कोलकाता: West Bengal विधानसभा चुनाव 2026 अपने चरम पर है। राज्य की सभी 294 सीटों पर राजनीतिक सरगर्मी तेज है, लेकिन असली मुकाबला उन चुनिंदा ‘हॉट सीट्स’ पर केंद्रित है, जो सत्ता की दिशा तय करेंगी। राजनीतिक जानकारों के अनुसार, इन सीटों पर परिणाम न सिर्फ All India Trinamool Congress (TMC) और Bharatiya Janata Party (BJP) के भविष्य को प्रभावित करेंगे, बल्कि यह भी तय करेंगे कि ‘नबान्न’ की सत्ता किसके हाथ में जाएगी।
प्रमुख ‘हॉट सीट्स’ और उनका समीकरण:
मुख्यमंत्री Mamata Banerjee की पारंपरिक सीट भवानीपुर इस बार भी सबसे हाई-प्रोफाइल बनी हुई है। भाजपा यहां पूरी ताकत के साथ चुनौती दे रही है, जिससे यह मुकाबला प्रतिष्ठा का बन गया है।
2021 में सुर्खियों में रही नंदीग्राम सीट पर Suvendu Adhikari और टीएमसी के बीच सीधी टक्कर है। यह सीट दोनों नेताओं की राजनीतिक साख का बड़ा इम्तिहान मानी जा रही है।
आरजी कर कांड से जुड़े भावनात्मक माहौल ने पानीहाटी को खास बना दिया है। यहां जनाक्रोश वोट में तब्दील होता है या नहीं, यह परिणाम तय करेगा।
Siliguri और Darjeeling भाजपा का मजबूत गढ़ रहे हैं। टीएमसी यहां वापसी की कोशिश में है, जिससे मुकाबला दिलचस्प हो गया है।
Malda और Murshidabad में कांग्रेस मजबूत स्थिति में है। यहां Asaduddin Owaisi की पार्टी AIMIM और अन्य क्षेत्रीय समीकरणों ने मुकाबले को बहुकोणीय बना दिया है।
कांग्रेस नेताओं Mausam Noor और गनी खान चौधरी परिवार का प्रभाव भी टीएमसी के लिए चुनौती बन सकता है।
Singur, जहां से ममता बनर्जी के राजनीतिक उत्थान की कहानी शुरू हुई, अब भाजपा और टीएमसी के बीच कड़ा मुकाबला देख रहा है। किसान और उद्योग से जुड़े मुद्दे यहां निर्णायक हैं।
इन सीटों पर Abhishek Banerjee का प्रभाव माना जाता है। भाजपा यहां आक्रामक रणनीति के साथ घेराबंदी कर रही है। शहरी मतदाताओं का रुख यहां परिणाम तय करेगा।
क्यों अहम हैं ये सीटें:
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।
तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) में जारी अंदरूनी संकट और बगावत के बीच पार्टी सांसद महुआ मोइत्रा ने वरिष्ठ नेता सुदीप बंद्योपाध्याय पर तीखा हमला बोला है। महुआ ने आरोप लगाया कि सुदीप बंद्योपाध्याय ने बीमारी का बहाना बनाकर पार्टी नेतृत्व को गुमराह किया और बाद में दिल्ली जाकर केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव से मुलाकात की। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट करते हुए महुआ मोइत्रा ने सुदीप बंद्योपाध्याय के पुराने राजनीतिक विवादों का जिक्र करते हुए उन पर विश्वासघात का आरोप लगाया। 'बीमारी का बहाना, दिल्ली में मुलाकात' महुआ मोइत्रा ने लिखा, "दादा सुदीप बंद्योपाध्याय, आपको 2017 में रोज वैली घोटाले में गिरफ्तार किया गया था। तब भी आपने बीमारी का सहारा लिया था। इस बार भी बीमारी का बहाना बनाकर दिल्ली जाकर गद्दारी की। तापस रॉय और कुणाल घोष आपके बारे में सही थे, गलती हमारी थी।" उन्होंने दावा किया कि सुदीप बंद्योपाध्याय ने पार्टी नेताओं को बताया था कि पेट संबंधी समस्या के कारण उन्हें कोलकाता के एक अस्पताल में भर्ती कराया गया है। लेकिन बाद में उन्हें टीवी चैनलों पर दिल्ली में केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव के आवास पर देखा गया। महुआ ने अपने पोस्ट में कटाक्ष करते हुए लिखा, "उनका मुखौटा और उनकी विग दोनों उतर गए। दादा, अब कम से कम अपना एक्स हैंडल बदलकर 'सुदीप बीजेपी बी टीम' कर लीजिए। हमारे नाम का इस्तेमाल मत कीजिए।" कुणाल घोष ने भी साधा निशाना टीएमसी नेता कुणाल घोष ने भी सुदीप बंद्योपाध्याय की आलोचना करते हुए कहा कि उनका राजनीतिक इतिहास दल बदलने से जुड़ा रहा है। उन्होंने कहा, "ममता दीदी ने इन लोगों को पद, सम्मान और पहचान दी, लेकिन बदले में उन्हें यही मिला। सुदीप बंद्योपाध्याय की राजनीति हमेशा ममता बनर्जी को गुमराह करने की रही है। मैंने पहले भी इस बारे में चेतावनी दी थी, जिसके कारण मुझे पार्टी से निलंबित तक होना पड़ा।" ममता को 'चीफ एडवाइजर' बनाने के बयान से बढ़ा विवाद विवाद तब और गहरा गया जब सुदीप बंद्योपाध्याय ने एक बांग्ला न्यूज चैनल को दिए इंटरव्यू में कहा कि टीएमसी के अधिकांश सांसद और विधायक चाहते हैं कि पार्टी का संगठन बचा रहे और ममता बनर्जी को 'मुख्य सलाहकार' (Chief Advisor) की भूमिका में रखा जाए। उन्होंने कहा कि बागी नेताओं ने उनसे आग्रह किया कि ममता बनर्जी को सम्मानपूर्वक मार्गदर्शक की भूमिका दी जाए, जिससे वह भावुक हो गए और बागी गुट के साथ जाने का फैसला किया। उनके इस बयान पर टीएमसी नेता कल्याण बनर्जी ने भी नाराजगी जताई और कहा कि ममता बनर्जी ने ही सुदीप बंद्योपाध्याय को राजनीति में स्थापित किया, संकट के समय उनका साथ दिया और आज वही उन्हें 'सलाहकार' बनाने की बात कर रहे हैं। बागी सांसदों के दावे से बढ़ी सियासी हलचल टीएमसी में मतभेदों की खबरों के बीच यह दावा भी किया जा रहा है कि लोकसभा में पार्टी के 20 सांसदों ने अलग समूह बना लिया है और वे खुद को 'वास्तविक टीएमसी' का प्रतिनिधि बता रहे हैं। बागी सांसद काकोली घोष दस्तिदार ने दावा किया है कि 20 सांसदों ने नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) में विलय कर लिया है और यह नया समूह राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) को समर्थन देगा। इन दावों और आरोपों पर सुदीप बंद्योपाध्याय की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। वहीं, टीएमसी के भीतर जारी सियासी उठापटक ने पश्चिम बंगाल की राजनीति को एक नए मोड़ पर ला खड़ा किया है।
कोलकाता: तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) में जारी अंदरूनी घमासान के बीच जादवपुर की फायरब्रांड सांसद सायोनी घोष का नया अवतार चर्चा का विषय बन गया है। कभी मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की तरह सफेद सूती साड़ी, बड़ी बिंदी और सादगी भरे अंदाज में नजर आने वाली सायोनी अब जींस-टीशर्ट, कैजुअल कुर्तियों, मॉडर्न हेयरस्टाइल और स्नीकर्स में दिखाई दे रही हैं। दिल्ली से लेकर कोलकाता तक राजनीतिक गलियारों में उनके इस बदलाव को लेकर कई तरह की चर्चाएं शुरू हो गई हैं। विश्लेषकों का मानना है कि यह केवल फैशन में बदलाव नहीं, बल्कि एक बड़े राजनीतिक संदेश का संकेत हो सकता है। साड़ी से स्नीकर्स तक, क्यों बदला सायोनी का अंदाज? हाल के दिनों में सायोनी घोष कई सार्वजनिक कार्यक्रमों और राजनीतिक दौरों के दौरान अपने नए लुक में नजर आई हैं। उन्होंने पारंपरिक सफेद साड़ी और हवाई चप्पलों की जगह आधुनिक परिधान और स्नीकर्स को अपनाया है। उनका यह बदलाव ऐसे समय सामने आया है, जब टीएमसी के भीतर नेतृत्व, रणनीति और संगठनात्मक दिशा को लेकर बहस तेज है। ऐसे में उनके नए मेकओवर को राजनीतिक संकेतों के रूप में भी देखा जा रहा है। कभी कहा था- 'दीदी की सादगी मेरे व्यक्तित्व का हिस्सा बन गई' नवंबर 2025 में एक टीवी इंटरव्यू के दौरान सायोनी घोष ने ममता बनर्जी की सादगी से अपनी प्रेरणा का जिक्र किया था। उन्होंने कहा था कि जिस पार्टी और नेता के साथ वे काम करती हैं, उनके मूल्यों और जीवनशैली का असर स्वाभाविक रूप से उनके व्यक्तित्व पर पड़ता है। उन्होंने यह भी कहा था कि वे अपनी नेता की तरह आम लोगों, 'मां-माटी-मानुष' और जमीनी राजनीति के करीब रहना चाहती हैं। अभिनय की दुनिया से राजनीति तक का सफर टॉलीवुड की लोकप्रिय अभिनेत्री रहीं सायोनी घोष ने राजनीति में आने के बाद अपनी ग्लैमरस छवि को काफी हद तक पीछे छोड़ दिया था। उन्होंने खुद कई मौकों पर कहा कि अभिनय के दौरान भी वह व्यक्तिगत जीवन में सादगी पसंद करती थीं और राजनीति में आने के बाद ममता बनर्जी के व्यक्तित्व ने उन पर गहरा प्रभाव डाला। क्या टीएमसी की अंदरूनी खींचतान से जुड़ा है मेकओवर? राजनीतिक जानकारों का मानना है कि टीएमसी में जारी कथित 'ओल्ड गार्ड बनाम न्यू गार्ड' की खींचतान, पार्टी के अंदर नेतृत्व को लेकर चल रही बहस और हालिया विवादों के बीच सायोनी घोष अपनी एक स्वतंत्र राजनीतिक पहचान स्थापित करने की कोशिश कर रही हैं। विश्लेषकों के मुताबिक, यह बदलाव उनकी 'इंडिपेंडेंट ब्रांडिंग' की रणनीति का हिस्सा भी हो सकता है, जिससे वे खुद को केवल किसी नेता की छवि तक सीमित न रखकर एक अलग राजनीतिक व्यक्तित्व के रूप में पेश कर सकें। सियासी संदेश या व्यक्तिगत पसंद? सायोनी घोष की ओर से उनके नए लुक को लेकर कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है, लेकिन उनका बदला हुआ अंदाज राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बना हुआ है। सवाल यह भी उठ रहे हैं कि क्या यह सिर्फ व्यक्तिगत पसंद का मामला है या फिर बंगाल की राजनीति में बदलते समीकरणों के बीच एक नया राजनीतिक संदेश देने की कोशिश। फिलहाल, टीएमसी के अंदरूनी संकट के दौर में सायोनी घोष का यह नया अवतार बंगाल की राजनीति में एक नई बहस को जन्म दे चुका है।
पश्चिम बंगाल की सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) में अंदरूनी मतभेदों को लेकर राजनीतिक चर्चा तेज हो गई है। वरिष्ठ सांसद कल्याण बनर्जी के हालिया बयान ने पार्टी के भीतर नेतृत्व और संगठनात्मक रणनीति को लेकर चल रही बहस को नई दिशा दे दी है। अभिषेक बनर्जी की भूमिका पर उठाए सवाल कल्याण बनर्जी ने सार्वजनिक रूप से पार्टी की कार्यशैली और निर्णय प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए कहा कि नेतृत्व को संगठन के भविष्य को ध्यान में रखते हुए स्पष्ट दिशा तय करनी चाहिए। उन्होंने संकेत दिया कि पार्टी के भीतर पुराने नेताओं और नई पीढ़ी के नेतृत्व के बीच मतभेद बढ़ रहे हैं। उनके बयान को पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी की कार्यशैली पर अप्रत्यक्ष आलोचना के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि, टीएमसी नेतृत्व की ओर से इस पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। राजनीतिक गलियारों में बढ़ी चर्चा कल्याण बनर्जी के बयान के बाद राजनीतिक हलकों में यह चर्चा तेज हो गई है कि पार्टी के भीतर विभिन्न गुटों के बीच मतभेद सामने आ रहे हैं। कुछ रिपोर्टों और राजनीतिक सूत्रों में दावा किया जा रहा है कि संगठन की रणनीति, विपक्षी दलों के साथ संबंधों और भविष्य की राजनीतिक दिशा को लेकर अलग-अलग राय मौजूद हैं। सांसदों और विधायकों की कथित बगावत या दल के भीतर बड़े पैमाने पर टूट की खबरों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। कांग्रेस से संबंधों पर भी उठे सवाल राजनीतिक चर्चाओं के बीच कांग्रेस नेतृत्व और टीएमसी नेताओं की हालिया बैठकों को भी जोड़कर देखा जा रहा है। कुछ सूत्रों का दावा है कि विपक्षी एकजुटता और संभावित राजनीतिक सहयोग को लेकर पार्टी के भीतर अलग-अलग मत हैं। हालांकि, टीएमसी या कांग्रेस की ओर से किसी संभावित विलय अथवा औपचारिक राजनीतिक समझौते की पुष्टि नहीं की गई है। महुआ मोइत्रा सहित कई नेता नेतृत्व के समर्थन में दूसरी ओर, पार्टी के कई नेता खुलकर ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी के समर्थन में सामने आए हैं। टीएमसी का आधिकारिक रुख यही है कि पार्टी एकजुट है और संगठन को मजबूत करने के लिए काम कर रही है। आगे क्या? कल्याण बनर्जी के बयान ने यह संकेत जरूर दिया है कि टीएमसी के भीतर नेतृत्व, संगठन और राजनीतिक रणनीति को लेकर गंभीर चर्चा चल रही है। अब राजनीतिक नजरें ममता बनर्जी की अगली रणनीति और पार्टी नेतृत्व की प्रतिक्रिया पर टिकी हैं, क्योंकि आने वाले समय में यह मुद्दा बंगाल की राजनीति को प्रभावित कर सकता है।