पश्चिम बंगाल में राष्ट्रपति के हालिया दौरे को लेकर उठे ‘प्रोटोकॉल उल्लंघन’ के विवाद ने केंद्र और राज्य सरकार के बीच एक बार फिर राजनीतिक और प्रशासनिक बहस को जन्म दे दिया है। राष्ट्रपति Droupadi Murmu के सिलीगुड़ी दौरे के दौरान मुख्यमंत्री और राज्य के शीर्ष अधिकारियों की अनुपस्थिति को लेकर उठे सवालों के बीच अब बंगाल सरकार ने अपनी ओर से विस्तृत स्पष्टीकरण केंद्र सरकार को भेज दिया है।
सूत्रों के अनुसार, राज्य की मुख्य सचिव Nandini Chakravorty ने सोमवार को केंद्रीय गृह मंत्रालय को एक विस्तृत और गोपनीय रिपोर्ट भेजी है। इस रिपोर्ट में उन परिस्थितियों और प्रशासनिक कारणों का विस्तार से उल्लेख किया गया है, जिनकी वजह से राष्ट्रपति के स्वागत के समय मुख्यमंत्री Mamata Banerjee और कुछ वरिष्ठ अधिकारी कार्यक्रम स्थल पर मौजूद नहीं थे।
दरअसल, 7 मार्च को केंद्रीय गृह मंत्रालय ने पश्चिम बंगाल सरकार से इस मामले में जवाब तलब किया था। आरोप लगाया गया था कि राष्ट्रपति Droupadi Murmu के राज्य दौरे के दौरान मुख्यमंत्री, मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक (DGP) जैसे शीर्ष अधिकारी कार्यक्रम में उपस्थित नहीं थे।
केंद्र ने इसे राष्ट्रपति से जुड़े प्रोटोकॉल के महत्वपूर्ण नियमों का उल्लंघन माना है। इन नियमों को ‘ब्लू बुक’ के नाम से जाना जाता है, जिसमें राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और उपराष्ट्रपति जैसे संवैधानिक पदों के दौरे के दौरान सुरक्षा और औपचारिक व्यवस्थाओं के लिए सख्त दिशानिर्देश तय किए गए हैं।
राज्य सरकार की ओर से भेजी गई रिपोर्ट में कई महत्वपूर्ण बिंदुओं पर सफाई दी गई है।
सबसे पहले मुख्यमंत्री Mamata Banerjee की अनुपस्थिति के कारणों का उल्लेख किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, कुछ प्रशासनिक और कार्यक्रम संबंधी परिस्थितियों के चलते मुख्यमंत्री उस समय कार्यक्रम का हिस्सा नहीं बन सकीं।
इसके अलावा राष्ट्रपति के दौरे के दौरान आयोजित ‘अंतरराष्ट्रीय आदिवासी और संथाल सम्मेलन’ के कार्यक्रम स्थल में अचानक किए गए बदलाव के पीछे के प्रशासनिक और सुरक्षा कारणों का भी विस्तृत विवरण रिपोर्ट में दिया गया है।
राज्य सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक, दौरे से जुड़े हर प्रशासनिक फैसले का रिकॉर्ड रखा गया था और संबंधित दस्तावेज भी केंद्रीय गृह मंत्रालय को भेजी गई रिपोर्ट के साथ संलग्न किए गए हैं।
भारत में राष्ट्रपति से जुड़े कार्यक्रमों के लिए ‘ब्लू बुक’ एक अत्यंत गोपनीय दस्तावेज माना जाता है। इसमें यह स्पष्ट रूप से तय किया गया है कि जब भी राष्ट्रपति किसी राज्य के दौरे पर पहुंचते हैं, तो राज्य के मुख्यमंत्री, मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक जैसे वरिष्ठ अधिकारियों की उपस्थिति स्वागत के दौरान अनिवार्य होती है।
सूत्रों का कहना है कि केंद्रीय गृह मंत्रालय ने इस मामले को गंभीरता से लिया है और इसे संभावित ‘प्रोटोकॉल उल्लंघन’ के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि पश्चिम बंगाल सरकार का कहना है कि उस समय लिए गए सभी फैसले प्रशासनिक बाध्यताओं और परिस्थितियों को ध्यान में रखकर किए गए थे।
पश्चिम बंगाल की राजनीति में केंद्र और राज्य सरकार के बीच प्रोटोकॉल को लेकर टकराव का यह पहला मामला नहीं है। इससे पहले भी कई घटनाओं ने दोनों पक्षों के बीच तनाव बढ़ाया है।
मई 2021 में चक्रवात ‘यास’ के बाद Narendra Modi की अध्यक्षता में आयोजित समीक्षा बैठक में मुख्यमंत्री Mamata Banerjee के देरी से पहुंचने और रिपोर्ट सौंपकर लौट जाने को लेकर भी बड़ा विवाद हुआ था। इसके बाद तत्कालीन मुख्य सचिव Alapan Bandyopadhyay को केंद्र सरकार ने दिल्ली तलब किया था, जिससे केंद्र और राज्य के बीच संवैधानिक टकराव की स्थिति बन गई थी।
इसी तरह, पूर्व राज्यपाल Jagdeep Dhankhar के कार्यकाल के दौरान भी राजभवन और राज्य सरकार के बीच कई बार विश्वविद्यालयों और सरकारी कार्यक्रमों में प्रोटोकॉल को लेकर विवाद सामने आए थे।
फिलहाल राष्ट्रपति के दौरे से जुड़ा यह मामला भी राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में चर्चा का विषय बना हुआ है। अब सबकी नजर केंद्र सरकार की अगली प्रतिक्रिया और संभावित कार्रवाई पर टिकी हुई है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिआ गांधी ने महिला आरक्षण को लेकर चल रही बहस के बीच केंद्र सरकार की मंशा पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने अपने एक लेख में कहा कि असली मुद्दा महिला आरक्षण नहीं, बल्कि परिसीमन है, जिसे राजनीतिक फायदे के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। “महिला आरक्षण पहले ही पास हो चुका” सोनिया गांधी ने स्पष्ट किया कि Nari Shakti Vandan Adhiniyam (महिला आरक्षण कानून) 2023 में ही पारित हो चुका है और इस पर कोई विवाद नहीं है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार ने इसे जनगणना और परिसीमन से जोड़कर अनावश्यक देरी की है। विपक्ष पहले ही इसे 2024 लोकसभा चुनाव से पहले लागू करने की मांग कर चुका था, लेकिन सरकार ने इसे तब नहीं माना। परिसीमन पर उठाए बड़े सवाल उन्होंने कहा कि सरकार की पूरी कवायद परिसीमन को लेकर है, जो चुनावी समय में जल्दबाजी में किया जा रहा है। उनके मुताबिक, बिना जनगणना के इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाना पारदर्शिता और निष्पक्षता पर सवाल खड़े करता है। उन्होंने चेतावनी दी कि इससे संघीय ढांचे पर असर पड़ सकता है और खासकर दक्षिणी राज्यों को नुकसान हो सकता है। चुनावी टाइमिंग पर भी सवाल सोनिया गांधी ने संसद के विशेष सत्र की टाइमिंग पर भी आपत्ति जताई, जो Tamil Nadu और West Bengal में चुनाव प्रचार के दौरान बुलाया गया है। उनका कहना है कि यह कदम राजनीतिक लाभ लेने और विपक्ष को दबाव में लाने के उद्देश्य से उठाया गया है। सरकार के रुख में बदलाव पर निशाना उन्होंने सरकार के “यू-टर्न” पर भी सवाल उठाए। पहले महिला आरक्षण को जनगणना और परिसीमन से जोड़ने की बात की गई, जबकि अब इसे 2029 से लागू करने की बात हो रही है।
नारी शक्ति वंदन अधिनियम को लेकर सरकार और विपक्ष के बीच सियासी टकराव तेज हो गया है। Narendra Modi, Mallikarjun Kharge और Kiren Rijiju के बीच चिट्ठियों का दौर इस बहस को और गर्म कर रहा है। आखिर खरगे ने PM मोदी को क्यों लिखा पत्र? कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने प्रधानमंत्री मोदी को लिखे पत्र में सरकार पर कई आरोप लगाए: सरकार जल्दबाजी में संशोधन लागू करना चाहती है चुनाव से पहले इसे राजनीतिक फायदे के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है विपक्ष से पर्याप्त परामर्श नहीं किया गया खरगे का कहना है कि इतने अहम कानून पर व्यापक चर्चा जरूरी है, न कि जल्दबाजी में फैसला। रिजिजू का जवाब–“अभी सही समय है” इन आरोपों पर जवाब देते हुए केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा: 16 मार्च 2026 से ही सभी दलों से बातचीत शुरू हो चुकी थी कई पार्टियों–जैसे Samajwadi Party, DMK, Trinamool Congress–से चर्चा की गई कई दलों ने समर्थन भी जताया रिजिजू ने जोर देकर कहा कि अगर अभी कदम नहीं उठाए गए, तो 2029 चुनाव से पहले महिला आरक्षण लागू करना मुश्किल हो सकता है। संसद सत्र क्यों बुलाया गया? सरकार ने 16–18 अप्रैल 2026 तक संसद सत्र बुलाया है, ताकि इस कानून में जरूरी संशोधन कर उसे लागू किया जा सके। सरकार इसे महिलाओं को राजनीति में अधिक प्रतिनिधित्व देने की दिशा में ऐतिहासिक कदम बता रही है। मुद्दा क्या है? नारी शक्ति वंदन अधिनियम (महिला आरक्षण कानून) पहले ही 2023 में संसद से पास हो चुका है। अब सरकार चाहती है कि इसके कार्यान्वयन की प्रक्रिया तेज की जाए, जबकि विपक्ष टाइमिंग और प्रक्रिया पर सवाल उठा रहा है।
आगरा, एजेंसियां। सुरों की मल्लिका आशा भोसले के निधन से आज पूरा देश शोक की लहर में डूबा हुआ है, लेकिन इसी बीच उत्तर प्रदेश के आगरा से एक बेहद चौंकाने वाला मामला सामने आया है। आगरा की मेयर हेमलता दिवाकर कुशवाह दिवंगत गायिका को श्रद्धांजलि देने के दौरान एक बड़ी चूक कर बैठीं, जिसका वीडियो अब इंटरनेट पर तेजी से वायरल हो रहा है। मेयर ने न केवल दिग्गज गायिका का नाम गलत पुकारा, बल्कि सार्वजनिक रूप से यह भी पूछ लिया कि क्या वह कोई गायिका थीं? इस असंवेदनशील व्यवहार और अज्ञानता को लेकर सोशल मीडिया पर उनकी तीखी आलोचना हो रही है। आशा घोसले' बोलकर हंसी मेयर, बगल में खड़े लोगों से ली जानकारी यह पूरा घटनाक्रम आगरा स्थित भारतीय जनता पार्टी के ब्रज प्रांत कार्यालय का है, जहां 'नारी शक्ति वंदन अधिनियम' को लेकर एक जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया गया था। इस कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के तौर पर मौजूद मेयर हेमलता दिवाकर से जब मीडिया ने आशा भोसले के निधन पर प्रतिक्रिया मांगी, तो उन्होंने गायिका को 'आशा घोसले' कहकर संबोधित किया। हैरानी की बात यह रही कि श्रद्धांजलि देने से पहले मेयर अपने पास खड़े समर्थकों से धीरे से यह पूछती नजर आईं, "क्या वह गायिका थीं?" पुष्टि मिलने के बाद वह कैमरे के सामने ही हंसने लगीं। हालांकि, बाद में उन्होंने अपनी बात सुधारने की कोशिश की और इसे संगीत जगत के लिए अपूरणीय क्षति बताया, लेकिन तब तक उनका यह 'ब्लंडर' कैमरे में कैद हो चुका था। मल्टी-ऑर्गन फेलियर से हुआ निधन, आज शिवाजी पार्क में होगा अंतिम संस्कार गौरतलब है कि स्वर कोकिला लता मंगेशकर की छोटी बहन और भारतीय संगीत की दिग्गज हस्ती आशा भोसले का 92 वर्ष की आयु में रविवार को मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में निधन हो गया। वे लंबे समय से उम्र संबंधी बीमारियों से जूझ रही थीं और डॉक्टरों के अनुसार उनकी मृत्यु का कारण मल्टी-ऑर्गन फेलियर रहा। आज, 13 अप्रैल को मुंबई के शिवाजी पार्क में शाम 4:00 बजे उनका अंतिम संस्कार राजकीय सम्मान के साथ किया जाएगा। दोपहर 2:00 बजे तक फिल्मी जगत की हस्तियां और प्रशंसक उनके अंतिम दर्शन कर सकेंगे। सचिन तेंदुलकर और एआर रहमान जैसी मशहूर हस्तियां उनके घर पहुंच चुकी हैं। सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग और मेयर का राजनीतिक सफर मेयर हेमलता दिवाकर का वीडियो वायरल होने के बाद नेटिज़न्स उन पर जमकर निशाना साध रहे हैं। यूजर्स का कहना है कि जिस हस्ती ने संगीत के क्षेत्र में सैकड़ों रिकॉर्ड बनाए, उनके बारे में एक जिम्मेदार पद पर बैठी जनप्रतिनिधि का ऐसा गैर-जिम्मेदाराना व्यवहार स्वीकार्य नहीं है। बता दें कि हेमलता दिवाकर आगरा की राजनीति में एक बड़ा नाम हैं। उन्होंने 2012 में समाजवादी पार्टी से अपना राजनीतिक सफर शुरू किया था, लेकिन बाद में 2016 में वे भाजपा में शामिल हो गईं। वह 2017 से 2022 तक आगरा ग्रामीण सीट से विधायक रहीं और 2023 के निकाय चुनाव में उन्होंने 1.08 लाख से अधिक मतों के भारी अंतर से जीत दर्ज कर मेयर की कुर्सी हासिल की थी। इस विवाद ने न केवल मेयर की छवि पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि यह भी दर्शाया है कि सार्वजनिक जीवन में रहने वाले व्यक्तियों को राष्ट्रीय स्तर की विभूतियों के प्रति कितनी संवेदनशीलता बरतनी चाहिए। फिलहाल भाजपा की ओर से इस मामले पर कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण नहीं आया है।