स्वास्थ्य

Narrowband UVB Better Tolerated in Eczema Study

Atopic Dermatitis में Narrowband vs Broadband UVB: असर बराबर, सहनशीलता में Narrowband बेहतर – नई स्टडी

surbhi मई 2, 2026 0
Narrowband and broadband UVB phototherapy comparison for treating moderate to severe atopic dermatitis
Narrowband vs Broadband UVB Atopic Dermatitis Study

मध्यम से गंभीर Atopic Dermatitis के इलाज में Ultraviolet B phototherapy (UVB) लंबे समय से प्रभावी विकल्प माना जाता है, खासकर उन मरीजों के लिए जो टॉपिकल स्टेरॉयड जैसे उपचारों से पर्याप्त लाभ नहीं पा रहे हैं। अब एक नई रैंडमाइज्ड कंट्रोल्ड ट्रायल ने narrowband और broadband UVB के बीच तुलना करते हुए अहम निष्कर्ष सामने रखे हैं।

स्टडी कैसे की गई?

इस अध्ययन में 18 वर्ष से अधिक उम्र के 69 मरीज शामिल किए गए, जिन्हें मध्यम से गंभीर और ट्रीटमेंट-रेफ्रैक्टरी एटोपिक डर्मेटाइटिस था।
मरीजों को दो समूहों में बांटा गया:

  • एक को broadband UVB
  • दूसरे को narrowband UVB

दोनों समूहों को 12 हफ्तों तक फुल-बॉडी फोटोथेरेपी दी गई, साथ ही उनकी मौजूदा टॉपिकल थेरेपी जारी रही। अध्ययन का मुख्य मापदंड Eczema Area and Severity Index (EASI) स्कोर में बदलाव था।

असर में नहीं दिखा बड़ा अंतर

रिजल्ट्स के मुताबिक, दोनों ही थेरेपी ने बीमारी की गंभीरता में उल्लेखनीय सुधार किया:

  • Broadband UVB: EASI में औसत −8.1 की कमी
  • Narrowband UVB: EASI में औसत −8.9 की कमी

दोनों के बीच का अंतर सांख्यिकीय रूप से महत्वपूर्ण नहीं था, यानी प्रभाव लगभग समान रहा।

इसके अलावा vIGA, POEM, PP-NRS, DLQI और RECAP जैसे अन्य क्लिनिकल और मरीज-आधारित मापदंडों में भी दोनों ग्रुप्स के बीच कोई खास अंतर नहीं पाया गया।

सहनशीलता में बड़ा फर्क

हालांकि, टॉलरबिलिटी (सहनशीलता) के मामले में फर्क देखने को मिला:

  • Broadband UVB ग्रुप में 4 मरीजों ने साइड इफेक्ट्स के कारण इलाज छोड़ दिया
  • Narrowband UVB ग्रुप में कोई भी मरीज बीच में नहीं छोड़ा

यह दर्शाता है कि narrowband UVB ज्यादा सुरक्षित और बेहतर सहन किया जाने वाला विकल्प हो सकता है।

क्या है इसका मतलब?

इस अध्ययन से यह साफ होता है कि दोनों UVB थेरेपी प्रभावी हैं, लेकिन बेहतर सहनशीलता के कारण narrowband UVB को प्राथमिकता दी जा सकती है। यह निष्कर्ष डॉक्टरों को इलाज का सही विकल्प चुनने में मदद कर सकता है, खासकर उन मरीजों के लिए जिनकी बीमारी लंबे समय से नियंत्रण में नहीं आ रही।

 

Popular post
शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

स्वास्थ्य

View more
Illustration of heart arteries showing bypass surgery and stent procedure comparison in coronary artery disease treatment
कोरोनरी आर्टरी डिजीज के इलाज में नई बहस: CABG और PCI के नतीजों में क्या कहती है ताजा स्टडी?

हृदय रोग के इलाज में लंबे समय से यह सवाल बना हुआ है कि सर्जरी बेहतर है या स्टेंटिंग। हालिया रिसर्च ने इस बहस को नई दिशा दी है। Coronary Artery Disease के इलाज में Coronary Artery Bypass Graft (CABG) और Percutaneous Coronary Intervention (PCI) के बीच तुलना करने वाली एक व्यापक स्टडी से कई अहम निष्कर्ष सामने आए हैं। क्या कहती है स्टडी? यह अध्ययन कई रैंडमाइज्ड कंट्रोल्ड ट्रायल्स पर आधारित है, जिनमें कम से कम 3 साल का फॉलो-अप शामिल था। मुख्य फोकस था–मृत्यु दर (all-cause mortality), जबकि सेकेंडरी पैरामीटर्स में हार्ट अटैक, स्ट्रोक जैसे गंभीर इवेंट्स और दोबारा इलाज (revascularisation) शामिल थे। मृत्यु दर में बड़ा अंतर नहीं स्टडी के अनुसार, CABG और PCI के बीच कुल मृत्यु दर में कोई बड़ा अंतर नहीं पाया गया। रिलेटिव रिस्क: 0.90 95% कॉन्फिडेंस इंटरवल: 0.78–1.04 हालांकि, जिन मरीजों में आर्टरी ब्लॉकेज कम जटिल था (SYNTAX स्कोर 23 से कम), उनमें CABG से मृत्यु का जोखिम कुछ कम देखा गया। गंभीर हार्ट इवेंट्स में CABG आगे भले ही मृत्यु दर लगभग समान रही, लेकिन अन्य महत्वपूर्ण पैरामीटर्स में CABG बेहतर साबित हुआ: मेजर कार्डियोवैस्कुलर और सेरेब्रोवैस्कुलर इवेंट्स (MACCE) का जोखिम कम रिलेटिव रिस्क: 0.75 दोबारा प्रक्रिया (revascularisation) की जरूरत आधी तक कम (RR: 0.50) यह फायदे अलग-अलग मरीज समूहों में भी समान रूप से देखे गए। इलाज के फैसले पर क्या असर? यह निष्कर्ष डॉक्टरों और मरीजों दोनों के लिए महत्वपूर्ण हैं। अगर लक्ष्य सिर्फ जीवन बचाना है, तो दोनों विकल्प लगभग समान हैं लेकिन लंबे समय में जटिलताओं और दोबारा इलाज से बचना है, तो CABG बेहतर विकल्प हो सकता है क्या होना चाहिए अगला कदम? विशेषज्ञों का मानना है कि हर मरीज के लिए एक ही इलाज सही नहीं हो सकता। इलाज का चयन करते समय मरीज की स्थिति, आर्टरी की जटिलता और व्यक्तिगत जोखिम को ध्यान में रखना जरूरी है।  

surbhi मई 6, 2026 0
60-day junk food challenge

60 दिन तक जंक फूड छोड़ने से शरीर में दिखते हैं ये बड़े बदलाव, एक्सपर्ट्स ने बताए फायदे

AI analyzing MRI brain scan to detect tumor with high accuracy using deep learning model

AI से ब्रेन ट्यूमर की पहचान में क्रांति: MRI से 98% तक सटीक डायग्नोसिस, डॉक्टरों का काम होगा आसान

Microscopic view of Influenza D virus infecting human respiratory cells in lab research study

Influenza D Virus पर बढ़ी चिंता: इंसानों को संक्रमित करने की क्षमता, लेकिन शुरुआती इम्यून सिस्टम से बच निकलने में माहिर

Cardiac MRI showing advanced risk assessment in hypertrophic cardiomyopathy using Left Atrioventricular Coupling Index
Hypertrophic Cardiomyopathy: नए MRI इंडेक्स से Sudden Cardiac Death का जोखिम आकलन हुआ और सटीक

हृदय रोग Hypertrophic Cardiomyopathy (HCM) में अचानक हृदय मृत्यु (Sudden Cardiac Death) का जोखिम लंबे समय से चिंता का विषय रहा है। अब एक नई स्टडी में पाया गया है कि MRI से निकाला गया एक नया मापदंड – Left Atrioventricular Coupling Index (LACI) – जोखिम का अनुमान लगाने में मौजूदा मॉडल्स से भी बेहतर मदद कर सकता है। क्या है LACI और क्यों है महत्वपूर्ण? LACI दिल के बाएं एट्रियम और वेंट्रिकल के बीच के संबंध को दर्शाता है। इसे बाएं एट्रियम और बाएं वेंट्रिकल के एंड-डायस्टोलिक वॉल्यूम के अनुपात से मापा जाता है। यह इंडेक्स दिल की कार्यप्रणाली के उस पहलू को पकड़ता है, जिसे पारंपरिक पैरामीटर पूरी तरह नहीं दर्शा पाते। बड़े अध्ययन से मिले अहम संकेत इस रिसर्च में 2,240 HCM मरीजों को औसतन 4 साल तक फॉलो किया गया। इस दौरान: 128 मरीजों (5.7%) में Sudden Cardiac Death की घटनाएं दर्ज हुईं जिन मरीजों में घटना हुई, उनमें LACI का स्तर ज्यादा था साथ ही Late Gadolinium Enhancement (LGE) भी अधिक और हृदय की पंपिंग क्षमता (Ejection Fraction) कम पाई गई मौजूदा मॉडल्स से बेहतर प्रदर्शन अध्ययन में यह भी पाया गया कि LACI, पारंपरिक जोखिम कारकों और LGE के साथ मिलकर Sudden Cardiac Death का स्वतंत्र भविष्यवक्ता (independent predictor) बना रहा। जब इसे ESC और ACC/AHA के मौजूदा जोखिम मॉडल्स में जोड़ा गया, तो जोखिम आकलन की सटीकता और बेहतर हो गई। डॉक्टरों के लिए क्या मतलब? इस नई जानकारी से डॉक्टरों को यह तय करने में मदद मिल सकती है कि किन मरीजों में अचानक हृदय मृत्यु का खतरा ज्यादा है। इससे इलाज और मॉनिटरिंग की रणनीति और अधिक सटीक बनाई जा सकती है। अभी और रिसर्च की जरूरत हालांकि यह अध्ययन रेट्रोस्पेक्टिव था, इसलिए इसके आधार पर सीधे कारण-परिणाम का निष्कर्ष निकालना सीमित है। साथ ही, अलग-अलग आबादी (जैसे लिंग और जातीयता) पर इसके प्रभाव को समझने के लिए और शोध जरूरी है।  

surbhi मई 2, 2026 0
Narrowband and broadband UVB phototherapy comparison for treating moderate to severe atopic dermatitis

Atopic Dermatitis में Narrowband vs Broadband UVB: असर बराबर, सहनशीलता में Narrowband बेहतर – नई स्टडी

Instagram Reels effects

क्या आप भी घंटों रील्स देखते हैं? जानें कैसे रील्स बिगड़ रही आपकी मेंटल हेल्थ?

yoga for anxiety

एंग्जाइटी से परेशान हैं? अपनाएं ये योग, आयुर्वेद उपचार और घरेलू नुस्खे, मिलेगी तुरंत राहत!

Home hemodialysis patient dealing with chronic kidney disease related itching
होम हीमोडायलिसिस मरीजों में खुजली (CKD-प्रुरिटस) बड़ी समस्या: नई स्टडी में जीवन की गुणवत्ता पर असर उजागर

क्रोनिक किडनी डिजीज से जूझ रहे मरीजों के लिए एक नई स्टडी ने अहम जानकारी सामने रखी है। Chronic Kidney Disease से जुड़ी खुजली, जिसे CKD-associated pruritus कहा जाता है, होम हीमोडायलिसिस लेने वाले मरीजों में भी एक आम और गंभीर समस्या बनी हुई है। करीब एक-तिहाई मरीज प्रभावित इस क्रॉस-सेक्शनल स्टडी में घर पर हीमोडायलिसिस करवा रहे 59 मरीजों का विश्लेषण किया गया। इसमें पाया गया कि करीब 31% मरीज (18 लोग) CKD-प्रुरिटस से प्रभावित थे। यह आंकड़ा उन मरीजों के बराबर है जो अस्पताल या डायलिसिस सेंटर में इलाज कराते हैं, जिससे साफ होता है कि घर पर इलाज करने के बावजूद यह समस्या बनी रहती है। जीवन की गुणवत्ता पर बड़ा असर स्टडी में यह भी सामने आया कि जिन मरीजों को खुजली की समस्या थी, उनकी जीवन गुणवत्ता (Quality of Life) काफी खराब पाई गई। EQ-5D स्कोर के अनुसार, प्रुरिटस वाले मरीजों का स्कोर 0.760 रहा, जबकि बिना इस समस्या वाले मरीजों का स्कोर 1.00 था। इससे यह स्पष्ट होता है कि यह लक्षण रोजमर्रा के जीवन और मानसिक स्थिति पर गहरा प्रभाव डालता है। खुजली की तीव्रता और असर में नहीं मिला सीधा संबंध दिलचस्प बात यह है कि खुजली की गंभीरता (इंटेंसिटी) और मरीजों के अनुभव–जैसे एंग्जायटी, डिप्रेशन या नींद की समस्या–के बीच सीधा संबंध नहीं पाया गया। यानी हल्की खुजली भी मरीजों के जीवन पर बड़ा असर डाल सकती है, या फिर अन्य कारक भी उनकी स्थिति को प्रभावित कर रहे हो सकते हैं। इलाज और मैनेजमेंट पर नया फोकस जरूरी विशेषज्ञों का मानना है कि CKD-associated pruritus और मरीजों के अनुभव के बीच संबंध अभी पूरी तरह समझा नहीं गया है। इसलिए बड़े और लंबी अवधि वाले शोध की जरूरत है, ताकि बेहतर इलाज और मैनेजमेंट रणनीतियां विकसित की जा सकें। भविष्य के लिए अहम संकेत जैसे-जैसे होम हीमोडायलिसिस का चलन बढ़ रहा है, वैसे-वैसे ऐसे लक्षणों की पहचान और उनका प्रभावी समाधान जरूरी हो गया है। मरीजों के समग्र स्वास्थ्य और जीवन की गुणवत्ता को बेहतर बनाने के लिए इस दिशा में और ध्यान देने की आवश्यकता है।  

surbhi मई 1, 2026 0
Psychedelic therapy and antidepressants highlighted in mental health media coverage study

साइकेडेलिक थेरेपी पर मीडिया का ‘ओवरहाइप’? नई स्टडी में सामने आई बड़ी तस्वीर

summer fruits danger

हेल्दी समझकर खा रहे हैं ये फल? गर्मी में पड़ सकते हैं भारी

coconut buying tips

नारियल खरीदने से पहले अपनाएं ये ट्रिक, कभी नहीं होगा नुकसान

0 Comments