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SIR Campaign Removes 5.58 Crore Voters in India

SIR अभियान: देशभर में 5.58 करोड़ वोटर लिस्ट से बाहर, गुजरात टॉप पर

surbhi अप्रैल 11, 2026 0
Election Commission voter list revision process showing removal of names during SIR campaign across India
SIR Voter List Revision India 2026 Update

नई दिल्ली: चुनाव आयोग द्वारा चलाए गए विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) अभियान ने देश की चुनावी तस्वीर में बड़ा बदलाव ला दिया है। अब तक करीब 5.58 करोड़ मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से हटाए जा चुके हैं, जो कुल मतदाताओं का लगभग 9.55% है। यह अब तक का सबसे बड़ा और व्यापक मतदाता पुनरीक्षण अभियान माना जा रहा है।

दूसरे चरण में सबसे ज्यादा नाम हटे

SIR के दूसरे चरण में 9 राज्यों और 3 केंद्र शासित प्रदेशों को शामिल किया गया था, जिसकी प्रक्रिया अक्टूबर 2025 से शुरू होकर हाल ही में पूरी हुई। इस चरण में ही करीब 5.37 करोड़ वोटर लिस्ट से हटाए गए, जो लगभग 10.55% के बराबर है।

अगर पहले चरण (जिसमें बिहार शामिल था) को भी जोड़ दें, तो कुल मतदाताओं की संख्या 58.87 करोड़ से घटकर 53.28 करोड़ रह गई है।

किन राज्यों में चला अभियान

दूसरे चरण में जिन प्रमुख राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को शामिल किया गया, उनमें राजस्थान, गुजरात, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश, तमिलनाडु, केरल, छत्तीसगढ़, गोवा के साथ-साथ अंडमान और निकोबार द्वीप समूह, पुड्डुचेरी और लक्षद्वीप शामिल हैं।

इन क्षेत्रों में कुल मतदाता संख्या 50.97 करोड़ से घटकर 45.59 करोड़ हो गई है।

गुजरात टॉप, यूपी दूसरे नंबर पर

नाम कटने के प्रतिशत के हिसाब से गुजरात सबसे ऊपर है, जहां 13.39% वोटर सूची से बाहर हुए।
दूसरे स्थान पर उत्तर प्रदेश है, जहां 13.23% नाम हटे।
तीसरे नंबर पर छत्तीसगढ़ (11.77%) रहा।

वहीं, पश्चिम बंगाल में 11.63% और तमिलनाडु में 11.55% नाम हटाए गए।
सबसे ज्यादा गिरावट केंद्र शासित प्रदेश अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में दर्ज हुई, जहां 16.86% मतदाता कम हुए

संख्या के हिसाब से यूपी सबसे आगे

हालांकि प्रतिशत के मामले में गुजरात आगे है, लेकिन कुल संख्या के लिहाज से उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा नाम हटे। यहां मतदाता संख्या 15.44 करोड़ से घटकर 13.39 करोड़ रह गई। इस प्रक्रिया को पूरा करने के लिए आयोग ने राज्य को अतिरिक्त समय भी दिया था।

क्यों चलाया गया SIR अभियान

चुनाव आयोग ने 24 जून 2025 को यह फैसला लिया था। करीब 20 साल बाद इतनी व्यापक समीक्षा की गई।
तेजी से हो रहे शहरीकरण, पलायन और डुप्लीकेट या निष्क्रिय मतदाताओं को हटाने के उद्देश्य से यह अभियान शुरू किया गया, ताकि वोटर लिस्ट को अधिक सटीक और पारदर्शी बनाया जा सके।

क्या है SIR की प्रक्रिया

सामान्य पुनरीक्षण (SSR) के विपरीत, SIR में पूरी वोटर लिस्ट नए सिरे से तैयार की जाती है। इस बार सभी मतदाताओं को एक तय समय सीमा के भीतर फॉर्म जमा करना अनिवार्य किया गया था।

जो लोग ऐसा नहीं कर पाए, उनके नाम ड्राफ्ट लिस्ट से हट गए। कई मामलों में नागरिकता से जुड़े दस्तावेज भी मांगे गए, जिस पर विवाद हुआ और मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा।

 

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शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

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Hormuz Strait tensions
ईरान-अमेरिका वार्ता में संपत्ति मुद्दा सुलझा, होर्मुज पर तनाव कायम

नई दिल्ली। मध्य पूर्व में जारी तनाव के बीच अमेरिका और ईरान के बीच कूटनीतिक गलियारों से एक बड़ी खबर सामने आ रही है। पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में होने वाली शांति वार्ता से ठीक पहले अमेरिका ने ईरान की उन संपत्तियों को रिलीज करने पर सहमति जताई है, जो कतर और अन्य विदेशी बैंकों में 'फ्रीज' (जब्त) की गई थीं। हालांकि, वाशिंगटन ने इस राहत के बदले एक कड़ी शर्त रख दी है, जिसके केंद्र में सामरिक रूप से महत्वपूर्ण 'होर्मुज जलडमरूमध्य' (Strait of Hormuz) है। अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि जब तक ईरान इस समुद्री मार्ग को स्थायी रूप से सुरक्षित नहीं बनाता, तब तक उसकी संपत्तियों पर लगी रोक नहीं हटेगी।   अमेरिकी शर्तों का कड़ा रुख और होर्मुज की सुरक्षा रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका ने ईरान के सामने 15 सूत्रीय मांगों की एक लंबी सूची रखी है। इसमें सबसे प्रमुख शर्त वैश्विक तेल आपूर्ति के लिए होर्मुज जलडमरूमध्य को तुरंत और स्थायी रूप से खोलना है। अमेरिका चाहता है कि इस अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्ग से गुजरने वाले जहाजों की सुरक्षा की पूरी गारंटी दी जाए। इसके साथ ही, अमेरिका ने यह भी स्पष्ट किया है कि ईरान को परमाणु हथियार बनाने की अपनी सभी कोशिशों को पूरी तरह और सत्यापन योग्य तरीके से बंद करना होगा।   वाशिंगटन की शर्तों में ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल विकास कार्यक्रम पर कड़े प्रतिबंध और क्षेत्रीय प्रॉक्सी समूहों को दी जाने वाली फंडिंग व हथियारों की आपूर्ति पर रोक भी शामिल है। इतना ही नहीं, अमेरिका ने मांग की है कि ईरान की जेलों में बंद सभी अमेरिकी नागरिकों को तत्काल प्रभाव से रिहा किया जाए। इन शर्तों को पूरा किए बिना अमेरिका जब्त संपत्तियों को पूरी तरह से हस्तांतरित करने के पक्ष में नहीं दिख रहा है।   ईरान का 10 सूत्रीय प्रस्ताव और 'टोल टैक्स' की मांग दूसरी ओर, तेहरान ने भी वार्ता की मेज पर अपना 10 सूत्रीय प्लान रखा है, जो काफी कड़ा माना जा रहा है। ईरानी अधिकारियों का तर्क है कि अमेरिका को सबसे पहले उन सभी आर्थिक प्रतिबंधों को हटाना चाहिए जिन्होंने देश की अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाया है। ईरान की सबसे विवादित मांग होर्मुज जलडमरूमध्य पर पूर्ण संप्रभुता और नियंत्रण की है। ईरान चाहता है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय होर्मुज पर उसके एकाधिकार को स्वीकार करे और वहां से गुजरने वाले विदेशी जहाजों से 'टोल टैक्स' वसूलने के उसके अधिकार को मान्यता दे। सामरिक विशेषज्ञों का मानना है कि टोल टैक्स की यह मांग अमेरिका के लिए एक बड़ी चुनौती है, क्योंकि यह अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में नौपरिवहन की स्वतंत्रता (Freedom of Navigation) के वैश्विक सिद्धांतों के खिलाफ है।   इस्लामाबाद वार्ता और वैश्विक तेल बाजार पर असर इस्लामाबाद में होने वाली यह बैठक वैश्विक राजनीति और तेल बाजार के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जा रही है। दुनिया का एक-तिहाई समुद्री तेल परिवहन होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है। यदि दोनों देशों के बीच सहमति नहीं बनती है और होर्मुज का संकट गहराता है, तो वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल आ सकता है। फिलहाल, अमेरिका की ओर से संपत्ति रिलीज करने की हामी को एक 'सॉफ्ट सिग्नल' के रूप में देखा जा रहा है, लेकिन दोनों देशों के बीच विश्वास की कमी और लंबी-चौड़ी शर्तों की सूची ने इस पूरी डील को अधर में लटका दिया है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय की नजरें अब इस्लामाबाद की चर्चाओं पर टिकी हैं, जहां यह तय होगा कि मध्य पूर्व में युद्ध के बादल छंटेंगे या तनाव की एक नई लहर शुरू होगी।

Anjali Kumari अप्रैल 11, 2026 0
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झारखंड के बाजारों में नकली NCERT किताबों की बाढ़: कोल्हान प्रमंडल में माफिया सक्रिय, अभिभावक इन 4 तरीकों से करें पहचान

चक्रधरपुर, चाईबासा। झारखंड के कोल्हान प्रमंडल में इन दिनों नकली एनसीईआरटी (NCERT) किताबों का अवैध कारोबार बड़े पैमाने पर पैर पसार रहा है। मुनाफाखोरों द्वारा स्कूली बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ करते हुए बाजार में घटिया गुणवत्ता वाली पायरेटेड पुस्तकें बेची जा रही हैं। पश्चिमी सिंहभूम के चाईबासा, चक्रधरपुर और जमशेदपुर जैसे प्रमुख शहरों में प्रशासन की नाक के नीचे यह खेल धड़ल्ले से जारी है, जिससे न केवल अभिभावकों की मेहनत की कमाई लूटी जा रही है, बल्कि शिक्षा की गुणवत्ता पर भी गंभीर खतरा मंडरा रहा है।   पायरेसी माफिया के निशाने पर स्कूली छात्र बाजार में एनसीईआरटी पुस्तकों की अत्यधिक मांग और समय पर आपूर्ति न होने का फायदा उठाकर असामाजिक तत्व सक्रिय हो गए हैं। जानकारी के अनुसार, कक्षा 9 की नई अंग्रेजी पुस्तक 'कावेरी' सहित अन्य मुख्य विषयों की पायरेटेड कॉपियां बाजार में भर गई हैं। बुक सेलर्स बिना किसी डर के इन किताबों को असली बताकर बेच रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि पूर्व में मेरठ और सहारनपुर जैसे शहरों से करोड़ों रुपये की नकली किताबें बरामद की जा चुकी हैं, जिनके तार अब झारखंड के ग्रामीण और शहरी इलाकों से जुड़ते नजर आ रहे हैं।   कैसे पहचानें असली और नकली का अंतर? पायरेटेड किताबों के इस गोरखधंधे से बचने के लिए अभिभावकों को कुछ तकनीकी बारीकियों पर ध्यान देना होगा। असली एनसीईआरटी पुस्तक का कागज हल्का पीलापन (Off-white) लिए होता है और उसकी सतह काफी चिकनी होती है, जबकि नकली किताबों में या तो बहुत अधिक सफेद या फिर बेहद खुरदरे रद्दी कागज का उपयोग किया जाता है। इसके अलावा, असली किताब के पन्नों पर भारतीय मुद्रा (नोट) की तरह वॉटरमार्क होता है, जिसे रोशनी में देखा जा सकता है। नकली प्रतियों में अक्सर अक्षर धुंधले होते हैं, चित्र और नक्शे साफ नहीं दिखते और कवर पर लगा होलोग्राम भी गायब रहता है। इन 4 प्रमुख पहचानों के जरिए आप धोखाधड़ी का शिकार होने से बच सकते हैं।   सिर्फ सरकारी किताबों की ही पायरेसी क्यों? यह सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर माफिया केवल एनसीईआरटी को ही निशाना क्यों बनाते हैं। इसके पीछे का मुख्य कारण सीबीएसई बोर्ड के छात्रों की विशाल संख्या है। आईसीएसई (ICSE) की पुस्तकें काफी महंगी होती हैं, लेकिन उनकी मांग सीमित है और प्राइवेट कंपनियां पायरेसी को लेकर अधिक सतर्क रहती हैं। इसके विपरीत, एनसीईआरटी की पुस्तकें देश के किसी भी हिस्से में आसानी से बेची जा सकती हैं। मुनाफाखोरों को पता है कि सरकारी किताबों की निगरानी में होने वाली ढिलाई का फायदा उठाकर वे मोटा कमीशन कमा सकते हैं।   अभिभावकों के लिए 'एक्शन प्लान' और कानूनी प्रावधान एनसीईआरटी का कंटेंट कॉपीराइट पायरेसी एक्ट के तहत पूरी तरह सुरक्षित है। बिना अनुमति किताब छापना या बेचना एक दंडनीय अपराध है, जिसमें जेल और भारी जुर्माने का प्रावधान है। अभिभावकों को सलाह दी जाती है कि वे किताब खरीदते समय दुकानदार से पक्का बिल जरूर मांगें और पुस्तक पर दुकान की मुहर लगवाएं। यदि कोई दुकानदार बिल देने से मना करता है, तो इसकी शिकायत तुरंत स्थानीय पुलिस, एसडीओ कार्यालय या एनसीईआरटी के ऑनलाइन पोर्टल पर दर्ज करानी चाहिए। नई किताबों पर दिए गए क्यूआर (QR) कोड को स्कैन करके भी उनकी प्रमाणिकता की जांच की जा सकती है। प्रशासन को भी चाहिए कि सत्र शुरू होते ही ऐसी दुकानों पर औचक छापेमारी करे ताकि शिक्षा के नाम पर चल रही इस लूट पर लगाम लगाई जा सके।

Anjali Kumari अप्रैल 11, 2026 0
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Allahabad High Court building symbolizing transfer of 1,086 judicial officers in Uttar Pradesh.
UP में बड़ा न्यायिक फेरबदल: 1,086 जजों का ट्रांसफर, अदालतों की कार्यप्रणाली सुधारने की तैयारी

उत्तर प्रदेश की न्यायिक व्यवस्था में बड़ा प्रशासनिक बदलाव किया गया है। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक साथ 1,086 न्यायिक अधिकारियों के तबादले का आदेश जारी किया है। इस व्यापक ट्रांसफर को राज्य की अदालतों में लंबित मामलों को कम करने और कार्यप्रणाली को अधिक प्रभावी बनाने की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है। किन-किन जजों का हुआ ट्रांसफर? जारी आदेश के अनुसार: 408 एडिशनल डिस्ट्रिक्ट एंड सेशन जज (ADJ) 277 सिविल जज (सीनियर डिवीजन) 401 सिविल जज (जूनियर डिवीजन) इन सभी न्यायिक अधिकारियों के कार्यक्षेत्र में बदलाव किया गया है। यह हाल के दिनों में दूसरी बार है जब इतनी बड़ी संख्या में ट्रांसफर किए गए हैं। क्यों किया गया इतना बड़ा फेरबदल? सूत्रों के अनुसार, इस कदम का मुख्य उद्देश्य: जिला अदालतों में कामकाज को सुव्यवस्थित करना लंबित मामलों के निपटारे में तेजी लाना न्यायिक प्रशासन में संतुलन और दक्षता बढ़ाना न्यायपालिका में समय-समय पर इस तरह के ट्रांसफर सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा होते हैं, लेकिन इतनी बड़ी संख्या में तबादले यह संकेत देते हैं कि सिस्टम को अधिक प्रभावी बनाने पर जोर दिया जा रहा है। किसके आदेश पर हुआ फैसला? यह पूरा फैसला अरुण भंसाली के निर्देश पर लिया गया है। आदेश में स्पष्ट किया गया है कि सभी न्यायिक अधिकारी 15 अप्रैल तक अपनी नई पोस्टिंग पर कार्यभार संभाल लें। प्रशासनिक स्तर पर भी बदलाव इस ट्रांसफर के तहत कुछ अहम पदों पर भी बदलाव किए गए हैं। बुलंदशहर के ADJ वरुण मोहित निगम को हाई कोर्ट में रजिस्ट्रार (लिस्टिंग) नियुक्त किया गया है, जो न्यायिक कार्यों के संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। क्या होगा असर? विशेषज्ञों का मानना है कि इस बड़े पैमाने के ट्रांसफर से: मामलों के निपटारे में तेजी आएगी न्यायिक व्यवस्था में पारदर्शिता और दक्षता बढ़ेगी अलग-अलग जिलों में कार्यभार संतुलित होगा हालांकि, इतने बड़े बदलाव के बाद शुरुआती दिनों में प्रशासनिक समन्वय की चुनौतियां भी सामने आ सकती हैं।  

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