Narendra Modi और Giorgia Meloni के बीच बढ़ती दोस्ती एक बार फिर चर्चा में है। इटली दौरे पर पहुंचे प्रधानमंत्री मोदी ने मेलोनी को भारत की लोकप्रिय ‘मेलोडी’ टॉफी गिफ्ट की, जिसके बाद दोनों नेताओं की मुलाकात सोशल मीडिया पर भी खूब वायरल हो गई। मेलोनी ने इस खास गिफ्ट के लिए पीएम मोदी को धन्यवाद देते हुए एक वीडियो साझा किया, जिसमें वह मुस्कुराते हुए कहती नजर आईं कि प्रधानमंत्री मोदी ने उन्हें “बहुत बढ़िया टॉफी” गिफ्ट की है। इटली दौरे पर पीएम मोदी प्रधानमंत्री मोदी अपने पांच देशों के दौरे के अंतिम चरण में Italy पहुंचे हैं। यह यात्रा इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी के निमंत्रण पर हो रही है। भारत और इटली इस समय “जॉइंट स्ट्रेटेजिक एक्शन प्लान 2025-2029” के तहत अपने संबंधों को नई मजबूती देने पर काम कर रहे हैं। दोनों देशों के बीच व्यापार, निवेश, रक्षा, स्वच्छ ऊर्जा, विज्ञान, तकनीक और सांस्कृतिक सहयोग बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है। कोलोसियम में साथ दिखे मोदी और मेलोनी रोम पहुंचने के बाद पीएम मोदी ने जॉर्जिया मेलोनी के साथ मशहूर Colosseum का दौरा भी किया। प्रधानमंत्री मोदी ने सोशल मीडिया पर तस्वीरें साझा करते हुए लिखा कि रोम पहुंचने के बाद उन्होंने प्रधानमंत्री मेलोनी के साथ डिनर किया और फिर ऐतिहासिक कोलोसियम घूमने गए। उन्होंने कहा कि दोनों नेताओं ने कई वैश्विक और द्विपक्षीय मुद्दों पर विचार साझा किए। भारत-इटली सहयोग पर होगी अहम बातचीत बुधवार को पीएम मोदी और मेलोनी के बीच औपचारिक वार्ता होने वाली है। इसमें: व्यापार और निवेश रक्षा सहयोग क्लीन एनर्जी इनोवेशन साइंस और टेक्नोलॉजी सांस्कृतिक आदान-प्रदान जैसे मुद्दों पर चर्चा होने की संभावना है। हाल के वर्षों में भारत और इटली के रिश्तों में तेजी से मजबूती आई है और दोनों देश रणनीतिक साझेदारी को आगे बढ़ाने के लिए गंभीरता से काम कर रहे हैं। रोम में दिखी काशी की झलक पीएम मोदी ने अपने दौरे के दौरान यह भी बताया कि इटालियन कलाकार Giampaolo Tomassetti ने उन्हें वाराणसी की एक खूबसूरत पेंटिंग भेंट की। प्रधानमंत्री ने कहा कि भारतीय संस्कृति के प्रति टोमासेटी का लगाव चार दशक से भी ज्यादा पुराना है। उन्होंने वैदिक संस्कृति और Mahabharata से जुड़ी कई कलाकृतियों पर काम किया है। सोशल मीडिया पर वायरल हुई ‘मेलोडी डिप्लोमेसी’ पीएम मोदी द्वारा मेलोनी को ‘मेलोडी’ टॉफी गिफ्ट किए जाने को सोशल media पर लोग “मेलोडी डिप्लोमेसी” कहकर भी चर्चा कर रहे हैं। दोनों नेताओं की दोस्ताना केमिस्ट्री पहले भी अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सुर्खियां बटोर चुकी है।
बीजिंग, एजेंसियां। डोनाल्ड ट्रंप ने चीन दौरे से लौटने के बाद बड़ा दावा किया है कि चीन के राष्ट्रपति Xi Jinping भी इस बात से सहमत हैं कि ईरान के पास परमाणु हथियार नहीं होने चाहिए और होर्मुज स्ट्रेट को खुला रखा जाना चाहिए। ट्रंप ने इसे अमेरिका-चीन के बीच अहम रणनीतिक समझ बताया है। ईरान और होर्मुज स्ट्रेट पर साझा रुख का दावा एयर फ़ोर्स वन में पत्रकारों से बातचीत करते हुए ट्रंप ने कहा कि अमेरिका और चीन दोनों इस बात पर सहमत हैं कि ईरान को परमाणु हथियार विकसित नहीं करने दिए जा सकते। उन्होंने यह भी दावा किया कि होर्मुज स्ट्रेट को खुला रखना जरूरी है ताकि वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति बाधित न हो। ट्रंप के अनुसार, इस क्षेत्र में अमेरिकी नौसेना की स्थिति के कारण ईरान को भारी आर्थिक नुकसान हुआ है। उन्होंने दावा किया कि पिछले ढाई हफ्तों में ईरान को प्रतिदिन लगभग 500 मिलियन डॉलर का नुकसान हो रहा है, क्योंकि व्यापार बाधित हुआ है। चीन की भूमिका और कूटनीतिक चर्चा ट्रंप ने कहा कि चीन भी पश्चिम एशिया में तनाव नहीं चाहता और वह ईरान के परमाणु हथियार कार्यक्रम के खिलाफ है। उन्होंने बताया कि उनकी शी जिनपिंग से ताइवान और ईरान दोनों मुद्दों पर विस्तार से बातचीत हुई। हालांकि चीन की ओर से इन दावों की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है। ट्रंप ने यह भी कहा कि जिनपिंग ताइवान में किसी बड़े संघर्ष के पक्ष में नहीं हैं, क्योंकि इससे गंभीर वैश्विक टकराव हो सकता है। उन्होंने दावा किया कि बातचीत सकारात्मक रही और दोनों देशों के बीच कई मुद्दों पर “बेहतर समझ” बनी। ताइवान और हथियार बिक्री पर भी चर्चा ट्रंप के अनुसार बैठक में ताइवान और अमेरिका की हथियार बिक्री जैसे संवेदनशील मुद्दों पर भी चर्चा हुई। उन्होंने कहा कि वे इन मामलों पर जल्द निर्णय लेंगे। हालांकि उन्होंने यह भी माना कि यह मुद्दे बेहद जटिल हैं और इन पर संतुलित रुख जरूरी है। वैश्विक असर पर नजर ट्रंप की इस टिप्पणी के बाद अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और ऊर्जा बाजार पर संभावित असर को लेकर चर्चा तेज हो गई है। विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि अमेरिका और चीन के बीच इस तरह की सहमति वास्तव में आगे बढ़ती है, तो इसका प्रभाव ईरान, मध्य पूर्व और वैश्विक व्यापार पर व्यापक रूप से देखा जा सकता है।
अमेरिका के राष्ट्रपति Donald Trump का चीन दौरा वैश्विक राजनीति में नई चर्चा का विषय बन गया है। करीब नौ वर्षों बाद कोई अमेरिकी राष्ट्रपति Beijing पहुंचा है। यह दौरा ऐसे समय हुआ है जब अमेरिका और भारत के रिश्तों में पहले जैसी गर्मजोशी नहीं दिख रही, जबकि पश्चिम एशिया में जारी तनाव ने अमेरिका की चुनौतियां बढ़ा दी हैं। दूसरी ओर, भारत और China के बीच भी सीमाई और रणनीतिक मुद्दों को लेकर भरोसे की कमी बनी हुई है। ऐसे में ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति Xi Jinping के बीच बढ़ती नरमी और सकारात्मक संकेतों को भारत बेहद ध्यान से देख रहा है। तनाव के बाद दिखी नरमी पिछले कई महीनों से अमेरिका और चीन के बीच टैरिफ विवाद, व्यापारिक प्रतिस्पर्धा और रणनीतिक तनाव जारी था। इसके बावजूद ट्रंप ने शी जिनपिंग को “महान नेता” और “मित्र” कहकर संबंधों में नरमी का संकेत दिया। विशेषज्ञों का मानना है कि दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाएं अब टकराव के बजाय स्थिर संबंधों की दिशा में बढ़ना चाहती हैं। हालांकि इसे सीधे तौर पर भारत के खिलाफ नहीं माना जा रहा, लेकिन इसके रणनीतिक असर को नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता। भारत के लिए क्यों अहम है यह समीकरण? भारत लंबे समय से अमेरिका और चीन के बीच संतुलन बनाकर चलने की नीति अपनाता रहा है। भारत की कोशिश रहती है कि उसके किसी भी देश से रिश्ते दूसरे देश के खिलाफ न दिखें। India के लिए अमेरिका और चीन दोनों ही बड़े व्यापारिक साझेदार हैं। तकनीक, रक्षा, व्यापार और आपूर्ति श्रृंखला जैसे कई क्षेत्रों में भारत की दोनों देशों पर अलग-अलग स्तर पर निर्भरता भी है। भारत लगातार बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था और “मल्टीपोलर एशिया” की बात करता रहा है। लेकिन मौजूदा वैश्विक व्यवस्था में अमेरिका का वैश्विक प्रभाव और एशिया में चीन की बढ़ती ताकत भारत के लिए रणनीतिक संतुलन की चुनौती पैदा करती है। एक्सपर्ट क्या कह रहे हैं? भारत-अमेरिका संबंधों के विशेषज्ञ और रणनीतिक मामलों के जानकार Ashley Tellis ने पहले भी इस मुद्दे पर चिंता जताई थी। उन्होंने अपने एक लेख में लिखा था कि ट्रंप की नीतियों से पैदा हुई अनिश्चितताएं भारत को असहज करती हैं और इससे अमेरिका के साथ गहरी साझेदारी को लेकर भारत की सतर्कता बढ़ती है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि भारत की रणनीतिक हिचकिचाहट केवल ट्रंप तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत की पुरानी विदेश नीति और खुद महाशक्ति बनने की महत्वाकांक्षा से जुड़ी हुई है। टेलिस के मुताबिक, चीन की बढ़ती ताकत और उसका आक्रामक रुख भारत के लिए बड़ी रणनीतिक चुनौती है। ऐसे में अमेरिका के साथ मजबूत साझेदारी भारत की आवश्यकता बनी रहेगी, क्योंकि अकेले भारत के लिए चीन का संतुलन बनाना आसान नहीं होगा। भारत के सामने संतुलन की चुनौती विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर अमेरिका और चीन के संबंधों में स्थिरता आती है, तो इसका असर वैश्विक व्यापार, सुरक्षा और इंडो-पैसिफिक रणनीति पर भी पड़ सकता है। भारत को ऐसे माहौल में अपनी विदेश नीति को बेहद संतुलित और व्यावहारिक तरीके से आगे बढ़ाना होगा। फिलहाल नई दिल्ली की नजर इस बात पर है कि ट्रंप-शी मुलाकात केवल कूटनीतिक नरमी तक सीमित रहती है या आने वाले समय में यह वैश्विक शक्ति संतुलन को भी प्रभावित करती है।
NATO ने साफ किया अपना रुख अमेरिका और स्पेन के बीच बढ़ते तनाव के बीच NATO ने स्पष्ट कर दिया है कि उसके नियमों में किसी सदस्य देश को निलंबित करने या बाहर निकालने का कोई प्रावधान नहीं है। यह बयान उस रिपोर्ट के बाद आया, जिसमें दावा किया गया था कि अमेरिका, ईरान युद्ध पर स्पेन के रुख से नाराज होकर उसके खिलाफ कार्रवाई पर विचार कर सकता है। क्या है पूरा मामला? रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी रक्षा विभाग के एक आंतरिक ईमेल में उन सहयोगी देशों के खिलाफ संभावित कदमों पर चर्चा की गई, जिन्होंने ईरान के खिलाफ अमेरिकी अभियान का खुलकर समर्थन नहीं किया। इस सूची में Spain का नाम प्रमुखता से सामने आया। स्पेन ने अपने सैन्य अड्डों का इस्तेमाल ईरान पर हमलों के लिए करने से इनकार कर दिया था। अमेरिका के दो महत्वपूर्ण सैन्य ठिकाने स्पेन में स्थित हैं। स्पेन के प्रधानमंत्री ने रिपोर्ट को किया खारिज स्पेन के प्रधानमंत्री Pedro Sánchez ने इस रिपोर्ट को गंभीरता से लेने से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि उनकी सरकार किसी लीक ईमेल के आधार पर नहीं, बल्कि आधिकारिक दस्तावेजों और अमेरिकी सरकार की औपचारिक नीति के आधार पर काम करती है। उन्होंने दोहराया कि स्पेन अपने सहयोगियों के साथ खड़ा है, लेकिन हमेशा अंतरराष्ट्रीय कानून के दायरे में। ट्रंप प्रशासन की नाराजगी अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump और रक्षा मंत्री Pete Hegseth लगातार यूरोपीय सहयोगियों पर निशाना साध रहे हैं। उनका आरोप है कि यूरोप अमेरिकी सुरक्षा पर निर्भर है, लेकिन संकट के समय पर्याप्त सहयोग नहीं करता। हेगसेथ ने कहा कि यूरोप को सिर्फ बयान देने के बजाय वास्तविक योगदान देना चाहिए। फॉकलैंड मुद्दे का भी जिक्र रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि अमेरिका, ब्रिटेन के फॉकलैंड द्वीपों पर अपने समर्थन की समीक्षा कर सकता है। यह द्वीप लंबे समय से Argentina और United Kingdom के बीच विवाद का केंद्र रहे हैं। यूरोपीय देशों ने दिखाई एकजुटता इटली की प्रधानमंत्री Giorgia Meloni ने NATO की एकता बनाए रखने पर जोर दिया। वहीं, जर्मनी ने भी स्पष्ट कहा कि स्पेन की सदस्यता पर कोई सवाल नहीं उठता। NATO में स्पेन की सदस्यता सुरक्षित हालिया विवाद के बावजूद, NATO के नियम स्पष्ट हैं। किसी सदस्य देश को संगठन से निकालना आसान नहीं है, और फिलहाल स्पेन की सदस्यता पर कोई खतरा नजर नहीं आता। हालांकि, इस घटनाक्रम ने अमेरिका और उसके यूरोपीय सहयोगियों के बीच बढ़ती खाई को जरूर उजागर कर दिया है।
नाटो देशों को लेकर अमेरिका की नई रणनीति पर विवाद अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक बार फिर अपने फैसले को लेकर चर्चा में हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, ट्रंप प्रशासन ने नाटो (NATO) देशों के लिए एक “नॉटी और नाइस” (अच्छे और खराब) सूची तैयार की है। इसमें यह आकलन किया जा रहा है कि कौन से देश अमेरिका का साथ ईरान युद्ध में दे रहे हैं और कौन उससे दूरी बनाए हुए हैं। इस कदम को लेकर पश्चिमी देशों के गठबंधन में तनाव और बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। सहयोग के आधार पर होगा देशों का आकलन रिपोर्ट के मुताबिक, इस सूची का उद्देश्य उन देशों को अलग-अलग श्रेणी में रखना है जो अमेरिका के सैन्य रुख का समर्थन करते हैं या विरोध करते हैं। माना जा रहा है कि यह विचार पहले भी अमेरिकी रक्षा मंत्रालय की बैठकों में सामने आ चुका है, जिसमें “मॉडल सहयोगी देशों” को विशेष लाभ देने की बात कही गई थी। सूत्रों के अनुसार, यह सूची नाटो महासचिव मार्क रूटे की वॉशिंगटन यात्रा से पहले तैयार की गई थी। सजा या इनाम जैसी नीति पर सवाल रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि इस सूची के आधार पर अमेरिका अपने सहयोगी देशों के खिलाफ कदम उठा सकता है। इनमें अमेरिकी सैनिकों की तैनाती बदलना या रक्षा उपकरणों की बिक्री रोकना शामिल हो सकता है। हालांकि, यूरोपीय अधिकारियों का मानना है कि ऐसे फैसले अमेरिका के लिए भी नुकसानदायक साबित हो सकते हैं। पोलैंड और रोमानिया को मिल सकता है फायदा सूत्रों के अनुसार, कुछ देशों जैसे पोलैंड और रोमानिया को इस सूची में सकारात्मक स्थान मिलने की संभावना है। पोलैंड को नाटो में रक्षा खर्च और योगदान के लिए पहले से ही महत्वपूर्ण माना जाता है, जबकि रोमानिया ने अमेरिका को सैन्य अभियानों के लिए अपने एयरबेस उपलब्ध कराए हैं। नाटो के साथ ट्रंप की बढ़ती खटास नाटो के कई देश ईरान संघर्ष में अमेरिका का सीधे समर्थन नहीं कर रहे हैं, जिससे ट्रंप नाराज बताए जा रहे हैं। उन्होंने पहले भी नाटो देशों पर रक्षा खर्च कम रखने का आरोप लगाया था और कई बार गठबंधन की भूमिका पर सवाल उठाए हैं। ट्रंप के हालिया बयानों ने यह संकेत दिया है कि अमेरिका अब अपने सहयोगियों पर निर्भर रहने के बजाय खुद की रणनीति पर ज्यादा ध्यान दे रहा है।
सेना का बढ़ता प्रभाव, सत्ता पर पकड़ मजबूत ईरान में सत्ता के समीकरण बदलते नजर आ रहे हैं। Islamic Revolutionary Guard Corps (IRGC) पर आरोप है कि वह देश की राजनीतिक व्यवस्था में अपनी पकड़ लगातार मजबूत कर रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, IRGC ने राष्ट्रपति के कई अहम फैसलों में हस्तक्षेप करते हुए सरकार की कार्यप्रणाली पर प्रभाव बढ़ा दिया है। राष्ट्रपति की नियुक्तियों पर रोक Masoud Pezeshkian द्वारा किए गए महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्ति के प्रयासों को कथित तौर पर रोक दिया गया। खासकर खुफिया मंत्री की नियुक्ति को लेकर राष्ट्रपति और सैन्य नेतृत्व के बीच टकराव सामने आया है। बताया जा रहा है कि IRGC के दबाव के चलते प्रस्तावित सभी नामों को खारिज कर दिया गया। सुप्रीम लीडर तक पहुंच भी सीमित रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है कि Mojtaba Khamenei के आसपास सुरक्षा घेरा कड़ा कर दिया गया है और उनकी पहुंच को सीमित किया गया है। सूत्रों के अनुसार, अब शीर्ष नेतृत्व तक पहुंच और संवाद को सैन्य अधिकारियों की एक परिषद नियंत्रित कर रही है, जिससे सरकार और नेतृत्व के बीच दूरी बढ़ गई है। क्या यह तख्तापलट है? विशेषज्ञ इसे अचानक हुआ सत्ता परिवर्तन नहीं मानते, बल्कि इसे लंबे समय से चल रही प्रक्रिया का हिस्सा बताते हैं। उनका कहना है कि IRGC का प्रभाव पहले से ही बढ़ रहा था और अब वह खुलकर सामने आ रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, अगर IRGC का दबदबा और बढ़ता है, तो ईरान की विदेश नीति और अधिक सख्त हो सकती है। इससे अमेरिका जैसे देशों के साथ बातचीत में तनाव बढ़ने की संभावना है। राजनीतिक संकट गहराने के संकेत ईरान के भीतर सत्ता संघर्ष और बढ़ते तनाव से राजनीतिक संकट गहराता दिख रहा है। राष्ट्रपति पेजेशकियन के लिए यह स्थिति बड़ी चुनौती बन गई है, जहां उन्हें एक ऐसे सिस्टम में काम करना पड़ रहा है, जहां वास्तविक नियंत्रण धीरे-धीरे सैन्य संस्थाओं के हाथ में जाता नजर आ रहा है।
ट्रंप ने बढ़ाया ईरान के साथ युद्धविराम अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने ईरान के साथ जारी सीजफायर को आगे बढ़ाने का ऐलान किया है। उन्होंने कहा कि यह तब तक जारी रहेगा, जब तक ईरान के नेता एक साझा प्रस्ताव पेश नहीं करते और बातचीत पूरी नहीं हो जाती। ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर पोस्ट करते हुए बताया कि यह फैसला पाकिस्तान के अनुरोध पर लिया गया है। पाकिस्तान की अपील का हवाला ट्रंप ने कहा कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री Shehbaz Sharif और सेना प्रमुख Asim Munir की अपील के बाद अमेरिका ने हमले को टालने का निर्णय लिया। उन्होंने यह भी कहा कि ईरान की सरकार फिलहाल आंतरिक रूप से बंटी हुई है, इसलिए बातचीत के लिए समय देना जरूरी है। सैन्य दबाव बरकरार रहेगा सीजफायर बढ़ाने के बावजूद अमेरिका ने ईरान पर दबाव बनाए रखा है। ट्रंप ने स्पष्ट किया कि अमेरिकी सेना को पूरी तरह तैयार रहने के निर्देश दिए गए हैं और ईरान के खिलाफ समुद्री नाकेबंदी जारी रहेगी। यह कदम एक तरफ तनाव को कम करने का संकेत देता है, वहीं दूसरी ओर सैन्य तैयारियों को भी कायम रखता है। ईरान की कड़ी प्रतिक्रिया ईरान के विदेश मंत्री Abbas Araghchi ने इस नाकेबंदी को “युद्ध जैसी कार्रवाई” बताया है। उन्होंने चेतावनी दी कि व्यापारिक जहाजों को निशाना बनाना और क्रू को रोकना हालात को और बिगाड़ सकता है। ईरान ने यह भी संकेत दिया है कि वह पाकिस्तान में होने वाली बातचीत में शामिल नहीं होगा। साजिश का आरोप और बढ़ता तनाव ईरान के एक वरिष्ठ सलाहकार ने ट्रंप के फैसले को “समय खरीदने की चाल” बताया है। उनका कहना है कि यह किसी संभावित हमले की तैयारी हो सकती है। दूसरी ओर, पाकिस्तान ने इस फैसले का स्वागत किया है और उम्मीद जताई है कि बातचीत के जरिए स्थायी समाधान निकलेगा। कूटनीतिक हल पर टिकी नजर फिलहाल यह फैसला अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तनाव कम करने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि, अमेरिका और ईरान के बीच मतभेद अभी भी बरकरार हैं और आने वाले दिनों में हालात किस दिशा में जाएंगे, इस पर सभी की नजर बनी हुई है।
मिडिल ईस्ट में जारी तनाव के बीच Iran की आंतरिक राजनीति को लेकर नई अटकलें तेज हो गई हैं। कुछ रिपोर्ट्स में दावा किया जा रहा है कि ईरान की शक्तिशाली सैन्य इकाई Islamic Revolutionary Guard Corps (IRGC) का प्रभाव तेजी से बढ़ा है और उसने सुरक्षा व विदेश नीति से जुड़े फैसलों पर पकड़ मजबूत कर ली है। क्या वाकई “तख्तापलट” जैसा माहौल है? सीधे तौर पर आधिकारिक “कूप” (coup) की पुष्टि नहीं है, लेकिन संकेत यह जरूर मिल रहे हैं कि: सैन्य नेतृत्व का प्रभाव बढ़ा है कूटनीतिक (डिप्लोमैटिक) चैनल कमजोर पड़े हैं बातचीत की जगह सख्त रुख हावी हो रहा है रिपोर्ट्स के मुताबिक IRGC से जुड़े वरिष्ठ नेता Ahmad Vahidi और सुप्रीम लीडर के करीबी Mojtaba Khamenei की भूमिका अहम हो गई है। नरमपंथी नेता साइडलाइन? ईरान के विदेश मंत्री Abbas Araghchi जैसे नेताओं के प्रभाव में कमी की बात कही जा रही है। बताया जा रहा है कि: उन्होंने पहले बातचीत के जरिए तनाव कम करने के संकेत दिए थे लेकिन IRGC ने सख्त रुख अपनाते हुए उस लाइन को पलट दिया इससे साफ है कि फिलहाल “डिप्लोमेसी बनाम मिलिट्री” की लड़ाई में सैन्य पक्ष भारी पड़ रहा है। बढ़ा तनाव Strait of Hormuz पर नियंत्रण को लेकर हालात और गंभीर हो गए हैं। ईरान ने जहाजों की आवाजाही सीमित की कई जहाजों को निशाना बनाए जाने की खबरें सैकड़ों जहाज फंसे होने की आशंका यह मार्ग वैश्विक तेल सप्लाई के लिए बेहद अहम है, इसलिए इसका असर पूरी दुनिया पर पड़ सकता है। डिप्लोमेसी में सेना की एंट्री रिपोर्ट्स बताती हैं कि IRGC से जुड़े अधिकारियों को अब बातचीत करने वाले प्रतिनिधिमंडल में भी शामिल किया जा रहा है, ताकि कोई भी फैसला “सिस्टम लाइन” से बाहर न जाए। इससे संकेत मिलता है कि: विदेश नीति पर भी सैन्य नियंत्रण बढ़ रहा है पश्चिमी देशों के साथ समझौते की संभावना और कम हो सकती है अमेरिका के सामने क्या विकल्प? अब United States के सामने तीन संभावित रास्ते माने जा रहे हैं: डिप्लोमैटिक दबाव बढ़ाना – प्रतिबंध और अंतरराष्ट्रीय समर्थन के जरिए मिलिट्री विकल्प – होर्मुज और क्षेत्र में अपनी मौजूदगी मजबूत करना मध्यस्थता के जरिए समझौता – तीसरे देशों के माध्यम से बातचीत जारी रखना लेकिन मौजूदा हालात में किसी भी विकल्प के आसान होने की संभावना कम दिख रही है। क्षेत्र में अनिश्चितता बढ़ी कमजोर संघर्षविराम (सीजफायर) के बावजूद हालात बेहद नाजुक बने हुए हैं। बातचीत ठप पड़ती दिख रही है सैन्य गतिविधियां बढ़ रही हैं खाड़ी क्षेत्र में बड़े संघर्ष का खतरा बना हुआ है ईरान में सत्ता संतुलन में बदलाव की ये खबरें भले पूरी तरह पुष्टि नहीं हुई हों, लेकिन संकेत साफ हैं–सैन्य ताकत का असर बढ़ रहा है और कूटनीति कमजोर पड़ रही है। ऐसे में आने वाले दिन न सिर्फ ईरान-अमेरिका रिश्तों, बल्कि पूरे मिडिल ईस्ट की स्थिरता के लिए निर्णायक साबित हो सकते हैं।
अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बीच Donald Trump ने एक बार फिर कड़ा रुख अपनाते हुए तेहरान को अंतिम चेतावनी दी है। ट्रंप ने साफ कहा है कि यदि Iran अमेरिका द्वारा प्रस्तावित समझौते को स्वीकार नहीं करता है, तो उसे गंभीर परिणाम भुगतने होंगे। साथ ही उन्होंने यह भी बताया कि अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल बातचीत के लिए Islamabad जाएगा। ट्रंप का दोहरा संदेश: बातचीत भी, कार्रवाई की धमकी भी ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर पोस्ट करते हुए ईरान पर संघर्षविराम उल्लंघन का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि Strait of Hormuz में हुई गोलीबारी युद्धविराम समझौते के खिलाफ है, जिसमें फ्रांस और यूनाइटेड किंगडम के जहाजों को निशाना बनाया गया। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर समझौता नहीं हुआ तो अमेरिका ईरान के पावर प्लांट और अहम इंफ्रास्ट्रक्चर को निशाना बना सकता है। हालांकि, इसके साथ ही उन्होंने बातचीत का दरवाजा भी खुला रखा और कहा कि “हमने एक निष्पक्ष और उचित समझौता प्रस्तावित किया है।” पाकिस्तान में होगा अगला दौर ट्रंप के मुताबिक, अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल सोमवार को पाकिस्तान पहुंचेगा और मंगलवार से वार्ता शुरू हो सकती है। इस प्रतिनिधिमंडल में Jared Kushner और Steve Witkoff शामिल हैं। इससे पहले भी दोनों देशों के बीच बातचीत हो चुकी है, लेकिन कोई ठोस नतीजा नहीं निकला। “ईरान घुटने टेक देगा” – ट्रंप ट्रंप ने अपने बयान में कहा कि ईरान अमेरिका के सामने ज्यादा देर टिक नहीं पाएगा और उसे अंततः समझौता करना ही होगा। उन्होंने कहा कि अगर ईरान नहीं मानता, तो अमेरिका वह कदम उठाएगा जो पिछले दशकों में नहीं उठाए गए। सीजफायर की डेडलाइन नजदीक गौरतलब है कि अमेरिका और ईरान के बीच 8 अप्रैल को 14 दिनों का संघर्षविराम लागू हुआ था, जो 22 अप्रैल को समाप्त हो रहा है। ऐसे में आने वाले कुछ दिन दोनों देशों के रिश्तों के लिए बेहद अहम माने जा रहे हैं। वैश्विक असर की आशंका विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह तनाव और बढ़ता है, तो इसका असर वैश्विक तेल सप्लाई और मध्य पूर्व की स्थिरता पर पड़ सकता है, खासकर Strait of Hormuz जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग पर।
हॉर्मुज संकट के बाद ट्रंप का तीखा बयान अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर NATO (नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गेनाइजेशन) पर कड़ा हमला बोला है। उन्होंने कहा कि जब हॉर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव चरम पर था, तब NATO ने कोई प्रभावी मदद नहीं की, लेकिन स्थिति सामान्य होने के बाद सहायता की पेशकश की गई। “अब आपकी मदद की जरूरत नहीं” – ट्रंप एरिजोना में आयोजित Turning Point USA कार्यक्रम के दौरान ट्रंप ने कहा कि NATO ने अमेरिका से तब संपर्क किया जब हालात लगभग स्थिर हो चुके थे। उन्होंने कहा कि अगर मदद चाहिए थी, तो “दो महीने पहले चाहिए थी, अब नहीं।” ट्रंप ने स्पष्ट शब्दों में कहा, “वे उस समय पूरी तरह बेकार साबित हुए जब हमें उनकी जरूरत थी। लेकिन सच यह है कि हमें उनकी जरूरत कभी नहीं थी, उन्हें हमारी जरूरत थी।” हॉर्मुज संकट और वैश्विक तनाव यह बयान उस समय आया है जब हाल ही में ईरान और अमेरिका के बीच तनाव के चलते हॉर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक सुर्खियों में रहा। यह वही समुद्री मार्ग है, जिससे दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत तेल और गैस का परिवहन होता है। हालांकि अब स्थिति कुछ हद तक स्थिर बताई जा रही है, लेकिन क्षेत्र में तनाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। नाटो को बताया ‘पेपर टाइगर’ ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट में NATO को “पेपर टाइगर” तक कह दिया। उन्होंने लिखा कि संकट के दौरान संगठन कमजोर और निष्क्रिय रहा, लेकिन अब जब स्थिति सुधर रही है, तो मदद की बात कर रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि अगर NATO को सहयोग करना ही है, तो वे “तेल ले जाने के लिए जहाज भर सकते हैं।” क्षेत्रीय देशों की तारीफ अपने बयान में ट्रंप ने खाड़ी क्षेत्र के कुछ देशों की तारीफ भी की। उन्होंने सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और कतर का उल्लेख करते हुए कहा कि इन देशों ने संकट के दौरान स्थिरता बनाए रखने में अहम भूमिका निभाई। ईरान और हॉर्मुज को लेकर स्थिति ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने पुष्टि की है कि युद्धविराम अवधि में सभी वाणिज्यिक जहाजों के लिए हॉर्मुज जलडमरूमध्य खुला रहेगा। हालांकि अमेरिका ने इस क्षेत्र में कड़ा रुख बनाए रखा है और नौसैनिक दबाव जारी है। ट्रंप का यह बयान एक बार फिर अमेरिका और NATO के बीच मतभेद को उजागर करता है। साथ ही यह भी दिखाता है कि हॉर्मुज संकट ने वैश्विक राजनीति, ऊर्जा सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय गठबंधनों पर गहरा असर डाला है।
अमेरिका के राष्ट्रपति Donald Trump ने एक बार फिर पाकिस्तान की भूमिका की सराहना करते हुए बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि यदि ईरान के साथ शांति समझौता (पीस डील) पाकिस्तान में होता है, तो वह खुद Islamabad जाने पर विचार कर सकते हैं। व्हाइट हाउस में पत्रकारों से बातचीत के दौरान ट्रंप ने कहा, “पाकिस्तान बहुत अच्छा काम कर रहा है। अगर डील साइन होती है, तो मैं इस्लामाबाद जा सकता हूं।” उन्होंने पाकिस्तान की मौजूदा नेतृत्व व्यवस्था की भी तारीफ की। पाकिस्तान की भूमिका पर ट्रंप की टिप्पणी ट्रंप ने कहा कि पाकिस्तान के सैन्य और राजनीतिक नेतृत्व शांति प्रक्रिया में अहम भूमिका निभा रहे हैं। उन्होंने विशेष रूप से Asim Munir और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री की सराहना करते हुए कहा कि दोनों “बेहतरीन काम कर रहे हैं।” ईरान में चल रही कूटनीतिक हलचल इस बीच, पाकिस्तान के सेना प्रमुख आसिम मुनीर इन दिनों Tehran में मौजूद हैं, जहां उन्होंने ईरान के राष्ट्रपति Masoud Pezeshkian से मुलाकात की। यह मुलाकात अमेरिका-ईरान के बीच संभावित शांति वार्ता के प्रयासों के तहत महत्वपूर्ण मानी जा रही है। PM मोदी को बताया ‘अच्छा दोस्त’ ट्रंप ने बातचीत के दौरान भारत के प्रधानमंत्री Narendra Modi की भी तारीफ की और उन्हें अपना “अच्छा दोस्त” बताया। इस बयान को भारत-अमेरिका संबंधों के संदर्भ में भी अहम माना जा रहा है। पहले भी दे चुके हैं संकेत हाल ही में दिए एक इंटरव्यू में ट्रंप ने कहा था कि अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत दोबारा शुरू हो सकती है। अब उनका इस्लामाबाद जाने का संकेत देना इस पूरी कूटनीतिक प्रक्रिया को और अहम बना देता है। अमेरिका, पाकिस्तान और ईरान के बीच चल रही कूटनीतिक गतिविधियों के बीच ट्रंप का यह बयान संकेत देता है कि आने वाले समय में शांति वार्ता तेज हो सकती है। अगर ऐसा होता है, तो इस्लामाबाद एक अहम कूटनीतिक केंद्र बन सकता है।
तिरुवंतपुरम, एजेंसियां। सबरीमाला मंदिर में सामने आए कथित घी घोटाले की जांच को पूरा करने के लिए Kerala High Court ने विजिलेंस ब्यूरो को 30 दिन का अतिरिक्त समय दे दिया है। अदालत ने कहा कि जांच में कई नए पहलू सामने आने के कारण समय बढ़ाना जरूरी था। विजिलेंस की दलील के बाद मिला विस्तार Vigilance and Anti-Corruption Bureau Kerala ने अदालत में बताया कि मामले में त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड (TDB) के कई और कर्मचारी संदिग्ध पाए गए हैं, जिनकी भूमिका की जांच अभी बाकी है। इसी आधार पर जांच एजेंसी ने अतिरिक्त समय की मांग की थी, जिसे कोर्ट ने स्वीकार कर लिया। 33 लोगों के खिलाफ दर्ज है FIR जांच एजेंसी ने शुरुआत में 33 लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की थी। आरोप है कि मंदिर में बेचे गए घी पैकेट की बिक्री से प्राप्त राशि को देवस्वोम खाते में जमा नहीं किया गया, जिससे वित्तीय गड़बड़ी सामने आई। अभिलेखों की गड़बड़ी बनी बड़ी चुनौती जांच में यह भी पाया गया कि टीडीबी द्वारा रिकॉर्ड का अनुचित और लापरवाह रखरखाव किया गया, जिससे जांच प्रक्रिया प्रभावित हो रही है। अदालत ने इसे गंभीर बाधा बताया और विस्तृत जांच के निर्देश दिए। लाखों का राजस्व नुकसान सामने आया रिपोर्ट के अनुसार, लगभग 16,628 घी पैकेट की बिक्री राशि जमा नहीं की गई, जबकि बाद की अवधि में 22,565 पैकेट की कमी भी पाई गई। इससे लाखों रुपये के राजस्व नुकसान की आशंका जताई गई है। कोर्ट का सख्त निर्देश हाईकोर्ट की खंडपीठ ने जांच एजेंसी को सभी संदिग्धों की भूमिका स्पष्ट करने और कानून के अनुसार कार्रवाई सुनिश्चित करने का आदेश दिया है। साथ ही अंतिम रिपोर्ट दाखिल करने से पहले अदालत की अनुमति लेना अनिवार्य किया गया है।
US Iran Talks Islamabad: अमेरिका और ईरान के बीच 11 अप्रैल को होने वाली अहम वार्ता से पहले पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद को पूरी तरह हाई-सिक्योरिटी ज़ोन में बदल दिया गया है। सुरक्षा के कड़े इंतज़ाम ‘रेड ज़ोन’ पूरी तरह सील संसद, दूतावास और होटल इलाके में सीमित एंट्री शहरभर में चेकपॉइंट्स और सशस्त्र पुलिस तैनात कई सड़कों पर आवागमन बंद, रूट डायवर्ट दो दिन का पब्लिक हॉलिडे गुरुवार और शुक्रवार को इस्लामाबाद में छुट्टी स्कूल, दुकानें बंद सड़कों पर कम भीड़ रखने की रणनीति आसमान में भी सुरक्षा कवच PAF ने C-130 विमान और IL-78 टैंकर तैनात किए फाइटर जेट्स ईरानी प्रतिनिधिमंडल को एस्कॉर्ट करते दिखे AWACS सिस्टम से हवाई निगरानी उद्देश्य: किसी भी संभावित हमले, खासकर इजरायली खतरे को रोकना अमेरिकी टीम पहले से मौजूद 30 सदस्यीय अमेरिकी एडवांस टीम पहुंच चुकी पाकिस्तान ने दिया फुलप्रूफ सिक्योरिटी का भरोसा हालांकि, कुछ अमेरिकी नेताओं ने सुरक्षा पर चिंता जताई वीजा-ऑन-अराइवल की सुविधा प्रतिनिधियों और पत्रकारों के लिए आगमन पर वीजा एयरपोर्ट पर स्पेशल हेल्प डेस्क एंट्री प्रोसेस को बनाया गया आसान क्यों अहम है ये वार्ता? 14 दिन के सीजफायर के बाद पहली बड़ी बातचीत पूरी दुनिया की नजरें इस मीटिंग पर पाकिस्तान के लिए डिप्लोमैटिक टेस्ट
Israel-Lebanon Conflict: इजराइल के प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू ने साफ कर दिया है कि लेबनान के साथ किसी भी तरह का संघर्षविराम (सीजफायर) लागू नहीं है। उन्होंने कहा कि इजरायली सेना हिज़्बुल्लाह के खिलाफ अपनी कार्रवाई जारी रखेगी। “हम तब तक नहीं रुकेंगे…” नेतन्याहू ने उत्तरी इजराइल के नागरिकों को संबोधित करते हुए कहा: “लेबनान में कोई संघर्षविराम लागू नहीं है। हम पूरी ताकत से हिज़्बुल्लाह पर हमले कर रहे हैं और तब तक नहीं रुकेंगे, जब तक अपनी सुरक्षा बहाल नहीं हो जाती।” बातचीत के लिए भी दिए निर्देश हालांकि, इससे पहले नेतन्याहू ने एक अलग बयान में संकेत दिया था कि: उन्होंने कैबिनेट को लेबनान के साथ बातचीत शुरू करने के निर्देश दिए हैं यह बातचीत जल्द शुरू हो सकती है बातचीत का फोकस क्या होगा? नेतन्याहू के मुताबिक संभावित बातचीत इन मुद्दों पर केंद्रित होगी: हिज़्बुल्लाह का निरस्त्रीकरण (हथियार छोड़ना) इजराइल और लेबनान के बीच शांतिपूर्ण संबंध स्थापित करना लेबनान के PM के बयान का जिक्र इजरायली प्रधानमंत्री ने लेबनान के प्रधानमंत्री द्वारा बेरूत के निरस्त्रीकरण की अपील की सराहना भी की और इसे बातचीत के लिए सकारात्मक संकेत बताया।
Middle East Tension: अमेरिका-ईरान के बीच जारी 14 दिनों के सीजफायर के बीच पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ के विवादित बयान ने नया कूटनीतिक विवाद खड़ा कर दिया है। इजराइल ने इस बयान की कड़ी निंदा करते हुए पाकिस्तान की मध्यस्थ भूमिका पर सवाल उठाए हैं। क्या कहा था ख्वाजा आसिफ ने? पाकिस्तानी रक्षा मंत्री ने सोशल मीडिया पर इजराइल को: “मानवता के लिए अभिशाप” बताया लेबनान में हो रहे हमलों को “नरसंहार” करार दिया गाजा, ईरान और लेबनान में हिंसा का आरोप लगाया उनके बयान के कुछ हिस्सों को लेकर इजराइल ने गंभीर आपत्ति जताई है। इजराइल का सख्त रुख इजराइल के प्रधानमंत्री कार्यालय ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा: “इजराइल के विनाश की बात करना बेहद आपत्तिजनक है” “ऐसे बयान किसी भी सरकार से स्वीकार्य नहीं हैं, खासकर उस देश से जो खुद को शांति का मध्यस्थ बताता है” इस बयान के बाद पाकिस्तान की तटस्थता पर सवाल उठने लगे हैं। विदेश मंत्री की भी कड़ी प्रतिक्रिया इजराइल के विदेश मंत्री गिदोन सआर ने भी तीखी प्रतिक्रिया दी: बयान को यहूदी-विरोधी और भ्रामक बताया कहा कि इजराइल अपनी सुरक्षा के लिए हर कदम उठाएगा शांति वार्ता पर असर? यह बयानबाजी ऐसे समय में सामने आई है जब: अमेरिका और ईरान के बीच 14 दिन का सीजफायर लागू है पाकिस्तान में संभावित शांति वार्ता की तैयारी चल रही है ऐसे में पाकिस्तान-इजराइल के बीच बढ़ती बयानबाजी से कूटनीतिक माहौल और तनावपूर्ण हो सकता है।
वैश्विक राजनीति में बड़ा बदलाव संकेत दे रहा है कि शक्ति संतुलन अब बदल रहा है। ताजा सर्वे के मुताबिक, United States की वैश्विक साख में गिरावट आई है, जबकि China ने पहली बार उसे पीछे छोड़ दिया है। यह रिपोर्ट ऐसे समय आई है जब मिडिल ईस्ट में तनाव और युद्ध जैसे हालात दुनिया की राजनीति को प्रभावित कर रहे हैं। Gallup सर्वे में बड़ा उलटफेर Gallup के ताजा ग्लोबल अप्रूवल सर्वे के अनुसार, चीन को 36% और अमेरिका को 31% अप्रूवल रेटिंग मिली है। यह पिछले दो दशकों में चीन की सबसे बड़ी बढ़त मानी जा रही है। चीन के राष्ट्रपति Xi Jinping के नेतृत्व में यह सुधार देखा गया है, जबकि Donald Trump की नीतियों को लेकर असंतोष बढ़ा है। अमेरिका की छवि क्यों कमजोर हुई? विश्लेषकों के मुताबिक, इसके पीछे कई बड़े कारण हैं- ट्रेड वॉर और रेसिप्रोकल टैरिफ सहयोगी देशों पर भी सख्त आर्थिक नीतियां ईरान के साथ बढ़ता सैन्य तनाव वैश्विक स्तर पर आक्रामक विदेश नीति इन वजहों से अमेरिका की अस्वीकृति दर 48% तक पहुंच गई, जो अब तक का उच्चतम स्तर है। चीन की स्थिति क्यों मजबूत हुई? दूसरी ओर, चीन की छवि में सुधार दर्ज किया गया है। वैश्विक स्तर पर उसकी अप्रूवल रेटिंग 32% से बढ़कर 36% हो गई। विशेषज्ञों का मानना है कि स्थिर आर्थिक नीतियां और रणनीतिक कूटनीति ने चीन को फायदा पहुंचाया है। अन्य देशों की स्थिति सर्वे के अनुसार: Germany लगातार नौवें साल सबसे ज्यादा सकारात्मक रेटिंग (48%) के साथ शीर्ष पर बना हुआ है Russia की अप्रूवल रेटिंग 26% रही क्या बदल रही है दुनिया की ताकत? यह रिपोर्ट साफ संकेत देती है कि वैश्विक नेतृत्व को लेकर लोगों की सोच बदल रही है। अमेरिका की पारंपरिक ‘सुपरपावर’ छवि को चुनौती मिल रही है, जबकि चीन अपनी पकड़ मजबूत कर रहा है। हालांकि यह सर्वे कुछ बड़े हालिया घटनाक्रमों से पहले किया गया था, लेकिन इसके संकेत गंभीर हैं। आने वाले समय में अमेरिका-चीन के बीच प्रतिस्पर्धा और तेज हो सकती है, जो वैश्विक राजनीति की दिशा तय करेगी।
भारत और Bangladesh के बीच संबंधों को नई दिशा देने की उम्मीदों के बीच बांग्लादेश के विदेश मंत्री Khalilur Rahman का भारत दौरा कई अहम संदेश छोड़ गया। जहां एक ओर ऊर्जा, व्यापार और वीजा जैसे मुद्दों पर सकारात्मक बातचीत हुई, वहीं दौरे के अंत में प्रत्यर्पण की मांग ने कूटनीतिक समीकरणों को जटिल बना दिया। प्रत्यर्पण की मांग ने बढ़ाया तनाव बांग्लादेश ने एक बार फिर पूर्व प्रधानमंत्री Sheikh Hasina और पूर्व गृह मंत्री Asaduzzaman Khan Kamal के प्रत्यर्पण की मांग दोहराई। बांग्लादेश सरकार का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण द्वारा सजा सुनाए जाने के बाद उन्हें देश वापस लाना जरूरी है। यह मांग केवल कानूनी प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक स्पष्ट राजनीतिक और कूटनीतिक संदेश भी मानी जा रही है। भारत के लिए कठिन संतुलन भारत के सामने यह मुद्दा बेहद संवेदनशील बन गया है। एक ओर पड़ोसी देश के साथ रिश्तों को मजबूत बनाए रखने की जरूरत है, तो दूसरी ओर भारत में रह रही पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना की सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून का पालन भी उतना ही महत्वपूर्ण है। इस दौरान विदेश मंत्री S. Jaishankar और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार Ajit Doval के साथ हुई बैठकों में इस विषय पर चर्चा ने साफ कर दिया कि यह सिर्फ औपचारिक दौरा नहीं, बल्कि रणनीतिक बातचीत का हिस्सा था। अन्य मुद्दों पर भी बनी सहमति दोनों देशों के बीच वार्ता केवल प्रत्यर्पण तक सीमित नहीं रही। ऊर्जा सहयोग बढ़ाने पर चर्चा डीजल और उर्वरक आपूर्ति पर सकारात्मक संकेत मेडिकल और बिजनेस वीजा को आसान बनाने पर सहमति व्यापारिक संबंध मजबूत करने की दिशा में कदम इन पहलुओं से यह भी स्पष्ट हुआ कि दोनों देश रिश्तों को मजबूत बनाए रखना चाहते हैं, भले ही कुछ मुद्दों पर मतभेद क्यों न हों। नई सरकार का ‘Bangladesh First’ रुख बांग्लादेश की नई सरकार, जिसका नेतृत्व Tarique Rahman कर रहे हैं, ‘Bangladesh First’ नीति पर जोर दे रही है। इसी नीति के तहत प्रत्यर्पण का मुद्दा प्राथमिकता में रखा गया है। रिश्तों के लिए अग्निपरीक्षा यह पूरा घटनाक्रम संकेत देता है कि भारत-बांग्लादेश संबंध एक नए मोड़ पर हैं। जहां सहयोग और साझेदारी की संभावनाएं हैं, वहीं संवेदनशील मुद्दे दोनों देशों के बीच संतुलन की परीक्षा ले सकते हैं। आने वाले समय में भारत का रुख तय करेगा कि यह मामला रिश्तों को मजबूत करेगा या तनाव बढ़ाएगा।
पाकिस्तान और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के बीच आर्थिक और कूटनीतिक तनाव बढ़ता नजर आ रहा है। UAE द्वारा कर्ज की अवधि बढ़ाने से इनकार करने के बाद पाकिस्तान को अब 3.5 अरब डॉलर (करीब हजारों करोड़ रुपये) लौटाने पड़ रहे हैं, जिससे उसकी पहले से कमजोर अर्थव्यवस्था पर और दबाव बढ़ गया है। कर्ज लौटाने को मजबूर पाकिस्तान पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने पुष्टि की है कि वह UAE से लिया गया 3.5 बिलियन डॉलर का मैच्योर लोन वापस करेगा। यह रकम पाकिस्तान की आर्थिक स्थिरता बनाए रखने के लिए UAE ने जमा कराई थी। हालांकि, पाकिस्तान को उम्मीद थी कि UAE इस लोन को आगे बढ़ा देगा (रोल ओवर), लेकिन ऐसा नहीं हुआ। विदेशी मुद्रा भंडार पर संकट पाकिस्तान के पास 27 मार्च तक 16.4 बिलियन डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार था इसमें से 3.5 बिलियन डॉलर UAE को लौटाने होंगे अप्रैल में 1.3 बिलियन डॉलर का बॉन्ड पेमेंट भी बाकी है ऐसे में पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति और गंभीर हो सकती है। पाक नेता का विवादित बयान इस मुद्दे पर पाकिस्तान के पूर्व मंत्री मुशाहिद हुसैन का बयान विवादों में आ गया है। उन्होंने तंज कसते हुए कहा- पाकिस्तान ने पैसे लौटाने का सही फैसला किया क्योंकि UAE को इसकी ज्यादा जरूरत है UAE कई अंतरराष्ट्रीय मामलों में उलझा हुआ है, इसलिए उसे पैसों की जरूरत है ‘अखंड भारत’ वाला बयान भी चर्चा में मुशाहिद हुसैन ने बयान देते हुए UAE को लेकर विवादित टिप्पणी की- उन्होंने कहा कि UAE को ध्यान रखना चाहिए कि कहीं वह “अखंड भारत” का हिस्सा न बन जाए, क्योंकि वहां बड़ी संख्या में भारतीय रहते हैं। इस बयान को कूटनीतिक मर्यादाओं के खिलाफ माना जा रहा है। क्यों बढ़ा तनाव? UAE का सख्त रुख और कर्ज वापसी की मांग पाकिस्तान की कमजोर आर्थिक स्थिति नेताओं की तीखी बयानबाजी इन सब कारणों से दोनों देशों के संबंधों में तनाव की स्थिति बनती दिख रही है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के एक नए बयान ने मिडिल ईस्ट की राजनीति में हलचल मचा दी है। ट्रंप ने कहा है कि होर्मुज़ स्ट्रेट से जहाजों पर टोल वसूलने का अधिकार ईरान के बजाय अमेरिका को होना चाहिए। “हम विजेता हैं, टोल हमें मिलना चाहिए” सोमवार को मीडिया से बातचीत में ट्रंप ने कहा- “क्यों न हम टोल वसूलें? मैं यह करना पसंद करूंगा बजाय कि उन्हें (ईरान) टोल मिले। हमें टोल क्यों नहीं वसूलना चाहिए? हम विजेता हैं।” उनके इस बयान को अमेरिका के आक्रामक रुख के तौर पर देखा जा रहा है। शांति समझौते में होर्मुज़ खोलना जरूरी हालांकि ट्रंप ने यह भी स्पष्ट किया कि ईरान के साथ किसी भी संभावित शांति समझौते में एक अहम शर्त होगी- होर्मुज़ स्ट्रेट को पूरी तरह खोलना तेल और जहाजों की आवाजाही पर कोई रोक न होना उन्होंने कहा कि अमेरिका “फ्री ऑयल ट्रांजिट” चाहता है। क्या है पूरा विवाद? पहले ईरान ने संकेत दिया था कि वह होर्मुज़ से गुजरने वाले जहाजों से टोल वसूलेगा इसके जवाब में अब ट्रंप ने खुद टोल वसूली की बात कह दी क्यों अहम है होर्मुज़ स्ट्रेट? दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्गों में से एक वैश्विक तेल सप्लाई का बड़ा हिस्सा यहीं से गुजरता है यहां किसी भी तनाव का असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है बढ़ सकता है तनाव ट्रंप का यह बयान ऐसे समय आया है जब अमेरिका-ईरान के बीच पहले से ही सैन्य और कूटनीतिक तनाव चरम पर है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के बयान हालात को और बिगाड़ सकते हैं।
अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव कम होने के आसार फिलहाल नजर नहीं आ रहे हैं। सीजफायर के लिए चल रही कूटनीतिक कोशिशों को बड़ा झटका लगा है, क्योंकि ईरान ने अमेरिका के साथ प्रस्तावित बातचीत में शामिल होने से साफ इनकार कर दिया है। क्या है पूरा मामला? मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक: ईरान ने मध्यस्थों को स्पष्ट कर दिया है कि वह अमेरिकी अधिकारियों से मिलने को तैयार नहीं है उसने अमेरिका की शर्तों को “अस्वीकार्य” बताया है इस वजह से सीजफायर के लिए चल रही बातचीत ठप पड़ गई है पाकिस्तान की कोशिशें भी नाकाम इस मामले में पाकिस्तान समेत कई क्षेत्रीय देश मध्यस्थता की कोशिश कर रहे थे। पाकिस्तान ने इस्लामाबाद में बातचीत की मेजबानी का प्रस्ताव दिया था विदेश मंत्री इशाक डार ने कहा था कि पाकिस्तान इस प्रक्रिया में सहयोग देने को तैयार है लेकिन ईरान के इनकार के बाद यह पहल फिलहाल अधर में लटक गई है। बढ़ सकता है तनाव विशेषज्ञों का मानना है कि: बातचीत रुकने से क्षेत्र में तनाव और बढ़ सकता है सीजफायर की संभावना फिलहाल कमजोर पड़ गई है आगे क्या? अब नजर इस बात पर है कि क्या दोनों देश किसी नए मंच या शर्तों के तहत बातचीत के लिए तैयार होंगे या फिर हालात और बिगड़ेंगे।
तेहरान/वॉशिंगटन: ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान ने अमेरिकी नागरिकों को संबोधित करते हुए एक खुला पत्र लिखा है, जिसे उन्होंने बुधवार को सोशल मीडिया पर साझा किया। इस पत्र में उन्होंने युद्धविराम का कोई उल्लेख नहीं किया, जबकि इससे कुछ ही घंटे पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया था कि ईरान की ओर से सीजफायर की मांग की गई है। “ईरान ने कभी युद्ध शुरू नहीं किया” अपने पत्र में पेज़ेश्कियान ने कहा कि ईरान ने “कभी कोई युद्ध शुरू नहीं किया” और देश लंबे समय से “हमलों और कब्ज़े” का सामना करता रहा है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि ईरानी जनता का अमेरिका, यूरोप या पड़ोसी देशों के लोगों के प्रति कोई दुर्भावना नहीं है। ट्रंप के दावे से अलग संदेश ईरानी राष्ट्रपति का यह बयान ऐसे समय आया है जब अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने सोशल मीडिया पर दावा किया था कि ईरान के “नए शासन” ने युद्धविराम की अपील की है। हालांकि, उन्होंने यह नहीं बताया कि यह अपील किसने की। ट्रंप ने यह भी कहा कि अमेरिका युद्धविराम पर तभी विचार करेगा जब होर्मुज़ जलडमरूमध्य पूरी तरह सुरक्षित और खुला होगा। उन्होंने ईरान के खिलाफ कड़ी चेतावनी देते हुए सख्त कार्रवाई की बात भी कही। संवाद बनाम टकराव की अपील पेज़ेश्कियान ने अपने पत्र के अंत में कहा कि दुनिया के सामने आज सबसे बड़ा विकल्प “टकराव और संवाद” के बीच है। उन्होंने चेतावनी दी कि आज लिया गया फैसला आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को तय करेगा। बढ़ते तनाव के बीच कूटनीतिक संदेश विशेषज्ञों के मुताबिक, यह पत्र सीधे अमेरिकी सरकार की बजाय वहां के नागरिकों को संबोधित कर एक कूटनीतिक संदेश देने की कोशिश है। इसमें शांति और संवाद की बात तो की गई है, लेकिन औपचारिक रूप से युद्धविराम का प्रस्ताव नहीं रखा गया।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।