नई दिल्ली: सनातन धर्म में निर्जला एकादशी का व्रत सबसे महत्वपूर्ण और पुण्यदायी एकादशी व्रतों में से एक माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन श्रद्धापूर्वक व्रत रखने से वर्षभर की सभी एकादशियों के व्रत के बराबर पुण्य फल प्राप्त होता है। यही कारण है कि इसे अत्यंत विशेष स्थान दिया गया है। पद्म पुराण और धर्मशास्त्रों में भी इस व्रत की महिमा का विस्तार से वर्णन मिलता है। निर्जला एकादशी को भीमसेनी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है, क्योंकि महाभारत काल में भीमसेन ने इसी व्रत का पालन किया था। व्रत का पूर्ण फल प्राप्त करने के लिए द्वादशी तिथि पर विधिपूर्वक पारण करना आवश्यक माना गया है। निर्जला एकादशी व्रत पारण का शुभ समय धार्मिक पंचांग के अनुसार, निर्जला एकादशी का व्रत 25 जून 2026, गुरुवार को रखा जाएगा। वहीं व्रत का पारण 26 जून 2026, शुक्रवार को द्वादशी तिथि में किया जाएगा। व्रत पारण का शुभ समय: सुबह 5:41 बजे से 8:25 बजे तक धर्मशास्त्रों के अनुसार द्वादशी तिथि में निर्धारित समय पर व्रत खोलना शुभ माना जाता है। समय पर पारण करने से व्रत का पूर्ण फल प्राप्त होता है और भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है। क्यों खास है निर्जला एकादशी? मान्यता है कि जो व्यक्ति सभी एकादशी व्रत नहीं कर पाता, वह श्रद्धा और नियमपूर्वक निर्जला एकादशी का व्रत रखकर वर्षभर की सभी एकादशियों का पुण्य प्राप्त कर सकता है। इस दिन बिना अन्न और जल ग्रहण किए भगवान विष्णु की उपासना की जाती है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार यह व्रत पापों का नाश करने वाला, सुख-समृद्धि प्रदान करने वाला और मोक्षदायक माना गया है। पद्म पुराण के अनुसार व्रत पारण की संपूर्ण विधि 1. प्रातःकाल स्नान और शुद्धि द्वादशी तिथि के दिन ब्रह्म मुहूर्त या सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। 2. भगवान विष्णु की पूजा स्नान के बाद भगवान विष्णु की विधिवत पूजा करें। पूजा में गंध, धूप, दीप, पुष्प और सुंदर वस्त्र अर्पित करें। 3. जल कलश का संकल्प पद्म पुराण में जल से भरे घड़े के दान का विशेष महत्व बताया गया है। पूजा के समय जल से भरे कलश का संकल्प करें। 4. मंत्र का उच्चारण जल के घड़े का संकल्प करते समय यह मंत्र बोलें— "देवदेव हृषीकेश संसारार्णवतारक। उदकुम्भप्रदानेन नय मां परमां गतिम्॥" अर्थ: हे संसार सागर से पार लगाने वाले भगवान हृषीकेश! इस जलघट के दान से मुझे परम गति प्रदान करें। 5. दान और ब्राह्मण भोजन पूजन के बाद ब्राह्मणों को भोजन कराएं तथा यथाशक्ति दान-दक्षिणा दें। धार्मिक मान्यता के अनुसार इससे व्रत का पुण्य कई गुना बढ़ जाता है। 6. व्रत पारण ब्राह्मण भोजन और पूजा के पश्चात स्वयं व्रत का पारण करें। परंपरा के अनुसार व्रत सबसे पहले जल और तुलसी दल ग्रहण करके खोला जाता है। इसके बाद सात्विक भोजन करना शुभ माना जाता है। व्रत करने से क्या मिलता है फल? पद्म पुराण के अनुसार विधिपूर्वक निर्जला एकादशी का व्रत और द्वादशी पर पारण करने वाला व्यक्ति पापों से मुक्ति प्राप्त करता है। साथ ही उसे भगवान विष्णु का आशीर्वाद, सुख-समृद्धि, पारिवारिक खुशहाली और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है।
Nirjala Ekadashi 2026 Date: हिंदू धर्म में निर्जला एकादशी को सभी एकादशियों में सबसे श्रेष्ठ और पुण्यदायी माना गया है। मान्यता है कि जो व्यक्ति श्रद्धा और नियमपूर्वक इस व्रत का पालन करता है, उसे पूरे वर्ष की 24 एकादशियों के समान पुण्य फल प्राप्त होता है। इस दिन भगवान विष्णु की विशेष पूजा की जाती है और व्रती पूरे दिन अन्न और जल का त्याग कर उपवास रखते हैं। इसलिए इसे सबसे कठिन और सबसे फलदायी एकादशी भी कहा जाता है। कब है निर्जला एकादशी 2026? पंचांग के अनुसार, ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि का आरंभ 24 जून 2026, बुधवार को शाम 6:13 बजे से होगा और इसका समापन 25 जून 2026, गुरुवार को शाम 8:10 बजे पर होगा। उदया तिथि के आधार पर निर्जला एकादशी का व्रत 25 जून 2026, गुरुवार को रखा जाएगा। तिथि समय एकादशी तिथि प्रारंभ 24 जून 2026, शाम 6:13 बजे एकादशी तिथि समाप्त 25 जून 2026, शाम 8:10 बजे निर्जला एकादशी व्रत 25 जून 2026, गुरुवार क्यों माना जाता है निर्जला एकादशी को सबसे श्रेष्ठ? शास्त्रों के अनुसार, निर्जला एकादशी का महत्व अत्यंत विशेष है। पद्म पुराण में उल्लेख मिलता है कि इस दिन बिना जल ग्रहण किए भगवान विष्णु का स्मरण और उपवास करने से मनुष्य को बड़े से बड़े पापों से मुक्ति मिलती है और मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त होता है। इस दिन किए गए स्नान, दान, जप और पूजा का फल अक्षय माना गया है। मान्यता है कि इस व्रत से मेरु पर्वत के समान बड़े पाप भी नष्ट हो जाते हैं। भीमसेनी एकादशी क्यों कहलाती है? निर्जला एकादशी को भीमसेनी एकादशी भी कहा जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार, महाभारत काल में पांडवों में से भीमसेन अपनी प्रबल भूख के कारण नियमित व्रत नहीं रख पाते थे। तब उन्होंने महर्षि वेदव्यास से ऐसा उपाय पूछा, जिससे उन्हें सभी एकादशियों का फल प्राप्त हो सके। महर्षि वेदव्यास ने उन्हें ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी पर निर्जल रहकर व्रत करने का उपदेश दिया। भीमसेन ने इस कठिन व्रत का पालन किया और उन्हें वर्षभर की सभी एकादशियों के समान पुण्य प्राप्त हुआ। तभी से इसे भीमसेनी एकादशी कहा जाने लगा। क्यों मिलता है 24 एकादशियों के बराबर फल? धार्मिक मान्यता के अनुसार, जो लोग पूरे वर्ष की सभी एकादशियों का व्रत करने में सक्षम नहीं होते, उनके लिए निर्जला एकादशी विशेष महत्व रखती है। कहा जाता है कि केवल इस एक व्रत को श्रद्धा और नियमपूर्वक करने से वर्षभर में आने वाली सभी एकादशियों के समान पुण्य प्राप्त होता है। निर्जला एकादशी व्रत की विधि प्रातःकाल स्नान करके भगवान विष्णु का पूजन करें। पीले वस्त्र, तुलसी दल, फल और पंचामृत अर्पित करें। दिनभर अन्न और जल का त्याग कर उपवास रखें। विष्णु मंत्र और विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें। जरूरतमंदों को दान करें। अगले दिन द्वादशी तिथि में विधिपूर्वक व्रत का पारण करें।
नई दिल्ली: यदि आपके व्यापार या दुकान में लगातार मंदी, आर्थिक नुकसान या काम में रुकावटें आ रही हैं, तो ज्योतिष शास्त्र में कुछ ऐसे उपाय बताए गए हैं जो सकारात्मक ऊर्जा बढ़ाने और बाधाओं को कम करने में सहायक माने जाते हैं। मान्यता है कि शनिवार का दिन शनि देव को समर्पित होता है और इस दिन किए गए कुछ विशेष उपाय व्यापार में स्थिरता और उन्नति के रास्ते खोल सकते हैं। ज्योतिष विशेषज्ञ पिनाकी मिश्रा के अनुसार, व्यापार में सफलता केवल पूंजी पर निर्भर नहीं करती, बल्कि कर्म, समय और प्रतिष्ठा का संतुलन भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। ऐसे में शनिवार के उपाय इस संतुलन को मजबूत करने का माध्यम माने जाते हैं। 1. व्यापार की बाधाएं दूर करने के लिए करें पीपल का उपाय यदि कारोबार में लगातार रुकावटें आ रही हैं, तो शनिवार के दिन पीपल के पेड़ के नीचे सरसों के तेल का दीपक जलाना शुभ माना जाता है। ज्योतिष मान्यताओं के अनुसार, पीपल का वृक्ष शनि ऊर्जा और कर्मफल से जुड़ा माना जाता है। इस उपाय से: रुके हुए कार्यों में गति आती है। निर्णय लेने की क्षमता मजबूत होती है। धैर्य और आत्मविश्वास बढ़ता है। 2. अनावश्यक खर्च कम करने के लिए तिजोरी में रखें शमी का पत्ता शनिवार के दिन शमी का एक पत्ता लेकर उसे अपनी दुकान या तिजोरी में रखने की परंपरा भी प्रचलित है। मान्यता है कि शमी वृक्ष स्थायित्व और संरक्षण का प्रतीक है। इस उपाय से: धन संचय की क्षमता बढ़ती है। फिजूल खर्चों पर नियंत्रण होता है। आर्थिक स्थिरता मजबूत होती है। 3. कमाई बढ़ाने के लिए जरूरतमंदों को कराएं भोजन शनि देव को सेवा और कर्म का कारक माना जाता है। ऐसे में शनिवार के दिन अपनी क्षमता के अनुसार किसी श्रमिक या जरूरतमंद व्यक्ति को भोजन कराना शुभ माना गया है। मान्यता के अनुसार, इससे: व्यापार में सहयोग बढ़ता है। कर्मचारियों का विश्वास मजबूत होता है। नए अवसर मिलने की संभावना बनती है। 4. नकारात्मक ऊर्जा दूर करने के लिए करें काले तिल का उपाय शनिवार के दिन दुकान के मुख्य द्वार पर काले तिल अर्पित करने की भी मान्यता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, काले तिल शनि तत्व से जुड़े होते हैं। ऐसा करने से: नकारात्मक ऊर्जा कम होती है। सकारात्मक वातावरण बनता है। कार्यों में सुचारुता बनी रहती है। 5. लेन-देन की समस्याओं से राहत के लिए काले कुत्ते को खिलाएं रोटी यदि व्यापार में बार-बार भुगतान अटक रहे हों या आर्थिक परेशानियां बढ़ रही हों, तो शनिवार के दिन काले कुत्ते को तेल लगी रोटी खिलाना शुभ माना जाता है। मान्यता है कि इस उपाय से: शनि दोष का प्रभाव कम होता है। आर्थिक नुकसान की आशंका घटती है। लेन-देन संबंधी अड़चनें दूर होती हैं। ध्यान रखें ये सभी उपाय ज्योतिषीय मान्यताओं और धार्मिक विश्वासों पर आधारित हैं। इनके परिणाम व्यक्ति की आस्था और मान्यताओं के अनुसार अलग-अलग हो सकते हैं।
हिंदू धर्म में स्कंद षष्ठी का विशेष महत्व माना जाता है। यह पर्व भगवान शिव और माता पार्वती के ज्येष्ठ पुत्र भगवान कार्तिकेय को समर्पित होता है, जिन्हें स्कंद, मुरुगन और कुमारस्वामी के नाम से भी जाना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन श्रद्धा और नियमपूर्वक व्रत और पूजा करने से जीवन में सुख, समृद्धि, साहस और सफलता का आशीर्वाद प्राप्त होता है। स्कंद षष्ठी 2026 की तिथि और शुभ मुहूर्त वैदिक पंचांग के अनुसार, स्कंद षष्ठी तिथि 19 जून 2026 को शाम 5:00 बजे से शुरू होकर 20 जून 2026 को दोपहर 3:47 बजे तक रहेगी। इस दिन कई शुभ योग और विशेष मुहूर्त बन रहे हैं, जिनका धार्मिक दृष्टि से खास महत्व माना गया है। ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 4:03 बजे से 4:43 बजे तक अमृत काल: सुबह 8:36 बजे से 10:06 बजे तक अभिजीत मुहूर्त: सुबह 11:54 बजे से दोपहर 12:50 बजे तक विजय मुहूर्त: दोपहर 2:42 बजे से 3:38 बजे तक इस वर्ष स्कंद षष्ठी पर रवि योग और निशिता मुहूर्त जैसे शुभ संयोग भी बन रहे हैं, जिससे इस पर्व का आध्यात्मिक महत्व और बढ़ गया है। स्कंद षष्ठी पर करें यह आसान उपाय धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, स्कंद षष्ठी के दिन भगवान कार्तिकेय को लाल या पीले रंग के फूल अर्पित करना शुभ माना जाता है। पूजा के दौरान "ॐ स्कन्दाय नमः" मंत्र का 108 बार जाप करने से सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और मन को शांति मिलती है। इसके अलावा पूजा स्थल पर घी का दीपक जलाकर कुछ समय भगवान कार्तिकेय का ध्यान करने की भी परंपरा है। मान्यता है कि इससे मानसिक तनाव कम होता है और आत्मविश्वास में वृद्धि होती है। भगवान कार्तिकेय और तारकासुर की कथा का संदेश पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान कार्तिकेय ने अपनी दिव्य शक्ति और पराक्रम से अत्याचारी दैत्य तारकासुर का वध किया था। यह कथा केवल देव और दानव के युद्ध की कहानी नहीं है, बल्कि अच्छाई की बुराई पर विजय का प्रतीक भी मानी जाती है। भगवान कार्तिकेय का जीवन यह संदेश देता है कि साहस, संयम और सही दिशा में किए गए प्रयास किसी भी कठिनाई पर विजय दिला सकते हैं। स्कंद षष्ठी का आध्यात्मिक महत्व स्कंद षष्ठी केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि आत्मबल, सकारात्मक सोच और नई शुरुआत का प्रतीक भी माना जाता है। मान्यता है कि सच्ची श्रद्धा और भक्ति से किए गए छोटे-छोटे उपाय भी जीवन में बड़े सकारात्मक बदलाव ला सकते हैं।
Rohini Vrat 2026: जैन धर्म में रोहिणी व्रत को अत्यंत शुभ और पुण्य प्रदान करने वाला व्रत माना जाता है। यह व्रत भगवान वासुपूज्य स्वामी को समर्पित होता है और श्रद्धालु इसे पूरे नियम, संयम और भक्ति भाव से करते हैं। मान्यता है कि इस व्रत के प्रभाव से जीवन में सुख-समृद्धि, मानसिक शांति और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है। जून 2026 में कब है रोहिणी व्रत? ज्योतिषीय गणना और पंचांग के अनुसार, 14 जून 2026, रविवार को रोहिणी व्रत रखा जाएगा। इस दिन सूर्योदय के समय रोहिणी नक्षत्र का प्रभाव रहेगा, जिसके कारण यह तिथि व्रत, ध्यान और पूजा-अर्चना के लिए विशेष रूप से शुभ मानी जा रही है। जैन धर्म में रोहिणी व्रत का महत्व रोहिणी व्रत जैन समाज के प्रमुख धार्मिक व्रतों में शामिल है। इस दिन श्रद्धालु उपवास रखकर भगवान वासुपूज्य स्वामी की आराधना करते हैं और अपने जीवन में सुख, शांति तथा कल्याण की प्रार्थना करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस व्रत को विधि-विधान और श्रद्धा के साथ करने से जीवन की कई बाधाएं दूर होती हैं। साथ ही आर्थिक परेशानियों, मानसिक तनाव और पारिवारिक समस्याओं से मुक्ति मिलने की भी मान्यता है। वैवाहिक सुख और समृद्धि के लिए रखा जाता है व्रत कई महिलाएं अपने पति के उत्तम स्वास्थ्य, लंबी आयु और दांपत्य जीवन में सुख-समृद्धि की कामना से भी रोहिणी व्रत करती हैं। माना जाता है कि यह व्रत परिवार में सकारात्मक ऊर्जा और खुशहाली लाने में सहायक होता है। कितने वर्षों तक किया जाता है रोहिणी व्रत? परंपरा के अनुसार, रोहिणी व्रत का संकल्प सामान्यतः 3 वर्ष, 5 वर्ष या 7 वर्ष के लिए लिया जाता है। इनमें 5 वर्ष 5 माह की अवधि को विशेष रूप से श्रेष्ठ माना गया है। संकल्प की अवधि पूरी होने के बाद व्रत का विधिवत उद्यापन किया जाता है, जिससे व्रत पूर्ण माना जाता है। आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग जैन धर्म में रोहिणी व्रत केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मसंयम, तप और आध्यात्मिक साधना का प्रतीक माना जाता है। इस दिन की गई पूजा और आराधना से आत्मिक शुद्धि तथा मोक्ष मार्ग की ओर अग्रसर होने की प्रेरणा मिलती है।
सनातन धर्म में अधिक मास यानी पुरुषोत्तम मास का विशेष महत्व माना गया है। यह पवित्र मास लगभग हर तीन वर्ष में एक बार आता है और इसमें किए गए जप, तप, दान और पूजा का फल अक्षय माना जाता है। ज्येष्ठ अधिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को मनाई जाने वाली अधिक रामलक्ष्मण द्वादशी इस वर्ष 12 जून 2026 को पड़ रही है। इस बार यह तिथि कई शुभ योगों के साथ आ रही है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन रवि योग, सर्वार्थ सिद्धि योग और उन्मीलिनी महाद्वादशी का दुर्लभ संयोग बन रहा है, जिससे इस व्रत और पूजा का महत्व और भी बढ़ गया है। भगवान श्रीराम, लक्ष्मण और माता सीता की होती है विशेष पूजा अधिक रामलक्ष्मण द्वादशी के दिन भगवान श्रीराम, उनके अनुज लक्ष्मण जी और माता सीता की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। यह पर्व भाईचारे, पारिवारिक प्रेम और धर्म के आदर्श मूल्यों का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि श्रद्धा और सच्चे मन से इस व्रत को करने वाले भक्तों के जीवन की बाधाएं दूर होती हैं और परिवार में सुख-समृद्धि का वास होता है। 'चंपक द्वादशी' के नाम से भी प्रसिद्ध है यह पर्व अधिक रामलक्ष्मण द्वादशी को "चंपक द्वादशी" भी कहा जाता है। इस दिन भगवान विष्णु, श्रीराम या श्रीकृष्ण को चंपा के फूल अर्पित करने का विशेष महत्व बताया गया है। पूजा विधि प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें। सूर्य देव को अर्घ्य देकर व्रत का संकल्प लें। एक चौकी पर पीला वस्त्र बिछाकर भगवान श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण जी की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें। भगवान को पीले या सफेद वस्त्र, चंदन और चंपा के फूल अर्पित करें। मौसमी फल और सात्विक मिठाई का भोग लगाएं। दीपक और धूप जलाकर रामलक्ष्मण द्वादशी व्रत कथा का पाठ करें। श्रीराम के मंत्रों का जाप करें और अंत में आरती करके पूजा संपन्न करें। अधिक रामलक्ष्मण द्वादशी का धार्मिक महत्व रुके हुए कार्यों में मिलती है सफलता मान्यता है कि इस दिन श्रीराम और लक्ष्मण जी की पूजा करने से लंबे समय से रुके हुए कार्यों में सफलता मिलने लगती है और जीवन की बाधाएं दूर होती हैं। परिवार में बढ़ता है प्रेम और सौहार्द यह पर्व भगवान राम और लक्ष्मण के आदर्श भाईचारे का प्रतीक माना जाता है। इस दिन पूजा करने से परिवार में सुख-शांति बनी रहती है और भाइयों के बीच प्रेम और विश्वास मजबूत होता है। अक्षय पुण्य और मोक्ष की प्राप्ति पुरुषोत्तम मास में किए गए दान-पुण्य का फल कभी समाप्त नहीं होता। इस दिन अन्न, वस्त्र या धन का दान करने से दरिद्रता दूर होने की मान्यता है और साधक के लिए मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है। श्रद्धा और भक्ति का विशेष दिन अधिक रामलक्ष्मण द्वादशी केवल एक व्रत नहीं, बल्कि भगवान श्रीराम के आदर्शों और पारिवारिक मूल्यों को जीवन में अपनाने का संदेश भी देती है। इस पावन अवसर पर श्रद्धा और भक्ति के साथ की गई पूजा व्यक्ति के जीवन में सकारात्मकता और सुख-समृद्धि लाने वाली मानी जाती है।
Bhanu Saptami 2026: हिंदू पंचांग के अनुसार, इस वर्ष 7 जून 2026, रविवार को भानु सप्तमी का पावन पर्व मनाया जाएगा। यह दिन भगवान सूर्यदेव की आराधना के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन श्रद्धा और नियमपूर्वक सूर्य उपासना करने से सुख, समृद्धि, आरोग्य और सौभाग्य की प्राप्ति होती है। साथ ही भानु सप्तमी व्रत कथा का पाठ करने से व्रत का पुण्य फल कई गुना बढ़ जाता है। क्या है भानु सप्तमी का महत्व? भानु सप्तमी भगवान सूर्य को समर्पित विशेष तिथि है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन सूर्यदेव को जल अर्पित करने, मंत्र जाप करने और व्रत रखने से जीवन की बाधाएं दूर होती हैं और व्यक्ति को सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है। इस दिन सूर्यदेव के 108 नामों का स्मरण भी विशेष फलदायी माना गया है। भानु सप्तमी की पौराणिक कथा पौराणिक कथा के अनुसार, प्राचीन समय में इन्दुमती नाम की एक वेश्या रहती थी। उसने अपने जीवन में अनेक पाप किए थे, लेकिन जीवन के अंतिम चरण में उसे अपनी गलतियों का एहसास हुआ और वह मोक्ष प्राप्त करना चाहती थी। इसी उद्देश्य से वह महर्षि वशिष्ठ के पास पहुंची और उनसे प्रार्थना करते हुए बोली, "हे ऋषिवर! मैंने जीवन में कोई पुण्य कार्य नहीं किया है। कृपया ऐसा उपाय बताइए जिससे मुझे जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति मिल सके।" इन्दुमती की विनम्र प्रार्थना सुनकर महर्षि वशिष्ठ ने कहा कि भानु सप्तमी का व्रत स्त्रियों के लिए सुख, सौभाग्य, सौंदर्य और मोक्ष प्रदान करने वाला श्रेष्ठ व्रत है। यदि वह श्रद्धापूर्वक सूर्यदेव की पूजा और व्रत का पालन करेगी, तो उसे अवश्य शुभ फल प्राप्त होगा। महर्षि के निर्देशानुसार इन्दुमती ने पूरे विधि-विधान से भानु सप्तमी का व्रत किया, सूर्यदेव को अर्घ्य अर्पित किया और उनकी आराधना की। मान्यता है कि इस व्रत के प्रभाव से मृत्यु के बाद उसे मोक्ष की प्राप्ति हुई और स्वर्ग में अप्सराओं की नायिका बनने का सम्मान भी मिला। सूर्यदेव के 108 नामों का महत्व धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भानु सप्तमी के दिन सूर्यदेव के 108 नामों का जाप करने से आरोग्य, यश, तेज, आत्मबल और सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है। भक्त इस दिन "ॐ सूर्याय नमः", "ॐ भास्कराय नमः", "ॐ आदित्याय नमः", "ॐ रवये नमः" और "ॐ श्रीसूर्यनारायणाय नमः" जैसे नामों का श्रद्धापूर्वक स्मरण करते हैं। धार्मिक मान्यता मान्यता है कि सच्चे मन से किया गया पश्चाताप और श्रद्धा से की गई उपासना व्यक्ति के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला सकती है। इन्दुमती की कथा इसी संदेश को दर्शाती है कि ईश्वर की भक्ति और अच्छे संकल्प से व्यक्ति अपने जीवन को नई दिशा दे सकता है।
रांची। झारखंड के मधुपुर में ईद-उल-अजहा (बकरीद) के मौके पर गुरुवार को धार्मिक उत्साह और भाईचारे का माहौल देखने को मिला। खलासी मोहल्ला स्थित मदीना ईदगाह में बड़ी संख्या में लोगों ने नमाज अदा की। इस अवसर पर राज्य के स्वास्थ्य मंत्री और जामताड़ा विधायक Dr. Irfan Ansari भी शामिल हुए। नमाज के बाद उन्होंने लोगों से गले मिलकर बकरीद की मुबारकबाद दी और राज्य व देश में अमन-चैन की दुआ मांगी। बकरीद को बताया त्याग और खुशियों का पर्व नमाज के बाद अपने संबोधन में डॉ इरफान अंसारी ने कहा कि बकरीद केवल धार्मिक त्योहार नहीं, बल्कि त्याग, प्रेम और भाईचारे का प्रतीक है। उन्होंने लोगों से अपील की कि सभी मिल-जुलकर त्योहार मनाएं और समाज में प्रेम व सद्भाव का संदेश फैलाएं। मंत्री ने कहा कि “खाएं-खिलाएं और खुशियां बांटें, यही इस पर्व की असली भावना है।” उन्होंने देश में बढ़ती नफरत की राजनीति पर भी टिप्पणी करते हुए कहा कि जो लोग समाज में विभाजन फैलाने की कोशिश करते हैं, उन्हें भी प्यार और भाईचारे के साथ अपने घर बुलाना चाहिए, ताकि वे इंसानियत और सद्भाव की ताकत को समझ सकें। झारखंड और देश की खुशहाली की दुआ डॉ इरफान अंसारी ने कहा कि उन्होंने अल्लाह से झारखंड और पूरे देश की तरक्की, शांति और खुशहाली की दुआ मांगी है। उन्होंने कहा कि हर घर में सुख-शांति बनी रहे और समाज में आपसी सौहार्द कायम रहे, यही बकरीद का संदेश है। मदीना ईदगाह में नमाज का समय सुबह 7 बजे निर्धारित किया गया था। त्योहार को शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न कराने के लिए प्रशासन की ओर से सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए थे। ईदगाह परिसर और आसपास पुलिस बल की तैनाती की गई थी, जिससे लोगों ने सुरक्षित माहौल में नमाज अदा की।
वृंदावन, एजेंसियां। वृंदावन के प्रसिद्ध संत प्रेमानंद महाराज ने अपने भक्तों और शिष्यों के लिए एक भावुक संदेश जारी किया है। केली कुंज आश्रम ट्रस्ट के यूट्यूब चैनल पर साझा किए गए 1 मिनट 19 सेकेंड के वीडियो में उन्होंने भक्तों से चिंता न करने और भगवान श्रीजी के भजन में मन लगाने की अपील की। उन्होंने कहा, “हम मिलें न मिलें, बोलें न बोलें, हम आप सबको बहुत प्यार करते हैं। चिंता मत करो, खूब नाम जप करो और प्रसन्न रहो।” ‘हमारा मौन और एकांतवास आपके लिए’ प्रेमानंद महाराज ने अपने संदेश में कहा कि उनका एकांतवास और मौन उनके स्वयं के लिए नहीं, बल्कि भक्तों के कल्याण के लिए है। उन्होंने कहा कि “जो कुछ होना था, वह हो चुका है। अब जो कुछ हो रहा है, वह सब आपके लिए है।” उन्होंने भक्तों से निर्भय होकर भजन करने और गुरुदेव पर भरोसा बनाए रखने की बात कही। स्वास्थ्य खराब होने से स्थगित हुई पदयात्रा 17 मई से प्रेमानंद महाराज की प्रसिद्ध रात्रि पदयात्रा बंद है। उनके शिष्यों ने बताया था कि स्वास्थ्य खराब होने के कारण महाराज जी पदयात्रा और एकांतिक दर्शन नहीं कर पा रहे हैं। जानकारी के अनुसार उनकी दोनों किडनी खराब हैं और सप्ताह में दो से तीन बार डायलिसिस करानी पड़ती है। हालांकि तीन दिन पहले वह अपने गुरु संत गोविंद शरण महाराज के दर्शन के लिए वराह घाट स्थित आश्रम पहुंचे थे। हजारों भक्तों में चिंता का माहौल प्रेमानंद महाराज हर रोज तड़के 3 बजे केली कुंज आश्रम से सौभरी वन तक करीब डेढ़ किलोमीटर पैदल पदयात्रा करते थे। उनके दर्शन के लिए रोजाना हजारों श्रद्धालु पहुंचते थे। पदयात्रा बंद होने के बाद भक्तों में चिंता और भावुकता का माहौल बना हुआ है। महाराज के संदेश ने उनके अनुयायियों को भावनात्मक रूप से गहराई से प्रभावित किया है।
भोपाल, एजेंसियां। मध्यप्रदेश की ऐतिहासिक और लंबे समय से चर्चाओं में रही भोजशाला सोमवार को एक खास और ऐतिहासिक क्षण की साक्षी बनी। मुख्यमंत्री मोहन यादव दोपहर करीब 1:30 बजे धार स्थित भोजशाला पहुंचे, जहां उन्होंने मां वाग्देवी यानी सरस्वती की विधि-विधान से पूजा-अर्चना की। इसके साथ ही वे मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए भोजशाला पहुंचने वाले प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री बन गए। वैदिक मंत्रोच्चार के बीच हुई पूजा-अर्चना मुख्यमंत्री के आगमन को लेकर भोजशाला परिसर को विशेष रूप से सजाया गया था। पारंपरिक स्वागत और जयघोष के बीच उन्होंने मां वाग्देवी के दर्शन किए और प्रदेश की सुख-समृद्धि की कामना की। इसके बाद उन्होंने वैदिक मंत्रोच्चार के बीच हवन कुंड में आहुति भी दी। “जय मां सरस्वती” के नारों से पूरा परिसर गूंज उठा। तेज गर्मी के बावजूद बड़ी संख्या में श्रद्धालु और समर्थक मुख्यमंत्री के स्वागत के लिए सड़कों पर पहुंचे। धार शहर में जगह-जगह स्वागत मंच बनाए गए थे, जिससे पूरे शहर में उत्सवी माहौल देखने को मिला। हाई कोर्ट के फैसले के बाद बढ़ा दौरे का महत्व मुख्यमंत्री का यह दौरा हाल ही में आए न्यायिक फैसले के बाद और भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इंदौर हाई कोर्ट की खंडपीठ के आदेश के बाद भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण यानी भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने हिंदू पक्ष को वर्षभर पूजा-अर्चना की अनुमति दी थी। इसके बाद पहली बार किसी मुख्यमंत्री का भोजशाला पहुंचना राजनीतिक और सांस्कृतिक दोनों दृष्टि से अहम माना जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह दौरा राज्य सरकार की सांस्कृतिक और धार्मिक विषयों पर सक्रियता का संकेत है। श्रद्धालुओं और हिंदू संगठनों को उम्मीद है कि भविष्य में मां वाग्देवी की लंदन में संरक्षित प्रतिमा को भारत वापस लाने और “सरस्वती लोक” निर्माण को लेकर भी बड़ी घोषणा हो सकती है।मुख्यमंत्री के इस दौरे ने भोजशाला से जुड़े मुद्दों को एक बार फिर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में ला दिया है।
Padmini Ekadashi हिंदू धर्म में भगवान Vishnu को समर्पित अत्यंत पुण्यदायी व्रत माना जाता है। यह एकादशी अधिक मास में आती है, इसलिए इसका महत्व सामान्य एकादशी से कई गुना अधिक माना गया है। इसे पुरुषोत्तमी एकादशी और कमला एकादशी के नाम से भी जाना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन श्रद्धा और विधि-विधान से व्रत और पूजा करने पर भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है, पापों का नाश होता है और जीवन में सुख-समृद्धि आती है। साल 2026 में अधिक मास के कारण कुल 26 एकादशी पड़ेंगी। लगभग तीन साल बाद आने वाले इस विशेष संयोग में अधिक ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष एकादशी को पद्मिनी एकादशी के रूप में मनाया जाएगा। पद्मिनी एकादशी 2026: तिथि और शुभ मुहूर्त एकादशी तिथि प्रारंभ: 26 मई 2026, सुबह 05:10 बजे एकादशी तिथि समाप्त: 27 मई 2026, सुबह 06:21 बजे उदयातिथि के अनुसार व्रत: 27 मई 2026, बुधवार पारण का समय: 28 मई 2026, सुबह 05:25 बजे से 07:56 बजे तक पद्मिनी एकादशी का धार्मिक महत्व धार्मिक ग्रंथों के अनुसार अधिक मास के स्वामी स्वयं भगवान पुरुषोत्तम विष्णु माने जाते हैं। इसलिए इस माह में किए गए जप, तप, दान और पूजा का फल कई गुना बढ़ जाता है। Skanda Purana में बताया गया है कि पद्मिनी एकादशी का व्रत करने से मनुष्य को बड़े यज्ञों और कठोर तपस्या के समान पुण्य प्राप्त होता है। यह व्रत संचित पापों का नाश कर मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है। मान्यता है कि इस दिन सच्चे मन से भगवान विष्णु और माता Lakshmi की पूजा करने से घर में धन, वैभव और खुशहाली बनी रहती है। पद्मिनी एकादशी पूजा विधि ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और स्वच्छ या पीले रंग के वस्त्र धारण करें। पूजा स्थान पर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें। हाथ में जल लेकर व्रत का संकल्प लें। भगवान को पीले फूल, चंदन, अक्षत, फल और मिठाई अर्पित करें। भोग में तुलसी दल अवश्य शामिल करें, क्योंकि भगवान विष्णु को तुलसी अत्यंत प्रिय है। शुद्ध घी का दीपक और धूप जलाकर पूजा करें। विष्णु मंत्रों का जाप और पद्मिनी एकादशी व्रत कथा का पाठ करें। अंत में भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की आरती करें। धार्मिक मान्यता के अनुसार, एकादशी की रात जागरण करना भी बेहद शुभ माना जाता है। इस दौरान भजन-कीर्तन, विष्णु सहस्रनाम और भगवान विष्णु के नाम का स्मरण करने से विशेष पुण्य फल प्राप्त होता है। व्रत पारण कैसे करें? द्वादशी तिथि पर शुभ मुहूर्त में ब्राह्मण या जरूरतमंद व्यक्ति को भोजन और दान-दक्षिणा देने के बाद स्वयं भोजन ग्रहण कर व्रत का पारण करना चाहिए। ऐसा करने से व्रत पूर्ण माना जाता है और शुभ फल की प्राप्ति होती है।
जैन धर्म में रोहिणी व्रत को बेहद पवित्र और फलदायी माना जाता है। यह व्रत भगवान वासुपूज्य की आराधना को समर्पित होता है और मानसिक शांति, सकारात्मक ऊर्जा तथा आध्यात्मिक उन्नति का प्रतीक माना जाता है। साल 2026 में रोहिणी व्रत 18 मई, सोमवार को रखा जाएगा। धार्मिक मान्यता है कि श्रद्धा और नियमपूर्वक इस व्रत को करने से जीवन में सुख-शांति, समृद्धि और मानसिक संतुलन बना रहता है। रोहिणी व्रत 2026: तिथि और शुभ मुहूर्त रोहिणी व्रत किसी निश्चित तिथि पर नहीं बल्कि रोहिणी नक्षत्र के प्रभाव के अनुसार रखा जाता है। जब सूर्योदय के बाद रोहिणी नक्षत्र विद्यमान रहता है, तब यह व्रत किया जाता है। मुख्य व्रत तिथि: 18 मई 2026, सोमवार रोहिणी नक्षत्र प्रारंभ: 17 मई 2026, रात 9:43 बजे रोहिणी नक्षत्र समाप्त: 18 मई 2026, शाम 5:55 बजे विशेष पूजा मुहूर्त: सुबह 08:00 बजे से 10:00 बजे तक व्रत पारण का समय: 18 मई को सुबह 11:32 बजे के बाद क्या है रोहिणी व्रत का महत्व? रोहिणी व्रत मुख्य रूप से जैन समुदाय द्वारा रखा जाता है। इस दिन श्रद्धालु उपवास रखते हैं और भगवान वासुपूज्य की पूजा-अर्चना करते हैं। मान्यता है कि यह व्रत आत्मिक शुद्धि, संयम और सकारात्मक सोच को बढ़ावा देता है। रोहिणी व्रत के प्रमुख नियम यह व्रत लगातार 3, 5 या 7 वर्षों तक किया जाता है। हर महीने रोहिणी नक्षत्र के दिन उपवास रखा जाता है। व्रत के दौरान सात्विक जीवनशैली और धार्मिक नियमों का पालन जरूरी माना जाता है। निर्धारित अवधि पूरी होने के बाद विधि-विधान से ‘उद्यापन’ किया जाता है। शास्त्रों के अनुसार, बिना उद्यापन के लंबे समय तक किए गए व्रत को पूर्ण नहीं माना जाता।
रिकॉर्ड संख्या में पहुंच रहे श्रद्धालु, धाम में दिख रहा आस्था का सैलाब Kedarnath Temple की यात्रा इस वर्ष नए रिकॉर्ड बना रही है। यात्रा शुरू होने के महज 22 दिनों के भीतर 5 लाख 23 हजार से अधिक श्रद्धालु बाबा केदारनाथ के दर्शन कर चुके हैं। लगातार बढ़ रही भक्तों की संख्या से पूरे केदारघाटी क्षेत्र में भक्ति और उत्साह का माहौल बना हुआ है। 22 अप्रैल को कपाट खुलने के बाद से ही श्रद्धालुओं की भारी भीड़ केदारनाथ धाम पहुंच रही है। बुधवार को अकेले 32,427 श्रद्धालुओं ने बाबा के दर्शन किए। अब तक कुल 5,23,582 भक्त पवित्र धाम में माथा टेक चुके हैं। यात्रा मार्ग पर बेहतर सुविधाएं प्रशासन की ओर से यात्रा को सुरक्षित और व्यवस्थित बनाने के लिए व्यापक इंतजाम किए गए हैं। पैदल मार्ग पर जगह-जगह विश्राम स्थल, भोजन, पेयजल, स्वास्थ्य सेवाएं और सुरक्षा व्यवस्था उपलब्ध कराई गई है। धाम क्षेत्र में स्वच्छता, आवास और आपातकालीन सेवाओं को भी प्राथमिकता दी जा रही है। प्रशासन, पुलिस, स्वास्थ्य विभाग और आपदा प्रबंधन की टीमें लगातार समन्वय के साथ काम कर रही हैं ताकि श्रद्धालुओं को किसी प्रकार की परेशानी न हो। श्रद्धालुओं ने की व्यवस्थाओं की सराहना देश के अलग-अलग हिस्सों से पहुंचे श्रद्धालु प्रशासनिक व्यवस्थाओं की खुलकर तारीफ कर रहे हैं। पंजाब के रोपड़ से आए दिवाकर ने बताया कि दर्शन व्यवस्था बेहद सरल और सुगम रही। वहीं अहमदाबाद से आई श्रद्धालु माही ने कहा कि उन्हें उम्मीद से कहीं बेहतर सुविधाएं मिलीं। पर्यटन और स्थानीय कारोबार को भी मिल रहा लाभ केदारनाथ यात्रा में रिकॉर्ड संख्या में श्रद्धालुओं के पहुंचने से स्थानीय व्यापार, होटल व्यवसाय और पर्यटन गतिविधियों को भी बड़ा फायदा मिल रहा है। यात्रा सीजन के शुरुआती दौर में ही इतनी बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं का पहुंचना उत्तराखंड पर्यटन के लिए सकारात्मक संकेत माना जा रहा है।
Masik Shivratri हिंदू धर्म में बेहद पवित्र और फलदायी पर्व माना जाता है। हर महीने कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाई जाने वाली यह शिवरात्रि भगवान Shiva की आराधना के लिए विशेष मानी जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन व्रत, पूजा और दान करने से जीवन के कष्ट दूर होते हैं और सुख-समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त होता है। माना जाता है कि मासिक शिवरात्रि भगवान शिव और शक्ति के दिव्य मिलन का प्रतीक है। यही कारण है कि इस दिन श्रद्धा और सच्चे मन से की गई पूजा और दान का विशेष महत्व बताया गया है। मई 2026 में कब है मासिक शिवरात्रि? पंचांग के अनुसार, ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि 15 मई 2026 को सुबह 8 बजकर 31 मिनट से शुरू होगी और 16 मई को सुबह 5 बजकर 11 मिनट तक रहेगी। निशिता काल को ध्यान में रखते हुए मासिक शिवरात्रि का व्रत और पूजा 15 मई, शुक्रवार को किया जाएगा। इस दिन शिव भक्त उपवास रखकर भगवान शिव का अभिषेक और रात्रि पूजा करते हैं। दूध और सफेद वस्तुओं का दान मासिक शिवरात्रि पर दूध, दही, चावल, मिश्री और सफेद वस्त्रों का दान बेहद शुभ माना जाता है। सफेद रंग को शांति, पवित्रता और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इन वस्तुओं का दान करने से मानसिक तनाव कम होता है और भगवान शिव की विशेष कृपा प्राप्त होती है। अन्न और भोजन का दान इस दिन गरीब और जरूरतमंद लोगों को भोजन, फल और अन्न दान करना पुण्यदायी माना गया है। मान्यता है कि भूखे लोगों को भोजन कराने से घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। कहा जाता है कि भगवान शिव ऐसे दान से शीघ्र प्रसन्न होते हैं। तिल और घी का दान काले तिल और घी का दान भी मासिक शिवरात्रि पर विशेष महत्व रखता है। शिव मंदिर में घी का दीपक जलाना और तिल का दान करना जीवन की नकारात्मकता और बाधाओं को दूर करने वाला माना जाता है। धार्मिक विश्वास है कि इससे जीवन में शांति और स्थिरता आती है। वस्त्र और जरूरत की चीजों का दान जरूरतमंद लोगों को कपड़े, कंबल और दैनिक उपयोग की वस्तुएं दान करने से पुण्य फल प्राप्त होता है। मान्यता है कि ऐसा करने से जीवन में सकारात्मकता, सुख और संतोष बढ़ता है। धार्मिक दृष्टि से दान को केवल पुण्य का माध्यम नहीं बल्कि मानव सेवा का भी प्रतीक माना गया है। धार्मिक मान्यता मान्यता है कि मासिक शिवरात्रि पर श्रद्धा और सच्चे मन से किया गया दान भगवान शिव को प्रसन्न करता है। इससे व्यक्ति के जीवन में सुख, शांति, समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा का आगमन होता है। इस दिन शिव पूजा के साथ दान-पुण्य करने को विशेष फलदायी माना गया है।
Bada Mangal 2026: ज्येष्ठ माह में पड़ने वाला बड़ा मंगल भगवान Hanuman की विशेष आराधना का दिन माना जाता है। उत्तर भारत, खासकर Lucknow और अवध क्षेत्र में इस पर्व का बेहद खास महत्व है। इस साल 12 मई को ज्येष्ठ मास का दूसरा बड़ा मंगल मनाया जाएगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन संकटमोचन हनुमान जी की पूजा करने से भक्तों के कष्ट दूर होते हैं और जीवन में सुख-समृद्धि आती है। 19 साल बाद बना दुर्लभ संयोग साल 2026 का बड़ा मंगल इसलिए भी खास माना जा रहा है क्योंकि इस बार अधिक मास (पुरुषोत्तम मास) के कारण ज्येष्ठ माह लंबा हो गया है। आमतौर पर ज्येष्ठ महीने में 4 या 5 मंगलवार पड़ते हैं, लेकिन इस बार कुल 8 बड़े मंगलवार पड़ रहे हैं। ज्योतिषाचार्यों के अनुसार ऐसा दुर्लभ संयोग करीब 19 साल बाद बना है। धार्मिक मान्यता है कि इतने लंबे समय तक हनुमान जी की आराधना का अवसर मिलना बेहद शुभ माना जाता है। भक्त इस दौरान व्रत, पूजा-पाठ और भंडारे का आयोजन कर बजरंगबली की कृपा प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। क्यों कहा जाता है ‘बुढ़वा मंगल’? बड़ा मंगल को कई जगह ‘बुढ़वा मंगल’ के नाम से भी जाना जाता है। इसके पीछे दो प्रमुख पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं। पहली कथा के अनुसार, Mahabharata काल में Hanuman ने वृद्ध वानर का रूप धारण कर Bhima के अहंकार को समाप्त किया था। चूंकि उन्होंने वृद्ध रूप में मंगलवार को दर्शन दिए थे, इसलिए इसे ‘बुढ़वा मंगल’ कहा जाने लगा। दूसरी मान्यता के अनुसार, ज्येष्ठ माह के मंगलवार को ही भगवान Rama और हनुमान जी की पहली मुलाकात हुई थी। इसी कारण यह दिन हनुमान भक्तों के लिए अत्यंत पवित्र माना जाता है। 2026 के सभी बड़े मंगल की तिथियां पहला बड़ा मंगल – 5 मई दूसरा बड़ा मंगल – 12 मई तीसरा बड़ा मंगल – 19 मई चौथा बड़ा मंगल – 26 मई पांचवां बड़ा मंगल – 2 जून छठा बड़ा मंगल – 9 जून सातवां बड़ा मंगल – 16 जून आठवां बड़ा मंगल – 23 जून कैसे करें पूजा? बड़ा मंगल के दिन सुबह स्नान करके साफ या लाल वस्त्र पहनने की परंपरा है। भक्त हनुमान मंदिरों में जाकर चमेली के तेल और सिंदूर से चोला चढ़ाते हैं। इसके साथ ही बूंदी के लड्डू, गुड़-चना और फलों का भोग लगाया जाता है। इस दिन Hanuman Chalisa, सुंदरकांड और बजरंग बाण का पाठ करना अत्यंत शुभ माना जाता है। शाम के समय हनुमान जी की आरती और प्रसाद वितरण के साथ पूजा संपन्न की जाती है। लखनऊ और अवध में दिखती है खास रौनक Lucknow समेत अवध क्षेत्र में बड़ा मंगल के अवसर पर जगह-जगह भंडारे लगाए जाते हैं। भक्तों को शरबत, पूड़ी-सब्जी और प्रसाद वितरित किया जाता है। मंदिरों में विशेष सजावट और धार्मिक आयोजनों के कारण पूरे क्षेत्र में उत्सव जैसा माहौल देखने को मिलता है।
Masik Krishna Janmashtami 2026: हिंदू धर्म में मासिक कृष्ण जन्माष्टमी का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है। यह पर्व हर महीने कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है। ज्येष्ठ माह की मासिक कृष्ण जन्माष्टमी इस वर्ष 9 मई को पड़ रही है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन श्रद्धा और नियमपूर्वक व्रत एवं पूजा करने से भगवान Krishna की कृपा प्राप्त होती है और जीवन में सुख, शांति व समृद्धि आती है। मान्यता है कि इस दिन कुछ खास नियमों का पालन करने से शुभ फल मिलते हैं, जबकि छोटी-छोटी गलतियां पूजा के प्रभाव को कम कर सकती हैं। ऐसे में आइए जानते हैं कि मासिक कृष्ण जन्माष्टमी के दिन क्या करना शुभ माना जाता है और किन बातों से बचना चाहिए। मासिक कृष्ण जन्माष्टमी के दिन क्या करें? भगवान कृष्ण को पीले वस्त्र पहनाएं भगवान Krishna को पीला रंग अत्यंत प्रिय माना जाता है। पूजा के दौरान उन्हें पीले वस्त्र अर्पित करें और मुकुट में मोरपंख जरूर लगाएं। इससे पूजा का विशेष फल प्राप्त होता है। भोग में तुलसी दल जरूर रखें धार्मिक मान्यता के अनुसार बिना तुलसी के भगवान कृष्ण भोग स्वीकार नहीं करते। इसलिए माखन-मिश्री, फल या अन्य प्रसाद में तुलसी दल अवश्य रखें। मंत्र जाप और भजन करें इस दिन “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” जैसे मंत्रों का जाप करना शुभ माना जाता है। साथ ही भजन-कीर्तन और Bhagavad Gita का पाठ करने से मन को शांति मिलती है। दान-पुण्य करें जरूरतमंद लोगों को भोजन, वस्त्र या धन का दान करना अत्यंत पुण्यकारी माना गया है। मान्यता है कि इससे घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है। गौ सेवा करें भगवान कृष्ण को गोपाल कहा जाता है। इस दिन गाय को हरा चारा, गुड़ या रोटी खिलाना शुभ माना जाता है। इसे विशेष पुण्यदायी कार्य माना गया है। मध्यरात्रि में करें पूजा भगवान कृष्ण का जन्म मध्यरात्रि में हुआ था, इसलिए रात 12 बजे विशेष आरती और पूजा का महत्व माना जाता है। इस समय घंटी, शंख और भजन के साथ जन्मोत्सव मनाया जाता है। मासिक कृष्ण जन्माष्टमी के दिन क्या न करें? तामसिक भोजन से बचें इस दिन मांस, मदिरा, प्याज और लहसुन का सेवन नहीं करना चाहिए। घर का वातावरण सात्विक और शांत रखना शुभ माना जाता है। अन्न और चावल का सेवन न करें यदि आप व्रत कर रहे हैं तो चावल और सामान्य अन्न से परहेज करें। फलाहार में साबूदाना, कुट्टू का आटा और फल ग्रहण किए जा सकते हैं। तुलसी के पत्ते न तोड़ें जन्माष्टमी के दिन तुलसी तोड़ना अशुभ माना जाता है। पूजा के लिए आवश्यक तुलसी के पत्ते एक दिन पहले ही तोड़कर रख लें। काले कपड़े पहनने से बचें पूजा के दौरान काले रंग के वस्त्र पहनना शुभ नहीं माना जाता। पीले, सफेद या लाल रंग के कपड़े पहनना बेहतर माना गया है। क्रोध और नकारात्मकता से दूर रहें व्रत केवल भोजन का त्याग नहीं बल्कि मन की शुद्धता का भी प्रतीक माना जाता है। इस दिन झूठ बोलने, किसी की निंदा करने और क्रोध करने से बचना चाहिए। दिन में ज्यादा न सोएं धार्मिक मान्यता के अनुसार व्रत वाले दिन आलस्य नहीं करना चाहिए। समय को भजन, ध्यान और धार्मिक पाठ में लगाना अधिक शुभ माना जाता है। क्या है धार्मिक मान्यता? मान्यता है कि मासिक कृष्ण जन्माष्टमी का व्रत रखने और श्रद्धा से पूजा करने से भगवान Krishna भक्तों के सभी कष्ट दूर करते हैं। दांपत्य जीवन में सुख, संतान सुख और मानसिक शांति के लिए भी यह व्रत विशेष फलदायी माना जाता है।
Shani Jayanti 2026: हिंदू धर्म में शनि जयंती का विशेष धार्मिक और ज्योतिषीय महत्व माना जाता है. वर्ष 2026 में शनि जयंती 16 मई, शनिवार को मनायी जाएगी. यह दिन ज्येष्ठ माह की अमावस्या तिथि पर पड़ता है और मान्यता है कि इसी दिन भगवान शनि देव का जन्म हुआ था. इस बार शनि जयंती शनिवार को पड़ रही है, जिसे ज्योतिष शास्त्र में बेहद दुर्लभ और शुभ संयोग माना जा रहा है. ज्योतिषियों के अनुसार ऐसा योग करीब 13 साल बाद बन रहा है, जिसका प्रभाव कई राशियों पर सकारात्मक रूप से देखने को मिल सकता है. वृषभ राशि वालों को मिल सकती है बड़ी सफलता वृषभ राशि के जातकों के लिए यह समय करियर और आर्थिक मामलों में शुभ माना जा रहा है. नौकरी में पदोन्नति और वेतन वृद्धि के संकेत मिल रहे हैं. जो लोग लंबे समय से नई नौकरी की तलाश में हैं, उन्हें अच्छे अवसर मिल सकते हैं. कार्यक्षेत्र में चल रही परेशानियां कम हो सकती हैं और कामकाज में स्थिरता आने की संभावना है. मिथुन राशि के लिए बन रहे लाभ के योग मिथुन राशि वालों के लिए शनि जयंती भाग्यशाली साबित हो सकती है. व्यापार में लाभ मिलने और रुके हुए काम पूरे होने के संकेत हैं. नौकरीपेशा लोगों को नई जिम्मेदारियां और प्रमोशन मिल सकता है. आय में वृद्धि के भी योग बन रहे हैं. तुला राशि पर रहेगी विशेष कृपा तुला राशि के जातकों के जीवन में सकारात्मक बदलाव देखने को मिल सकते हैं. करियर में नई उपलब्धियां हासिल होने की संभावना है. विदेश से नौकरी या व्यापार से जुड़े अवसर मिल सकते हैं. परिवार में सुख-शांति और खुशियों का माहौल बना रह सकता है. धनु राशि वालों को मिलेगा सहयोग धनु राशि के लोगों को कार्यक्षेत्र में अधिकारियों का सहयोग मिलने की संभावना है. लंबे समय से रुके कार्य पूरे हो सकते हैं. आर्थिक स्थिति में सुधार और स्वास्थ्य में राहत मिलने के संकेत हैं. मेहनत का अच्छा परिणाम मिल सकता है. कुंभ राशि के लिए रहेगा खास दिन कुंभ राशि के स्वामी स्वयं शनि देव माने जाते हैं, इसलिए यह दिन इनके लिए विशेष फलदायी माना जा रहा है. ज्योतिष मान्यताओं के अनुसार साढ़ेसाती का प्रभाव इस दौरान कुछ हद तक कम हो सकता है. करियर, व्यापार और निजी जीवन में सकारात्मक परिवर्तन देखने को मिल सकते हैं. शनि जयंती पर क्या करें? धार्मिक मान्यता के अनुसार शनि जयंती के दिन शनि देव की पूजा, तेल अर्पित करना, दान-पुण्य और जरूरतमंदों की सहायता करना शुभ माना जाता है. इस दिन पीपल के पेड़ के नीचे दीपक जलाने और शनि मंत्रों का जाप करने से शनि दोष कम होने की मान्यता है.
Bakrid 2026 Date: रमजान और ईद-उल-फितर के बाद मुस्लिम समुदाय जिस बड़े त्योहार का इंतजार करता है, वह है बकरीद. इसे ईद-उल-अजहा और बकरा ईद के नाम से भी जाना जाता है. इस्लाम में यह पर्व त्याग, कुर्बानी, इंसानियत और अल्लाह के प्रति समर्पण का प्रतीक माना जाता है. 2026 में कब मनाई जाएगी बकरीद? इस्लामी कैलेंडर के अनुसार ईद-उल-अजहा हर साल जुल हिज्जा महीने की 10वीं तारीख को मनायी जाती है. ग्रेगोरियन कैलेंडर के मुताबिक भारत में बकरीद 27 मई 2026, बुधवार को मनाये जाने की संभावना है. हालांकि इस त्योहार की अंतिम तारीख चांद दिखने पर ही तय होती है. इसलिए विभिन्न देशों और क्षेत्रों में तारीख में एक दिन का अंतर भी हो सकता है. क्यों मनायी जाती है ईद-उल-अजहा? बकरीद का संबंध हजरत इब्राहिम की कुर्बानी और अल्लाह के प्रति उनके समर्पण से जुड़ा हुआ है. धार्मिक मान्यता के अनुसार, अल्लाह ने हजरत इब्राहिम की आस्था की परीक्षा ली थी और उन्हें अपने बेटे की कुर्बानी देने का आदेश दिया था. हजरत इब्राहिम अल्लाह के हुक्म का पालन करने के लिए तैयार हो गये. उनकी इसी निष्ठा और समर्पण को देखते हुए अल्लाह ने उनके बेटे की जगह एक जानवर की कुर्बानी स्वीकार कर ली. इसी घटना की याद में मुस्लिम समुदाय बकरीद पर कुर्बानी देता है. कुर्बानी का क्या महत्व है? ईद-उल-अजहा पर बकरे, भेड़, ऊंट या अन्य निर्धारित पशुओं की कुर्बानी दी जाती है. इस कुर्बानी का मकसद केवल धार्मिक परंपरा निभाना नहीं, बल्कि त्याग, सेवा और जरूरतमंदों की मदद का संदेश देना भी है. परंपरा के अनुसार कुर्बानी के मांस को तीन हिस्सों में बांटा जाता है– एक हिस्सा गरीब और जरूरतमंद लोगों के लिए दूसरा रिश्तेदारों और दोस्तों के लिए तीसरा अपने परिवार के लिए रखा जाता है यह परंपरा समाज में भाईचारा और समानता की भावना को मजबूत करती है. कैसे मनाया जाता है यह त्योहार? बकरीद के दिन सुबह लोग नए कपड़े पहनकर मस्जिदों और ईदगाहों में विशेष नमाज अदा करते हैं. नमाज के बाद लोग एक-दूसरे को गले लगाकर ईद की मुबारकबाद देते हैं. इसके बाद कुर्बानी की रस्म निभायी जाती है और जरूरतमंदों में गोश्त बांटा जाता है. परिवार और रिश्तेदार मिलकर इस पर्व को खुशी और श्रद्धा के साथ मनाते हैं. हज यात्रा से भी जुड़ा है संबंध ईद-उल-अजहा का संबंध हज यात्रा से भी माना जाता है. इस दौरान दुनिया भर से लाखों मुस्लिम सऊदी अरब में हज करने पहुंचते हैं. इसलिए यह पर्व धार्मिक दृष्टि से बेहद खास माना जाता है. बकरीद इंसानियत, दया, त्याग और सामाजिक सहयोग का संदेश देने वाला महत्वपूर्ण इस्लामी त्योहार माना जाता है.
हिंदू धर्म में समय-समय पर आने वाले विशेष महीनों का धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि से खास महत्व होता है। इन्हीं में से एक है मलमास, जिसे अधिक मास या पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है। साल 2026 में मलमास की शुरुआत 17 मई से होने जा रही है, जो 15 जून 2026 तक रहेगा। इस पूरे महीने को भगवान विष्णु की भक्ति और साधना के लिए बेहद शुभ माना जाता है, लेकिन मांगलिक कार्यों के लिए इसे वर्जित माना जाता है। क्या होता है मलमास? हिंदू पंचांग के अनुसार, जब सूर्य एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश नहीं करता, तब उस अवधि को अधिक मास या मलमास कहा जाता है। यह समय खगोलीय संतुलन बनाए रखने के लिए जोड़ा जाता है, लेकिन धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह सांसारिक और भौतिक कार्यों के लिए अनुकूल नहीं माना जाता। क्यों रुक जाते हैं शुभ कार्य? मलमास के दौरान विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन, नामकरण और नए व्यवसाय की शुरुआत जैसे कार्यों को टालने की परंपरा है। मान्यता है कि इस समय किए गए शुभ कार्यों का फल अपेक्षित नहीं मिलता और जीवन में बाधाएं आ सकती हैं। इसलिए लोग इस पूरे महीने को धार्मिक साधना और आत्मचिंतन के लिए समर्पित करते हैं। मलमास में क्या करें? यह महीना भगवान विष्णु की उपासना के लिए सबसे उत्तम माना गया है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार इस दौरान: रोजाना विष्णु पूजा और व्रत करना शुभ होता है “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जाप विशेष फलदायी माना जाता है दान-पुण्य, कथा श्रवण और भजन-कीर्तन करने से पुण्य की प्राप्ति होती है जरूरतमंदों की मदद करने से जीवन में सुख-समृद्धि आती है विशेष योग बना रहे हैं मलमास को खास इस बार का अधिक मास और भी खास माना जा रहा है, क्योंकि इसमें दो गुरु पुष्य योग का संयोग बन रहा है। आमतौर पर एक महीने में एक ही पुष्य नक्षत्र आता है, लेकिन इस बार दो बार यह शुभ योग बनना आध्यात्मिक दृष्टि से बेहद लाभकारी माना जा रहा है। दुर्लभ संयोग, अगली बार 2037 में ज्योतिषाचार्यों के अनुसार, ज्येष्ठ मास में अधिक मास का यह संयोग काफी दुर्लभ है। ऐसा योग अब 2037 में देखने को मिलेगा। इसलिए इस बार मलमास को विशेष महत्व दिया जा रहा है।
हिंदू धर्म में Shiva की आराधना के लिए प्रदोष व्रत बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। यह व्रत हर महीने की त्रयोदशी तिथि को रखा जाता है और प्रदोष काल (सूर्यास्त के बाद का समय) में पूजा का विशेष महत्व होता है। मान्यता है कि इस समय भगवान शिव अत्यंत प्रसन्न होते हैं और भक्तों के सभी कष्टों का निवारण करते हैं। मई 2026 का महीना शिव भक्तों के लिए खास है, क्योंकि इस बार दोनों प्रदोष व्रत गुरुवार के दिन पड़ रहे हैं, जिससे Guru Pradosh Vrat का शुभ संयोग बन रहा है। यह संयोग विशेष रूप से ज्ञान, सौभाग्य और सफलता देने वाला माना जाता है। मई 2026 प्रदोष व्रत की तिथियां पहला प्रदोष व्रत – 14 मई 2026 (गुरु प्रदोष) पक्ष: ज्येष्ठ माह, कृष्ण पक्ष त्रयोदशी तिथि प्रारंभ: 14 मई, सुबह 11:20 बजे त्रयोदशी तिथि समाप्त: 15 मई, सुबह 08:31 बजे इस दिन शाम के समय प्रदोष काल में पूजा करना सबसे फलदायी रहेगा। दूसरा प्रदोष व्रत – 28 मई 2026 (गुरु प्रदोष) पक्ष: ज्येष्ठ माह, शुक्ल पक्ष त्रयोदशी तिथि प्रारंभ: 28 मई, सुबह 07:56 बजे त्रयोदशी तिथि समाप्त: 29 मई, सुबह 09:50 बजे इस दिन भी सूर्यास्त के बाद प्रदोष काल में पूजा का विशेष महत्व है। प्रदोष व्रत का महत्व शास्त्रों के अनुसार, प्रदोष व्रत के दिन Shiva कैलाश पर्वत पर आनंदित होकर नृत्य करते हैं। इस समय की गई पूजा और उपासना कई गुना अधिक फल देती है। गुरु प्रदोष व्रत के लाभ: शत्रुओं पर विजय जीवन में सुख-शांति ज्ञान और बुद्धि में वृद्धि करियर और कार्यों में सफलता पूजा विधि (सरल तरीके से) अगर आप प्रदोष व्रत रख रहे हैं, तो इस विधि से पूजा कर सकते हैं: सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और व्रत का संकल्प लें दिनभर फलाहार या व्रत रखें शाम को प्रदोष काल में शिव मंदिर जाएं या घर पर पूजा करें शिवलिंग का पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर) से अभिषेक करें बेलपत्र, धतूरा, अक्षत और सफेद फूल अर्पित करें शिव चालीसा और प्रदोष व्रत कथा का पाठ करें अंत में आरती करें
हिंदू धर्म में ज्येष्ठ माह को तप, त्याग और सेवा का महीना माना जाता है। वर्ष 2026 में इस पवित्र माह की शुरुआत 2 मई से हो चुकी है और इसका समापन 29 जून को होगा। पंचांग के अनुसार प्रतिपदा तिथि 1 मई की रात से आरंभ हुई, लेकिन उदयातिथि के आधार पर 2 मई से ज्येष्ठ मास की गणना की जाती है। यह हिंदी कैलेंडर का तीसरा महीना है और इस दौरान सूर्य की तपिश अपने चरम पर होती है, जिससे भीषण गर्मी पड़ती है। अधिक मास का विशेष संयोग, बढ़ेगा पुण्य का प्रभाव इस बार ज्येष्ठ माह में Adhik Maas का दुर्लभ संयोग बन रहा है, जिसे Purushottam Maas भी कहा जाता है। यह 17 मई से 15 जून तक रहेगा। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस अवधि में किए गए जप, तप, दान और सेवा का फल कई गुना अधिक मिलता है। यह समय आत्मशुद्धि, भक्ति और भगवान के प्रति समर्पण का सर्वोत्तम काल माना जाता है। नौतपा: तप और सेवा की असली परीक्षा ज्येष्ठ माह में पड़ने वाला Nautapa वर्ष का सबसे गर्म समय माना जाता है। इन दिनों में सूर्य की किरणें अत्यंत प्रचंड होती हैं और तापमान बहुत अधिक बढ़ जाता है। इंसानों के साथ-साथ पशु-पक्षी भी पानी के लिए तरसते हैं पेड़-पौधों और प्रकृति पर भी इसका गहरा प्रभाव पड़ता है ऐसे समय में दया और सेवा का महत्व और भी बढ़ जाता है। यही कारण है कि शास्त्रों में इस माह को “सेवा का महीना” भी कहा गया है। पूजा-पाठ और धार्मिक महत्व ज्येष्ठ माह का आरंभ कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से होता है और समापन शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा पर होता है। पूरे महीने में स्नान, दान, व्रत और पूजा-पाठ करने का विशेष महत्व बताया गया है। इस दौरान विशेष रूप से भगवान Vishnu के Vamana Avatar (त्रिविक्रम रूप) की पूजा की जाती है। मान्यता है कि: भगवान विष्णु की आराधना से जीवन के कष्ट दूर होते हैं पापों का नाश होता है व्यक्ति को मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग मिलता है सिर्फ एक काम–जल दान, मिलेगा महान फल अगर कोई व्यक्ति पूरे विधि-विधान से पूजा नहीं कर सकता, तो भी इस माह में एक बेहद सरल उपाय करके वह महान पुण्य कमा सकता है–जल दान। जल दान को ज्येष्ठ माह का सबसे बड़ा और श्रेष्ठ दान माना गया है। आप इन आसान तरीकों से इसे कर सकते हैं: प्यासे लोगों को ठंडा पानी पिलाएं घर या दुकान के बाहर मिट्टी का घड़ा (मटका) रखकर उसमें पानी भरें राहगीरों के लिए छांव और पानी की व्यवस्था करें पक्षियों के लिए छत या आंगन में पानी रखें पशुओं के लिए भी पानी की व्यवस्था करें धार्मिक मान्यता है कि इस छोटे से कार्य से भी व्यक्ति को अपार पुण्य प्राप्त होता है और भगवान की विशेष कृपा बनी रहती है। सेवा, दया और प्रकृति से जुड़ने का संदेश ज्येष्ठ माह केवल पूजा-पाठ का ही नहीं, बल्कि प्रकृति और जीवों के प्रति संवेदनशीलता दिखाने का भी समय है। यह हमें सिखाता है कि दूसरों की मदद करना ही सच्ची भक्ति है सेवा और दया के जरिए ही ईश्वर की कृपा प्राप्त होती है
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।