Indian Politics

Jairam Ramesh
जयराम रमेश का केंद्र पर हमला, बोले- ''वोट से लेकर चंदे तक सबकी हो रही चोरी'

नई दिल्ली, एजेंसियां। कांग्रेस महासचिव और राज्यसभा सांसद जयराम रमेश ने केंद्र सरकार और चुनाव आयोग पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने कहा कि इंडिया ब्लॉक ने चुनाव आयोग की विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision-SIR) प्रक्रिया को लेकर चिंता जताते हुए भारत के मुख्य न्यायाधीश को संयुक्त पत्र भेजा है। विपक्ष का आरोप है कि चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली निष्पक्ष नहीं है और इससे चुनावी प्रक्रिया पर जनता का भरोसा कमजोर हो रहा है।   'चुनावी व्यवस्था पर लोगों का भरोसा घट रहा' जयराम रमेश ने कहा कि एसआईआर प्रक्रिया और चुनाव आयोग के कामकाज को लेकर विपक्ष की गंभीर आपत्तियां हैं। उनका दावा है कि देश में चुनावी व्यवस्था पर लोगों का विश्वास लगातार कम हो रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि लोगों के बीच यह धारणा बन रही है कि चुनाव परिणाम पहले से तय होते हैं। उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा कि यदि नतीजे पहले ही तय हैं, तो चुनाव कराने का उद्देश्य क्या रह जाता है।   'ट्रिपल इंजन सरकार' पर साधा निशाना कांग्रेस नेता ने केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि यह "ट्रिपल इंजन सरकार" है, जहां वोटों की चोरी, सीटों की चोरी और चंदे की चोरी हो रही है। उन्होंने इन आरोपों को कथित राम जन्मभूमि चंदा विवाद से भी जोड़ते हुए सरकार पर पारदर्शिता की कमी का आरोप लगाया।   जयराम रमेश ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के कामकाज पर भी सवाल उठाए। उनका आरोप था कि पश्चिम बंगाल, बिहार, महाराष्ट्र और हरियाणा जैसे राज्यों में चुनाव आयोग का रवैया निष्पक्ष नहीं रहा और आयोग केंद्र सरकार के निर्देशों के अनुसार काम करता दिखाई देता है।   इंडिया ब्लॉक ने CJI से की हस्तक्षेप की मांग यह बयान ऐसे समय आया है जब आम आदमी पार्टी, डीएमके सहित इंडिया ब्लॉक के 23 राजनीतिक दलों और एक निर्दलीय सांसद ने संयुक्त रूप से भारत के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर एसआईआर प्रक्रिया और चुनावी व्यवस्था से जुड़े मुद्दों पर हस्तक्षेप की मांग की है। फिलहाल चुनाव आयोग की ओर से इन आरोपों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

anjali kumari जुलाई 4, 2026 0
TMC MP Mahua Moitra speaks in a video after alleging that protesters threw eggs and rotten brinjals outside her residence or office premises in Kolkata.
महुआ मोइत्रा ने घर पर अंडे और सड़े बैंगन फेंके जाने का लगाया आरोप, सोशल मीडिया पर वीडियो साझा किया

कोलकाता: Mahua Moitra ने दावा किया है कि उनके घर (या कार्यालय परिसर) के बाहर कुछ लोगों ने अंडे और सड़े बैंगन फेंके। उन्होंने घटना का एक वीडियो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर साझा करते हुए इसके लिए भारतीय जनता पार्टी के समर्थकों को जिम्मेदार ठहराया और सुरक्षा व्यवस्था पर भी सवाल उठाए। वीडियो शेयर कर लगाए गंभीर आरोप महुआ मोइत्रा ने अपने पोस्ट में आरोप लगाया कि भाजपा समर्थक उनके परिसर के बाहर विरोध प्रदर्शन कर रहे थे। उन्होंने पश्चिम बंगाल पुलिस और केंद्रीय सुरक्षा बलों की भूमिका पर भी सवाल उठाए। अपने पोस्ट में उन्होंने कई विपक्षी नेताओं, जिनमें Mamata Banerjee, Rahul Gandhi, Akhilesh Yadav, Supriya Sule, M. K. Stalin और Arvind Kejriwal को टैग किया। वीडियो में क्या दिखाई देता है? करीब एक मिनट के वीडियो में एक व्यस्त सड़क पर भीड़, पुलिसकर्मी और कई लोग मोबाइल से वीडियो बनाते दिखाई देते हैं। वीडियो ऊपरी मंजिल से रिकॉर्ड किया गया प्रतीत होता है। महुआ मोइत्रा का कहना है कि वे करीब एक घंटे तक अपने कार्यालय के अंदर ही रहीं क्योंकि बाहर का माहौल तनावपूर्ण था। उन्होंने वीडियो में यह भी कहा कि केंद्रीय सुरक्षा बल (CRPF) के जवान मौके पर मौजूद थे, लेकिन उन्होंने कोई हस्तक्षेप नहीं किया। पहले भी दी थी चेतावनी महुआ मोइत्रा ने इससे पहले सार्वजनिक रूप से कहा था कि यदि कोई उन पर अंडे फेंकेगा या इस तरह का हमला करेगा तो वह संबंधित लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराएंगी और कानूनी कार्रवाई करेंगी। सोशल मीडिया पर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं घटना का वीडियो वायरल होने के बाद सोशल मीडिया पर इसे लेकर अलग-अलग तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आईं। कुछ यूज़र्स ने घटना की आलोचना की, जबकि कुछ ने राजनीतिक टिप्पणी करते हुए इसे लेकर व्यंग्यात्मक पोस्ट भी साझा किए। आधिकारिक पुष्टि नहीं फिलहाल इस मामले में आरोपों की स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। उपलब्ध जानकारी मुख्य रूप से महुआ मोइत्रा द्वारा साझा किए गए वीडियो और उनके सार्वजनिक बयानों पर आधारित है। इस संबंध में पुलिस या अन्य संबंधित एजेंसियों की विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया का इंतजार है।  

Deepshikha जुलाई 2, 2026 0
RLD president Jayant Chaudhary and senior leader KC Tyagi during a party meeting after the announcement of the new parliamentary board.
RLD ने किया संसदीय दल का गठन, केसी त्यागी बने संसदीय बोर्ड के अध्यक्ष; यूपी चुनाव से पहले बड़ा संगठनात्मक बदलाव

नई दिल्ली/लखनऊ: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारियों के बीच राष्ट्रीय लोक दल (RLD) ने बड़ा संगठनात्मक बदलाव करते हुए अपने संसदीय दल का गठन कर दिया है। पार्टी ने वरिष्ठ नेता केसी त्यागी को संसदीय बोर्ड का अध्यक्ष नियुक्त किया है। राजनीतिक जानकार इसे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में संगठन को मजबूत करने और चुनावी रणनीति को धार देने की दिशा में अहम कदम मान रहे हैं। राष्ट्रीय लोक दल की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में संसदीय दल के गठन का प्रस्ताव पारित किया गया था। इसी प्रस्ताव के आधार पर मंगलवार को 15 सदस्यीय संसदीय दल की घोषणा की गई। 15 सदस्यीय संसदीय दल का गठन आरएलडी के संसदीय दल में पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जयंत चौधरी समेत कई वरिष्ठ नेताओं को शामिल किया गया है। इनमें मेजर जनरल बिशंभर दयाल, पूर्व सांसद तारीफ सिंह, मुंशी राम, पूर्व मंत्री अशोक यादव, पूर्व सांसद मलूक नागर, सांसद राजकुमार सांगवान, विधायक राजपाल बालियान, राजस्थान के पूर्व विधायक अब्दुर सगीर खान, विधान परिषद सदस्य योगेश चौधरी, राजस्थान विधायक सुभाष गर्ग, यशपाल बघेल, अनिल दुबे, रमा नागर और बबीता तोमर शामिल हैं। इसके अलावा किसान नेता युद्धवीर सिंह, विजय पूनिया, सुखबीर गठीना और चंद्रबली यादव को विशेष आमंत्रित सदस्य बनाया गया है। यूपी चुनाव से पहले संगठन को मजबूत करने की रणनीति आरएलडी का पारंपरिक जनाधार पश्चिमी उत्तर प्रदेश में माना जाता है। ऐसे में विधानसभा चुनाव से पहले संसदीय दल का गठन संगठनात्मक मजबूती और राजनीतिक संदेश दोनों के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। पार्टी नेतृत्व का मानना है कि अनुभवी नेताओं को जिम्मेदारी देकर संगठन और चुनावी तैयारी को अधिक प्रभावी बनाया जा सकेगा। कौन हैं केसी त्यागी? केसी त्यागी का जन्म वर्ष 1950 में उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद जिले के एक किसान परिवार में हुआ था। उन्होंने मुरादनगर से स्कूली शिक्षा और मेरठ विश्वविद्यालय से स्नातक की पढ़ाई पूरी की। छात्र जीवन के दौरान ही उनका झुकाव समाजवादी आंदोलन की ओर हुआ और वे पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह की विचारधारा से प्रभावित होकर राजनीति में सक्रिय हुए। उन्होंने 1984 में लोकदल के टिकट पर पहला लोकसभा चुनाव लड़ा, जीत नहीं मिली। इसके बाद 1989 में जनता दल के उम्मीदवार के रूप में गाजियाबाद से लोकसभा चुनाव जीतकर पहली बार सांसद बने। समाजवादी राजनीति से जेडीयू तक का सफर जनता दल के विभाजन के बाद केसी त्यागी कुछ समय के लिए समाजवादी पार्टी से जुड़े। बाद में नीतीश कुमार और जॉर्ज फर्नांडिस द्वारा गठित समता पार्टी में शामिल हुए। समता पार्टी के जनता दल (यूनाइटेड) में विलय के बाद वे लंबे समय तक जेडीयू के राष्ट्रीय महासचिव और मुख्य प्रवक्ता रहे। वर्ष 2013 से 2016 तक वे राज्यसभा सदस्य भी रहे। हाल के राजनीतिक घटनाक्रम के बाद उन्होंने जेडीयू छोड़कर राष्ट्रीय लोक दल का दामन थाम लिया। गठबंधन राजनीति का लंबा अनुभव केसी त्यागी को गठबंधन राजनीति और संगठन संचालन का लंबा अनुभव है। विभिन्न समाजवादी दलों और राष्ट्रीय स्तर के नेताओं के साथ उनके करीबी संबंध रहे हैं। आपातकाल के दौरान लोकतांत्रिक अधिकारों के समर्थन में आवाज उठाने के कारण उन्हें मीसा (MISA) के तहत जेल भी जाना पड़ा था। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जयंत चौधरी ने उन्हें संसदीय बोर्ड की जिम्मेदारी देकर पार्टी के संगठनात्मक अनुभव और चुनावी रणनीति को मजबूत करने का संदेश दिया है। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले यह नियुक्ति आरएलडी की चुनावी तैयारियों का महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जा रही है।  

Deepshikha जुलाई 1, 2026 0
Vodafone Idea (Vi) prepaid SIM card promoting ₹4,600 annual recharge plan with 365-day validity and data benefits.
5G विस्तार अभी अधूरा, फिर भी Vi ने लॉन्च किया Jio-Airtel से महंगा ₹4,600 का रिचार्ज प्लान, जानिए क्या मिलेंगे फायदे

भारत की तीसरी सबसे बड़ी टेलीकॉम कंपनी Vodafone Idea (Vi) ने बिना किसी बड़े ऐलान के अपना नया सालभर वाला प्रीपेड प्लान लॉन्च कर दिया है। इस प्लान की कीमत ₹4,600 रखी गई है, जो मौजूदा समय में Jio और Airtel के कई वार्षिक प्रीपेड प्लानों से महंगा माना जा रहा है। कंपनी का दावा है कि इस प्लान में अनलिमिटेड डेटा मिलता है, लेकिन इसकी शर्तें जानना भी जरूरी है। यह प्लान फिलहाल Vi की आधिकारिक वेबसाइट और मोबाइल ऐप पर उपलब्ध है। ₹4,600 वाले प्लान में क्या मिलेगा? Vi के इस नए एनुअल प्रीपेड प्लान की वैधता 365 दिन है। इसमें ग्राहकों को पूरे साल के लिए कई बेसिक सुविधाएं मिलती हैं। प्लान के प्रमुख फायदे: 365 दिनों की वैधता अनलिमिटेड वॉयस कॉलिंग प्रतिदिन 100 मुफ्त SMS अनलिमिटेड डेटा (शर्तों के साथ) हालांकि, इस प्लान में किसी भी OTT प्लेटफॉर्म जैसे Netflix, Amazon Prime Video, JioHotstar या अन्य स्ट्रीमिंग सर्विस का मुफ्त सब्सक्रिप्शन शामिल नहीं किया गया है। क्या सच में मिलेगा अनलिमिटेड डेटा? Vi इस प्लान को अनलिमिटेड डेटा प्लान के तौर पर पेश कर रही है, लेकिन वास्तव में इसमें फेयर यूसेज पॉलिसी (FUP) लागू होती है। रिपोर्ट्स के अनुसार, ग्राहकों को हर 28 दिनों के लिए 300GB डेटा मिलेगा। यानी डेटा पूरी तरह बिना सीमा वाला नहीं है। 4G और 5G दोनों नेटवर्क पर यही डेटा सीमा लागू होगी। इसका मतलब है कि 5G इस्तेमाल करने वाले यूजर्स को भी अलग से अनलिमिटेड हाई-स्पीड डेटा नहीं मिलेगा। एक दिन का खर्च कितना पड़ेगा? अगर पूरे साल की कीमत को 365 दिनों में बांटा जाए, तो इस प्लान की लागत करीब ₹12.60 प्रतिदिन बैठती है। जो ग्राहक लंबे समय तक बार-बार रिचार्ज नहीं कराना चाहते, उनके लिए यह एक सुविधाजनक विकल्प हो सकता है। हालांकि, इसकी कीमत प्रतिस्पर्धी कंपनियों के मुकाबले अधिक है। 5G अभी भी सीमित शहरों तक Vi ने भले ही यह प्रीमियम प्लान लॉन्च कर दिया हो, लेकिन कंपनी की 5G सेवा अभी पूरे देश में उपलब्ध नहीं है। फिलहाल Vi की 5G सर्विस चुनिंदा शहरों और क्षेत्रों में ही उपलब्ध है, जिनमें शामिल हैं— दिल्ली मुंबई कोलकाता गुजरात के कुछ हिस्से कर्नाटक के कुछ इलाके कंपनी धीरे-धीरे अपने 5G नेटवर्क का विस्तार कर रही है। 5G सेवा का लाभ लेने के लिए ग्राहकों के पास 5G स्मार्टफोन होना चाहिए और वे 5G कवरेज वाले क्षेत्र में होने चाहिए। अच्छी बात यह है कि इसके लिए नया SIM कार्ड लेने की जरूरत नहीं पड़ती। Jio और Airtel से कितना अलग है यह प्लान? Vi का यह प्लान कीमत के मामले में Jio और Airtel के कई वार्षिक प्लानों से महंगा है। हालांकि, इसमें OTT सब्सक्रिप्शन जैसी अतिरिक्त सुविधाएं शामिल नहीं हैं। ऐसे में यह प्लान उन ग्राहकों के लिए अधिक उपयोगी हो सकता है जो पूरे साल की वैधता और अधिक डेटा चाहते हैं, लेकिन जिन यूजर्स के लिए OTT बेनिफिट और व्यापक 5G कवरेज महत्वपूर्ण है, वे अन्य टेलीकॉम कंपनियों के विकल्पों की भी तुलना कर सकते हैं।  

surbhi जुलाई 1, 2026 0
RLD president Jayant Chaudhary and senior leader KC Tyagi during a party meeting after the announcement of the new parliamentary board.
RLD ने किया संसदीय दल का गठन, केसी त्यागी बने संसदीय बोर्ड के अध्यक्ष; यूपी चुनाव से पहले बड़ा संगठनात्मक बदलाव

नई दिल्ली/लखनऊ: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 की तैयारियों के बीच राष्ट्रीय लोक दल (RLD) ने बड़ा संगठनात्मक बदलाव करते हुए अपने संसदीय दल का गठन कर दिया है। पार्टी ने वरिष्ठ नेता केसी त्यागी को संसदीय बोर्ड का अध्यक्ष नियुक्त किया है। राजनीतिक जानकार इसे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में संगठन को मजबूत करने और चुनावी रणनीति को धार देने की दिशा में अहम कदम मान रहे हैं। राष्ट्रीय लोक दल की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में संसदीय दल के गठन का प्रस्ताव पारित किया गया था। इसी प्रस्ताव के आधार पर मंगलवार को 15 सदस्यीय संसदीय दल की घोषणा की गई। 15 सदस्यीय संसदीय दल का गठन आरएलडी के संसदीय दल में पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जयंत चौधरी समेत कई वरिष्ठ नेताओं को शामिल किया गया है। इनमें मेजर जनरल बिशंभर दयाल, पूर्व सांसद तारीफ सिंह, मुंशी राम, पूर्व मंत्री अशोक यादव, पूर्व सांसद मलूक नागर, सांसद राजकुमार सांगवान, विधायक राजपाल बालियान, राजस्थान के पूर्व विधायक अब्दुर सगीर खान, विधान परिषद सदस्य योगेश चौधरी, राजस्थान विधायक सुभाष गर्ग, यशपाल बघेल, अनिल दुबे, रमा नागर और बबीता तोमर शामिल हैं। इसके अलावा किसान नेता युद्धवीर सिंह, विजय पूनिया, सुखबीर गठीना और चंद्रबली यादव को विशेष आमंत्रित सदस्य बनाया गया है। यूपी चुनाव से पहले संगठन को मजबूत करने की रणनीति आरएलडी का पारंपरिक जनाधार पश्चिमी उत्तर प्रदेश में माना जाता है। ऐसे में विधानसभा चुनाव से पहले संसदीय दल का गठन संगठनात्मक मजबूती और राजनीतिक संदेश दोनों के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। पार्टी नेतृत्व का मानना है कि अनुभवी नेताओं को जिम्मेदारी देकर संगठन और चुनावी तैयारी को अधिक प्रभावी बनाया जा सकेगा। कौन हैं केसी त्यागी? केसी त्यागी का जन्म वर्ष 1950 में उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद जिले के एक किसान परिवार में हुआ था। उन्होंने मुरादनगर से स्कूली शिक्षा और मेरठ विश्वविद्यालय से स्नातक की पढ़ाई पूरी की। छात्र जीवन के दौरान ही उनका झुकाव समाजवादी आंदोलन की ओर हुआ और वे पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह की विचारधारा से प्रभावित होकर राजनीति में सक्रिय हुए। उन्होंने 1984 में लोकदल के टिकट पर पहला लोकसभा चुनाव लड़ा, जीत नहीं मिली। इसके बाद 1989 में जनता दल के उम्मीदवार के रूप में गाजियाबाद से लोकसभा चुनाव जीतकर पहली बार सांसद बने। समाजवादी राजनीति से जेडीयू तक का सफर जनता दल के विभाजन के बाद केसी त्यागी कुछ समय के लिए समाजवादी पार्टी से जुड़े। बाद में नीतीश कुमार और जॉर्ज फर्नांडिस द्वारा गठित समता पार्टी में शामिल हुए। समता पार्टी के जनता दल (यूनाइटेड) में विलय के बाद वे लंबे समय तक जेडीयू के राष्ट्रीय महासचिव और मुख्य प्रवक्ता रहे। वर्ष 2013 से 2016 तक वे राज्यसभा सदस्य भी रहे। हाल के राजनीतिक घटनाक्रम के बाद उन्होंने जेडीयू छोड़कर राष्ट्रीय लोक दल का दामन थाम लिया। गठबंधन राजनीति का लंबा अनुभव केसी त्यागी को गठबंधन राजनीति और संगठन संचालन का लंबा अनुभव है। विभिन्न समाजवादी दलों और राष्ट्रीय स्तर के नेताओं के साथ उनके करीबी संबंध रहे हैं। आपातकाल के दौरान लोकतांत्रिक अधिकारों के समर्थन में आवाज उठाने के कारण उन्हें मीसा (MISA) के तहत जेल भी जाना पड़ा था। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जयंत चौधरी ने उन्हें संसदीय बोर्ड की जिम्मेदारी देकर पार्टी के संगठनात्मक अनुभव और चुनावी रणनीति को मजबूत करने का संदेश दिया है। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले यह नियुक्ति आरएलडी की चुनावी तैयारियों का महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जा रही है।  

Deepshikha जुलाई 1, 2026 0
Posters describing Rahul Gandhi as "missing" displayed in Delhi, sparking a political controversy between the BJP and Congress.
दिल्ली में राहुल गांधी को लेकर लगे 'गुमशुदा' पोस्टरों पर सियासत तेज, बीजेपी का हमला

  नई दिल्ली: राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में कांग्रेस सांसद और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को लेकर लगाए गए 'गुमशुदा' पोस्टरों ने राजनीतिक विवाद को हवा दे दी है। शहर के कई इलाकों में लगाए गए इन पोस्टरों में राहुल गांधी की तस्वीर के साथ उन्हें "गुमशुदा" बताया गया है और उनकी विदेश यात्राओं को लेकर तंज कसा गया है। इस मुद्दे पर भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने कांग्रेस पर तीखा हमला बोला है। पोस्टरों में क्या लिखा है? दिल्ली में लगाए गए पोस्टरों में बड़े अक्षरों में "गुमशुदा" लिखा गया है। पोस्टर में राहुल गांधी की तस्वीर के साथ लिखा गया है: नाम: राहुल गांधी पहचान: हमेशा विदेश में पाए जाते हैं। किसी पब में हो सकते हैं, किसी बीच पर हो सकते हैं। तलाश जारी है। इन पोस्टरों के सामने आने के बाद राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। बीजेपी ने राहुल गांधी पर साधा निशाना बीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता शहजाद पूनावाला ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर राहुल गांधी को निशाने पर लेते हुए उन्हें "पर्यटन का नेता" और "लापता राहुल बाबा" बताया। उन्होंने दावा किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री के रूप में अपने लंबे सार्वजनिक जीवन में बिना छुट्टी लिए लगातार काम किया है, जबकि राहुल गांधी महत्वपूर्ण राजनीतिक अवसरों पर अक्सर विदेश यात्राओं पर चले जाते हैं। पूनावाला ने आरोप लगाया कि जब संसद, देश या उनकी पार्टी को उनकी जरूरत होती है, तब राहुल गांधी विदेश में होते हैं। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि राहुल गांधी की विदेश यात्राओं का खर्च किस स्रोत से उठाया जाता है। अर्जुन राम मेघवाल ने भी किया हमला केंद्रीय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने भी पोस्टरों के मुद्दे पर राहुल गांधी की आलोचना की। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी का तरीका "झूठ बोलो और फिर भाग जाओ" जैसा हो गया है। उन्होंने आरोप लगाया कि राहुल गांधी कई बार ऐसे मुद्दों पर राजनीति करते हैं, जिनसे देश में भ्रम और अशांति फैलती है। उन्होंने कहा कि यदि किसी नीति या परीक्षा व्यवस्था पर सुझाव हैं तो उन्हें रचनात्मक तरीके से रखा जाना चाहिए। कांग्रेस की ओर से नहीं आई प्रतिक्रिया पोस्टर विवाद पर कांग्रेस की ओर से फिलहाल कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। हालांकि, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि संसद सत्र और आगामी राजनीतिक कार्यक्रमों के बीच यह मुद्दा सियासी बहस का हिस्सा बना रह सकता है। दिल्ली में लगे इन पोस्टरों ने एक बार फिर राहुल गांधी की विदेश यात्राओं को लेकर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप को तेज कर दिया है। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर कांग्रेस और बीजेपी के बीच बयानबाजी और तेज होने की संभावना है।  

Deepshikha जून 29, 2026 0
TMC MP Mahua Moitra addresses the media while raising questions over transparency in Ayodhya Ram Temple donation records.
राम मंदिर दान विवाद पर महुआ मोइत्रा का हमला, पूछा- 1250 किलो सोना, 70 किलो चांदी और हजारों करोड़ का चंदा कहां गया?

  नई दिल्ली: अयोध्या के श्रीराम मंदिर में श्रद्धालुओं के चढ़ावे और दान में कथित अनियमितताओं को लेकर सियासी घमासान तेज हो गया है। इस विवाद में अब तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की सांसद महुआ मोइत्रा भी खुलकर सामने आ गई हैं। उन्होंने केंद्र सरकार और श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट पर सवाल उठाते हुए मंदिर में चढ़ाए गए सोने, चांदी और नकद दान के हिसाब को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े किए हैं। महुआ मोइत्रा ने दावा किया कि मंदिर में आए हजारों करोड़ रुपये के दान और बड़ी मात्रा में सोना-चांदी के संबंध में पारदर्शिता नहीं है। उन्होंने पूरे मामले की निष्पक्ष और विस्तृत जांच की मांग की है। '3500 करोड़ रुपये के कच्चे दान का हिसाब कहां है?' महुआ मोइत्रा ने कहा कि वर्ष 2020 में ऑडिट के दौरान यह चिंता जताई गई थी कि मंदिर में आने वाले "रॉ डोनेशन" (बिना रसीद वाले दान) का व्यवस्थित रिकॉर्ड नहीं रखा जा रहा था। उन्होंने आरोप लगाया कि अब तक करीब 3,500 करोड़ रुपये का ऐसा दान आया, जिसका पूरा लेखा-जोखा सार्वजनिक नहीं किया गया। उनके मुताबिक, श्रद्धालुओं को यह जानने का अधिकार है कि उनके द्वारा दिया गया दान किस प्रकार सुरक्षित रखा गया और उसका उपयोग कैसे किया गया। 1250 किलो सोना और 70 किलो चांदी को लेकर उठाए सवाल टीएमसी सांसद ने दावा किया कि मंदिर में चढ़ाए गए 1,250 किलो सोने, 70 किलो चांदी और लगभग 200 करोड़ रुपये नकद दान के संबंध में स्पष्ट जानकारी सामने आनी चाहिए। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि सिंधी समुदाय द्वारा दान की गई एक-एक किलो वजन वाली 200 चांदी की ईंटों का कोई स्पष्ट रिकॉर्ड सार्वजनिक नहीं किया गया है। उन्होंने पूछा कि इन बहुमूल्य दानों का वर्तमान विवरण क्या है। 'सिर्फ कर्मचारियों की गिरफ्तारी से जवाबदेही खत्म नहीं होती' महुआ मोइत्रा ने इस मामले में स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (SIT) की कार्रवाई और अब तक हुई गिरफ्तारियों पर भी सवाल उठाए। उनका कहना है कि केवल कुछ कर्मचारियों की गिरफ्तारी से पूरे मामले की जवाबदेही तय नहीं हो जाती। उन्होंने कहा कि यदि जांच में वित्तीय अनियमितताओं के आरोप सामने आए हैं, तो पूरे प्रशासनिक ढांचे की भूमिका की भी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। योगी सरकार और केंद्र पर भी साधा निशाना महुआ मोइत्रा ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के उस बयान पर भी प्रतिक्रिया दी, जिसमें उन्होंने इस मामले का राजनीतिकरण नहीं करने की अपील की थी। टीएमसी सांसद ने कहा कि यह मामला करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़ा है और ऐसे में दान की पूरी पारदर्शिता सुनिश्चित करना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि सवाल उठाना राजनीतिक नहीं, बल्कि जवाबदेही तय करने का विषय है। जांच जारी, ट्रस्ट ने आरोपों से किया इनकार इस बीच, कथित अनियमितताओं के मामले में जांच एजेंसियों की कार्रवाई जारी है। मामले में कई लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी है और नकदी भी बरामद होने का दावा किया गया है। वहीं, श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने पहले भी कहा है कि श्रद्धालुओं द्वारा दान की गई चांदी की ईंटें, आभूषण और अन्य बहुमूल्य वस्तुएं पूरी तरह सुरक्षित हैं तथा उनके रखरखाव और रिकॉर्ड की निर्धारित प्रक्रिया का पालन किया जाता है। जांच एजेंसियां पूरे मामले की पड़ताल कर रही हैं। ऐसे में दान में कथित गड़बड़ी और उससे जुड़े सभी आरोपों पर अंतिम स्थिति जांच पूरी होने के बाद ही स्पष्ट होगी।  

Deepshikha जून 29, 2026 0
West Bengal Assembly prepares to debate the Uniform Civil Code (UCC) Bill during a crucial legislative session.
बंगाल विधानसभा में आज UCC विधेयक पर संग्राम, सत्ता पक्ष बनाम टीएमसी के दोनों गुटों के बीच होगी तीखी टक्कर

  कोलकाता: पश्चिम बंगाल विधानसभा का सोमवार का सत्र राजनीतिक रूप से बेहद अहम रहने वाला है। राज्य की भाजपा सरकार अपना बहुप्रतीक्षित और विवादास्पद समान नागरिक संहिता (UCC) विधेयक सदन में पेश करने जा रही है। विधानसभा चुनाव में सत्ता परिवर्तन के बाद यह भाजपा सरकार का सबसे बड़ा वैचारिक विधेयक माना जा रहा है। इस विधेयक पर मुकाबला सिर्फ सरकार और विपक्ष के बीच नहीं होगा। तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के भीतर चल रही राजनीतिक खींचतान भी विधानसभा में खुलकर सामने आने की संभावना है। पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और विपक्ष के नेता रीतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले दोनों गुट यूसीसी के विरोध को लेकर अपनी-अपनी राजनीतिक स्थिति मजबूत करने की कोशिश में जुटे हैं। UCC पर टीएमसी के दोनों गुट आमने-सामने विधानसभा में यूसीसी विधेयक पर बहस के दौरान टीएमसी के दोनों गुट सरकार को घेरने की तैयारी कर चुके हैं। पार्टी सूत्रों के अनुसार, ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट ने अपने विधायकों को विधेयक का कड़ा विरोध करने के निर्देश दिए हैं। ममता बनर्जी का कहना है कि समान नागरिक संहिता देश की सामाजिक विविधता, सांस्कृतिक पहचान और संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ है। उनका आरोप है कि इस तरह के कानून से भारत की बहुलतावादी व्यवस्था प्रभावित हो सकती है। वहीं विपक्ष के नेता रीतब्रत बनर्जी का गुट भी सरकार पर निशाना साधने की रणनीति बना चुका है। उनका कहना है कि सरकार बिना व्यापक चर्चा और सामाजिक सहमति के इतना महत्वपूर्ण कानून लाने की जल्दबाजी कर रही है। भाजपा के पास बहुमत, विधेयक पारित होने की संभावना विधानसभा में भाजपा के पास स्पष्ट बहुमत होने के कारण विधेयक के पारित होने में किसी बड़ी बाधा की संभावना नहीं है। इसके बावजूद सदन में होने वाली बहस राजनीतिक दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण मानी जा रही है, क्योंकि यह राज्य की नई राजनीतिक दिशा और विपक्ष की रणनीति दोनों को स्पष्ट करेगी। क्या है समान नागरिक संहिता (UCC)? समान नागरिक संहिता का उद्देश्य सभी नागरिकों के लिए धर्म से अलग एक समान नागरिक कानून लागू करना है। इसके तहत विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, संपत्ति के अधिकार, गोद लेने और पारिवारिक मामलों में अलग-अलग धार्मिक व्यक्तिगत कानूनों के स्थान पर एक समान कानूनी व्यवस्था लागू करने का प्रस्ताव है। भाजपा लंबे समय से इसे अपने प्रमुख चुनावी और वैचारिक एजेंडे का हिस्सा बताती रही है। पार्टी का तर्क है कि इससे सभी नागरिकों को समान अधिकार मिलेंगे और कानून के समक्ष समानता सुनिश्चित होगी। सदन में होगी विस्तृत चर्चा विधानसभा की कार्यवाही सोमवार सुबह 11 बजे शुरू होगी। सरकार पहले अन्य विधेयक पेश करेगी, जिसके बाद दूसरे चरण में यूसीसी विधेयक पर चर्चा होने की संभावना है। इस दौरान मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी, विपक्ष के नेता रीतब्रत बनर्जी और विभिन्न दलों के वरिष्ठ विधायक अपनी-अपनी बात रखेंगे। बहस के बाद सरकार विधेयक को सदन से पारित कराने का प्रयास करेगी। राजनीतिक नजरें विधानसभा पर यूसीसी विधेयक पर होने वाली चर्चा को केवल एक कानूनी प्रक्रिया नहीं, बल्कि पश्चिम बंगाल की बदलती राजनीति का अहम पड़ाव माना जा रहा है। एक ओर भाजपा इसे अपने वैचारिक एजेंडे की बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश करना चाहती है, वहीं टीएमसी के दोनों गुट इस मुद्दे पर अपनी राजनीतिक स्वीकार्यता और नेतृत्व क्षमता साबित करने की कोशिश करेंगे। ऐसे में सोमवार का विधानसभा सत्र राज्य की राजनीति के लिए काफी अहम रहने वाला है।  

Deepshikha जून 29, 2026 0
Congress MP Shashi Tharoor questions the government's position on whether an Indian passport should serve as proof of citizenship
पासपोर्ट विवाद पर शशि थरूर का सरकार पर तंज, बोले- कानून में बड़ा विरोधाभास; नागरिकता नियम बदलने की मांग

  नई दिल्ली: कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने पासपोर्ट को लेकर केंद्र सरकार के रुख पर सवाल उठाते हुए इसे "अजीब कानूनी विरोधाभास" बताया है। उन्होंने कहा कि जब सरकार पासपोर्ट जारी करने से पहले सभी दस्तावेजों और पहचान की विस्तृत जांच करती है, तो फिर उसी पासपोर्ट को नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं माना जाना आम लोगों के लिए भ्रम पैदा करता है। थरूर ने सरकार से कानून में संशोधन कर पासपोर्ट और आधार को लेकर स्पष्ट व्यवस्था बनाने की मांग की है। पासपोर्ट को लेकर सरकार के रुख पर उठाए सवाल शशि थरूर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट करते हुए कहा कि भारतीय पासपोर्ट नागरिकता का अंतिम कानूनी प्रमाण नहीं माना जाता, जबकि इसे जारी करने से पहले सरकार व्यापक सत्यापन प्रक्रिया अपनाती है। उन्होंने कहा कि यदि इतनी जांच के बाद भी पासपोर्ट नागरिकता साबित नहीं करता, तो यह कानूनी व्यवस्था में गंभीर विरोधाभास को दर्शाता है। उन्होंने सरकार से आग्रह किया कि इस भ्रम को दूर करने के लिए कानून में आवश्यक बदलाव किए जाएं। आधार कार्ड को लेकर भी जताई चिंता थरूर ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि आधार केवल पहचान और पते का प्रमाण है, नागरिकता का नहीं। ऐसे में करोड़ों भारतीयों के पास सरकारी दस्तावेज तो हैं, लेकिन नागरिकता साबित करने के लिए कोई स्पष्ट और अंतिम दस्तावेज नहीं है। उनका कहना है कि सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि आखिर नागरिकता का वैध और अंतिम प्रमाण कौन-सा दस्तावेज है। कानून में संशोधन की मांग कांग्रेस सांसद ने मांग की कि केंद्र सरकार कानून में बदलाव कर भारतीय पासपोर्ट और सामान्य आधार कार्ड को नागरिकता का वैध और अंतिम प्रमाण घोषित करे। उनका कहना है कि इससे नागरिकों को विभिन्न सरकारी प्रक्रियाओं में बार-बार अपनी नागरिकता साबित करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी और प्रशासनिक व्यवस्था भी सरल होगी। गैर-नागरिकों के लिए अलग आधार कार्ड का सुझाव शशि थरूर ने यह भी सुझाव दिया कि भारत में रहने वाले गैर-नागरिकों के लिए अलग रंग या अलग पहचान वाला आधार कार्ड जारी किया जाए। उनका मानना है कि इससे नागरिकों और गैर-नागरिकों के बीच स्पष्ट अंतर किया जा सकेगा और सरकारी एजेंसियों के लिए पहचान संबंधी प्रक्रियाएं आसान होंगी। सरकार ने क्या कहा? केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया है कि पासपोर्ट मुख्य रूप से विदेश यात्रा के लिए जारी किया जाने वाला दस्तावेज है, न कि नागरिकता का अंतिम प्रमाण। सरकार का कहना है कि यह कोई नया नियम नहीं है, बल्कि लंबे समय से लागू कानूनी व्यवस्था का हिस्सा है। सरकार ने अपने पक्ष के समर्थन में पासपोर्ट अधिनियम, 1967 और 2013 के बॉम्बे हाई कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि पासपोर्ट जारी किया जाना अपने आप में नागरिकता का अंतिम कानूनी प्रमाण नहीं माना जा सकता।  

Deepshikha जून 27, 2026 0
West Bengal Assembly expected to discuss a Uniform Civil Code (UCC) bill during a special legislative session.
पश्चिम बंगाल में लागू होगा यूनिफॉर्म सिविल कोड? विधानसभा के मौजूदा सत्र में आ सकता है UCC विधेयक

  कोलकाता: उत्तराखंड, गुजरात और असम के बाद अब पश्चिम बंगाल में भी समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code-UCC) लागू करने की तैयारी तेज होती दिखाई दे रही है। विधानसभा और राज्य प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार, राज्य सरकार अगले सप्ताह विधानसभा के विशेष सत्र में यूसीसी से संबंधित विधेयक पेश कर सकती है। यदि यह विधेयक पारित हो जाता है, तो पश्चिम बंगाल समान नागरिक संहिता लागू करने वाला देश का चौथा भाजपा शासित राज्य बन जाएगा। सरकार का कहना है कि इस कानून का उद्देश्य विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, गोद लेने और लिव-इन संबंधों जैसे मामलों में सभी नागरिकों के लिए समान कानूनी व्यवस्था सुनिश्चित करना है। साथ ही महिलाओं के अधिकारों को मजबूत करने और लैंगिक समानता को बढ़ावा देने की दिशा में इसे एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। सरकार ने बताई यूसीसी की जरूरत विधानसभा और प्रशासनिक सूत्रों के मुताबिक, सरकार का मानना है कि अलग-अलग समुदायों के व्यक्तिगत कानूनों की जगह एक समान नागरिक कानून लागू होने से न्यायिक प्रक्रिया अधिक पारदर्शी और प्रभावी बनेगी। सरकार का दावा है कि इससे कानूनी विवादों में एकरूपता आएगी और सभी नागरिकों को समान अधिकार सुनिश्चित किए जा सकेंगे। असम मॉडल पर आगे बढ़ सकती है सरकार सूत्रों के अनुसार, पश्चिम बंगाल सरकार यूसीसी लागू करने के लिए असम मॉडल का अध्ययन कर रही है। हाल ही में असम विधानसभा ने लंबी बहस के बाद समान नागरिक संहिता विधेयक पारित किया था। उस कानून में विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, लिव-इन संबंधों के पंजीकरण और बहुविवाह पर रोक जैसे कई महत्वपूर्ण प्रावधान शामिल किए गए हैं। असम सरकार ने इसे संविधान के नीति-निर्देशक तत्वों के अनुरूप बताया था और कहा था कि इसका उद्देश्य महिलाओं के अधिकारों की रक्षा और लैंगिक समानता को बढ़ावा देना है। जनजातीय समुदायों को मिल सकती है छूट सूत्रों के मुताबिक, असम की तरह पश्चिम बंगाल में भी कुछ जनजातीय समुदायों को यूसीसी के दायरे से बाहर रखने पर विचार किया जा रहा है। दार्जिलिंग पर्वतीय क्षेत्र और जंगलमहल के कुछ आदिवासी समुदायों की पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था और संवैधानिक अधिकारों को ध्यान में रखते हुए विशेष प्रावधान किए जा सकते हैं।  इस संबंध में अंतिम फैसला विधेयक पेश होने के बाद ही स्पष्ट होगा। राजनीतिक मुद्दा बनने की संभावना राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि पश्चिम बंगाल विधानसभा में यूसीसी विधेयक पेश होता है तो यह राज्य की राजनीति का बड़ा मुद्दा बन सकता है। भाजपा इसे महिलाओं के अधिकार, समान कानून और सुशासन से जोड़कर पेश कर सकती है, जबकि विपक्ष धार्मिक स्वतंत्रता और अल्पसंख्यकों के अधिकारों के आधार पर इसका विरोध कर सकता है। सरकार का कहना है कि समान नागरिक संहिता किसी धर्म विशेष के खिलाफ नहीं है, बल्कि सभी नागरिकों के लिए समान कानूनी व्यवस्था सुनिश्चित करने का संवैधानिक प्रयास है। वहीं विपक्षी दल पहले ही इस प्रस्तावित कानून को लेकर विरोध के संकेत दे चुके हैं। विधेयक पर रहेगी सबकी नजर अब सभी की नजर विधानसभा के आगामी विशेष सत्र पर टिकी है, जहां सरकार यूसीसी विधेयक पेश कर सकती है। विधेयक के अंतिम स्वरूप, उसमें शामिल प्रावधानों और संभावित छूटों को लेकर राजनीतिक और कानूनी हलकों में चर्चा तेज हो गई है।  

Deepshikha जून 26, 2026 0
India's Ministry of External Affairs clarifies that a passport is a travel document and not conclusive proof of citizenship, triggering political controversy.
पासपोर्ट विवाद: विपक्ष का सरकार पर हमला, पूछा—आखिर भारतीय नागरिकता का प्रमाण क्या है?

  विदेश मंत्रालय (Ministry of External Affairs) के उस बयान के बाद राजनीतिक विवाद गहरा गया है, जिसमें कहा गया कि पासपोर्ट केवल एक यात्रा दस्तावेज है और इसे नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं माना जा सकता। इस टिप्पणी को लेकर कांग्रेस, AIMIM और एनसीपी (शरद पवार गुट) सहित विपक्षी दलों ने केंद्र सरकार पर सवाल उठाए हैं। विपक्ष का कहना है कि इस बयान से आम जनता में भ्रम की स्थिति पैदा हो रही है। सरकार के बयान पर विवाद की शुरुआत विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया था कि पासपोर्ट मुख्य रूप से अंतरराष्ट्रीय यात्रा के लिए जारी किया जाने वाला दस्तावेज है और यह नागरिकता का निर्णायक प्रमाण नहीं है। मंत्रालय ने कहा कि यह कानूनी स्थिति नई नहीं है और लंबे समय से लागू है। इसी बयान के बाद राजनीतिक विवाद तेज हो गया। कांग्रेस का सवाल—नागरिकता साबित कैसे हो? कांग्रेस नेता Supriya Shrinate ने सरकार पर निशाना साधते हुए पूछा कि यदि पासपोर्ट, आधार कार्ड, पैन कार्ड और वोटर आईडी जैसे दस्तावेज भी नागरिकता का प्रमाण नहीं हैं, तो फिर आम नागरिक अपनी नागरिकता कैसे साबित करे। उन्होंने इसे जनता के लिए भ्रम पैदा करने वाला मुद्दा बताया। ओवैसी ने उठाए कानूनी सवाल AIMIM प्रमुख Asaduddin Owaisi ने भी सरकार की टिप्पणी पर सवाल उठाते हुए कहा कि कानून के अनुसार पासपोर्ट केवल भारतीय नागरिकों को ही जारी किया जाता है। उन्होंने कहा कि यदि ऐसा है तो नागरिकता के प्रमाण को लेकर स्पष्टता जरूरी है। एनसीपी (शरद पवार) का हमला एनसीपी (शरदचंद्र पवार गुट) के प्रवक्ता ने कहा कि पहले आधार कार्ड, फिर वोटर आईडी और अब पासपोर्ट—लगातार प्रमुख दस्तावेजों की वैधता पर सवाल उठाए जा रहे हैं। उन्होंने पूछा कि यदि ये सभी प्रमाण पर्याप्त नहीं हैं तो नागरिकता साबित करने का वास्तविक आधार क्या है। राजनीतिक बहस तेज यह मुद्दा अब संसद से लेकर सोशल मीडिया तक चर्चा का केंद्र बन गया है। विपक्ष सरकार से नागरिकता प्रमाण को लेकर स्पष्ट नीति की मांग कर रहा है, जबकि केंद्र सरकार का कहना है कि पासपोर्ट नियमों में कोई बदलाव नहीं हुआ है और बयान केवल मौजूदा कानूनी स्थिति की व्याख्या है।  

Deepshikha जून 26, 2026 0
Former IAS officer Sujatha Raut Karthikeyan joins Biju Janata Dal in the presence of Naveen Patnaik
वीके पांडियन की पत्नी सुजाता राउत कार्तिकेयन बीजू जनता दल में शामिल

  भुवनेश्वर: ओडिशा की राजनीति में बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। पूर्व आईएएस अधिकारी Sujatha Raut Karthikeyan ने गुरुवार को आधिकारिक तौर पर बीजू जनता दल (BJD) की सदस्यता ग्रहण कर ली। वह पूर्व मुख्यमंत्री Naveen Patnaik की मौजूदगी में पार्टी में शामिल हुईं। सामाजिक कल्याण और विशेष रूप से महिला सशक्तीकरण से जुड़े मिशन शक्ति कार्यक्रम में अहम भूमिका निभाने वाली सुजाता राउत ने 13 मार्च 2025 को भारतीय प्रशासनिक सेवा से इस्तीफा दिया था। राजनीतिक पृष्ठभूमि और पार्टी में शामिल होना सुजाता राउत कार्तिकेयन, जो 2000 बैच की आईएएस अधिकारी रह चुकी हैं, लंबे समय तक ओडिशा सरकार में महत्वपूर्ण प्रशासनिक पदों पर कार्यरत रहीं। उन्होंने विशेष रूप से महिला सशक्तीकरण से जुड़े कार्यक्रमों को विस्तार देने में अहम योगदान दिया। बीजू जनता दल में उनके शामिल होने की घोषणा पार्टी मुख्यालय शंख भवन में आयोजित बैठक के बाद की गई। नवीन पटनायक का बयान पूर्व मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने सुजाता राउत का पार्टी में स्वागत करते हुए कहा कि वह एक अनुभवी प्रशासनिक अधिकारी रही हैं और उन्होंने राज्य में कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों का सफलतापूर्वक निर्वहन किया है। उन्होंने उम्मीद जताई कि सुजाता अपनी नई राजनीतिक भूमिका में सहज होकर जनता, विशेषकर महिलाओं के सशक्तीकरण के लिए काम करेंगी। साथ ही उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि आगामी चुनावों में बीजू जनता दल का नेतृत्व स्वयं वही करेंगे और नेतृत्व परिवर्तन की सभी अटकलों को खारिज किया। सुजाता राउत का बयान पार्टी में शामिल होने के बाद सुजाता राउत ने कहा कि वह ओडिशा की जनता की सेवा को अपनी प्राथमिकता बनाए रखेंगी। उन्होंने कहा कि उन्हें बीते 24 वर्षों में नवीन पटनायक के नेतृत्व में काम करने का अवसर मिला और अब एक नई भूमिका में जनता की सेवा करने का अवसर मिला है। उन्होंने कहा कि वह पूरी निष्ठा और समर्पण के साथ राज्य के विकास और महिलाओं के सशक्तीकरण के लिए कार्य करेंगी। पार्टी के भीतर प्रतिक्रियाएं सूत्रों के अनुसार, बीजेडी के कुछ वरिष्ठ नेताओं ने उनके प्रवेश पर आपत्ति भी जताई थी। उनका कहना था कि 2024 के चुनावों में पार्टी के प्रदर्शन को लेकर संगठन के भीतर पहले से ही असंतोष है, और ऐसे में यह कदम राजनीतिक बहस को और बढ़ा सकता है। पार्टी नेतृत्व ने उनके शामिल होने को संगठनात्मक मजबूती और प्रशासनिक अनुभव के तौर पर देखा है।  

Deepshikha जून 26, 2026 0
Rahul Gandhi receives birthday wishes from PM Narendra Modi and Congress leaders on his 56th birthday.
PM Modi Wishes Rahul Gandhi on Birthday: पीएम मोदी ने राहुल गांधी को दी जन्मदिन की बधाई, अच्छे स्वास्थ्य और दीर्घायु की कामना की

  नई दिल्ली: लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस सांसद राहुल गांधी शुक्रवार (19 जून, 2026) को 56 वर्ष के हो गए। उनके जन्मदिन के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं ने उन्हें शुभकामनाएं दीं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट करते हुए राहुल गांधी को जन्मदिन की बधाई दी। प्रधानमंत्री ने लिखा, "लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को जन्मदिन की शुभकामनाएं। उनके अच्छे स्वास्थ्य और दीर्घायु की कामना करता हूं।" 56 साल के हुए राहुल गांधी राहुल गांधी का जन्म 19 जून, 1970 को नई दिल्ली में हुआ था। वह पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी और कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी के पुत्र हैं। वर्तमान में वह उत्तर प्रदेश की रायबरेली लोकसभा सीट से सांसद हैं और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष की जिम्मेदारी निभा रहे हैं। राहुल गांधी पिछले 22 वर्षों से सक्रिय राजनीति में हैं और कांग्रेस के प्रमुख चेहरों में शामिल हैं। मल्लिकार्जुन खरगे ने बताया प्रेरणास्रोत कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने X पर पोस्ट कर राहुल गांधी को जन्मदिन की शुभकामनाएं दीं। उन्होंने लिखा कि संविधान के आदर्शों के प्रति राहुल गांधी की अटूट निष्ठा और वंचित वर्गों के अधिकारों के लिए उनका संघर्ष लाखों लोगों के लिए प्रेरणास्रोत रहा है। खरगे ने कहा कि समावेशिता, सामाजिक न्याय, सद्भाव और करुणा की कांग्रेस पार्टी की परंपरा राहुल गांधी के सार्वजनिक जीवन और नेतृत्व में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। उन्होंने कहा कि जनता के बीच निरंतर संवाद और सत्ता के सामने निर्भीक होकर सच बोलने के कारण राहुल गांधी ने समाज के कमजोर और हाशिए पर खड़े लोगों की आवाज को मजबूती से उठाया है। पवन खेड़ा ने राहुल गांधी के संघर्ष को सराहा कांग्रेस के मीडिया एवं प्रचार विभाग के प्रमुख पवन खेड़ा ने भी राहुल गांधी को जन्मदिन की बधाई दी। उन्होंने कहा कि बहुत कम नेताओं ने लंबे समय तक इतनी तीखी आलोचना और लगातार सार्वजनिक जांच-परख का सामना किया है। पवन खेड़ा ने कहा, "ऐसी परिस्थितियों में अधिकांश लोग सार्वजनिक जीवन से पीछे हट जाते हैं, लेकिन राहुल गांधी को कमजोर करने का हर प्रयास उनके संकल्प को और मजबूत करता गया, उनकी राजनीति को और परिपक्व बनाता गया तथा जनता से उनके संबंध को और गहरा करता गया।" राहुल गांधी के जन्मदिन के अवसर पर देशभर से कांग्रेस कार्यकर्ताओं और समर्थकों ने भी उन्हें शुभकामनाएं दीं और उनके लंबे एवं स्वस्थ जीवन की कामना की।  

Deepshikha जून 19, 2026 0
RSS chief Mohan Bhagwat and Congress leader Priyank Kharge amid debate over RSS registration and transparency issues.
RSS Registration Row: 100 साल बाद संघ के रजिस्ट्रेशन पर क्यों छिड़ी बहस, क्या बिना पंजीकरण के काम करना गैरकानूनी है?

  नई दिल्ली: राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (RSS) अपनी स्थापना के शताब्दी वर्ष में एक नए राजनीतिक और कानूनी विवाद के केंद्र में आ गया है। कांग्रेस नेता प्रियांक खरगे ने संघ प्रमुख मोहन भागवत को पत्र लिखकर सवाल उठाया है कि देश का सबसे बड़ा सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन होने का दावा करने वाला RSS आज तक औपचारिक रूप से पंजीकृत (Registered) क्यों नहीं हुआ। खरगे ने संगठन की फंडिंग, टैक्स अनुपालन और सार्वजनिक जवाबदेही पर भी सवाल खड़े किए हैं। प्रियांक खरगे ने कहा कि जब नागरिकों, गैर-सरकारी संगठनों (NGOs), ट्रस्टों, मंदिरों और कंपनियों को कानून के तहत पंजीकरण, लेखा-परीक्षा और पारदर्शिता के नियमों का पालन करना पड़ता है, तो RSS को इससे अलग क्यों रखा जाए। उन्होंने कहा कि 60,000 से अधिक शाखाओं और करोड़ों स्वयंसेवकों का दावा करने वाले संगठन को भी संवैधानिक जवाबदेही के मानकों पर खरा उतरना चाहिए। संघ का पक्ष: रजिस्ट्रेशन कभी अनिवार्य नहीं रहा विवाद के बीच संघ प्रमुख मोहन भागवत ने स्पष्ट किया है कि RSS की स्थापना 1925 में ब्रिटिश शासन के दौरान हुई थी, जब संगठन के पंजीकरण को लेकर कोई अनिवार्य कानूनी व्यवस्था नहीं थी। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता के बाद भी ऐसा कोई कानून नहीं बनाया गया, जिसने RSS के लिए रजिस्ट्रेशन को अनिवार्य बनाया हो। भागवत के अनुसार, RSS सरकार से कोई अनुदान या वित्तीय लाभ नहीं लेता और एक स्वैच्छिक संगठन के रूप में कार्य करता है। उन्होंने कहा कि संघ अपने वित्तीय लेन-देन का पूरा रिकॉर्ड रखता है और यदि सरकार कभी जानकारी मांगे तो वह अपना पूरा हिसाब-किताब प्रस्तुत कर सकता है। गुरु दक्षिणा पर नहीं लगता टैक्स RSS की आय का प्रमुख स्रोत ‘गुरु दक्षिणा’ है, जो स्वयंसेवकों द्वारा हर वर्ष गुरु पूर्णिमा के अवसर पर स्वेच्छा से दिया जाने वाला आर्थिक योगदान है। संघ का तर्क है कि यह व्यावसायिक आय नहीं, बल्कि स्वयंसेवकों का स्वैच्छिक योगदान है। 1970 के दशक में इस आय पर कर लगाने का प्रयास किया गया था, लेकिन मामला आयकर अपीलीय न्यायाधिकरण (ITAT) की बंबई पीठ तक पहुंचा। 26 जुलाई 1980 को दिए गए फैसले में न्यायाधिकरण ने माना कि RSS और उसके स्वयंसेवकों के बीच ‘म्यूचुअलिटी’ (Mutuality) का संबंध है, इसलिए गुरु दक्षिणा को कर योग्य आय नहीं माना जा सकता। 'Body of Individuals' के रूप में मान्यता RSS का कहना है कि आयकर अधिकारियों और न्यायालयों ने उसे ‘Body of Individuals’ (BOI) यानी ‘व्यक्तियों का समूह’ माना है। इसका अर्थ यह है कि कुछ व्यक्ति मिलकर एक संगठनात्मक इकाई के रूप में कार्य कर रहे हैं, लेकिन उनका किसी कंपनी, ट्रस्ट या सोसायटी के रूप में पंजीकृत होना आवश्यक नहीं है। संघ नेतृत्व का तर्क है कि इसी आधार पर उस पर आयकर की देनदारी लागू नहीं होती और वह मौजूदा कानूनों के तहत वैध रूप से काम कर रहा है। क्या बिना रजिस्ट्रेशन के संगठन गैरकानूनी हो जाता है? कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि किसी संगठन का गैर-पंजीकृत होना उसे स्वतः गैरकानूनी नहीं बनाता। झारखंड हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता अवनीश रंजन मिश्रा के अनुसार, भारत में रजिस्ट्रेशन मुख्य रूप से उन संस्थाओं के लिए आवश्यक होता है, जो सरकार से अनुदान, वित्तीय सहायता या विशेष कानूनी लाभ प्राप्त करना चाहती हैं। ऐसे में केवल रजिस्ट्रेशन न होने के आधार पर RSS को अवैध नहीं कहा जा सकता। क्यों महत्वपूर्ण बन गया है यह विवाद? RSS के रजिस्ट्रेशन को लेकर उठी बहस अब केवल एक कानूनी प्रश्न नहीं रह गई है। यह मुद्दा देश के सबसे प्रभावशाली सामाजिक-सांस्कृतिक संगठनों में से एक की वित्तीय पारदर्शिता, सार्वजनिक जवाबदेही और संस्थागत नियमन से जुड़ गया है। एक ओर आलोचक यह सवाल उठा रहे हैं कि इतने बड़े संगठन को अन्य संस्थाओं की तरह पारदर्शिता के नियमों के दायरे में लाया जाना चाहिए, वहीं RSS का कहना है कि उसने कभी कानून का उल्लंघन नहीं किया और मौजूदा कानूनी ढांचे के भीतर ही अपना कार्य संचालित किया है। RSS के शताब्दी वर्ष में उठा यह विवाद आने वाले दिनों में संगठन की संरचना, वित्तीय जवाबदेही और कानूनी स्थिति पर एक व्यापक राष्ट्रीय बहस को जन्म दे सकता है।  

Deepshikha जून 19, 2026 0
NCPI, once left with only ₹75 in its bank account, is now in the spotlight after 20 rebel TMC MPs announced their merger with the party.
75 रुपए वाली गुमनाम पार्टी रातोंरात बन सकती है NDA की दूसरी सबसे बड़ी ताकत! जानिए NCPI का पूरा सच

  नई दिल्ली/कोलकाता: भारतीय राजनीति में एक ऐसा घटनाक्रम सामने आया है, जिसने राजनीतिक गलियारों से लेकर आम लोगों तक को हैरान कर दिया है। जिस पार्टी के बैंक खाते में एक साल पहले केवल 75 रुपए बचे थे, वही पार्टी अब संसद में सत्तारूढ़ गठबंधन एनडीए (NDA) की दूसरी सबसे बड़ी ताकत बनने की दहलीज पर खड़ी दिखाई दे रही है। यह पार्टी है नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI)। पश्चिम बंगाल की तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 20 बागी सांसदों द्वारा इस पार्टी में विलय की घोषणा के बाद अचानक यह छोटा-सा दल राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आ गया है। 75 रुपए से संसद की ताकत बनने तक का सफर निर्वाचन आयोग को सौंपी गई एनसीपीआई की ऑडिट रिपोर्ट के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2022-23 में पार्टी को चंदे के रूप में कुल 1,13,075 रुपए मिले थे। पार्टी ने लगभग पूरी राशि संगठनात्मक गतिविधियों और चुनावी खर्चों में खर्च कर दी। त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में चार उम्मीदवारों को मैदान में उतारने पर पार्टी ने करीब 49,400 रुपए खर्च किए थे। चुनाव और अन्य खर्चों के बाद पार्टी के बैंक खाते में मात्र 75 रुपए बचे थे। पति-पत्नी के चंदे से चलती थी पार्टी रिपोर्ट के मुताबिक, पार्टी को दान देने वालों में प्रमुख रूप से पार्टी अध्यक्ष शिउली कुंडू और उनके पति उत्तीय कुंडू शामिल थे। शिउली कुंडू ने 15,000 रुपए का योगदान दिया था। उत्तीय कुंडू ने 18,000 रुपए का चंदा दिया था। यानी जिस पार्टी का अस्तित्व कुछ समर्थकों और परिवार के योगदान पर टिका था, वही आज राष्ट्रीय राजनीति की सुर्खियों में है। त्रिपुरा में नहीं मिला था जनसमर्थन एनसीपीआई ने वर्ष 2023 में त्रिपुरा विधानसभा चुनाव की चार सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे। लेकिन पार्टी का प्रदर्शन बेहद कमजोर रहा। अधिकांश सीटों पर पार्टी के उम्मीदवारों को NOTA (नोटा) के आसपास ही वोट मिले। पार्टी न तो कोई सीट जीत सकी और न ही कोई बड़ा जनाधार बना पाई। विडंबना: 'दलबदलुओं को नकारें' का नारा, लेकिन दलबदल से मिली पहचान जनवरी 2023 में पंजीकरण के समय एनसीपीआई ने अपना प्रमुख नारा दिया था— "अपने अधिकारों की रक्षा के लिए राजनीतिक दलबदलुओं को नकारें।" लेकिन राजनीतिक विडंबना देखिए कि आज इसी पार्टी की पहचान और राष्ट्रीय महत्व तृणमूल कांग्रेस के बागी सांसदों के दलबदल के कारण बनी है। 20 सांसदों के आने से कैसे बदल जाएगा समीकरण? यदि लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला बागी सांसदों के विलय को मान्यता दे देते हैं, तो एनसीपीआई रातोंरात लोकसभा की सबसे बड़ी पार्टियों में शामिल हो सकती है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार: पार्टी सीधे देश की प्रमुख संसदीय ताकतों में शामिल हो जाएगी। एनडीए के भीतर इसका आकार कई पुराने सहयोगी दलों से बड़ा हो सकता है। इससे संसद में सीटों का गणित और गठबंधन की राजनीति दोनों प्रभावित हो सकते हैं। यह सब लोकसभा अध्यक्ष और कानूनी प्रक्रियाओं के फैसलों पर निर्भर करेगा। जमीन पर कोई जनप्रतिनिधि नहीं, फिर भी राष्ट्रीय चर्चा में सबसे दिलचस्प तथ्य यह है कि एनसीपीआई के पास अब तक किसी बड़े स्तर का जनाधार नहीं रहा है। पार्टी का कोई विधायक नहीं। कोई सांसद नहीं था। किसी बड़े नगर निकाय में भी उल्लेखनीय प्रतिनिधित्व नहीं रहा। इसके बावजूद, बागी सांसदों के विलय के बाद यह पार्टी राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आ गई है। कौन हैं शिउली और उत्तीय कुंडू? एनसीपीआई की पूर्व अध्यक्ष शिउली कुंडू की शैक्षणिक योग्यता काफी चर्चित रही है। वे: कलकत्ता हाईकोर्ट की वकील हैं। गणित में एमएससी हैं। एमबीए और एलएलएम की डिग्री रखती हैं। लैंड सर्वेइंग का प्रमाणपत्र भी उनके पास है। वहीं उनके पति उत्तीय कुंडू स्वयं को: बांग्ला अखबार के संपादक, गणित शिक्षक, मोटिवेशनल स्पीकर, आईएसओ ऑडिटर, योग स्वयंसेवक बताते हैं। आगे क्या? एनसीपीआई की कहानी भारतीय लोकतंत्र के सबसे अनोखे राजनीतिक घटनाक्रमों में शामिल हो सकती है। एक ऐसी पार्टी, जिसके खाते में कभी केवल 75 रुपए बचे थे, अब संसद की सत्ता समीकरण को प्रभावित करने की स्थिति में पहुंच गई है। बागी सांसदों के विलय, दलबदल विरोधी कानून, पार्टी की मान्यता और चुनाव चिह्न को लेकर अंतिम फैसला संवैधानिक और कानूनी प्रक्रियाओं के बाद ही सामने आएगा। लेकिन फिलहाल, एनसीपीआई भारतीय राजनीति का सबसे चर्चित और रहस्यमय राजनीतिक नाम बन चुकी है।  

Deepshikha जून 16, 2026 0
Prime Minister Narendra Modi addresses NDA leaders at Bharat Mandapam marking 12 years of NDA government and record tenure.
भारत मंडपम में गरजे पीएम मोदी, बोले– कांग्रेस के कुशासन के बाद जनता ने एनडीए पर जताया भरोसा

  नई दिल्ली के भारत मंडपम में बुधवार (10 जून) को राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) सरकार के 12 वर्ष पूरे होने के अवसर पर एक विशेष बैठक आयोजित की गई। इस बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एनडीए के कार्यकाल की उपलब्धियों को गिनाते हुए कांग्रेस पर तीखा हमला बोला। बैठक में बीजेपी और एनडीए के कई वरिष्ठ नेता मौजूद रहे और प्रधानमंत्री को उनके ऐतिहासिक कार्यकाल के लिए बधाई दी। ‘जनता ने बदलाव के लिए चुना एनडीए’ – पीएम मोदी अपने संबोधन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि 2014 में जब एनडीए सत्ता में आया था, तब देश की जनता ने बदलाव और स्थिरता की उम्मीद के साथ भरोसा जताया था। उन्होंने कहा कि पिछले 12 वर्षों में सरकार ने उस विश्वास को मजबूत करने का काम किया है। प्रधानमंत्री ने कहा कि उन्हें कभी नहीं लगा था कि उन्हें देश की इतनी लंबी अवधि तक सेवा करने का अवसर मिलेगा, लेकिन जनता के विश्वास ने यह जिम्मेदारी संभव बनाई। कांग्रेस पर साधा निशाना, ‘कुशासन’ का लगाया आरोप प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संबोधन में कांग्रेस पर तीखा हमला करते हुए कहा कि लंबे समय तक देश ने धीमी विकास दर, भ्रष्टाचार और नीतिगत अस्थिरता का सामना किया। उन्होंने कहा कि 2014 के बाद सरकार की स्पष्ट नीति और निर्णायक नेतृत्व के कारण देश के विकास को नई गति मिली है और भारत आज आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ रहा है। 12 सालों की उपलब्धियां गिनाईं प्रधानमंत्री ने कहा कि पिछले 12 वर्षों में देश ने कई क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति की है। उन्होंने बताया कि: हवाई अड्डों की संख्या में बड़ा इजाफा हुआ है एक्सप्रेसवे और मेट्रो नेटवर्क का तेजी से विस्तार हुआ है रक्षा निर्यात में वृद्धि हुई है डिजिटल भुगतान और इंटरनेट उपयोग में भारत वैश्विक स्तर पर अग्रणी बना है उन्होंने कहा कि यह सिर्फ आंकड़ों की नहीं, बल्कि एक नए भारत की कहानी है जो बड़े लक्ष्य तय कर उन्हें हासिल कर रहा है। ‘स्थिरता से मिली विकास को गति’ – पीएम मोदी प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि देश की जनता ने राजनीतिक स्थिरता को समझते हुए एनडीए को लगातार सेवा का अवसर दिया है। उन्होंने कहा कि पहले अस्थिरता के कारण विकास प्रभावित होता था, लेकिन अब निर्णय तेजी से और प्रभावी ढंग से लागू हो रहे हैं। नेहरू के रिकॉर्ड को पीछे छोड़ने का दावा इसी अवसर पर प्रधानमंत्री मोदी ने एक ऐतिहासिक उपलब्धि भी हासिल की। उन्होंने भारत के पहले प्रधानमंत्री Jawaharlal Nehru के लगातार सबसे लंबे कार्यकाल के रिकॉर्ड को पीछे छोड़ दिया। रिपोर्ट के अनुसार, प्रधानमंत्री मोदी का लगातार कार्यकाल 4,399 दिन हो गया है, जबकि नेहरू का कार्यकाल 4,398 दिनों का था। एनडीए बैठक में दिखी बड़ी राजनीतिक मौजूदगी बैठक में केंद्रीय मंत्री राजनाथ सिंह, अमित शाह, जे.पी. नड्डा और नितिन गडकरी समेत कई वरिष्ठ नेता शामिल हुए। साथ ही एनडीए के सहयोगी दलों के नेता भी मौजूद रहे, जिनमें टीडीपी, जेडीयू, जेडीएस और अपना दल (एस) के प्रतिनिधि शामिल थे। तीसरे कार्यकाल में भी जारी है नेतृत्व प्रधानमंत्री मोदी ने पहली बार 2014 में पद संभाला था, इसके बाद 2019 और 2024 में लगातार चुनाव जीतकर उन्होंने तीसरा कार्यकाल शुरू किया। एनडीए नेताओं ने इस अवसर को भारत की राजनीतिक स्थिरता और विकास यात्रा का प्रतीक बताया।  

Deepshikha जून 11, 2026 0
Leaders submit memorandum to Justice K.G. Balakrishnan Commission seeking SC status for Dalit Christians.
दलित ईसाइयों को SC दर्जा देने की मांग तेज, BRS और YSRCP ने बालाकृष्णन आयोग के समक्ष रखा पक्ष

  नई दिल्ली: दलित ईसाइयों को अनुसूचित जाति (SC) का दर्जा दिए जाने की मांग एक बार फिर राष्ट्रीय बहस के केंद्र में आ गई है। इस मुद्दे पर तेलंगाना की भारत राष्ट्र समिति (BRS) और आंध्र प्रदेश की वाईएसआर कांग्रेस पार्टी (YSRCP) ने न्यायमूर्ति के.जी. बालाकृष्णन आयोग के समक्ष अपने-अपने पक्ष रखे हैं। दोनों दलों ने आयोग को ज्ञापन सौंपकर दलित ईसाइयों को भी अनुसूचित जाति सूची में शामिल करने की सिफारिश करने का आग्रह किया। BRS प्रतिनिधिमंडल ने आयोग को सौंपा ज्ञापन मंगलवार को नई दिल्ली में बीआरएस के वरिष्ठ नेताओं के एक प्रतिनिधिमंडल ने आयोग के अध्यक्ष न्यायमूर्ति के.जी. बालाकृष्णन से मुलाकात की। प्रतिनिधिमंडल ने दलित ईसाइयों को एससी दर्जा देने की मांग करते हुए विस्तृत ज्ञापन सौंपा और कहा कि सामाजिक न्याय तथा समान अवसर के सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए इस मुद्दे पर सकारात्मक निर्णय लिया जाना चाहिए। बीआरएस प्रतिनिधिमंडल में राज्यसभा सांसद वद्दिराजू रविचंद्र, पूर्व मंत्री कोप्पुला ईश्वर, पार्टी महासचिव आर.एस. प्रवीण कुमार और पूर्व निगम अध्यक्ष राजीव सागर समेत कई नेता शामिल थे। वाईएसआरसीपी ने भी उठाई समानता और सामाजिक न्याय की मांग बीआरएस से पहले वाईएसआर कांग्रेस पार्टी के सांसद मद्दिला गुरुमूर्ति ने भी आयोग से मुलाकात कर दलित ईसाइयों को संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 के दायरे में शामिल करने की मांग की थी। आयोग को सौंपे गए ज्ञापन में गुरुमूर्ति ने कहा कि दलित ईसाइयों को एससी सूची से बाहर रखना समानता, धर्मनिरपेक्षता और सामाजिक न्याय जैसे संवैधानिक मूल्यों की भावना के विपरीत है। उन्होंने आयोग से इस विषय पर सकारात्मक सिफारिश करने का अनुरोध किया। आंध्र प्रदेश विधानसभा के प्रस्ताव का दिया हवाला वाईएसआरसीपी सांसद ने अपने ज्ञापन में 24 मार्च 2023 को आंध्र प्रदेश विधानसभा द्वारा पारित सर्वसम्मत प्रस्ताव का भी उल्लेख किया। उस प्रस्ताव में कहा गया था कि दलित ईसाई भी सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक रूप से उसी प्रकार वंचित हैं जैसे हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म से जुड़े अनुसूचित जाति समुदाय। पार्टी का तर्क है कि सामाजिक पिछड़ापन और भेदभाव धर्म परिवर्तन के बाद भी पूरी तरह समाप्त नहीं होता, इसलिए दलित ईसाइयों को भी समान संवैधानिक लाभ मिलना चाहिए। धर्म परिवर्तन से खत्म नहीं होती सामाजिक विषमता: तर्क आयोग के समक्ष प्रस्तुत पक्ष में कहा गया कि केवल धर्म परिवर्तन के आधार पर किसी समुदाय को अनुसूचित जाति के अधिकारों से वंचित नहीं किया जाना चाहिए। दलित ईसाई आज भी कई क्षेत्रों में सामाजिक भेदभाव, आर्थिक पिछड़ेपन और शैक्षणिक चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। वाईएसआरसीपी ने यह भी कहा कि एससी दर्जा न होने के कारण दलित ईसाई अनुसूचित जाति एवं जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के तहत मिलने वाले कई कानूनी संरक्षणों से भी वंचित रह जाते हैं। अनुच्छेद 341 के तहत संसद के पास है अधिकार ज्ञापन में संविधान के अनुच्छेद 341(2) का उल्लेख करते हुए कहा गया कि संसद को किसी समुदाय को अनुसूचित जाति सूची में शामिल करने अथवा उससे बाहर करने का अधिकार प्राप्त है। इसी आधार पर आयोग से आग्रह किया गया है कि वर्तमान सामाजिक वास्तविकताओं और संवैधानिक मूल्यों को ध्यान में रखते हुए दलित ईसाइयों को एससी दर्जा देने के पक्ष में अपनी सिफारिश प्रस्तुत करे। राष्ट्रीय स्तर पर फिर तेज हुई बहस बीआरएस और वाईएसआरसीपी की ओर से आयोग के समक्ष रखे गए पक्ष के बाद दलित ईसाइयों को अनुसूचित जाति का दर्जा देने का मुद्दा एक बार फिर राष्ट्रीय चर्चा का विषय बन गया है। अब नजर न्यायमूर्ति के.जी. बालाकृष्णन आयोग की सिफारिशों पर टिकी है, जो इस लंबे समय से लंबित सामाजिक और संवैधानिक प्रश्न पर आगे की दिशा तय कर सकती हैं।  

Deepshikha जून 10, 2026 0
Justice Markandey Katju and Mahua Moitra amid social media debate over the reported Ishq Karo Party.
महुआ मोइत्रा को ‘इश्क करो पार्टी’ में शामिल होने का ऑफर? जस्टिस काटजू और TMC सांसद को लेकर सोशल मीडिया पर चर्चा तेज

  नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश Markandey Katju द्वारा कथित तौर पर शुरू की गई ‘इश्क करो पार्टी’ को लेकर सोशल मीडिया पर नई बहस छिड़ गई है। इस बीच तृणमूल कांग्रेस की सांसद Mahua Moitra का नाम भी चर्चा में आ गया है। सोशल मीडिया पर वायरल दावों को लेकर अब तक कोई आधिकारिक पुष्टि सामने नहीं आई है। ‘इश्क करो पार्टी’ को लेकर क्या है दावा? सोशल मीडिया और कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि जस्टिस मार्कंडेय काटजू ने ‘इश्क करो पार्टी’ (IKP) नामक एक राजनीतिक मंच की घोषणा की है। बताया जा रहा है कि इस मंच का उद्देश्य समाज में बढ़ती नफरत और विभाजनकारी राजनीति के खिलाफ प्रेम, सामाजिक एकता और संवाद को बढ़ावा देना है। रिपोर्ट्स के अनुसार, काटजू ने लोगों से जाति, धर्म और क्षेत्रीय विभाजन से ऊपर उठकर सामाजिक सद्भाव के लिए काम करने की अपील की है। महुआ मोइत्रा का नाम क्यों आया चर्चा में? कुछ रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि काटजू ने तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा को भी इस नए राजनीतिक मंच से जुड़ने का न्योता दिया है। साथ ही यह भी कहा गया कि उन्होंने पश्चिम बंगाल की मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों और टीएमसी के भीतर चल रही कथित चुनौतियों का जिक्र किया। इन दावों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हो सकी है और न ही इस संबंध में कोई आधिकारिक दस्तावेज सार्वजनिक रूप से उपलब्ध है। सोशल मीडिया पर वायरल हुए कथित जवाब वायरल दावों में यह भी कहा गया कि महुआ मोइत्रा ने जस्टिस काटजू की टिप्पणियों पर तीखी प्रतिक्रिया दी। कथित जवाब में उन्होंने अपने राजनीतिक रुख और विचारधारा के प्रति प्रतिबद्धता दोहराई। लेकिन महत्वपूर्ण बात यह है कि संबंधित पोस्ट या बयान दोनों पक्षों के आधिकारिक सोशल मीडिया खातों पर स्पष्ट रूप से उपलब्ध नहीं हैं। ऐसे में इन दावों की सत्यता को लेकर सवाल बने हुए हैं। आधिकारिक पुष्टि का इंतजार राजनीतिक गलियारों में इस पूरे घटनाक्रम को लेकर चर्चा जरूर है, लेकिन अभी तक न तो जस्टिस मार्कंडेय काटजू की ओर से और न ही महुआ मोइत्रा की ओर से कोई औपचारिक बयान जारी किया गया है, जिससे वायरल दावों की पुष्टि हो सके। विशेषज्ञों का मानना है कि सोशल मीडिया के दौर में राजनीतिक हस्तियों से जुड़े कई दावे तेजी से वायरल हो जाते हैं, इसलिए किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले आधिकारिक जानकारी का इंतजार करना जरूरी है। क्यों चर्चा में है मामला? ‘इश्क करो पार्टी’ नाम की वजह से सोशल मीडिया पर बहस तेज। महुआ मोइत्रा का नाम जुड़ने से राजनीतिक दिलचस्पी बढ़ी। वायरल दावों की अब तक आधिकारिक पुष्टि नहीं। दोनों पक्षों की ओर से स्पष्ट बयान आने का इंतजार। फिलहाल यह मामला सोशल मीडिया और राजनीतिक चर्चाओं तक सीमित है तथा वायरल दावों की सत्यता को लेकर कोई आधिकारिक पुष्टि उपलब्ध नहीं है।  

Deepshikha जून 10, 2026 0
Mamata Banerjee and Abhishek Banerjee during Delhi visit amid speculation over dissent within TMC ranks.
दिल्ली दौरे में ममता बनर्जी को झटका! बागी सांसदों की दूरी से बढ़ीं टीएमसी की मुश्किलें

  नई दिल्ली: तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) प्रमुख ममता बनर्जी के हालिया दिल्ली दौरे ने पार्टी के भीतर चल रही खींचतान और असंतोष की अटकलों को और हवा दे दी है. राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि पार्टी के कुछ असंतुष्ट सांसदों ने नेतृत्व से दूरी बना ली है, जिससे टीएमसी की राष्ट्रीय राजनीति में स्थिति को लेकर नए सवाल खड़े हो गए हैं. सांसदों से संपर्क की कोशिशों को नहीं मिला अपेक्षित समर्थन सूत्रों के अनुसार, दिल्ली पहुंचने के बाद ममता बनर्जी और पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी ने कई सांसदों से संपर्क साधने की कोशिश की. कई सांसदों से संपर्क नहीं हो सका. बताया जा रहा है कि कुछ सांसदों के फोन बंद थे, जबकि कुछ ने बातचीत से परहेज किया. राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि यह घटनाक्रम पार्टी नेतृत्व के लिए चिंता का विषय हो सकता है, खासकर ऐसे समय में जब टीएमसी को संगठनात्मक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है. बागी खेमे की गतिविधियों पर बनी हुई है नजर टीएमसी के भीतर असंतोष को लेकर चर्चाएं पहले से चल रही थीं. अब खबरें हैं कि कुछ सांसद अलग रणनीति पर काम कर रहे हैं. पार्टी की ओर से आधिकारिक तौर पर किसी बड़े विभाजन की पुष्टि नहीं की गई है. सूत्रों का दावा है कि असंतुष्ट नेताओं के बीच लगातार बैठकें हो रही हैं और भविष्य की राजनीतिक दिशा को लेकर विचार-विमर्श जारी है. अभिषेक बनर्जी ने संभाला मोर्चा दिल्ली प्रवास के दौरान ममता बनर्जी अपने भतीजे और टीएमसी महासचिव अभिषेक बनर्जी के आवास पर ठहरीं. बताया जा रहा है कि अभिषेक ने पार्टी के असंतुष्ट नेताओं को मनाने और संवाद कायम रखने की कोशिश की. सूत्रों के मुताबिक अब तक इन प्रयासों को बड़ी सफलता नहीं मिली है. पार्टी नेतृत्व लगातार स्थिति पर नजर बनाए हुए है और संगठनात्मक एकता बनाए रखने की कोशिश कर रहा है. विपक्षी राजनीति में टीएमसी की भूमिका पर उठे सवाल पश्चिम बंगाल की राजनीति में लंबे समय तक मजबूत स्थिति रखने वाली टीएमसी के सामने मौजूदा परिस्थितियां नई चुनौती बनकर उभरी हैं. INDIA गठबंधन की राजनीति और राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी एकता के बीच पार्टी के भीतर बढ़ती असहमति आने वाले दिनों में टीएमसी की रणनीति को प्रभावित कर सकती है. फिलहाल पार्टी नेतृत्व की ओर से कोई विस्तृत आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है, लेकिन राजनीतिक हलकों में इस पूरे घटनाक्रम पर नजर बनी हुई है.  

Deepshikha जून 10, 2026 0
Sonia Gandhi and Mamata Banerjee share a warm interaction during INDIA alliance coordination meeting in Delhi.
सोनिया गांधी से गले मिलते ही भावुक हुईं ममता बनर्जी, INDIA बैठक की तस्वीरों ने खींचा ध्यान

  नई दिल्ली: INDIA गठबंधन की समन्वय समिति की बैठक के दौरान सोमवार को एक ऐसा दृश्य देखने को मिला, जिसने राजनीतिक हलकों में नई चर्चा छेड़ दी। तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी और कांग्रेस की वरिष्ठ नेता सोनिया गांधी की मुलाकात के दौरान दोनों नेताओं के बीच गर्मजोशी देखने को मिली। इस दौरान ममता बनर्जी भावुक भी नजर आईं। दिल्ली में विपक्षी नेताओं की मुलाकात बनी चर्चा का विषय INDIA गठबंधन की बैठक में शामिल होने पहुंचीं ममता बनर्जी का सोनिया गांधी ने स्वागत किया। दोनों नेताओं के बीच कुछ समय तक बातचीत हुई और मुलाकात की तस्वीरें तेजी से चर्चा में आ गईं। राजनीतिक जानकार इसे विपक्षी दलों के बीच बढ़ते संवाद का संकेत मान रहे हैं। तीन दशक पुराने रिश्तों की फिर हुई चर्चा कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के रिश्ते भारतीय राजनीति के सबसे दिलचस्प अध्यायों में से एक रहे हैं। 1998 में कांग्रेस से अलग होकर ममता बनर्जी ने तृणमूल कांग्रेस की स्थापना की थी। इसके बाद दोनों दलों के बीच सहयोग और प्रतिस्पर्धा का दौर लगातार चलता रहा। बंगाल की राजनीति में कई बार आमने-सामने आए दोनों दल पश्चिम बंगाल में कांग्रेस और टीएमसी कई चुनावों में प्रतिद्वंद्वी रही हैं। राज्य की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस के उभार के साथ कांग्रेस का प्रभाव सीमित होता गया। इसके बावजूद राष्ट्रीय स्तर पर दोनों दल कई मौकों पर एक साथ भी नजर आए हैं। 2024 के चुनाव के बाद बढ़ी थी राजनीतिक दूरी लोकसभा चुनाव 2024 के दौरान सीट बंटवारे को लेकर दोनों दलों के बीच मतभेद खुलकर सामने आए थे। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस ने अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया था, जिसके बाद कांग्रेस और टीएमसी के रिश्तों में तनाव की चर्चा तेज हो गई थी। INDIA गठबंधन को मजबूत करने पर हुई बातचीत सूत्रों के अनुसार बैठक के दौरान विपक्षी एकजुटता और भविष्य की राजनीतिक रणनीति पर भी चर्चा हुई। विपक्षी दल आगामी चुनावों को देखते हुए साझा मुद्दों पर साथ आने की कोशिश कर रहे हैं। 10 जनपथ पर फिर हुई अहम मुलाकात बैठक के अगले दिन ममता बनर्जी ने सोनिया गांधी से उनके आवास 10 जनपथ पर भी मुलाकात की। दोनों नेताओं के बीच हुई इस बातचीत को विपक्षी राजनीति के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। टीएमसी की चुनौतियों के बीच बढ़ी राजनीतिक सक्रियता हाल के दिनों में तृणमूल कांग्रेस को संगठनात्मक और राजनीतिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। ऐसे में ममता बनर्जी की विपक्षी नेताओं के साथ लगातार बैठकें राजनीतिक रूप से अहम मानी जा रही हैं। विपक्षी राजनीति में नए संकेत दे रही है यह मुलाकात विश्लेषकों का मानना है कि सोनिया गांधी और ममता बनर्जी की यह मुलाकात केवल शिष्टाचार तक सीमित नहीं है, बल्कि विपक्षी दलों के बीच बेहतर समन्वय और संवाद की संभावनाओं को भी दर्शाती है। आने वाले समय में इसका असर राष्ट्रीय राजनीति में देखने को मिल सकता है।  

Deepshikha जून 10, 2026 0
Prime Minister Narendra Modi marks record-breaking tenure as India’s longest-serving elected PM.
4399 दिनों का रिकॉर्ड: नेहरू को पीछे छोड़ भारत के सबसे लंबे समय तक लगातार निर्वाचित प्रधानमंत्री बने मोदी

  नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारतीय राजनीति में एक नया इतिहास रच दिया है। लगातार तीसरी बार देश की सत्ता संभाल रहे मोदी अब भारत के सबसे लंबे समय तक लगातार निर्वाचित प्रधानमंत्री बनने वाले नेता बन गए हैं। उन्होंने देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू का रिकॉर्ड पीछे छोड़ते हुए 4,399 दिनों का लगातार निर्वाचित कार्यकाल पूरा कर लिया है। लगातार तीसरे कार्यकाल में बना नया इतिहास प्रधानमंत्री मोदी ने पहली बार 26 मई 2014 को प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी। इसके बाद उन्होंने 2019 और 2024 के लोकसभा चुनावों में भी जीत दर्ज कर लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी की। इसी के साथ उनका निर्वाचित प्रधानमंत्री के रूप में कार्यकाल 4,399 दिनों तक पहुंच गया, जो अब तक का सबसे लंबा लगातार निर्वाचित कार्यकाल है। नेहरू का रिकॉर्ड टूटा पंडित Jawaharlal Nehru ने 13 मई 1952 को पहले आम चुनाव के बाद निर्वाचित प्रधानमंत्री के रूप में कार्यभार संभाला था और 27 मई 1964 तक इस पद पर रहे। निर्वाचित प्रधानमंत्री के तौर पर उनका कार्यकाल 4,398 दिनों का था। यदि 15 अगस्त 1947 से उनके पूरे प्रधानमंत्री कार्यकाल को शामिल किया जाए तो वे कुल 6,130 दिनों तक देश के प्रधानमंत्री रहे थे। लेकिन निर्वाचित प्रधानमंत्री के रूप में लगातार कार्यकाल के मामले में मोदी अब उनसे आगे निकल गए हैं। गुजरात से दिल्ली तक का लंबा राजनीतिक सफर राष्ट्रीय राजनीति में आने से पहले नरेंद्र मोदी ने 7 अक्टूबर 2001 को गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में कार्यभार संभाला था। लगभग 13 वर्षों तक राज्य का नेतृत्व करने के बाद वे 2014 में देश के प्रधानमंत्री बने। मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री के रूप में उनका कुल नेतृत्वकाल अब 8,931 दिनों तक पहुंच चुका है, जो भारत के किसी भी निर्वाचित सरकार प्रमुख के लिए एक नया रिकॉर्ड माना जा रहा है। मोदी के नाम पहले से कई बड़े रिकॉर्ड प्रधानमंत्री मोदी पहले भी कई राजनीतिक उपलब्धियां अपने नाम कर चुके हैं। वे: स्वतंत्र भारत के बाद जन्म लेने वाले पहले प्रधानमंत्री हैं। पहले गैर-कांग्रेसी प्रधानमंत्री हैं जिन्होंने लगातार दो पूर्ण कार्यकाल पूरे किए। लगातार तीन लोकसभा चुनाव जीतकर सत्ता में लौटने वाले चुनिंदा नेताओं में शामिल हैं। सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री दोनों पदों पर रहने वाले निर्वाचित नेताओं में से एक हैं। सोशल मीडिया पर भी मजबूत मौजूदगी राजनीतिक उपलब्धियों के साथ-साथ प्रधानमंत्री मोदी डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भी लगातार नए रिकॉर्ड बना रहे हैं। यूट्यूब पर 3 करोड़ से अधिक सब्सक्राइबर। इंस्टाग्राम पर 10 करोड़ से ज्यादा फॉलोअर्स वाले दुनिया के पहले कार्यरत राष्ट्र प्रमुख। एक्स (पूर्व ट्विटर) पर 10 करोड़ से अधिक फॉलोअर्स। 12 वर्षों के कार्यकाल की प्रमुख उपलब्धियां आर्थिक क्षेत्र भारत दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बना। डिजिटल भुगतान प्रणाली UPI को वैश्विक पहचान मिली। निवेश और कारोबार को बढ़ावा देने के लिए कई सुधार लागू किए गए। जनकल्याण योजनाएं प्रधानमंत्री जनधन योजना के तहत करोड़ों बैंक खाते खुले। उज्ज्वला योजना के माध्यम से करोड़ों परिवारों को गैस कनेक्शन मिला। आयुष्मान भारत और प्रधानमंत्री आवास योजना का विस्तार हुआ। जल जीवन मिशन और स्वच्छ भारत अभियान को व्यापक स्तर पर लागू किया गया। बड़े राजनीतिक फैसले जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाया गया। तीन तलाक कानून लागू किया गया। नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) पारित हुआ। नए संसद भवन का उद्घाटन किया गया। बुनियादी ढांचा और रक्षा वंदे भारत ट्रेनों की शुरुआत। एक्सप्रेसवे, हाईवे और एयरपोर्ट नेटवर्क का विस्तार। रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता पर जोर। राफेल लड़ाकू विमानों को भारतीय वायुसेना में शामिल किया गया। वैश्विक मंच पर भारत G20 New Delhi Summit की सफल मेजबानी। International Solar Alliance को वैश्विक पहचान। ग्लोबल साउथ की आवाज के रूप में भारत की भूमिका मजबूत हुई। क्यों महत्वपूर्ण है यह उपलब्धि? प्रधानमंत्री मोदी का 4,399 दिनों का लगातार निर्वाचित कार्यकाल भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर माना जा रहा है। यह उपलब्धि न केवल उनके लंबे राजनीतिक सफर को दर्शाती है, बल्कि लगातार तीन आम चुनावों में मिले जनादेश को भी रेखांकित करती है। भारत के राजनीतिक इतिहास में यह रिकॉर्ड अब एक नए मानक के रूप में दर्ज हो गया है।  

Deepshikha जून 10, 2026 0
Popular post
शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

Top week

Sapna Jain Gogi Gang
राष्ट्रीय

दिल्ली में 50 लाख की रंगदारी की साजिश का खुलासा, कारोबारी की पत्नी निकली मास्टरमाइंड

abhishek singh जून 30, 2026 0