नई दिल्ली, एजेंसियां। संसद का मानसून सत्र 20 जुलाई से शुरू होकर 13 अगस्त 2026 तक चलेगा। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने केंद्र सरकार की सिफारिश पर लोकसभा और राज्यसभा की बैठकें बुलाने को मंजूरी दे दी है। केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर इसकी जानकारी साझा करते हुए कहा कि राष्ट्रपति की स्वीकृति के बाद संसद के दोनों सदनों का मानसून सत्र निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार आयोजित किया जाएगा। संसदीय परंपरा के अनुसार संसदीय परंपरा के अनुसार मानसून सत्र की शुरुआत राष्ट्रपति के अभिभाषण से होगी। इसके बाद लोकसभा और राज्यसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा कराई जाएगी। करीब तीन सप्ताह तक चलने वाले इस सत्र में सरकार कई महत्वपूर्ण विधेयकों को पेश करने और उन्हें पारित कराने का प्रयास करेगी। इसके साथ ही विभिन्न राष्ट्रीय और जनहित से जुड़े मुद्दों पर भी दोनों सदनों में विस्तृत चर्चा होने की संभावना है। केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने अपने बयान में कहा कि मानसून सत्र लोकतांत्रिक विमर्श का महत्वपूर्ण मंच होगा, जहां राष्ट्रीय महत्व के विषयों पर सार्थक बहस, चर्चा और निर्णय लिए जाएंगे। उन्होंने उम्मीद जताई कि सभी राजनीतिक दल सकारात्मक सहयोग के साथ संसद की कार्यवाही को सफल बनाने में योगदान देंगे। इस बार के मानसून सत्र पर राजनीतिक दृष्टि इस बार के मानसून सत्र पर राजनीतिक दृष्टि से भी खास नजर रहेगी। विपक्ष महंगाई, बेरोजगारी, कृषि, आर्थिक स्थिति, कानून-व्यवस्था और अन्य समसामयिक मुद्दों को लेकर सरकार को घेरने की तैयारी में है। वहीं सरकार अपने विधायी एजेंडे को आगे बढ़ाने के साथ विभिन्न नीतिगत फैसलों पर सदन की सहमति हासिल करने की कोशिश करेगी। संसद का यह सत्र कई महत्वपूर्ण विधेयकों, नीति संबंधी चर्चाओं और सरकार-विपक्ष के बीच होने वाली बहस के कारण बेहद अहम माना जा रहा है। ऐसे में आगामी तीन सप्ताह तक देश की राजनीतिक गतिविधियों का केंद्र संसद भवन रहेगा।
रांची। झारखंड के वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने सरकार की ओर से उपलब्ध कराई गई पूरी सुरक्षा व्यवस्था वापस लौटा दी है। बताया जा रहा है कि पुलिस मुख्यालय की ओर से सुरक्षा व्यवस्था में कटौती से जुड़े एक पत्र के बाद मंत्री ने नाराजगी जताते हुए यह फैसला लिया। पिछले पांच दिनों से वह बिना सुरक्षा कर्मियों के ही सरकारी कार्यक्रमों और बैठकों में शामिल हो रहे हैं। गुरुवार को आयोजित राज्य मंत्रिपरिषद (कैबिनेट) की बैठक में भी वह बिना सुरक्षा के पहुंचे। हालांकि, वह अभी भी मंत्री के तौर पर आवंटित सरकारी वाहन का उपयोग कर रहे हैं। सुरक्षा वाहन कम करने के पत्र से बढ़ी नाराजगी जानकारी के अनुसार, पुलिस मुख्यालय ने वित्त विभाग को पत्र भेजकर मंत्री की सुरक्षा में तैनात एक वाहन वापस लेने का निर्देश दिया था। अब तक उनकी सुरक्षा में चार वाहन और 16 सुरक्षा कर्मी तैनात थे। यह पत्र वित्त विभाग के संयुक्त सचिव के माध्यम से वित्त मंत्री तक पहुंचा। पत्र मिलने के बाद मंत्री ने नाराजगी जाहिर करते हुए पूरी सुरक्षा व्यवस्था ही लौटाने का निर्णय लिया। 'तीन गाड़ियों में 16 जवानों की तैनाती व्यावहारिक नहीं' सूत्रों के मुताबिक, वित्त मंत्री का मानना था कि यदि एक वाहन वापस ले लिया जाता है तो 16 सुरक्षा कर्मियों को केवल तीन वाहनों में समायोजित करना व्यावहारिक नहीं होगा। इसी कारण उन्होंने सुरक्षा में तैनात सभी कर्मियों और सुरक्षा वाहनों को वापस भेज दिया। फिलहाल वह बिना सरकारी सुरक्षा के ही अपने आधिकारिक दायित्वों का निर्वहन कर रहे हैं। इस घटनाक्रम ने राज्य के राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में चर्चा तेज कर दी है। हालांकि, इस पूरे मामले पर अब तक पुलिस मुख्यालय या राज्य सरकार की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। वहीं, मंत्री के इस फैसले को लेकर विभिन्न स्तरों पर अलग-अलग तरह की चर्चाएं जारी हैं।
नई दिल्ली, एजेंसियां। तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) में नेतृत्व और चुनाव चिन्ह को लेकर बढ़े विवाद के बीच चुनाव आयोग ने दोनों गुटों को नोटिस जारी कर अपना-अपना पक्ष रखने को कहा है। आयोग ने ममता बनर्जी गुट और बागी गुट से 6 जुलाई 2026 को शाम 5:30 बजे तक दावे, प्रति-दावे और संबंधित दस्तावेज जमा करने के निर्देश दिए हैं। दोनों गुटों से मांगे गए दावे और दस्तावेज चुनाव आयोग ने दोनों पक्षों से पार्टी के संगठनात्मक चुनाव, अधिकृत हस्ताक्षरकर्ताओं , पार्टी के संविधान और 'जुड़वां फूल' चुनाव चिन्ह पर अपने दावे के समर्थन में सभी आवश्यक दस्तावेज प्रस्तुत करने को कहा है। आयोग दोनों पक्षों की ओर से दाखिल किए जाने वाले रिकॉर्ड का परीक्षण करेगा। चुनाव चिन्ह पर बना है मुख्य विवाद बागी गुट का दावा है कि उसे पार्टी के अधिकांश विधायकों और पदाधिकारियों का समर्थन प्राप्त है, इसलिए वही असली टीएमसी है। वहीं ममता बनर्जी के नेतृत्व वाला गुट पार्टी के संविधान और संगठनात्मक ढांचे के आधार पर खुद को वास्तविक तृणमूल कांग्रेस बता रहा है। 6 जुलाई के बाद होगी अगली कार्रवाई निर्धारित समय सीमा तक दोनों पक्षों के जवाब मिलने के बाद चुनाव आयोग दस्तावेजों की समीक्षा करेगा। आवश्यकता पड़ने पर आयोग अगली सुनवाई की तारीख तय करेगा और इसके बाद पार्टी के नाम, संगठन और चुनाव चिन्ह को लेकर आगे का निर्णय लिया जाएगा। राजनीतिक हलकों की नजर आयोग के फैसले पर टीएमसी से जुड़े इस विवाद पर पूरे देश की राजनीतिक नजरें टिकी हुई हैं। माना जा रहा है कि चुनाव आयोग का फैसला पश्चिम बंगाल की राजनीति और पार्टी के भविष्य पर महत्वपूर्ण असर डाल सकता है।
चेन्नई, एजेंसियां। तमिलनाडु की राजनीति में एक बार फिर बड़ा विवाद सामने आया है। सत्तारूढ़ तमिलगा वेट्री कझगम (TVK) के विधायक एन. इलैयाराजा ने आरोप लगाया है कि उन्हें पार्टी छोड़ने और सरकार के खिलाफ जाने के लिए 35 करोड़ रुपये का लालच दिया गया। विधायक की शिकायत के आधार पर पुलिस ने पूर्व डीएमके मंत्री वी. सेंथिल बालाजी के भाई अशोक कुमार के खिलाफ मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। इस घटनाक्रम ने राज्य की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। विधायक का आरोप- पार्टी बदलने के लिए मिला ऑफर एन. इलैयाराजा का आरोप है कि उन्हें कई बार संपर्क कर सत्तारूढ़ दल छोड़ने के लिए दबाव बनाया गया। शिकायत में कहा गया है कि सरकार गिराने की कथित साजिश के तहत उन्हें 35 करोड़ रुपये की पेशकश की गई और इनकार करने पर धमकियां भी दी गईं। पुलिस ने शिकायत मिलने के बाद मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। जांच में सामने आए नए दावे पुलिस के अनुसार, इस मामले में पहले गिरफ्तार किए गए पांच आरोपियों से पूछताछ के दौरान कई अहम जानकारियां मिली हैं। जांच में शामिल एक आरोपी नरेश ने कथित तौर पर बताया कि उसने विधायक से संपर्क करने से पहले चेन्नई में अशोक कुमार से मुलाकात की थी। उसने यह भी दावा किया कि उसने अशोक कुमार और वी. सेंथिल बालाजी के कहने पर विधायक से संपर्क किया था। इन्हीं बयानों के आधार पर पुलिस ने अशोक कुमार के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम सहित विभिन्न धाराओं में मामला दर्ज किया है। राजनीतिक माहौल पहले से गर्म यह मामला ऐसे समय सामने आया है जब तमिलनाडु में विधानसभा चुनाव के बाद बनी गठबंधन सरकार की स्थिरता को लेकर लगातार राजनीतिक बयानबाजी हो रही है। TVK को चुनाव में 108 सीटें मिली थीं और कांग्रेस सहित अन्य सहयोगी दलों के समर्थन से पार्टी ने सरकार बनाई थी। दूसरी ओर, डीएमके लगातार सरकार के बहुमत और स्थिरता पर सवाल उठाती रही है। पुलिस का कहना है कि मामले की जांच जारी है और आगे की कार्रवाई उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर की जाएगी।
कोलकाता, एजेंसियां। पश्चिम बंगाल की अन्नपूर्णा भंडार योजना को लेकर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के बीच राजनीतिक विवाद तेज हो गया है। टीएमसी नेता और पूर्व राज्यसभा सांसद साकेत गोखले ने आरोप लगाया है कि भाजपा सरकार ने योजना के तहत बड़ी संख्या में महिलाओं के नाम लाभार्थियों की सूची से हटाकर अपना पहला बड़ा घोटाला किया है। वहीं, मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि केवल अपात्र और फर्जी आवेदनों को ही रद्द किया गया है। टीएमसी ने उठाए लाभार्थियों की संख्या पर सवाल साकेत गोखले ने कहा कि ममता बनर्जी सरकार की लक्ष्मी भंडार योजना के तहत करीब 2.4 करोड़ महिलाओं को लाभ मिल रहा था, जबकि नई अन्नपूर्णा भंडार योजना में लाभार्थियों की संख्या घटकर लगभग 1.3 करोड़ रह गई है। उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर 1.1 करोड़ महिलाओं के नाम क्यों हटाए गए। टीएमसी का आरोप है कि भाजपा सरकार ने राजनीतिक बदले की भावना से महिलाओं को योजना से बाहर किया है। सरकार का दावा- फर्जी आवेदन हटाए गए मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने कहा कि सरकार को योजना के लिए करीब 1.6 करोड़ आवेदन मिले थे। विस्तृत जांच के बाद 27 लाख आवेदन रद्द किए गए, जिनमें मृत लाभार्थियों के नाम, डुप्लीकेट बैंक खाते, मतदाता सूची से हटे नाम और नागरिकता या निवास से जुड़ी विसंगतियां पाई गईं। उन्होंने कहा कि सभी पात्र महिलाओं के खातों में डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) के जरिए पहली किस्त भेजने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है और लगभग 1.1 करोड़ खातों में राशि जमा कराई जा चुकी है। सरकार का कहना है कि योजना का उद्देश्य केवल पात्र महिलाओं तक पारदर्शी तरीके से लाभ पहुंचाना है, जबकि टीएमसी इसे महिलाओं के अधिकारों पर हमला बताते हुए भाजपा सरकार को लगातार घेर रही है। अन्नपूर्णा भंडार योजना को लेकर दोनों दलों के बीच सियासी टकराव फिलहाल और तेज होने के आसार हैं।
रांची। झारखंड के कथित शराब घोटाले मामले में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) द्वारा पूर्व वित्त मंत्री एवं कांग्रेस विधायक डॉ. रामेश्वर उरांव और उनके बेटे रोहित उरांव को पूछताछ के लिए समन जारी किए जाने के बाद राज्य की राजनीति गरमा गई है। इस कार्रवाई पर कांग्रेस ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए भाजपा पर राजनीतिक दुर्भावना से काम करने का आरोप लगाया है। झारखंड कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व शिक्षामंत्री बंधु तिर्की ने कहा कि भाजपा केंद्रीय एजेंसियों का इस्तेमाल राजनीतिक विरोधियों को परेशान करने के लिए कर रही है। 'समन से बाल भी बांका नहीं होगा' बंधु तिर्की ने कहा कि डॉ. रामेश्वर उरांव एक सम्मानित जनप्रतिनिधि हैं और ईडी के समन से उनका "बाल भी बांका नहीं होगा।" उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा आगामी राजनीतिक परिस्थितियों को देखते हुए विपक्षी नेताओं को निशाना बना रही है। तिर्की ने दावा किया कि उन्हें भी पहले बिना ठोस तथ्यों के मामलों में फंसाकर जनता के बीच गलत संदेश देने की कोशिश की गई थी। उन्होंने कहा कि झारखंड की जनता भाजपा की कार्यशैली और राजनीतिक रणनीति को अच्छी तरह समझती है। भाजपा पर लगाए गंभीर आरोप पूर्व मंत्री ने भाजपा पर पलटवार करते हुए कहा कि पार्टी के कई नेताओं पर भी भ्रष्टाचार और घोटालों के आरोप लग चुके हैं, लेकिन उन मामलों में एजेंसियों की कार्रवाई नहीं होती। उन्होंने पूर्व स्वास्थ्य मंत्री और भाजपा नेता भानु प्रताप शाही का नाम लेते हुए कहा कि जिन पर पहले घोटालों के आरोप लगे, वे भाजपा में शामिल होने के बाद "पाक-साफ" हो गए। बंधु तिर्की ने आरोप लगाया कि राज्य के कई हिस्सों में भ्रष्टाचार के पैसे से जमीन खरीदने और संपत्ति बनाने के मामले सामने आए हैं, लेकिन उन पर कोई जांच नहीं हो रही। उन्होंने भाजपा को चुनौती देते हुए कहा कि ईडी या अन्य एजेंसियों के जरिए दबाव बनाने से पार्टी को कोई राजनीतिक लाभ नहीं मिलेगा। तिर्की ने कहा कि 2 अगस्त को रांची में होने वाला आदिवासी महाजुटान भाजपा को जनता की वास्तविक ताकत का एहसास करा देगा। उन्होंने दोहराया कि कांग्रेस इस कार्रवाई से डरने वाली नहीं है और लोकतांत्रिक तरीके से अपना संघर्ष जारी रखेगी।
कोलकाता: पश्चिम बंगाल के पश्चिम मेदिनीपुर जिले के डेबरा में तृणमूल कांग्रेस (TMC) के एक प्रभावशाली नेता हुमायूं कबीर की गिरफ्तारी के बाद इलाके की राजनीति में हलचल तेज हो गई है। डेबरा ब्लॉक पंचायत समिति के सदस्य और तृणमूल कांग्रेस अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ के अध्यक्ष हुमायूं कबीर को डेबरा थाना पुलिस ने हिरासत में लिया है। पुलिस ने अभी तक उनके खिलाफ दर्ज आरोपों का आधिकारिक तौर पर खुलासा नहीं किया है। शिकायतों के आधार पर हुई कार्रवाई पुलिस के अनुसार, हुमायूं कबीर के खिलाफ कुछ शिकायतें प्राप्त हुई थीं, जिनकी जांच शुरू की गई। प्रारंभिक जांच में पर्याप्त तथ्य सामने आने के बाद पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार किया। यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि मामला किस प्रकृति का है और किन धाराओं के तहत कार्रवाई की गई है। जिले की राजनीति में बढ़ी हलचल एक प्रभावशाली टीएमसी नेता की गिरफ्तारी के बाद पश्चिम मेदिनीपुर के राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का दौर तेज हो गया है। स्थानीय स्तर पर भी इस कार्रवाई को लेकर लोगों में उत्सुकता बनी हुई है। विभिन्न राजनीतिक दल इस घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए हैं। पुलिस ने कहा- जांच जारी पुलिस अधिकारियों का कहना है कि मामले की गंभीरता को देखते हुए सभी पहलुओं की जांच की जा रही है। जांच पूरी होने के बाद उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आगे की कानूनी कार्रवाई की जाएगी। फिलहाल पुलिस पूरे मामले से जुड़े तथ्यों को जुटाने में लगी हुई है। आरोपों पर अब भी सस्पेंस हुमायूं कबीर की गिरफ्तारी के बावजूद पुलिस ने अभी तक यह नहीं बताया है कि उनके खिलाफ आरोप क्या हैं। ऐसे में मामले को लेकर कई तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं। पुलिस का कहना है कि जांच पूरी होने के बाद ही विस्तृत जानकारी सार्वजनिक की जाएगी। आगे क्या? जिले के राजनीतिक पर्यवेक्षकों की नजर अब पुलिस जांच की दिशा और आगे होने वाली कानूनी कार्रवाई पर टिकी हुई है। इस मामले में पुलिस की अगली कार्रवाई और संभावित खुलासों का इंतजार किया जा रहा है।
नई दिल्ली: केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री भागीरथ चौधरी को अपने ही मंत्रालय के अधीन संचालित राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड (NHB) की एक योजना के तहत 99.60 लाख रुपये की सब्सिडी मिलने का मामला सामने आया है। इस खुलासे के बाद हितों के टकराव (Conflict of Interest) को लेकर सवाल उठने लगे हैं। एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, राजस्थान स्थित भागीरथ चौधरी के कृषि प्रोजेक्ट को राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड की योजना के तहत कुल परियोजना लागत का 50 प्रतिशत यानी 99.60 लाख रुपये की सब्सिडी मंजूर की गई। यह राशि करीब तीन महीने पहले स्वीकृत हुई थी। फार्म पर लगा है सरकारी सहायता का बोर्ड रिपोर्ट के मुताबिक, राजस्थान में स्थित भागीरथ चौधरी के फार्म पर लगे बोर्ड में स्पष्ट रूप से लिखा है कि इस परियोजना को भारत सरकार के कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के तहत राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड से वित्तीय सहायता मिली है। बोर्ड पर लाभार्थी के रूप में भागीरथ चौधरी का नाम दर्ज है और 99.60 लाख रुपये की सब्सिडी का भी उल्लेख किया गया है। बोर्ड पर यह जानकारी नहीं दी गई कि लाभार्थी स्वयं केंद्र सरकार में कृषि राज्य मंत्री भी हैं। अपने ही मंत्रालय की योजना से मिली सब्सिडी यह सब्सिडी मिशन फॉर इंटीग्रेटेड डेवलपमेंट ऑफ हॉर्टिकल्चर (MIDH) के तहत संचालित राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड (NHB) की योजना के अंतर्गत दी गई है। यह योजना वर्ष 2014-15 में बड़े पैमाने पर सब्जियों, फूलों और बागवानी फसलों की व्यावसायिक खेती को बढ़ावा देने के उद्देश्य से शुरू की गई थी। राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के अधीन कार्य करने वाली एक स्वायत्त संस्था है। NHB के पदेन उपाध्यक्ष भी हैं भागीरथ चौधरी राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार, बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स का पदेन अध्यक्ष केंद्रीय कृषि मंत्री होता है, जबकि केंद्रीय कृषि राज्य मंत्री पदेन उपाध्यक्ष की भूमिका निभाते हैं। यानी वर्तमान में भागीरथ चौधरी न केवल इस योजना के लाभार्थी हैं, बल्कि उसी बोर्ड के पदेन उपाध्यक्ष भी हैं, जो बागवानी योजनाओं के संचालन की निगरानी करता है। वेबसाइट पर उपाध्यक्ष पद के लिए मंत्रालय का पदनाम दर्ज है, जबकि संपर्क के लिए उपलब्ध ईमेल आईडी भागीरथ चौधरी से संबंधित बताई गई हैं। क्या सब्सिडी मंजूरी में मंत्री की भूमिका होती है? रिपोर्ट के अनुसार, तकनीकी रूप से किसी भी परियोजना को मंजूरी देने का अंतिम अधिकार राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड की परियोजना अनुमोदन समिति (Project Approval Committee) के पास होता है। इस समिति में बोर्ड के अध्यक्ष या उपाध्यक्ष शामिल नहीं होते। समिति में विभिन्न तकनीकी विशेषज्ञ और वरिष्ठ अधिकारी परियोजनाओं का मूल्यांकन कर स्वीकृति देते हैं। ऐसे में दस्तावेजों के आधार पर यह माना जा रहा है कि परियोजना की मंजूरी की प्रक्रिया में कृषि राज्य मंत्री की प्रत्यक्ष भूमिका नहीं थी। हितों के टकराव पर उठे सवाल मंत्री की प्रत्यक्ष भूमिका न होने के बावजूद यह मामला हितों के टकराव (Conflict of Interest) को लेकर चर्चा में आ गया है। सवाल उठ रहे हैं कि क्या किसी मंत्रालय के मंत्री को उसी मंत्रालय की योजना का लाभार्थी होना उचित माना जा सकता है। इसी मुद्दे पर जवाब लेने के लिए मीडिया की ओर से भागीरथ चौधरी से संपर्क किया गया था। उनसे पूछा गया कि क्या अपने ही मंत्रालय की योजना के तहत सब्सिडी प्राप्त करना हितों के टकराव की श्रेणी में आता है। हालांकि, खबर प्रकाशित होने तक उनकी ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई थी.
नई दिल्ली: कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने पासपोर्ट को लेकर केंद्र सरकार के रुख पर सवाल उठाते हुए इसे "अजीब कानूनी विरोधाभास" बताया है। उन्होंने कहा कि जब सरकार पासपोर्ट जारी करने से पहले सभी दस्तावेजों और पहचान की विस्तृत जांच करती है, तो फिर उसी पासपोर्ट को नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं माना जाना आम लोगों के लिए भ्रम पैदा करता है। थरूर ने सरकार से कानून में संशोधन कर पासपोर्ट और आधार को लेकर स्पष्ट व्यवस्था बनाने की मांग की है। पासपोर्ट को लेकर सरकार के रुख पर उठाए सवाल शशि थरूर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट करते हुए कहा कि भारतीय पासपोर्ट नागरिकता का अंतिम कानूनी प्रमाण नहीं माना जाता, जबकि इसे जारी करने से पहले सरकार व्यापक सत्यापन प्रक्रिया अपनाती है। उन्होंने कहा कि यदि इतनी जांच के बाद भी पासपोर्ट नागरिकता साबित नहीं करता, तो यह कानूनी व्यवस्था में गंभीर विरोधाभास को दर्शाता है। उन्होंने सरकार से आग्रह किया कि इस भ्रम को दूर करने के लिए कानून में आवश्यक बदलाव किए जाएं। आधार कार्ड को लेकर भी जताई चिंता थरूर ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि आधार केवल पहचान और पते का प्रमाण है, नागरिकता का नहीं। ऐसे में करोड़ों भारतीयों के पास सरकारी दस्तावेज तो हैं, लेकिन नागरिकता साबित करने के लिए कोई स्पष्ट और अंतिम दस्तावेज नहीं है। उनका कहना है कि सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि आखिर नागरिकता का वैध और अंतिम प्रमाण कौन-सा दस्तावेज है। कानून में संशोधन की मांग कांग्रेस सांसद ने मांग की कि केंद्र सरकार कानून में बदलाव कर भारतीय पासपोर्ट और सामान्य आधार कार्ड को नागरिकता का वैध और अंतिम प्रमाण घोषित करे। उनका कहना है कि इससे नागरिकों को विभिन्न सरकारी प्रक्रियाओं में बार-बार अपनी नागरिकता साबित करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी और प्रशासनिक व्यवस्था भी सरल होगी। गैर-नागरिकों के लिए अलग आधार कार्ड का सुझाव शशि थरूर ने यह भी सुझाव दिया कि भारत में रहने वाले गैर-नागरिकों के लिए अलग रंग या अलग पहचान वाला आधार कार्ड जारी किया जाए। उनका मानना है कि इससे नागरिकों और गैर-नागरिकों के बीच स्पष्ट अंतर किया जा सकेगा और सरकारी एजेंसियों के लिए पहचान संबंधी प्रक्रियाएं आसान होंगी। सरकार ने क्या कहा? केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया है कि पासपोर्ट मुख्य रूप से विदेश यात्रा के लिए जारी किया जाने वाला दस्तावेज है, न कि नागरिकता का अंतिम प्रमाण। सरकार का कहना है कि यह कोई नया नियम नहीं है, बल्कि लंबे समय से लागू कानूनी व्यवस्था का हिस्सा है। सरकार ने अपने पक्ष के समर्थन में पासपोर्ट अधिनियम, 1967 और 2013 के बॉम्बे हाई कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि पासपोर्ट जारी किया जाना अपने आप में नागरिकता का अंतिम कानूनी प्रमाण नहीं माना जा सकता।
पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान से जुड़े कथित वायरल वीडियो को लेकर राज्य की राजनीति गरमा गई है। इस मामले में बीजेपी नेता राघव चड्ढा ने गंभीर आरोप लगाते हुए FIR दर्ज करने और मुख्यमंत्री के इस्तीफे की मांग की है। उन्होंने दावा किया है कि मामले को दबाने के लिए फर्जी फोरेंसिक रिपोर्ट तैयार करवाई गई। राघव चड्ढा के आरोप से बढ़ा विवाद राघव चड्ढा ने आरोप लगाया कि आम आदमी पार्टी (AAP) की ओर से मुख्यमंत्री भगवंत मान को बचाने के लिए कथित तौर पर फर्जी फोरेंसिक रिपोर्ट तैयार करवाई गई। उन्होंने कहा कि इस पूरे घटनाक्रम से सिख समुदाय की भावनाएं आहत हुई हैं और लोगों में नाराजगी बढ़ रही है। FIR और स्वतंत्र जांच की मांग बीजेपी नेता ने मांग की कि इस बात की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए कि कथित फर्जी रिपोर्ट किसने तैयार की, इसमें कौन-कौन अधिकारी शामिल थे और इसमें सरकारी संसाधनों का कितना इस्तेमाल हुआ। उन्होंने पूरे मामले की स्वतंत्र जांच की भी अपील की। गुरुग्राम पुलिस की कार्रवाई से मामला और उलझा गुरुग्राम पुलिस ने इस मामले में दो लोगों को गिरफ्तार किया है। आरोप है कि उन्होंने 10 लाख रुपये लेकर फर्जी फोरेंसिक रिपोर्ट तैयार की। पुलिस यह भी जांच कर रही है कि इस पूरे मामले में पंजाब के कुछ अधिकारियों की भूमिका तो नहीं है। भगवंत मान ने आरोपों को बताया साजिश मुख्यमंत्री भगवंत मान ने सभी आरोपों को सिरे से खारिज किया है। उन्होंने कहा कि वायरल वीडियो पूरी तरह फर्जी है और उन्हें बदनाम करने के लिए राजनीतिक साजिश रची जा रही है। उनका कहना है कि वीडियो में दिख रहा व्यक्ति वह नहीं हैं। विपक्ष पर साधा निशाना सीएम मान ने बीजेपी, कांग्रेस और अकाली दल पर उनकी छवि खराब करने का आरोप लगाया है। उन्होंने कहा कि जनता सच्चाई जानती है और वे अपने विकास कार्यों पर ध्यान केंद्रित करते रहेंगे। अकाल तख्त की कार्रवाई भी चर्चा में इस विवाद के बीच अकाल तख्त ने मुख्यमंत्री भगवंत मान को तलब किया था। बाद में सिख समुदाय से उनके सामाजिक बहिष्कार की अपील किए जाने की भी खबर सामने आई, जिससे मामला और अधिक संवेदनशील हो गया है।
विदेश मंत्रालय (Ministry of External Affairs) के उस बयान के बाद राजनीतिक विवाद गहरा गया है, जिसमें कहा गया कि पासपोर्ट केवल एक यात्रा दस्तावेज है और इसे नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं माना जा सकता। इस टिप्पणी को लेकर कांग्रेस, AIMIM और एनसीपी (शरद पवार गुट) सहित विपक्षी दलों ने केंद्र सरकार पर सवाल उठाए हैं। विपक्ष का कहना है कि इस बयान से आम जनता में भ्रम की स्थिति पैदा हो रही है। सरकार के बयान पर विवाद की शुरुआत विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया था कि पासपोर्ट मुख्य रूप से अंतरराष्ट्रीय यात्रा के लिए जारी किया जाने वाला दस्तावेज है और यह नागरिकता का निर्णायक प्रमाण नहीं है। मंत्रालय ने कहा कि यह कानूनी स्थिति नई नहीं है और लंबे समय से लागू है। इसी बयान के बाद राजनीतिक विवाद तेज हो गया। कांग्रेस का सवाल—नागरिकता साबित कैसे हो? कांग्रेस नेता Supriya Shrinate ने सरकार पर निशाना साधते हुए पूछा कि यदि पासपोर्ट, आधार कार्ड, पैन कार्ड और वोटर आईडी जैसे दस्तावेज भी नागरिकता का प्रमाण नहीं हैं, तो फिर आम नागरिक अपनी नागरिकता कैसे साबित करे। उन्होंने इसे जनता के लिए भ्रम पैदा करने वाला मुद्दा बताया। ओवैसी ने उठाए कानूनी सवाल AIMIM प्रमुख Asaduddin Owaisi ने भी सरकार की टिप्पणी पर सवाल उठाते हुए कहा कि कानून के अनुसार पासपोर्ट केवल भारतीय नागरिकों को ही जारी किया जाता है। उन्होंने कहा कि यदि ऐसा है तो नागरिकता के प्रमाण को लेकर स्पष्टता जरूरी है। एनसीपी (शरद पवार) का हमला एनसीपी (शरदचंद्र पवार गुट) के प्रवक्ता ने कहा कि पहले आधार कार्ड, फिर वोटर आईडी और अब पासपोर्ट—लगातार प्रमुख दस्तावेजों की वैधता पर सवाल उठाए जा रहे हैं। उन्होंने पूछा कि यदि ये सभी प्रमाण पर्याप्त नहीं हैं तो नागरिकता साबित करने का वास्तविक आधार क्या है। राजनीतिक बहस तेज यह मुद्दा अब संसद से लेकर सोशल मीडिया तक चर्चा का केंद्र बन गया है। विपक्ष सरकार से नागरिकता प्रमाण को लेकर स्पष्ट नीति की मांग कर रहा है, जबकि केंद्र सरकार का कहना है कि पासपोर्ट नियमों में कोई बदलाव नहीं हुआ है और बयान केवल मौजूदा कानूनी स्थिति की व्याख्या है।
भुवनेश्वर: ओडिशा की राजनीति में बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। पूर्व आईएएस अधिकारी Sujatha Raut Karthikeyan ने गुरुवार को आधिकारिक तौर पर बीजू जनता दल (BJD) की सदस्यता ग्रहण कर ली। वह पूर्व मुख्यमंत्री Naveen Patnaik की मौजूदगी में पार्टी में शामिल हुईं। सामाजिक कल्याण और विशेष रूप से महिला सशक्तीकरण से जुड़े मिशन शक्ति कार्यक्रम में अहम भूमिका निभाने वाली सुजाता राउत ने 13 मार्च 2025 को भारतीय प्रशासनिक सेवा से इस्तीफा दिया था। राजनीतिक पृष्ठभूमि और पार्टी में शामिल होना सुजाता राउत कार्तिकेयन, जो 2000 बैच की आईएएस अधिकारी रह चुकी हैं, लंबे समय तक ओडिशा सरकार में महत्वपूर्ण प्रशासनिक पदों पर कार्यरत रहीं। उन्होंने विशेष रूप से महिला सशक्तीकरण से जुड़े कार्यक्रमों को विस्तार देने में अहम योगदान दिया। बीजू जनता दल में उनके शामिल होने की घोषणा पार्टी मुख्यालय शंख भवन में आयोजित बैठक के बाद की गई। नवीन पटनायक का बयान पूर्व मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने सुजाता राउत का पार्टी में स्वागत करते हुए कहा कि वह एक अनुभवी प्रशासनिक अधिकारी रही हैं और उन्होंने राज्य में कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों का सफलतापूर्वक निर्वहन किया है। उन्होंने उम्मीद जताई कि सुजाता अपनी नई राजनीतिक भूमिका में सहज होकर जनता, विशेषकर महिलाओं के सशक्तीकरण के लिए काम करेंगी। साथ ही उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि आगामी चुनावों में बीजू जनता दल का नेतृत्व स्वयं वही करेंगे और नेतृत्व परिवर्तन की सभी अटकलों को खारिज किया। सुजाता राउत का बयान पार्टी में शामिल होने के बाद सुजाता राउत ने कहा कि वह ओडिशा की जनता की सेवा को अपनी प्राथमिकता बनाए रखेंगी। उन्होंने कहा कि उन्हें बीते 24 वर्षों में नवीन पटनायक के नेतृत्व में काम करने का अवसर मिला और अब एक नई भूमिका में जनता की सेवा करने का अवसर मिला है। उन्होंने कहा कि वह पूरी निष्ठा और समर्पण के साथ राज्य के विकास और महिलाओं के सशक्तीकरण के लिए कार्य करेंगी। पार्टी के भीतर प्रतिक्रियाएं सूत्रों के अनुसार, बीजेडी के कुछ वरिष्ठ नेताओं ने उनके प्रवेश पर आपत्ति भी जताई थी। उनका कहना था कि 2024 के चुनावों में पार्टी के प्रदर्शन को लेकर संगठन के भीतर पहले से ही असंतोष है, और ऐसे में यह कदम राजनीतिक बहस को और बढ़ा सकता है। पार्टी नेतृत्व ने उनके शामिल होने को संगठनात्मक मजबूती और प्रशासनिक अनुभव के तौर पर देखा है।
रांची। झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को गुरुवार को झारखंड हाईकोर्ट से बड़ी कानूनी राहत मिली। जस्टिस अनिल कुमार चौधरी की अदालत ने सरायकेला-खरसावां जिले के आदित्यपुर थाना में वर्ष 2014 में दर्ज आचार संहिता उल्लंघन मामले की प्राथमिकी (FIR) को निरस्त कर दिया। इस फैसले के साथ ही मुख्यमंत्री के खिलाफ इस मामले में चल रही समस्त कानूनी कार्रवाई पर पूरी तरह विराम लग गया है। क्या था पूरा मामला? यह मामला 2014 के झारखंड विधानसभा चुनाव के दौरान कथित आचार संहिता उल्लंघन से जुड़ा था। आदित्यपुर थाना में कांड संख्या 418/2014 के तहत हेमंत सोरेन के खिलाफ FIR दर्ज की गई थी। उनकी ओर से हाईकोर्ट में याचिका दायर कर यह दलील दी गई थी कि दर्ज प्राथमिकी और उस पर आधारित कार्रवाई कानून सम्मत नहीं है। पहले ही ट्रायल पर लग चुकी थी रोक मामले की पूर्व सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने निचली अदालत में चल रही ट्रायल प्रक्रिया पर पहले ही रोक लगा दी थी। अंतिम सुनवाई में अदालत ने दोनों पक्षों याचिकाकर्ता हेमंत सोरेन और राज्य सरकार की दलीलें तथा उपलब्ध अभिलेखों का अवलोकन किया। इसके बाद याचिका स्वीकार करते हुए FIR निरस्त करने का आदेश दिया गया। राजनीतिक हलकों में चर्चा तेज हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद राजनीतिक और कानूनी हलकों में चर्चा तेज हो गई है। यह मामला करीब एक दशक से न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा बना हुआ था। अब FIR रद्द होने के बाद इसे मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के लिए एक महत्वपूर्ण कानूनी जीत और राज्य की राजनीति में अहम घटनाक्रम के रूप में देखा जा रहा है।
नई दिल्ली: राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (RSS) अपनी स्थापना के शताब्दी वर्ष में एक नए राजनीतिक और कानूनी विवाद के केंद्र में आ गया है। कांग्रेस नेता प्रियांक खरगे ने संघ प्रमुख मोहन भागवत को पत्र लिखकर सवाल उठाया है कि देश का सबसे बड़ा सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन होने का दावा करने वाला RSS आज तक औपचारिक रूप से पंजीकृत (Registered) क्यों नहीं हुआ। खरगे ने संगठन की फंडिंग, टैक्स अनुपालन और सार्वजनिक जवाबदेही पर भी सवाल खड़े किए हैं। प्रियांक खरगे ने कहा कि जब नागरिकों, गैर-सरकारी संगठनों (NGOs), ट्रस्टों, मंदिरों और कंपनियों को कानून के तहत पंजीकरण, लेखा-परीक्षा और पारदर्शिता के नियमों का पालन करना पड़ता है, तो RSS को इससे अलग क्यों रखा जाए। उन्होंने कहा कि 60,000 से अधिक शाखाओं और करोड़ों स्वयंसेवकों का दावा करने वाले संगठन को भी संवैधानिक जवाबदेही के मानकों पर खरा उतरना चाहिए। संघ का पक्ष: रजिस्ट्रेशन कभी अनिवार्य नहीं रहा विवाद के बीच संघ प्रमुख मोहन भागवत ने स्पष्ट किया है कि RSS की स्थापना 1925 में ब्रिटिश शासन के दौरान हुई थी, जब संगठन के पंजीकरण को लेकर कोई अनिवार्य कानूनी व्यवस्था नहीं थी। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता के बाद भी ऐसा कोई कानून नहीं बनाया गया, जिसने RSS के लिए रजिस्ट्रेशन को अनिवार्य बनाया हो। भागवत के अनुसार, RSS सरकार से कोई अनुदान या वित्तीय लाभ नहीं लेता और एक स्वैच्छिक संगठन के रूप में कार्य करता है। उन्होंने कहा कि संघ अपने वित्तीय लेन-देन का पूरा रिकॉर्ड रखता है और यदि सरकार कभी जानकारी मांगे तो वह अपना पूरा हिसाब-किताब प्रस्तुत कर सकता है। गुरु दक्षिणा पर नहीं लगता टैक्स RSS की आय का प्रमुख स्रोत ‘गुरु दक्षिणा’ है, जो स्वयंसेवकों द्वारा हर वर्ष गुरु पूर्णिमा के अवसर पर स्वेच्छा से दिया जाने वाला आर्थिक योगदान है। संघ का तर्क है कि यह व्यावसायिक आय नहीं, बल्कि स्वयंसेवकों का स्वैच्छिक योगदान है। 1970 के दशक में इस आय पर कर लगाने का प्रयास किया गया था, लेकिन मामला आयकर अपीलीय न्यायाधिकरण (ITAT) की बंबई पीठ तक पहुंचा। 26 जुलाई 1980 को दिए गए फैसले में न्यायाधिकरण ने माना कि RSS और उसके स्वयंसेवकों के बीच ‘म्यूचुअलिटी’ (Mutuality) का संबंध है, इसलिए गुरु दक्षिणा को कर योग्य आय नहीं माना जा सकता। 'Body of Individuals' के रूप में मान्यता RSS का कहना है कि आयकर अधिकारियों और न्यायालयों ने उसे ‘Body of Individuals’ (BOI) यानी ‘व्यक्तियों का समूह’ माना है। इसका अर्थ यह है कि कुछ व्यक्ति मिलकर एक संगठनात्मक इकाई के रूप में कार्य कर रहे हैं, लेकिन उनका किसी कंपनी, ट्रस्ट या सोसायटी के रूप में पंजीकृत होना आवश्यक नहीं है। संघ नेतृत्व का तर्क है कि इसी आधार पर उस पर आयकर की देनदारी लागू नहीं होती और वह मौजूदा कानूनों के तहत वैध रूप से काम कर रहा है। क्या बिना रजिस्ट्रेशन के संगठन गैरकानूनी हो जाता है? कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि किसी संगठन का गैर-पंजीकृत होना उसे स्वतः गैरकानूनी नहीं बनाता। झारखंड हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता अवनीश रंजन मिश्रा के अनुसार, भारत में रजिस्ट्रेशन मुख्य रूप से उन संस्थाओं के लिए आवश्यक होता है, जो सरकार से अनुदान, वित्तीय सहायता या विशेष कानूनी लाभ प्राप्त करना चाहती हैं। ऐसे में केवल रजिस्ट्रेशन न होने के आधार पर RSS को अवैध नहीं कहा जा सकता। क्यों महत्वपूर्ण बन गया है यह विवाद? RSS के रजिस्ट्रेशन को लेकर उठी बहस अब केवल एक कानूनी प्रश्न नहीं रह गई है। यह मुद्दा देश के सबसे प्रभावशाली सामाजिक-सांस्कृतिक संगठनों में से एक की वित्तीय पारदर्शिता, सार्वजनिक जवाबदेही और संस्थागत नियमन से जुड़ गया है। एक ओर आलोचक यह सवाल उठा रहे हैं कि इतने बड़े संगठन को अन्य संस्थाओं की तरह पारदर्शिता के नियमों के दायरे में लाया जाना चाहिए, वहीं RSS का कहना है कि उसने कभी कानून का उल्लंघन नहीं किया और मौजूदा कानूनी ढांचे के भीतर ही अपना कार्य संचालित किया है। RSS के शताब्दी वर्ष में उठा यह विवाद आने वाले दिनों में संगठन की संरचना, वित्तीय जवाबदेही और कानूनी स्थिति पर एक व्यापक राष्ट्रीय बहस को जन्म दे सकता है।
रांची। झारखंड में राज्यसभा की दो सीटों के लिए गुरुवार को मतदान शांतिपूर्ण ढंग से जारी है। इसी क्रम में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और विधायक कल्पना सोरेन विधानसभा पहुंचे और अपने मताधिकार का प्रयोग किया। दोनों नेताओं के विधानसभा पहुंचने के साथ ही राजनीतिक गतिविधियां और तेज हो गईं। सुबह से ही विधानसभा परिसर में विधायकों की आवाजाही बनी रही और विभिन्न राजनीतिक दलों के नेता मतदान प्रक्रिया पर लगातार नजर रखे हुए हैं।राज्यसभा चुनाव के लिए मतदान सुबह 9 बजे से शुरू हुआ, जो शाम 4 बजे तक चलेगा। इसके बाद शाम 5 बजे से मतगणना शुरू होगी और देर शाम तक परिणाम आने की संभावना है। चुनाव को देखते हुए विधानसभा परिसर में सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए हैं।
कोलकाता, एजेंसियां। तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) सांसद अभिषेक बनर्जी को हस्ताक्षर जालसाजी मामले में एक बार फिर पश्चिम बंगाल सीआईडी ने तलब किया है। गुरुवार को भवानी भवन स्थित सीआईडी मुख्यालय में उनसे करीब साढ़े पांच घंटे तक पूछताछ की गई, लेकिन जांच एजेंसी उनके जवाबों से संतुष्ट नहीं हुई। अधिकारियों के अनुसार, कई महत्वपूर्ण सवालों पर अभिषेक ने स्पष्ट जानकारी नहीं दी, जिसके चलते उन्हें 14 जून को दोपहर 12 बजे दोबारा पेश होने का नोटिस जारी किया गया है। जांच में सहयोग नहीं करने का आरोप सूत्रों के मुताबिक, सीआईडी अधिकारियों ने पूछताछ के दौरान विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से सवाल किए, लेकिन कई बार अभिषेक बनर्जी ने "मुझे नहीं पता", "मैं नहीं कह सकता" या "इस बारे में जानकारी नहीं है" जैसे जवाब दिए। जांच एजेंसी का मानना है कि उनके बयानों में विसंगतियां हैं और कई अहम सवालों के संतोषजनक उत्तर नहीं मिले। इसी कारण जांच को आगे बढ़ाने के लिए दोबारा पूछताछ आवश्यक समझी गई। कोर्ट की राहत के बाद हुए थे पेश सीआईडी ने इससे पहले भी अभिषेक बनर्जी को तीन बार समन भेजा था, लेकिन वे पेश नहीं हुए थे। मामला बाद में कलकत्ता हाईकोर्ट पहुंचा। अदालत से राहत मिलने के बाद अभिषेक दिल्ली से कोलकाता लौटे और सीधे सीआईडी मुख्यालय पहुंचे, जहां उनसे लंबी पूछताछ की गई। पूछताछ समाप्त होने के बाद उन्होंने मीडिया के किसी भी सवाल का जवाब नहीं दिया और बिना कोई बयान दिए वहां से रवाना हो गए। पूछताछ के बाद ममता बनर्जी से की मुलाकात पूछताछ के बाद अभिषेक बनर्जी देर रात मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के कालीघाट स्थित आवास पहुंचे। वहां टीएमसी के वरिष्ठ नेताओं के साथ बैठक हुई। हालांकि बैठक के विषय में किसी नेता ने आधिकारिक जानकारी नहीं दी। पार्टी नेताओं ने केवल इतना कहा कि मामला जांच के अधीन है और इस पर सार्वजनिक टिप्पणी करना उचित नहीं होगा। अब सभी की नजर 14 जून को होने वाली अगली पूछताछ पर टिकी है, जहां सीआईडी उनसे दोबारा अहम सवाल पूछेगी।
नई दिल्ली: कांग्रेस नेता उदित राज ने प्रधानमंत्री Narendra Modi के लंबे कार्यकाल और केंद्र सरकार की आर्थिक नीतियों को लेकर तीखी आलोचना की है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार विकास और अर्थव्यवस्था से जुड़े आंकड़ों को लेकर भ्रामक तस्वीर पेश कर रही है तथा वास्तविक मुद्दों से जनता का ध्यान भटकाने की कोशिश कर रही है। उदित राज ने कहा कि किसी भी सरकार का मूल्यांकन उसके कार्यकाल की अवधि से नहीं, बल्कि रोजगार सृजन, महंगाई नियंत्रण, प्रति व्यक्ति आय और आर्थिक अवसरों में सुधार जैसे मानकों से किया जाना चाहिए। उनके अनुसार, जनता इन मुद्दों पर जवाब चाहती है। GDP आंकड़ों को लेकर सरकार पर निशाना कांग्रेस नेता ने आर्थिक आंकड़ों और विकास दर को लेकर भी सवाल उठाए। उन्होंने दावा किया कि सरकार अपनी उपलब्धियों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करती है और आर्थिक स्थिति की वास्तविक तस्वीर सामने नहीं रखती। उदित राज ने अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की रिपोर्टों का हवाला देते हुए कहा कि आर्थिक आंकड़ों की विश्वसनीयता और पारदर्शिता को लेकर गंभीर चर्चा होनी चाहिए। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार आलोचनाओं का जवाब देने के बजाय राजनीतिक मुद्दों को अधिक प्रमुखता देती है। रोजगार और महंगाई को बताया बड़ा मुद्दा कांग्रेस नेता ने कहा कि देश के सामने रोजगार, महंगाई, उत्पादन, निर्यात-आयात और बढ़ते कर्ज जैसे मुद्दे सबसे बड़ी चुनौतियां हैं। उनके अनुसार, इन विषयों पर व्यापक बहस और ठोस नीतिगत कदमों की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि किसी भी अर्थव्यवस्था का आकलन जाति, धर्म या राजनीतिक नारों के आधार पर नहीं, बल्कि आर्थिक संकेतकों और आम नागरिक के जीवन स्तर में सुधार के आधार पर किया जाना चाहिए। लंबे कार्यकाल पर भी उठाए सवाल उदित राज ने कहा कि लंबे समय तक सत्ता में रहने वाली सरकार से लोगों की अपेक्षाएं अधिक होती हैं। उनके अनुसार, ऐसे कार्यकाल का मूल्यांकन इस आधार पर होना चाहिए कि रोजगार के अवसर कितने बढ़े, महंगाई पर कितना नियंत्रण हुआ और आम लोगों की आय में कितना सुधार आया। फिलहाल कांग्रेस और भाजपा के बीच अर्थव्यवस्था, विकास दर और रोजगार जैसे मुद्दों को लेकर राजनीतिक बयानबाजी तेज बनी हुई है। सत्तारूढ़ पक्ष जहां अपनी आर्थिक उपलब्धियों को रेखांकित कर रहा है, वहीं विपक्ष सरकार के दावों पर लगातार सवाल उठा रहा है।
भोपाल, एजेंसियां। मध्य प्रदेश से राज्यसभा चुनाव के लिए कांग्रेस की एकमात्र उम्मीदवार मिनाक्षी नटराजन का नामांकन रद्द होने का मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। रिटर्निंग ऑफिसर द्वारा नामांकन खारिज किए जाने के बाद कांग्रेस ने आधी रात को कानूनी रणनीति तैयार करते हुए सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर की है। मामले पर अवकाशकालीन पीठ के समक्ष जल्द सुनवाई की उम्मीद जताई जा रही है। भाजपा की आपत्ति के बाद हुआ फैसला विवाद की शुरुआत भाजपा द्वारा उठाई गई आपत्ति से हुई। भाजपा का आरोप है कि मीनाक्षी नटराजन ने अपने नामांकन पत्र के साथ दाखिल हलफनामे में तेलंगाना से जुड़े एक कानूनी मामले की जानकारी नहीं दी। इसी आधार पर रिटर्निंग ऑफिसर ने उनका नामांकन रद्द कर दिया। हालांकि कांग्रेस ने इस फैसले को पूरी तरह गैरकानूनी और राजनीतिक रूप से प्रेरित बताया है। कांग्रेस ने फैसले को बताया साजिश मीनाक्षी नटराजन और कांग्रेस नेताओं का कहना है कि उनके खिलाफ कोई आपराधिक मामला लंबित नहीं है, जिसे चुनावी नियमों के तहत घोषित करना आवश्यक हो। उनका दावा है कि संबंधित मामला केवल एक निजी शिकायत तक सीमित था और अदालत ने उस पर अभी तक संज्ञान भी नहीं लिया है। कांग्रेस ने आरोप लगाया कि रिटर्निंग ऑफिसर ने सरकार के दबाव में आकर निर्णय लिया। चुनाव आयोग से भी की गई शिकायत वरिष्ठ कांग्रेस नेता Abhishek Manu Singhvi और K. C. Venugopal के नेतृत्व में पार्टी के प्रतिनिधिमंडल ने चुनाव आयोग से मुलाकात कर विस्तृत ज्ञापन सौंपा। कांग्रेस ने आयोग से हस्तक्षेप कर नामांकन रद्द करने के फैसले की समीक्षा करने की मांग की है। कांग्रेस के सामने बढ़ी चुनौती मीनाक्षी नटराजन राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस की एकमात्र उम्मीदवार थीं। नामांकन की अंतिम तिथि समाप्त होने के बाद उनका पर्चा खारिज होने से पार्टी किसी अन्य उम्मीदवार को मैदान में नहीं उतार सकती। ऐसे में कांग्रेस की उम्मीदें अब सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग के फैसले पर टिकी हुई हैं। अब सबकी नजर अदालत पर राजनीतिक और कानूनी रूप से महत्वपूर्ण बन चुके इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला कांग्रेस की आगे की रणनीति तय करेगा। साथ ही चुनाव आयोग भी कानूनी विशेषज्ञों से सलाह लेकर अपना रुख स्पष्ट कर सकता है।
तमिलनाडु में भारतीय जनता पार्टी (BJP) को एक बार फिर बड़ा झटका लगा है। पार्टी के राज्य सचिव अमर प्रसाद रेड्डी ने प्राथमिक सदस्यता और सभी आधिकारिक जिम्मेदारियों से तत्काल प्रभाव से इस्तीफा दे दिया है। इस कदम के साथ उनका करीब 13 वर्षों का राजनीतिक सफर समाप्त हो गया। पार्टी सूत्रों के अनुसार, यह इस्तीफा ऐसे समय में आया है जब तमिलनाडु बीजेपी पहले से ही आंतरिक असंतोष और संगठनात्मक चुनौतियों का सामना कर रही है। अन्नामलाई के बाद तेज हुआ इस्तीफों का सिलसिला यह घटनाक्रम उस समय और तेज हो गया जब पूर्व प्रदेश अध्यक्ष K. Annamalai ने 5 जून को भाजपा से इस्तीफा देकर एक नए राजनीतिक दल के गठन की घोषणा की थी। अन्नामलाई ने दावा किया था कि उनका नया संगठन तमिलनाडु की राजनीति में एक वैकल्पिक राजनीतिक मंच के रूप में उभरेगा और आगामी चुनावों में भाग लेगा। उनके इस फैसले के बाद राज्य में भाजपा के भीतर असंतोष खुलकर सामने आने लगा है। कई वरिष्ठ नेताओं ने भी छोड़ी पार्टी अन्नामलाई के ऐलान के बाद भाजपा के कई वरिष्ठ नेता और पदाधिकारी भी पार्टी से अलग हो चुके हैं। तमिलनाडु भाजपा के पूर्व उपाध्यक्ष करुणा नागराजन ने भी 5 जून को पार्टी छोड़ने की घोषणा करते हुए अन्नामलाई के नए राजनीतिक आंदोलन का समर्थन किया था। उन्होंने कहा था कि अन्नामलाई एक ऊर्जावान और जनहित के मुद्दों को उठाने वाले नेता हैं। इसके अलावा भाजपा युवा मोर्चा की तमिलनाडु इकाई के कानूनी संयोजक अभिलाष गोपीनाथ समेत कई अन्य नेताओं ने भी पार्टी से इस्तीफा दे दिया है। नए राजनीतिक मंच को मिल रहा शुरुआती समर्थन सूत्रों के अनुसार, अन्नामलाई द्वारा शुरू किए गए नए राजनीतिक मंच को शुरुआती स्तर पर डिजिटल समर्थन भी मिल रहा है। बताया जा रहा है कि उनके द्वारा लॉन्च की गई एक वेबसाइट से कुछ ही घंटों में लाखों लोग जुड़े थे। तमिलनाडु बीजेपी में बढ़ी अनिश्चितता लगातार हो रहे इस्तीफों और नए राजनीतिक समीकरणों के बीच तमिलनाडु बीजेपी की संगठनात्मक स्थिति को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले समय में राज्य की राजनीति में और भी बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं।
कोलकाता, एजेंसियां। पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बड़ा सियासी उलटफेर सामने आया है। तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की तेज-तर्रार और मुखर सांसद सयानी घोष ने पार्टी नेतृत्व के खिलाफ बगावती रुख अपनाकर राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी है। कभी मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को देश का भावी प्रधानमंत्री बताने वाली सयानी अब उन सांसदों के समूह के साथ खड़ी नजर आ रही हैं, जिन्होंने टीएमसी से अलग राह पकड़ ली है। 20 बागी सांसदों के साथ नया मोर्चा सूत्रों के अनुसार, जादवपुर से सांसद सयानी घोष उन 20 सांसदों के गुट में शामिल हो गई हैं, जिन्होंने हालिया विधानसभा चुनाव में पार्टी की हार के बाद संसद में अलग पहचान बनाने की पहल की है। लोकसभा सांसद काकोली घोष दस्तीदार के नेतृत्व में इस गुट ने लोकसभा अध्यक्ष को पत्र सौंपकर एनडीए को समर्थन देने की पेशकश की है। बताया जा रहा है कि सयानी घोष ने भी इस पहल का समर्थन करते हुए संबंधित दस्तावेजों पर हस्ताक्षर किए हैं। दिल्ली में डेरा, बढ़ी अटकलें राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि सयानी घोष फिलहाल कोलकाता के बजाय दिल्ली में मौजूद हैं, जहां बागी सांसदों का जमावड़ा लगा हुआ है। ममता बनर्जी की करीबी मानी जाने वाली सांसद माला रॉय के भी इस खेमे से जुड़ने की खबरों ने टीएमसी की चिंता और बढ़ा दी है। कभी ममता की कट्टर समर्थक थीं सयानी सयानी घोष हाल तक टीएमसी की युवा इकाई की प्रमुख थीं और पार्टी की सबसे मुखर नेताओं में गिनी जाती थीं। उन्होंने कई मंचों से ममता बनर्जी को राष्ट्रीय राजनीति का मजबूत चेहरा बताते हुए उनके प्रधानमंत्री बनने की संभावना जताई थी। भाजपा और एनडीए की नीतियों की खुलकर आलोचना करने वाली सयानी ने विधानसभा चुनाव में हार के बाद भी टीएमसी का जोरदार बचाव किया था। टीएमसी के लिए बड़ा राजनीतिक संकट सयानी घोष का यह कदम टीएमसी के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है। पार्टी के भीतर बढ़ती असंतोष की आवाजें अब खुलकर सामने आने लगी हैं। बंगाल से लेकर दिल्ली तक इस राजनीतिक घटनाक्रम पर नजरें टिकी हैं और अब सबकी निगाहें ममता बनर्जी की अगली रणनीति पर हैं।
रांची। झारखंड में राज्यसभा चुनाव को लेकर सियासी पारा चरम पर है। सत्तापक्ष और विपक्ष की ओर से हाई-वोल्टेज राजनीतिक ड्रामा देखने को मिल रहा है। भाजपा समर्थित परिमल नाथवानी के नामांकन दाखिल करने के बाद चुनाव के रिटर्निंग ऑफिसर ने उनका नामांकन होल्ड पर रख दिया था। उनके नाम को लेकर भ्रम की स्थिति थी, क्योंकि कहीं उनका नाम परिमल नाथवानी तो कहीं नाथवानी परिमल दर्ज था। इसी को लेकर कांग्रेस की ओर से विधायक नमन विक्सल कोंगाड़ी ने आपत्ति जताई थी। जिसके बाद परिमल नाथवानी का नामांकन होल्ड पर रख दिया गया था, लेकिन दो दिनों तक चले विवाद के बाद आखिरकार परिमल नाथवानी का नामांकन मंजूर कर लिया गया है। रिटर्निंग ऑफिसर ने उनके नामांकन को हरी झंडी दे दी है। राज्यसभा की दो सीटों के लिए अब 3 प्रत्याशी झारखंड से राज्यसभा की दो सीटें खाली हैं, लेकिन उम्मीदवार तीन हैं। परिमल नाथवानी एक निर्दलीय उम्मीदवार हैं, जिन्हें भाजपा समर्थन दे रही है। वहीं, गठबंधन की ओर से झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) के बैजनाथ राम और कांग्रेस के प्रणव झा चुनावी मैदान में हैं। नामांकन पर आपत्ति के बाद मचा था घमासान नामांकन होल्ड पर किए जाने की खबर मिलते ही परिमल नाथवानी विधानसभा पहुंचे थे और अपनी ओर से सफाई दी थी। वहीं, निर्वाचन आयोग के मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी के. रवि कुमार भी विधानसभा पहुंचे थे और पूरे मामले की जानकारी ली थी। बुधवार को सुबह से ही कांग्रेस समर्थक नाथवानी का नामांकन रद्द करने की मांग को लेकर प्रदर्शन कर रहे थे। वहीं, बीजेपी कार्यकर्ताओं को गेट के बाहर ही रोक दिया गया था। मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट के एक सीनियर वकील भी पहुंचे थे। इधर, कांग्रेस के वरीय नेता सलमान खुर्शीद भी दिल्ली से रांची पहुंच गये। यहां वह सीधे विधानसभा पहुंचे। विधानसभा के गेट के बाहर भाजपा कार्यकताओं ने उन्हें रोका और जमकर नारेबाजी की। करीब एक बजे मामले में बहस पूरी हुई और रिटर्निंग ऑफिसर ने नाथवानी के नामांकन पत्र को सही घोषित कर दिया।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।