Public Health

Hepatitis C medicine packaging representing patent dispute over affordable generic drug access in India.
अमेरिकी दवा कंपनी को झटका, भारत ने हेपेटाइटिस C कॉम्बो थेरेपी पर पेटेंट देने से किया इनकार

भारतीय पेटेंट कार्यालय ने अमेरिकी दवा कंपनी AbbVie को बड़ा झटका देते हुए हेपेटाइटिस C के इलाज में इस्तेमाल होने वाली कॉम्बो थेरेपी glecaprevir/pibrentasvir पर पेटेंट देने से इनकार कर दिया है। इस फैसले को सार्वजनिक स्वास्थ्य और सस्ती दवाओं की उपलब्धता के लिहाज से अहम माना जा रहा है।  इस निर्णय से मरीजों को दवा के सस्ते और जेनेरिक विकल्प उपलब्ध हो सकेंगे, जिससे इलाज अधिक लोगों की पहुंच में आ पाएगा। पब्लिक हेल्थ ग्रुप्स ने फैसले का किया स्वागत पब्लिक हेल्थ एडवोकेसी संगठन Third World Network ने भारतीय पेटेंट कार्यालय के फैसले का स्वागत किया है। संगठन ने कहा कि यह आदेश भारत के पेटेंट सुरक्षा प्रावधानों की अहमियत को दर्शाता है, खासकर “प्री-ग्रांट अपोजिशन” जैसी व्यवस्था की, जो गैर-जरूरी पेटेंट एकाधिकारों को रोकने में मदद करती है। संगठन के अनुसार, ऐसे पेटेंट कई बार जरूरी दवाओं की उपलब्धता और उनकी सस्ती पहुंच में बाधा बनते हैं। हेपेटाइटिस C इलाज में अहम है यह थेरेपी AbbVie जिस कॉम्बो थेरेपी के लिए पेटेंट मांग रही थी, उसे हेपेटाइटिस C के इलाज का एक प्रभावी तरीका माना जाता है। यह दवा दुनिया भर में Mavyret नाम से बेची जाती है। विशेषज्ञों के अनुसार, यदि इस दवा पर पेटेंट मिल जाता तो कंपनी का बाजार पर एकाधिकार मजबूत हो सकता था, जिससे जेनेरिक दवाओं के उत्पादन और उपलब्धता पर असर पड़ता। भारतीय पेटेंट कार्यालय ने क्या कहा? भारतीय पेटेंट कार्यालय ने पेटेंट अधिनियम की धारा 15 के तहत आवेदन को खारिज किया है। आदेश में कहा गया कि कंपनी की ओर से आवश्यक जवाब या पर्याप्त साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किए गए। बाद में AbbVie ने पेटेंट कार्यालय को आवेदन वापस लेने की जानकारी भी दे दी। मरीजों को होगा फायदा स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले से भारत में हेपेटाइटिस C के मरीजों के लिए सस्ती दवाओं का रास्ता खुला रहेगा। भारत लंबे समय से जेनेरिक दवाओं के बड़े उत्पादक के रूप में जाना जाता है और ऐसे फैसले सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।  

surbhi मई 19, 2026 0
Glass of alcohol with warning symbol indicating increased uric acid and gout risk from drinking
शराब का हर स्तर बन सकता है खतरा: नई स्टडी में हाइपरयूरिसीमिया के बढ़ते जोखिम का खुलासा

नई रिसर्च ने शराब सेवन को लेकर एक अहम चेतावनी दी है। अध्ययन के अनुसार, कम या कभी-कभार शराब पीना भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं माना जा सकता, क्योंकि इससे Hyperuricaemia का खतरा बढ़ सकता है। यह स्थिति शरीर में यूरिक एसिड के बढ़े स्तर को दर्शाती है, जो आगे चलकर गठिया (गाउट) और हृदय व मेटाबॉलिक बीमारियों का कारण बन सकती है। क्या है स्टडी का आधार? यह एक बड़े स्तर का रेट्रोस्पेक्टिव कोहोर्ट अध्ययन था, जिसमें 5,153 जापानी प्रतिभागियों के डेटा का विश्लेषण किया गया। इन सभी में शुरुआत में हाइपरयूरिसीमिया नहीं था और इन्हें औसतन 5.5 वर्षों तक फॉलो किया गया। शराब और जोखिम का सीधा संबंध अध्ययन में पाया गया कि जैसे-जैसे शराब की मात्रा बढ़ती है, वैसे-वैसे हाइपरयूरिसीमिया का जोखिम भी बढ़ता जाता है। पुरुषों में: न पीने वालों में दर: 33.7 प्रति 1,000 व्यक्ति-वर्ष रोजाना 66 ग्राम या अधिक सेवन करने वालों में: 92.7 महिलाओं में: न पीने वालों में दर: 6.1 ज्यादा सेवन करने वालों में: 13.4 सबसे अहम बात यह रही कि कम या कभी-कभार शराब पीने वालों में भी जोखिम बढ़ा हुआ पाया गया। डोज-डिपेंडेंट असर विश्लेषण में यह भी सामने आया कि शराब का प्रभाव “डोज-डिपेंडेंट” है–यानी जितनी अधिक मात्रा, उतना ज्यादा खतरा। शराब शरीर में यूरिक एसिड को कई तरीकों से बढ़ाती है: प्यूरीन मेटाबॉलिज्म को बढ़ाना किडनी से यूरिक एसिड के उत्सर्जन को कम करना क्या कहता है पब्लिक हेल्थ मैसेज? यह स्टडी उस धारणा को चुनौती देती है कि “थोड़ी-बहुत शराब सुरक्षित होती है।” विशेषज्ञों का मानना है कि खासकर उन लोगों को, जिन्हें गाउट या मेटाबॉलिक समस्याओं का खतरा है, शराब सेवन पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। डॉक्टरों के लिए क्या संकेत? डॉक्टरों को अब मरीजों के इलाज और सलाह में शराब सेवन को एक अहम जोखिम कारक के रूप में शामिल करना चाहिए। यह विशेष रूप से उन मरीजों के लिए जरूरी है, जिनमें पहले से Gout या दिल से जुड़ी बीमारियों का खतरा है।

surbhi मई 6, 2026 0
Microscopic view of Influenza D virus infecting human respiratory cells in lab research study
Influenza D Virus पर बढ़ी चिंता: इंसानों को संक्रमित करने की क्षमता, लेकिन शुरुआती इम्यून सिस्टम से बच निकलने में माहिर

नई दिल्ली: दुनिया अभी तक कोविड-19 जैसी महामारी के असर से पूरी तरह उबर नहीं पाई है, ऐसे में एक नई स्टडी ने वैज्ञानिकों और पब्लिक हेल्थ एक्सपर्ट्स की चिंता बढ़ा दी है। शोध में पाया गया है कि Influenza D virus इंसानी श्वसन तंत्र की कोशिकाओं को संक्रमित करने में सक्षम है और शुरुआती इम्यून प्रतिक्रिया से बच निकलने की क्षमता रखता है। क्या है Influenza D Virus? Influenza D virus आमतौर पर मवेशियों–खासकर गाय और सूअर–में पाया जाता है। लेकिन हाल के वर्षों में इसके इंसानों तक पहुंचने (zoonotic spillover) की संभावना पर रिसर्च तेज हुई है, खासकर उन लोगों में जो पशुपालन या कृषि से जुड़े हैं। रिसर्च में क्या सामने आया? वैज्ञानिकों ने 2011 से 2020 के बीच पशुओं से लिए गए वायरस सैंपल्स पर अध्ययन किया। इन सैंपल्स को मानव फेफड़ों की कोशिकाओं और श्वसन तंत्र जैसे लैब मॉडल्स पर टेस्ट किया गया। नतीजे चौंकाने वाले थे: वायरस ने इंसानी कोशिकाओं में प्रभावी रूप से खुद को रिप्लिकेट किया कुछ मामलों में इसका स्तर Influenza A virus के बराबर पाया गया इम्यून सिस्टम को कैसे चकमा देता है? इस वायरस की सबसे बड़ी चिंता इसकी “चुपके से हमला” करने की क्षमता है। यह शरीर के शुरुआती इम्यून रिस्पॉन्स को कमजोर कर देता है खासतौर पर Interferon signaling को कम सक्रिय करता है इससे शरीर को वायरस का पता देर से चलता है हालांकि, अगर शरीर में पहले से एंटीवायरल एक्टिविटी बढ़ाई जाए, तो यह वायरस कमजोर पड़ जाता है। क्या महामारी का खतरा है? फिलहाल ऐसा कोई प्रमाण नहीं है कि यह वायरस इंसानों में तेजी से फैल रहा है। लेकिन वैज्ञानिकों का मानना है कि: बहुत छोटे जेनेटिक बदलाव इसे इंसानों में फैलने लायक बना सकते हैं इसकी मौजूदा क्षमता “स्पिलओवर” का संकेत देती है किन लोगों को ज्यादा खतरा? पशुपालक डेयरी और फार्म वर्कर्स मवेशियों के संपर्क में रहने वाले लोग इन समूहों में पहले ही एंटीबॉडी पाए जाने के संकेत मिले हैं। आगे क्या जरूरी? विशेषज्ञों का कहना है कि: पशुओं में फैल रहे वायरस की निगरानी बढ़ानी होगी इंसान और पशु के बीच संपर्क वाले क्षेत्रों पर खास ध्यान देना होगा समय रहते रिसर्च और तैयारी जरूरी है

surbhi मई 4, 2026 0
AI analyzing antibiotic data in hospital to combat antimicrobial resistance crisis
AMR संकट के बीच AI के जिम्मेदार इस्तेमाल की जरूरत, ESCMID 2026 में विशेषज्ञ की चेतावनी

  दुनियाभर में बढ़ते एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस (AMR) संकट को लेकर वैज्ञानिकों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों की चिंता लगातार गहराती जा रही है। अनुमान है कि 2025 तक यह संकट हर साल करीब 1 करोड़ लोगों की जान को खतरे में डाल सकता है। इसी बीच ESCMID Global 2026 में पेश किए गए नए शोध में बताया गया है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) इस समस्या से निपटने में बड़ी भूमिका निभा सकता है–लेकिन इसके इस्तेमाल में सावधानी बेहद जरूरी है। AI कैसे कर सकता है AMR से मुकाबला यूके की University of Hertfordshire से जुड़ी शोधकर्ता Rasha Elshenawy ने अपने अध्ययन में बताया कि AI आधारित मशीन लर्निंग एल्गोरिदम अस्पतालों में एंटीबायोटिक के सही उपयोग, समय पर हस्तक्षेप और संक्रमण के जोखिम का पूर्वानुमान लगाने में मददगार साबित हो रहे हैं। उनके अनुसार, AI सिस्टम अस्पतालों में एंटीबायोटिक उपयोग के पैटर्न का विश्लेषण कर यह संकेत दे सकता है कि कहां दवाओं के प्रति प्रतिरोध (resistance) बढ़ने की संभावना है, जिससे डॉक्टर समय रहते सही कदम उठा सकें। रिसर्च में मिले प्रभावशाली नतीजे अध्ययन के दौरान: AI ने 84.7% सटीकता के साथ सही प्रिस्क्रिप्शन का अनुमान लगाया 156 संभावित दवा-इंटरैक्शन की पहचान की गई 89 मामलों में डोज़ एडजस्टमेंट की जरूरत बताई गई डेटा की सटीकता 99.2% पाई गई यह सिस्टम महामारी के दौरान बढ़े हुए 40% कार्यभार के बावजूद प्रभावी बना रहा, जो इसकी मजबूती को दर्शाता है। लो-इनकम देशों में बड़ी चुनौतियां हालांकि, AMR का सबसे ज्यादा असर लो और मिडिल-इनकम देशों (LMICs) में देखने को मिलता है, जहां संसाधनों की कमी, नीति और प्रशिक्षण के अभाव जैसी कई बाधाएं मौजूद हैं। रिसर्च में यह भी सामने आया कि इन देशों में AI लागू करना तकनीकी रूप से संभव तो है, लेकिन इसके लिए मजबूत वित्तीय समर्थन, प्रशिक्षण और स्थानीय स्तर पर नवाचार की जरूरत है। जिम्मेदार AI उपयोग पर जोर विशेषज्ञों ने चेतावनी दी कि AI का इस्तेमाल बिना उचित जांच और सत्यापन के नहीं किया जाना चाहिए। Rasha Elshenawy ने स्पष्ट कहा कि किसी भी AI सिस्टम को लागू करने से पहले उसकी विश्वसनीयता और सटीकता सुनिश्चित करना अनिवार्य है, ताकि मरीजों पर इसका सकारात्मक प्रभाव पड़े। उन्होंने यह भी जोर दिया कि अस्पतालों और स्वास्थ्य संस्थानों को AI अपनाने से पहले मजबूत परीक्षण प्रक्रिया और स्पष्ट दिशानिर्देश तैयार करने होंगे। आगे की राह विशेषज्ञों के मुताबिक, AMR से लड़ाई में AI एक शक्तिशाली उपकरण बन सकता है, लेकिन इसके लिए जरूरी है: मजबूत वैलिडेशन और टेस्टिंग हेल्थकेयर प्रोफेशनल्स की ट्रेनिंग मरीज-केंद्रित दृष्टिकोण नीति और वित्तीय समर्थन अगर इन पहलुओं पर ध्यान दिया जाए, तो AI न केवल एंटीबायोटिक के सही उपयोग को बढ़ावा देगा, बल्कि वैश्विक स्वास्थ्य संकट को कम करने में भी मददगार साबित हो सकता है।  

surbhi अप्रैल 23, 2026 0
Transgender cancer patient consulting doctor highlighting healthcare discrimination and unequal treatment
ट्रांसजेंडर और नॉन-बाइनरी कैंसर मरीजों के साथ भेदभाव से बिगड़ते स्वास्थ्य परिणाम, नई स्टडी में खुलासा

  कैंसर इलाज के दौरान समान और सम्मानजनक देखभाल की जरूरत को रेखांकित करते हुए एक नई रिसर्च में चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। अध्ययन के अनुसार, ट्रांसजेंडर, जेंडर-नॉनकनफॉर्मिंग (GNC) और नॉन-बाइनरी (NB) मरीजों को स्वास्थ्य सेवाओं में अधिक भेदभाव का सामना करना पड़ता है, जिसका सीधा असर उनके स्वास्थ्य परिणामों पर पड़ता है। भेदभाव और खराब स्वास्थ्य के बीच मजबूत संबंध रिसर्च में कुल 1,476 कैंसर सर्वाइवर्स को शामिल किया गया, जिनमें 246 ट्रांसजेंडर, GNC और NB व्यक्ति थे। आंकड़ों के मुताबिक: 63.8% ट्रांसजेंडर, GNC और NB मरीजों ने हेल्थकेयर में भेदभाव का अनुभव किया जबकि 48.5% सिसजेंडर महिलाओं और 29.8% सिसजेंडर पुरुषों ने ऐसा अनुभव किया इतना ही नहीं, इन मरीजों में खराब स्वास्थ्य की शिकायत करने की संभावना तीन गुना से अधिक पाई गई। मरीजों ने यह भी बताया कि उन्हें अक्सर नजरअंदाज किया गया, कम सम्मान मिला और स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता भी कमजोर रही। कैंसर देखभाल में असमानताएं क्यों चिंता का विषय हैं कैंसर जैसी गंभीर बीमारी में इलाज लंबा और जटिल होता है। ऐसे में मरीज का अनुभव, डॉक्टर का व्यवहार और समय पर सही इलाज मिलना बेहद जरूरी होता है। लेकिन जब किसी समूह को बार-बार भेदभाव का सामना करना पड़े, तो उनका इलाज और रिकवरी दोनों प्रभावित हो सकते हैं। डॉक्टरों की तैयारी में कमी रिपोर्ट के अनुसार, National Institutes of Health द्वारा फंड किए गए प्रोजेक्ट्स में से सिर्फ 0.8% ही जेंडर और सेक्सुअल माइनॉरिटी हेल्थ पर केंद्रित हैं। वहीं, एक सर्वे में सामने आया कि अमेरिका में केवल 5 में से 1 ऑन्कोलॉजिस्ट ही ट्रांसजेंडर और नॉन-बाइनरी मरीजों का इलाज करने में आत्मविश्वास महसूस करते हैं, हालांकि अधिकांश डॉक्टर इस क्षेत्र में प्रशिक्षण लेना चाहते हैं। यूरोप और UK में भी समान स्थिति यूरोप में भी LGBTQ+ समुदाय के कैंसर मरीजों को इलाज में देरी, स्क्रीनिंग की कमी और भेदभाव जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। इसी तरह British Medical Association ने भी ट्रांसजेंडर और नॉन-बाइनरी मरीजों के लिए बेहतर और समान स्वास्थ्य सेवाएं सुनिश्चित करने की जरूरत पर जोर दिया है। स्क्रीनिंग और डायग्नोसिस में भी अंतर रिपोर्ट के अनुसार: LGBTQ+ समुदाय में मैमोग्राफी और सर्वाइकल स्क्रीनिंग की दर सामान्य आबादी से कम है इससे कैंसर का समय पर पता नहीं चल पाता और इलाज में देरी होती है आगे का रास्ता: सिस्टम स्तर पर बदलाव जरूरी विशेषज्ञों का मानना है कि सिर्फ भेदभाव खत्म करना ही पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि पूरे हेल्थकेयर सिस्टम में बदलाव की जरूरत है। इसमें शामिल हैं: डॉक्टरों की बेहतर ट्रेनिंग समावेशी (inclusive) स्क्रीनिंग नीतियां सामाजिक स्तर पर जागरूकता और समर्थन हालांकि यह अध्ययन स्वयं-रिपोर्टेड डेटा पर आधारित है और इससे कारण-परिणाम का सीधा निष्कर्ष निकालना सीमित हो सकता है, फिर भी यह स्वास्थ्य सेवाओं में गहरी असमानताओं की ओर इशारा करता है।  

surbhi अप्रैल 23, 2026 0
Young person using e-cigarette vape device highlighting potential cognitive health risks and dementia study findings
ई-सिगरेट से बढ़ सकता है डिमेंशिया का खतरा, युवाओं पर नए शोध में चौंकाने वाला खुलासा

नई दिल्ली: युवाओं में तेजी से बढ़ते ई-सिगरेट (E-Cigarette) के इस्तेमाल को लेकर एक नया शोध सामने आया है, जिसने गंभीर चिंता बढ़ा दी है। अध्ययन के मुताबिक, 18 से 25 वर्ष के युवाओं में ई-सिगरेट का उपयोग शुरुआती संज्ञानात्मक गिरावट (Cognitive Decline) और डिमेंशिया के बढ़ते जोखिम से जुड़ा पाया गया है। यह शोध ऐसे समय में आया है जब दुनियाभर में किशोरों और युवाओं के बीच ई-सिगरेट का चलन तेजी से बढ़ रहा है। विशेषज्ञ पहले ही चेतावनी दे चुके हैं कि मस्तिष्क के विकास के महत्वपूर्ण चरणों में निकोटिन का प्रभाव सोचने-समझने की क्षमता पर नकारात्मक असर डाल सकता है। कैसे किया गया अध्ययन? इस क्रॉस-सेक्शनल स्टडी में थाईलैंड के 232 युवाओं को शामिल किया गया, जिन्हें दो समूहों में बांटा गया–ई-सिगरेट उपयोग करने वाले और नॉन-स्मोकर्स। शोधकर्ताओं ने मस्तिष्क की कार्यक्षमता को मापने के लिए Montreal Cognitive Assessment जैसे टूल्स का इस्तेमाल किया, साथ ही ADHD (Attention-Deficit/Hyperactivity Disorder) और इमोशनल इंटेलिजेंस से जुड़े पहलुओं का भी आकलन किया गया। क्या निकला निष्कर्ष? अध्ययन में पाया गया कि: ई-सिगरेट उपयोग करने वालों में डिमेंशिया के जोखिम वाले व्यक्तियों की संख्या काफी अधिक थी। जो युवा एक महीने के भीतर ई-सिगरेट छोड़ने की योजना नहीं बना रहे थे, उनमें जोखिम 6 गुना तक बढ़ा पाया गया। वहीं, छह महीने तक छोड़ने की कोई योजना न रखने वालों में यह जोखिम 4 गुना अधिक था। हालांकि, ADHD के लक्षण और इमोशनल इंटेलिजेंस के स्तर में दोनों समूहों के बीच कोई बड़ा अंतर नहीं पाया गया। शुरुआती संकेत, लेकिन खतरे की घंटी विशेषज्ञों का कहना है कि यह अध्ययन डिमेंशिया की पुष्टि नहीं करता, बल्कि इसके शुरुआती संकेतों की ओर इशारा करता है। यानी यह जोखिम भविष्य में गंभीर बीमारी का रूप ले सकता है। कारण और सीमाएं शोधकर्ताओं ने स्पष्ट किया कि यह एक क्रॉस-सेक्शनल स्टडी है, इसलिए यह तय नहीं किया जा सकता कि ई-सिगरेट सीधे तौर पर डिमेंशिया का कारण बनती है। इसके पीछे अन्य सामाजिक या व्यवहारिक कारण भी हो सकते हैं। क्यों जरूरी है सतर्कता? स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, अगर युवाओं में इस तरह के शुरुआती संज्ञानात्मक बदलाव बढ़ते हैं, तो भविष्य में यह सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है। इसलिए जरूरी है कि: युवाओं में ई-सिगरेट के नुकसान को लेकर जागरूकता बढ़ाई जाए निकोटिन की लत से बचने के लिए काउंसलिंग और रोकथाम कार्यक्रम चलाए जाएं आगे और लंबे समय तक चलने वाले शोध किए जाएं

surbhi अप्रैल 17, 2026 0
Young student using smartphone at night showing stress and anxiety linked to mobile addiction study
स्मार्टफोन की लत से बढ़ रही चिंता और डिप्रेशन की समस्या, नए शोध में खुलासा

नई दिल्ली: डिजिटल युग में स्मार्टफोन हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है, लेकिन इसका अत्यधिक इस्तेमाल अब मानसिक स्वास्थ्य के लिए खतरा बनता जा रहा है। हाल ही में सामने आए एक अध्ययन में पाया गया है कि स्मार्टफोन की लत युवा छात्रों में चिंता (Anxiety) और अवसाद (Depression) के बढ़ते स्तर से जुड़ी हुई है। करीब 2,000 युवाओं पर किए गए इस शोध में 1,846 विश्वविद्यालय के छात्रों को शामिल किया गया, जिनकी औसत उम्र 19.6 वर्ष थी। अध्ययन में यह स्पष्ट हुआ कि जिन छात्रों में स्मार्टफोन उपयोग की लत अधिक थी, उनमें मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएं भी ज्यादा देखने को मिलीं। कैसे मापी गई स्मार्टफोन की लत? शोधकर्ताओं ने स्मार्टफोन एडिक्शन को मापने के लिए “Smartphone Addiction Scale” का इस्तेमाल किया, साथ ही चिंता और अवसाद के स्तर को आंकने के लिए मान्यता प्राप्त टूल्स का उपयोग किया गया। परिणामों में पाया गया कि जो छात्र बार-बार फोन चेक करते हैं, फोन से अलग नहीं रह पाते हैं और जिनकी दिनचर्या इससे प्रभावित होती है, उनमें चिंता और डिप्रेशन के लक्षण काफी अधिक थे। पढ़ाई पर नहीं पड़ा सीधा असर दिलचस्प बात यह रही कि इस अध्ययन में स्मार्टफोन की लत और शैक्षणिक प्रदर्शन (Academic Performance) के बीच कोई सीधा संबंध नहीं पाया गया। यानी छात्रों के नंबर भले प्रभावित न हों, लेकिन उनकी मानसिक और भावनात्मक स्थिति पर इसका नकारात्मक असर पड़ सकता है। पब्लिक हेल्थ के लिए बढ़ती चिंता विशेषज्ञों का मानना है कि स्मार्टफोन की लत अब एक उभरती हुई सार्वजनिक स्वास्थ्य (Public Health) समस्या बनती जा रही है। युवा वर्ग, जो सबसे ज्यादा डिजिटल रूप से सक्रिय है, इस जोखिम के दायरे में सबसे आगे है। आज के समय में लगभग हर युवा के पास स्मार्टफोन है, ऐसे में यदि इसका मानसिक स्वास्थ्य पर थोड़ा भी नकारात्मक असर पड़ता है, तो यह बड़े स्तर पर गंभीर समस्या बन सकता है। शोध की सीमाएं भी समझना जरूरी हालांकि, शोधकर्ताओं ने यह भी स्पष्ट किया कि यह एक “क्रॉस-सेक्शनल स्टडी” है, इसलिए यह साबित नहीं किया जा सकता कि स्मार्टफोन की लत सीधे तौर पर चिंता और डिप्रेशन का कारण है। इसके पीछे अन्य कारण भी हो सकते हैं।  

surbhi अप्रैल 17, 2026 0
Healthcare worker administering tuberculosis vaccine during PreVenTB clinical trial in India
टीबी वैक्सीन ट्रायल: कुल मिलाकर सीमित सुरक्षा, लेकिन गंभीर मामलों में दिखा असर

  एक बड़े फेज-3 ट्रायल में Tuberculosis (टीबी) वैक्सीन रणनीति के नतीजों से मिला-जुला संकेत मिला है। जहां कुल मिलाकर टीबी से बचाव सीमित रहा, वहीं कुछ खास मरीज समूहों में गंभीर (एक्स्ट्रापल्मोनरी) टीबी के खिलाफ बेहतर सुरक्षा देखी गई।   क्या था ट्रायल? PreVenTB नाम का यह ट्रायल भारत के 18 केंद्रों पर किया गया, जिसमें 12,717 लोगों को शामिल किया गया। ये सभी ऐसे लोग थे जो टीबी मरीजों के संपर्क में थे। प्रतिभागियों को तीन समूहों में बांटा गया: VPM1002 Immuvac प्लेसीबो (डमी) करीब 38 महीनों तक यह देखा गया कि वैक्सीन टीबी को रोकने में कितनी प्रभावी है।   कुल सुरक्षा क्यों रही सीमित? ट्रायल में पाया गया: VPM1002 लेने वालों में 1.68% को टीबी हुआ प्लेसीबो समूह में 2.13% Immuvac समूह में 2.09% यानी वैक्सीन का असर बहुत ज्यादा मजबूत नहीं था और आंकड़ों में अनिश्चितता (confidence interval) भी दिखी। सबसे अहम बात यह रही कि फेफड़ों की टीबी (Pulmonary TB) के खिलाफ कोई खास सुरक्षा नहीं दिखी, जबकि यही सबसे आम और फैलने वाला रूप है।   कहां दिखा बेहतर असर? एक्स्ट्रापल्मोनरी टीबी (जो फेफड़ों के बाहर होती है) में बेहतर नतीजे सामने आए: VPM1002 ने लगभग 50% तक सुरक्षा दिखाई कुछ मरीजों में यह प्रभाव 60% से ज्यादा भी रहा खासतौर पर जिन लोगों का ट्यूबरक्युलिन स्किन टेस्ट पॉजिटिव था (यानी पहले से इम्यून प्रतिक्रिया मौजूद थी), उनमें वैक्सीन ज्यादा असरदार रही। बच्चों (6–14 साल) में भी बेहतर सुरक्षा के संकेत मिले, हालांकि इस पर और रिसर्च की जरूरत है।   क्या सुरक्षित है वैक्सीन? दोनों वैक्सीन को सुरक्षित पाया गया। लगभग एक-तिहाई लोगों में हल्की स्थानीय प्रतिक्रिया (जैसे इंजेक्शन साइट पर दर्द/सूजन) देखी गई कोई गंभीर साइड इफेक्ट सामने नहीं आया   इसका क्या मतलब है? यह स्टडी बताती है कि: अभी तक कोई भी टीबी वैक्सीन सभी प्रकार की टीबी से पूरी सुरक्षा नहीं दे पा रही लेकिन कुछ खास मरीज समूहों में गंभीर टीबी को रोकने में मदद मिल सकती है भविष्य में “टारगेटेड वैक्सीनेशन” (विशेष समूहों पर केंद्रित रणनीति) ज्यादा प्रभावी हो सकती है

surbhi अप्रैल 16, 2026 0
Pakistani hospital ward highlighting HIV outbreak among children due to alleged syringe reuse.
पाकिस्तान में बड़ा स्वास्थ्य संकट: 331 बच्चे HIV पॉजिटिव, सरकारी अस्पताल पर लापरवाही के गंभीर आरोप

पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के ताउंसा शहर से एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जहां नवंबर 2024 से अक्टूबर 2025 के बीच 331 बच्चे HIV पॉजिटिव पाए गए हैं। इस घटना ने पूरे देश के स्वास्थ्य तंत्र पर सवाल खड़े कर दिए हैं। अस्पताल में लापरवाही बनी संक्रमण की वजह? बीबीसी की जांच में सामने आया कि THQ ताउंसा अस्पताल में गंभीर लापरवाही बरती जा रही थी। मरीजों को लगाने वाली सिरिंज दोबारा इस्तेमाल की जा रही थीं एक ही दवा की शीशी (मल्टी-डोज वायल) से कई बच्चों को इंजेक्शन दिए गए 32 घंटे की अंडरकवर रिकॉर्डिंग में: 10 बार सिरिंज का दोबारा इस्तेमाल देखा गया 4 मामलों में वही दवा दूसरे बच्चों को दी गई विशेषज्ञों ने बताया बेहद खतरनाक संक्रामक रोग विशेषज्ञ Dr Altaf Ahmed के मुताबिक: सिरिंज का पिछला हिस्सा भी वायरस फैला सकता है सिर्फ नई सुई लगाने से खतरा खत्म नहीं होता यह तरीका HIV संक्रमण फैलाने के लिए बेहद खतरनाक है अन्य गंभीर खामियां भी उजागर जांच में अस्पताल की कार्यप्रणाली पर और भी सवाल उठे: 66 बार बिना स्टरलाइज्ड ग्लव्स के इंजेक्शन लगाए गए मेडिकल वेस्ट को बिना सुरक्षा के संभाला गया इस्तेमाल की गई सुइयां और दवाइयां खुले में पाई गईं कैसे सामने आया मामला? इस पूरे मामले का खुलासा 8 साल के बच्चे मोहम्मद अमीन की मौत के बाद हुआ। उसकी बहन असमा भी HIV पॉजिटिव पाई गई परिवार का आरोप है कि अस्पताल में संक्रमित सुई के कारण बच्चों को यह संक्रमण हुआ सबसे पहले निजी डॉक्टर Gul Qaiserani ने इस पैटर्न को पहचाना। उन्होंने बताया कि संक्रमित बच्चों में से अधिकांश का इलाज उसी अस्पताल में हुआ था। आंकड़े क्या बताते हैं? 97 संक्रमित बच्चों में से सिर्फ 4 की माताएं HIV पॉजिटिव थीं इससे संकेत मिलता है कि संक्रमण मां से नहीं, बल्कि अन्य कारणों से फैला आधे से ज्यादा मामलों में कारण: दूषित सुई (Contaminated Needle) प्रशासन ने आरोपों से किया इनकार अस्पताल प्रशासन ने इन आरोपों को खारिज किया है। नए सुपरिटेंडेंट Dr Qasim Buzdar ने कहा कि: वीडियो पुराना या स्टेज्ड हो सकता है वहीं, स्थानीय सरकार का कहना है कि अभी तक यह साबित नहीं हुआ कि संक्रमण का स्रोत वही अस्पताल है। हालांकि, एक लीक रिपोर्ट में अस्पताल में: दवाओं की कमी IV फ्लूइड का दोबारा इस्तेमाल खराब साफ-सफाई जैसी गंभीर कमियां सामने आईं। पहले भी सामने आ चुके हैं ऐसे मामले Pakistan में इस तरह की घटनाएं पहले भी हो चुकी हैं: 2019: सिंध के रतोदेरो में सैकड़ों बच्चे HIV पॉजिटिव 2021 तक संख्या 1500 पहुंची कराची में भी 84 बच्चों के संक्रमित होने का मामला विशेषज्ञ Dr Fatima Mir के अनुसार: यह पूरे सिस्टम में संक्रमण नियंत्रण की कमजोरी को दिखाता है जरूरत से ज्यादा इंजेक्शन देने की प्रवृत्ति भी एक बड़ा कारण है   कितना खतरनाक है सिरिंज का दोबारा इस्तेमाल? संक्रमित खून सीधे दूसरे मरीज में पहुंच सकता है HIV जैसे वायरस तेजी से फैल सकते हैं नई सुई लगाने के बावजूद जोखिम बना रहता है ताउंसा का यह मामला केवल एक अस्पताल की लापरवाही नहीं, बल्कि पूरे स्वास्थ्य सिस्टम की खामियों को उजागर करता है। सैकड़ों बच्चों का संक्रमित होना एक गंभीर चेतावनी है कि इन्फेक्शन कंट्रोल, मेडिकल सुरक्षा और निगरानी प्रणाली को तुरंत मजबूत करना बेहद जरूरी है।      

surbhi अप्रैल 15, 2026 0
Maharashtra rural health campaign launch event with officials promoting healthcare awareness in villages
‘माझे गाव, आरोग्य संपन्न गाव’ अभियान की शुरुआत, ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत करने पर जोर

महाराष्ट्र में ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं को सशक्त बनाने की दिशा में एक अहम कदम उठाया गया है। प्रकाश आबिटकर, जो राज्य के सार्वजनिक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री हैं, ने पुणे के Smt. Kashibai Navale Medical College and General Hospital में ‘माझे गाव, आरोग्य संपन्न गाव’ अभियान का शुभारंभ किया। इस अभियान का मुख्य उद्देश्य पूरे महाराष्ट्र में स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ाना और लोगों की भागीदारी से ग्रामीण क्षेत्रों में बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं सुनिश्चित करना है। ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था में बदलाव का लक्ष्य कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मंत्री प्रकाश आबिटकर ने विश्वास जताया कि यह अभियान ग्रामीण महाराष्ट्र की स्वास्थ्य व्यवस्था की तस्वीर बदल देगा। उन्होंने कहा कि सरकार का लक्ष्य है कि हर नागरिक को उसके गांव में ही गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध हों। मुफ्त सेवाओं और योजनाओं पर जोर मंत्री ने बताया कि स्वास्थ्य विभाग के पास पर्याप्त संसाधन और कई प्रभावी योजनाएं मौजूद हैं, जिन्हें लोगों तक पहुंचाना जरूरी है। उन्होंने विशेष रूप से Mahatma Jyotirao Phule Jan Arogya Yojana का उल्लेख करते हुए कहा कि इस पर बड़ी राशि खर्च की गई है और अब इसे सभी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHCs) में लागू करना अनिवार्य कर दिया गया है। इसके तहत: ECG और डायलिसिस जैसी सेवाएं मुफ्त दी जा रही हैं जरूरतमंद मरीजों तक स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचाने पर विशेष फोकस है HPV वैक्सीनेशन पर फैलाई जा रही गलत जानकारी पर चिंता मंत्री ने सर्वाइकल कैंसर की रोकथाम के लिए चल रहे HPV वैक्सीनेशन अभियान का जिक्र करते हुए कहा कि सोशल मीडिया पर फैल रही गलत जानकारी को रोकना बेहद जरूरी है। उन्होंने लोगों से अपील की कि वे अफवाहों पर ध्यान न दें और वैक्सीनेशन को बढ़ावा दें। सफल क्रियान्वयन के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम अभियान के प्रभावी संचालन के लिए कार्यक्रम स्थल पर डिवीजन स्तर की ट्रेनिंग वर्कशॉप का आयोजन भी किया गया। इसमें विभिन्न जिलों के अधिकारियों और कर्मचारियों को अभियान के उद्देश्य, कार्यप्रणाली और जिम्मेदारियों के बारे में विस्तार से जानकारी दी गई। इस कार्यशाला में पुणे, मुंबई, ठाणे, पालघर, रायगढ़, रत्नागिरी, सिंधुदुर्ग, कोल्हापुर, सतारा और सांगली जिलों के स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी शामिल हुए। जमीनी स्तर पर समितियों की भूमिका अहम पुणे जिला परिषद के अध्यक्ष वीरधवल बाबा जगदाले ने कहा कि मॉडल PHCs के जरिए जिले में बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं शुरू की गई हैं। उन्होंने ‘Patient Welfare Committees’ की भूमिका को बेहद महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि चुनाव के बाद इन समितियों को फिर से सक्रिय करना जरूरी है। वहीं, जिला परिषद के मुख्य कार्यकारी अधिकारी गजानन पाटिल ने ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता पर जोर दिया।  

surbhi अप्रैल 2, 2026 0
Pregnant woman receiving medical care in hospital highlighting maternal mortality concerns in India report
Lancet Report: हर 10 में से एक मातृ मृत्यु भारत में, रिपोर्ट ने बढ़ाई चिंता

Lancet Maternal Death Report: दुनियाभर में गर्भावस्था और प्रसव से जुड़ी जटिलताओं के कारण होने वाली मातृ मृत्यु को लेकर एक बार फिर चिंता बढ़ गई है। द लैंसेट में प्रकाशित ताज़ा स्टडी के मुताबिक, दुनिया की हर 10 में से एक मां की मौत भारत में होती है, जो एक गंभीर संकेत है। क्या कहती है रिपोर्ट? रिपोर्ट के अनुसार: 2023 में दुनिया भर में करीब 2.4 लाख महिलाओं की मौत गर्भावस्था और प्रसव से जुड़ी वजहों से हुई। इनमें से लगभग 24,700 मौतें भारत में दर्ज की गईं। यानी वैश्विक स्तर पर करीब 10% मातृ मृत्यु भारत से जुड़ी है। हालांकि, आंकड़ों का एक सकारात्मक पहलू भी सामने आया है। 1990 में भारत में मातृ मृत्यु: लगभग 1.19 लाख 2015 में घटकर: 36,900 2023 में और घटकर: 24,700 इसी तरह, मातृ मृत्यु दर (MMR) 1990 में 508 से घटकर 2023 में 116 प्रति 1 लाख जीवित जन्म हो गई है सुधार के बावजूद क्यों बनी हुई है चिंता? विशेषज्ञों का मानना है कि सुधार अभी अधूरा है और देश में असमानता बड़ी समस्या है। केरल और तमिलनाडु जैसे राज्य बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं जबकि उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश में हालात अब भी चुनौतीपूर्ण हैं मातृ मृत्यु के मुख्य कारण स्टडी के मुताबिक, ज्यादातर मौतें ऐसी वजहों से होती हैं जिन्हें रोका जा सकता है: प्रसव के दौरान अत्यधिक रक्तस्राव हाई ब्लड प्रेशर (प्री-एक्लेम्प्सिया जैसी स्थिति) संक्रमण (Infections) पहले से मौजूद बीमारियां इसके अलावा: समय पर इलाज न मिलना स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता में अंतर ग्रामीण-शहरी असमानता भी बड़ी वजहें हैं। कोविड-19 का भी पड़ा असर एक्सपर्ट्स के अनुसार, कोविड-19 महामारी के दौरान मातृ स्वास्थ्य सेवाएं प्रभावित हुईं, जिससे हालात और बिगड़े। यही वजह है कि 2015 के बाद सुधार की रफ्तार धीमी पड़ गई। वैश्विक स्थिति भी चिंताजनक 2023 में वैश्विक मातृ मृत्यु दर: 190 प्रति 1 लाख जीवित जन्म जबकि संयुक्त राष्ट्र का लक्ष्य (SDGs): 70 प्रति 1 लाख यानी दुनिया अभी भी लक्ष्य से काफी दूर है।  

surbhi मार्च 30, 2026 0
Popular post
शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

Top week

Indian delegation at international cyber security meeting after India assumed CCDB chairmanship role
राष्ट्रीय

भारत को मिली बड़ी अंतरराष्ट्रीय जिम्मेदारी, संभाला CCDB के अध्यक्ष का पद

surbhi मई 15, 2026 0