स्वास्थ्य

वजन कम करना हुआ आसान, डाइट में शामिल करें ये सलाद

Anjali Kumari मई 1, 2026 0
weight loss salad
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नई दिल्ली, एजेंसियां। वजन कम करने के लिए लोग अक्सर कठिन डाइट और एक्सरसाइज का सहारा लेते हैं, लेकिन अगर आप आसान और प्राकृतिक तरीका अपनाना चाहते हैं, तो सलाद एक बेहतरीन विकल्प है। सलाद में कम कैलोरी और अधिक फाइबर होता है, जो न केवल वजन घटाने में मदद करता है बल्कि शरीर को जरूरी पोषक तत्व भी प्रदान करता है। नियमित रूप से सलाद खाने से पेट लंबे समय तक भरा रहता है, जिससे बार-बार खाने की आदत कम होती है।

 

सलाद क्यों है असरदार


सलाद में मौजूद विटामिन, मिनरल्स और एंटीऑक्सीडेंट शरीर को स्वस्थ रखते हैं। यह पाचन तंत्र को बेहतर बनाता है और शरीर से अतिरिक्त फैट कम करने में सहायक होता है। खास बात यह है कि इसे बनाने में ज्यादा समय या मेहनत नहीं लगती।

 

ट्राई करें ये 5 हेल्दी सलाद


पहला है ककड़ी-टमाटर सलाद, जो पानी से भरपूर होता है और शरीर को हाइड्रेट रखता है। दूसरा है स्प्राउट्स सलाद, जो प्रोटीन का अच्छा स्रोत है और भूख को लंबे समय तक नियंत्रित करता है। तीसरा है फ्रूट सलाद, जो मीठा खाने की इच्छा को कम करता है और विटामिन्स से भरपूर होता है।चौथा विकल्प ग्रीन सलाद है, जिसमें पालक, खीरा और शिमला मिर्च जैसी सब्जियां शामिल होती हैं। यह फाइबर से भरपूर होता है और पाचन को मजबूत बनाता है। पांचवां है चना सलाद, जो प्रोटीन और फाइबर का अच्छा मिश्रण है और वजन घटाने में बेहद मददगार है।

 

ध्यान रखने वाली बातें


सलाद बनाते समय ज्यादा नमक या भारी सॉस का इस्तेमाल न करें, क्योंकि इससे इसके फायदे कम हो सकते हैं। ताजा और साफ सामग्री का उपयोग करें।

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शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

स्वास्थ्य

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महिलाओं में यूटीआई का बढ़ता खतरा, समय रहते पहचानें लक्षण

नई दिल्ली, एजेंसियां। यूरिनरी ट्रैक्ट इन्फेक्शन (UTI) महिलाओं में होने वाली एक आम लेकिन कष्टदायक समस्या है। यह संक्रमण मूत्र मार्ग में बैक्टीरिया के कारण होता है, जो किडनी, ब्लैडर और यूरेथ्रा को प्रभावित कर सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार, पुरुषों की तुलना में महिलाओं में यूटीआई होने की संभावना अधिक होती है, जिसका मुख्य कारण उनकी शारीरिक संरचना है।   क्यों अधिक होता है महिलाओं में यूटीआई   महिलाओं का यूरेथ्रा छोटा होता है, जिससे बैक्टीरिया आसानी से ब्लैडर तक पहुंच जाते हैं। लंबे समय तक पेशाब रोककर रखना, साफ-सफाई में कमी, गर्भावस्था और डायबिटीज जैसी स्थितियां भी यूटीआई का खतरा बढ़ाती हैं। इसलिए महिलाओं को इस समस्या को लेकर अधिक सतर्क रहने की जरूरत है।   लक्षणों को पहचानना है जरूरी   यूटीआई होने पर पेशाब करते समय जलन और दर्द महसूस होता है। बार-बार पेशाब आने की इच्छा होती है, लेकिन पूरी तरह राहत नहीं मिलती। गंभीर स्थिति में पेशाब के साथ खून आना, पेट के निचले हिस्से या कमर में दर्द, मिचली और हल्का बुखार भी हो सकता है। ऐसे लक्षण दिखने पर तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना जरूरी है।   टेस्ट और इलाज   यूटीआई की पुष्टि के लिए डॉक्टर यूरिन टेस्ट करवाते हैं। संक्रमण की पुष्टि होने पर एंटीबायोटिक दवाओं से इलाज किया जाता है। आमतौर पर 1-2 दिनों में लक्षण कम होने लगते हैं, लेकिन पूरी दवा लेना जरूरी होता है।   बचाव के लिए अपनाएं ये उपाय   यूटीआई से बचने के लिए पर्याप्त मात्रा में पानी पीना चाहिए और पेशाब को कभी भी ज्यादा देर तक नहीं रोकना चाहिए। व्यक्तिगत स्वच्छता का विशेष ध्यान रखें और सूती कपड़े पहनें। विटामिन-सी से भरपूर फल जैसे नींबू, संतरा और मौसमी का सेवन लाभदायक होता है। मसालेदार भोजन से परहेज और साफ टॉयलेट का उपयोग भी जरूरी है।

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प्लाज्मा प्रोटीन से मिले यूरोलॉजिकल कैंसर के संकेत: नई रिसर्च ने खोले इलाज और पहचान के रास्ते

कैंसर रिसर्च के क्षेत्र में एक अहम प्रगति सामने आई है, जहां वैज्ञानिकों ने खून में मौजूद प्लाज्मा प्रोटीन के जरिए यूरोलॉजिकल कैंसर के जोखिम और संभावित इलाज के नए रास्ते खोजे हैं। Mendelian randomisation आधारित इस बड़े अध्ययन में यह पाया गया कि कुछ खास प्रोटीन कैंसर के खतरे को बढ़ा या घटा सकते हैं। किन कैंसर पर हुआ अध्ययन इस रिसर्च में चार प्रमुख यूरोलॉजिकल कैंसर शामिल थे: Bladder Cancer Prostate Cancer Renal Cell Carcinoma Testicular Cancer शोधकर्ताओं ने बड़े पैमाने पर जीन डेटा और प्लाज्मा प्रोटीन के अध्ययन के लिए FinnGen और UK Biobank जैसे डेटाबेस का उपयोग किया। ब्लैडर कैंसर में अहम प्रोटीन ब्लैडर कैंसर के मामले में चार प्रमुख प्रोटीन की पहचान हुई: PSCA: कैंसर के खतरे को बढ़ाता है GSTM1, GSTM3, GSTM4: जोखिम को कम करने से जुड़े ये प्रोटीन ट्यूमर में मौजूद खास कोशिकाओं जैसे यूरोथीलियल और इम्यून सेल्स में सक्रिय पाए गए। प्रोस्टेट कैंसर में 15 बायोमार्कर प्रोस्टेट कैंसर में कुल 15 प्रोटीन बायोमार्कर सामने आए: जोखिम बढ़ाने वाले: AGER, ALAD, CHMP2B, PEX14, ZG16B, PPP1R14A, SERPINA3 जोखिम घटाने वाले: BTN2A1, CEACAM21, DNAJB9, MSMB, PYGL, HLA-E, SOD2, TOR1AIP1 इनमें से SOD2 और CHMP2B को सबसे मजबूत कारणात्मक बायोमार्कर माना गया। इलाज के नए अवसर इस अध्ययन की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पहचाने गए सात प्रोटीन पहले से ही अन्य बीमारियों के इलाज में उपयोग होने वाली दवाओं का हिस्सा हैं। इसका मतलब है कि भविष्य में इन्हें यूरोलॉजिकल कैंसर के इलाज के लिए दोबारा इस्तेमाल किया जा सकता है। क्या है इसका महत्व यह रिसर्च दिखाती है कि प्लाज्मा प्रोटीन न सिर्फ कैंसर के जोखिम की भविष्यवाणी कर सकते हैं, बल्कि नए इलाज विकसित करने में भी मददगार साबित हो सकते हैं। इससे आने वाले समय में कैंसर की पहचान और उपचार दोनों अधिक सटीक और प्रभावी हो सकते हैं।  

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कैंसर इलाज में नई उम्मीद: HER-2 वैक्सीन ने दिखाया असर, एंटीबॉडी थेरेपी के साथ भी कायम रही ताकत

कैंसर उपचार के क्षेत्र में एक नई रिसर्च ने उम्मीद जगाई है। वैज्ञानिकों द्वारा विकसित नई HER-2 वैक्सीन ने न सिर्फ मजबूत इम्यून रिस्पॉन्स दिखाया है, बल्कि मोनोक्लोनल एंटीबॉडी थेरेपी के साथ भी प्रभावी बनी रही है। यह खोज खासतौर पर HER-2 पॉजिटिव कैंसर–जैसे कुछ प्रकार के ब्रेस्ट कैंसर–के इलाज के लिए अहम मानी जा रही है। क्या है नई HER-2 वैक्सीन? यह नई वैक्सीन, ES2B-C001, वायरस जैसे कणों (Virus-like particles) पर आधारित है, जो HER-2 प्रोटीन के पूरे बाहरी हिस्से को प्रदर्शित करती है। प्रीक्लिनिकल (प्रयोगशाला) अध्ययनों में इस वैक्सीन ने शरीर में मजबूत एंटीबॉडी प्रतिक्रिया पैदा की, जो ट्यूमर और मेटास्टेसिस (फैलाव) को खत्म करने में सक्षम रही। मजबूत इम्यून रिस्पॉन्स का दावा शोध में पाया गया कि इस वैक्सीन से शरीर में एंटी-HER-2 इम्यूनोग्लोबुलिन G (IgG) का स्तर काफी ऊंचा रहा और यह प्रभाव 6 महीने से अधिक समय तक बना रहा। साथ ही, T-सेल्स की सक्रियता भी बढ़ी, जो कैंसर कोशिकाओं से लड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। एंटीबॉडी थेरेपी के साथ भी असर बरकरार सबसे अहम बात यह रही कि जब इस वैक्सीन को एंटी-HER-2 मोनोक्लोनल एंटीबॉडी (जैसे 4D5) के साथ दिया गया, तब भी इसकी प्रभावशीलता कम नहीं हुई। इसका मतलब है कि पहले से चल रहे इलाज के साथ भी यह वैक्सीन असरदार बनी रह सकती है। ट्यूमर पर कितना असर? माउस मॉडल (चूहों पर किए गए अध्ययन) में: केवल वैक्सीन देने पर 20 में से 13 चूहे लंबे समय तक ट्यूमर-फ्री रहे वैक्सीन + एंटीबॉडी थेरेपी के साथ यह आंकड़ा बढ़कर 20 में से 15 हो गया यह दर्शाता है कि वैक्सीन अकेले और कॉम्बिनेशन दोनों में प्रभावी है। भविष्य के लिए क्या संकेत? यह वैक्सीन अब क्लिनिकल डेवलपमेंट के चरण में पहुंच चुकी है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इंसानों पर भी इसके परिणाम सकारात्मक रहते हैं, तो यह HER-2 पॉजिटिव कैंसर के इलाज में बड़ा बदलाव ला सकती है। खासतौर पर उन मरीजों के लिए, जो पहले से एंटी-HER-2 थेरेपी जैसे ट्रास्टुजुमैब ले रहे हैं, यह एक अतिरिक्त और प्रभावी विकल्प बन सकता है। क्या है इसका महत्व? यह रिसर्च इस दिशा में एक बड़ा कदम है कि भविष्य में कैंसर इलाज सिर्फ दवाओं तक सीमित न रहकर वैक्सीन आधारित इम्यून थेरेपी तक भी विस्तारित हो सकता है।  

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