ट्रंप प्रशासन ने कसी शिकंजा, ईरान की तेल आय पर बड़ा वार
अमेरिका ने ईरान के तेल कारोबार पर एक और बड़ा कदम उठाते हुए चीन की प्रमुख रिफाइनरी और करीब 40 शिपिंग कंपनियों पर आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए हैं। यह कार्रवाई ईरान के तेल निर्यात को रोकने और उसकी आय के प्रमुख स्रोत को कमजोर करने की रणनीति का हिस्सा है।
अमेरिकी ट्रेजरी विभाग ने चीन के डालियान स्थित हेंगली पेट्रोकेमिकल रिफाइनरी पर प्रतिबंध लगाया है। यह चीन की सबसे बड़ी स्वतंत्र रिफाइनरियों में से एक है, जिसकी प्रतिदिन लगभग चार लाख बैरल तेल प्रसंस्करण क्षमता है।
अमेरिका का आरोप है कि यह रिफाइनरी 2023 से लगातार ईरानी कच्चा तेल खरीद रही थी।
हेंगली के अलावा, ईरानी तेल के परिवहन में शामिल लगभग 40 शिपिंग कंपनियों और टैंकरों को भी अमेरिकी प्रतिबंधों की सूची में शामिल किया गया है।
इस कदम से ईरान के लिए वैश्विक बाजार तक तेल पहुंचाना और मुश्किल हो जाएगा।
अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट ने कहा कि वॉशिंगटन ईरान के तेल नेटवर्क को पूरी तरह बाधित करने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने कहा कि अमेरिका उन जहाजों, बिचौलियों और खरीदारों पर लगातार कार्रवाई करेगा, जिनके जरिए ईरान तेल बेचता है।
इन प्रतिबंधों से चीन और ईरान के बीच ऊर्जा व्यापार पर सीधा असर पड़ सकता है। यह फैसला ऐसे समय आया है जब वैश्विक ऊर्जा बाजार पहले से ही तनाव में है।
फारस की खाड़ी में जारी तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य पर संकट के बीच इस कदम ने वैश्विक तेल आपूर्ति को लेकर नई चिंताएं पैदा कर दी हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि इससे अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों में और उतार-चढ़ाव आ सकता है।
अमेरिका ने साफ कर दिया है कि जो देश या कंपनियां ईरानी तेल खरीदेंगी, उनके खिलाफ भी द्वितीयक प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।
यह संदेश खास तौर पर चीन, हांगकांग, यूएई और ओमान जैसे देशों के लिए है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
वॉशिंगटन: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपना जन्मदिन इस बार बेहद अनोखे अंदाज में मनाया। रिपोर्ट्स के मुताबिक, व्हाइट हाउस के साउथ लॉन को एक विशाल UFC फाइटिंग एरिना में तब्दील कर दिया गया, जहां अल्टीमेट फाइटिंग चैंपियनशिप (UFC) के कई मुकाबले आयोजित किए गए। इस दौरान ट्रंप फ्रंट रो में बैठकर मुकाबलों का आनंद लेते नजर आए। बताया जा रहा है कि बारिश के कारण कार्यक्रम की शुरुआत में थोड़ी देरी हुई, लेकिन इसके बाद फाइटिंग केज के अंदर जोरदार मुकाबले देखने को मिले। 92 फीट ऊंचे ‘द क्लॉ’ नामक फाइटिंग केज में दुनिया के कई फाइटर्स ने हिस्सा लिया। एयर शो से हुई शुरुआत कार्यक्रम की शुरुआत अमेरिकी वायुसेना के विशेष फ्लाईपास्ट से हुई। इस दौरान छह एफ/ए-18 सुपर हॉर्नेट और छह एफ-16 फाइटिंग फाल्कन विमानों ने ‘सुपर डेल्टा फॉर्मेशन’ में उड़ान भरी। फ्लाईपास्ट के दौरान ट्रंप सैल्यूट करते नजर आए। इसके बाद संगीत की धुनों के बीच ट्रंप व्हाइट हाउस से निकलकर फाइटिंग एरिना तक पहुंचे और मुकाबलों का सिलसिला शुरू हुआ। ट्रंप परिवार और प्रशासन के वरिष्ठ सदस्य रहे मौजूद मुकाबलों के दौरान डोनाल्ड ट्रंप UFC के मुख्य कार्यकारी अधिकारी डाना व्हाइट और प्रथम महिला मेलानिया ट्रंप के साथ पहली पंक्ति में बैठे दिखाई दिए। उनके दोनों बेटे भी कार्यक्रम में मौजूद थे। इस आयोजन में ट्रंप प्रशासन के कई वरिष्ठ सदस्य शामिल हुए, जिनमें स्वास्थ्य मंत्री रॉबर्ट एफ. कैनेडी जूनियर, काश पटेल और रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ के नाम प्रमुख हैं। जन्मदिन समारोह या MAGA शक्ति प्रदर्शन? ट्रंप ने इस आयोजन को अमेरिका की 250वीं स्वतंत्रता वर्षगांठ समारोह का हिस्सा बताया, लेकिन कार्यक्रम में मौजूद समर्थकों का उत्साह इसे राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन के रूप में भी पेश करता दिखा। पूरे कार्यक्रम के दौरान समर्थक ‘यूएसए, यूएसए’ के नारे लगाते रहे। ब्रिटिश हेवीवेट मुक्केबाज टायसन फ्यूरी भी कार्यक्रम में पहुंचे। उन्होंने ‘Donald Trump for Prime Minister’ लिखी टोपी पहन रखी थी, जिसने लोगों का ध्यान खींचा। शुरुआती मुकाबलों में किसने जीता? शुरुआती मुकाबलों में ट्रंप के करीबी माने जाने वाले बो निकल (Bo Nickal) ने काइल डौकाउस (Kyle Daukaus) को हराया। वहीं डिएगो लोपेस (Diego Lopes) ने स्टीव गार्सिया (Steve Garcia) के खिलाफ जीत दर्ज की। रिपोर्ट लिखे जाने तक कई अन्य मुकाबले भी जारी थे और दुनिया भर के फाइटर्स इस आयोजन का हिस्सा बने हुए थे। UFC और ट्रंप की राजनीति का पुराना रिश्ता UFC लंबे समय से ट्रंप के ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ (MAGA) समर्थक वर्ग के बीच लोकप्रिय रहा है। मशहूर पॉडकास्टर जो रोगन समेत UFC से जुड़े कई प्रभावशाली चेहरे ट्रंप के समर्थकों में गिने जाते हैं। यही वजह है कि इस आयोजन को खेल के साथ-साथ राजनीतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। क्या व्हाइट हाउस में स्थायी होगा UFC केज? रिपोर्ट्स के मुताबिक, ट्रंप ने मजाकिया अंदाज में कहा कि वह शायद ‘द क्लॉ’ फाइटिंग केज को कभी हटाना नहीं चाहेंगे और इसे व्हाइट हाउस परिसर का स्थायी हिस्सा भी बनाया जा सकता है। अगर ऐसा होता है, तो यह व्हाइट हाउस में ट्रंप प्रशासन के दौरान किए गए बड़े बदलावों की सूची में एक और अनोखा अध्याय जोड़ सकता है।
वॉशिंगटन/तेहरान: पश्चिम एशिया में लंबे समय से जारी तनाव के बीच अमेरिका और ईरान के बीच संभावित शांति समझौते की खबरों ने वैश्विक राजनीति और ऊर्जा बाजारों में हलचल बढ़ा दी है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने दावा किया है कि दोनों देशों के बीच शांति समझौते पर सहमति बन गई है। वहीं, ईरान की ओर से भी इस दिशा में सकारात्मक संकेत दिए गए हैं। ट्रंप ने होर्मुज स्ट्रेट खोलने का किया ऐलान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'ट्रुथ सोशल' पर लिखा कि अमेरिका और ईरान के बीच समझौता पूरा हो चुका है। उन्होंने रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य (Hormuz Strait) को फिर से खोलने और अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी हटाने की घोषणा की। ट्रंप ने लिखा, "इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान के साथ समझौता अब पूरा हो चुका है। सभी को बधाई। दुनिया के जहाज अब अपने इंजन शुरू करें, तेल का प्रवाह जारी रहने दें।" ईरान ने रखी अपनी शर्तें ईरान के कानूनी एवं अंतरराष्ट्रीय मामलों के उप विदेश मंत्री काजेम गरीबाबादी ने कहा कि तेहरान प्रस्तावित 60 दिन की वार्ता प्रक्रिया में तभी शामिल होगा, जब अमेरिका युद्ध समाप्त करने, नाकेबंदी हटाने और ईरानी संपत्तियों को मुक्त करने जैसे अपने वादों को पूरा करेगा। उन्होंने कहा कि समझौते का अर्थ यह नहीं है कि ईरान अमेरिका पर पूरी तरह भरोसा कर रहा है। तेहरान अमेरिकी प्रतिबद्धताओं के क्रियान्वयन की लगातार निगरानी करेगा। शहबाज शरीफ ने भी किया समझौते का दावा पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर दावा किया कि लंबी बातचीत और गहन वार्ताओं के बाद अमेरिका और ईरान शांति समझौते पर सहमत हो गए हैं। उन्होंने कहा कि दोनों पक्षों ने लेबनान समेत विभिन्न मोर्चों पर सैन्य गतिविधियों को तत्काल और स्थायी रूप से समाप्त करने का निर्णय लिया है। शरीफ के अनुसार, समझौते पर औपचारिक हस्ताक्षर 19 जून को स्विट्जरलैंड में किए जा सकते हैं। कतर, सऊदी अरब और तुर्किये की भूमिका अहम शहबाज शरीफ ने इस मध्यस्थता प्रक्रिया में कतर, सऊदी अरब और तुर्किये की भूमिका की सराहना की। उन्होंने कहा कि इन देशों के कूटनीतिक प्रयासों ने दोनों पक्षों को बातचीत की मेज तक लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। परमाणु कार्यक्रम पर भी रहेगा फोकस डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया कि प्रस्तावित समझौते के तहत ईरान के परमाणु कार्यक्रम की निगरानी को और मजबूत किया जाएगा। इसमें निरीक्षण व्यवस्था को सख्त करने तथा परमाणु सामग्री के प्रबंधन से जुड़े प्रावधान शामिल किए जा सकते हैं। वैश्विक ऊर्जा बाजार की नजरें समझौते पर यदि 19 जून को प्रस्तावित हस्ताक्षर होते हैं और होर्मुज जलडमरूमध्य पूरी तरह खुलता है, तो इसका सीधा असर वैश्विक तेल आपूर्ति और ऊर्जा बाजारों पर पड़ सकता है। पश्चिम एशिया में तनाव कम होने की स्थिति में कच्चे तेल की कीमतों में भी राहत देखने को मिल सकती है। अमेरिका, ईरान और अन्य संबंधित पक्षों की ओर से समझौते के अंतिम दस्तावेज और आधिकारिक विवरण सार्वजनिक होने का इंतजार किया जा रहा है।
उत्तर कोरिया पर ड्रोन ऑपरेशन से जुड़ा मामला, सत्ता से हटाए जा चुके हैं यून दक्षिण कोरिया की एक अदालत ने पूर्व राष्ट्रपति Yoon Suk Yeol को बड़ा झटका देते हुए 30 साल की जेल की सजा सुनाई है। अदालत ने उन्हें उत्तर कोरिया के ऊपर सैन्य ड्रोन भेजने की साजिश और सत्ता के दुरुपयोग का दोषी पाया है। यह मामला अक्टूबर 2024 में प्योंगयांग के ऊपर कथित ड्रोन घुसपैठ से जुड़ा हुआ है। अदालत ने क्या कहा? Seoul Central District Court ने अपने फैसले में कहा कि यून शुरू से ही उस ड्रोन ऑपरेशन की योजना में शामिल थे, जिसके तहत उत्तर कोरिया की राजधानी प्योंगयांग के ऊपर सैन्य ड्रोन भेजे गए थे। अदालत के अनुसार यह कार्रवाई बाद में दिसंबर 2024 में मार्शल लॉ लागू करने के लिए माहौल बनाने की कोशिश का हिस्सा थी। अदालत ने यून को "दुश्मन की सहायता करने" और "सत्ता के दुरुपयोग" का दोषी ठहराया। पहले भी मिल चुकी है उम्रकैद यह फैसला यून के खिलाफ आया दूसरा बड़ा न्यायिक झटका है। इससे पहले फरवरी 2026 में उन्हें मार्शल लॉ लागू करने की कोशिश से जुड़े विद्रोह (Insurrection) मामले में उम्रकैद की सजा सुनाई जा चुकी है। यून को पिछले वर्ष संवैधानिक अदालत द्वारा महाभियोग को बरकरार रखने के बाद राष्ट्रपति पद से हटा दिया गया था। इसके बाद हुए विशेष चुनाव में Lee Jae Myung ने जीत हासिल कर देश की सत्ता संभाली। यून ने आरोपों से किया इनकार पूर्व राष्ट्रपति यून ने अपने ऊपर लगे सभी आरोपों को खारिज किया है। उनके वकीलों का कहना है कि उन्होंने न तो ड्रोन मिशन का आदेश दिया और न ही उसे मंजूरी दी। बचाव पक्ष के अनुसार यह अभियान उत्तर कोरिया द्वारा दक्षिण कोरिया की सीमा में कचरे से भरे गुब्बारे भेजने की घटनाओं के जवाब में किया गया था और इसका मार्शल लॉ से कोई संबंध नहीं था। अपील का रास्ता खुला अभियोजन पक्ष ने अप्रैल में यून के लिए 30 साल की सजा की मांग की थी, जिसे अदालत ने स्वीकार कर लिया। हालांकि यून अभी भी इस फैसले को ऊपरी अदालत में चुनौती दे सकते हैं। वह पहले से सुनाई गई उम्रकैद की सजा के खिलाफ भी अपील कर चुके हैं। दक्षिण कोरिया की राजनीति में बढ़ी हलचल पूर्व राष्ट्रपति के खिलाफ लगातार आ रहे फैसलों ने दक्षिण कोरिया की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। विश्लेषकों का मानना है कि यह मामला देश के लोकतांत्रिक इतिहास के सबसे बड़े राजनीतिक और संवैधानिक संकटों में से एक माना जाएगा।