नई दिल्ली: मैसेजिंग प्लेटफॉर्म WhatsApp के नए यूजरनेम फीचर को लेकर केंद्र सरकार ने अपनी चिंता जताई है। इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) ने इस मामले में Meta को विस्तृत जवाब देने के लिए 9 जुलाई तक का समय दिया है। पहले कंपनी से 6 जुलाई तक जवाब मांगा गया था, लेकिन अब तीन दिन की अतिरिक्त मोहलत दी गई है। सरकार का कहना है कि मोबाइल नंबर की जगह यूजरनेम से पहचान होने की सुविधा का गलत इस्तेमाल साइबर अपराधी कर सकते हैं। ऐसे में इस फीचर के सुरक्षा पहलुओं और संभावित जोखिमों पर स्पष्ट जानकारी मांगी गई है। क्या है WhatsApp का नया यूजरनेम फीचर? WhatsApp अपने प्लेटफॉर्म पर ऐसा फीचर ला रहा है, जिसके तहत यूजर अपना मोबाइल नंबर साझा किए बिना दूसरे लोगों से चैट कर सकेंगे। कंपनी के अनुसार— हर यूजर के लिए एक यूनिक यूजरनेम होगा। डिस्प्ले नेम और यूजरनेम अलग-अलग होंगे। डिस्प्ले नेम एक जैसा हो सकता है, लेकिन यूजरनेम प्रत्येक अकाउंट के लिए अलग होगा। इसका उद्देश्य यूजर्स की प्राइवेसी को बेहतर बनाना है। सरकार को क्यों है चिंता? MeitY का मानना है कि यदि मोबाइल नंबर दिखाई नहीं देगा तो इससे कानून-व्यवस्था और साइबर सुरक्षा से जुड़े नए खतरे पैदा हो सकते हैं। सरकार की प्रमुख चिंताएं हैं— अपराधी फर्जी यूजरनेम बनाकर लोगों को निशाना बना सकते हैं। किसी की पहचान छिपाकर धोखाधड़ी और साइबर अपराध को अंजाम देना आसान हो सकता है। फर्जी प्रोफाइल और तस्वीरों का दुरुपयोग बढ़ सकता है। कानून प्रवर्तन एजेंसियों के लिए अपराधियों की पहचान करना अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकता है। Meta से क्या जानकारी मांगी गई है? सरकार ने Meta से यूजरनेम फीचर के कई तकनीकी और सुरक्षा संबंधी पहलुओं पर स्पष्टीकरण मांगा है। इनमें शामिल हैं— फीचर का तकनीकी ढांचा। यूजर की पहचान सत्यापित करने की प्रक्रिया। फर्जी अकाउंट और दुरुपयोग रोकने के उपाय। साइबर अपराध की स्थिति में जांच एजेंसियों को मिलने वाली सहायता। प्राइवेसी और सुरक्षा के बीच संतुलन बनाए रखने की व्यवस्था। फिलहाल फीचर लागू न करने की सलाह सरकार ने Meta से कहा है कि जब तक इस फीचर पर समीक्षा और आवश्यक चर्चा पूरी नहीं हो जाती, तब तक भारत में इसे व्यापक स्तर पर लागू करने से बचा जाए। सरकार पहले यह सुनिश्चित करना चाहती है कि नया फीचर उपयोगकर्ताओं की गोपनीयता की रक्षा करते हुए राष्ट्रीय सुरक्षा और कानून-व्यवस्था से जुड़े मुद्दों पर भी प्रभावी समाधान उपलब्ध कराए। अब इस मामले में सभी की नजर Meta के जवाब पर है, जिसे कंपनी को 9 जुलाई तक केंद्र सरकार के समक्ष प्रस्तुत करना होगा।
नई दिल्ली: भारतीय SaaS कंपनी Zoho के सह-संस्थापक और मुख्य वैज्ञानिक श्रीधर वेम्बु ने एक दिलचस्प अनुभव साझा करते हुए बताया कि कैसे उनके एक ग्राहक ने सिर्फ Zoho का नाम लेकर Microsoft से भारी डिस्काउंट हासिल कर लिया। वेम्बु ने इस घटना को वर्तमान AI प्रतिस्पर्धा से जोड़ते हुए कहा कि किसी भी बाजार में मजबूत विकल्प (Competition) होना बेहद जरूरी है, क्योंकि प्रतिस्पर्धा ही ग्राहकों के हितों की रक्षा करती है। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक पोस्ट में दावा किया कि उनके एक भारतीय ग्राहक को Microsoft Office लाइसेंस रिन्यू कराने के दौरान अचानक काफी अधिक कीमत चुकाने के लिए कहा गया। लेकिन जैसे ही ग्राहक ने Microsoft को बताया कि वह Zoho Office Suite पर शिफ्ट होने पर विचार कर रहा है, कंपनी ने कथित तौर पर लाइसेंस की कीमत में लगभग 90 प्रतिशत तक की कटौती कर दी। हालांकि, इस दावे पर Microsoft की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। ग्राहक ने सिर्फ Zoho का नाम लिया और बदल गई कीमत श्रीधर वेम्बु के मुताबिक, संबंधित ग्राहक पहले से Zoho के कुछ अन्य प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल कर रहा था। जब Microsoft Office के लाइसेंस का नवीनीकरण कराने का समय आया, तो उसे पहले की तुलना में काफी अधिक कीमत बताई गई। इसके बाद ग्राहक ने Microsoft के प्रतिनिधियों से कहा कि वह Zoho Office Suite को विकल्प के रूप में देख रहा है। वेम्बु का दावा है कि इतना सुनते ही Microsoft ने अपने लाइसेंस की कीमत में करीब 90% तक की कमी कर दी। उन्होंने मजाकिया अंदाज में कहा कि ग्राहक ने बाद में उन्हें धन्यवाद देते हुए बताया कि "Zoho खरीदे बिना ही उसके काफी पैसे बच गए।" AI की प्रतिस्पर्धा से जोड़ा पूरा मामला श्रीधर वेम्बु ने इस उदाहरण का इस्तेमाल मौजूदा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की प्रतिस्पर्धा को समझाने के लिए किया। उनका कहना था कि आज अमेरिकी AI कंपनियों को चीनी ओपन-सोर्स AI मॉडल्स से कड़ी चुनौती मिल रही है और यही प्रतिस्पर्धा पूरे उद्योग के लिए सकारात्मक साबित हो सकती है। उन्होंने इशारा किया कि जब किसी बड़ी कंपनी को मजबूत विकल्पों का सामना करना पड़ता है, तो उसे अपने उत्पादों की कीमत, गुणवत्ता और सेवाओं में सुधार करना पड़ता है। इसका सीधा फायदा ग्राहकों को मिलता है। "अगली बार Zoho का नाम जरूर लेना" अपने पोस्ट में वेम्बु ने हल्के-फुल्के अंदाज में सलाह भी दी कि अगर कोई Microsoft Office का लाइसेंस रिन्यू करा रहा है, तो उसे Zoho का जिक्र जरूर करना चाहिए। उनका कहना था कि प्रतिस्पर्धा कई बार ग्राहकों के लिए बेहतर डील दिलाने में मददगार साबित होती है। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य केवल यह दिखाना था कि बाजार में विकल्प मौजूद होना क्यों जरूरी है। एकाधिकार पर उठाए सवाल वेम्बु ने अपने पोस्ट में पुराने एंटी-ट्रस्ट मामलों का जिक्र करते हुए कहा कि किसी भी कंपनी का बाजार पर अत्यधिक नियंत्रण ग्राहकों के हित में नहीं होता। उनके अनुसार, जब किसी सेक्टर में सिर्फ एक या दो बड़ी कंपनियां हावी हो जाती हैं, तो वे कीमतें और शर्तें अपनी सुविधा के अनुसार तय कर सकती हैं। उन्होंने कहा कि मजबूत प्रतिस्पर्धा कंपनियों को जवाबदेह बनाती है और उपभोक्ताओं को बेहतर कीमत, बेहतर सेवा और अधिक विकल्प उपलब्ध कराती है। भारतीय AI को लेकर जताया भरोसा श्रीधर वेम्बु ने भारत के AI इकोसिस्टम को लेकर भी आशावादी रुख अपनाया। उनका कहना है कि भारतीय विश्वविद्यालयों, स्टार्टअप्स और टेक कंपनियों में तेजी से AI पर काम हो रहा है। उन्होंने कहा कि AI मॉडल्स को ट्रेन करने की लागत लगातार कम हो रही है और आने वाले वर्षों में भारतीय AI मॉडल्स भी वैश्विक स्तर पर मजबूत प्रतिस्पर्धा पेश कर सकते हैं। वेम्बु के मुताबिक, भारत को AI की दौड़ में पीछे मानने की जरूरत नहीं है। यदि निवेश, रिसर्च और नवाचार इसी गति से आगे बढ़ते रहे, तो भारतीय कंपनियां भी दुनिया के बड़े AI खिलाड़ियों को चुनौती देने की स्थिति में पहुंच सकती हैं।
ICANN Domestic Root Servers: डिजिटल क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को मजबूत करने की दिशा में भारत सरकार ने एक महत्वपूर्ण पहल की है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, केंद्र सरकार ने वैश्विक इंटरनेट संस्था ICANN (Internet Corporation for Assigned Names and Numbers) से भारत में मुख्य रूट सर्वर स्थापित करने की मांग की है। इस कदम का उद्देश्य देश की इंटरनेट सुरक्षा को मजबूत करना और विदेशी नेटवर्क पर निर्भरता को कम करना है। भारत ने क्यों उठाई रूट सर्वर की मांग? इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के सचिव एस. कृष्णन के अनुसार, दुनिया के सबसे बड़े इंटरनेट उपयोगकर्ता आधार वाले देशों में शामिल भारत के पास अपना मजबूत और सुरक्षित इंटरनेट इंफ्रास्ट्रक्चर होना चाहिए। उनका मानना है कि घरेलू रूट सर्वर से देश की डिजिटल संप्रभुता को और मजबूती मिलेगी। क्या होते हैं रूट सर्वर? रूट सर्वर इंटरनेट की बुनियादी संरचना का महत्वपूर्ण हिस्सा होते हैं। जब कोई यूजर किसी वेबसाइट को खोलता है या ईमेल भेजता है, तो डोमेन नेम सिस्टम (DNS) के जरिए रूट सर्वर उस वेबसाइट का सही पता खोजने में मदद करते हैं। सरल शब्दों में कहें तो रूट सर्वर इंटरनेट की "डायरेक्टरी" की तरह काम करते हैं, जो यूजर्स को सही वेबसाइट तक पहुंचाने में सहायता करते हैं। फिलहाल कहां मौजूद हैं ये सर्वर? वर्तमान में ICANN के नेटवर्क से जुड़े प्रमुख रूट सर्वरों की मौजूदगी अमेरिका, यूरोप, सिंगापुर, मिस्र और केन्या जैसे देशों में है। रिपोर्ट्स के अनुसार, भारत और ICANN के बीच इस विषय पर बातचीत जारी है। बताया जा रहा है कि भारत को सभी 13 मुख्य रूट सर्वरों को मिरर करने वाले करीब 18 सर्वरों का एक पूरा क्लस्टर मिल सकता है। हालांकि, यह प्रक्रिया तकनीकी रूप से जटिल और लंबी मानी जा रही है। क्या होंगे इसके फायदे? यदि भारत में रूट सर्वर स्थापित होते हैं, तो इसके कई महत्वपूर्ण लाभ सामने आ सकते हैं: इंटरनेट इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए विदेशी नेटवर्क पर निर्भरता कम होगी। साइबर हमलों और मैलवेयर खतरों से निपटने में तेजी आएगी। इंटरनेट सेवा प्रदाताओं के स्तर पर ही संभावित खतरों को रोका जा सकेगा। देश के महत्वपूर्ण डिजिटल ढांचे को अतिरिक्त सुरक्षा मिलेगी। तकनीकी निवेश और डिजिटल इकोसिस्टम को बढ़ावा मिलेगा। भारत डिजिटल रूप से अधिक आत्मनिर्भर बन सकेगा। वैश्विक स्तर पर संतुलित इंटरनेट ढांचे की जरूरत रिपोर्ट्स के मुताबिक, सचिव एस. कृष्णन ने इस बात पर भी जोर दिया है कि इंटरनेट का बुनियादी ढांचा दुनिया भर में संतुलित तरीके से वितरित होना चाहिए। उनका मानना है कि भारत में रूट सर्वर स्थापित होने से न केवल देश की सुरक्षा मजबूत होगी, बल्कि तकनीकी नवाचार और निवेश के नए अवसर भी पैदा होंगे। अगर यह प्रस्ताव आगे बढ़ता है, तो इसे भारत की डिजिटल संप्रभुता और साइबर सुरक्षा के क्षेत्र में एक बड़े बदलाव के रूप में देखा जा सकता है।
Send WhatsApp Message Without Showing Online: WhatsApp अपने यूजर्स के अनुभव को बेहतर बनाने के लिए लगातार नए फीचर्स पर काम कर रहा है। अब कंपनी एक ऐसा खास विजेट लाने की तैयारी कर रही है, जिसकी मदद से यूजर्स ऐप खोले बिना ही सीधे फोन की होम स्क्रीन से ऑडियो मैसेज भेज सकेंगे। इससे दूसरे लोगों को यह भी पता नहीं चलेगा कि आप WhatsApp पर ऑनलाइन थे या नहीं। WhatsApp ला रहा है नया ऑडियो मैसेज विजेट लोकप्रिय फीचर ट्रैकर WABetaInfo की रिपोर्ट के मुताबिक, WhatsApp एंड्रॉयड यूजर्स के लिए एक नया वॉइस मैसेज विजेट टेस्ट कर रहा है। यह फीचर फिलहाल एंड्रॉयड बीटा वर्जन 2.26.24.2 में देखा गया है। इस विजेट की मदद से यूजर्स सीधे होम स्क्रीन से ऑडियो मैसेज रिकॉर्ड कर अपने कॉन्टैक्ट्स को भेज सकेंगे। इसके लिए WhatsApp ऐप खोलने की जरूरत नहीं पड़ेगी। क्या होता है विजेट? विजेट किसी ऐप का छोटा शॉर्टकट होता है, जिसे फोन की होम स्क्रीन पर लगाया जा सकता है। इसके जरिए ऐप खोले बिना ही कुछ खास काम किए जा सकते हैं। WhatsApp का नया ऑडियो विजेट भी इसी तरह काम करेगा और यूजर्स को तेजी से वॉइस मैसेज भेजने की सुविधा देगा। कैसे काम करेगा नया फीचर? होम स्क्रीन पर WhatsApp ऑडियो विजेट सेट करना होगा। विजेट में दिए गए "Tap to Record" विकल्प पर टैप करना होगा। ऑडियो रिकॉर्ड करने के बाद उस कॉन्टैक्ट को चुनना होगा, जिसे मैसेज भेजना है। पूरा काम WhatsApp ऐप खोले बिना ही हो जाएगा। अन्य कॉन्टैक्ट्स को यह पता नहीं चलेगा कि आप ऑनलाइन थे या नहीं। एक साथ कई लोगों को भी ऑडियो मैसेज भेजने की सुविधा मिल सकती है। विजेट का डिजाइन कैसा होगा? रिपोर्ट के अनुसार, इस विजेट का डिफॉल्ट साइज 3×1 होगा। हालांकि यूजर्स अपनी जरूरत के अनुसार इसका आकार छोटा या बड़ा भी कर सकेंगे। इसका इंटरफेस काफी सरल रखा गया है ताकि कोई भी आसानी से इसका इस्तेमाल कर सके। अभी बिना WhatsApp खोले ऐसे पढ़ें मैसेज हालांकि ऑडियो मैसेज वाला नया फीचर अभी टेस्टिंग स्टेज में है, लेकिन एंड्रॉयड यूजर्स फिलहाल WhatsApp मैसेज विजेट का इस्तेमाल करके बिना ऐप खोले मैसेज पढ़ सकते हैं। ऐसे करें सेटअप: फोन की होम स्क्रीन पर खाली जगह को कुछ सेकंड दबाकर रखें। Widgets ऑप्शन पर जाएं। WhatsApp के विजेट्स में जाकर 4×2 साइज का विजेट चुनें। इसे होम स्क्रीन पर सेट कर लें। जरूरत के अनुसार इसका आकार छोटा या बड़ा कर सकते हैं। इसके बाद आने वाले WhatsApp मैसेज सीधे होम स्क्रीन पर दिखाई देंगे। इस तरह आप बिना WhatsApp खोले और बिना ऑनलाइन दिखे मैसेज पढ़ सकते हैं। कब मिलेगा नया फीचर? फिलहाल यह फीचर बीटा टेस्टिंग में है। उम्मीद की जा रही है कि आने वाले समय में इसे सभी एंड्रॉयड यूजर्स के लिए जारी किया जा सकता है। इसके बाद WhatsApp का इस्तेमाल पहले से ज्यादा आसान और प्राइवेट हो जाएगा।
ट्रिलियन डॉलर की संपत्ति के बाद अब क्वाड्रिलियन डॉलर की चर्चा दुनिया के सबसे अमीर व्यक्ति Elon Musk एक बार फिर अपने बड़े और भविष्यवादी विचारों को लेकर सुर्खियों में हैं। दुनिया के पहले ट्रिलियनेयर बनने के बाद अब मस्क ने कहा है कि किसी व्यक्ति का क्वाड्रिलियनेयर बनना भी असंभव नहीं है। हालांकि इसके लिए मानव सभ्यता को पृथ्वी से आगे बढ़कर चंद्रमा और मंगल ग्रह पर औद्योगिक विस्तार करना होगा। मस्क की यह टिप्पणी सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रही है और भविष्य की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था को लेकर नई बहस छेड़ रही है। आखिर कितनी होती है क्वाड्रिलियन डॉलर की संपत्ति? मस्क की मौजूदा अनुमानित संपत्ति 1.1 ट्रिलियन डॉलर बताई जा रही है। लेकिन क्वाड्रिलियन डॉलर की संपत्ति का मतलब है 1,000 ट्रिलियन डॉलर यानी 1,000,000,000,000,000 डॉलर। तुलना करें तो वर्ष 2026 में पूरी दुनिया की कुल अर्थव्यवस्था (Global GDP) लगभग 120 ट्रिलियन डॉलर के आसपास मानी जाती है। ऐसे में एक क्वाड्रिलियनेयर की संपत्ति दुनिया के कुल आर्थिक उत्पादन से कई गुना अधिक होगी। जब सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में कहा गया कि मस्क को इस स्तर तक पहुंचने के लिए अभी करीब 998.9 ट्रिलियन डॉलर और चाहिए, तो उन्होंने जवाब दिया, "Not impossible." चांद और मंगल पर फैक्ट्रियां होंगी तो बनेगा नया आर्थिक युग मस्क ने स्पष्ट किया कि इतनी बड़ी संपत्ति हासिल करने का रास्ता पृथ्वी पर नहीं, बल्कि अंतरिक्ष में है। उन्होंने कहा कि इसके लिए चंद्रमा और मंगल ग्रह पर फैक्ट्रियों की जरूरत होगी। मस्क लंबे समय से मंगल ग्रह पर मानव बस्ती बसाने की वकालत करते रहे हैं। उनकी कंपनी SpaceX का प्रमुख लक्ष्य भी भविष्य में बड़े पैमाने पर इंसानों और सामान को मंगल तक पहुंचाना है। मस्क का मानना है कि यदि मंगल और चंद्रमा पर औद्योगिक उत्पादन शुरू होता है, तो अंतरग्रहीय व्यापार (Interplanetary Commerce) की शुरुआत होगी, जिससे मानव इतिहास की सबसे बड़ी आर्थिक क्रांति देखने को मिल सकती है। भविष्य में डॉलर नहीं, ‘द्रव्यमान और ऊर्जा’ होगी असली मुद्रा! मस्क ने भविष्य को लेकर एक और दिलचस्प दावा किया। उनका कहना है कि जब यह सब संभव होगा, तब शायद डॉलर जैसी पारंपरिक मुद्रा का अस्तित्व ही न रहे। उनके मुताबिक, भविष्य की अर्थव्यवस्था में "Mass and Energy" यानी द्रव्यमान और ऊर्जा सबसे महत्वपूर्ण संसाधन होंगे। उन्होंने संकेत दिया कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और रोबोटिक्स दुनिया को इतना बदल देंगे कि पैसों की मौजूदा अवधारणा अप्रासंगिक हो सकती है। AI और रोबोट बदल देंगे पूरी अर्थव्यवस्था मस्क पहले भी कई बार कह चुके हैं कि आने वाले दशकों में AI और रोबोट अधिकांश वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन करेंगे। इससे उत्पादन लागत बेहद कम हो जाएगी और कई क्षेत्रों में मानव श्रम की आवश्यकता घट सकती है। उनका मानना है कि जब मशीनें लगभग हर काम इंसानों से बेहतर और सस्ते तरीके से करने लगेंगी, तब वेतन, रोजगार और धन जैसी पारंपरिक आर्थिक अवधारणाओं में बड़े बदलाव देखने को मिलेंगे। आखिर एलन मस्क की संपत्ति कहां से आती है? दक्षिण अफ्रीका में जन्मे एलन मस्क की संपत्ति का सबसे बड़ा हिस्सा उनकी अंतरिक्ष कंपनी SpaceX से जुड़ा है। इसके अलावा इलेक्ट्रिक वाहन निर्माता Tesla, न्यूरोटेक कंपनी Neuralink और The Boring Company में उनकी हिस्सेदारी भी उनकी संपत्ति का बड़ा स्रोत है। वर्ष 2022 में उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X (पूर्व में ट्विटर) का अधिग्रहण भी किया था, जिसने उन्हें वैश्विक स्तर पर और अधिक प्रभावशाली बना दिया। क्या सचमुच संभव है क्वाड्रिलियनेयर बनना? विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में किसी व्यक्ति का क्वाड्रिलियन डॉलर की संपत्ति तक पहुंचना बेहद कठिन है। लेकिन यदि अंतरिक्ष उद्योग, AI और स्वचालित उत्पादन भविष्य में मस्क की कल्पना के अनुसार विकसित होते हैं, तो आज असंभव लगने वाले आर्थिक आंकड़े भी वास्तविकता बन सकते हैं।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आज शिक्षा और सीखने के तरीके को तेजी से बदल रहा है। छात्र असाइनमेंट तैयार करने, कोडिंग सीखने, प्रोजेक्ट पूरा करने और परीक्षाओं की तैयारी के लिए ChatGPT, Gemini और Claude जैसे AI टूल्स का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल कर रहे हैं। लेकिन इसी बढ़ती निर्भरता को लेकर Sridhar Vembu ने छात्रों को गंभीर चेतावनी दी है। Zoho के संस्थापक श्रीधर वेम्बु का कहना है कि AI जहां लोगों को तेज़ी से सीखने और समस्याएं हल करने में मदद कर सकता है, वहीं इसका अत्यधिक उपयोग छात्रों की बुनियादी समझ और सोचने की क्षमता को भी कमजोर कर सकता है। "AI आपको तेजी से स्मार्ट बना सकता है, लेकिन मूर्ख भी" सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए वेम्बु ने कहा कि AI एक शक्तिशाली उपकरण है, लेकिन इसका गलत इस्तेमाल नुकसानदायक साबित हो सकता है। उनका मानना है कि अगर छात्र हर सवाल का जवाब AI से लेने लगेंगे, तो वे खुद समस्या को समझने, विश्लेषण करने और समाधान खोजने की क्षमता खो सकते हैं। यही कौशल किसी भी क्षेत्र में सफलता की असली नींव होते हैं। पहले मजबूत करें बुनियाद वेम्बु का कहना है कि छात्रों को AI का उपयोग करने से पहले अपने विषय की बुनियादी समझ विकसित करनी चाहिए। उन्होंने स्पष्ट कहा कि जब तक स्कूल और कॉलेज के छात्र मूलभूत अवधारणाओं को अच्छी तरह नहीं सीख लेते, तब तक उन्हें AI पर अत्यधिक निर्भर नहीं होना चाहिए। उनके अनुसार AI सीखने की प्रक्रिया को तेज कर सकता है, लेकिन सीखने की जगह नहीं ले सकता। UC Berkeley की रिपोर्ट ने बढ़ाई चिंता यह बयान उस समय आया है जब University of California, Berkeley में कंप्यूटर साइंस कोर्सेज में असामान्य रूप से अधिक छात्रों के फेल होने की खबरें सामने आईं। रिपोर्ट के अनुसार: CS 10 कोर्स में लगभग 35.3% छात्र फेल हुए। CS 61A कोर्स में 10.6% छात्रों को सफलता नहीं मिली। ये आंकड़े पिछले वर्षों की तुलना में काफी अधिक बताए जा रहे हैं, जहां फेल होने की दर आमतौर पर 10 प्रतिशत से कम रहती थी। हालांकि रिपोर्ट ने सीधे तौर पर AI को इसका कारण नहीं बताया, लेकिन वेम्बु का मानना है कि AI पर अत्यधिक निर्भरता छात्रों की वास्तविक समझ को प्रभावित कर सकती है। पहले भी जता चुके हैं चिंता यह पहली बार नहीं है जब श्रीधर वेम्बु ने AI को लेकर चेतावनी दी हो। इससे पहले भी उन्होंने कई शोधों का हवाला देते हुए कहा था कि AI अल्पकालिक प्रदर्शन (Short-Term Performance) को बेहतर बना सकता है, लेकिन लंबे समय में सीखने और कौशल विकास (Long-Term Learning) पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है। उनका मानना है कि छात्रों को AI का इस्तेमाल सहायक उपकरण (Assistant Tool) की तरह करना चाहिए, न कि अपने दिमाग की जगह लेने वाले विकल्प के रूप में। AI का सही उपयोग क्या है? विशेषज्ञों के अनुसार AI का उपयोग इन कार्यों में फायदेमंद हो सकता है: किसी विषय को समझने के लिए अतिरिक्त जानकारी लेना कोडिंग या प्रोजेक्ट में सहायता प्राप्त करना रिसर्च और डेटा विश्लेषण करना भाषा और लेखन कौशल में सुधार करना लेकिन यदि छात्र बिना समझे सीधे AI के उत्तरों पर निर्भर हो जाते हैं, तो उनकी विश्लेषणात्मक क्षमता और समस्या समाधान कौशल कमजोर पड़ सकते हैं। AI भविष्य का महत्वपूर्ण हिस्सा है, लेकिन वेम्बु की चेतावनी यही बताती है कि तकनीक का लाभ तभी मिलता है जब उसके साथ मानवीय समझ और सीखने की इच्छा भी बनी रहे।
मुंबई में तैनात एक CISF कॉन्स्टेबल के साथ साइबर ठगी का ऐसा मामला सामने आया है जिसने साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों को भी हैरान कर दिया है। आमतौर पर डिजिटल फ्रॉड के मामलों में फर्जी लिंक, ओटीपी शेयरिंग या स्क्रीन-शेयरिंग ऐप्स का इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन इस मामले में घटनाक्रम बिल्कुल अलग और अधिक चिंताजनक दिखाई देता है। रिपोर्ट के मुताबिक, 34 वर्षीय CISF जवान का स्मार्टफोन अचानक अपने आप रीसेट (फॉर्मेट) हो गया। फोन के रीस्टार्ट होने के बाद उसमें मौजूद सभी एप्लिकेशन गायब हो चुके थे। शुरुआत में इसे तकनीकी खराबी समझा गया, लेकिन जब जवान ने दोबारा फोन सेटअप कर जरूरी ऐप्स इंस्टॉल किए और बैंक बैलेंस चेक किया, तो उनके होश उड़ गए। उनके बैंक खाते से कुल 95,668 रुपये निकाले जा चुके थे। कैसे हुआ पूरा घटनाक्रम? मामले की जानकारी के अनुसार, जवान एक चीनी ब्रांड के स्मार्टफोन का इस्तेमाल कर रहे थे। अचानक फोन फॉर्मेट हो गया और उसमें मौजूद सभी ऐप्स हट गए। इसके बाद उन्होंने फोन को दोबारा सेटअप किया और जरूरी एप्लिकेशन, जिनमें पेमेंट और बैंकिंग ऐप्स भी शामिल थे, फिर से डाउनलोड किए। जब उन्होंने अपने खाते का बैलेंस चेक किया, तब पता चला कि बड़ी रकम पहले ही ट्रांसफर की जा चुकी है। सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि उन्हें किसी संदिग्ध कॉल, लिंक, ओटीपी या बैंकिंग अलर्ट के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। जवान ने तुरंत उठाया यह कदम धोखाधड़ी का पता चलते ही CISF कॉन्स्टेबल ने बिना देर किए अपने बैंक से संपर्क कर खाते को ब्लॉक कराया। इसके साथ ही राष्ट्रीय साइबर अपराध हेल्पलाइन 1930 पर शिकायत दर्ज कराई और मामले की सूचना पुलिस को दी। समय रहते कार्रवाई करने से आगे होने वाले संभावित नुकसान को रोका जा सका। जांच में क्या सामने आया? पुलिस जांच में पता चला कि जिस खाते में रकम ट्रांसफर हुई, वह एक ऐसे मोबाइल नंबर से जुड़ा हुआ था जिसके बारे में पीड़ित को कोई जानकारी नहीं थी। अब जांच एजेंसियां यह पता लगाने में जुटी हैं कि फोन का अचानक फॉर्मेट होना तकनीकी खराबी थी या किसी साइबर हमले का हिस्सा। जांच का फोकस इस बात पर है कि क्या किसी मैलवेयर, स्पाइवेयर या रिमोट एक्सेस तकनीक के जरिए फोन पर नियंत्रण हासिल किया गया था। क्यों बढ़ी चिंता? यह मामला इसलिए गंभीर माना जा रहा है क्योंकि इसमें पारंपरिक साइबर फ्रॉड के संकेत नहीं मिले। साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि आजकल ऐसे एडवांस्ड मैलवेयर मौजूद हैं जो स्मार्टफोन को रिमोटली कंट्रोल कर सकते हैं, डेटा चुरा सकते हैं और बैंकिंग गतिविधियों पर नजर रख सकते हैं। यदि फोन का फॉर्मेट होना किसी साइबर हमले का हिस्सा साबित होता है, तो यह डिजिटल ठगी का एक नया और बेहद खतरनाक तरीका हो सकता है। खुद को कैसे सुरक्षित रखें? फोन में इंस्टॉल सभी ऐप्स की नियमित जांच करें। केवल आधिकारिक ऐप स्टोर से ही ऐप डाउनलोड करें। अनजान स्रोतों से APK फाइल इंस्टॉल न करें। फोन की परमिशन सेटिंग्स समय-समय पर चेक करें। किसी भी संदिग्ध गतिविधि पर तुरंत बैंक और साइबर हेल्पलाइन 1930 से संपर्क करें। मोबाइल और बैंकिंग ऐप्स में टू-फैक्टर ऑथेंटिकेशन सक्रिय रखें। फोन के ऑपरेटिंग सिस्टम और सुरक्षा अपडेट नियमित रूप से इंस्टॉल करें। यह घटना एक बार फिर साबित करती है कि साइबर अपराधी लगातार नए तरीके विकसित कर रहे हैं। ऐसे में केवल ओटीपी या लिंक से सावधान रहना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि अपने स्मार्टफोन की सुरक्षा पर भी लगातार नजर रखना बेहद जरूरी हो गया है।
भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (UIDAI) ने पुराने mAadhaar ऐप को बंद कर दिया है और अब यह ऐप Google Play Store तथा Apple App Store से हटा दिया गया है। इसकी जगह UIDAI का नया और अधिक सुरक्षित Aadhaar ऐप लॉन्च किया गया है, जो यूजर्स को बेहतर सुरक्षा, अधिक नियंत्रण और कई नए फीचर्स प्रदान करता है। हालांकि mAadhaar ऐप बंद होने के बाद सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या पुराने अकाउंट को नए ऐप में ट्रांसफर करना होगा? इसका जवाब है—नहीं। पुराने mAadhaar अकाउंट को ट्रांसफर करने की जरूरत नहीं UIDAI के नए Aadhaar ऐप में आपको पुराने mAadhaar अकाउंट को माइग्रेट या ट्रांसफर करने की आवश्यकता नहीं है। यूजर्स नए ऐप को एक फ्रेश यूजर की तरह इस्तेमाल कर सकते हैं। लॉगिन के लिए आधार नंबर, फेस ऑथेंटिकेशन और अन्य पहचान सत्यापन विकल्पों का उपयोग किया जा सकता है। नया ऐप पूरी तरह डिजिटल अनुभव देने के उद्देश्य से तैयार किया गया है। नए Aadhaar ऐप में क्या है खास? नया Aadhaar ऐप केवल डिजिटल आधार दिखाने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें कई एडवांस फीचर्स जोड़े गए हैं। फेस ऑथेंटिकेशन और बेहतर सुरक्षा पुराने mAadhaar ऐप में OTP और PIN आधारित लॉगिन सिस्टम था। नए ऐप में फेस ऑथेंटिकेशन और बायोमेट्रिक लॉक/अनलॉक जैसे आधुनिक सुरक्षा फीचर्स शामिल किए गए हैं। QR कोड के जरिए आधार शेयरिंग अब आपका आधार डिजिटल QR कोड के रूप में उपलब्ध रहेगा। इससे आप आवश्यकता के अनुसार आसानी से आधार साझा कर सकते हैं। Selective Sharing फीचर नए ऐप में Masked Aadhaar और QR आधारित Selective Sharing फीचर दिया गया है। इसके जरिए आप केवल उतनी ही जानकारी साझा कर सकते हैं, जितनी सामने वाले व्यक्ति या संस्था को जरूरी हो। नाम और पता अपडेट करने की सुविधा यूजर्स नए ऐप की मदद से आधार में नाम और पते से जुड़ी त्रुटियों को सुधारने के लिए भी आवेदन कर सकते हैं। एक ऐप में जोड़ सकते हैं 5 प्रोफाइल नए Aadhaar ऐप की सबसे उपयोगी सुविधाओं में से एक है मल्टी-प्रोफाइल सपोर्ट। एक मोबाइल नंबर से लिंक अधिकतम 5 प्रोफाइल जोड़ी जा सकती हैं। माता-पिता अपने बच्चों के आधार प्रोफाइल भी उसी ऐप में मैनेज कर सकते हैं। अलग-अलग परिवार के सदस्यों के आधार को एक ही डिवाइस में सुरक्षित रखा जा सकता है। बायोमेट्रिक लॉक- अनलॉक होगा आसान नए ऐप में बायोमेट्रिक लॉक और अनलॉक का विकल्प सीधे होम स्क्रीन पर उपलब्ध है। इससे यूजर्स जरूरत पड़ने पर तुरंत अपने बायोमेट्रिक डेटा को सुरक्षित कर सकते हैं। क्यों बेहतर है नया Aadhaar ऐप? नया ऐप केवल डिजिटल पहचान पत्र नहीं बल्कि एक सुरक्षित डिजिटल पहचान प्रबंधन प्लेटफॉर्म के रूप में तैयार किया गया है। फेस ऑथेंटिकेशन, QR आधारित शेयरिंग, मल्टी-प्रोफाइल सपोर्ट और बायोमेट्रिक सुरक्षा जैसी सुविधाएं इसे पुराने mAadhaar ऐप की तुलना में अधिक सुरक्षित और सुविधाजनक बनाती हैं।
टेक जॉब मार्केट में बड़ी गिरावट भारत के आईटी और टेक सेक्टर में नौकरी तलाश रहे युवाओं के लिए चिंता बढ़ाने वाली खबर सामने आई है। नई रिपोर्ट के अनुसार, देश में सक्रिय टेक जॉब ओपनिंग्स पिछले 28 महीनों के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गई हैं। ऐसे समय में जब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) कंपनियों के कामकाज के तरीके बदल रहा है, नई भर्तियों की रफ्तार भी धीमी पड़ती दिखाई दे रही है। रिपोर्ट के मुताबिक जून 2026 में देशभर में सक्रिय टेक नौकरियों की संख्या घटकर 93,000 रह गई है। यह पिछले 28 महीनों का सबसे कम आंकड़ा माना जा रहा है। एक महीने में 14 फीसदी की बड़ी गिरावट रोजगार विश्लेषण कंपनी Xpheno की रिपोर्ट के अनुसार, मई में सक्रिय टेक जॉब ओपनिंग्स लगभग 1.08 लाख थीं, जो जून में घटकर 93,000 पर आ गईं। यानी सिर्फ एक महीने में करीब 14 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। विशेषज्ञों का कहना है कि यह पिछले एक वर्ष में सबसे तेज मासिक गिरावटों में से एक है, जो टेक उद्योग में बदलती परिस्थितियों की ओर इशारा करती है। AI बन रहा है भर्ती में कमी की बड़ी वजह विशेषज्ञों का मानना है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का बढ़ता इस्तेमाल इस बदलाव का एक प्रमुख कारण हो सकता है। Careernet के मुख्य व्यवसाय अधिकारी Neelabh Shukla के अनुसार, सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट में AI का उपयोग अब मुख्यधारा का हिस्सा बनता जा रहा है। इससे कई कंपनियां पहले की तुलना में कम कर्मचारियों के साथ अधिक काम करने में सक्षम हो रही हैं। उनका कहना है कि भारत जैसे बड़े टेक हायरिंग बाजार में इसका असर अपेक्षाकृत अधिक दिखाई दे रहा है। IT कंपनियों से लेकर स्टार्टअप तक प्रभावित रिपोर्ट के अनुसार, नौकरी के अवसरों में कमी केवल आईटी सर्विस कंपनियों तक सीमित नहीं है। टेक स्टार्टअप, सॉफ्टवेयर प्रोडक्ट कंपनियां और अन्य तकनीकी क्षेत्रों में भी भर्ती की गति कमजोर पड़ी है। हालांकि, Global Capability Centres (GCCs) एक ऐसा क्षेत्र रहा जहां साल-दर-साल आधार पर 31 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। इसके बावजूद मासिक आधार पर यहां भी लगभग 6 प्रतिशत की कमी देखी गई। H-1B वीजा धारकों की वापसी से बढ़ेगी प्रतिस्पर्धा स्थिति को और चुनौतीपूर्ण बनाने वाला एक अन्य पहलू अमेरिका से लौट रहे भारतीय तकनीकी पेशेवर हैं। कई भारतीय टेक कर्मचारी अमेरिका में H-1B वीजा पर काम करते हैं। यह वीजा सीधे नियोक्ता से जुड़ा होता है। नौकरी जाने की स्थिति में कर्मचारी को सीमित समय के भीतर नई नौकरी ढूंढनी होती है, अन्यथा उसे अपने देश लौटना पड़ सकता है। विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका में हालिया छंटनियों और सख्त आव्रजन नीतियों के कारण बड़ी संख्या में भारतीय पेशेवर भारत लौट सकते हैं। इससे पहले से कमजोर पड़े भारतीय जॉब मार्केट में प्रतिस्पर्धा और बढ़ सकती है। अमेरिका की सख्त नीतियों का असर हाल के वर्षों में अमेरिका ने H-1B वीजा और ग्रीन कार्ड प्रक्रिया से जुड़े कुछ नियमों को सख्त किया है। इसके कारण विदेशी कर्मचारियों के लिए रोजगार संबंधी अनिश्चितता बढ़ी है। रिपोर्ट के अनुसार, 2023 में अमेरिका जाने वाले भारतीय टेक पेशेवरों की संख्या लौटने वालों से लगभग 12,300 अधिक थी। वहीं 2024 में यह अंतर घटकर 6,100 रह गया। इससे संकेत मिलता है कि भारत लौटने वालों की संख्या लगातार बढ़ रही है। क्या आगे और मुश्किल होगा जॉब मार्केट? विशेषज्ञों का मानना है कि AI के बढ़ते उपयोग, वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं और बदलती भर्ती रणनीतियों के कारण टेक सेक्टर में नौकरी बाजार आने वाले महीनों में भी दबाव में रह सकता है। हालांकि AI नए अवसर भी पैदा कर रहा है। ऐसे में उद्योग विशेषज्ञ युवाओं को AI, डेटा साइंस, साइबर सिक्योरिटी, क्लाउड कंप्यूटिंग और ऑटोमेशन जैसी उभरती तकनीकों में कौशल विकसित करने की सलाह दे रहे हैं ताकि बदलते रोजगार बाजार में उनकी प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता बनी रहे।
AI के लिए अरबों डॉलर जुटाने की तैयारी में Google आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की बढ़ती प्रतिस्पर्धा के बीच दुनिया की बड़ी टेक कंपनियां भारी निवेश कर रही हैं। अब Google की पैरेंट कंपनी Alphabet ने भी AI इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने के लिए 80 अरब डॉलर जुटाने की योजना का ऐलान किया है। यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब AI मॉडल्स, क्लाउड सेवाओं और हाई-परफॉर्मेंस कंप्यूटिंग की मांग तेजी से बढ़ रही है। कंपनी का मानना है कि आने वाले वर्षों में AI सेवाओं की जरूरत मौजूदा क्षमता से कहीं अधिक बढ़ने वाली है। इसी वजह से Alphabet अपने डेटा सेंटर, कंप्यूटिंग क्षमता और AI चिप्स के विस्तार पर बड़ा निवेश करने जा रही है। Berkshire Hathaway भी करेगी 10 अरब डॉलर का निवेश रिपोर्ट के अनुसार, Alphabet की फंड जुटाने की योजना में 10 अरब डॉलर का निवेश Berkshire Hathaway की ओर से शामिल है। यह वही कंपनी है जिसे लंबे समय तक दिग्गज निवेशक Warren Buffett ने नेतृत्व दिया था। हालांकि बफेट अप्रैल में CEO पद से हट चुके हैं, लेकिन अभी भी कंपनी के चेयरमैन हैं। 80 अरब डॉलर के पैकेज में 40 अरब डॉलर का शेयर बिक्री कार्यक्रम और 30 अरब डॉलर के अंडरराइटेड शेयर एवं कन्वर्टिबल प्रेफर्ड स्टॉक ऑफरिंग भी शामिल हैं। आखिर Google को इतनी बड़ी रकम की जरूरत क्यों? Google पहले से ही दुनिया की सबसे मूल्यवान कंपनियों में शामिल है और उसका बाजार मूल्य लगभग 4.5 ट्रिलियन डॉलर बताया जा रहा है। इसके बावजूद कंपनी इतनी बड़ी राशि इसलिए जुटा रही है क्योंकि AI के लिए जरूरी कंप्यूटिंग क्षमता (Compute Power) की मांग लगातार बढ़ रही है। ChatGPT, Gemini, Claude और अन्य बड़े AI मॉडल्स को चलाने के लिए विशाल डेटा सेंटर और अत्याधुनिक प्रोसेसर की आवश्यकता होती है। AI सेवाओं के उपयोग में तेजी आने के कारण टेक कंपनियां पर्याप्त कंप्यूटिंग संसाधनों की कमी का सामना कर रही हैं। 2027 में और बढ़ सकता है निवेश Alphabet की मुख्य वित्तीय अधिकारी (CFO) Anat Ashkenazi ने पहले संकेत दिया था कि 2027 में कंपनी का पूंजीगत खर्च (Capital Expenditure) 2026 की तुलना में काफी अधिक होगा। कंपनी ने अप्रैल में अपने वार्षिक पूंजीगत निवेश अनुमान को बढ़ाकर 180 से 190 अरब डॉलर कर दिया था। यह वृद्धि मुख्य रूप से AI कंप्यूटिंग और डेटा सेंटर क्षमता बढ़ाने के लिए की गई है। Alphabet का कहना है कि एंटरप्राइज और उपभोक्ता दोनों स्तरों पर उसकी AI सेवाओं की मांग उपलब्ध क्षमता से ज्यादा हो चुकी है। इसलिए भविष्य की जरूरतों को पूरा करने के लिए बड़े पैमाने पर निवेश जरूरी है। Nvidia को चुनौती देने की तैयारी Google सिर्फ AI मॉडल्स ही नहीं, बल्कि अपने स्वयं के AI हार्डवेयर पर भी बड़ा दांव लगा रहा है। कंपनी के Tensor Processing Units (TPUs) अब AI उद्योग में तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं। TPU चिप्स को Nvidia के AI प्रोसेसर का विकल्प माना जा रहा है। AI कंपनियों को बड़े पैमाने पर कंप्यूटिंग शक्ति की जरूरत होती है और Google इस बढ़ती मांग का लाभ उठाना चाहता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि Google अपने TPU कारोबार का सफल विस्तार कर लेता है, तो वह AI इंफ्रास्ट्रक्चर बाजार में Nvidia को कड़ी चुनौती दे सकता है। AI सेक्टर में निवेश की होड़ तेज Google का यह कदम ऐसे समय आया है जब पूरी AI इंडस्ट्री में फंड जुटाने की होड़ मची हुई है। SpaceX ने हाल ही में IPO से जुड़ी योजनाओं के जरिए लगभग 1.75 ट्रिलियन डॉलर के मूल्यांकन का संकेत दिया है, जिसमें AI स्टार्टअप xAI भी शामिल है। वहीं Anthropic भी करीब 1 ट्रिलियन डॉलर के मूल्यांकन पर फंड जुटाने की तैयारी में है। इसके अलावा OpenAI को लेकर भी इस वर्ष IPO लाने की अटकलें तेज हैं। इससे साफ है कि AI की अगली दौड़ केवल बेहतर मॉडल बनाने की नहीं, बल्कि उन्हें चलाने के लिए विशाल इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा करने की भी है। AI का भविष्य तय करेगा कंप्यूटिंग इंफ्रास्ट्रक्चर विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में AI सेक्टर में सफलता केवल सॉफ्टवेयर या मॉडल्स पर निर्भर नहीं रहेगी। जिन कंपनियों के पास सबसे ज्यादा डेटा सेंटर, कंप्यूटिंग क्षमता और उन्नत चिप्स होंगे, वही इस बाजार में बढ़त हासिल कर पाएंगी। Alphabet का 80 अरब डॉलर जुटाने का फैसला इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है, जो यह दर्शाता है कि AI की वैश्विक प्रतिस्पर्धा अब इंफ्रास्ट्रक्चर निर्माण के नए चरण में प्रवेश कर चुकी है।
AI और नौकरियों पर नई बहस कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) को लेकर पिछले कुछ वर्षों से यह आशंका जताई जा रही थी कि यह तकनीक लाखों लोगों की नौकरियां खत्म कर सकती है। तकनीकी विशेषज्ञों और उद्योग जगत के कई नेताओं ने चेतावनी दी थी कि AI कई पेशों को पूरी तरह बदल देगा और रोजगार बाजार पर बड़ा असर डालेगा। लेकिन अब इस बहस में नया मोड़ आता दिखाई दे रहा है। OpenAI के सीईओ Sam Altman ने हाल ही में कहा है कि वास्तविक स्थिति उन आशंकाओं से अलग हो सकती है जो अब तक सामने आती रही हैं। उनके अनुसार, जिन कंपनियों ने AI को सबसे अधिक अपनाया है, वे ही सबसे ज्यादा कर्मचारियों की भर्ती भी कर रही हैं। "AI अपनाने वाली कंपनियां भर्ती बढ़ा रही हैं" एक साक्षात्कार के दौरान सैम ऑल्टमैन ने कहा कि उनके अनुभव में AI का व्यापक उपयोग करने वाली कंपनियां अपने कार्यबल को कम नहीं कर रहीं, बल्कि नए लोगों को नियुक्त कर रही हैं। उन्होंने यह भी दावा किया कि जो कंपनियां छंटनी के लिए AI को जिम्मेदार ठहरा रही हैं, उनमें से कई वास्तव में AI में सबसे कम निवेश कर रही हैं। ऑल्टमैन के मुताबिक, कई मामलों में AI को कर्मचारियों की कटौती का कारण बताना वास्तविक स्थिति को पूरी तरह नहीं दर्शाता। AI कर्मचारियों की जगह नहीं, उनकी क्षमता बढ़ा रहा ऑल्टमैन का कहना है कि AI को लेकर उनकी अपनी सोच भी समय के साथ बदली है। OpenAI के कोडिंग टूल्स और अन्य AI मॉडल्स के उपयोग को करीब से देखने के बाद उन्हें महसूस हुआ कि यह तकनीक कुछ कार्यों में बेहद सक्षम है, लेकिन अभी भी कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में इसकी सीमाएं मौजूद हैं। उन्होंने बताया कि AI छोटे और विशिष्ट कार्यों को तेजी से पूरा कर सकता है, लेकिन लंबी अवधि की योजना बनाना, जटिल परियोजनाओं का प्रबंधन करना और लगातार निगरानी जैसे कार्य अभी भी इंसानों की भूमिका को महत्वपूर्ण बनाए रखते हैं। क्या छंटनी के लिए AI को बहाना बनाया जा रहा है? ऑल्टमैन ने "AI वॉशिंग" शब्द का इस्तेमाल करते हुए कहा कि कई बार कंपनियां कर्मचारियों की छंटनी को AI से जोड़ देती हैं, जबकि इसके पीछे अन्य व्यावसायिक कारण भी हो सकते हैं। उनका मानना है कि AI का रोजगार बाजार पर प्रभाव जरूर पड़ेगा, लेकिन फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि यह बड़े पैमाने पर नौकरियां खत्म कर रहा है। उनके अनुसार, AI का दीर्घकालिक प्रभाव अभी स्पष्ट नहीं है और इस पर गंभीर अध्ययन की आवश्यकता है। हम समाज में बड़े बदलाव के दौर से गुजर रहे हैं ऑल्टमैन ने स्वीकार किया कि AI को लेकर लोगों की चिंताएं पूरी तरह निराधार नहीं हैं। उनका कहना है कि दुनिया एक ऐसे तकनीकी बदलाव को देख रही है जो लंबे समय में समाज, अर्थव्यवस्था और कार्यस्थलों को गहराई से प्रभावित कर सकता है। हालांकि उन्होंने यह भी माना कि AI की वर्तमान क्षमताओं को लेकर कई बार अतिशयोक्तिपूर्ण दावे किए गए हैं, जिससे लोगों के बीच अनावश्यक भय भी पैदा हुआ। OpenAI ने भी मानी अपनी गलती OpenAI प्रमुख ने स्वीकार किया कि उनकी कंपनी के कुछ पुराने दावों ने भी नौकरी खोने की आशंकाओं को बढ़ावा दिया हो सकता है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि एक समय कंपनी ने दावा किया था कि उसका मॉडल कई पेशों में पेशेवरों से बेहतर प्रदर्शन करता है। अब ऑल्टमैन का कहना है कि उस दावे को अधिक स्पष्ट तरीके से प्रस्तुत किया जाना चाहिए था। उनके अनुसार, AI पूरे पेशे में नहीं बल्कि उन पेशों से जुड़े कुछ विशेष कार्यों में बेहतर प्रदर्शन कर सकता है। AI पर चर्चा हो रही अधिक संतुलित AI तकनीक के तेजी से विकास के बीच अब उद्योग जगत में इस विषय पर अधिक संतुलित चर्चा देखने को मिल रही है। जहां एक ओर AI से जुड़े जोखिमों को स्वीकार किया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर इसके जरिए उत्पादकता बढ़ाने, नए अवसर पैदा करने और व्यवसायों को विस्तार देने की संभावनाओं पर भी जोर दिया जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में AI नौकरियों को पूरी तरह खत्म करने के बजाय कार्य करने के तरीकों को बदल सकता है, जिससे नए कौशल और नई भूमिकाओं की मांग बढ़ेगी।
सोशल मीडिया और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की दुनिया में बड़ा नाम बन चुकी Meta अब एक नए AI-पावर्ड वियरेबल डिवाइस पर काम कर रही है। रिपोर्ट्स के मुताबिक कंपनी एक ऐसे स्मार्ट AI पेंडेंट की टेस्टिंग की तैयारी कर रही है जिसे यूजर्स गले में पहन सकेंगे या अपनी शर्ट पर क्लिप कर सकेंगे। यह डिवाइस केवल एक एक्सेसरी नहीं होगा, बल्कि बातचीत को सुनने, रिकॉर्ड करने और उसे व्यवस्थित करने में सक्षम AI असिस्टेंट की तरह काम करेगा। Meta का नया AI पेंडेंट क्या करेगा? लीक हुए एक इंटरनल मेमो के अनुसार, Meta अगले एक साल के भीतर इस डिवाइस की टेस्टिंग शुरू कर सकती है। बताया जा रहा है कि यह तकनीक उस AI पेंडेंट पर आधारित होगी जिसे Limitless AI ने विकसित किया था। Limitless का डिवाइस यूजर्स की बातचीत को रिकॉर्ड और प्रोसेस कर सकता था। इसे दो तरीकों से इस्तेमाल किया जा सकता था: गले में पेंडेंट की तरह पहनकर शर्ट या कपड़ों पर क्लिप लगाकर इसके जरिए AI असिस्टेंट आसपास की बातचीत को कैप्चर करता था और बाद में उसे व्यवस्थित जानकारी के रूप में उपलब्ध कराता था। Meta ने क्यों खरीदी थी Limitless? 2025 के आखिर में Meta ने Limitless का अधिग्रहण किया था। कंपनी का मानना था कि इस तकनीक की मदद से AI आधारित हार्डवेयर जैसे: स्मार्ट ग्लासेज स्मार्ट वॉच AI असिस्टेंट डिवाइस को तेजी से विकसित किया जा सकेगा। Meta लंबे समय से AI को रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बनाने की दिशा में काम कर रही है और यह पेंडेंट उसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। बातचीत रिकॉर्ड करने पर उठ सकते हैं सवाल AI पेंडेंट का सबसे चर्चित फीचर इसकी बातचीत रिकॉर्ड करने की क्षमता है। हालांकि यही फीचर इसकी सबसे बड़ी चुनौती भी बन सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार ऐसे डिवाइस को लेकर तीन प्रमुख चिंताएं सामने आती हैं: प्राइवेसी और डेटा सुरक्षा बातचीत रिकॉर्ड होने की पारदर्शिता संवेदनशील जानकारी के दुरुपयोग का जोखिम पिछले कुछ AI वियरेबल डिवाइस भी इन्हीं कारणों से बड़े पैमाने पर लोकप्रिय नहीं हो सके थे। AI वियरेबल्स पर बढ़ रहा है दांव AI हार्डवेयर को लेकर प्रतिस्पर्धा लगातार बढ़ रही है। Meta के अलावा OpenAI सहित कई बड़ी टेक कंपनियां ऐसे उपकरण विकसित कर रही हैं जो स्मार्टफोन के बाद अगली बड़ी तकनीकी क्रांति बन सकते हैं। कंपनियों का मानना है कि भविष्य में AI सिर्फ मोबाइल ऐप तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सीधे पहनने वाले डिवाइसों के जरिए लोगों के साथ लगातार जुड़ा रहेगा। "Wearables for Work" भी ला सकती है Meta रिपोर्ट्स के अनुसार Meta केवल AI पेंडेंट तक सीमित नहीं रहने वाली। कंपनी अपने AI-संचालित स्मार्ट ग्लासेज पोर्टफोलियो का भी विस्तार कर रही है। इसके अलावा Meta "Wearables for Work" नाम से एक नई सब्सक्रिप्शन सेवा लॉन्च करने की तैयारी में है, जो विशेष रूप से: कॉर्पोरेट यूजर्स ऑफिस कर्मचारियों एंटरप्राइज ग्राहकों को ध्यान में रखकर विकसित की जा रही है। क्या बदल सकता है AI का भविष्य? यदि Meta का यह प्रोजेक्ट सफल रहता है, तो AI असिस्टेंट को इस्तेमाल करने का तरीका पूरी तरह बदल सकता है। स्मार्टफोन निकालने की जरूरत के बिना यूजर्स सीधे अपने पहनने वाले डिवाइस के जरिए नोट्स, बातचीत और जानकारी को मैनेज कर सकेंगे। हालांकि इसकी सफलता काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगी कि Meta प्राइवेसी और डेटा सुरक्षा से जुड़े सवालों का समाधान किस तरह करती है।
दुनिया भर में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के बढ़ते प्रभाव के बीच कैथोलिक चर्च के प्रमुख पोप लियो XIV ने AI को लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की है। अपने पहले प्रमुख आधिकारिक दस्तावेज़ (Encyclical) में उन्होंने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता को मानवता पर हावी होने से रोकना होगा और इसके विकास व उपयोग पर मजबूत नैतिक तथा कानूनी निगरानी जरूरी है। AI मानव जीवन को तेजी से बदल रहा है पोप लियो XIV ने अपने दस्तावेज़ "Magnifica Humanitas: On Safeguarding the Human Person in the Time of Artificial Intelligence" में लिखा कि AI आज मानव जीवन, सामाजिक संबंधों, संस्थाओं और सत्ता संरचनाओं को गहराई से प्रभावित कर रहा है। उन्होंने कहा कि तकनीकी प्रगति के इस दौर में यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि इंसान ही तकनीक का मार्गदर्शन करे, न कि तकनीक इंसानों को नियंत्रित करने लगे। पोप के अनुसार, AI अब केवल भविष्य की तकनीक नहीं रह गई है, बल्कि यह लोगों के दैनिक जीवन का हिस्सा बन चुकी है। ऐसे में इसके विकास और उपयोग को मानव मूल्यों के अनुरूप बनाए रखना आवश्यक है। AI और मानव बुद्धिमत्ता एक समान नहीं पोप ने स्पष्ट किया कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता को मानव बुद्धिमत्ता के बराबर समझना एक बड़ी भूल होगी। उन्होंने कहा कि AI कुछ मानवीय कार्यों की नकल कर सकती है और कई मामलों में गति व गणना क्षमता में इंसानों से आगे निकल सकती है, लेकिन इसमें मानवीय चेतना, भावनाएं और नैतिक समझ नहीं होती। उन्होंने कहा कि AI न तो प्रेम को समझ सकती है, न जिम्मेदारी को महसूस कर सकती है और न ही दोस्ती, करुणा या नैतिक निर्णय लेने की क्षमता रखती है। इसलिए अंतिम निर्णय और जिम्मेदारी हमेशा इंसानों के हाथ में ही रहनी चाहिए। AI के फायदे हैं, लेकिन सतर्कता भी जरूरी पोप लियो XIV ने यह भी माना कि AI कई क्षेत्रों में उपयोगी साबित हो रही है। स्वास्थ्य, शिक्षा, संचार और प्रशासन जैसे क्षेत्रों में यह बेहतर सेवाएं देने में मदद कर सकती है। हालांकि उन्होंने चेतावनी दी कि बिना पर्याप्त समीक्षा और नियंत्रण के AI को तेजी से अपनाना कई नए जोखिम पैदा कर सकता है। उनके अनुसार, तकनीक का उपयोग मानव कल्याण के लिए होना चाहिए, न कि केवल व्यावसायिक लाभ या राजनीतिक प्रभुत्व के लिए। पर्यावरण पर भी पड़ रहा है AI का असर अपने संदेश में पोप ने AI के पर्यावरणीय प्रभाव पर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि आधुनिक AI मॉडल को चलाने के लिए भारी मात्रा में बिजली, पानी और कंप्यूटिंग संसाधनों की जरूरत होती है। बढ़ते डेटा सेंटर और ऊर्जा-गहन इंफ्रास्ट्रक्चर से कार्बन उत्सर्जन बढ़ रहा है और प्राकृतिक संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव पड़ रहा है। इसलिए उन्होंने अधिक टिकाऊ और पर्यावरण-अनुकूल तकनीकी समाधानों के विकास की अपील की। AI में पक्षपात और असमानता का खतरा पोप ने कहा कि AI पूरी तरह निष्पक्ष तकनीक नहीं है, क्योंकि यह अपने निर्माताओं के डेटा, सोच और प्राथमिकताओं को प्रतिबिंबित करती है। ऐसे में यदि पर्याप्त निगरानी न हो तो यह भेदभाव, असमानता और सामाजिक बहिष्कार को बढ़ावा दे सकती है। उन्होंने AI सिस्टम में पारदर्शिता, जवाबदेही और नैतिक निगरानी को अनिवार्य बताते हुए मजबूत कानूनी ढांचे की मांग की। डेटा और तकनीक पर एकाधिकार के खिलाफ चेतावनी पोप लियो XIV ने कुछ बड़ी कंपनियों के हाथों में डेटा और कंप्यूटिंग शक्ति के केंद्रीकरण पर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि तकनीक का उद्देश्य समाज की भलाई होना चाहिए, न कि केवल बाजार या भू-राजनीतिक शक्ति हासिल करना। उन्होंने सरकारों, नीति निर्माताओं और तकनीकी कंपनियों से अपील की कि AI के विकास में मानव गरिमा, न्याय, समानता और सामाजिक जिम्मेदारी को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए। जिम्मेदार AI विकास की जरूरत पोप का मानना है कि AI आने वाले वर्षों में मानव सभ्यता को गहराई से प्रभावित करेगी। इसलिए अभी से ऐसे नियम और मानक विकसित करने की जरूरत है, जो तकनीकी नवाचार और मानवीय मूल्यों के बीच संतुलन बनाए रखें। उनका संदेश साफ है - AI का भविष्य तभी सुरक्षित होगा जब इंसान उसके विकास और उपयोग पर नियंत्रण बनाए रखे।
AI पर दांव लगा रही Meta, लेकिन कर्मचारी परेशान Meta अपने बिजनेस को तेजी से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित कंपनी में बदलने में जुटी है। लेकिन कंपनी के अंदर काम कर रहे हजारों कर्मचारी इस बदलाव से खुद को असहज और दबाव में महसूस कर रहे हैं। रिपोर्ट के मुताबिक Meta अब अपने कर्मचारियों की कंप्यूटर गतिविधियों को ट्रैक कर रही है ताकि AI मॉडल को ट्रेन किया जा सके। इसमें यह देखा जा रहा है कि कर्मचारी कंप्यूटर पर क्या टाइप करते हैं, माउस कैसे चलाते हैं और स्क्रीन पर क्या देखते हैं। इस फैसले के बाद कंपनी के अंदर कर्मचारियों में नाराजगी बढ़ गई है। कर्मचारियों ने बताया ‘प्राइवेसी का उल्लंघन’ कई कर्मचारियों ने Meta के इस कदम को निजी गोपनीयता में दखल बताया। आंतरिक चैट और पोस्ट्स में कर्मचारियों ने इस फैसले पर कड़ी प्रतिक्रिया दी। एक इंजीनियरिंग मैनेजर ने लिखा कि यह उन्हें बेहद असहज महसूस करा रहा है और पूछा कि क्या इससे बाहर निकलने का कोई विकल्प है। इस पर Andrew Bosworth ने जवाब दिया कि कंपनी के लैपटॉप पर काम करने वालों के पास “ऑप्ट-आउट” का विकल्प नहीं होगा। AI इस्तेमाल अब परफॉर्मेंस रिव्यू का हिस्सा रिपोर्ट में दावा किया गया है कि Meta अब कर्मचारियों के AI टूल इस्तेमाल को उनके प्रदर्शन मूल्यांकन का हिस्सा भी बना रही है। कंपनी अपने 78 हजार कर्मचारियों को AI टूल अपनाने के लिए लगातार प्रेरित कर रही है। इसके लिए “AI Transformation Weeks” जैसे कार्यक्रम भी आयोजित किए गए, जहां कर्मचारियों को AI एजेंट और AI कोडिंग टूल्स इस्तेमाल करना सिखाया गया। नौकरी कटौती से बढ़ी चिंता AI पर भारी निवेश के बीच कंपनी लागत कम करने के लिए कर्मचारियों की छंटनी भी कर रही है। Meta ने हाल ही में करीब 10 प्रतिशत कर्मचारियों की कटौती की घोषणा की थी। रिपोर्ट्स के मुताबिक लगभग 8 हजार कर्मचारियों की नौकरी जा सकती है। इससे कंपनी के अंदर डर और असुरक्षा का माहौल बन गया है। कई कर्मचारी अब नई नौकरी तलाश रहे हैं, जबकि कुछ लोग चाहते हैं कि उन्हें भी छंटनी में शामिल किया जाए ताकि उन्हें सेवरेंस पैकेज मिल सके। ‘क्या हम अपनी जगह लेने वाले AI को ट्रेन कर रहे हैं?’ कर्मचारियों के बीच सबसे बड़ी चिंता यही है कि कहीं वे खुद अपने AI रिप्लेसमेंट को ट्रेन तो नहीं कर रहे। विशेषज्ञों का कहना है कि AI कर्मचारियों की उत्पादकता बढ़ा सकता है, लेकिन इससे काम का दबाव और मानसिक तनाव भी तेजी से बढ़ रहा है। Mark Zuckerberg लगातार AI और “Superintelligence” को कंपनी का भविष्य बता रहे हैं। Meta फेसबुक और इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफॉर्म में AI फीचर्स को तेजी से जोड़ रही है और डेटा सेंटर व AI मॉडल पर अरबों डॉलर खर्च कर रही है। कंपनियों के लिए बड़ा संकेत विशेषज्ञ मानते हैं कि आने वाले समय में दूसरी टेक कंपनियां भी इसी तरह AI आधारित बदलाव करेंगी। लेकिन अगर कर्मचारियों की मानसिक स्थिति, प्राइवेसी और नौकरी की सुरक्षा पर ध्यान नहीं दिया गया तो असंतोष और बढ़ सकता है। अब टेक इंडस्ट्री के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि AI और कर्मचारियों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
चेन्नई, एजेंसियां। अभिनेता से नेता बने थलापति विजय ने रविवार को तमिलनाडु के 9वें मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। चेन्नई के जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम में आयोजित समारोह में राहुल गांधी और तृषा समेत कई हस्तियां मौजूद रहीं। विजय के सीएम की शपथ लेने के बाद एक्टर कमल हासन और प्रकाश राज ने उन्हें बधाई दी। कमल हासन ने कहा, ‘तमिलगा वेत्री कड़गम के अध्यक्ष और तमिलनाडु के माननीय मुख्यमंत्री मेरे भाई थिरु विजय को शुभकामनाएं। उम्मीद है कि उनके नेतृत्व में तमिलनाडु नई ऊंचाइयों तक पहुंचेगा। मैं उन्हें दिल से बधाई देता हूं।’ वहीं प्रकाश राज ने ट्वीट कर लिखा, ‘मुख्यमंत्री विजय को बहुत-बहुत बधाई। नई जिम्मेदारी के लिए शुभकामनाएं। उम्मीद है कि आपके नेतृत्व में राज्य और तरक्की करेगा। आर माधवन ने भी दी बधाई एक्टर आर माधवन ने भी विजय को बधाई दी। माधवन ने इंस्टाग्राम अकाउंट पर विजय की एक फोटो शेयर की और साथ ही लिखा, 'भगवान आपका भला करे और मुझे आप पर बहुत गर्व है। तृषा ने विजय की मां से मुलाकात की शपथ ग्रहण समारोह में एक्ट्रेस तृषा कृष्णन भी पहुंचीं। उन्होंने विजय के परिवार से मुलाकात की और उनकी मां से गले मिलती नजर आईं। विजय ने सुबह 10.15 बजे तमिल में शपथ ली तमिलगा वेत्री कड़गम (TVK) चीफ और एक्टर से नेता बने सी जोसेफ विजय ने रविवार सुबह 10.15 बजे तमिल में सीएम पद की शपथ ली। इस दौरान राहुल गांधी भी मौजूद रहे। विजय शपथ लेते समय निर्धारित लाइनों के अलावा और बातें बोलने लगे। इस पर राज्यपाल अर्लेकर ने उन्हें टोक दिया और कहा कि वही पढ़ें जो लिखकर दिया है। 9 मंत्रियों ने भी शपथ ली विजय के साथ 9 और मंत्रियों ने भी शपथ ली। इनमें एन आनंद, आधव अर्जुन, डॉ. केजी अरुणराज, केए सेंगोट्टैयन, पी वेंकटरमणन, आर निर्मलकुमार, राजमोहन, डॉ. टीके प्रभु, सेल्वी एस कीर्तना शामिल हैं। ये सभी विजय की पार्टी TVK के विधायक हैं। सहयोगी दलों के किसी विधायक को मंत्रिमंडल में शामिल नहीं किया गया है।
आज की दुनिया इंटरनेट के बिना लगभग ठहर सी जाती है। ईमेल भेजना हो, वीडियो कॉल करनी हो या सोशल मीडिया स्क्रॉल करना हो, हर काम कुछ सेकंड में पूरा हो जाता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि हजारों किलोमीटर दूर भेजा गया डेटा इतनी तेजी से कैसे पहुंच जाता है? ज्यादातर लोगों को लगता है कि यह सब अंतरिक्ष में मौजूद सैटेलाइट्स के जरिए होता है, जबकि असल सच्चाई कुछ और है। दुनिया के करीब 95 प्रतिशत इंटरनेट ट्रैफिक का आधार समुद्र के नीचे बिछी फाइबर-ऑप्टिक केबलें हैं, जिन्हें सबमरीन कम्युनिकेशन केबल कहा जाता है। यही केबलें दुनिया के अलग-अलग देशों और महाद्वीपों को डिजिटल रूप से जोड़ती हैं। समुद्र के नीचे कैसे काम करता है इंटरनेट का नेटवर्क? समुद्र के नीचे बिछी ये केबलें बेहद पतले ऑप्टिकल फाइबर से बनी होती हैं, जिनके जरिए डेटा प्रकाश (light signals) के रूप में ट्रांसफर किया जाता है। इन केबलों का काम एक देश से दूसरे देश तक इंटरनेट डेटा पहुंचाना होता है। ईमेल, वीडियो कॉल, वेबसाइट, क्लाउड सर्विस और सोशल मीडिया जैसे लगभग सभी इंटरनेशनल ऑनलाइन कम्युनिकेशन इन्हीं के जरिए चलते हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक दुनिया में डेटा ट्रांसफर का 95% से ज्यादा हिस्सा इन्हीं केबलों से होकर गुजरता है। यही वजह है कि इन्हें ग्लोबल इंटरनेट की “रीढ़ की हड्डी” भी कहा जाता है। एक सेकंड में भेज सकती हैं कई फिल्में ये हाई-स्पीड फाइबर-ऑप्टिक केबल हर सेकंड कई टेराबिट डेटा ट्रांसमिट करने की क्षमता रखती हैं। एक टेराबिट प्रति सेकंड की स्पीड इतनी तेज होती है कि इसमें कुछ ही पलों में कई 4K HD फिल्में भेजी जा सकती हैं। यही कारण है कि लाखों लोग एक साथ वीडियो स्ट्रीमिंग, गेमिंग और वीडियो कॉलिंग कर पाते हैं। दुनिया भर में फैला है केबलों का विशाल जाल रिपोर्ट्स के अनुसार दुनिया के महासागरों में लगभग 485 से ज्यादा सबमरीन केबलें बिछी हुई हैं। इनकी कुल लंबाई करीब 9 लाख मील से ज्यादा बताई जाती है। ये केबलें अटलांटिक और प्रशांत महासागर के साथ-साथ स्वेज नहर जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों से होकर गुजरती हैं। कई केबलें बेहद गहरे और दूरदराज समुद्री इलाकों तक फैली हुई हैं। इतने मजबूत होने के बावजूद हर साल कट जाती हैं कई केबलें समुद्र के नीचे बिछी इन केबलों को कई सुरक्षात्मक परतों से ढका जाता है ताकि वे समुद्री दबाव, घर्षण और बाहरी नुकसान से बच सकें। इनमें स्टील कवच जैसी मजबूत लेयर भी शामिल होती हैं। फिर भी हर साल लगभग 100 से 150 केबलें क्षतिग्रस्त हो जाती हैं। इसके पीछे मुख्य कारण जहाजों के एंकर, मछली पकड़ने वाले उपकरण और समुद्री गतिविधियां होती हैं। अगर किसी बड़े रूट की केबल कट जाए तो कई देशों में इंटरनेट सेवाएं प्रभावित हो सकती हैं। कैसे सुरक्षित रखी जाती हैं ये केबलें? सबमरीन केबल बिछाने से पहले समुद्री रास्तों का गहराई से अध्ययन किया जाता है ताकि उन्हें सुरक्षित क्षेत्रों से गुजारा जा सके। इसके अलावा कंपनियां मजबूत मटेरियल और आधुनिक निगरानी तकनीक का इस्तेमाल करती हैं। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय कानूनों को और मजबूत बनाने की जरूरत है ताकि इन केबलों को जानबूझकर नुकसान पहुंचाने की घटनाओं को रोका जा सके। क्यों जरूरी हैं ये केबलें? आज पूरी दुनिया डिजिटल अर्थव्यवस्था पर निर्भर है। बैंकिंग, सोशल मीडिया, क्लाउड कंप्यूटिंग, ऑनलाइन मीटिंग, AI सर्वर और वीडियो स्ट्रीमिंग जैसी सेवाएं इन्हीं केबलों पर टिकी हैं। यानी अगली बार जब आप Google पर कुछ सर्च करें या Facebook खोलें, तो याद रखिए कि आपके फोन तक पहुंचने वाला डेटा समुद्र की गहराइयों से होकर आया है।
नई दिल्ली: मेडिकल टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में एक बड़ी सफलता सामने आई है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आधारित एक नया डीप लर्निंग मॉडल अब MRI स्कैन के जरिए ब्रेन ट्यूमर की पहचान को और तेज़, सटीक और भरोसेमंद बना सकता है। इस तकनीक का नाम MultiAttenNet है, जो जटिल मामलों में भी ट्यूमर को बेहतर तरीके से पहचानने में सक्षम है। कैसे काम करता है यह AI मॉडल? MultiAttenNet एक हाइब्रिड डीप लर्निंग सिस्टम है, जिसमें: मल्टी-स्केल CNN (Convolutional Neural Networks) ट्रांसफॉर्मर बेस्ड अटेंशन मैकेनिज्म का इस्तेमाल किया गया है। यह तकनीक न सिर्फ इमेज के छोटे-छोटे हिस्सों को बारीकी से समझती है, बल्कि पूरे MRI स्कैन का कॉन्टेक्स्ट भी पकड़ती है। इससे अलग-अलग आकार और अनियमित संरचना वाले ट्यूमर की पहचान आसान हो जाती है। फॉल्स पॉजिटिव कम, सटीकता ज्यादा इस मॉडल की सबसे बड़ी खासियत है इसका “अडैप्टिव अटेंशन सिस्टम”, जो सिर्फ जरूरी हिस्सों पर फोकस करता है। इससे: गलत अलर्ट (False Positives) कम होते हैं ट्यूमर की लोकेशन और बाउंड्री ज्यादा सटीक मिलती है कितनी है सटीकता? रिसर्च के दौरान इस मॉडल का परीक्षण कई बड़े डेटासेट्स पर किया गया, जिनमें Brain Tumor Segmentation 2023 शामिल है। नतीजे बेहद प्रभावशाली रहे: Accuracy: 98.4% Sensitivity: 96.8% Specificity: 99.2% False Positive Rate: सिर्फ 1.3% यह प्रदर्शन मौजूदा कई एडवांस सिस्टम्स से बेहतर बताया जा रहा है। कम डेटा में भी असरदार इस AI मॉडल की एक खासियत यह भी है कि यह “सेमी-सुपरवाइज्ड लर्निंग” पर काम करता है। यानी: कम लेबल्ड डेटा में भी ट्रेन हो सकता है अनलेबल्ड डेटा का भी उपयोग करता है अलग-अलग क्लीनिकल परिस्थितियों में बेहतर काम करता है डॉक्टरों और मरीजों के लिए क्या मतलब? ब्रेन ट्यूमर की जल्दी और सही पहचान इलाज के लिए बेहद जरूरी होती है। इस तकनीक से: डॉक्टरों का वर्कलोड कम होगा डायग्नोसिस में एकरूपता (Consistency) बढ़ेगी मरीजों को जल्दी और बेहतर इलाज मिल सकेगा
देश में हर साल बढ़ती गर्मी और हीटवेव के बीच एयर कंडीशनर अब सिर्फ लग्ज़री नहीं, बल्कि जरूरत बन चुका है। ऐसे में IIT Delhi और भारतीय स्टार्टअप Optimist ने मिलकर एक ऐसा 1.5 Ton 5 Star Split AC तैयार किया है, जो 50 डिग्री सेल्सियस तक की भीषण गर्मी में भी कूलिंग देने का दावा करता है। यह इनोवेशन खासतौर पर भारतीय परिस्थितियों को ध्यान में रखकर विकसित किया गया है। एक्सट्रीम हीट के लिए बना खास AC भारत के कई हिस्सों में गर्मियों में तापमान 45°C से ऊपर पहुंच जाता है, जहां पारंपरिक AC की क्षमता कम होने लगती है। इस नए AC की खासियतें: 50°C तक भी स्थिर और प्रभावी कूलिंग हाई-एंबिएंट कूलिंग टेक्नोलॉजी लंबे समय तक लगातार चलने की क्षमता गर्म हवा में भी कंप्रेसर की बेहतर परफॉर्मेंस कंपनी का दावा है कि यह AC सिर्फ ठंडी हवा नहीं देता, बल्कि कठिन मौसम में भी लगातार परफॉर्म करता है, जो इसे बाकी मॉडलों से अलग बनाता है। रिसर्च-बेस्ड टेक्नोलॉजी, IIT का साथ इस प्रोजेक्ट को मजबूत बनाने में IIT Delhi की अहम भूमिका रही है। लंबे समय तक रिसर्च और डेवलपमेंट एडवांस लैब टेस्टिंग रियल वर्ल्ड कंडीशन्स में ट्रायल स्टार्टअप Optimist का कहना है कि इस AC को सिर्फ सैद्धांतिक नहीं, बल्कि प्रैक्टिकल उपयोग के लिए डिजाइन किया गया है। संभावित एडवांस फीचर्स (रिपोर्ट्स के आधार पर) हालांकि कंपनी ने सभी टेक्निकल डिटेल्स सार्वजनिक नहीं की हैं, लेकिन इसमें कुछ आधुनिक फीचर्स होने की उम्मीद है: इन्वर्टर टेक्नोलॉजी (कम बिजली खपत) बेहतर हीट एक्सचेंज सिस्टम मजबूत कंप्रेसर, जो हाई टेम्परेचर में भी काम करे एनर्जी एफिशिएंसी के लिए 5-स्टार रेटिंग कीमत और वैल्यू फॉर मनी कीमत: लगभग ₹44,490 कैटेगरी: प्रीमियम सेगमेंट इस कीमत में 50°C तक कूलिंग देने का दावा इसे खास बनाता है। आम तौर पर इस रेंज में मिलने वाले AC इतने एक्सट्रीम तापमान के लिए डिजाइन नहीं होते। किन इलाकों के लिए बेस्ट? यह AC खासतौर पर उन जगहों के लिए उपयोगी है जहां गर्मी रिकॉर्ड स्तर तक पहुंचती है: दिल्ली-एनसीआर राजस्थान उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के कई हिस्से औद्योगिक या गर्म वातावरण वाले इलाके इसके अलावा, जिन लोगों को 24x7 कूलिंग चाहिए, उनके लिए भी यह एक भरोसेमंद विकल्प हो सकता है। भारतीय AC मार्केट पर असर अगर यह टेक्नोलॉजी बड़े पैमाने पर सफल होती है, तो इसके कई बड़े प्रभाव हो सकते हैं: भारतीय कंपनियों की टेक्नोलॉजी में आत्मनिर्भरता बढ़ेगी विदेशी ब्रांड्स को कड़ी टक्कर मिलेगी एक्सट्रीम वेदर के लिए नए स्टैंडर्ड सेट होंगे रिसर्च-बेस्ड प्रोडक्ट्स का ट्रेंड बढ़ेगा यह इनोवेशन “मेक इन इंडिया” और “डिजाइन इन इंडिया” की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा सकता है। ध्यान रखने वाली बातें हालांकि यह AC काफी एडवांस बताया जा रहा है, लेकिन खरीदने से पहले कुछ बातों पर ध्यान देना जरूरी है: आपके कमरे का साइज (1.5 टन उपयुक्त है या नहीं) बिजली की खपत और बिल सर्विस नेटवर्क और वारंटी आपके इलाके का वास्तविक तापमान
Apple में नेतृत्व परिवर्तन का ऐलान टेक दिग्गज Apple ने अपने टॉप लीडरशिप में बड़ा बदलाव घोषित किया है। कंपनी के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट (हार्डवेयर इंजीनियरिंग) John Ternus को 1 सितंबर 2026 से नया CEO नियुक्त किया गया है। वहीं मौजूदा CEO Tim Cook इस पद से हटकर कंपनी के बोर्ड में एग्जीक्यूटिव चेयरमैन की भूमिका निभाएंगे। कंपनी के अनुसार, यह फैसला लंबे समय से चल रही सक्सेशन प्लानिंग का हिस्सा है, जिसे बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स ने सर्वसम्मति से मंजूरी दी है। स्मूद ट्रांजिशन के लिए साथ काम करेंगे Cook और Ternus Apple ने स्पष्ट किया है कि Tim Cook इस साल गर्मियों तक CEO के रूप में काम करते रहेंगे, ताकि John Ternus के साथ नेतृत्व परिवर्तन सुचारू तरीके से हो सके। नई भूमिका में Cook कंपनी की ग्लोबल पॉलिसी और अहम कॉर्पोरेट फैसलों पर ध्यान केंद्रित करेंगे। वहीं, Arthur Levinson लीड इंडिपेंडेंट डायरेक्टर की भूमिका संभालेंगे और Ternus भी बोर्ड में शामिल होंगे। Tim Cook का कार्यकाल और उपलब्धियां Tim Cook ने 1998 में Apple जॉइन किया था और 2011 में CEO बने थे। उनके नेतृत्व में कंपनी ने जबरदस्त वित्तीय और तकनीकी विस्तार हासिल किया। Cook के कार्यकाल में iPhone, Apple Watch, AirPods और अन्य प्रोडक्ट्स ने कंपनी को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया। उन्होंने कहा कि Apple का नेतृत्व करना उनके जीवन का सबसे बड़ा सम्मान रहा है और कंपनी के साथ उनका जुड़ाव हमेशा बना रहेगा। John Ternus पर बड़ी जिम्मेदारी करीब 25 वर्षों से Apple के साथ जुड़े John Ternus कंपनी के कई प्रमुख प्रोडक्ट्स–जैसे iPhone, iPad, Mac और Apple Watch–के विकास में अहम भूमिका निभा चुके हैं। Ternus ने इस नई जिम्मेदारी को स्वीकार करते हुए कहा कि Apple के मिशन को आगे बढ़ाना उनके लिए गर्व की बात है। उन्होंने Steve Jobs और Tim Cook से मिली सीख को आगे ले जाने की बात कही। विशेषज्ञों के अनुसार, यह बदलाव Apple के अगले दौर की रणनीति, खासकर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और नई तकनीकों पर फोकस को मजबूत करने की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है।
मैसेजिंग प्लेटफॉर्म WhatsApp यूजर्स के अनुभव को और बेहतर बनाने के लिए कई नए फीचर्स पर काम कर रहा है। आने वाले अपडेट्स में खासतौर पर बिजनेस और पर्सनल चैट्स को अलग करने पर फोकस किया गया है, जिससे ऐप का इस्तेमाल ज्यादा आसान और व्यवस्थित हो सके। बिजनेस चैट्स के लिए अलग इनबॉक्स WhatsApp जल्द ही एक नया फीचर लाने वाला है, जिसमें: बिजनेस से जुड़े मैसेज के लिए अलग इनबॉक्स मिलेगा इससे यूजर्स अपनी पर्सनल और प्रोफेशनल चैट्स को अलग-अलग मैनेज कर पाएंगे जरूरी बिजनेस मैसेज ढूंढना और जवाब देना आसान हो जाएगा यह फीचर खासकर उन लोगों के लिए फायदेमंद होगा जो WhatsApp का इस्तेमाल काम के लिए भी करते हैं। आने वाले 3 बड़े फीचर्स 1. यूजरनेम फीचर अब बिना मोबाइल नंबर शेयर किए चैटिंग संभव होगी हर यूजर का एक यूनिक यूजरनेम होगा इससे प्राइवेसी और सुरक्षा दोनों बढ़ेंगी 2. नॉइज कैंसिलेशन कॉल के दौरान बैकग्राउंड का शोर कम किया जा सकेगा आवाज ज्यादा साफ और स्पष्ट सुनाई देगी भीड़भाड़ या शोर वाले माहौल में यह फीचर काफी मददगार होगा 3. चैट प्राइवेसी अपडेट्स नए सिक्योरिटी फीचर्स जोड़े जाएंगे यूजर्स को अपनी चैट्स पर ज्यादा कंट्रोल मिलेगा डेटा सुरक्षा को और मजबूत किया जाएगा कब तक आएंगे ये फीचर्स? फिलहाल ये सभी फीचर्स डेवलपमेंट स्टेज में हैं अभी तक इन्हें बीटा वर्जन में भी जारी नहीं किया गया है संभावना है कि आने वाले WhatsApp अपडेट्स में इन्हें धीरे-धीरे रोलआउट किया जाएगा क्या बदलेगा यूजर एक्सपीरियंस? इन नए फीचर्स के आने के बाद WhatsApp का इस्तेमाल: ज्यादा सुरक्षित ज्यादा व्यवस्थित और पहले से ज्यादा प्रोफेशनल हो जाएगा
गर्मियों के मौसम में एयर कंडीशनर (AC) का इस्तेमाल तेजी से बढ़ जाता है। ऐसे में कई लोग बिजली बचाने के लिए AC को हर 10–15 मिनट में ऑन-ऑफ करते रहते हैं। लेकिन क्या यह तरीका सही है? एक्सपर्ट्स के मुताबिक, यह आदत फायदे की बजाय नुकसान पहुंचा सकती है। क्या बार-बार AC ऑन-ऑफ करना सही है? टेक्निकल तौर पर AC को बार-बार ऑन-ऑफ करना गलत माना जाता है। जब भी AC चालू किया जाता है, उसका कंप्रेसर (compressor) शुरुआत में ज्यादा बिजली खपत करता है। ऐसे में अगर आप इसे बार-बार बंद करके फिर चालू करते हैं, तो हर बार स्टार्टिंग लोड बढ़ता है, जिससे कुल बिजली खपत ज्यादा हो जाती है। क्यों बढ़ जाता है बिजली बिल? हर बार ON करने पर कंप्रेसर को ज्यादा पावर चाहिए होती है बार-बार स्टार्ट होने से यूनिट को कमरे को फिर से ठंडा करने में ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है इससे बिजली की खपत कम होने के बजाय बढ़ जाती है AC को नुकसान कैसे होता है? कंप्रेसर पर बार-बार दबाव पड़ता है मशीन के पार्ट्स जल्दी घिसने लगते हैं AC की लाइफ कम हो सकती है खराब होने की संभावना बढ़ जाती है सही तरीका क्या है? AC को बार-बार ऑन-ऑफ करने के बजाय लगातार चलने दें तापमान 24–26°C के बीच सेट रखें (यह सबसे ऊर्जा-कुशल माना जाता है) टाइमर या स्लीप मोड का इस्तेमाल करें कमरे को पूरी तरह बंद रखें ताकि कूलिंग बनी रहे नियमित सर्विसिंग कराते रहें AC को बार-बार ऑन-ऑफ करना बिजली बचाने का तरीका नहीं है, बल्कि इससे बिजली बिल बढ़ सकता है और मशीन पर भी बुरा असर पड़ता है। सही उपयोग और सेटिंग्स अपनाकर ही आप बेहतर कूलिंग के साथ
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे। कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है। CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है। सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया। पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।
भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं? क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है? हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।
नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें। 118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है। गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया। रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता। प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।
लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है। फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी। मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो। क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी। क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ। कैसे हुई मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।