वाराणसी: उत्तर प्रदेश के वाराणसी में मांस और मछली की दुकानों को शहर की सीमा से बाहर स्थानांतरित करने की तैयारी शुरू हो गई है। नगर निगम ने शहर को अधिक व्यवस्थित, स्वच्छ और सुगम बनाने के उद्देश्य से यह फैसला लिया है। इस निर्णय के तहत शहर के भीतर संचालित सभी मीट और फिश मार्केट को चरणबद्ध तरीके से बाहरी क्षेत्रों में स्थानांतरित किया जाएगा। नगर निगम की बैठक में लिया गया फैसला वाराणसी नगर निगम की बैठक शनिवार को मैदागिन स्थित टाउन हॉल में महापौर अशोक कुमार तिवारी की अध्यक्षता में आयोजित की गई। बैठक में शहर के विकास और शहरी प्रबंधन से जुड़े कई मुद्दों पर चर्चा हुई, जिसमें मांस और मछली बाजारों को शहर के बाहर स्थानांतरित करने का प्रस्ताव प्रमुख रहा। नगर निगम के जनसंपर्क अधिकारी संदीप श्रीवास्तव ने बताया कि इस योजना को लागू करने के लिए प्रशासन ने प्रारंभिक स्तर पर पांच स्थानों की पहचान कर ली है। इन क्षेत्रों में बनेंगे नए मीट मार्केट नगर आयुक्त हिमांशु नागपाल के अनुसार, पहले चरण में जिन स्थानों को चिन्हित किया गया है, उनमें शामिल हैं— रामनगर शुजाबाद गणेशपुर अवलेशपुर शिवपुर प्रशासन का कहना है कि ये सभी क्षेत्र शहर की बाहरी सीमा के निकट हैं, जिससे आम नागरिकों को खरीदारी में अधिक परेशानी नहीं होगी। शहर में हैं करीब 400 दुकानें नगर निगम के आंकड़ों के अनुसार, वाराणसी शहर में वर्तमान में लगभग 350 से 400 मांस और मछली की दुकानें संचालित हो रही हैं। नई व्यवस्था लागू होने के बाद इन दुकानों को निर्धारित स्थानों पर स्थानांतरित किया जाएगा। एक साल पहले उठा था प्रस्ताव नगर निगम के पार्षद गुलशन अली ने बैठक के दौरान कहा कि मांस और मछली की दुकानों को शहर के बाहर स्थानांतरित करने का प्रस्ताव लगभग एक वर्ष पहले भी लाया गया था, लेकिन अब तक उस पर प्रभावी कार्रवाई नहीं हो सकी थी। उन्होंने यह भी कहा कि श्रावण माह के दौरान मांस की दुकानों के बंद रहने से इस व्यवसाय से जुड़े लोगों की आय प्रभावित होती है, इसलिए प्रशासन को व्यापारियों के हितों का भी ध्यान रखना चाहिए। प्रशासन ने जल्द कार्रवाई का दिया भरोसा नगर आयुक्त हिमांशु नागपाल ने सदन को आश्वस्त किया कि नई मीट मार्केट के लिए भूमि चिन्हित की जा चुकी है और प्रस्ताव को जल्द लागू करने की प्रक्रिया शुरू कर दी जाएगी। उन्होंने कहा कि यह कदम शहर के बेहतर प्रबंधन और भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए उठाया जा रहा है। फैसले से नाराज हैं दुकानदार नगर निगम के इस निर्णय का कई व्यापारियों ने विरोध किया है। दुकानदारों का कहना है कि शहर से बाहर दुकानें स्थानांतरित होने पर उनके कारोबार पर असर पड़ सकता है। व्यापारियों का तर्क है कि ग्राहकों को मांस और मछली खरीदने के लिए शहर से बाहर जाना पड़ेगा, जिससे समय और परिवहन खर्च दोनों बढ़ेंगे। उन्होंने प्रशासन से मांग की है कि कोई ऐसा व्यावहारिक समाधान निकाला जाए, जिससे व्यापार और उपभोक्ताओं दोनों की सुविधा बनी रहे। शहर के विकास और व्यापारिक हितों के बीच संतुलन की चुनौती नगर निगम का मानना है कि यह कदम शहर की स्वच्छता, यातायात व्यवस्था और शहरी सौंदर्यीकरण के लिए आवश्यक है। वहीं दूसरी ओर व्यापारियों और स्थानीय निवासियों की चिंताओं को देखते हुए प्रशासन के सामने विकास और आजीविका के बीच संतुलन बनाने की चुनौती भी होगी।
उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले में एक हनुमान मंदिर परिसर में नमाज पढ़ने का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद मामला चर्चा में आ गया है। वीडियो सामने आने के बाद पुलिस ने कार्रवाई करते हुए तीन लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की है और जांच शुरू कर दी है। मजदूरी के दौरान मंदिर परिसर में पहुंचे थे लोग पुलिस के अनुसार, 31 मई को असर मोहम्मद अपने साथी नजर मोहम्मद और अन्य लोगों के साथ औरंगाबाद थाना क्षेत्र के औलीना गांव में राजमिस्त्री का काम करने पहुंचे थे। वे राजकुमार नामक व्यक्ति के घर निर्माण कार्य में लगे हुए थे। काम के दौरान दोपहर में भोजन और आराम के लिए विराम लिया गया। इसी दौरान कथित तौर पर असर मोहम्मद ने हल्की बारिश से बचने के लिए मंदिर परिसर में प्रवेश किया और वहां नमाज अदा की। उस समय नजर मोहम्मद भी मौके पर मौजूद था। वीडियो वायरल होने के बाद सामने आया मामला घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद गांव में इसको लेकर चर्चा शुरू हो गई। स्थानीय लोगों ने मामले पर आपत्ति जताई, जिसके बाद पुलिस ने वीडियो और अन्य तथ्यों की जांच शुरू की। पुलिस ने दर्ज की एफआईआर प्रारंभिक जांच के बाद पुलिस ने तीन लोगों के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया है। अधिकारियों का कहना है कि पूरे घटनाक्रम की विस्तार से जांच की जा रही है और सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए आगे की कार्रवाई की जाएगी। अधिकारियों का क्या कहना है? औरंगाबाद थाना प्रभारी मोहम्मद असलम ने बताया कि मामले में प्राथमिकी दर्ज कर ली गई है। पुलिस वीडियो की सत्यता, घटना की परिस्थितियों और संबंधित व्यक्तियों की भूमिका की जांच कर रही है। जांच पूरी होने के बाद आगे की कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
Yogi Adityanath सरकार ने 2027 विधानसभा चुनाव से पहले बड़ा राजनीतिक दांव खेलते हुए मंत्रिमंडल का विस्तार कर दिया है। रविवार को राजभवन में आयोजित समारोह में 8 नए मंत्रियों को पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई गई। यह मंत्रिमंडल विस्तार 10 मई को तय किया गया था, जिसके बाद से विभागों के बंटवारे को लेकर चर्चाएं तेज थीं। अब शपथ ग्रहण के साथ ही नए मंत्रियों को विभाग भी सौंप दिए गए हैं। राजनीतिक जानकार इस फेरबदल को आगामी चुनावों की रणनीति और सामाजिक-संगठनात्मक संतुलन से जोड़कर देख रहे हैं। समारोह में राज्यपाल Anandiben Patel ने सभी मंत्रियों को शपथ दिलाई। इसके बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अगुवाई वाली सरकार ने विभागों की घोषणा की। भूपेंद्र चौधरी को MSME, मनोज पाण्डेय को खाद्य विभाग मंत्रिमंडल विस्तार में सबसे चर्चित नाम Bhupendra Chaudhary का रहा। पूर्व भाजपा प्रदेश अध्यक्ष को कैबिनेट मंत्री बनाकर सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योग (MSME) विभाग की जिम्मेदारी सौंपी गई है। वहीं भाजपा नेता Manoj Kumar Pandey को खाद्य एवं रसद, नागरिक आपूर्ति और उपभोक्ता मामले विभाग का प्रभार दिया गया है। स्वतंत्र प्रभार मंत्रियों को नई जिम्मेदारियां सरकार ने स्वतंत्र प्रभार वाले मंत्रियों के विभागों में भी बदलाव किया है। अजीत सिंह पाल को खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन विभाग सौंपा गया। सोमेंद्र तोमर को राजनीतिक पेंशन, सैनिक कल्याण और प्रांतीय रक्षक दल विभाग की जिम्मेदारी मिली। सरकार का कहना है कि इन विभागों में नए चेहरों के आने से प्रशासनिक कामकाज में तेजी और बेहतर समन्वय देखने को मिलेगा। राज्य मंत्रियों को विकास से जुड़े विभाग राज्य मंत्रियों को भी अहम जिम्मेदारियां दी गई हैं: कृष्णा पासवान को पशुधन एवं डेयरी विकास विभाग कैलाश सिंह राजपूत को ऊर्जा और अतिरिक्त ऊर्जा स्रोत विभाग सुरेंद्र दिलेर को राजस्व विभाग हंस राज विश्वकर्मा को MSME मंत्रालय में राज्यमंत्री बनाया गया है, जहां वे भूपेंद्र चौधरी के साथ काम करेंगे। चुनावी रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा विस्तार राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मंत्रिमंडल विस्तार 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारियों का हिस्सा है। भाजपा संगठन और सरकार के बीच बेहतर तालमेल बनाने के साथ-साथ क्षेत्रीय और सामाजिक समीकरणों को साधने की कोशिश भी इस फेरबदल में दिखाई दे रही है। योगी सरकार के इस कदम को प्रशासनिक मजबूती और चुनावी तैयारी दोनों के लिहाज से अहम माना जा रहा है।
"मेरे शव को पिता छूएं नहीं"– मौत से पहले WhatsApp स्टेटस पर लिखा दर्द उत्तर प्रदेश के कानपुर से बेहद दुखद और झकझोर देने वाली घटना सामने आई है। 24 वर्षीय युवा वकील ने कोर्ट परिसर की इमारत से कूदकर अपनी जान दे दी। घटना के बाद पूरे न्यायालय परिसर में हड़कंप मच गया। मृतक ने आत्महत्या से पहले दो पन्नों का सुसाइड नोट अपने व्हाट्सएप स्टेटस पर साझा किया, जिसमें उन्होंने अपने पिता पर बचपन से मानसिक प्रताड़ना देने के गंभीर आरोप लगाए। पांचवीं मंजिल से कूदकर दी जान पुलिस के अनुसार, युवा वकील प्रियंशु श्रीवास्तव ने गुरुवार को कानपुर कोर्ट की पांचवीं मंजिल से छलांग लगा दी। गंभीर हालत में उन्हें तत्काल अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। सुसाइड नोट में छलका वर्षों का दर्द प्रियंशु ने अपने नोट में बचपन की कई घटनाओं का जिक्र किया। उन्होंने लिखा कि छह साल की उम्र में आम का जूस पीने पर उनके पिता ने उन्हें निर्वस्त्र कर घर से बाहर निकाल दिया था। इस घटना ने उनके मन पर गहरा असर छोड़ा और जीवनभर हीन भावना से जूझते रहे। "मेरे शव को पिता हाथ न लगाएं" सुसाइड नोट की सबसे मार्मिक पंक्ति थी– "मेरे शव को मेरे पिता छूएं नहीं।" यह पंक्ति उनके भीतर वर्षों से जमा पीड़ा और मानसिक संघर्ष को बयां करती है। पढ़ाई को लेकर भी लगाया दबाव का आरोप प्रियंशु ने 2016 की एक घटना का भी उल्लेख किया। उनका कहना था कि वह फिजिकल एजुकेशन पढ़ना चाहते थे, लेकिन पिता ने उन्हें जबरन कंप्यूटर साइंस लेने के लिए मजबूर किया। मां को परेशान न करने की अपील अपने अंतिम संदेश में प्रियंशु ने पुलिस और परिवार से अनुरोध किया कि उनकी मां को किसी प्रकार की परेशानी न दी जाए। उन्होंने यह भी लिखा कि अपने इस फैसले के लिए वह किसी और को जिम्मेदार नहीं ठहराते। पुलिस जांच में जुटी पुलिस ने सुसाइड नोट को कब्जे में लेकर जांच शुरू कर दी है। कोर्ट परिसर के CCTV फुटेज खंगाले जा रहे हैं। शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया है।
चाईबासा। झारखंड में कोषागार (ट्रेजरी) से अवैध निकासी के मामलों की कड़ी में एक और नाम जुड़ गया है। इस बार मामला चाईबासा से जुड़ा है, जहां पुलिस विभाग के खातों से करीब 45 लाख रुपये की अवैध निकासी का खुलासा हुआ है। घटना सामने आते ही जिला प्रशासन और पुलिस महकमे में हड़कंप मच गया है। जानकारी के अनुसार, यह गड़बड़ी आंतरिक ऑडिट के दौरान पकड़ी गई। प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि पुलिस विभाग के नाम पर फर्जी तरीके से अलग-अलग ट्रांजैक्शन कर रकम निकाली गई। मामले की गंभीरता को देखते हुए प्रशासन ने तुरंत जांच शुरू कर दी है। विशेष जांच टीम का गठन पूरे मामले की जांच के लिए जिला प्रशासन ने विशेष टीम का गठन किया है, जिसमें कोषागार, ऑडिट और पुलिस विभाग के अधिकारी शामिल हैं। रांची मुख्यालय से भी ऑडिट टीम को जांच में लगाया गया है, जो पिछले महीनों के वाउचर, चेकबुक और ऑनलाइन लेन-देन की बारीकी से जांच कर रही है। एक सिपाही हिरासत में, जांच तेज मामले में त्वरित कार्रवाई करते हुए पुलिस ने गोइलकेरा से एक सिपाही को हिरासत में लिया है। प्रारंभिक जांच में संकेत मिले हैं कि उसी के माध्यम से संदिग्ध लेन-देन हुए। हालांकि, अभी तक पूरी राशि और जिम्मेदार व्यक्तियों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हो सकी है। निगरानी व्यवस्था पर उठे सवाल जांच में यह भी देखा जा रहा है कि इतनी बड़ी राशि बिना उचित सत्यापन के कैसे निकाली गई। प्रशासन ने सभी बड़े भुगतानों पर अस्थायी रोक लगा दी है और निगरानी प्रणाली को मजबूत करने के निर्देश दिए हैं। अधिकारियों का कहना है कि जांच पूरी होने के बाद ही पूरे घोटाले की वास्तविक तस्वीर सामने आएगी।
चित्रकूट में दर्दनाक घटना, दोनों लड़कियां गंभीर हालत में अस्पताल में भर्ती उत्तर प्रदेश के चित्रकूट जिले से बेहद संवेदनशील मामला सामने आया है। यहां यमुना नदी में स्नान के दौरान कुछ युवकों द्वारा वीडियो बनाए जाने के बाद मानसिक तनाव में आई दो किशोरियों ने जहरीला पदार्थ खाकर आत्महत्या का प्रयास किया। घटना के बाद इलाके में हड़कंप मच गया। यमुना में नहाते समय बनाया गया वीडियो पुलिस के मुताबिक, दोनों किशोरियां गुरुवार को यमुना नदी में स्नान करने गई थीं। इसी दौरान कुछ लोगों ने उनकी तस्वीरें खींचीं और वीडियो बना लिया। इस घटना की जानकारी जब घरवालों को मिली तो उन्होंने लड़कियों को डांट-फटकार लगाई। मानसिक तनाव में उठाया खौफनाक कदम परिवार की डांट से आहत होकर दोनों किशोरियों ने शुक्रवार को जहरीला पदार्थ खा लिया। हालत बिगड़ने पर उन्हें तुरंत पहाड़ी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र ले जाया गया। बेहतर इलाज के लिए बांदा रेफर प्राथमिक उपचार के बाद दोनों को पहले कर्वी जिला अस्पताल भेजा गया। वहां से गंभीर स्थिति को देखते हुए रानी दुर्गावती मेडिकल कॉलेज, बांदा रेफर कर दिया गया। फिलहाल दोनों का इलाज जारी है। तीन टीमों का गठन, आरोपियों की तलाश तेज चित्रकूट के पुलिस अधीक्षक अरुण कुमार सिंह ने बताया कि मामले की गंभीरता को देखते हुए तीन अलग-अलग पुलिस टीमें बनाई गई हैं। पहली टीम अस्पताल में इलाज पर नजर रख रही है। दूसरी टीम पीड़ित परिवार के संपर्क में है। तीसरी टीम वीडियो बनाने वालों की पहचान कर उनकी तलाश में जुटी है। पुलिस ने शुरू की गहन जांच पुलिस पूरे मामले की जांच कर रही है। वीडियो बनाने वाले लोगों की तलाश के लिए आसपास के क्षेत्रों में छापेमारी की जा रही है। अधिकारियों ने दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई का भरोसा दिलाया है।
रांची। झारखंड में सूचना आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया पर सवाल खड़े हो गए हैं। राज्यपाल सचिवालय ने सरकार द्वारा भेजे गए नामों पर आपत्ति जताते हुए पूरी प्रक्रिया की समीक्षा कर नए सिरे से प्रस्ताव भेजने को कहा है। प्रस्तावित नामों पर आपत्ति, FIR का मामला सामने आया जांच में सामने आया है कि जिन चार नामों को नियुक्ति के लिए भेजा गया था, उनमें से दो व्यक्तियों के खिलाफ पहले से प्राथमिकी दर्ज है। अमूल्य नीरज खलखो पर छह और तनुज खत्री पर एक प्राथमिकी दर्ज होने की बात सामने आई है। नियुक्ति प्रक्रिया की समीक्षा का निर्देश इन्हीं बिंदुओं को आधार बनाते हुए राज्यपाल सचिवालय ने सरकार को पूरी चयन प्रक्रिया पर पुनर्विचार करने और पारदर्शी तरीके से नए नाम भेजने का अनुरोध किया है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का हवाला सचिवालय ने फाइल लौटाते समय सुप्रीम कोर्ट के ‘नमित शर्मा बनाम केंद्र सरकार’ मामले का भी उल्लेख किया है। इस फैसले में कहा गया है कि सूचना आयुक्त का कार्य अर्द्ध-न्यायिक प्रकृति का होता है, इसलिए नियुक्ति में योग्य और समझ रखने वाले व्यक्तियों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। पारदर्शिता और निष्पक्षता पर जोर सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया है कि सूचना आयुक्तों की नियुक्ति में पारदर्शिता और निष्पक्षता बनाए रखना आवश्यक है। साथ ही विज्ञान, तकनीक, प्रबंधन, पत्रकारिता और समाज सेवा जैसे क्षेत्रों के विशेषज्ञों को भी इस पद के लिए चुना जा सकता है। कानूनी प्रावधानों की समीक्षा की भी मांग राज्यपाल सचिवालय ने सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 15(6) की समीक्षा करने का सुझाव भी दिया है, ताकि नियुक्ति प्रक्रिया को नियमों के अनुरूप और अधिक स्पष्ट बनाया जा सके।
उत्तर प्रदेश के Mathura में यमुना नदी में हुए दर्दनाक बोट हादसे ने कई परिवारों की खुशियां पल भर में छीन लीं। श्रद्धालुओं से भरी मोटरबोट के पलटने से अब तक 10 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 5 लोग अब भी लापता हैं। हादसे के बाद दूसरे दिन भी राहत और बचाव अभियान जारी है, लेकिन हर गुजरते घंटे के साथ परिजनों की उम्मीदें टूटती नजर आ रही हैं। हादसे से पहले खुशी, फिर अचानक मातम हादसे में शामिल अधिकतर लोग Ludhiana समेत पंजाब के अलग-अलग इलाकों से तीर्थ यात्रा पर आए थे। परिवार वालों के मुताबिक, गुरुवार शाम को सभी खुशी-खुशी Vrindavan के लिए रवाना हुए थे। रास्ते में वीडियो कॉल और मैसेज के जरिए अपनों से बात हो रही थी। लेकिन कुछ ही घंटों बाद अचानक एक फोन आया - “बोट पलट गई है… सबके फोन डूब गए…” “कल तक सब ठीक थे…” - परिजनों की आपबीती पीड़ित परिवारों की बातें दिल को झकझोर देने वाली हैं। एक महिला ने बताया, “सुबह 9 बजे बात हुई थी, सब खुश थे, वीडियो भेज रहे थे… आधे घंटे बाद खबर आई कि नाव पलट गई।” वहीं एक अन्य रिश्तेदार ने रोते हुए कहा, “कल तक बच्चे हंसते-खेलते गए थे, अब पता नहीं कौन कहां है… बस लापता होने की खबर आ रही है।” कैसे हुआ हादसा? अधिकारियों के मुताबिक, हादसे के वक्त नाव में करीब 37 लोग सवार थे। तेज हवाओं के कारण नाव असंतुलित हो गई और गहरे पानी में एक तैरते पोंटून से टकरा गई, जिससे वह पलट गई। बताया जा रहा है कि हाल ही में नदी का जलस्तर बढ़ने के कारण पीपा पुल हटाया गया था, लेकिन उसके कुछ हिस्से पानी में ही रह गए थे जो इस हादसे की बड़ी वजह बने। राहत-बचाव अभियान जारी घटना के बाद से State Disaster Response Force, फायर ब्रिगेड और सेना की टीमें मौके पर लगातार राहत कार्य में जुटी हैं। करीब 50 स्थानीय गोताखोर भी सर्च ऑपरेशन में शामिल हैं। अब तक 22 लोगों को सुरक्षित बचा लिया गया है, लेकिन लापता लोगों की तलाश जारी है। सुरक्षा इंतजामों पर उठे सवाल इस हादसे ने सुरक्षा व्यवस्थाओं पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सामने आए वीडियो में देखा गया कि नाव में सवार किसी भी यात्री ने लाइफ जैकेट नहीं पहनी थी। हादसे से ठीक पहले सभी श्रद्धालु ‘राधे-राधे’ का जाप करते हुए खुश नजर आ रहे थे, लेकिन किसी को अंदाजा नहीं था कि कुछ ही पल में सब कुछ बदल जाएगा। सरकार ने जताया दुख Yogi Adityanath ने इस हादसे पर गहरा शोक व्यक्त करते हुए मृतकों के परिजनों के प्रति संवेदना जताई है और अधिकारियों को राहत कार्य तेज करने के निर्देश दिए हैं।
नई दिल्ली: चुनाव आयोग द्वारा चलाए गए विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) अभियान ने देश की चुनावी तस्वीर में बड़ा बदलाव ला दिया है। अब तक करीब 5.58 करोड़ मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से हटाए जा चुके हैं, जो कुल मतदाताओं का लगभग 9.55% है। यह अब तक का सबसे बड़ा और व्यापक मतदाता पुनरीक्षण अभियान माना जा रहा है। दूसरे चरण में सबसे ज्यादा नाम हटे SIR के दूसरे चरण में 9 राज्यों और 3 केंद्र शासित प्रदेशों को शामिल किया गया था, जिसकी प्रक्रिया अक्टूबर 2025 से शुरू होकर हाल ही में पूरी हुई। इस चरण में ही करीब 5.37 करोड़ वोटर लिस्ट से हटाए गए, जो लगभग 10.55% के बराबर है। अगर पहले चरण (जिसमें बिहार शामिल था) को भी जोड़ दें, तो कुल मतदाताओं की संख्या 58.87 करोड़ से घटकर 53.28 करोड़ रह गई है। किन राज्यों में चला अभियान दूसरे चरण में जिन प्रमुख राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को शामिल किया गया, उनमें राजस्थान, गुजरात, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश, तमिलनाडु, केरल, छत्तीसगढ़, गोवा के साथ-साथ अंडमान और निकोबार द्वीप समूह, पुड्डुचेरी और लक्षद्वीप शामिल हैं। इन क्षेत्रों में कुल मतदाता संख्या 50.97 करोड़ से घटकर 45.59 करोड़ हो गई है। गुजरात टॉप, यूपी दूसरे नंबर पर नाम कटने के प्रतिशत के हिसाब से गुजरात सबसे ऊपर है, जहां 13.39% वोटर सूची से बाहर हुए। दूसरे स्थान पर उत्तर प्रदेश है, जहां 13.23% नाम हटे। तीसरे नंबर पर छत्तीसगढ़ (11.77%) रहा। वहीं, पश्चिम बंगाल में 11.63% और तमिलनाडु में 11.55% नाम हटाए गए। सबसे ज्यादा गिरावट केंद्र शासित प्रदेश अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में दर्ज हुई, जहां 16.86% मतदाता कम हुए। संख्या के हिसाब से यूपी सबसे आगे हालांकि प्रतिशत के मामले में गुजरात आगे है, लेकिन कुल संख्या के लिहाज से उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा नाम हटे। यहां मतदाता संख्या 15.44 करोड़ से घटकर 13.39 करोड़ रह गई। इस प्रक्रिया को पूरा करने के लिए आयोग ने राज्य को अतिरिक्त समय भी दिया था। क्यों चलाया गया SIR अभियान चुनाव आयोग ने 24 जून 2025 को यह फैसला लिया था। करीब 20 साल बाद इतनी व्यापक समीक्षा की गई। तेजी से हो रहे शहरीकरण, पलायन और डुप्लीकेट या निष्क्रिय मतदाताओं को हटाने के उद्देश्य से यह अभियान शुरू किया गया, ताकि वोटर लिस्ट को अधिक सटीक और पारदर्शी बनाया जा सके। क्या है SIR की प्रक्रिया सामान्य पुनरीक्षण (SSR) के विपरीत, SIR में पूरी वोटर लिस्ट नए सिरे से तैयार की जाती है। इस बार सभी मतदाताओं को एक तय समय सीमा के भीतर फॉर्म जमा करना अनिवार्य किया गया था। जो लोग ऐसा नहीं कर पाए, उनके नाम ड्राफ्ट लिस्ट से हट गए। कई मामलों में नागरिकता से जुड़े दस्तावेज भी मांगे गए, जिस पर विवाद हुआ और मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।