चुनाव आयोग ने कांग्रेस अध्यक्ष Mallikarjun Kharge को प्रधानमंत्री Narendra Modi पर की गई विवादित टिप्पणी को लेकर कारण बताओ नोटिस जारी किया है। आयोग का कहना है कि यह बयान आदर्श आचार संहिता (MCC) का उल्लंघन प्रतीत होता है। क्या है पूरा मामला? दरअसल, खरगे ने तमिलनाडु चुनाव प्रचार के अंतिम दिन चेन्नई में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान पीएम मोदी को “आतंकवादी” कह दिया था। उनके इस बयान के बाद राजनीतिक माहौल गरमा गया और मामले ने तूल पकड़ लिया। चुनाव आयोग ने क्या कहा? Election Commission of India ने अपने नोटिस में कहा कि प्रथम दृष्टया खरगे का बयान आचार संहिता के प्रावधानों का उल्लंघन करता है। आयोग ने उन्हें 24 घंटे के भीतर अपना पक्ष रखने का निर्देश दिया है। नोटिस में यह भी स्पष्ट किया गया है कि तय समय में जवाब नहीं मिलने पर आयोग एकतरफा कार्रवाई कर सकता है। खरगे की सफाई विवाद बढ़ने के बाद खरगे ने अपने बयान पर सफाई देते हुए कहा कि उनका आशय पीएम को “आतंकवादी” कहना नहीं था, बल्कि वह यह कहना चाहते थे कि प्रधानमंत्री लोकतांत्रिक व्यवस्था को “डराने-धमकाने” का काम कर रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार एजेंसियों का दुरुपयोग कर विपक्ष को निशाना बना रही है। बीजेपी ने की सख्त कार्रवाई की मांग इस मुद्दे पर बीजेपी नेताओं ने कड़ी प्रतिक्रिया दी। केंद्रीय मंत्री Kiren Rijiju, Nirmala Sitharaman और Arjun Ram Meghwal के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल ने चुनाव आयोग से मुलाकात कर खरगे के खिलाफ सख्त कार्रवाई और सार्वजनिक माफी की मांग की। बीजेपी ने इस बयान को “अत्यंत आपत्तिजनक” बताते हुए कहा कि यह राजनीतिक मर्यादा के खिलाफ है। कांग्रेस का पलटवार वहीं कांग्रेस ने चुनाव आयोग की कार्रवाई पर सवाल उठाए हैं। पार्टी नेताओं का आरोप है कि आयोग विपक्ष की शिकायतों पर धीमी कार्रवाई करता है, जबकि बीजेपी से जुड़े मामलों में तेजी दिखाता है। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने आयोग के रवैये को “संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ” बताया। चुनावी माहौल में बढ़ा विवाद तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में चुनाव के बीच यह विवाद और गहरा गया है। राजनीतिक दल एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगा रहे हैं, जिससे चुनावी माहौल और अधिक गरमा गया है।
27 लाख नाम कटे, सिर्फ 139 को राहत पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के बीच वोटर लिस्ट को लेकर बड़ा विवाद सामने आया है। स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के तहत हटाए गए 27 लाख से ज्यादा नामों में से अब तक सिर्फ 139 लोगों को ही दोबारा वोट देने का अधिकार मिला है। यह कुल हटाए गए मतदाताओं का बेहद छोटा हिस्सा, करीब 0.005% है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर बनी ट्रिब्यूनल ने लिया फैसला यह फैसला सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर गठित ट्रिब्यूनलों ने सुनाया है। पहले चरण की वोटिंग से ठीक पहले आए इस फैसले ने चुनावी माहौल में नई बहस छेड़ दी है। जानकारी के अनुसार, SIR प्रक्रिया के बाद राज्य में कुल मतदाताओं की संख्या 7.6 करोड़ से घटकर 6.8 करोड़ रह गई है। लाखों अपील, लेकिन निपटारा बेहद कम वोटर लिस्ट से नाम हटाए जाने के खिलाफ करीब 34 लाख लोगों ने अपील की थी। हालांकि, अब तक केवल 147 अपीलों पर ही फैसला हो पाया है। इसके अलावा, 510 अपीलों को गलत आवेदन मानते हुए खारिज कर दिया गया है, जबकि कुछ नाम सप्लीमेंट्री लिस्ट से भी हटा दिए गए हैं। नंदलाल बोस के परिवार को भी मिला अधिकार दिलचस्प बात यह है कि जिन 139 लोगों के नाम बहाल किए गए हैं, उनमें प्रसिद्ध कलाकार नंदलाल बोस के नाती 88 वर्षीय सुप्रबुद्ध सेन का नाम भी शामिल है। हालांकि खराब स्वास्थ्य के कारण उनके मतदान करने की संभावना कम बताई जा रही है। उनकी पत्नी और देखभाल करने वाले व्यक्ति भी इस सूची में शामिल हैं और उनके वोट डालने की संभावना जताई जा रही है। ट्रिब्यूनल की कार्यप्रणाली पर उठे सवाल इस पूरे मामले को लेकर ट्रिब्यूनलों की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। कलकत्ता हाई कोर्ट में दायर एक जनहित याचिका में ट्रिब्यूनलों के कामकाज और उनकी प्रक्रिया (SOP) को सार्वजनिक करने की मांग की गई थी। हालांकि कोर्ट ने इस पर सुनवाई से इनकार करते हुए याचिकाकर्ताओं को सुप्रीम कोर्ट जाने की सलाह दी। मुर्शिदाबाद में सबसे ज्यादा नाम हटे आंकड़ों के अनुसार, मुर्शिदाबाद जिले के शमशेरगंज विधानसभा क्षेत्र में सबसे ज्यादा 74,775 नाम हटाए गए थे। वहीं, इस पूरे क्षेत्र में सिर्फ एक व्यक्ति का वोटिंग अधिकार बहाल किया गया है, जिससे विवाद और गहरा गया है।
पहले चरण में मतदान जारी, कई जगह EVM ने रोकी रफ्तार West Bengal विधानसभा चुनाव 2026 के पहले चरण में गुरुवार सुबह मतदान शुरू होते ही कई इलाकों से Electronic Voting Machine में खराबी की खबरें सामने आईं। अधिकारियों के मुताबिक, मुर्शिदाबाद, नंदीग्राम, कूचबिहार, मालदा और सिलीगुड़ी समेत कई स्थानों पर ईवीएम में तकनीकी दिक्कत के कारण मतदान प्रभावित हुआ और कुछ बूथों पर देरी भी हुई। पहले चरण में 18.76% वोटिंग, मिदनापुर सबसे आगे Election Commission of India के आंकड़ों के अनुसार सुबह 9 बजे तक पहले चरण में 18.76% मतदान दर्ज किया गया। पश्चिम मिदनापुर में सबसे ज्यादा 20.51% मतदान हुआ, जबकि मालदा में सबसे कम 16.96% वोटिंग दर्ज की गई। मुर्शिदाबाद में बमबाजी, कई घायल मतदान के बीच Murshidabad के नवदा इलाके में अज्ञात लोगों द्वारा देसी बम फेंके जाने की घटना सामने आई, जिसमें कई लोग घायल हो गए। घटना के बाद चुनाव आयोग ने जिला प्रशासन से रिपोर्ट मांगी है और सुरक्षा व्यवस्था और सख्त कर दी गई है। 152 सीटों पर कड़ी सुरक्षा के बीच मतदान पहले चरण में राज्य की 152 विधानसभा सीटों पर वोटिंग हो रही है। चुनाव आयोग ने करीब 2.5 लाख केंद्रीय बलों की तैनाती की है ताकि शांतिपूर्ण मतदान सुनिश्चित किया जा सके। कुछ जगहों पर मतदान केंद्रों पर लंबी कतारें भी देखी गईं, जबकि कई जगह “पिंक बूथ” भी बनाए गए हैं, जिन्हें पूरी तरह महिला स्टाफ द्वारा संचालित किया जा रहा है। दिग्गज नेताओं की अपील, सियासी बयानबाजी तेज बीजेपी नेता Suvendu Adhikari और अन्य नेताओं ने शांतिपूर्ण मतदान की अपील की है, वहीं कांग्रेस अध्यक्ष Mallikarjun Kharge ने मतदाताओं से बड़ी संख्या में मतदान करने की अपील की। राजनीतिक दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप भी तेज हो गए हैं, जिससे चुनावी माहौल और गर्म हो गया है। 2 चरणों में हो रहे चुनाव, 4 मई को आएंगे नतीजे पश्चिम बंगाल में चुनाव दो चरणों में कराए जा रहे हैं। पहला चरण 23 अप्रैल को और दूसरा चरण 29 अप्रैल को होगा। मतगणना 4 मई को की जाएगी, जिसके बाद राज्य की नई सरकार का फैसला होगा।
प्रधानमंत्री Narendra Modi ने गुरुवार को तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों के दौरान मतदाताओं से बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने की अपील की। उन्होंने मतदान को “पवित्र लोकतांत्रिक कर्तव्य” बताते हुए खासकर युवाओं और महिलाओं से रिकॉर्ड संख्या में वोट डालने का आग्रह किया। युवाओं और महिलाओं से खास अपील प्रधानमंत्री मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर अलग-अलग संदेश जारी करते हुए कहा कि लोकतंत्र को मजबूत बनाने के लिए हर नागरिक की भागीदारी जरूरी है। उन्होंने कहा कि तमिलनाडु के मतदाता पूरे उत्साह के साथ अपने अधिकार का उपयोग करें और रिकॉर्ड मतदान सुनिश्चित करें। इसी तरह, पश्चिम बंगाल के मतदाताओं को संबोधित करते हुए उन्होंने चुनाव को “लोकतंत्र का उत्सव” बताया और लोगों से बिना किसी डर के मतदान करने की अपील की। दोनों राज्यों में कड़ी सुरक्षा के बीच मतदान तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में गुरुवार सुबह से मतदान शुरू हो गया। चुनाव आयोग की देखरेख में सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए गए हैं ताकि शांतिपूर्ण मतदान सुनिश्चित हो सके। तमिलनाडु में सभी 234 विधानसभा सीटों पर एक ही चरण में वोटिंग हो रही है, जबकि पश्चिम बंगाल में चुनाव दो चरणों में आयोजित किए जा रहे हैं। पहले चरण में 152 सीटों पर मतदान जारी है। चुनाव आयोग की तैयारी और प्रक्रिया Election Commission of India के अनुसार, मतदान से पहले सभी बूथों पर मॉक पोल कराए गए ताकि इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (EVM) की जांच हो सके। पहले चरण में कुल 1,478 उम्मीदवार मैदान में हैं। मतदान प्रक्रिया शाम 6 बजे तक जारी रहेगी, जबकि मतगणना 4 मई को की जाएगी। लोकतंत्र के पर्व में भागीदारी का संदेश प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संदेश में कहा कि ज्यादा से ज्यादा मतदान देश के लोकतांत्रिक ढांचे को मजबूत करता है। उन्होंने मतदाताओं से अपील की कि वे इस “लोकतंत्र के पर्व” में बढ़-चढ़कर हिस्सा लें और अपनी भागीदारी सुनिश्चित करें।
चुनाव से पहले सख्ती बढ़ी Election Commission of India ने पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु विधानसभा चुनावों से पहले इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) की सुरक्षा को लेकर सख्त रुख अपनाया है। आयोग ने स्पष्ट कर दिया है कि मशीन के साथ किसी भी प्रकार की छेड़छाड़ को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। परफ्यूम, इंक और गोंद को माना जाएगा छेड़छाड़ चुनाव आयोग के अनुसार, यदि EVM पर इत्र, स्याही, गोंद या किसी भी प्रकार का केमिकल लगाया जाता है, तो इसे सीधा छेड़छाड़ की श्रेणी में रखा जाएगा। ऐसे मामलों में जिम्मेदार लोगों पर कड़ी कार्रवाई की जाएगी। उम्मीदवार बटन साफ और स्पष्ट रखना जरूरी आयोग ने सभी पीठासीन अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वे यह सुनिश्चित करें कि EVM के सभी उम्मीदवार बटन स्पष्ट रूप से दिखाई दें। किसी भी बटन को टेप, गोंद या अन्य सामग्री से ढकना पूरी तरह प्रतिबंधित है। इसके अलावा, मतों की गोपनीयता बनाए रखने के लिए भी मशीन के साथ किसी तरह की छेड़छाड़ को गंभीर अपराध माना जाएगा। गड़बड़ी मिलने पर तुरंत सूचना देना अनिवार्य निर्देशों के अनुसार, अगर किसी बूथ पर EVM में कोई भी असामान्यता या छेड़छाड़ नजर आती है, तो पीठासीन अधिकारी तुरंत सेक्टर अधिकारी या रिटर्निंग अधिकारी को इसकी जानकारी देंगे। चुनाव आयोग ने साफ किया है कि EVM के साथ किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप एक चुनावी अपराध है। ऐसे मामलों में सख्त कानूनी कार्रवाई के साथ-साथ पुनर्मतदान (री-पोल) का आदेश भी दिया जा सकता है। 23 अप्रैल को मतदान, पहले ही जारी हुई चेतावनी गौरतलब है कि पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में 23 अप्रैल को मतदान होना है। मतदान से ठीक पहले आयोग ने यह निर्देश जारी कर सभी अधिकारियों को सतर्क रहने को कहा है। खासतौर पर पश्चिम बंगाल में सभी पोलिंग बूथों के प्रीसाइडिंग अधिकारियों को यह जिम्मेदारी दी गई है कि वे EVM पर उम्मीदवारों के बटन पूरी तरह साफ और बिना किसी रुकावट के दिखाई देने की पुष्टि करें।
चुनाव प्रचार थमा, अब मतदान की बारी Election Commission of India के निर्देशानुसार पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में विधानसभा चुनाव के लिए प्रचार अभियान समाप्त हो चुका है। दोनों राज्यों में 23 अप्रैल को वोटिंग होनी है। चुनाव से ठीक पहले राजनीतिक माहौल काफी गर्म है और सभी दल अंतिम रणनीति में जुटे हुए हैं। खड़गे के बयान से मचा सियासी तूफान कांग्रेस अध्यक्ष Mallikarjun Kharge ने तमिलनाडु की एक रैली में प्रधानमंत्री Narendra Modi पर तीखा हमला करते हुए उन्हें “आतंकी” कह दिया। इस बयान के सामने आते ही देशभर में विवाद छिड़ गया और राजनीतिक माहौल और गरमा गया। हालांकि, बाद में खड़गे ने सफाई दी कि उनका आशय शाब्दिक रूप से यह नहीं था, बल्कि उन्होंने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री विपक्ष और संस्थाओं पर दबाव बनाते हैं। अमित शाह का पलटवार, कांग्रेस पर साधा निशाना केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah ने खड़गे के बयान को लेकर कांग्रेस पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि इस तरह की भाषा से कांग्रेस ने राजनीतिक मर्यादाओं को पार कर दिया है और यह देश के लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है। शाह ने यह भी कहा कि इस तरह के बयान प्रधानमंत्री पद की गरिमा को ठेस पहुंचाते हैं। बंगाल में पहले चरण में 152 सीटों पर मतदान पश्चिम बंगाल में पहले चरण के तहत 152 सीटों पर वोट डाले जाएंगे। इस चरण में लगभग 3.60 करोड़ मतदाता मतदान करेंगे, जिनमें बड़ी संख्या में महिलाएं शामिल हैं। सुरक्षा के मद्देनजर 2,450 केंद्रीय बलों की कंपनियां तैनात की गई हैं, जबकि 8,000 से अधिक बूथों को संवेदनशील घोषित किया गया है। ED की छापेमारी से बढ़ा चुनावी तापमान चुनाव से पहले Enforcement Directorate (ED) की पश्चिम बंगाल में एक दर्जन से अधिक छापेमारी ने राजनीतिक माहौल को और गर्म कर दिया है। एजेंसी का कहना है कि यह कार्रवाई चल रही जांच के तहत की गई है, जबकि राज्य की सत्ताधारी पार्टी ने इसे राजनीतिक दबाव बनाने का प्रयास बताया है। तमिलनाडु में NDA बनाम DMK गठबंधन की टक्कर तमिलनाडु में मुकाबला काफी दिलचस्प है, जहां National Democratic Alliance (NDA) विपक्षी गढ़ में अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रहा है। वहीं DMK गठबंधन अपनी सत्ता बरकरार रखने के लिए पूरी ताकत लगा रहा है। पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल, असम और पुडुचेरी में हुए चुनावों के नतीजे 4 मई को घोषित किए जाएंगे। इन नतीजों से तय होगा कि किस दल को जनता ने शासन की जिम्मेदारी सौंपी है।
तमिलनाडु विधानसभा चुनाव से पहले राज्य में बड़ी चुनावी कार्रवाई सामने आई है। चुनाव आयोग की निगरानी में अब तक ₹1,200 करोड़ से अधिक की नकदी, सोना-चांदी, फ्रीबीज, शराब और ड्रग्स जब्त किए गए हैं। जब्ती का बड़ा आंकड़ा आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार: ₹169.85 करोड़ कैश ₹650.87 करोड़ के सोना-चांदी इसके अलावा भारी मात्रा में फ्रीबीज, शराब और नशीले पदार्थ यह कार्रवाई चुनाव में पैसे और प्रलोभनों के इस्तेमाल पर रोक लगाने के लिए की जा रही है। पीएम मोदी पर आचार संहिता उल्लंघन का आरोप इसी बीच नरेंद्र मोदी के 18 अप्रैल के संबोधन को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। 700 से अधिक नागरिकों–जिनमें पूर्व ब्यूरोक्रेट्स, एक्टिविस्ट और पत्रकार शामिल हैं–ने चुनाव आयोग को पत्र लिखकर इसे आचार संहिता (MCC) का उल्लंघन बताया है। शिकायत में कहा गया है कि यह संबोधन दूरदर्शन, संसद टीवी और ऑल इंडिया रेडियो जैसे सरकारी प्लेटफॉर्म पर प्रसारित हुआ, जो चुनाव के दौरान पक्षपातपूर्ण प्रचार जैसा प्रतीत होता है। विपक्ष के हमले तेज ममता बनर्जी ने आरोप लगाया कि पीएम मोदी चुनाव प्रचार में सरकारी संसाधनों–रेल और विमान–का दुरुपयोग कर रहे हैं। राहुल गांधी ने तमिलनाडु में कहा कि भाजपा “रिमोट कंट्रोल” वाली सरकार बनाना चाहती है, जैसा उन्होंने बिहार का उदाहरण देकर आरोप लगाया। मद्रास हाई कोर्ट का नोटिस इस बीच मद्रास हाई कोर्ट ने TVK प्रमुख विजय के खिलाफ याचिका पर चुनाव आयोग और आयकर विभाग को नोटिस जारी किया है। याचिका में आरोप है कि अलग-अलग हलफनामों में उनकी संपत्ति के आंकड़ों में करीब ₹100 करोड़ का अंतर है। चुनावी माहौल और सख्त तमिलनाडु में चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आ रहे हैं, चुनाव आयोग की सख्ती और राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप दोनों तेज होते जा रहे हैं।
West Bengal में आगामी विधानसभा चुनाव के पहले चरण से ठीक पहले प्रशासन ने बड़ा कदम उठाया है। राज्य के उत्पाद शुल्क (Excise) विभाग ने 16 जिलों में शराब की बिक्री पर तत्काल प्रभाव से प्रतिबंध लगाने का आदेश जारी किया है। इस फैसले के तहत आज रात 9 बजे से न सिर्फ शराब की दुकानें बंद रहेंगी, बल्कि बार और पब को भी संचालन रोकना होगा। क्यों लिया गया यह फैसला? चुनाव के दौरान कानून-व्यवस्था बनाए रखने और निष्पक्ष मतदान सुनिश्चित करने के लिए यह कदम उठाया गया है। मुख्य चुनाव आयुक्त Gyanesh Kumar पहले ही कह चुके हैं कि स्वतंत्र और शांतिपूर्ण चुनाव के लिए हर जरूरी उपाय किए जाएंगे। ऐसे में माना जा रहा है कि शराब बिक्री पर यह रोक चुनाव आयोग की उसी रणनीति का हिस्सा है, ताकि: मतदान के दौरान किसी तरह की गड़बड़ी न हो शराब के जरिए मतदाताओं को प्रभावित करने की कोशिश रोकी जा सके हिंसा या अव्यवस्था की आशंका कम हो अचानक फैसले से दुकानदार हैरान दिलचस्प बात यह है कि: पहले जानकारी थी कि 21 अप्रैल से शराब की दुकानें बंद होंगी लेकिन उत्पाद शुल्क विभाग ने अचानक तीन दिन पहले ही आदेश जारी कर दिया इस अचानक फैसले से शराब विक्रेताओं में असमंजस की स्थिति बन गई है। हालांकि, दुकानदारों का कहना है कि वे सरकारी निर्देशों का पालन करेंगे, लेकिन बिना पूर्व सूचना के ऐसा निर्णय उनके व्यापार को प्रभावित करता है। किन जिलों में लागू है प्रतिबंध? पहले चरण के मतदान के तहत कुल 16 जिलों में यह प्रतिबंध लागू किया गया है। इनमें शामिल हैं: Cooch Behar Alipurduar Jalpaiguri Kalimpong Darjeeling Uttar Dinajpur Dakshin Dinajpur Malda Murshidabad Birbhum Paschim Bardhaman Bankura Purulia Paschim Medinipur Purba Medinipur Jhargram इन सभी जिलों में 23 अप्रैल को पहले चरण का मतदान होना है। कितनी सीटों पर होगा मतदान? पहले चरण में राज्य की 152 विधानसभा सीटों पर वोटिंग होगी। यह चरण खास तौर पर उत्तर बंगाल और कुछ दक्षिणी जिलों को कवर करता है, जहां सुरक्षा और संवेदनशीलता को देखते हुए प्रशासन पहले से ही अलर्ट मोड पर है। चुनाव के दौरान ‘ड्राई डे’ का नियम भारत में चुनाव के दौरान शराब बिक्री पर रोक लगाना एक सामान्य प्रक्रिया है, जिसे ‘ड्राई डे’ कहा जाता है। इसका मकसद होता है: मतदाताओं को किसी भी तरह के लालच या दबाव से बचाना चुनाव प्रक्रिया को निष्पक्ष बनाना कानून-व्यवस्था बनाए रखना
West Bengal में होने वाले आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर Election Commission of India (ECI) ने पहचान सत्यापन के नियमों को लेकर बड़ा और सख्त फैसला लिया है। आयोग ने साफ कर दिया है कि मतदान के दौरान किसी भी मतदाता को पहचान छिपाने की अनुमति नहीं दी जाएगी। अगर किसी की पहचान पर जरा सा भी संदेह होता है, तो उसे अपना चेहरा दिखाना अनिवार्य होगा–चाहे वह घूंघट में हो या बुर्का में। यह फैसला चुनाव की पारदर्शिता और निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए लिया गया है, क्योंकि पिछले चुनावों में फर्जी मतदान को लेकर कई शिकायतें सामने आई थीं। क्या हैं नए नियम? चुनाव आयोग द्वारा जारी दिशा-निर्देशों के अनुसार: मतदान केंद्र पर आने वाले हर मतदाता की पहचान की पुष्टि की जाएगी अगर कोई मतदाता चेहरा ढककर आता है और पहचान को लेकर संदेह होता है, तो उसे चेहरा दिखाना होगा महिला मतदाताओं की पहचान केवल महिला अधिकारी द्वारा ही जांची जाएगी किसी भी परिस्थिति में पहचान सत्यापन से छूट नहीं दी जाएगी आयोग ने यह भी स्पष्ट किया है कि यह नियम सभी मतदाताओं पर समान रूप से लागू होगा और इसका उद्देश्य किसी विशेष समुदाय को निशाना बनाना नहीं, बल्कि चुनाव प्रक्रिया को निष्पक्ष बनाना है। महिला कर्मियों की अहम भूमिका इस प्रक्रिया को संवेदनशील तरीके से लागू करने के लिए आयोग ने खास इंतजाम किए हैं: हर मतदान केंद्र पर कम से कम एक महिला कर्मचारी की तैनाती अनिवार्य की गई है जहां जरूरत होगी, महिला अधिकारी अलग से जाकर पहचान सत्यापन करेंगी इससे महिला मतदाताओं की गरिमा और निजता (privacy) बनी रहेगी क्यों जरूरी हुआ यह कदम? चुनाव आयोग के मुताबिक, कई बार देखा गया है कि: कुछ लोग नकली पहचान के साथ वोट डालने की कोशिश करते हैं घूंघट या बुर्का का इस्तेमाल पहचान छिपाने के लिए किया जाता है इससे फर्जी मतदान (Bogus Voting) की संभावना बढ़ जाती है इन्हीं चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए आयोग ने इस बार सख्ती बढ़ाने का फैसला किया है, ताकि हर वोट असली मतदाता द्वारा ही डाला जाए। पहले भी हो चुका है विवाद यह मुद्दा नया नहीं है। इससे पहले Bihar के चुनावों में भी घूंघट और बुर्का में पहचान सत्यापन को लेकर विवाद हुआ था। कुछ राजनीतिक दलों ने इसे लेकर आपत्ति जताई थी वहीं चुनाव आयोग ने इसे चुनाव की निष्पक्षता के लिए जरूरी बताया था इस बार बंगाल में पहले से ही स्पष्ट नियम जारी कर दिए गए हैं, ताकि मतदान के दिन किसी तरह की भ्रम की स्थिति न बने। संवेदनशील माने जा रहे हैं ज्यादातर बूथ चुनाव आयोग के अनुसार: राज्य के अधिकांश मतदान केंद्र संवेदनशील श्रेणी में आते हैं करीब 8,500 बूथों को अत्यंत संवेदनशील घोषित किया गया है पहले चरण में होने वाले मतदान के लिए 1,500 बूथों पर अतिरिक्त सुरक्षा दी जा रही है यह आंकड़े बताते हैं कि इस बार चुनाव को लेकर प्रशासन काफी सतर्क है। सुरक्षा के व्यापक इंतजाम निष्पक्ष और शांतिपूर्ण मतदान सुनिश्चित करने के लिए कई अतिरिक्त कदम उठाए गए हैं: सभी प्रमुख मतदान केंद्रों पर CCTV कैमरे लगाए जाएंगे केंद्रीय सुरक्षा बलों की तैनाती की जाएगी मतदान केंद्रों के अंदर और बाहर कड़ी निगरानी रखी जाएगी भीड़ नियंत्रण के लिए विशेष व्यवस्था की जाएगी क्या होगा असर? विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले के कई असर हो सकते हैं: फर्जी मतदान पर रोक लगेगी चुनाव प्रक्रिया में पारदर्शिता बढ़ेगी मतदाताओं का भरोसा मजबूत होगा
कोलकाता: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) के महासचिव Abhishek Banerjee ने वोटर लिस्ट और बाहरी मतदाताओं को लेकर चुनाव आयोग पर निशाना साधते हुए सख्त चेतावनी दी है। उन्होंने साफ कहा कि राज्य में वही लोग वोट देंगे जो पश्चिम बंगाल के निवासी हैं। अगर कोई व्यक्ति हाल ही में दिल्ली या Bihar में वोट डाल चुका है और फिर बंगाल में वोट देने आता है, तो TMC कार्यकर्ता उसे ऐसा करने से रोकेंगे। “बाहरी वोटरों से जीतना चाहती है भाजपा” Abhishek Banerjee ने आरोप लगाया कि Bharatiya Janata Party (भाजपा) बाहरी वोटरों के जरिए चुनाव जीतने की कोशिश कर रही है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि बंगाल में रहने वाले गैर-बंगाली लोगों से उन्हें कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन बाहर से आकर वोट डालने की कोशिश बर्दाश्त नहीं की जाएगी। वोटर लिस्ट पर विवाद गहराया राज्य में नई वोटर लिस्ट को लेकर भी विवाद बढ़ गया है। करीब 1 करोड़ पुराने नाम हटाए जाने का दावा 27 लाख लोग SIR ट्रिब्यूनल में विचाराधीन, जिन्हें इस बार वोट का अधिकार नहीं मिलेगा Abhishek Banerjee ने कहा कि इतने बड़े स्तर पर नाम हटने का असर चुनाव नतीजों पर पड़ सकता है। कार्यकर्ताओं को एकजुट रहने की अपील पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि: सभी मतभेद भुलाकर चुनाव पर ध्यान दें गुटबाजी से दूर रहें पूरी ताकत के साथ चुनाव लड़ें उन्होंने इसे Mamata Banerjee के नेतृत्व की लड़ाई बताते हुए कहा कि हर कार्यकर्ता की जिम्मेदारी है कि पार्टी को जीत दिलाए। “आत्मसंतुष्टि से बचें” Abhishek Banerjee ने कहा कि भले ही सर्वे में पार्टी की स्थिति मजबूत दिख रही हो, लेकिन किसी भी तरह की लापरवाही नहीं होनी चाहिए। उन्होंने पुराने और नए नेताओं के बीच तालमेल बनाकर काम करने पर भी जोर दिया। पश्चिम बंगाल में चुनाव से पहले वोटर लिस्ट और बाहरी मतदाताओं का मुद्दा बड़ा राजनीतिक विवाद बन गया है। TMC और भाजपा के बीच आरोप-प्रत्यारोप के बीच अब नजर चुनाव आयोग के अगले कदम पर टिकी है, जो इस पूरे विवाद को दिशा दे सकता है।
नई दिल्ली: चुनाव आयोग द्वारा चलाए गए विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) अभियान ने देश की चुनावी तस्वीर में बड़ा बदलाव ला दिया है। अब तक करीब 5.58 करोड़ मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से हटाए जा चुके हैं, जो कुल मतदाताओं का लगभग 9.55% है। यह अब तक का सबसे बड़ा और व्यापक मतदाता पुनरीक्षण अभियान माना जा रहा है। दूसरे चरण में सबसे ज्यादा नाम हटे SIR के दूसरे चरण में 9 राज्यों और 3 केंद्र शासित प्रदेशों को शामिल किया गया था, जिसकी प्रक्रिया अक्टूबर 2025 से शुरू होकर हाल ही में पूरी हुई। इस चरण में ही करीब 5.37 करोड़ वोटर लिस्ट से हटाए गए, जो लगभग 10.55% के बराबर है। अगर पहले चरण (जिसमें बिहार शामिल था) को भी जोड़ दें, तो कुल मतदाताओं की संख्या 58.87 करोड़ से घटकर 53.28 करोड़ रह गई है। किन राज्यों में चला अभियान दूसरे चरण में जिन प्रमुख राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को शामिल किया गया, उनमें राजस्थान, गुजरात, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश, तमिलनाडु, केरल, छत्तीसगढ़, गोवा के साथ-साथ अंडमान और निकोबार द्वीप समूह, पुड्डुचेरी और लक्षद्वीप शामिल हैं। इन क्षेत्रों में कुल मतदाता संख्या 50.97 करोड़ से घटकर 45.59 करोड़ हो गई है। गुजरात टॉप, यूपी दूसरे नंबर पर नाम कटने के प्रतिशत के हिसाब से गुजरात सबसे ऊपर है, जहां 13.39% वोटर सूची से बाहर हुए। दूसरे स्थान पर उत्तर प्रदेश है, जहां 13.23% नाम हटे। तीसरे नंबर पर छत्तीसगढ़ (11.77%) रहा। वहीं, पश्चिम बंगाल में 11.63% और तमिलनाडु में 11.55% नाम हटाए गए। सबसे ज्यादा गिरावट केंद्र शासित प्रदेश अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में दर्ज हुई, जहां 16.86% मतदाता कम हुए। संख्या के हिसाब से यूपी सबसे आगे हालांकि प्रतिशत के मामले में गुजरात आगे है, लेकिन कुल संख्या के लिहाज से उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा नाम हटे। यहां मतदाता संख्या 15.44 करोड़ से घटकर 13.39 करोड़ रह गई। इस प्रक्रिया को पूरा करने के लिए आयोग ने राज्य को अतिरिक्त समय भी दिया था। क्यों चलाया गया SIR अभियान चुनाव आयोग ने 24 जून 2025 को यह फैसला लिया था। करीब 20 साल बाद इतनी व्यापक समीक्षा की गई। तेजी से हो रहे शहरीकरण, पलायन और डुप्लीकेट या निष्क्रिय मतदाताओं को हटाने के उद्देश्य से यह अभियान शुरू किया गया, ताकि वोटर लिस्ट को अधिक सटीक और पारदर्शी बनाया जा सके। क्या है SIR की प्रक्रिया सामान्य पुनरीक्षण (SSR) के विपरीत, SIR में पूरी वोटर लिस्ट नए सिरे से तैयार की जाती है। इस बार सभी मतदाताओं को एक तय समय सीमा के भीतर फॉर्म जमा करना अनिवार्य किया गया था। जो लोग ऐसा नहीं कर पाए, उनके नाम ड्राफ्ट लिस्ट से हट गए। कई मामलों में नागरिकता से जुड़े दस्तावेज भी मांगे गए, जिस पर विवाद हुआ और मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा।
SIR in Bengal: पश्चिम बंगाल में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान लाखों वोटरों के नाम हटाए जाने को लेकर राजनीति गरमा गई है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) और बीजेपी आमने-सामने हैं। कितने नाम कटे? कुल मिलाकर करीब 91 लाख वोटरों के नाम हटने का दावा लेकिन चुनाव आयोग (EC) ने अभी तक आधिकारिक तौर पर धर्म के आधार पर डेटा जारी नहीं किया TMC का दावा क्या है? हटाए गए नामों में: 63% हिंदू 35% मुस्लिम TMC के अनुसार: पहले चरण में 58 लाख में से 44 लाख हिंदू दूसरे चरण में ज्यादातर नाम हिंदुओं के तीसरे चरण में मुस्लिम नाम ज्यादा, लेकिन कुल मिलाकर हिंदू ज्यादा प्रभावित TMC का आरोप: “घुसपैठियों को ढूंढने के नाम पर गरीब हिंदुओं को भी हटाया गया” BJP का जवाब BJP ने इन आंकड़ों को संदिग्ध बताया कहा: “चुनाव आयोग ने ऐसा कोई डेटा जारी नहीं किया” “TMC के पास ये आंकड़े आए कहां से?” असली विवाद क्या है? SIR का मकसद: वोटर लिस्ट को अपडेट और शुद्ध करना लेकिन आरोप: वैध वोटरों के नाम भी हटाए जा रहे हैं प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी मामला क्यों अहम है? बंगाल में चुनाव से पहले वोटर लिस्ट में बदलाव का सीधा असर चुनावी नतीजों पर पड़ सकता है इसलिए यह मुद्दा राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील बन गया है।
पश्चिम बंगाल की चुनावी हलचल के बीच Election Commission of India और Trinamool Congress के बीच तनाव खुलकर सामने आ गया। बुधवार को हुई एक अहम बैठक महज 7 मिनट में खत्म हो गई, जब टीएमसी सांसद Derek O'Brien और मुख्य चुनाव आयुक्त Gyanesh Kumar के बीच तीखी बहस हो गई। सूत्रों के मुताबिक, बैठक के दौरान डेरेक ओब्रायन ने CEC पर ऊंची आवाज में सवाल उठाए और उन्हें बोलने से रोक दिया। स्थिति इतनी तनावपूर्ण हो गई कि बैठक बीच में ही खत्म करनी पड़ी। चुनाव आयोग की ओर से कहा गया कि बैठक के दौरान गरिमा बनाए रखने की अपील की गई, लेकिन माहौल शांत नहीं हो सका। टीएमसी का आरोप-‘हमें कहा गया GET LOST’ वहीं, टीएमसी ने आयोग के दावों को खारिज करते हुए गंभीर आरोप लगाए। डेरेक ओब्रायन ने दावा किया कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने उनके प्रतिनिधिमंडल से “यहां से निकल जाओ” यानी “GET LOST” कहा, जिसके बाद वे बैठक से बाहर आ गए। पार्टी के अन्य नेताओं, जिनमें सांसद साकेत गोखले भी शामिल हैं, ने भी इस दावे का समर्थन किया। मतदाता सूची को लेकर विवाद की जड़ दरअसल, यह बैठक पश्चिम बंगाल में चल रहे विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर बुलाई गई थी। टीएमसी का आरोप है कि इस प्रक्रिया के तहत लाखों मतदाताओं के नाम सूची से हटाए जा रहे हैं, जिससे गरीब, अल्पसंख्यक और बंगाली मतदाता प्रभावित हो रहे हैं। चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार, इस अभियान के तहत अब तक लगभग 90 लाख से अधिक नाम हटाए जा चुके हैं, जो कुल मतदाताओं का करीब 11.85% है। हालांकि, अंतिम सूची अभी जारी नहीं हुई है। आरोप-प्रत्यारोप तेज बैठक के बाद टीएमसी ने चुनाव आयोग पर तीखा हमला जारी रखा। डेरेक ओब्रायन ने सीईसी पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि आयोग निष्पक्ष नहीं है और “वोट चोरी” की कोशिश कर रहा है। वहीं, चुनाव आयोग ने इस तरह के आरोपों को सिरे से खारिज किया है। यह पहली बार नहीं है जब टीएमसी ने CEC को लेकर नाराजगी जताई हो। इससे पहले भी पार्टी नेताओं ने चुनाव प्रक्रिया में पारदर्शिता को लेकर सवाल उठाए हैं। इस घटनाक्रम ने पश्चिम बंगाल की राजनीति को और गरमा दिया है, जहां चुनाव से पहले संस्थाओं और राजनीतिक दलों के बीच टकराव खुलकर सामने आ रहा है।
असम, केरल और केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी में विधानसभा चुनाव को लेकर प्रचार का शोर आज थम जाएगा। चुनाव आयोग ने मंगलवार शाम 5 बजे से ‘साइलेंस पीरियड’ लागू करने का ऐलान किया है। इन राज्यों में 9 अप्रैल को एक ही चरण में मतदान होना है। क्या होता है साइलेंस पीरियड? ‘जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951’ की धारा 126 के तहत- मतदान से 48 घंटे पहले प्रचार पर पूरी तरह रोक लग जाती है कोई भी पार्टी या उम्मीदवार रैली, जनसभा, जुलूस डोर-टू-डोर कैंपेन भाषण या प्रचार गतिविधि नहीं कर सकते इसके अलावा- टीवी, सोशल मीडिया, SMS, कॉल के जरिए वोट मांगना भी प्रतिबंधित रहेगा ओपिनियन पोल और सर्वे के प्रसारण पर भी रोक रहेगी बाहरी कार्यकर्ताओं को जाना होगा चुनाव आयोग ने निर्देश दिया है कि- जो राजनीतिक कार्यकर्ता संबंधित राज्य के मतदाता नहीं हैं उन्हें प्रचार खत्म होते ही इलाका छोड़ना होगा स्टालिन का केंद्र पर हमला तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने पुडुचेरी को लेकर केंद्र सरकार पर निशाना साधा। उन्होंने कहा- पुडुचेरी की विधानसभा 14 बार राज्य का दर्जा देने का प्रस्ताव पास कर चुकी है इसके बावजूद केंद्र सरकार ने इस पर ध्यान नहीं दिया स्टालिन ने पुडुचेरी को पूर्ण राज्य का दर्जा (Statehood) देने की मांग दोहराई। केरल में वोटर्स को जागरूक करने का अनोखा तरीका केरल में मुख्य चुनाव अधिकारी रतन यू. केलकर का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है- इसमें वे अधिकारियों के साथ समुद्र किनारे डांस करते नजर आ रहे हैं यह वीडियो युवाओं को वोट डालने के लिए प्रेरित करने के उद्देश्य से बनाया गया है अन्य राजनीतिक हलचल अभिषेक बनर्जी (TMC) ने पाकिस्तान को लेकर विवादित बयान दिया लिएंडर पेस को ‘X’ कैटेगरी सुरक्षा मिली (हाल ही में BJP जॉइन की) असम CM हिमंता बिस्वा सरमा की पत्नी ने कांग्रेस के खिलाफ FIR दर्ज कराई तमिलनाडु चुनाव अपडेट 234 सीटों पर 7,000+ उम्मीदवारों ने नामांकन किया नामांकन की जांच: 7 अप्रैल नाम वापसी की अंतिम तारीख: 9 अप्रैल मतदान: 23 अप्रैल
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 से पहले सियासी माहौल गरमा गया है। भारतीय जनता पार्टी (BJP) के एक प्रतिनिधिमंडल ने Election Commission of India से मुलाकात कर राज्य में चुनावी माहौल को लेकर गंभीर शिकायत दर्ज कराई है। पार्टी ने आरोप लगाया है कि मतदाताओं को डराकर चुनाव को प्रभावित करने की कोशिश की जा रही है। क्या है पूरा मामला? बीजेपी प्रतिनिधिमंडल ने चुनाव आयोग को सौंपी याचिका में दावा किया कि राज्य के कई इलाकों में मतदाताओं को घर-घर जाकर धमकाया जा रहा है। इस मुलाकात के बाद केंद्रीय मंत्री Kiren Rijiju ने कहा कि: लोगों को बीजेपी को वोट न देने के लिए दबाव डाला जा रहा है चुनाव प्रक्रिया को “हाईजैक” करने की कोशिश हो रही है मतदाताओं को डराकर और दबाकर प्रभावित किया जा रहा है ममता सरकार पर सीधे आरोप रिजिजू ने सीधे तौर पर मुख्यमंत्री Mamata Banerjee और उनकी पार्टी All India Trinamool Congress (TMC) पर निशाना साधते हुए कहा कि: पार्टी कार्यकर्ता घर-घर जाकर लोगों को धमका रहे हैं पिछले चुनावों में भी इसी तरह के तरीके अपनाए गए राज्य का पुलिस और प्रशासन TMC के प्रभाव में काम कर रहा है चुनाव आयोग का जवाब चुनाव आयोग ने बीजेपी प्रतिनिधिमंडल की शिकायतों को गंभीरता से सुनने के बाद आश्वासन दिया कि: राज्य में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित किए जाएंगे सभी जरूरी कदम उठाए जाएंगे कब होंगे चुनाव? पश्चिम बंगाल की 294 सीटों पर: मतदान: 23 अप्रैल और 29 अप्रैल मतगणना: 4 मई इस बीच, राजनीतिक दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप तेज होते जा रहे हैं, जिससे चुनावी माहौल और अधिक संवेदनशील बनता दिख रहा है।
कोलकाता: पश्चिम बंगाल की वोटर लिस्ट में आई तकनीकी गड़बड़ी को लेकर चुनाव आयोग (EC) ने सफाई दी है। आयोग ने बुधवार को स्वीकार किया कि डिस्प्ले एरर के कारण कई मतदाताओं का नाम “जांच के दायरे में” दिख रहा था, जबकि वे पहले से ही फाइनल वोटर लिस्ट में शामिल थे। क्या थी गड़बड़ी? मंगलवार शाम को जब लोगों ने EPIC नंबर के जरिए अपना वोटर स्टेटस चेक किया, तो: उनके नाम के आगे “जांच के दायरे में” दिख रहा था यह समस्या उन वोटरों के साथ भी हुई, जिनका नाम पहले से फाइनल लिस्ट में था 2 घंटे में ठीक हुई समस्या चुनाव आयोग के अधिकारियों के मुताबिक: यह पूरी तरह तकनीकी (टेक्निकल) गड़बड़ी थी टेक्निकल टीम ने करीब 2 घंटे में इसे ठीक कर दिया फिलहाल आयोग इस मामले की जांच कर रहा है TMC ने उठाए सवाल इस गड़बड़ी पर सत्ताधारी पार्टी TMC (तृणमूल कांग्रेस) ने सवाल उठाए: पार्टी ने कहा कि इससे ऐसा लग रहा था जैसे सभी वोटरों पर शक किया जा रहा है हालांकि, चुनाव आयोग ने इसे सिरे से खारिज करते हुए कहा कि यह सिर्फ एक डिस्प्ले एरर था, किसी भी तरह की जांच या कार्रवाई से इसका कोई संबंध नहीं है। क्या है स्थिति अब? तकनीकी समस्या को ठीक कर दिया गया है वोटर स्टेटस अब सामान्य रूप से दिख रहा है आयोग मामले की विस्तृत जांच कर रहा है
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 को लेकर चुनाव आयोग (ECI) पूरी तरह एक्शन मोड में आ गया है। आयोग ने साफ कर दिया है कि इस बार चुनाव “हिंसा-मुक्त” और “भय-मुक्त” माहौल में कराए जाएंगे। सोमवार को निर्वाचन आयोग के वरिष्ठ अधिकारियों ने राज्य के सभी जिला निर्वाचन अधिकारियों (DM/DEO), पुलिस अधीक्षकों (SP) और पुलिस आयुक्तों (CP) के साथ हाई-लेवल ऑनलाइन समीक्षा बैठक की। CEC का साफ संदेश: डर और प्रलोभन की कोई जगह नहीं मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने दोहराया कि आयोग का लक्ष्य है कि हर मतदाता बिना किसी डर के मतदान कर सके। अधिकारियों को निर्देश दिया गया कि संवेदनशील इलाकों में विशेष सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित की जाए। बैठक में दिए गए अहम निर्देश चुनाव आयोग ने अधिकारियों को कई सख्त निर्देश दिए- संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान: जहां मतदाताओं को डराया-धमकाया जा सकता है खर्च पर नजर: काले धन और अवैध शराब के इस्तेमाल पर रोक आचार संहिता (MCC): सख्ती से पालन सुनिश्चित करना EVM सुरक्षा: मशीनों के सुरक्षित संचालन और रखरखाव पर फोकस ट्रेनिंग: राष्ट्रीय मास्टर ट्रेनर्स द्वारा अधिकारियों को विशेष प्रशिक्षण 25 मार्च को होगी ROs की विशेष ट्रेनिंग चुनाव तैयारियों के अगले चरण में 25 मार्च 2026 को सभी रिटर्निंग ऑफिसर्स (ROs) के लिए विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा। इसका उद्देश्य चुनाव प्रक्रिया और कानूनी पहलुओं को और मजबूत बनाना है। मतदान केंद्रों पर सुविधाओं का ध्यान चुनाव आयोग ने यह भी सुनिश्चित करने को कहा है कि सभी बूथों पर बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध हों- पेयजल बिजली रैंप (दिव्यांग और बुजुर्गों के लिए)
कोलकाता: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 से पहले आज का दिन राज्य के करीब 27.2 लाख मतदाताओं के लिए बेहद अहम है। ये वे लोग हैं, जिनका नाम ‘अंडर एडजुडिकेशन’ श्रेणी में रखा गया था और जिनका मतदान अधिकार अब चुनाव आयोग की पहली सप्लीमेंट्री वोटर लिस्ट के जरिए तय होगा। दरअसल, ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीज़न’ (SIR) के दौरान राज्य के लगभग 60 लाख मतदाताओं को इस श्रेणी में रखा गया था। यानी इन मतदाताओं के दस्तावेज़ों और पात्रता पर अंतिम निर्णय अभी लंबित था। अब जारी होने वाली पहली सप्लीमेंट्री लिस्ट से इनमें से करीब आधे लोगों की स्थिति स्पष्ट हो जाएगी कि वे आगामी चुनाव में वोट डाल सकेंगे या नहीं। 8.6% वोटरों का भविष्य अधर में 28 फरवरी को जारी अंतिम मतदाता सूची में राज्य के करीब 7 करोड़ मतदाताओं में से लगभग 8.6% यानी 60 लाख लोगों की स्थिति स्पष्ट नहीं थी। यही वजह है कि लाखों परिवारों में असमंजस और चिंता का माहौल है। चुनाव आयोग के अधिकारियों के अनुसार, जिन मतदाताओं के दस्तावेज़ों में विसंगतियां पाई गईं या सुनवाई के दौरान संतोषजनक प्रमाण नहीं दिए गए, उन्हें ‘अंडर एडजुडिकेशन’ में रखा गया। तीन चरणों में आएगी सप्लीमेंट्री लिस्ट पहली सूची: 23 मार्च दूसरी सूची: अगले शुक्रवार तीसरी सूची: 3 अप्रैल पहली सूची जारी होने के बाद 27.2 लाख लोगों को अपने मतदान अधिकार की स्थिति का पता चल जाएगा, जबकि बाकी लोगों को अभी और इंतजार करना होगा। नाम नहीं आया तो क्या विकल्प? यदि किसी मतदाता का नाम सप्लीमेंट्री सूची में शामिल नहीं होता है, तो उसके पास अपील का विकल्प मौजूद रहेगा। वे: ECINET ऐप के माध्यम से ऑनलाइन अपील कर सकते हैं जिला मजिस्ट्रेट या उप-विभागीय अधिकारी के समक्ष आवेदन दे सकते हैं इसके लिए चुनाव आयोग ने 19 अपीलीय ट्रिब्यूनल का गठन किया है। जमीनी स्तर पर बेचैनी और उम्मीद भवानीपुर की शिखा दास, जो पिछले चार दशकों से मतदान करती आ रही हैं, इस बार अपने नाम को लेकर अनिश्चितता में हैं। उनके परिवार के अन्य सदस्यों के नाम सूची में हैं, लेकिन उनका नाम रोका गया है। वहीं अलीपुर के सौरव चक्रवर्ती और कैनिंग के अकरमुल हक सरदार जैसे कई मतदाता अपने दस्तावेजों के आधार पर आश्वस्त हैं, लेकिन अंतिम सूची का इंतजार उन्हें बेचैन कर रहा है। प्रशासन अलर्ट मोड में राज्य सरकार ने सभी जिला मजिस्ट्रेटों को कानून-व्यवस्था बनाए रखने के निर्देश दिए हैं, ताकि सूची जारी होने के बाद किसी भी तरह की अव्यवस्था न हो।
कोलकाता: Election Commission of India ने पश्चिम बंगाल में आगामी विधानसभा चुनावों को देखते हुए बड़ा प्रशासनिक कदम उठाया है। चुनाव की तारीखों के ऐलान के कुछ ही घंटों बाद आयोग ने राज्य के मुख्य सचिव नंदिनी चक्रवर्ती और गृह विभाग के शीर्ष अधिकारी को उनके पद से हटा दिया। आयोग ने नंदिनी चक्रवर्ती की जगह दुष्यंत नरियाला को राज्य का नया मुख्य सचिव नियुक्त किया है। वहीं संघमित्रा घोष को गृह एवं पर्वतीय मामलों के विभाग का नया प्रधान सचिव बनाया गया है। चुनाव आयोग के आदेश के मुताबिक ये नियुक्तियां तत्काल प्रभाव से लागू होंगी। निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने की कोशिश चुनाव आयोग का कहना है कि यह फैसला निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव प्रक्रिया सुनिश्चित करने के लिए लिया गया है। चुनावी माहौल के बीच प्रशासनिक स्तर पर इस तरह का फेरबदल राज्य की राजनीतिक गतिविधियों को भी प्रभावित कर सकता है। चुनावी प्रचार में प्रमुख मुद्दे बंगाल में इस बार चुनाव प्रचार कई बड़े मुद्दों के इर्द-गिर्द घूमता नजर आ रहा है। इनमें सबसे प्रमुख है ‘बंगाली अस्मिता’ का सवाल। सत्तारूढ़ All India Trinamool Congress और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भाजपा पर लगातार बंगाली पहचान पर हमले का आरोप लगाती रही हैं। दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी के नेता अवैध घुसपैठ और कानून-व्यवस्था के मुद्दों को चुनावी एजेंडे में प्रमुखता से उठा रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी हाल की रैलियों में इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाया है। मतुआ समुदाय और वोट बैंक की राजनीति राज्य की लगभग 50 विधानसभा सीटों पर प्रभाव रखने वाला मतुआ समुदाय भी इस चुनाव में अहम भूमिका निभा सकता है। 2021 के विधानसभा चुनाव में इस समुदाय के समर्थन से भाजपा को कई सीटों पर फायदा मिला था, जबकि तृणमूल कांग्रेस भी इस वोट बैंक को साधने की कोशिश में जुटी है। मतदाता सूची में बड़े बदलाव चुनाव से पहले मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के बाद लगभग 63.66 लाख नाम हटाए जाने की खबर ने भी राजनीतिक माहौल को गर्मा दिया है। इससे राज्य के कुल मतदाताओं की संख्या लगभग 7.66 करोड़ से घटकर करीब 7.04 करोड़ रह गई है। विश्लेषकों का मानना है कि मतदाता सूची में हुए इन बदलावों से कई क्षेत्रों में चुनावी समीकरण बदल सकते हैं, जिससे राजनीतिक दलों को अपनी रणनीति नए सिरे से बनानी पड़ रही है।
पश्चिम बंगाल में विशेष मतदाता सूची पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया से जुड़े मामले में मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान सख्त रुख देखने को मिला। सुनवाई के दौरान भारत के मुख्य न्यायाधीश Justice Surya Kant याचिकाकर्ताओं पर काफी नाराज़ दिखाई दिए और न्यायिक अधिकारियों पर सवाल उठाने को लेकर कड़ी चेतावनी दी। सुप्रीम कोर्ट में इस मामले से जुड़ी कई याचिकाओं पर सुनवाई हो रही है, जिनमें पश्चिम बंगाल में चल रही विशेष मतदाता सूची पुनरीक्षण प्रक्रिया की वैधता और पारदर्शिता पर सवाल उठाए गए हैं। ‘न्यायिक अधिकारियों पर सवाल बर्दाश्त नहीं’ सुनवाई के दौरान Justice Surya Kant ने कहा कि याचिकाकर्ताओं ने न्यायिक अधिकारियों पर सवाल उठाकर “हद पार कर दी है”। उन्होंने सख्त लहजे में कहा कि इस तरह की याचिकाएं न्यायिक व्यवस्था पर अविश्वास का संदेश देती हैं और अदालत इसे किसी भी हालत में बर्दाश्त नहीं करेगी। मुख्य न्यायाधीश ने टिप्पणी करते हुए कहा, “याचिकाकर्ता ऐसी अर्जी दाखिल करने की हिम्मत कैसे कर सकते हैं? न्यायिक अधिकारियों पर सवाल उठाना बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।” उन्होंने यह भी कहा कि अदालत इस तरह की टिप्पणियों को गंभीरता से लेती है और इस संबंध में कड़ी चेतावनी जारी की जा रही है। ‘सिस्टम पर भरोसे की कमी का गलत संदेश’ सुनवाई के दौरान अदालत को बताया गया कि विशेष पुनरीक्षण प्रक्रिया के तहत लगभग 52 लाख लोगों के मामलों की जांच की जा रही है, जिनमें से करीब 10 लाख मामलों का काम पूरा हो चुका है। इस पर Justice Surya Kant ने कहा कि समय से पहले याचिका दायर करना यह संकेत देता है कि याचिकाकर्ताओं को व्यवस्था पर भरोसा नहीं है। उन्होंने कहा कि प्रक्रिया को पूरा होने का समय दिया जाना चाहिए। वैध मतदाता शामिल होंगे, अवैध नाम हटेंगे अदालत ने स्पष्ट किया कि जिन लोगों का मतदान का अधिकार वैध है, उन्हें मतदाता सूची में शामिल किया जाएगा, जबकि अवैध रूप से जोड़े गए नामों को हटाया जाएगा। सीजेआई ने कहा, “जो लोग वास्तविक और वैध मतदाता हैं, उन्हें शामिल किया जाएगा और जो घुसपैठिए हैं, उन्हें बाहर किया जाएगा।” सुप्रीम कोर्ट के निर्देश सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने Election Commission of India और राज्य सरकार को प्रक्रिया सुचारू रूप से चलाने के लिए कई निर्देश दिए। अदालत ने कहा कि: पूरी प्रक्रिया को पारदर्शी और व्यवस्थित तरीके से पूरा किया जाए। पोर्टल से जुड़ी तकनीकी दिक्कतों को तुरंत दूर किया जाए। अधिकारियों के लिए आवश्यक लॉग-इन आईडी और तकनीकी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं। न्यायिक अधिकारियों को काम करने के लिए सभी जरूरी संसाधन उपलब्ध कराए जाएं। अपील की सुनवाई कौन करेगा अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि किसी व्यक्ति का नाम मतदाता सूची में शामिल करने का दावा खारिज हो जाता है, तो उसके खिलाफ किसी प्रशासनिक निकाय के पास अपील नहीं होगी। ऐसे मामलों में संबंधित हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश दो पूर्व या वर्तमान हाईकोर्ट जजों की एक विशेष पीठ गठित कर सकते हैं, जो इन अपीलों की सुनवाई करेगी। सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया है कि इस अपीलीय व्यवस्था से जुड़ी जानकारी आधिकारिक अधिसूचना जारी कर सार्वजनिक की जाए। इस पूरे घटनाक्रम के बाद बंगाल की SIR प्रक्रिया से जुड़ा मामला एक बार फिर न्यायिक और राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बन गया है।
नई दिल्ली: देश में 2026 Rajya Sabha Elections को लेकर सियासी हलचल तेज हो गई है। चुनाव आयोग ने 10 राज्यों की 37 सीटों पर चुनाव का कार्यक्रम घोषित किया है। इन सीटों पर मौजूदा सदस्यों का कार्यकाल अप्रैल 2026 में समाप्त हो रहा है। इन राज्यों में Maharashtra, Tamil Nadu, West Bengal, Bihar, Assam, Odisha, Telangana, Chhattisgarh, Haryana और Himachal Pradesh शामिल हैं। चुनाव आयोग के अनुसार नामांकन की अंतिम तारीख 5 मार्च और नाम वापसी की अंतिम तिथि 9 मार्च थी। मतदान 16 मार्च को सुबह 9 बजे से शाम 4 बजे तक होगा और उसी दिन शाम 5 बजे मतगणना की जाएगी। कई राज्यों में दिग्गजों का निर्विरोध चुना जाना तय कई राज्यों में राजनीतिक समीकरण पहले से तय होने के कारण कई बड़े नेताओं के निर्विरोध राज्यसभा पहुंचने की संभावना है। बिहार: बिहार की पांच सीटों में से चार पर NDA की स्थिति मजबूत मानी जा रही है। मुख्यमंत्री Nitish Kumar और भाजपा नेता Nitin Naveen का राज्यसभा जाना लगभग तय माना जा रहा है। हालांकि पांचवीं सीट पर Rashtriya Janata Dal ने A. D. Singh को मैदान में उतारकर मुकाबला दिलचस्प बना दिया है। महाराष्ट्र: महाराष्ट्र की 7 सीटों में से कई सीटों पर बड़े नेताओं का निर्विरोध चुना जाना तय माना जा रहा है। इनमें Sharad Pawar, Ramdas Athawale और भाजपा के Vinod Tawde के नाम प्रमुख हैं। असम: असम की तीन सीटों पर NDA की स्थिति मजबूत बताई जा रही है। यहां Jogen Mohan, Terash Gowalla और Pramod Boro के निर्विरोध चुने जाने की संभावना जताई जा रही है। तमिलनाडु: तमिलनाडु में छह उम्मीदवारों के निर्विरोध चुने जाने की संभावना है। इनमें Tiruchi Siva (DMK) और M. Thambidurai (AIADMK) शामिल हैं। छत्तीसगढ़: छत्तीसगढ़ में कांग्रेस और भाजपा को एक-एक सीट मिलने की संभावना है। कांग्रेस ने Phulo Devi Netam को उम्मीदवार बनाया है, जबकि भाजपा ने Laxmi Verma को मैदान में उतारा है। जहां मुकाबला दिलचस्प कुछ राज्यों में मुकाबला काफी रोचक बना हुआ है। बिहार: बिहार में पांचवीं सीट पर मुकाबला कड़ा माना जा रहा है। आरजेडी के उम्मीदवार ए.डी. सिंह के मैदान में उतरने से NDA को अतिरिक्त समर्थन जुटाने की जरूरत पड़ सकती है। ओडिशा: ओडिशा में चार सीटों पर त्रिकोणीय मुकाबले की स्थिति बन गई है। कांग्रेस ने Biju Janata Dal का समर्थन किया है, जबकि भाजपा ने निर्दलीय नेता Dilip Ray को समर्थन दिया है। हरियाणा: हरियाणा की दो सीटों पर चुनाव होना है। भाजपा ने एक उम्मीदवार उतारा है, जबकि दूसरी सीट पर कांग्रेस और अन्य क्षेत्रीय दलों के बीच मुकाबला होने की संभावना है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2026 के राज्यसभा चुनाव केंद्र और राज्यों के राजनीतिक समीकरणों पर असर डाल सकते हैं। कई जगह NDA की स्थिति मजबूत दिखाई दे रही है, जबकि विपक्ष भी जहां मौका मिल रहा है, वहां कड़ी टक्कर देने की तैयारी में है। बिहार, ओडिशा और हरियाणा जैसे राज्यों में चुनावी रोमांच सबसे ज्यादा देखने को मिल सकता है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।