नई दिल्ली, एजेंसियां। महिला आरक्षण कानून में संशोधन से जुड़े 3 बिल 16 अप्रैल को लोकसभा में पेश किए गए। डेढ़ घंटे बाद वोटिंग हुई कि बिलों पर चर्चा की जाए या नहीं। पक्ष में 251 वोट पड़े,185 सांसदों ने विरोध किया।
कांग्रेस सांसद केसी वेणुगोपाल ने बिलों का विरोध करते हुए कहा कि सरकार संविधान को हाईजैक करना चाहती है। इसके बाद सपा सांसद धर्मेंद्र यादव ने विरोध किया। कहा कि जब तक मुस्लिम महिलाओं को आरक्षण नहीं दिया जाएगा। तब तक इसका मतलब नहीं है। इस पर अमित शाह ने कहा- मुस्लिमों को धर्म के आधार पर आरक्षण गैर संवैधानिक है, इसका सवाल ही पैदा नहीं होता।
अखिलेश यादव ने कहा- पूरा देश आधी आबादी को आरक्षण चाहता है। मैं जानना चाहता हूं कि मुस्लिम महिलाओं के लिए क्या। इस पर अमित शाह ने जवाब दिया कि समाजवादी पार्टी पूरी टिकटें मुस्लिम महिलाओं को दे दे, हमें कहां आपत्ति है।
संशोधन बिल में लोकसभा सांसदों की संख्या 850 करने का प्रस्ताव है। मौजूदा संख्या 543 है। राज्यों में 815 और केंद्र शासित प्रदेशों में 35 तक सीटें होंगी। सीटों की सटीक संख्या तय करने के लिए परिसीमन भी किया जाएगा। 273 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होंगी।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
नई दिल्ली, एजेंसियां। दिल्ली में संसद के विशेष सत्र के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah ने देश की जनगणना को लेकर बड़ा ऐलान किया। उन्होंने कहा कि इस बार की राष्ट्रीय जनगणना डिजिटल माध्यम से कराई जाएगी और इसमें जाति आधारित गणना भी शामिल होगी।गृह मंत्री ने लोकसभा में जानकारी देते हुए बताया कि जनगणना की प्रक्रिया आधिकारिक रूप से शुरू हो चुकी है। फिलहाल घरों की सूची तैयार की जा रही है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जब लोगों की गिनती होगी, तब जाति का कॉलम अनिवार्य रूप से शामिल किया जाएगा। विपक्ष के सवालों का जवाब जनगणना में देरी और महिला आरक्षण जैसे मुद्दों पर विपक्ष की ओर से उठाए गए सवालों का जवाब देते हुए Akhilesh Yadav के सवालों पर अमित शाह ने कहा कि यह प्रक्रिया उनके मंत्रालय के अधीन है और सरकार इसे पूरी पारदर्शिता के साथ पूरा करेगी। उन्होंने तंज करते हुए कहा कि अभी घरों की गिनती हो रही है, जिनकी कोई जाति नहीं होती, इसलिए इस पर राजनीति नहीं होनी चाहिए। धर्म आधारित आरक्षण पर सख्त रुख सत्र के दौरान धमेंद्र यादव द्वारा मुस्लिम महिलाओं के लिए अलग आरक्षण की मांग उठाई गई। इस पर गृह मंत्री ने स्पष्ट कहा कि भारतीय संविधान धर्म के आधार पर आरक्षण की अनुमति नहीं देता। उन्होंने कहा कि सरकार सामाजिक न्याय के लिए प्रतिबद्ध है, लेकिन संवैधानिक सीमाओं का पालन जरूरी है। डिजिटल होगी पूरी प्रक्रिया सरकार इस बार जनगणना को पूरी तरह डिजिटल बनाने जा रही है। गृह मंत्रालय ने इसके लिए आधुनिक टूल्स और तकनीक तैयार की है, जिससे प्रक्रिया अधिक पारदर्शी और सटीक हो सके। परिसीमन और आरक्षण पर असर यह जनगणना 2011 के बाद पहली होगी और इसके आंकड़े भविष्य में परिसीमन तथा आरक्षण के नए समीकरण तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। सामाजिक न्याय की दिशा में कदम सरकार का कहना है कि इस पहल का उद्देश्य सटीक डेटा के आधार पर नीतियां बनाना और वंचित वर्गों को उनका अधिकार दिलाना है। यह कदम देश की राजनीति और सामाजिक ढांचे पर दीर्घकालिक प्रभाव डाल सकता है।
पटना: देश में पहली बार जनगणना पूरी तरह डिजिटल होने जा रही है। जनगणना 2027 के तहत अब लोगों को जनगणना कर्मी का इंतजार नहीं करना होगा, बल्कि वे खुद घर बैठे मोबाइल या कंप्यूटर के जरिए अपनी जानकारी दर्ज कर सकेंगे। 17 अप्रैल से 1 मई तक भर सकेंगे जानकारी जनगणना के पहले चरण में 17 अप्रैल से 1 मई तक सेल्फ-इन्युमरेशन (Self Enumeration) की सुविधा शुरू की जा रही है। नागरिक पोर्टल पर जाकर 33 महत्वपूर्ण सवालों के जवाब खुद भर सकेंगे इसके लिए मोबाइल नंबर से रजिस्ट्रेशन करना होगा डेटा सबमिट करने के बाद एक यूनिक आईडी जेनरेट होगी जब 2 मई से जनगणना कर्मी घर आएंगे, तो बस यह आईडी दिखानी होगी और प्रक्रिया तुरंत पूरी हो जाएगी। कैसे काम करेगा पूरा प्रोसेस? पोर्टल पर जाकर रजिस्ट्रेशन करें परिवार और मकान से जुड़ी जानकारी भरें 33 सवालों के जवाब दें सबमिट करने के बाद यूनिक आईडी प्राप्त करें आईडी को सुरक्षित रखें जनगणना कर्मी को दिखाकर प्रक्रिया पूरी करें ‘एक घर, कई चूल्हे’ = अलग परिवार इस बार जनगणना में परिवार की परिभाषा में बड़ा बदलाव किया गया है। अगर एक ही मकान में अलग-अलग चूल्हे (रसोई) हैं, तो उन्हें अलग-अलग परिवार माना जाएगा घर खाली मिलने पर उसे खाली मकान के रूप में दर्ज किया जाएगा क्या-क्या जानकारी देनी होगी? जनगणना में आपसे कई अहम सवाल पूछे जाएंगे, जैसे: मकान का मालिकाना हक दीवार और छत की सामग्री कमरों की संख्या परिवार के सदस्य विवाहित जोड़ों की जानकारी बाहर रहने वालों के लिए भी सुविधा बिहार के जो लोग राज्य से बाहर रह रहे हैं, वे भी पोर्टल के जरिए अपने मूल निवास (Native Place) की जानकारी दर्ज कर सकते हैं। डेटा सबमिट करने से पहले उसे एडिट करने का विकल्प भी मिलेगा। फरवरी 2027 में होगी असली गिनती यह चरण केवल मकानों की सूची और प्रारंभिक डेटा के लिए है। देशभर में लोगों की वास्तविक गणना फरवरी 2027 में की जाएगी। क्यों है यह बदलाव खास? डिजिटल जनगणना से: प्रक्रिया तेज और आसान होगी डेटा ज्यादा सटीक मिलेगा सरकारी योजनाओं और नीतियों को बेहतर बनाने में मदद मिलेगी सरकार ने लोगों से अपील की है कि वे इस प्रक्रिया में सक्रिय भाग लें और सही जानकारी दर्ज करें, ताकि देश के विकास की योजना मजबूत आधार पर तैयार की जा सके।
नई दिल्ली: संसद के 16 से 18 अप्रैल तक चलने वाले विशेष सत्र में महिला आरक्षण को लागू करने के तरीकों पर गहन चर्चा होने जा रही है। केंद्र सरकार 2023 में पारित नारी शक्ति वंदन अधिनियम को जल्द लागू करना चाहती है, लेकिन इसे लेकर अब सियासी टकराव तेज हो गया है। खासकर परिसीमन को लेकर दक्षिण भारत के राज्यों में नाराज़गी बढ़ती दिख रही है। क्या है महिला आरक्षण कानून? सरकार ने 2023 में नारी शक्ति वंदन अधिनियम के तहत संसद और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण का प्रावधान किया था। हालांकि, उस समय यह तय किया गया था कि आरक्षण जनगणना और परिसीमन के बाद ही लागू होगा। अब सरकार इसे जल्द लागू करने के लिए संशोधन प्रस्ताव लाई है। जनगणना और परिसीमन से क्या है कनेक्शन? महिला आरक्षण को लागू करने का पूरा ढांचा दो प्रक्रियाओं पर निर्भर है: जनगणना (Census): हर 10 साल में होती है, जिससे आबादी का सटीक आंकड़ा मिलता है परिसीमन (Delimitation): जनगणना के आधार पर लोकसभा और विधानसभा सीटों की संख्या और सीमाएं तय होती हैं 2021 में कोविड के कारण जनगणना नहीं हो पाई और अभी तक प्रक्रिया शुरू नहीं हुई है। ऐसे में परिसीमन भी अटका हुआ है। सरकार का लक्ष्य है कि 2029 के चुनाव से पहले जनगणना और परिसीमन पूरा कर लिया जाए, ताकि उसी आधार पर महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित की जा सकें। सरकार का नया प्लान क्या है? सरकार चाहती है कि 2029 के आम चुनाव में महिला आरक्षण लागू हो जाए। इसके लिए प्रस्तावित संशोधनों में: नई जनगणना के आधार पर परिसीमन एक स्वतंत्र परिसीमन आयोग का गठन कुल सीटों में से 33% महिलाओं के लिए आरक्षित आरक्षित सीटों का रोटेशन सिस्टम (सीटें समय-समय पर बदलेंगी) विपक्ष क्यों कर रहा है विरोध? विपक्ष महिला आरक्षण के खिलाफ नहीं है, लेकिन उसके लागू करने के तरीके पर सवाल उठा रहा है। मुख्य आपत्तियां: जनगणना के बिना जल्दबाजी में फैसला परिसीमन से दक्षिण भारत की सीटें घटने का डर महिला आरक्षण में OBC महिलाओं के लिए अलग कोटा की मांग कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों का कहना है कि सरकार राजनीतिक फायदे के लिए नियम बदल रही है। दक्षिण के राज्य क्यों हैं नाराज़? तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने कड़ा विरोध जताते हुए कहा है कि यह कदम दक्षिण भारत के साथ अन्याय होगा। उनकी चिंता का मुख्य कारण: दक्षिण के राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर काम किया अगर सीटें आबादी के आधार पर बढ़ेंगी, तो उत्तर भारत के राज्यों (जैसे उत्तर प्रदेश, बिहार) को ज्यादा सीटें मिलेंगी इससे दक्षिण भारत का राजनीतिक प्रतिनिधित्व घट सकता है स्टालिन ने चेतावनी दी है कि सरकार “आग से खेल रही है” और इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं। सरकार का पक्ष सरकार का कहना है कि उसका मकसद सिर्फ महिलाओं को उनका अधिकार देना है। किसी भी राज्य की सीटें कम नहीं की जाएंगी सीटों की संख्या बढ़ाई जा सकती है सभी राज्यों के हितों को ध्यान में रखकर फैसला लिया जाएगा सरकार का दावा है कि यह ऐतिहासिक कदम देश में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी को नई दिशा देगा। तीन दिन के इस विशेष सत्र में महिला आरक्षण के स्वरूप और लागू करने के तरीके पर गहन बहस होगी। अब यह देखना अहम होगा कि सरकार और विपक्ष के बीच सहमति बनती है या यह मुद्दा और ज्यादा सियासी टकराव पैदा करता है।