चैत्र नवरात्रि के आठवें दिन, जिसे महाअष्टमी के नाम से जाना जाता है, मां महागौरी की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां महागौरी को शांति, पवित्रता और समृद्धि की देवी माना जाता है। इस दिन विधि-विधान से पूजा करने पर भक्तों को धन-धान्य, सुख-शांति और सभी कष्टों से मुक्ति का आशीर्वाद प्राप्त होता है। मिर्जापुर के विंध्यधाम के विद्वान आचार्य पं. अनुपम महाराज के अनुसार, महाअष्टमी के दिन विशेष पूजा और कुछ सरल उपाय करने से मां की कृपा शीघ्र प्राप्त होती है। पूजा विधि: ऐसे करें मां महागौरी की आराधना महाअष्टमी के दिन सुबह स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें और पूजा स्थान को शुद्ध करें। इसके बाद एक थाली में लाल चुनरी, चंदन, अक्षत, धूप, लाल और पीले पुष्प रखें। मां को अर्पित करने के लिए 7 गोमती चक्र, 7 कौड़ियां, चांदी या पीतल का कछुआ, लक्ष्मी बैल और पान रखें। मान्यता है कि पूजा के बाद कछुए को तिजोरी में रखने से धन की कमी नहीं होती। मां को प्रसन्न करने के लिए 56 भोग अर्पित करना अत्यंत शुभ माना जाता है। यदि संभव न हो तो पूड़ी और लप्सी का भोग भी लगाया जा सकता है। कन्या पूजन का महत्व और सही विधि महाअष्टमी के दिन कन्या पूजन का विशेष महत्व होता है। 1 वर्ष से अधिक और 9 वर्ष से कम आयु की कन्याओं को देवी का स्वरूप मानकर उनका पूजन किया जाता है। कन्याओं को हलवा और खीर का भोग खिलाएं मिष्ठान अर्पित करें और दक्षिणा दें ध्यान रखें कि कन्या पूजन में नमक का उपयोग न करें मां को नारियल अर्पित करना भी अत्यंत शुभ माना जाता है धार्मिक मान्यता के अनुसार, नारियल की आठ आहुति देने से अष्टलक्ष्मी प्रसन्न होती हैं और घर में सुख-समृद्धि का वास होता है। खास उपाय: दूर होंगे कष्ट और बढ़ेगा धन-धान्य मां महागौरी को 7 कौड़ियां और 7 गोमती चक्र अर्पित करने से जीवन की बाधाएं दूर होती हैं। इसके साथ ही घी, शक्कर और बेल के मुरब्बे से हवन करने से आर्थिक स्थिति मजबूत होती है और घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
चैत्र नवरात्रि के पावन पर्व में पांचवां दिन माता दुर्गा के स्कंदमाता स्वरूप को समर्पित होता है। वर्ष 2026 में यह शुभ अवसर 23 मार्च को मनाया जा रहा है। इस दिन भक्त पूरे विधि-विधान के साथ मां स्कंदमाता की पूजा-अर्चना करते हैं। धार्मिक मान्यता है कि मां स्कंदमाता की कृपा से संतान सुख, पारिवारिक शांति और समृद्धि की प्राप्ति होती है। मां स्कंदमाता का दिव्य स्वरूप मां स्कंदमाता को ममता और वात्सल्य की प्रतिमूर्ति माना जाता है। वे चार भुजाओं वाली हैं और अपनी गोद में भगवान कार्तिकेय को धारण किए रहती हैं, जिन्हें ‘स्कंद’ भी कहा जाता है। माता की दो भुजाओं में कमल पुष्प होते हैं, जबकि एक हाथ वरमुद्रा में होता है। इनका वाहन सिंह है, लेकिन कमल पर विराजमान होने के कारण इन्हें ‘पद्मासना’ भी कहा जाता है। उनका शांत और तेजस्वी स्वरूप भक्तों को आस्था और विश्वास से भर देता है। पूजा विधि: कैसे करें आराधना नवरात्रि के पांचवें दिन प्रातःकाल स्नान कर स्वच्छ और विशेष रूप से सफेद वस्त्र धारण करना शुभ माना जाता है। पूजा स्थल की सफाई कर गंगाजल से शुद्धिकरण किया जाता है। इसके बाद माता का ध्यान कर कलश स्थापना की जाती है। पूजा के दौरान चंदन, अक्षत, धूप और दीप अर्पित किए जाते हैं। मां को पीले फूल और फल चढ़ाकर मंत्रों का जाप, दुर्गा चालीसा और दुर्गा सप्तशती का पाठ किया जाता है। अंत में कपूर से आरती कर पूजा संपन्न की जाती है। प्रिय रंग और पुष्प मान्यता के अनुसार मां स्कंदमाता को सफेद रंग अत्यंत प्रिय है, जो शांति और पवित्रता का प्रतीक है। इस दिन सफेद वस्त्र धारण करना शुभ माना जाता है। वहीं, पूजा में पीले रंग के फूल जैसे गेंदा और पीला गुलाब अर्पित करना विशेष फलदायी माना जाता है। भोग: क्या लगाएं प्रसाद मां स्कंदमाता को केले का भोग अत्यंत प्रिय है। धार्मिक मान्यता है कि केले का प्रसाद चढ़ाने से शारीरिक कष्ट दूर होते हैं और बुद्धि का विकास होता है। इसके अलावा केले से बनी खीर या मिठाई का भोग लगाना भी शुभ माना जाता है। स्कंदमाता के प्रमुख मंत्र सिंहासनगता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया। शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी॥ या देवी सर्वभूतेषु मां स्कन्दमाता रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥ धार्मिक महत्व माना जाता है कि मां स्कंदमाता की उपासना से संतान सुख, सुख-समृद्धि और मानसिक शांति प्राप्त होती है। उनकी कृपा से भक्तों को आरोग्य, ज्ञान और बुद्धि का आशीर्वाद मिलता है। साथ ही, यह भी मान्यता है कि उनकी भक्ति से मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। चैत्र नवरात्रि का शुभ पर्व 19 मार्च 2026 से शुरू हो चुका है। यह नौ दिनों तक चलने वाला पावन उत्सव है, जिसमें मां दुर्गा के नौ अलग-अलग स्वरूपों की विधि-विधान से पूजा की जाती है। मान्यता है कि हर दिन देवी के प्रिय भोग अर्पित करने से भक्तों को विशेष फल, सुख-समृद्धि और जीवन में सफलता प्राप्त होती है। नवरात्रि का हर दिन एक खास देवी को समर्पित होता है और उसी अनुसार भोग अर्पित किया जाता है। पहला दिन और दूसरा दिन पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा होती है, जिन्हें घी का भोग अर्पित करना शुभ माना जाता है। यह स्वास्थ्य और रोगों से मुक्ति दिलाने वाला माना जाता है। दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी को शक्कर का भोग चढ़ाया जाता है, जो लंबी आयु और सौभाग्य प्रदान करता है। तीसरे दिन और चौथा दिन तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की पूजा होती है, जिन्हें दूध या दूध से बने मिष्ठान्न अर्पित किए जाते हैं। यह भोग जीवन में शांति और सुख लाने वाला माना जाता है। चौथे दिन मां कूष्मांडा को मालपुआ का भोग अर्पित किया जाता है, जिससे बुद्धि और निर्णय क्षमता में वृद्धि होती है। पांचवें दिन और छठे दिन पांचवें दिन मां स्कंदमाता की पूजा में केले का भोग चढ़ाया जाता है, जो परिवार में सुख-शांति लाता है। छठे दिन मां कात्यायनी को शहद अर्पित किया जाता है, जिससे आकर्षण शक्ति और ऊर्जा बढ़ती है। सातवें दिन मां कालरात्रि को गुड़ का भोग चढ़ाया जाता है, जो नकारात्मक ऊर्जा को दूर करता है। आठवें दिन और नौवें दिन आठवें दिन मां महागौरी की पूजा में नारियल का भोग अर्पित किया जाता है। यह भोग मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए बेहद शुभ माना जाता है। वहीं नौवें दिन, यानी रामनवमी पर मां सिद्धिदात्री को खीर का भोग लगाया जाता है, जो सफलता और सिद्धियों की प्राप्ति का प्रतीक है। ध्यान रखने वाली बात यह है कि नवरात्रि के दौरान भोग पूरी तरह सात्विक होना चाहिए। लहसुन-प्याज का उपयोग वर्जित माना गया है। पहले माता को भोग अर्पित करें, उसके बाद ही प्रसाद के रूप में ग्रहण करें। इस प्रकार, श्रद्धा और विधि-विधान के साथ नौ दिनों तक मां दुर्गा की पूजा और सही भोग अर्पित करने से जीवन में सकारात्मक ऊर्जा, सुख और समृद्धि का वास होता है।
चैत्र नवरात्रि का दूसरा दिन पूरी श्रद्धा और आस्था के साथ मां ब्रह्मचारिणी को समर्पित होता है। 20 मार्च 2026 को जैसे ही इस पावन दिन की शुरुआत होती है, घर-घर में पूजा के साथ उम्मीद और सकारात्मक ऊर्जा का माहौल बन जाता है। मां ब्रह्मचारिणी को तप, संयम और साधना की देवी माना जाता है, जिनकी आराधना से जीवन में शांति, ज्ञान और स्थिरता आती है। ज्योतिषाचार्यों के अनुसार, यह दिन केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं बल्कि ग्रहों के संतुलन के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। खासतौर पर चंद्र और मंगल ग्रह से जुड़े दोषों को दूर करने में इस दिन की पूजा लाभकारी मानी जाती है। मां ब्रह्मचारिणी का महत्व और ज्योतिषीय संबंध मां ब्रह्मचारिणी नवदुर्गा का दूसरा स्वरूप हैं, जो कठोर तपस्या और आत्मसंयम का प्रतीक है। मान्यता है कि यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में चंद्र कमजोर हो या मानसिक अशांति बनी रहती हो, तो इस दिन सच्चे मन से पूजा करने से मन स्थिर होता है और निर्णय क्षमता मजबूत होती है। विद्यार्थियों और नौकरीपेशा लोगों के लिए यह दिन विशेष रूप से लाभकारी माना जाता है, क्योंकि इससे एकाग्रता और आत्मविश्वास में वृद्धि होती है। मां का दिव्य स्वरूप मां ब्रह्मचारिणी का स्वरूप अत्यंत सरल और शांत होता है। वे सफेद वस्त्र धारण करती हैं, एक हाथ में जपमाला और दूसरे में कमंडल रखती हैं। यह रूप तपस्या, ज्ञान और त्याग का प्रतीक है। ज्योतिष में सफेद रंग को चंद्र का प्रतीक माना गया है, इसलिए इस दिन सफेद या पीले वस्त्र पहनना शुभ माना जाता है। पूजा सामग्री सफेद या पीले फूल घी का दीपक चंदन, रोली, अक्षत धूप-दीप पान-सुपारी फल (विशेषकर सेब, नाशपाती, पीले फल) पूजा विधि प्रातः स्नान कर स्वच्छ पीले या सफेद वस्त्र धारण करें पूजा स्थल को साफ कर मां की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें दीपक जलाकर मां को फूल, फल और नैवेद्य अर्पित करें शांत मन और पूर्ण श्रद्धा के साथ पूजा करें जल्दबाजी से बचें, भाव और ध्यान सबसे महत्वपूर्ण होते हैं मंत्र “ॐ ऐं ह्रीं क्लीं ब्रह्मचारिण्यै नमः” “दधाना कर पद्माभ्याम अक्षमाला कमण्डलू। देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा॥” ज्योतिष मान्यता है कि इन मंत्रों का 108 बार जाप करने से चंद्र और मंगल ग्रह संतुलित होते हैं, जिससे जीवन में स्थिरता और सकारात्मक ऊर्जा आती है। भोग और विशेष अर्पण मां ब्रह्मचारिणी को फल अत्यंत प्रिय हैं। सेब, नाशपाती और पीले फल चढ़ाना शुभ माना जाता है। साथ ही सफेद और पीले फूल अर्पित करने से सकारात्मक ऊर्जा में वृद्धि होती है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। 19 मार्च से शुरू हो रहे चैत्र नवरात्रि में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा की जाती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इन नौ दिनों में देवी को उनके प्रिय रंगों के वस्त्र अर्पित कर श्रृंगार करने से विशेष फल की प्राप्ति होती है और भक्तों की मनोकामनाएं पूरी होती हैं। किस दिन कौन सा रंग है शुभ नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा होती है, जिन्हें सफेद और पीला रंग प्रिय है। दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी को पीला और केसरिया रंग अर्पित करना शुभ माना जाता है। तीसरे दिन मां चंद्रघंटा को गुलाबी या लाल रंग के वस्त्र पहनाए जाते हैं।चौथे दिन मां कूष्मांडा को लाल या नीले रंग के वस्त्र अर्पित किए जा सकते हैं। पांचवें दिन स्कंदमाता को लाल या नारंगी रंग पसंद है। छठे दिन मां कात्यायनी को गुलाबी या मैरून रंग चढ़ाना शुभ होता है।सातवें दिन मां कालरात्रि की पूजा में चटक लाल रंग का विशेष महत्व होता है। आठवें दिन मां सिद्धिदात्री को पीला और मैरून रंग अर्पित किया जाता है। हर दिन का रंग देवी के स्वरूप और ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है। आस्था और रंगों का विशेष महत्व धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सही रंगों के साथ पूजा करने से सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। यह न केवल देवी की कृपा पाने का माध्यम है, बल्कि जीवन में सुख-शांति और समृद्धि लाने का भी एक तरीका माना जाता है। नवरात्रि का बढ़ता महत्व चैत्र नवरात्रि का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि नवमी के दिन राम नवमी मनाई जाती है, जो भगवान राम के जन्मोत्सव के रूप में प्रसिद्ध है।
नालंदा के इस मंदिर की अनोखी परंपरा चैत्र नवरात्र की शुरुआत के साथ ही बिहार के नालंदा जिले में स्थित मां आशापुरी मंदिर चर्चा में आ गया है। करीब 350 साल पुराने इस शक्तिपीठ की एक अनोखी परंपरा है-नवरात्र के दौरान गर्भगृह में महिलाओं का प्रवेश वर्जित रहता है। मां सिद्धिदात्री के रूप में होती है पूजा गिरियक प्रखंड के घोसरावां गांव में स्थित इस मंदिर में मां आशापुरी को देवी मां सिद्धिदात्री के रूप में पूजा जाता है। आठ भुजाओं वाली उनकी दिव्य प्रतिमा श्रद्धालुओं की गहरी आस्था का केंद्र है। मान्यता है कि मां की प्रतिमा वर्षों पहले यहां एक टीले पर प्रकट हुई थी, जिसके बाद यह स्थान एक प्रमुख धार्मिक धाम बन गया। बिहारशरीफ और पावापुरी के पास स्थित यह प्रसिद्ध मंदिर बिहारशरीफ से लगभग 16 किलोमीटर और पावापुरी जल मंदिर से करीब 4 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। अपनी अलग पूजा-पद्धति और तांत्रिक साधना के कारण यह मंदिर दूर-दूर तक प्रसिद्ध है। नवरात्र में गर्भगृह में महिलाओं की एंट्री क्यों बैन? मंदिर के पुजारी के अनुसार, नवरात्र के दौरान यहां तांत्रिक विधि से विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। इसी वजह से चैत्र नवरात्र में महिलाओं को मंदिर परिसर में प्रवेश की अनुमति तो होती है, लेकिन गर्भगृह में नौ दिनों तक प्रवेश वर्जित रहता है। इस परंपरा को स्थानीय लोग मां की विशेष साधना से जोड़कर देखते हैं। नवरात्र में उमड़ती है श्रद्धालुओं की भीड़ नवरात्र के दौरान मंदिर परिसर को फूलों, रोशनी और ध्वज-पताकाओं से सजाया जाता है। शंखध्वनि, मंत्रोच्चार और जयकारों से पूरा वातावरण भक्तिमय हो जाता है। सुबह से लेकर देर शाम तक श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। आस्था और परंपरा का अद्भुत संगम मां आशापुरी मंदिर न सिर्फ एक धार्मिक स्थल है, बल्कि यह आस्था, तांत्रिक परंपरा और लोकविश्वास का अनोखा संगम भी है। सदियों पुरानी मान्यताओं के कारण यह मंदिर आज भी श्रद्धालुओं के लिए खास महत्व रखता है।
रांची। आज यानी गुरुवार 19 मार्च से चैत्र नवरात्र शुरू हो गया है। साल में दो नवरात्र होते है और दोनों संधिकाल में होते हैं। चैत्र से ही भारतीय नए साल की शुरुआत होती है। नौ दिनों तक मां के अलग-अलग रूपों की आराधना भक्त करते हैं। मां की आराधना से भक्तों के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं। झारखंड में बड़े भक्ति भाव से होती है मां की पूजा झारखंड में भी दर्जनों देवी मंदिर हैं। गांव-गांव देवी मंडप भी होता है। यहां हम राज्य प्रमुख नौ देवी मंदिरों के बारे में बता रहे हैं, जहां साक्षात माता विराजती हैं। 1.हाराडीह मंदिरः यह मंदिर रांची जिले के तमाड़ ब्लाक में कांची नदी के तट पर स्थित है। रांची से लगभग 60 किमी दूर है। यहां 16 भुजाओं वाली मां दुर्गा महिषासुरमर्दिनी की काले पत्थर की प्रतिमा है। मां यहां ध्यान मुद्रा में बैठी हैं और जिस सिंह पर विराजमान हैं, वह भी ध्यानमुद्रा में है। यह एक हजार साल से भी पुरानी प्रतिमा है। यहां मंदिर नया बना है, लेकिन प्राचीन मंदिरों के खंडहर यहां बिखरे पड़े हैं। देउड़ी मंदिर और हाराडीह मंदिर में काफी समानता हैं। 2. दिउड़ी मंदिर रांची-टाटा रोड पर तमाड़ से तीन किलोमीटर दूर स्थित है प्राचीन दिउड़ी मंदिर। मंदिर में सोलहभुजी मां दुर्गा विराजती हैं। नवरात्र के अवसर पर मां के दर्शन के लिए श्रद्धालुओं का तांता लगा रहा है। मंदिर में सोलहभुजी मां दुर्गा के अलावा भगवान शिव की मूर्ति भी स्थापित है। इस मंदिर को आदिवासी और हिंदू संस्कृति का संगम कहा जाता है, क्योंकि इस मंदिर के पुजारी पाहन और ब्राह्मण दोनों हैं। 3. मां उग्रतारा मंदिर लातेहार के चंदवा प्रखंड के नगर गांव स्थित मां उग्रतारा मंदिर में दुर्गा पूजा का त्योहार बड़ी धूम-धाम से मनाया जाता है। यहां सोलह दिनों की नवरात्र साधना होती है। कैथी भाषा में लिखे पांच सौ वर्ष पुराने ग्रंथ का अनुसरण करते हुए पूजा अनुष्ठान कराया जाता है। मंदिर के मुख्य प्रकोष्ठ में उग्रतारा की छोटी-छोटी मूर्तियां हैं, जो हमेशा वस्त्राच्छादित रहती हैं। 4. मां छिन्नमस्तिके मंदिर रजरप्पाः रांची से करीब 80 किमी दूर रामगढ़ के रजरप्पा में स्थित मां छिन्नमस्तिके मंदिर सिद्धपीठ है। मां छिन्नमस्तिके के रूप में मां दुर्गा भक्तों की समस्त मनोकामना पूरा करती हैं। भैरवी, भेड़ा और दामोदर नदी के संगम पर स्थित यह शक्तिपीठ तंत्र साधना का भी बड़ा केंद्र है। दस महाविद्याओं की सिद्धि हासिल करने के लिए साधक यहां दूर-दूर से आते हैं। मंदिर में दर्शन के लिए हमेशा भीड़ रहती है। 5. महामाया मंदिरः गुमला जिला मुख्यालय से से 30 किमी और घाघरा प्रखंड से आठ किमी दूर अवस्थित है हापामुनी गांव। यहां अति प्राचीन महामाया मंदिर है, जो हापामुनी गांव के बीच में है। मंदिर की स्थापना विक्रम संवत 965 यानी 908 ई में हुई थी। मंदिर की स्थापना महाराजा मोहन राय के बेटे गजघंट द्वारा की गई थी। वे नागवंश के 22 वें राजा थे। उन्होंने मंदिर की देखभाल अपने गुरु हरिनाथ, एक मराठी ब्राह्मण को सौंप दी थी। 6. मौलिक्षा मंदिरः संताल परगना के दुमका जिले में शिकारीपाड़ा के पास बसे एक छोटे से गांव मलूटी को गुप्त काशी कहा जाता है। यहां पर मौलिक्षा माता का मंदिर है, जिसकी मान्यता जाग्रत शक्तिपीठ के रूप में है। मां मौलिक्षा के मंदिर में मां के मस्तक के ही दर्शन किये जा सकते हैं। मंदिर के भीतर गर्भगृह एवं ऊंचे चबूतरा पर मां की सौम्य भव्य प्रतिमा स्थापित है। मां मौलिक्षा, मां तारा की बड़ी बहन के रूप में जानी जाती हैं। 7. मां भद्रकाली मंदिरः चतरा के इटखोरी प्रखंड मुख्यालय से करीब डेढ़ किमी दूर स्थित भदुली गांव में मां भद्रकाली मंदिर स्थित है। मंदिर में कमल के आसन पर मां भद्रकाली की आदमकद प्रतिमा वरदायिनी मुद्रा में है। मां की चतुर्भुज प्रतिमा करीब साढ़े चार पीठ ऊंची और ढाई पीठ चौड़ी है और एक बेशकीमती काले पत्थर को तराश कर बनाई गई है। प्रतिमा के चरणों के नीचे ब्राह्मी लिपि में यह अंकित है कि प्रतिमा का निर्माण नौवीं शताब्दी में राजा महेंद्र पाल द्वितीय ने कराया था। 8. गढ़देवी का मंदिरः गढ़वा जिले में मां गढ़देवी का मंदिर है। मंदिर के कारण ही जिले का नाम गढ़वा पड़ा। गढ़वा ही नहीं आसपास के राज्यों से भी श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं। नवरात्र में भक्तों की काफी भीड़ होती है। मंदिर परिसर में गढ़ परिवार द्वारा सालों से मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित कर विशेष विधि विधान से पूजा किया जाता है, जिससे मंदिर पूरे नौ दिन असीम श्रद्धा का केंद्र बना रहता है। 9. मां कौलेश्वरी मंदिर चतरा जिले के हंटरगंज प्रखंड से छह किलोमीटर दूर स्थित मां कौलेश्वरी मंदिर श्रद्धा और आस्था का केंद्र है। कोल्हुआ पहाड़ की चोटी पर बने इस प्राचीन मंदिर में मां कौलेश्वरी की दिव्य प्रतिमा स्थापित है। यह मंदिर दसवीं सदी में बनाया गया था। धार्मिक कथाओं के अनुसार राजा विराट ने माता के प्रतिमा को यहां स्थापित किया था। दुर्गा सप्तशती में देवी भगवती को कौलेश्वरी कहा गया है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। मैहर शारदा देवी मंदिर चैत्र नवरात्रि 2026 के मौके पर मध्य प्रदेश के मैहर स्थित मां शारदा देवी मंदिर में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ रही है। त्रिकूट पर्वत पर करीब 600 मीटर की ऊंचाई पर बने इस प्राचीन मंदिर का इतिहास 6वीं शताब्दी से जुड़ा बताया जाता है। 1080 सीढ़ियां चढ़कर होते हैं दर्शन इस मंदिर तक पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं को 1080 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं। हालांकि अब रोपवे की सुविधा भी उपलब्ध है, जिससे भक्त आसानी से माता के दरबार तक पहुंच सकते हैं। हर साल नवरात्र के दौरान यहां लाखों श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं। शक्तिपीठ के रूप में मान्यता धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यह मंदिर प्रमुख शक्तिपीठों में से एक है। कहा जाता है कि यहां माता सती का हार गिरा था, जिसके कारण इस स्थान का नाम ‘मैहर’ पड़ा, जिसका अर्थ है “मां का हार”। आल्हा-ऊदल से जुड़ी मान्यताएं मंदिर से जुड़ी एक रहस्यमयी मान्यता यह भी है कि वीर योद्धा आल्हा-ऊदल यहां माता के परम भक्त थे। कहा जाता है कि आज भी सबसे पहले मां के दर्शन वही करते हैं और उनके द्वारा चढ़ाए गए ताजे फूल मंदिर में पाए जाते हैं। इतिहास और आस्था का संगम मान्यता है कि Adi Shankaracharya ने भी यहां पूजा-अर्चना की थी। मंदिर में मां शारदा की प्रतिमा की स्थापना विक्रम संवत 559 में की गई थी। इस स्थान पर अन्य देवी-देवताओं जैसे काल भैरवी, हनुमान, काली, दुर्गा और शेषनाग की भी पूजा की जाती है। नवरात्र में विशेष आयोजन चैत्र नवरात्र के दौरान यहां भव्य मेला लगता है। सुबह 4 बजे से आरती शुरू होती है और दिनभर श्रद्धालु लंबी कतारों में खड़े होकर माता के दर्शन करते हैं। शाम को भी भजन-कीर्तन और आरती के बाद मंदिर के पट बंद कर दिए जाते हैं। धार्मिक आस्था, इतिहास और रहस्यमयी मान्यताओं से जुड़ा यह मंदिर हर साल लाखों श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करता है।
आस्था और श्रद्धा का प्रतीक Chaitra Navratri इस वर्ष 19 मार्च 2026 से प्रारंभ हो चुका है। नौ दिनों तक चलने वाले इस पर्व में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा की जाती है और इसका समापन Ram Navami के साथ होता है। इस बार तिथियों, मुहूर्तों और विशेष संयोगों को लेकर श्रद्धालुओं में खास उत्साह देखा जा रहा है। कलश स्थापना का शुभ समय 19 मार्च को सुबह 6:40 बजे तक अमावस्या रहने के बाद प्रतिपदा तिथि प्रारंभ हुई। प्रतिपदा के क्षय होने के कारण इसी दिन कलश स्थापना की गई। अभिजीत मुहूर्त: सुबह 11:32 बजे से 12:21 बजे तक हालांकि पूरे दिन स्थापना संभव है, लेकिन सुबह का समय सबसे शुभ माना गया है। मंगलवारी जुलूसों का धार्मिक उत्साह रामनवमी से पहले इस बार तीन मंगलवारी जुलूसों का आयोजन हो रहा है, जो श्रद्धालुओं के लिए विशेष महत्व रखते हैं: पहला: 10 मार्च दूसरा: 17 मार्च तीसरा: 24 मार्च इन जुलूसों में भारी संख्या में श्रद्धालु शामिल होते हैं और भक्ति का माहौल चरम पर होता है। षष्ठी और महासप्तमी (24–25 मार्च) 24 मार्च (षष्ठी): बेलवरण का आयोजन, शाम 6:54 बजे तक तिथि मान्य 25 मार्च (महासप्तमी): मां दुर्गा के सातवें स्वरूप की पूजा, शाम 4:30 बजे तक सप्तमी इस दिन से पंडालों में विधिवत पूजा-अर्चना शुरू हो जाती है। महाअष्टमी और महानवमी (26–27 मार्च) 26 मार्च (महाअष्टमी): अष्टमी तिथि दोपहर 2:15 बजे तक संधि पूजा और विशेष अनुष्ठानों का महत्व 27 मार्च (महानवमी + रामनवमी): नवमी तिथि दोपहर 12:02 बजे तक पुनर्वसु नक्षत्र का शुभ संयोग रामनवमी का विशेष योग इस वर्ष Ram Navami 27 मार्च को मनाई जाएगी। वाराणसी पंचांग के अनुसार नवमी तिथि सुबह 5:56 बजे से शाम 5:12 बजे तक रहेगी, जिससे पूजा के लिए पर्याप्त शुभ समय उपलब्ध रहेगा। दशमी और देवी आगमन-गमन 28 मार्च (दशमी): सुबह 10:06 बजे तक तिथि मान्य धार्मिक मान्यता के अनुसार: मां दुर्गा का आगमन डोली पर गमन मुर्गा पर इसे वर्ष भर के शुभ-अशुभ संकेतों से जोड़ा जाता है।
नई दिल्ली,एजेंसियां। हिंदू धर्म में नवरात्रि का पर्व देवी शक्ति की आराधना का विशेष समय माना जाता है। इन नौ पवित्र दिनों में भक्त पूरे श्रद्धा और भक्ति भाव के साथ दुर्गा के नौ अलग-अलग स्वरूपों की पूजा करते हैं। इन्हें सामूहिक रूप से नवदुर्गा कहा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दौरान देवी पृथ्वी पर आकर अपने भक्तों की मनोकामनाएं पूरी करती हैं और उन्हें सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देती हैं।नवरात्रि के दौरान श्रद्धालु व्रत रखते हैं, देवी की पूजा-अर्चना करते हैं और घरों तथा मंदिरों में विशेष अनुष्ठान आयोजित किए जाते हैं। ऐसा माना जाता है कि जो व्यक्ति सच्चे मन और नियम के साथ माता की आराधना करता है, उसके जीवन से दुख और बाधाएं धीरे-धीरे समाप्त होने लगती हैं। पहला दिन: मां शैलपुत्री की पूजा नवरात्रि के पहले दिन शैलपुत्री की पूजा की जाती है। उन्हें पर्वतराज हिमालय की पुत्री माना जाता है और यह देवी पार्वती का पहला रूप हैं। माता शैलपुत्री नंदी बैल पर सवार रहती हैं और उनके हाथों में त्रिशूल और कमल का फूल होता है।धार्मिक मान्यता है कि मां शैलपुत्री की पूजा से भक्तों को मानसिक शांति, स्थिरता और आध्यात्मिक शक्ति प्राप्त होती है। यह स्वरूप जीवन में नई शुरुआत और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है। दूसरा दिन: मां ब्रह्मचारिणी नवरात्रि के दूसरे दिन ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती है। यह देवी पार्वती का वह स्वरूप है जब उन्होंने भगवान शिव को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की थी।माता ब्रह्मचारिणी के हाथ में जपमाला और कमंडल होता है और उनका स्वरूप तपस्या, त्याग और भक्ति का प्रतीक माना जाता है। भक्त इस दिन आत्मबल, धैर्य और आध्यात्मिक ऊर्जा की प्राप्ति के लिए उनकी आराधना करते हैं। तीसरा दिन: मां चंद्रघंटा नवरात्रि के तीसरे दिन चंद्रघंटा की पूजा की जाती है। उनके मस्तक पर अर्धचंद्र के आकार की घंटी होती है, इसलिए उन्हें चंद्रघंटा कहा जाता है।मां चंद्रघंटा सिंह या बाघ पर सवार रहती हैं और उनके हाथों में तलवार, त्रिशूल और धनुष जैसे कई अस्त्र होते हैं। यह देवी साहस, वीरता और शांति की प्रतीक मानी जाती हैं। भक्तों का विश्वास है कि उनकी पूजा से भय और नकारात्मक शक्तियां दूर होती हैं। चौथा दिन: मां कूष्मांडा नवरात्रि के चौथे दिन कूष्मांडा की पूजा की जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार उन्होंने अपनी दिव्य मुस्कान से पूरे ब्रह्मांड की रचना की थी।माता कूष्मांडा सिंह पर सवार रहती हैं और उनकी आठ भुजाएं होती हैं। उनके हाथों में अलग-अलग अस्त्र, जपमाला और अमृत से भरा कलश होता है। उन्हें जीवन ऊर्जा और सृष्टि की शक्ति का प्रतीक माना जाता है। पांचवां दिन: मां स्कंदमाता नवरात्रि के पांचवें दिन स्कंदमाता की पूजा की जाती है। वह भगवान कार्तिकेय की माता हैं और मातृत्व, प्रेम तथा करुणा का प्रतीक मानी जाती हैं।माता स्कंदमाता सिंह पर सवार रहती हैं और अपनी गोद में बाल रूप में भगवान कार्तिकेय को धारण करती हैं। माना जाता है कि उनकी पूजा से परिवार में सुख-समृद्धि और सौभाग्य की प्राप्ति होती है। छठा दिन: मां कात्यायनी नवरात्रि के छठे दिन कात्यायनी की पूजा की जाती है। यह देवी दुर्गा का वीर और युद्ध करने वाला स्वरूप माना जाता है।मां कात्यायनी को बुराई और अन्याय का नाश करने वाली शक्ति का प्रतीक माना जाता है। भक्त उनकी पूजा साहस, आत्मविश्वास और जीवन में सफलता के लिए करते हैं। सातवां दिन: मां कालरात्रि नवरात्रि के सातवें दिन कालरात्रि की पूजा की जाती है। उनका स्वरूप अत्यंत उग्र और शक्तिशाली माना जाता है।पौराणिक मान्यताओं के अनुसार मां कालरात्रि ने चंड और मुंड नामक राक्षसों का वध किया था। उनका यह रूप बुराई, भय और नकारात्मक शक्तियों के नाश का प्रतीक है। हालांकि अपने भक्तों के प्रति वह दयालु और कृपालु मानी जाती हैं। आठवां दिन: मां महागौरी नवरात्रि के आठवें दिन महागौरी की पूजा की जाती है। उनका स्वरूप अत्यंत शांत, पवित्र और सौम्य माना जाता है।धार्मिक मान्यता है कि मां महागौरी अपने भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी करती हैं और उन्हें जीवन में सुख, समृद्धि और सफलता प्रदान करती हैं। उनकी पूजा से पापों से मुक्ति और आध्यात्मिक शुद्धि प्राप्त होती है। नौवां दिन: मां सिद्धिदात्री नवरात्रि के अंतिम दिन सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है। उन्हें सभी प्रकार की सिद्धियां और दिव्य शक्तियां देने वाली देवी माना जाता है।पौराणिक मान्यताओं के अनुसार देवता, ऋषि और मनुष्य सभी उनकी आराधना करते हैं। मां सिद्धिदात्री की पूजा से ज्ञान, सफलता और आध्यात्मिक उन्नति की प्राप्ति होती है। नवरात्रि पूजा का आध्यात्मिक महत्व नवरात्रि का पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आत्मिक शुद्धि और आध्यात्मिक जागरण का प्रतीक भी है। इन नौ दिनों में देवी के अलग-अलग स्वरूपों की पूजा करके भक्त शक्ति, ज्ञान, साहस और समृद्धि की कामना करते हैं।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।