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बेंगलुरु में हिंदी साइनबोर्ड पर विवाद, कन्नड़ समर्थक संगठन ने हटाया बोर्ड

anjali kumari जुलाई 1, 2026 0
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बेंगलुरु, एजेंसियां। कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु में एक बार फिर भाषा विवाद ने तूल पकड़ लिया है। बुधवार को कन्नड़ समर्थक संगठन कर्नाटक रक्षण वेदिके (KRV) के कार्यकर्ताओं ने जलाहल्ली स्थित BEL सर्कल के पास लगे एक हिंदी साइनबोर्ड का विरोध करते हुए उसे हटा दिया। प्रदर्शन के दौरान कार्यकर्ताओं ने साइनबोर्ड के हिंदी अक्षरों को क्षतिग्रस्त किया और आरोप लगाया कि बोर्ड बिना अनुमति लगाया गया था तथा यह राज्य में हिंदी थोपने की कोशिश का हिस्सा है।

 

हिंदी थोपने का लगाया आरोप


प्रदर्शन कर रहे संगठन का कहना है कि कर्नाटक की आधिकारिक भाषा कन्नड़ है और सार्वजनिक स्थानों पर बिना अनुमति हिंदी साइनबोर्ड लगाना उचित नहीं है। संगठन ने सोशल मीडिया पर भी अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि वह राज्य में किसी भी रूप में हिंदी थोपने के प्रयासों का विरोध करता रहेगा। संगठन ने दावा किया कि ऐसे साइनबोर्ड कर्नाटक की भाषाई पहचान के खिलाफ हैं।

 

भाषा विवाद फिर चर्चा में


इस घटना के बाद कर्नाटक में हिंदी और कन्नड़ भाषा को लेकर बहस एक बार फिर तेज हो गई है। संगठन के नेताओं का कहना है कि कन्नड़ भाषियों ने राज्य के औद्योगिक और सामाजिक विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है, इसलिए स्थानीय भाषा को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। उन्होंने सार्वजनिक क्षेत्रों में भाषा संबंधी नियमों का पालन करने की भी मांग की।

 

राजभाषा और राज्यभाषा में अंतर


गौरतलब है कि भारतीय संविधान के अनुसार हिंदी, देवनागरी लिपि में संघ सरकार की राजभाषा है। वहीं संविधान किसी भी भाषा को राष्ट्रभाषा का दर्जा नहीं देता। दूसरी ओर, कर्नाटक सरकार के प्रशासनिक कार्यों की प्रमुख भाषा कन्नड़ है। ऐसे में भाषा से जुड़े मुद्दे समय-समय पर राजनीतिक और सामाजिक बहस का विषय बनते रहे हैं।

 

प्रशासन की नजर घटना पर


घटना के बाद यह मामला चर्चा का विषय बन गया है। फिलहाल संबंधित अधिकारियों की ओर से इस मामले में विस्तृत बयान सामने नहीं आया है। वहीं भाषा को लेकर बढ़ते विवाद ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि सार्वजनिक संस्थानों में विभिन्न भाषाओं के उपयोग को लेकर स्पष्ट और संतुलित नीति अपनाने की आवश्यकता है, ताकि भाषाई अस्मिता और संवैधानिक व्यवस्था दोनों का सम्मान बना रहे।

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शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

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₹14,115 करोड़ की परियोजनाओं को मंजूरी, ट्रैफिक, कनेक्टिविटी और आर्थिक गतिविधियों को मिलेगी नई रफ्तार

नई दिल्ली, एजेंसियां। केंद्र सरकार ने देश के सड़क बुनियादी ढांचे को मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम उठाते हुए दिल्ली और उत्तर प्रदेश की दो महत्वपूर्ण सड़क परियोजनाओं को मंजूरी दे दी है। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने कुल ₹14,115 करोड़ की लागत वाली इन परियोजनाओं के तहत दिल्ली में छह लेन की द्वारका टनल और उत्तर प्रदेश में कानपुर से कबरई तक चार लेन एक्सेस-कंट्रोल्ड हाईवे के निर्माण को हरी झंडी दी है। केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कैबिनेट बैठक के बाद इन फैसलों की जानकारी दी।   दिल्ली में बनने वाली 8.1 किलोमीटर लंबी द्वारका दिल्ली में बनने वाली 8.1 किलोमीटर लंबी द्वारका टनल पर करीब ₹6,970 करोड़ खर्च किए जाएंगे। यह टनल द्वारका एक्सप्रेसवे के शिवमूर्ति इंटरचेंज को वसंत कुंज स्थित नेल्सन मंडेला मार्ग से जोड़ेगी। परियोजना का लगभग 3.1 किलोमीटर हिस्सा सदर्न रिज फॉरेस्ट के नीचे से गुजरेगा। इसे हाइब्रिड एन्यूटी मॉडल (HAM) के तहत विकसित किया जाएगा और अगले पांच वर्षों में पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। इसके निर्माण से पश्चिमी और दक्षिणी दिल्ली के बीच यात्रा आसान होगी तथा ट्रैफिक जाम में उल्लेखनीय कमी आने की उम्मीद है। वहीं, उत्तर प्रदेश में कानपुर से कबरई तक 242 किलोमीटर लंबे चार लेन एक्सेस-कंट्रोल्ड हाईवे के निर्माण को भी मंजूरी दी गई है। इस परियोजना पर ₹7,145 करोड़ की लागत आएगी और इसे बिल्ड-ऑपरेट-ट्रांसफर (BOT) टोल मॉडल के तहत विकसित किया जाएगा। हाईवे कानपुर, हमीरपुर और महोबा जैसे जिलों को बेहतर कनेक्टिविटी प्रदान करेगा और भविष्य में इसे छह लेन तक विस्तारित किया जा सकेगा। परियोजना को लगभग ढाई वर्षों में पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। सरकार का मानना है कि दोनों परियोजनाएं क्षेत्रीय कनेक्टिविटी को मजबूत करने के साथ-साथ व्यापार, पर्यटन, लॉजिस्टिक्स और रोजगार के नए अवसर पैदा करेंगी। आधुनिक सड़क नेटवर्क से यात्रा सुरक्षित और तेज होगी, जबकि आर्थिक गतिविधियों को भी नई गति मिलेगी। इन परियोजनाओं को देश में इंफ्रास्ट्रक्चर विकास और संतुलित क्षेत्रीय प्रगति की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

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ज़ूडियो-वेस्टसाइड को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाने वाले नोएल टाटा अब वोल्टास को भी कहेंगे अलविदा

नई दिल्ली, एजेंसियां। टाटा समूह के वरिष्ठ उद्योगपति और सफल रिटेल रणनीतिकार नोएल टाटा इस साल नवंबर में 70 वर्ष की आयु पूरी होने के बाद वोल्टास के चेयरमैन पद से इस्तीफा दे देंगे। उन्होंने कंपनी की 72वीं वार्षिक आम बैठक (AGM) में स्वयं इसकी जानकारी दी। इससे कुछ दिन पहले ही वह ट्रेंट लिमिटेड के चेयरमैन पद छोड़ने की घोषणा भी कर चुके हैं। लगातार दो बड़ी कंपनियों से उनके हटने को टाटा समूह में नेतृत्व परिवर्तन की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है।   ज़ूडियो और वेस्टसाइड को बनाया देश का लोकप्रिय फैशन ब्रांड नोएल टाटा को भारतीय रिटेल सेक्टर में नई पहचान दिलाने का श्रेय दिया जाता है। उनके नेतृत्व में ट्रेंट लिमिटेड ने वेस्टसाइड और ज़ूडियो जैसे ब्रांडों को देशभर में मजबूत पहचान दिलाई। जहां वेस्टसाइड को प्राइवेट लेबल मॉडल के जरिए विकसित किया गया, वहीं वर्ष 2016 में लॉन्च हुआ ज़ूडियो कम कीमत में ट्रेंडी फैशन उपलब्ध कराकर तेजी से ग्राहकों की पहली पसंद बन गया। खासकर छोटे शहरों और मध्यम वर्ग के बीच इस ब्रांड ने उल्लेखनीय सफलता हासिल की।   रणनीति से बदली कंपनी की तस्वीर नोएल टाटा की व्यावसायिक रणनीति का असर कंपनी के प्रदर्शन में भी साफ दिखाई दिया। उनके नेतृत्व में ट्रेंट का कारोबार करीब 1,300 करोड़ रुपये से बढ़कर 20,000 करोड़ रुपये तक पहुंच गया, जबकि मुनाफा लगभग 130 करोड़ रुपये से बढ़कर 1,700 करोड़ रुपये के करीब पहुंच गया। आज वेस्टसाइड के 300 से अधिक और ज़ूडियो के करीब 960 से ज्यादा स्टोर देशभर में संचालित हो रहे हैं। कंपनी का मार्केट कैप भी लगभग 1.73 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है।   समृद्ध अनुभव और वैश्विक दृष्टि 1957 में जन्मे नोएल टाटा, नवल टाटा और सिमोन टाटा के पुत्र तथा रतन टाटा के सौतेले भाई हैं। उन्होंने ब्रिटेन के ससेक्स विश्वविद्यालय से स्नातक और फ्रांस के INSEAD बिजनेस स्कूल से प्रबंधन की शिक्षा प्राप्त की। अपने लंबे करियर में उन्होंने टाटा इंटरनेशनल, ट्रेंट और वोल्टास जैसी कंपनियों को नई दिशा दी। अब उनके पद छोड़ने के साथ टाटा समूह में नई नेतृत्व टीम की भूमिका पर उद्योग जगत की नजरें टिकी हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि नोएल टाटा की बनाई मजबूत रणनीति और रिटेल मॉडल आने वाले वर्षों में भी समूह की कंपनियों की विकास यात्रा को दिशा देते रहेंगे।

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Pune Murder Case: केतन हत्याकांड में नया खुलासा, मंगेतर सिया के पास था मोबाइल, सबूत मिटाने के एंगल पर जांच तेज

पुणे, एजेंसियां। चर्चित केतन अग्रवाल हत्याकांड की जांच में एक नया मोड़ सामने आया है। पुलिस जांच में खुलासा हुआ है कि केतन की मौत के बाद उसका मोबाइल फोन कुछ समय तक उसकी मंगेतर सिया गोयल के पास था। बाद में सिया ने यह फोन केतन के परिजनों को सौंप दिया। अब पुणे ग्रामीण पुलिस इस बात की जांच कर रही है कि फोन उसके पास रहने के दौरान कहीं कोई चैट, कॉल रिकॉर्ड या अन्य डिजिटल सबूत तो नहीं हटाए गए।   डिजिटल सबूतों की हो रही जांच जांच एजेंसियां मोबाइल फोन के डेटा की फोरेंसिक जांच कर रही हैं। पुलिस यह पता लगाने का प्रयास कर रही है कि हत्या के बाद फोन से किसी तरह की छेड़छाड़ हुई या नहीं। यदि डिजिटल साक्ष्यों को मिटाने या बदलने की पुष्टि होती है, तो यह मामले की जांच में अहम कड़ी साबित हो सकती है।   मंगेतर और कथित प्रेमी पर हत्या का आरोप पुलिस के अनुसार, 26 वर्षीय केतन अग्रवाल की शादी नवंबर में सिया गोयल से होने वाली थी। इसके लिए जयपुर में एक भव्य विवाह समारोह की तैयारियां भी चल रही थीं। आरोप है कि सिया और उसके कथित प्रेमी चेतन चौधरी ने मिलकर लोनावला स्थित लोहागढ़ किले की पहाड़ी से केतन को धक्का देकर उसकी हत्या कर दी। फिलहाल दोनों आरोपी पुलिस हिरासत में हैं और उनसे लगातार पूछताछ की जा रही है।   क्राइम सीन रीक्रिएट कर जुटाए जा रहे सबूत मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस ने घटनास्थल पर क्राइम सीन को दोबारा तैयार (रीक्रिएट) किया। इस दौरान डमी का इस्तेमाल कर पूरी घटना को समझने की कोशिश की गई। साथ ही सह-आरोपी चेतन चौधरी को भी घटनास्थल ले जाकर घटनाक्रम की पुष्टि की गई।   सीसीटीवी और वैज्ञानिक जांच पर फोकस पुलिस अब सीसीटीवी फुटेज की सत्यता की जांच के लिए 'गेट एनालिसिस' (चाल-ढाल के वैज्ञानिक परीक्षण) की तैयारी कर रही है। बचाव पक्ष का दावा है कि फुटेज में दिखाई देने वाला व्यक्ति चेतन नहीं है, जबकि पुलिस वैज्ञानिक परीक्षण के जरिए इस दावे की पुष्टि या खंडन करना चाहती है। जांच अधिकारियों का मानना है कि डिजिटल साक्ष्य, फोरेंसिक रिपोर्ट और वैज्ञानिक परीक्षण इस हाई-प्रोफाइल हत्याकांड की गुत्थी सुलझाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।

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