊर्जा मंत्रालय में जॉइंट सेक्रेटरी बनाया गया उनकी पत्नी IAS Pratima S Verma को भी केंद्रीय प्रतिनियुक्ति मिली IAS Vandana Preyasi को उर्वरक विभाग में जॉइंट सेक्रेटरी नियुक्त किया गया IPS राकेश राठी और IAS श्रवनन एम को भी केंद्र भेजा गया इस्तीफे से पहले बड़ा कदम Nitish Kumar 14 अप्रैल को दोपहर 3 बजे इस्तीफा देने वाले हैं 15 अप्रैल को नई सरकार के गठन की संभावना इससे पहले ही करीबी अफसरों का केंद्र जाना सियासी और प्रशासनिक हलकों में चर्चा का विषय क्यों अहम है यह फेरबदल: नई सरकार के गठन से पहले प्रशासनिक ढांचे में बदलाव नीतीश कुमार के भरोसेमंद अधिकारियों का राज्य से बाहर जाना भविष्य की प्रशासनिक कार्यशैली पर असर की संभावना केंद्र और राज्य के बीच समन्वय को लेकर नई दिशा आगे क्या: अधिकारियों की दूसरी सूची जल्द जारी हो सकती है नई सरकार बनने के बाद और भी प्रशासनिक बदलाव संभव नौकरशाही में बड़े स्तर पर पुनर्गठन की उम्मीद बिहार में राजनीतिक बदलाव के साथ-साथ प्रशासनिक स्तर पर भी बड़े फैसले लिए जा रहे हैं। नीतीश कुमार के इस्तीफे से पहले उनके करीबी अधिकारियों का केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर जाना इस बात का संकेत माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में राज्य की प्रशासनिक संरचना में व्यापक बदलाव देखने को मिल सकते हैं।
Bihar Politics Update: बिहार की राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के राज्यसभा सदस्य के रूप में शपथ लेने के बाद अब राज्य में नए सीएम को लेकर चर्चा तेज हो गई है। दिल्ली पहुंचे नीतीश कुमार राज्यसभा सदस्य के रूप में शपथ लेने दिल्ली पहुंचे जदयू नेताओं ने एयरपोर्ट पर किया स्वागत कहा: “मैं यहां शपथ लेने आया हूं” कौन बनेगा अगला मुख्यमंत्री? मंत्री विजय कुमार चौधरी का बड़ा बयान: “CM वही बनेगा, जिसे NDA विधायक दल का नेता चुनेगा” “अब बस कुछ दिन की बात है” 5 दल मिलकर करेंगे फैसला यह सिर्फ एक पार्टी का निर्णय नहीं होगा NDA के 5 सहयोगी दल मिलकर बैठेंगे सभी दल अपने-अपने प्रस्ताव रखेंगे फिर सर्वसम्मति या बहुमत से नेता का चुनाव होगा वही नेता बनेगा बिहार का अगला मुख्यमंत्री इसका मतलब क्या है? CM फेस पर अभी कोई फाइनल नाम तय नहीं गठबंधन की राजनीति में सहमति जरूरी कई नामों पर चर्चा संभव JDU की प्रतिक्रिया नेता संतोष निराला ने कहा: नीतीश कुमार का राज्यसभा जाना गर्व की बात है, उनकी राजनीति से बिहार को आगे बढ़ने की उम्मीद है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।