नई दिल्ली/कोलकाता/बेंगलुरु/हैदराबाद: प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने गुरुवार को पॉलिटिकल कंसल्टेंसी फर्म I-PAC (Indian Political Action Committee) के कई ठिकानों पर छापेमारी की। यह कार्रवाई दिल्ली, बेंगलुरु और हैदराबाद स्थित कंपनी के दफ्तरों में की गई। अधिकारियों के अनुसार, यह छापेमारी कथित कोयला चोरी और मनी लॉन्ड्रिंग मामले से जुड़ी है। 2,742 करोड़ के घोटाले से जुड़ा मामला ED की यह कार्रवाई करीब 2,742 करोड़ रुपए के कोयला घोटाले से संबंधित बताई जा रही है। इस मामले में CBI ने 27 नवंबर 2020 को FIR दर्ज की थी, जिसके बाद ED ने मनी लॉन्ड्रिंग एंगल से जांच शुरू की। डायरेक्टर और को-फाउंडर भी जांच के दायरे में छापेमारी के दायरे में कंपनी के को-फाउंडर और डायरेक्टर ऋषि राज सिंह के ठिकाने भी शामिल हैं। इसके अलावा डायरेक्टर प्रतीक जैन पहले से ही जांच एजेंसियों के रडार पर हैं। ED ने हाल ही में दोनों को बयान दर्ज कराने के लिए समन भी भेजा था। हालांकि, सिंह और जैन ने इन समन को चुनौती देते हुए दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया, यह कहते हुए कि वे इस समय पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में चुनावी कार्यों में व्यस्त हैं। पहले भी हो चुकी है कार्रवाई इससे पहले जनवरी में ED ने कोलकाता में I-PAC के दफ्तर और प्रतीक जैन के घर पर छापा मारा था। उस दौरान कोलकाता के लाउडन स्ट्रीट स्थित आवास और सॉल्टलेक स्थित ऑफिस में जांच की गई थी। ममता बनर्जी भी पहुंची थीं मौके पर जनवरी में हुई कार्रवाई के दौरान एक बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम देखने को मिला था। छापेमारी सुबह करीब 6 बजे शुरू हुई बाद में कोलकाता पुलिस कमिश्नर मौके पर पहुंचे कुछ ही देर बाद पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी खुद प्रतीक जैन के घर पहुंचीं बताया जाता है कि ममता बनर्जी कुछ समय वहां रुकीं और बाहर निकलते समय उनके हाथ में एक फाइल भी देखी गई। इसके बाद वे I-PAC के दफ्तर भी गईं। TMC के लिए चुनावी रणनीति संभालती है I-PAC I-PAC फिलहाल तृणमूल कांग्रेस (TMC) के लिए चुनावी रणनीति और कैंपेन मैनेजमेंट का काम कर रही है। कंपनी डेटा-आधारित चुनावी रणनीति, मीडिया प्लानिंग और वोटर आउटरीच में विशेषज्ञ मानी जाती है। I-PAC का इतिहास I-PAC की शुरुआत 2013 में प्रशांत किशोर और प्रतीक जैन ने की थी पहले इसका नाम Citizens for Accountable Governance (CAG) था बाद में इसे I-PAC नाम दिया गया प्रशांत किशोर के अलग होने के बाद कंपनी की कमान पूरी तरह प्रतीक जैन के पास आ गई आगे क्या? ED की यह कार्रवाई राजनीतिक और कानूनी दोनों स्तरों पर बड़ा असर डाल सकती है। आने वाले दिनों में जांच की दिशा और इसके राजनीतिक निहितार्थ पर सभी की नजर रहेगी।
नई दिल्ली: आम आदमी पार्टी (AAP) ने राज्यसभा में बड़ा संगठनात्मक बदलाव करते हुए सांसद राघव चड्ढा को उपनेता पद से हटा दिया है। उनकी जगह अब पार्टी ने अशोक मित्तल को नया उपनेता नियुक्त किया है। राज्यसभा सचिवालय को दी सूचना AAP ने इस फैसले की जानकारी राज्यसभा सचिवालय को भी दे दी है। पार्टी ने साफ कहा है कि: राघव चड्ढा को अब पार्टी की ओर से बोलने का मौका न दिया जाए सदन में उनकी भूमिका और बोलने का समय सीमित किया जाए क्यों लिया गया यह फैसला? हालांकि पार्टी ने आधिकारिक तौर पर कारण स्पष्ट नहीं किया है, लेकिन सूत्रों के मुताबिक: राघव चड्ढा पार्टी लाइन से हटकर मुद्दे उठा रहे थे कई बार बिना पूर्व सूचना के सदन में बोलते थे पार्टी ने पहले उन्हें चेतावनी भी दी थी जनहित के मुद्दों पर रहे सक्रिय हाल के समय में राघव चड्ढा संसद में कई मुद्दे उठा रहे थे, जैसे: एयरपोर्ट पर महंगी चाय (₹10 मुद्दा) डिलीवरी बॉयज से जुड़े मुद्दे आम जनता से जुड़े अन्य सवाल अशोक मित्तल को मिली नई जिम्मेदारी अब राज्यसभा में AAP की ओर से: अशोक मित्तल उपनेता की भूमिका निभाएंगे सदन में पार्टी की रणनीति और लाइन को आगे बढ़ाएंगे
नई दिल्ली: संसद के बजट सत्र के बीच गुरुवार को लोकसभा में CAPF (सेंट्रल आर्म्ड पुलिस फोर्सेस) जनरल एडमिनिस्ट्रेशन बिल 2026 पेश किया जाएगा। इससे पहले यह बिल बुधवार को राज्यसभा से पास हो चुका है। गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय इसे लोकसभा में पेश कर सकते हैं। कार्यवाही की शुरुआत श्रद्धांजलि से सदन की कार्यवाही गुरुवार को दो पूर्व सांसदों को श्रद्धांजलि देने के साथ शुरू हुई। इसके बाद विधायी कामकाज आगे बढ़ाया गया। CAPF बिल में क्या प्रावधान हैं? इस बिल का मुख्य उद्देश्य CAPF में वरिष्ठ पदों पर डिपुटेशन (प्रतिनियुक्ति) के नियम तय करना है: IG (इंस्पेक्टर जनरल) स्तर के 50% पद डिपुटेशन से भरे जाएंगे ADG (एडिशनल डायरेक्टर जनरल) के कम से कम 67% पद डिपुटेशन से SDG और DG के सभी पद डिपुटेशन से ही भरे जाएंगे विपक्ष का विरोध इस बिल को लेकर विपक्ष ने आपत्ति जताई है। कांग्रेस सांसद मणिकम टैगोर ने आरोप लगाया कि: “बिल ऐसे दिन लाया गया है जब विपक्ष के नेता राहुल गांधी असम दौरे पर हैं।” राज्यसभा में आज क्या होगा? राज्यसभा में आज आंध्र प्रदेश की राजधानी अमरावती से जुड़ा बिल पेश किया जाएगा, जिसे लोकसभा पहले ही पास कर चुकी है। क्या बढ़ेगा बजट सत्र? आज बजट सत्र का आखिरी दिन माना जा रहा है, लेकिन रिपोर्ट्स के मुताबिक: सत्र को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित नहीं किया जाएगा सरकार इसे अप्रैल के तीसरे हफ्ते में फिर बुला सकती है बुधवार को पास हुए अहम बिल आंध्र प्रदेश पुनर्गठन (संशोधन) बिल 2026 – लोकसभा इनसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (संशोधन) बिल 2026 – राज्यसभा CAPF जनरल एडमिनिस्ट्रेशन बिल 2026 – राज्यसभा IBC से जुड़ा एक और बिल – राज्यसभा
भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने ओडिशा के पूर्व मुख्यमंत्री बीजू पटनायक पर दिए अपने विवादित बयान को लेकर माफी मांग ली है। उन्होंने बुधवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट कर कहा कि उनके बयान से यदि किसी की भावनाएं आहत हुई हैं तो वे बिना शर्त क्षमा चाहते हैं। दुबे ने लिखा कि “बीजू बाबू हमारे लिए हमेशा एक बड़े कद के स्टेट्समैन रहे हैं और रहेंगे”। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि उनका बयान उनकी निजी राय थी, जिसे गलत तरीके से समझा गया। क्या था विवाद? दरअसल, 27 मार्च को नई दिल्ली में पत्रकारों से बातचीत के दौरान निशिकांत दुबे ने दावा किया था कि: 1962 के चीन युद्ध में पंडित जवाहरलाल नेहरू ने अमेरिका और CIA की मदद ली थी और बीजू पटनायक को अमेरिका, CIA और नेहरू के बीच कड़ी बताया था इस बयान के बाद राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया। अब क्या कहा दुबे ने? माफी मांगते हुए दुबे ने कहा: उनके बयान को गलत संदर्भ में जोड़ा गया नेहरू पर की गई टिप्पणी को बीजू पटनायक से जोड़ना सही नहीं है विपक्ष का कड़ा विरोध दुबे के बयान पर बीजू जनता दल (BJD) ने तीखी प्रतिक्रिया दी: राज्यसभा में BJD सांसदों ने विरोध करते हुए वॉकआउट किया सांसद सस्मित पात्रा ने इसे “पूरी तरह गलत और मनगढ़ंत” बताया वहीं, ओडिशा के पूर्व मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने भी बयान की आलोचना करते हुए इसे आपत्तिजनक बताया। PM मोदी ने की बीजू पटनायक की सराहना विवाद के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उत्कल दिवस के मौके पर बीजू पटनायक को याद करते हुए उन्हें: देश निर्माण के लिए समर्पित नेता और साहस का प्रतीक बताया। कौन थे बीजू पटनायक? ओडिशा के दो बार मुख्यमंत्री (1961-63, 1990-95) स्वतंत्रता सेनानी और कुशल पायलट 1947 में इंडोनेशिया मिशन के लिए प्रसिद्ध द्वितीय विश्व युद्ध में भी अहम भूमिका
गुवाहाटी/धेमाजी: असम विधानसभा चुनाव 2026 के लिए प्रचार तेज हो गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बुधवार को राज्य में कई रैलियों को संबोधित करते हुए भरोसा जताया कि बीजेपी के नेतृत्व वाला NDA एक बार फिर सरकार बनाएगा और हैट्रिक पूरी करेगा। पीएम मोदी का बड़ा बयान गोगामुख और धेमाजी में जनसभाओं को संबोधित करते हुए पीएम मोदी ने कहा कि असम ने पिछले 10 वर्षों में अभूतपूर्व विकास देखा है। उन्होंने कहा, “इस बार का चुनाव विकसित भारत (Viksit Bharat) बनाने का संकल्प है। जनता का उत्साह बता रहा है कि NDA फिर से सत्ता में आएगा।” कांग्रेस पर तीखा हमला प्रधानमंत्री ने कांग्रेस और राहुल गांधी पर निशाना साधते हुए कहा कि चुनाव के बाद कांग्रेस को एक और बड़ी हार का सामना करना पड़ेगा। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि राहुल गांधी “हार का शतक” लगाने की ओर बढ़ रहे हैं। पीएम मोदी ने यह भी दावा किया कि असम में कांग्रेस की हार तय है। चुनावी रैलियां और कार्यक्रम पीएम मोदी ने आज धेमाजी और बिस्वनाथ जिलों में रैलियों को संबोधित किया सुबह 11 बजे गोगामुख में पहली रैली हुई इसके बाद बिस्वनाथ के बेहाली में दूसरी जनसभा आयोजित हुई वह 31 मार्च को ही डिब्रूगढ़ पहुंच चुके थे बीजेपी का ‘संकल्प पत्र’ (घोषणापत्र) बीजेपी ने असम चुनाव के लिए 31 वादों वाला ‘संकल्प पत्र’ जारी किया है, जिसमें विकास, रोजगार और सामाजिक सुरक्षा पर जोर दिया गया है। मुख्य वादे: असम को बाढ़ मुक्त बनाने के लिए 18,000 करोड़ रुपये का ‘बाढ़ मुक्त असम मिशन’ 5 लाख करोड़ रुपये का निवेश कर असम को ‘ईस्टर्न गेटवे’ बनाना युवाओं के लिए रोजगार और स्वरोजगार के अवसर किसानों की आय सुरक्षा मजबूत करना मछुआरों को आर्थिक सहायता महिलाओं की सुरक्षा और आर्थिक सशक्तिकरण हर जिले में यूनिवर्सिटी और शिक्षा ढांचे को मजबूत करना गरीब परिवारों को मुफ्त राशन और सस्ती दरों पर जरूरी खाद्य सामग्री जनजातीय और स्वदेशी समुदायों के लिए भूमि और अधिकारों की सुरक्षा सामाजिक और जनजातीय मुद्दों पर फोकस 7 समुदायों को OBC सूची में शामिल कराने का प्रयास विभिन्न जनजातीय स्वायत्त परिषदों को संवैधानिक दर्जा देने की दिशा में काम चाय बागान और आदिवासी समुदायों के समग्र विकास का वादा चुनाव की तारीख असम में विधानसभा चुनाव 9 अप्रैल को होने हैं, जिसे लेकर सभी राजनीतिक दलों ने पूरी ताकत झोंक दी है।
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 से पहले राजनीति में एक बड़ा और दिलचस्प मोड़ देखने को मिला है। भारत के दिग्गज टेनिस खिलाड़ी Leander Paes ने औपचारिक रूप से Bharatiya Janata Party (BJP) का दामन थाम लिया है। उनकी एंट्री ऐसे समय पर हुई है जब राज्य में चुनावी माहौल तेजी से गरमा रहा है और सभी पार्टियां अपने-अपने स्तर पर रणनीति को धार दे रही हैं। प्रेस कॉन्फ्रेंस में हुआ औपचारिक स्वागत Leander Paes को पार्टी में शामिल करने के लिए आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में केंद्रीय मंत्री Kiren Rijiju और भाजपा नेता Sukanta Majumdar मौजूद रहे। Kiren Rijiju ने पेस की उपलब्धियों को याद करते हुए कहा कि उन्होंने भारत को अंतरराष्ट्रीय खेल मंच पर पहचान दिलाई और अब वे राजनीति के जरिए देश की सेवा करेंगे। “अब देश और युवाओं की सेवा का समय” BJP में शामिल होने के बाद Leander Paes ने भावुक अंदाज में कहा कि उन्होंने पिछले 40 वर्षों में खेल के जरिए देश का प्रतिनिधित्व किया है और अब वे युवाओं और देश की सेवा के लिए राजनीति में कदम रख रहे हैं। उन्होंने प्रधानमंत्री Narendra Modi, गृह मंत्री Amit Shah और पार्टी नेतृत्व का आभार भी जताया। खेल से राजनीति तक का सफर Leander Paes भारत के सबसे सफल टेनिस खिलाड़ियों में से एक रहे हैं: 1996 बार्सिलोना ओलंपिक में ब्रॉन्ज मेडल डेविस कप और ग्रैंड स्लैम में शानदार प्रदर्शन विंबलडन समेत कई अंतरराष्ट्रीय खिताब उनकी लोकप्रियता और पहचान को देखते हुए BJP को उम्मीद है कि यह कदम खासकर युवाओं और शहरी वोटर्स के बीच असर डाल सकता है। चुनावी समीकरण पर क्या असर? Leander Paes की एंट्री को BJP के लिए एक “स्टार पावर” रणनीति के रूप में देखा जा रहा है। इससे पार्टी की छवि को मजबूती मिल सकती है युवा मतदाताओं को आकर्षित करने में मदद मिल सकती है विपक्ष पर मनोवैज्ञानिक दबाव भी बन सकता है हालांकि, यह देखना दिलचस्प होगा कि उनकी लोकप्रियता वोट में कितनी तब्दील होती है। निष्कर्ष पश्चिम बंगाल की राजनीति में Leander Paes की एंट्री ने चुनावी मुकाबले को और रोमांचक बना दिया है। खेल के मैदान से राजनीति के मैदान तक उनका यह सफर BJP के लिए कितना फायदेमंद साबित होगा, इसका जवाब आने वाले चुनावी नतीजे ही देंगे।
अमित शाह ने लोकसभा में नक्सलवाद के मुद्दे पर लगभग 90 मिनट तक ऐसा आक्रामक और रणनीतिक भाषण दिया, जिसने पूरे सदन का माहौल बदल दिया। उनका यह संबोधन केवल एक राजनीतिक जवाब नहीं था, बल्कि एक सुनियोजित सियासी हमला था, जिसमें उन्होंने आंकड़ों, इतिहास और तर्कों के जरिए विपक्ष को घेरने की कोशिश की। खामोशी से शुरुआत, रणनीति की तैयारी भाषण देने से करीब दो घंटे पहले ही अमित शाह सदन में मौजूद थे। वे शांत बैठकर हर वक्ता की बात ध्यान से सुन रहे थे और अहम बिंदुओं को नोट कर रहे थे। इस दौरान विपक्ष की बेंच काफी हद तक खाली दिखीं- Rahul Gandhi, Priyanka Gandhi Vadra और Dimple Yadav जैसे बड़े चेहरे मौजूद नहीं थे। बहस के बीच भावनात्मक मोड़ बीजेपी सांसद Nishikant Dubey ने अपने परिवार की निजी त्रासदी का जिक्र किया, जिसमें उनके दादा की नक्सलियों द्वारा हत्या की बात सामने आई। इससे बहस का माहौल भावनात्मक हो गया। वहीं अभिनेत्री और सांसद Kangana Ranaut ने कांग्रेस नेतृत्व पर तीखा हमला बोला, जिससे सदन में हंगामा भी हुआ। 6:04 बजे शुरू हुआ ‘मुख्य प्रहार’ शाम 6:04 बजे अमित शाह बोलने के लिए खड़े हुए और सीधे इतिहास से शुरुआत की। उन्होंने Indira Gandhi पर नक्सल विचारधारा को राजनीतिक संरक्षण देने का आरोप लगाया, जिस पर विपक्ष ने जोरदार विरोध किया। ‘गरीबी नहीं, नक्सलवाद से फैली गरीबी’ अपने भाषण के दौरान शाह ने विपक्ष के तर्क को पलटते हुए कहा: “नक्सलवाद गरीबी की वजह से नहीं फैला, बल्कि नक्सलवाद की वजह से गरीबी फैली।” उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि सरकार नक्सल हिंसा के खिलाफ सख्त रुख अपनाएगी- “जो हथियार उठाएंगे, उन्हें समझाया जाएगा, नहीं मानेंगे तो बल का इस्तेमाल होगा।” तारीख, डेटा और रणनीतिक रोडमैप अमित शाह ने अपने तर्कों को मजबूत करने के लिए कई अहम तारीखें पेश कीं: 20 अगस्त 2019: पुनर्वास और मुख्यधारा में लाने की नीति की शुरुआत 24 अगस्त 2024: भारत को 31 मार्च 2026 तक नक्सल-मुक्त करने का लक्ष्य उन्होंने दावा किया कि सरकार की रणनीति और लगातार कार्रवाई से देश नक्सलवाद से मुक्त होने की दिशा में आगे बढ़ चुका है। 90 मिनट में बदला पूरा माहौल करीब 7:25 बजे जब उनका भाषण खत्म हुआ, तब तक सदन में कई बार हंगामा और नारेबाजी हो चुकी थी। लेकिन यह साफ था कि अमित शाह ने बहस की दिशा तय कर दी थी। उनका यह भाषण एक राजनीतिक प्रदर्शन जैसा था-जो खामोशी से शुरू हुआ और आक्रामक अंदाज में खत्म हुआ।
देश के कई राज्यों में विधानसभा चुनाव 2026 को लेकर सियासी सरगर्मी अपने चरम पर पहुंच गई है। तमिलनाडु समेत असम, पश्चिम बंगाल, केरल और पुडुचेरी में चुनाव प्रचार तेज हो गया है। इस बीच तमिलनाडु की राजनीति में बड़ा घटनाक्रम सामने आया, जहां मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन और अभिनेता से नेता बने विजय ने सोमवार को अपना नामांकन दाखिल कर दिया। स्टालिन ने कोलाथुर से भरा पर्चा, जताया भरोसा डीएमके प्रमुख स्टालिन ने चेन्नई की कोलाथुर सीट से नामांकन दाखिल किया। यह सीट वे 2011 से लगातार जीतते आ रहे हैं। नामांकन के बाद उन्होंने रोड शो भी किया और दावा किया कि उनकी पार्टी इस बार भी भारी बहुमत से सत्ता में वापसी करेगी। उन्होंने कहा कि उनकी सरकार के वादों पर जनता को भरोसा है और पिछले कार्यकाल में किए गए कामों का फायदा उन्हें चुनाव में मिलेगा। विजय का सियासी डेब्यू, पेरंबूर से मैदान में तमिल फिल्म इंडस्ट्री के सुपरस्टार विजय ने भी पेरंबूर सीट से नामांकन दाखिल कर राजनीति में औपचारिक एंट्री कर ली है। उनकी पार्टी तमिलगा वेत्री कझगम के लिए यह चुनाव बेहद अहम माना जा रहा है। विजय के नामांकन के दौरान भारी भीड़ और समर्थकों का उत्साह देखने को मिला। वे इस चुनाव के जरिए अपनी लोकप्रियता को राजनीतिक ताकत में बदलने की कोशिश करेंगे। चुनावी मैदान में बढ़ी टक्कर विजय की एंट्री ने तमिलनाडु चुनाव को और दिलचस्प बना दिया है। एक तरफ सत्ताधारी डीएमके अपनी उपलब्धियों के दम पर मैदान में है, वहीं दूसरी ओर नए चेहरे के रूप में विजय का करिश्मा भी चुनावी समीकरणों को प्रभावित कर सकता है। अन्य राज्यों में भी तेज प्रचार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी चुनावी राज्यों में सक्रिय हैं और ‘मेरा बूथ, सबसे मजबूत संवाद’ अभियान के जरिए पार्टी कार्यकर्ताओं से जुड़ रहे हैं। बीजेपी को असम और पुडुचेरी में जीत का भरोसा जताया गया है।
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह राज्यसभा से विदाई ले रहे हैं, लेकिन यह विदाई उनके राजनीतिक करियर का अंत नहीं, बल्कि एक नए अध्याय की शुरुआत मानी जा रही है। 79 वर्ष की उम्र में भी सक्रिय और मुखर बने रहने वाले दिग्विजय सिंह ने साफ संकेत दिया है कि वे न तो “टायर्ड” हैं और न ही “रिटायर्ड”। मध्य प्रदेश के दो बार मुख्यमंत्री रह चुके दिग्विजय सिंह लंबे समय तक कांग्रेस संगठन में रणनीतिकार और अहम सिपहसालार की भूमिका निभाते रहे हैं। राज्यसभा कार्यकाल समाप्त होने के बाद यह सवाल तेजी से उठ रहा है कि उनकी अगली राजनीतिक भूमिका क्या होगी। क्या खत्म होगी सक्रिय राजनीति? राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि दिग्विजय सिंह के लिए सक्रिय राजनीति के विकल्प भले सीमित नजर आ रहे हों, लेकिन उनकी उपयोगिता अभी भी खत्म नहीं हुई है। मध्य प्रदेश की राजनीति में उनके बेटे जयवर्द्धन सिंह पहले से सक्रिय हैं, ऐसे में राज्य स्तर पर उनकी भूमिका कम हो सकती है। हालांकि, राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस नेतृत्व उन्हें एक रणनीतिक सलाहकार या विचारधारा के प्रतिनिधि के रूप में इस्तेमाल कर सकता है। ‘हिंदुत्व’ बनाम ‘सनातन’ पर स्पष्ट रुख दिग्विजय सिंह की पहचान एक ऐसे नेता की रही है, जो ‘हिंदुत्व’ की राजनीति का विरोध करते हुए खुद को सनातन परंपरा का समर्थक बताते हैं। वे कई बार भाजपा और उससे जुड़े संगठनों को ‘सच्चे हिंदुत्व’ पर खुली बहस की चुनौती दे चुके हैं। उनका मानना है कि ‘सर्वधर्म समभाव’ ही सनातन धर्म की मूल भावना है और इसे राजनीतिक लाभ के लिए तोड़ा-मरोड़ा जा रहा है। नर्मदा परिक्रमा से सियासी संदेश 2017-18 की उनकी प्रसिद्ध नर्मदा परिक्रमा को उनके राजनीतिक जीवन का अहम मोड़ माना जाता है। करीब 3,300 किलोमीटर की इस पदयात्रा ने न केवल उन्हें जनता से जोड़ा, बल्कि 2018 के मध्य प्रदेश चुनावों में कांग्रेस की वापसी का आधार भी बनी। कांग्रेस में अब भी मजबूत पकड़ कांग्रेस के भीतर दिग्विजय सिंह को आज भी एक अनुभवी और प्रभावशाली नेता माना जाता है। पार्टी के कई नेता मानते हैं कि वे साधु-संतों और धार्मिक वर्गों से संवाद स्थापित करने में अहम भूमिका निभा सकते हैं-जो कांग्रेस के लिए एक चुनौतीपूर्ण क्षेत्र रहा है। 2022 में कांग्रेस अध्यक्ष पद की दौड़ में उनका नाम सामने आना भी उनकी प्रासंगिकता को दर्शाता है, हालांकि अंततः मल्लिकार्जुन खड़गे को यह जिम्मेदारी मिली। आगे क्या? राज्यसभा से विदाई के बावजूद दिग्विजय सिंह की सक्रियता कम होने के संकेत नहीं हैं। उनके अनुभव, संगठनात्मक पकड़ और वैचारिक स्पष्टता को देखते हुए यह तय माना जा रहा है कि वे आने वाले समय में कांग्रेस की रणनीति और वैचारिक दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाते रहेंगे।
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 को लेकर राजनीतिक सरगर्मी तेज हो गई है। कांग्रेस पार्टी ने अपने उम्मीदवारों की पहली सूची जारी करते हुए कुल 284 सीटों पर प्रत्याशियों के नाम घोषित किए हैं। यह सूची नई दिल्ली में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की पार्लियामेंटरी बोर्ड की दो दिवसीय बैठक के बाद जारी की गई। इस सूची में पार्टी ने अनुभवी नेताओं और नए चेहरों के बीच संतुलन बनाने की रणनीति अपनाई है, जिससे राज्य के विभिन्न क्षेत्रों-उत्तर बंगाल से लेकर दक्षिण बंगाल तक-राजनीतिक समीकरण साधे जा सकें। प्रमुख सीटों पर दिग्गजों की तैनाती कांग्रेस की सूची में सबसे चर्चित नाम Adhir Ranjan Chowdhury का है, जिन्हें उनके गढ़ बहरमपुर से उम्मीदवार बनाया गया है। अधीर रंजन चौधरी लंबे समय से इस क्षेत्र में पार्टी का मजबूत चेहरा रहे हैं और उन्होंने पहले ही यहां से चुनाव लड़ने की इच्छा जताई थी। भवानीपुर में त्रिकोणीय मुकाबले की तैयारी भवानीपुर सीट इस बार सबसे हाई-प्रोफाइल सीटों में शामिल हो गई है। यहां मुख्यमंत्री Mamata Banerjee के खिलाफ कांग्रेस ने प्रदीप प्रसाद को मैदान में उतारा है। इस सीट पर नेता प्रतिपक्ष Suvendu Adhikari की मौजूदगी से मुकाबला और भी दिलचस्प होने की संभावना है। अन्य महत्वपूर्ण सीटों पर उम्मीदवार नंदीग्राम से शेख जरियातुल हुसैन को टिकट दिया गया है खड़गपुर सदर में भाजपा नेता Dilip Ghosh के खिलाफ डॉ. पापिया चक्रवर्ती मैदान में हैं संदेशखाली (ST) सीट से युधिष्ठिर भुइयां को उम्मीदवार बनाया गया है डायमंड हार्बर से गौतम भट्टाचार्य, सिंगूर से बरुण कुमार मलिक और रायगंज से मोहित सेनगुप्ता को मौका मिला है क्षेत्रीय समीकरणों पर खास ध्यान कांग्रेस ने अपनी रणनीति में मालदा और मुर्शिदाबाद जैसे पारंपरिक गढ़ों में मुस्लिम उम्मीदवारों और पुराने कार्यकर्ताओं पर भरोसा जताया है। वहीं उत्तर बंगाल की चाय बागान सीटों-जैसे कालचीनी और मदारीहाट-पर जनजातीय चेहरों को प्राथमिकता दी गई है। सिलीगुड़ी से आलोक धारा और दार्जिलिंग से माधव राय को टिकट देकर क्षेत्रीय संतुलन साधने की कोशिश की गई है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस की यह सूची राज्य में पार्टी की मौजूदगी को मजबूत करने और प्रमुख सीटों पर मुकाबले को त्रिकोणीय बनाने की दिशा में अहम कदम साबित हो सकती है।
नई दिल्ली। भारतीय राजनीति में दल-बदल का मुद्दा एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई के विश्लेषण में यह सवाल उठाया गया है कि क्या “कांग्रेस-मुक्त भारत” का नारा अब धीरे-धीरे “कांग्रेस-युक्त बीजेपी” में बदलता जा रहा है। आंकड़े क्या कहते हैं? पिछले एक दशक में 200 से अधिक सांसद और विधायक भारतीय जनता पार्टी में शामिल हुए हैं, जिनमें लगभग 40 प्रतिशत नेता भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से आए हैं। 2024 के आम चुनावों में भी बीजेपी के 100 से ज्यादा उम्मीदवार ऐसे थे, जो पहले अन्य दलों, खासकर कांग्रेस से जुड़े रहे। असम बना सबसे बड़ा उदाहरण असम की राजनीति इस बदलाव की सबसे स्पष्ट तस्वीर पेश करती है। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा खुद कांग्रेस से बीजेपी में आए और आज राज्य में पार्टी के सबसे प्रभावशाली चेहरों में गिने जाते हैं। हाल ही में कांग्रेस सांसद प्रद्युत बोरदोलोई का बीजेपी में शामिल होना भी इसी ट्रेंड का हिस्सा माना जा रहा है। विचारधारा से ज्यादा ‘सत्ता’ का महत्व विश्लेषण में कहा गया है कि अब राजनीति में विचारधारा की जगह सत्ता और अवसरवादिता ने ले ली है। जो नेता कभी बीजेपी की विचारधारा का विरोध करते थे, वही अब उसी का समर्थन करते नजर आते हैं। इससे राजनीतिक सीमाएं पहले की तुलना में कहीं ज्यादा धुंधली हो गई हैं। कांग्रेस की संगठनात्मक कमजोरी कांग्रेस की कमजोर होती संगठनात्मक पकड़ भी इस ट्रेंड की बड़ी वजह मानी जा रही है। कई राज्यों में पार्टी नेतृत्व को बनाए रखने और नए नेताओं को आगे लाने में असफल रही है, जिससे नेताओं के लिए दूसरे विकल्प तलाशना आसान हो गया है। लोकतंत्र पर क्या असर? दल-बदल का यह सिलसिला लोकतंत्र के लिए चुनौती बनता जा रहा है। जब कोई नेता एक पार्टी के टिकट पर जीतकर दूसरी पार्टी में चला जाता है, तो मतदाता का जनादेश कमजोर पड़ता है। हालांकि, कई मामलों में ऐसे नेताओं को दोबारा जीत मिलना यह भी दिखाता है कि मतदाता विकास और सत्ता के करीब रहने को प्राथमिकता दे रहे हैं। समाधान क्या हो सकता है? विशेषज्ञों का मानना है कि दल-बदल रोकने के लिए कड़े नियम जरूरी हैं। जैसे—दल बदलने वाले नेताओं को कुछ समय तक मंत्री बनने से रोकना या एंटी-डिफेक्शन कानून को और सख्त बनाना। लेकिन असली समाधान मजबूत विपक्ष और राजनीतिक सुधारों में ही छिपा है।
कोलकाता: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले सियासी हलचल तेज हो गई है। असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM ने पूर्व टीएमसी नेता हुमांयु कबीर की आम जनता उन्नयन पार्टी के साथ गठबंधन का ऐलान किया है। बुधवार को दोनों नेताओं ने संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में इसकी घोषणा की। भाजपा का हमला इस गठबंधन पर भाजपा नेता दिलीप घोष ने तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा, “ओवैसी लंबे समय से बंगाल में घुसने की कोशिश कर रहे हैं। कई पार्टियां अन्य राज्यों में सफल रही हैं, लेकिन बंगाल के लोग किसी को आसानी से स्वीकार नहीं करते। यहां काम करना पड़ता है, संघर्ष करना पड़ता है, तभी जनता अपनाती है।” ओवैसी का जवाब भाजपा के आरोपों पर ओवैसी ने पलटवार करते हुए कहा, “बंगाल के लोगों का यहां दम घुट रहा है। उन्हें एक नए विकल्प की जरूरत है और हम उन्हें वही विकल्प देने आए हैं।” उन्होंने दावा किया कि उनका गठबंधन राज्य में बदलाव की राजनीति को आगे बढ़ाएगा और जनता को नया विकल्प देगा। चुनावी समीकरण पर असर राजनीतिक जानकारों का मानना है कि AIMIM और आम जनता उन्नयन पार्टी का गठबंधन कुछ सीटों पर मुकाबले को त्रिकोणीय बना सकता है, जिसका असर सीधे तौर पर सत्तारूढ़ टीएमसी और भाजपा दोनों पर पड़ सकता है। तमिलनाडु में चुनाव बहिष्कार का ऐलान इधर तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली जिले के थिरुप्पराईथुराई गांव में 50 से ज्यादा परिवारों ने विधानसभा चुनाव का बहिष्कार करने का ऐलान किया है। स्थानीय लोगों का कहना है कि वे पिछले 16 साल से बुनियादी सुविधाओं-बिजली, पानी और शौचालय-के बिना जीवन बिता रहे हैं। उनका आरोप है कि कई बार शिकायत के बावजूद कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई, इसलिए इस बार उन्होंने वोट न देने का फैसला किया है।
बिहार की राजनीति इन दिनों नए मोड़ पर खड़ी है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के संभावित इस्तीफे और नए चेहरे की चर्चा के बीच सियासी बयानबाज़ी भी तेज हो गई है। इसी क्रम में डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी ने जहानाबाद में एक कार्यक्रम के दौरान नीतीश कुमार की तुलना महाभारत कालीन मगध सम्राट जरासंध से कर दी। इस बयान ने राजनीतिक हलकों में नई बहस छेड़ दी है। सम्राट चौधरी ने न सिर्फ नीतीश कुमार को पंडित चाणक्य जैसी रणनीतिक सोच वाला नेता बताया, बल्कि उन्हें चंद्रगुप्त मौर्य और जरासंध जैसी ऐतिहासिक शख्सियतों की श्रेणी में भी रखा। ऐसे में यह समझना जरूरी हो जाता है कि आखिर जरासंध कौन थे और उनकी तुलना का राजनीतिक अर्थ क्या है। कौन थे जरासंध? महाभारत के अनुसार, जरासंध प्राचीन मगध (आज का बिहार) के एक अत्यंत शक्तिशाली और प्रभावशाली सम्राट थे। उनकी राजधानी राजगृह (आज का राजगीर) थी। वे राजा बृहद्रथ के पुत्र थे और अपनी सैन्य शक्ति तथा रणनीति के लिए प्रसिद्ध थे। जरासंध का नाम विशेष रूप से इसलिए भी चर्चित है क्योंकि वे भगवान श्रीकृष्ण के सबसे बड़े विरोधियों में गिने जाते थे। श्रीकृष्ण से दुश्मनी की वजह जरासंध की श्रीकृष्ण से दुश्मनी का मुख्य कारण पारिवारिक संबंध था। दरअसल, वे मथुरा के राजा कंस के ससुर थे। जब श्रीकृष्ण ने कंस का वध किया, तो जरासंध ने इसे व्यक्तिगत अपमान माना और कृष्ण के खिलाफ कई बार युद्ध छेड़ा। कहा जाता है कि जरासंध ने बार-बार मथुरा पर आक्रमण कर श्रीकृष्ण को चुनौती दी और उन्हें काफी समय तक परेशान किया। शक्ति और महत्वाकांक्षा जरासंध सिर्फ एक योद्धा ही नहीं, बल्कि चक्रवर्ती सम्राट बनने की महत्वाकांक्षा रखने वाले शासक थे। उन्होंने 99 राजाओं को बंदी बनाकर रखा था, ताकि एक विशेष यज्ञ के जरिए अपनी सार्वभौमिक सत्ता स्थापित कर सकें। हालांकि, उन्होंने इन राजाओं की हत्या नहीं की थी। कैसे हुई जरासंध की मृत्यु? महाभारत के अनुसार, जरासंध की शक्ति को खत्म करना श्रीकृष्ण के लिए जरूरी हो गया था। इसके लिए उन्होंने भीम को मल्लयुद्ध के लिए आगे किया। राजगीर के अखाड़े में भीम और जरासंध के बीच लंबा और भीषण युद्ध हुआ। अंततः श्रीकृष्ण की रणनीति से भीम ने जरासंध के शरीर के दो हिस्से कर उन्हें विपरीत दिशाओं में फेंक दिया, जिससे उनकी मृत्यु हो गई। इसके बाद उनके पुत्र सहदेव को मगध का राजा बनाया गया। बिहार की राजनीति में जरासंध का जिक्र क्यों? हाल के वर्षों में बिहार की सांस्कृतिक और राजनीतिक पहचान में जरासंध का नाम फिर से प्रमुखता से उभरा है। 2025 में नीतीश कुमार ने राजगीर में 21 फीट ऊंची जरासंध की प्रतिमा का अनावरण किया था। यह स्मारक करीब 15 करोड़ रुपये की लागत से बना है। राजगीर स्थित जरासंध स्मृति पार्क में उनके जीवन और युद्धों को भित्तिचित्रों के माध्यम से दर्शाया गया है। इसके अलावा, राज्य में “जरासंध महोत्सव” का भी आयोजन किया जा रहा है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि यह ऐतिहासिक पात्र अब राजनीतिक विमर्श का भी हिस्सा बन चुका है। सियासी संकेत क्या हैं? सम्राट चौधरी द्वारा की गई यह तुलना केवल ऐतिहासिक संदर्भ नहीं, बल्कि एक राजनीतिक संकेत भी मानी जा रही है। बिहार में नेतृत्व परिवर्तन की अटकलों के बीच यह बयान इस ओर इशारा करता है कि सत्ता हस्तांतरण की जमीन तैयार हो रही है। करीब दो दशकों तक मुख्यमंत्री रहे नीतीश कुमार के संभावित पदत्याग के बाद बिहार की राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।
आदिवासी मुद्दों पर स्थानीय नेतृत्व को बताया अहम, कांग्रेस-जेएमएम गठबंधन पर भी कसा तंज असम विधानसभा चुनाव को लेकर झारखंड की सियासत में हलचल तेज हो गई है। जदयू नेता और जमशेदपुर पूर्वी के विधायक सरयू राय ने झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कई अहम टिप्पणियां की हैं। वे आईआईटी (आईएसएम) धनबाद में विश्व जल दिवस के कार्यक्रम में शामिल होने पहुंचे थे, जहां मीडिया से बातचीत में उन्होंने यह बयान दिया। “स्थानीय मुद्दे ही तय करते हैं चुनाव” सरयू राय ने कहा कि असम के आदिवासी भले ही झारखंड या ओडिशा से गए हों, लेकिन अब वे पूरी तरह स्थानीय समाज में घुल-मिल चुके हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि वहां के मतदाता बाहरी हस्तक्षेप के बजाय स्थानीय मुद्दों और नेतृत्व को प्राथमिकता देते हैं। ऐसे में बाहरी राजनीतिक दलों की भूमिका सीमित रह सकती है। हेमंत सोरेन के दौरे पर उठाए सवाल राय ने झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के असम दौरे को लेकर भी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि यह कदम “बदले की राजनीति” का हिस्सा हो सकता है। उनके मुताबिक, असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा पहले झारखंड आ चुके हैं, ऐसे में यह राजनीतिक प्रतिक्रिया के तौर पर देखा जा सकता है। कांग्रेस-जेएमएम गठबंधन पर तंज असम चुनाव में संभावित कांग्रेस-जेएमएम गठबंधन को लेकर भी सरयू राय ने कटाक्ष किया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस इतनी “दिमागी दिवालिया” नहीं है कि बिना सोचे-समझे हवा का रुख देखकर गठबंधन कर ले। हेमंत सोरेन पर नरम रुख भी हालांकि, सरयू राय ने यह भी कहा कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की पूरी तरह आलोचना करना सही नहीं होगा। उन्होंने माना कि सोरेन संभवतः असम में रह रहे आदिवासी समुदाय के मुद्दों को उठाकर राजनीतिक आधार मजबूत करना चाहते हैं और अन्य राज्यों में जीत हासिल कर अपनी पार्टी को राष्ट्रीय पहचान दिलाने की कोशिश कर रहे हैं।
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में इस बार मुकाबला सिर्फ रैलियों और जनसभाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भी जबरदस्त लड़ाई देखने को मिल रही है। सत्ताधारी All India Trinamool Congress (TMC) ने Bharatiya Janata Party (BJP) के डिजिटल अभियान का मुकाबला करने के लिए बड़े पैमाने पर रणनीति तैयार की है। 1.5 लाख WhatsApp ग्रुप, 1 करोड़ लोगों तक पहुंच मुख्यमंत्री Mamata Banerjee की पार्टी ने राज्यभर में 1.5 लाख से ज्यादा WhatsApp ग्रुप बनाए हैं, जिनसे 1 करोड़ से अधिक लोगों को जोड़ा गया है। इन ग्रुप्स के जरिए चुनावी संदेश, वीडियो और कंटेंट तेज़ी से लोगों तक पहुंचाया जा रहा है। TMC का फोकस इस बार डिजिटल स्तर पर लोकल नेटवर्क मजबूत करने पर है, जबकि BJP का अभियान अधिकतर केंद्रीय स्तर से संचालित बताया जा रहा है। ‘Didir Doot’ ऐप बना डिजिटल हथियार TMC अपने ‘Didir Doot’ ऐप के जरिए कार्यकर्ताओं और समर्थकों को जोड़ने में जुटी है। 18 लाख से ज्यादा डाउनलोड 1.3 लाख डेली एक्टिव यूजर्स 7.3 लाख मंथली एक्टिव यूजर्स इस ऐप के जरिए यूजर्स को टास्क, रियल-टाइम अपडेट, क्विज़ और इंटरैक्टिव फीचर्स दिए जाते हैं, ताकि वे लगातार चुनाव प्रचार से जुड़े रहें। 10 हजार रील्स और सोशल मीडिया इकोसिस्टम TMC का डिजिटल कैंपेन अब बड़े पैमाने पर कंटेंट प्रोडक्शन पर आधारित है। 10,000+ रील्स और शॉर्ट वीडियो 5,000+ सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स 50+ डिजिटल प्रवक्ता 1.6 लाख वॉलंटियर्स का नेटवर्क (‘ABDJ’) यह पूरा इकोसिस्टम रोज़ाना करीब 50 करोड़ इम्प्रेशन जनरेट करने का दावा करता है। ‘बंगाली अस्मिता’ पर फोकस TMC अपने डिजिटल कैंपेन में ‘बंगाली पहचान’ और ‘स्थानीय गौरव’ को प्रमुख मुद्दा बना रही है। पार्टी का संदेश है कि बाहरी ताकतें बंगाल की संस्कृति और पहचान को प्रभावित करना चाहती हैं, जबकि TMC खुद को ‘बंगाल की असली आवाज़’ के रूप में पेश कर रही है। कल्याणकारी योजनाओं का आक्रामक प्रचार TMC अपने शासन के दौरान चलाई गई योजनाओं को भी डिजिटल अभियान में प्रमुखता से दिखा रही है, खासकर ‘लक्ष्मी भंडार’ जैसी योजनाएं, जिनके जरिए महिलाओं को आर्थिक सहायता दी जाती है। पार्टी इन योजनाओं को अपनी सबसे बड़ी ताकत मानते हुए लगातार प्रचार कर रही है। BJP vs TMC: डिजिटल जंग तेज जहां BJP का अभियान राष्ट्रीय स्तर पर रणनीतिक तरीके से चलाया जा रहा है, वहीं TMC इसे जमीनी स्तर तक ले जाकर लोकल कनेक्शन मजबूत करने की कोशिश कर रही है। TMC आईटी सेल के अनुसार, पार्टी ने पिछली चुनावी गलतियों से सीख लेते हुए इस बार ज्यादा आक्रामक और संगठित डिजिटल रणनीति बनाई है। पश्चिम बंगाल चुनाव 2026 में डिजिटल प्लेटफॉर्म अब निर्णायक भूमिका निभा सकता है। TMC का यह विशाल डिजिटल नेटवर्क और लोकल अप्रोच BJP के लिए कड़ी चुनौती बन सकता है, लेकिन असली फैसला जनता के वोट से ही होगा।
पिता योगेंद्र साव के निष्कासन से भड़कीं अंबा, बोलीं– एकतरफा कार्रवाई, न्याय के लिए जाएंगी केंद्रीय नेतृत्व के पास झारखंड की राजनीति में इन दिनों घमासान तेज हो गया है। कांग्रेस की पूर्व विधायक और राष्ट्रीय सचिव अंबा प्रसाद ने पार्टी के खिलाफ खुलकर बगावती रुख अपना लिया है। उन्होंने न केवल प्रदेश कांग्रेस नेतृत्व बल्कि राज्य की गठबंधन सरकार पर भी गंभीर आरोप लगाए हैं। यह विवाद तब और बढ़ गया जब उनके पिता और पूर्व मंत्री योगेंद्र साव को पार्टी से निष्कासित कर दिया गया। “कार्रवाई पूरी तरह एकतरफा” अंबा प्रसाद ने प्रेस वार्ता में कहा कि उनके पिता के खिलाफ की गई कार्रवाई पूरी तरह से एकतरफा और दबाव में ली गई है। उनका आरोप है कि न तो कोई नोटिस दिया गया और न ही पक्ष रखने का मौका मिला। उन्होंने प्रदेश नेतृत्व के उस दावे को भी खारिज किया जिसमें चेतावनी दिए जाने की बात कही गई थी। 3 साल के लिए पार्टी से बाहर योगेंद्र साव झारखंड प्रदेश कांग्रेस कमेटी ने 20 मार्च को योगेंद्र साव को अनुशासनहीनता के आरोप में तीन वर्षों के लिए पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से निष्कासित कर दिया था। पार्टी के अनुसार, उन्होंने सोशल मीडिया और फेसबुक लाइव के जरिए मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और गठबंधन सरकार के खिलाफ बयानबाजी की, जो संगठनात्मक नियमों के खिलाफ है। घर तोड़े जाने से बढ़ा विवाद अंबा प्रसाद ने बड़कागांव स्थित चट्टी बरियातू कोल माइंस परियोजना क्षेत्र में उनके आवास को बुलडोजर से गिराए जाने का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने इस कार्रवाई को “तुगलकी फरमान” बताते हुए कहा कि बिना उचित मुआवजा और न्यायिक प्रक्रिया पूरी हुए उनके घर को ध्वस्त किया गया, जिससे परिवार को गहरा आघात पहुंचा है। जांच रिपोर्ट पर उठाए सवाल उन्होंने यह भी सवाल खड़ा किया कि मामले की जांच के लिए बनाई गई कमेटी की रिपोर्ट अब तक सार्वजनिक क्यों नहीं की गई। अंबा प्रसाद ने कांग्रेस नेतृत्व, गठबंधन सरकार, पुलिस-प्रशासन और NTPC Limited पर निशाना साधते हुए कहा कि उनका परिवार लंबे समय से टारगेट किया जा रहा है। “धमकियां मिलीं, करियर खत्म करने की कोशिश” अंबा प्रसाद ने दावा किया कि उनके पिता को लगातार धमकियां दी गईं और उनका राजनीतिक करियर खत्म करने की साजिश रची गई। उन्होंने कहा कि निष्कासन का फैसला दबाव में लिया गया है। केंद्रीय नेतृत्व से करेंगी न्याय की मांग उन्होंने साफ किया कि इस पूरे मामले को लेकर वे कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व के पास जाएंगी और न्याय की मांग करेंगी।
असम विधानसभा चुनाव 2026 को लेकर सियासी तस्वीर अब साफ होती नजर आ रही है। झारखंड में साथ मिलकर सरकार चला रहे झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस अब असम में आमने-सामने होंगे। लंबे समय से जारी सीट बंटवारे की बातचीत विफल होने के बाद झामुमो ने राज्य में अकेले चुनाव लड़ने का बड़ा फैसला लिया है। पार्टी के महासचिव और प्रवक्ता विनोद पांडेय ने स्पष्ट किया कि कांग्रेस के साथ सम्मानजनक समझौता नहीं हो सका, इसलिए अब झामुमो 19 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारेगा, जबकि एक सीट वाम दलों के लिए छोड़ी गई है। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब दोनों दलों के बीच कई दौर की बातचीत के बावजूद सहमति नहीं बन पाई। दिल्ली से रांची तक चली बातचीत, लेकिन नहीं बनी बात झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन खुद दिल्ली जाकर कांग्रेस नेतृत्व से मिले थे। वहीं असम कांग्रेस के प्रभारी भंवर जितेंद्र सिंह और प्रदेश अध्यक्ष गौरव गोगोई रांची पहुंचकर वार्ता कर चुके थे। इसके बावजूद सीट शेयरिंग पर सहमति नहीं बन सकी। सूत्रों के मुताबिक, कांग्रेस झामुमो को पांच से अधिक सीटें देने के पक्ष में नहीं थी, जबकि झामुमो ज्यादा हिस्सेदारी चाहता था। आदिवासी और टी-ट्राइब वोट पर झामुमो की नजर असम की 126 सदस्यीय विधानसभा में 19 सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं। झामुमो अपनी रणनीति इन्हीं सीटों पर केंद्रित कर रहा है। पार्टी का मानना है कि झारखंड में आदिवासी राजनीति का अनुभव असम में भी असर दिखा सकता है। साथ ही, चाय बागान (टी-ट्राइब) समुदाय को साधने की भी कोशिश की जा रही है, जो राज्य की राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाता है। ‘तीर-कमान’ के साथ चुनावी मैदान में निर्वाचन आयोग से झामुमो को असम में भी उसका पारंपरिक चुनाव चिन्ह ‘तीर-कमान’ मिल चुका है। फिलहाल राज्य में भारतीय जनता पार्टी की सरकार है, जबकि कांग्रेस मुख्य विपक्षी दल है। झामुमो नेताओं का दावा है कि वे इस चुनाव में मजबूती से उतरेंगे और असम की राजनीति में अपनी ठोस उपस्थिति दर्ज कराएंगे।
बिहार में हाल ही में हुए राज्यसभा चुनाव ने सियासी समीकरण पूरी तरह बदल दिए हैं। पांच सीटों के लिए हुए इस चुनाव में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) ने सभी सीटों पर कब्जा जमा लिया। जहां चार सीटों पर NDA की जीत पहले से तय मानी जा रही थी, वहीं पांचवीं सीट का विपक्ष के हाथ से निकलना कई सवाल खड़े कर गया। इस हार के पीछे कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के कुछ विधायकों की गैरमौजूदगी अहम कारण बनी। खासकर RJD विधायक फैसल रहमान का वोटिंग से दूर रहना पार्टी के लिए बड़ा झटका साबित हुआ। RJD विधायक की ‘चुप्पी वाली बगावत’ ने बढ़ाई परेशानी राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस के तीन विधायकों ने मतदान नहीं किया, जिसकी आशंका पहले से जताई जा रही थी। लेकिन RJD के 25 में से एक विधायक फैसल रहमान का वोट न देना अप्रत्याशित रहा। पूर्वी चंपारण के ढाका सीट से विधायक रहमान मतदान के दिन अचानक गायब रहे। देर शाम तक उनका इंतजार होता रहा, लेकिन वे वोट देने नहीं पहुंचे। इस घटना ने पार्टी के भीतर अनुशासन और एकजुटता पर सवाल खड़े कर दिए। बीमारी का बहाना या सियासी रणनीति? फैसल रहमान ने बाद में सफाई देते हुए कहा कि उनकी मां दिल्ली के एक अस्पताल में भर्ती थीं, जिस कारण उन्हें अचानक जाना पड़ा। उन्होंने यह भी दावा किया कि वे पटना आए थे, लेकिन हालात बिगड़ने पर वापस लौट गए। हालांकि, उनकी इस सफाई पर विपक्षी दलों और खुद पार्टी के भीतर भी संदेह जताया जा रहा है। रहमान ने आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि उन्हें खरीदने की किसी की हैसियत नहीं है। तेजस्वी यादव की बढ़ी मुश्किलें इस पूरे घटनाक्रम ने RJD नेता Tejashwi Yadav की स्थिति को असहज बना दिया है। पार्टी उम्मीदवार को वोट न मिलने से उनकी राजनीतिक साख पर असर पड़ा है। सामान्य परिस्थितियों में ऐसे मामले में पार्टी विधायक के खिलाफ कड़ी कार्रवाई कर सकती थी, लेकिन इस बार मामला इतना आसान नहीं है। क्यों नहीं कर सकते कोई सख्त कार्रवाई? दरअसल, बिहार विधानसभा में RJD की संख्या बेहद सीमित है। कुल 243 सदस्यीय सदन में पार्टी के पास ठीक 25 विधायक हैं, जो विपक्ष के नेता का पद बनाए रखने के लिए न्यूनतम जरूरी संख्या (10%) है। यदि पार्टी का एक भी विधायक कम होता है, तो Tejashwi Yadav विपक्ष के नेता का दर्जा खो सकते हैं। ऐसे में फैसल रहमान के खिलाफ कार्रवाई करना खुद पार्टी के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है। राजनीतिक मजबूरी में फंसे तेजस्वी फैसल रहमान की गैरमौजूदगी ने RJD को नुकसान तो पहुंचाया, लेकिन अब वे पार्टी के लिए ऐसी ‘गले की हड्डी’ बन गए हैं, जिसे न हटाया जा सकता है और न नजरअंदाज किया जा सकता है। अगर उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई होती है, तो इसका सीधा असर पार्टी की विधानसभा में स्थिति पर पड़ेगा। यही वजह है कि तमाम नाराजगी के बावजूद नेतृत्व फिलहाल चुप्पी साधे हुए है।
केरल विधानसभा चुनाव से ठीक पहले आई एक रिपोर्ट ने राजनीतिक माहौल को गरमा दिया है। Association for Democratic Reforms (ADR) और केरल इलेक्शन वॉच की ताजा रिपोर्ट में चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं, जिनसे राज्य की राजनीति और जनप्रतिनिधियों की प्रोफाइल पर गंभीर सवाल उठने लगे हैं। 70% विधायकों पर आपराधिक मामले रिपोर्ट के मुताबिक, Kerala के कुल 132 विधायकों में से 92 (लगभग 70%) ने अपने खिलाफ आपराधिक मामलों की जानकारी हलफनामे में दी है। इनमें से 33 विधायक (करीब 25%) ऐसे हैं, जिन पर गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हैं, जिनमें हत्या और हत्या के प्रयास जैसे आरोप शामिल हैं। 2 विधायकों पर हत्या (IPC 302) के मामले 3 विधायकों पर हत्या के प्रयास (IPC 307) 3 विधायकों पर महिलाओं के खिलाफ अपराध, जिनमें एक मामला रेप से जुड़ा ये आंकड़े लोकतांत्रिक व्यवस्था में उम्मीदवारों की पृष्ठभूमि पर गंभीर बहस को जन्म देते हैं। किस पार्टी के खिलाफ सबसे ज्यादा मामले? पार्टीवार आंकड़ों में भी स्थिति चिंताजनक है: Communist Party of India (Marxist): 74% विधायक Indian National Congress: 90% विधायक Communist Party of India: 44% विधायक Indian Union Muslim League: 86% विधायक यह आंकड़े बताते हैं कि लगभग सभी प्रमुख दलों में आपराधिक मामलों वाले नेताओं की मौजूदगी है। आधे से ज्यादा विधायक करोड़पति रिपोर्ट में विधायकों की संपत्ति को लेकर भी बड़ा खुलासा हुआ है। कुल संपत्ति: ₹363.78 करोड़ औसत संपत्ति: ₹2.75 करोड़ प्रति विधायक 72 विधायक (55%) करोड़पति कुछ दलों में तो सभी विधायक करोड़पति हैं, जैसे केरल कांग्रेस (M), JD(S), NCP और केरल कांग्रेस। सबसे अमीर और सबसे कम संपत्ति वाले विधायक सबसे अमीर: Mathew Kuzhalnadan (कांग्रेस) – ₹34 करोड़+ दूसरे: Mani C Kappan – ₹27 करोड़+ तीसरे: KB Ganesh Kumar – ₹19 करोड़+ वहीं, PP Sumod (CPI-M) ने सबसे कम संपत्ति, करीब ₹9.9 लाख घोषित की है। शिक्षा, महिला प्रतिनिधित्व और उम्र का आंकड़ा 61% विधायक ग्रेजुएट या उससे अधिक शिक्षित 36% ने 5वीं से 12वीं तक पढ़ाई की केवल 11 महिला विधायक (8%) 70% विधायक 51–80 वर्ष आयु वर्ग में ये आंकड़े दिखाते हैं कि शिक्षा के स्तर में सुधार के बावजूद महिला प्रतिनिधित्व अभी भी बेहद कम है। क्या कहती है यह रिपोर्ट? Association for Democratic Reforms की यह रिपोर्ट साफ संकेत देती है कि राजनीति में आपराधिक छवि और धनबल का प्रभाव अभी भी मजबूत है। चुनाव से पहले यह रिपोर्ट मतदाताओं के लिए एक अहम संकेत है कि वे उम्मीदवारों के चयन में अधिक जागरूक रहें।
राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने अपने विदाई भाषण में जहां 54 वर्षों के लंबे संसदीय अनुभव को साझा किया, वहीं माहौल को हल्का बनाने वाला एक बयान भी दे दिया, जिस पर सदन में मुस्कान छा गई-यहां तक कि नरेंद्र मोदी भी हंसी नहीं रोक सके। खड़गे ने अपने संबोधन की शुरुआत भावुक अंदाज़ में करते हुए कहा कि विदाई का पल हमेशा कठिन होता है, लेकिन सार्वजनिक जीवन में कोई भी व्यक्ति वास्तव में “रिटायर” नहीं होता। उन्होंने माना कि दशकों के अनुभव के बाद भी सीखने की प्रक्रिया कभी खत्म नहीं होती। हल्के अंदाज़ में सियासी टिप्पणी अपने भाषण के दौरान खड़गे ने पूर्व प्रधानमंत्री एच.डी. देवगौड़ा का जिक्र करते हुए चुटकी ली- “देवगौड़ा जी ने मोहब्बत हमसे की और शादी मोदी जी के साथ कर ली।” उनकी इस टिप्पणी पर सदन में ठहाके गूंज उठे और माहौल कुछ देर के लिए हल्का हो गया। साथियों के योगदान का जिक्र खड़गे ने कई वरिष्ठ सांसदों के योगदान को याद किया। उन्होंने रामदास अठावले की खास शैली और कविताओं का उल्लेख किया, वहीं शक्ति सिंह गोहिल और नीरज डांगी जैसे साथियों की तैयारी और सक्रियता की सराहना की। संसदीय मर्यादा पर जोर अपने भाषण के अंत में खड़गे ने सदन में सहयोग और शालीनता की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि संवाद और आपसी समझ ही संसदीय लोकतंत्र को मजबूत बनाते हैं, जबकि दूरी और टकराव से गलतफहमियां बढ़ती हैं। गौरतलब है कि राज्यसभा के 37 सदस्यों का कार्यकाल समाप्त हो रहा है। इस मौके पर खड़गे ने उम्मीद जताई कि जाने वाले सदस्य आगे भी लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूत करने में योगदान देते रहेंगे।
पटना: बिहार में हाल ही में हुए राज्यसभा चुनाव के नतीजों के बाद सियासत गरमा गई है। राजद उम्मीदवार अमरेंद्र धारी सिंह की हार के बाद अब कांग्रेस के भीतर ही मतभेद खुलकर सामने आने लगे हैं। वोटिंग से गैरहाजिर रहे तीन कांग्रेस विधायकों में से एक मनोज विश्वास ने मीडिया के सामने आकर बड़ा बयान दिया है। वोटिंग से दूरी पर कांग्रेस विधायक का बड़ा खुलासा 16 मार्च को हुई वोटिंग में कांग्रेस के तीन विधायक-मनिहारी से मनोहर सिंह, फारबिसगंज से मनोज विश्वास और वाल्मीकिनगर से सुरेंद्र कुशवाहा-ने मतदान नहीं किया था। अब मनोज विश्वास ने साफ कहा कि उम्मीदवार चयन में पार्टी के प्रदेश नेतृत्व की अनदेखी की गई, जिसके चलते यह स्थिति बनी। “नेतृत्व का सम्मान नहीं, तो वोट क्यों दें?” विधायक मनोज विश्वास ने आरोप लगाया कि उम्मीदवार चयन में न तो प्रदेश अध्यक्ष की भूमिका रही और न ही स्थानीय नेताओं को विश्वास में लिया गया। उनका कहना था कि जब पार्टी के नेताओं को ही महत्व नहीं दिया गया, तो विधायकों को वोट देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। अंतिम समय में उम्मीदवार बदलने पर नाराजगी उन्होंने दावा किया कि पहले किसी अन्य नाम पर चर्चा चल रही थी, लेकिन अंतिम समय में अचानक अमरेंद्र धारी सिंह को उम्मीदवार बना दिया गया, जिनका राजनीतिक अनुभव सीमित है। इस फैसले से कई विधायकों में असंतोष पैदा हुआ। प्रदेश अध्यक्ष पर ही उठाए सवाल अपने बयान में मनोज विश्वास ने सीधे तौर पर राजेश राम को निशाने पर लिया। उन्होंने कहा कि चुनाव के दौरान पार्टी के शीर्ष नेताओं को पूरी तरह शामिल नहीं किया गया, जिससे कार्यकर्ताओं और विधायकों में भ्रम की स्थिति बनी रही। “हमें स्वतंत्र निर्णय लेने को कहा गया” विधायक ने यह भी कहा कि पार्टी नेतृत्व की ओर से स्पष्ट निर्देश नहीं मिला, बल्कि विधायकों को अपने विवेक से निर्णय लेने को कहा गया। ऐसे में उन्होंने मतदान से दूरी बनाई। राजद की हार के बाद बढ़ा राजनीतिक दबाव इस पूरे घटनाक्रम के बाद विपक्षी गठबंधन में दरार की चर्चाएं तेज हो गई हैं। तेजस्वी यादव की रणनीति पर भी सवाल उठ रहे हैं कि आखिर उम्मीदवार चयन और सहयोगी दलों के साथ समन्वय में कहां चूक हुई। दल के प्रति निष्ठा पर भी दी सफाई हालांकि, मनोज विश्वास ने यह भी स्पष्ट किया कि उन्होंने पार्टी के साथ कोई गलत नहीं किया है और आगे भी कांग्रेस के साथ मजबूती से खड़े रहेंगे। उन्होंने कहा कि पार्टी हमेशा वंचित, अल्पसंख्यक और कमजोर वर्गों की आवाज उठाती रही है, लेकिन उम्मीदवार चयन में इन मूल्यों को नजरअंदाज किया गया। सियासी असर दूर तक संभव बिहार की राजनीति में यह बयान किसी ‘सियासी विस्फोट’ से कम नहीं माना जा रहा है। आने वाले दिनों में इसका असर गठबंधन की रणनीति और आंतरिक समीकरणों पर साफ दिखाई दे सकता है।
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
UPSC CSE Result 2025: देश की सबसे प्रतिष्ठित परीक्षाओं में से एक Civil Services Examination का अंतिम परिणाम जारी कर दिया गया है। Union Public Service Commission ने शुक्रवार 6 मार्च 2026 को UPSC सिविल सेवा परीक्षा 2025 का फाइनल रिजल्ट घोषित किया। इस परीक्षा में अनुज अग्निहोत्री ने पहला स्थान हासिल किया है। परीक्षा में शामिल हुए उम्मीदवार अब आयोग की आधिकारिक वेबसाइट UPSC Official Website पर जाकर फाइनल मेरिट लिस्ट देख सकते हैं। 958 उम्मीदवारों का हुआ चयन यूपीएससी द्वारा जारी फाइनल रिजल्ट के अनुसार इस वर्ष कुल 958 उम्मीदवारों ने सफलता हासिल की है। चयनित उम्मीदवारों की नियुक्ति विभिन्न केंद्रीय सेवाओं में उनकी रैंक और पसंद के आधार पर की जाएगी। फाइनल रिजल्ट उम्मीदवारों के लिखित परीक्षा (Main Exam) और पर्सनैलिटी टेस्ट (Interview) में प्रदर्शन के आधार पर तैयार किया गया है। इन प्रतिष्ठित सेवाओं के लिए होता है चयन यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा के माध्यम से देश की कई प्रतिष्ठित सेवाओं के लिए अधिकारियों का चयन किया जाता है। इनमें प्रमुख रूप से शामिल हैं— भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) भारतीय पुलिस सेवा (IPS) भारतीय विदेश सेवा (IFS) भारतीय राजस्व सेवा (IRS) भारतीय व्यापार सेवा सहित अन्य ग्रुप A और ग्रुप B सेवाएं 979 पदों को भरने का लक्ष्य सिविल सेवा परीक्षा 2025 के माध्यम से केंद्र सरकार के विभिन्न विभागों में कुल 979 रिक्त पदों को भरा जाना है। ऐसे चेक करें UPSC CSE 2025 का रिजल्ट उम्मीदवार नीचे दिए गए स्टेप्स के माध्यम से अपना रिजल्ट देख सकते हैं— आधिकारिक वेबसाइट upsc.gov.in पर जाएं होमपेज पर “Examination” टैब पर क्लिक करें “Active Examinations” या “What’s New” सेक्शन में जाएं Civil Services Examination Final Result 2025 लिंक पर क्लिक करें मेरिट लिस्ट की PDF खुल जाएगी Ctrl + F दबाकर अपना नाम या रोल नंबर सर्च करें 15 दिन में जारी होगी मार्कशीट यूपीएससी के अनुसार सभी उम्मीदवारों की मार्कशीट रिजल्ट जारी होने के 15 दिनों के भीतर आयोग की वेबसाइट पर अपलोड कर दी जाएगी। उम्मीदवार इसे 30 दिनों तक ऑनलाइन डाउनलोड कर सकेंगे। पिछले साल का कट-ऑफ पिछले वर्ष का अंतिम कट-ऑफ इस प्रकार था— जनरल: 87.98 EWS: 85.92 OBC: 87.28 SC: 79.03 ST: 74.23 आयु सीमा क्या है यूपीएससी की अधिसूचना के अनुसार उम्मीदवार की आयु 1 अगस्त 2024 तक कम से कम 21 वर्ष और अधिकतम 32 वर्ष होनी चाहिए। यानी उम्मीदवार का जन्म 2 अगस्त 1992 से 1 अगस्त 2003 के बीच होना चाहिए। यूपीएससी सिविल सेवा परीक्षा भारत की सबसे कठिन और प्रतिष्ठित प्रतियोगी परीक्षाओं में से एक मानी जाती है। हर साल लाखों उम्मीदवार इस परीक्षा में शामिल होते हैं, लेकिन तीन चरणों—प्रारंभिक परीक्षा, मुख्य परीक्षा और इंटरव्यू—को पार कर बहुत कम उम्मीदवार ही अंतिम सूची में जगह बना पाते हैं। UPSC CSE 2025 टॉप-20 उम्मीदवारों की सूची रैंक रोल नंबर नाम 1 1131589 अनुज अग्निहोत्री 2 4000040 राजेश्वरी सुवे एम 3 3512521 अकांश ढुल 4 0834732 राघव झुनझुनवाला 5 0409847 ईशान भटनागर 6 6410067 जिनिया अरोड़ा 7 0818306 ए आर राजा मोहिद्दीन 8 0843487 पक्षल सेक्रेटरी 9 0831647 आस्था जैन 10 1523945 उज्ज्वल प्रियांक 11 1512091 यशस्वी राज वर्धन 12 0840280 अक्षित भारद्वाज 13 7813999 अनन्या शर्मा 14 5402316 सुरभि यादव 15 3507500 सिमरनदीप कौर 16 0867445 मोनिका श्रीवास्तव 17 0829589 चितवन जैन 18 5604518 श्रुति आर 19 0105602 निसार दिशांत अमृतलाल 20 6630448 रवि राज