US Foreign Policy

US Vice President JD Vance speaks on diplomacy and Middle East security amid criticism of the America-Iran agreement from Israeli leaders.
‘हर समस्या का हल युद्ध नहीं’, जेडी वेंस ने इजराइल को दिया दो टूक संदेश; अमेरिका-ईरान समझौते का किया बचाव

  वॉशिंगटन/तेल अवीव: अमेरिका-ईरान समझौते को लेकर इजराइली नेताओं की लगातार आलोचना के बीच अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने इजराइल को स्पष्ट संदेश दिया है कि हर क्षेत्रीय और राष्ट्रीय सुरक्षा चुनौती का समाधान केवल सैन्य ताकत या युद्ध के जरिए नहीं निकाला जा सकता। उन्होंने कहा कि दीर्घकालिक समस्याओं के समाधान के लिए बातचीत, कूटनीति और राजनीतिक प्रयासों पर भी समान रूप से ध्यान देना आवश्यक है। अमेरिकी अखबार द न्यूयॉर्क टाइम्स को दिए एक इंटरव्यू में वेंस ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ईरान नीति और हालिया अमेरिका-ईरान समझौते का बचाव करते हुए इजराइली नेतृत्व से अमेरिका के कूटनीतिक प्रयासों का समर्थन करने की अपील की। ‘हर समस्या का समाधान लोगों को मारकर नहीं निकाला जा सकता’ जेडी वेंस ने कहा कि इजराइल को अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा चुनौतियों के समाधान के लिए केवल सैन्य अभियानों और हमलों पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। उन्होंने कहा, “आप सिर्फ 90 लाख की आबादी वाला देश हैं। आप अपनी हर राष्ट्रीय सुरक्षा चुनौती का समाधान केवल लोगों को मारकर या सैन्य कार्रवाई के जरिए नहीं निकाल सकते।” वेंस ने संकेत दिया कि सुरक्षा संबंधी जटिल समस्याओं के समाधान के लिए कूटनीतिक संवाद और राजनीतिक समझौते जैसे विकल्पों को भी प्राथमिकता दी जानी चाहिए। इजराइली नेताओं की आलोचना के बीच आया बयान जेडी वेंस की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की सरकार के कई वरिष्ठ मंत्री और इजराइल के राजनीतिक नेता अमेरिका-ईरान समझौते पर लगातार सवाल उठा रहे हैं। इजराइली नेतृत्व का आरोप है कि इस समझौते में: ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर पर्याप्त नियंत्रण की व्यवस्था नहीं है। बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम को प्रभावी ढंग से सीमित नहीं किया गया है। लेबनान में हिज्बुल्लाह के खिलाफ इजराइल की सैन्य कार्रवाई की स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है। अमेरिका की नीति का किया बचाव वेंस ने स्पष्ट किया कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीति का उद्देश्य पश्चिम एशिया में तनाव कम करना और संघर्ष के स्थायी समाधान की दिशा में आगे बढ़ना है। उन्होंने कहा कि अमेरिका कूटनीतिक माध्यमों से क्षेत्रीय स्थिरता स्थापित करने का प्रयास कर रहा है और सहयोगी देशों से भी इसी दिशा में रचनात्मक समर्थन की अपेक्षा रखता है। उन्होंने इशारों में यह भी कहा कि अमेरिका की नीतियों की सार्वजनिक आलोचना करने के बजाय इजराइल को अपने सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक सहयोगी के साथ समन्वय बढ़ाने की जरूरत है। पश्चिम एशिया की राजनीति में बढ़ सकती है नई बहस विशेषज्ञों का मानना है कि जेडी वेंस का बयान अमेरिका और इजराइल के बीच ईरान नीति को लेकर उभरते मतभेदों को सार्वजनिक रूप से सामने लाता है। अमेरिका जहां कूटनीतिक समाधान और क्षेत्रीय तनाव कम करने पर जोर दे रहा है, वहीं इजराइल ईरान की सैन्य और परमाणु क्षमताओं को लेकर अपनी सुरक्षा चिंताओं को प्रमुखता दे रहा है। अमेरिका-ईरान समझौते पर जारी बहस आने वाले दिनों में पश्चिम एशिया की रणनीतिक राजनीति और अमेरिका-इजराइल संबंधों की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।  

Deepshikha जून 19, 2026 0
US President Donald Trump speaking as Israel-Iran tensions rise amid diplomatic efforts to avoid wider regional conflict.
ट्रंप का नेतन्याहू को सख्त संदेश: ईरान से टकराव बढ़ाया तो अमेरिका नहीं देगा साथ

  वॉशिंगटन: इजराइल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को स्पष्ट संदेश दिया है कि यदि इजराइल ने ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई को और बढ़ाया, तो उसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गंभीर परिणामों का सामना करना पड़ सकता है। ट्रंप ने संकेत दिया कि अमेरिका फिलहाल क्षेत्र में युद्ध नहीं, बल्कि कूटनीतिक समाधान को प्राथमिकता देना चाहता है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, ट्रंप ने नेतन्याहू के साथ हुई बातचीत में कहा कि मध्य पूर्व को एक और बड़े युद्ध की ओर धकेलने वाले कदमों से बचना जरूरी है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि इजराइल और ईरान के बीच संघर्ष और गहराता है, तो तेहरान के साथ चल रही बातचीत पूरी तरह पटरी से उतर सकती है। बातचीत के रास्ते को बचाना चाहता है अमेरिका व्हाइट हाउस के सूत्रों के मुताबिक, ट्रंप प्रशासन की सबसे बड़ी चिंता यह है कि मौजूदा तनाव कहीं व्यापक क्षेत्रीय युद्ध में न बदल जाए। अमेरिका इस समय ईरान के साथ बातचीत के जरिए तनाव कम करने की कोशिशों में लगा हुआ है और वह नहीं चाहता कि सैन्य टकराव इन प्रयासों को विफल कर दे। ट्रंप का मानना है कि किसी भी नए बड़े संघर्ष की स्थिति में अमेरिका को भी सीधे या परोक्ष रूप से इसमें शामिल होना पड़ सकता है, जिससे पूरे क्षेत्र की सुरक्षा स्थिति और जटिल हो जाएगी। बेरूत हमले के बाद बढ़ा तनाव तनाव उस समय और बढ़ गया जब रविवार को इजराइल ने लेबनान की राजधानी बेरूत में हिज्बुल्लाह से जुड़े ठिकानों पर हमला किया। इसके जवाब में ईरान ने इजराइल की ओर कई मिसाइलें दागीं। इन घटनाओं ने पूरे मध्य पूर्व में बड़े युद्ध की आशंकाओं को फिर से हवा दे दी। क्षेत्रीय विशेषज्ञों का मानना है कि यदि दोनों देशों के बीच जवाबी हमलों का सिलसिला जारी रहा, तो स्थिति तेजी से नियंत्रण से बाहर जा सकती है। ट्रंप की आपत्तियों के बावजूद इजराइल ने की सीमित कार्रवाई रिपोर्ट के अनुसार, ट्रंप की ओर से संयम बरतने की सलाह दिए जाने के बावजूद नेतन्याहू ने अमेरिकी प्रशासन को स्पष्ट कर दिया था कि इजराइल अपनी सुरक्षा को लेकर कोई समझौता नहीं करेगा और आवश्यक होने पर सीमित सैन्य कार्रवाई करेगा। इसके बाद इजराइल ने ईरान से जुड़े कुछ ठिकानों को निशाना बनाया। जवाब में ईरान ने भी मिसाइल हमलों का नया दौर शुरू कर दिया। यह टकराव पूर्ण युद्ध में नहीं बदला, लेकिन दोनों देशों के बीच तनाव लगातार बना हुआ है। अमेरिका ने सीधे हिस्सा नहीं लिया, लेकिन इजराइल की मदद की अमेरिका इस सैन्य कार्रवाई में सीधे तौर पर शामिल नहीं हुआ, लेकिन क्षेत्र में तैनात अमेरिकी सैन्य संसाधनों ने इजराइल की रक्षा में सहयोग किया। रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिकी सेना ने इजराइल की ओर बढ़ रही कई ईरानी मिसाइलों को रोकने में मदद की। इससे यह भी स्पष्ट हुआ कि अमेरिका अपने सहयोगी इजराइल की सुरक्षा को लेकर प्रतिबद्ध है, लेकिन वह संघर्ष के विस्तार से बचना चाहता है। फोन कॉल में फिर हुई बातचीत तनाव बढ़ने के बाद ट्रंप ने एक बार फिर नेतन्याहू से फोन पर संपर्क किया। इस बातचीत में उन्होंने इजराइली प्रधानमंत्री से बड़े पैमाने पर जवाबी हमले की योजना को रोकने का आग्रह किया। सूत्रों के अनुसार, ट्रंप ने साफ कहा कि मौजूदा हालात में किसी भी आक्रामक कदम से पूरे क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ सकती है और अमेरिका की कूटनीतिक रणनीति को नुकसान पहुंच सकता है। तनाव कम करने पर बनी सहमति रिपोर्ट के मुताबिक, दोनों नेताओं के बीच हुई बातचीत के बाद एक सीमित सहमति बनी। नेतन्याहू ने संकेत दिया कि यदि ईरान की ओर से कोई नया हमला नहीं किया जाता है, तो इजराइल भी आगे सैन्य कार्रवाई नहीं करेगा। इस समझ के बाद क्षेत्र में तत्काल तनाव को कम करने की कोशिश की गई है। हालात अभी भी नाजुक बने हुए हैं और अंतरराष्ट्रीय समुदाय दोनों देशों के अगले कदमों पर करीबी नजर बनाए हुए है। मध्य पूर्व की राजनीति पर दूरगामी असर संभव विशेषज्ञों का मानना है कि इजराइल-ईरान तनाव केवल दो देशों के बीच का विवाद नहीं है, बल्कि इसका असर पूरे मध्य पूर्व की सुरक्षा व्यवस्था, वैश्विक ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति पर पड़ सकता है। ऐसे में ट्रंप प्रशासन की कोशिश है कि सैन्य टकराव को सीमित रखा जाए और संवाद के रास्ते खुले रहें। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि दोनों पक्ष संयम बरतते हैं या क्षेत्र एक नए संकट की ओर बढ़ता है।  

Deepshikha जून 9, 2026 0
US President Donald Trump speaks about Iran talks, nuclear concerns, and a possible diplomatic agreement.
ट्रंप बोले- समझौते से हो या सैन्य कार्रवाई से, अंत में अमेरिका ही जीतेगा

  अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने ईरान के साथ जारी तनाव और वार्ता को लेकर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे टकराव का अंत चाहे कूटनीतिक समझौते से हो या सैन्य ताकत के जरिए, नतीजा अमेरिका के पक्ष में ही रहेगा। व्हाइट हाउस में पत्रकारों से बातचीत के दौरान ट्रंप ने कहा कि वॉशिंगटन और तेहरान के बीच जारी बातचीत का उद्देश्य कई महीनों से चल रहे संकट को समाप्त करना है। खामेनेई से मुलाकात के संकेत ट्रंप ने ईरान के सर्वोच्च नेता Mojtaba Khamenei से संभावित मुलाकात को लेकर भी सकारात्मक संकेत दिए। उन्होंने कहा, "अगर समझौता होता है और मुलाकात का अवसर मिलता है तो मुझे उनसे मिलकर खुशी होगी। मुझे इसमें कोई आपत्ति नहीं है।" ट्रंप ने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसी मुलाकात किसी संभावित समझौते की स्थिति में ही संभव हो सकती है। एनरिच्ड यूरेनियम पर अमेरिका की नजर अमेरिकी राष्ट्रपति ने ईरान के संवर्धित यूरेनियम भंडार का उल्लेख करते हुए दावा किया कि अमेरिका उस पर लगातार नजर रखे हुए है। उन्होंने कहा कि यदि अमेरिका चाहे तो उस सामग्री पर नियंत्रण हासिल कर सकता है, लेकिन फिलहाल ऐसी किसी कार्रवाई की आवश्यकता नहीं है। ट्रंप के अनुसार यूरेनियम सुरक्षित स्थान पर है और उसकी गतिविधियों पर निगरानी रखी जा रही है। समझौते के लिए अमेरिका की दो प्रमुख शर्तें ट्रंप ने संभावित समझौते की दो मुख्य शर्तें भी सामने रखीं। ईरान कभी भी परमाणु हथियार हासिल न कर सके। Strait of Hormuz को पूरी तरह से खोला जाए। होर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का प्रमुख समुद्री मार्ग माना जाता है और दुनिया के तेल व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। तेहरान का जवाब- मसौदे में कई बातें अब भी अस्पष्ट ईरान की ओर से बातचीत को लेकर सतर्क रुख अपनाया गया है। खामेनेई के सलाहकार Mohsen Rezaee ने कहा कि प्रस्तावित समझौते में कई महत्वपूर्ण बिंदु अब भी स्पष्ट नहीं हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि अमेरिका अपनी शर्तों को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहा है, जबकि ईरान की चिंताओं और मांगों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया जा रहा। ईरान की प्रमुख मांगें क्या हैं? तेहरान ने स्थायी शांति समझौते के लिए कई शर्तें रखी हैं, जिनमें शामिल हैं: अमेरिकी नौसैनिक नाकाबंदी समाप्त करना। तेल और गैस निर्यात पर लगे प्रतिबंध हटाना। विदेशों में जमी ईरानी संपत्तियों को जारी करना। भविष्य में सैन्य हमलों के खिलाफ सुरक्षा गारंटी देना। युद्ध से हुए नुकसान की भरपाई के लिए मुआवजा तंत्र बनाना। क्षेत्र से अमेरिकी सैन्य उपस्थिति कम करना। ईरान का कहना है कि परमाणु कार्यक्रम और यूरेनियम संवर्धन पर चर्चा तभी होगी जब युद्ध और नाकाबंदी से जुड़े मुद्दों का समाधान हो जाएगा। संघर्षविराम के बावजूद पूरी तरह सामान्य नहीं हुए हालात दोनों देशों के बीच 8 अप्रैल से संघर्षविराम लागू है, लेकिन क्षेत्रीय तनाव पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। मध्य पूर्व के कई हिस्सों में अस्थिरता बनी हुई है और समय-समय पर सैन्य गतिविधियों की खबरें सामने आती रहती हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान वार्ता प्रक्रिया में प्रगति हुई है, लेकिन परमाणु कार्यक्रम, प्रतिबंधों और क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों पर मतभेद अभी भी गहरे हैं। कूटनीति और दबाव की दोहरी रणनीति ट्रंप के हालिया बयान से यह संकेत मिलता है कि अमेरिका एक ओर वार्ता और समझौते की संभावना खुली रखना चाहता है, वहीं दूसरी ओर ईरान पर दबाव बनाए रखने की रणनीति भी जारी रखे हुए है। ऐसे में आने वाले हफ्तों में वॉशिंगटन और तेहरान के बीच होने वाली बातचीत इस बात का फैसला कर सकती है कि संकट का समाधान कूटनीतिक रास्ते से निकलता है या तनाव एक बार फिर बढ़ता है।  

Deepshikha जून 5, 2026 0
US Secretary of State Marco Rubio speaks about Operation Epic Fury and Iran conflict during a congressional hearing.
मार्को रूबियो का दावा- ईरान के खिलाफ ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ हुआ समाप्त

  अमेरिकी विदेश मंत्री Marco Rubio ने दावा किया है कि ईरान के खिलाफ चलाया गया अमेरिकी सैन्य अभियान ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ अब समाप्त हो चुका है। क्षेत्र में हमलों और जवाबी कार्रवाइयों का सिलसिला अभी भी जारी है। अमेरिकी कांग्रेस में बोले रूबियो- अब ईरान के भीतर नहीं हो रहे लगातार हमले हाउस फॉरेन अफेयर्स कमेटी के समक्ष रूबियो ने कहा कि अमेरिका अब ईरान की सैन्य क्षमता को कमजोर करने के लिए लगातार हमले नहीं कर रहा है, क्योंकि अभियान अपने प्रमुख उद्देश्यों को हासिल कर चुका है। वॉशिंगटन का दावा- मिसाइल, ड्रोन और नौसैनिक क्षमता को पहुंचाया बड़ा नुकसान रूबियो के अनुसार अमेरिका ने ईरान के रक्षा औद्योगिक ढांचे, मिसाइल लॉन्चरों, ड्रोन भंडार और पारंपरिक नौसेना को गंभीर क्षति पहुंचाई है। उन्होंने कहा कि यही इस अभियान की सफलता का पैमाना था। होर्मुज संकट बरकरार, ईरान ने सहयोगी देशों पर बढ़ाया दबाव अमेरिका के दावों के बीच ईरान ने क्षेत्रीय सहयोगी देशों और रणनीतिक ठिकानों को निशाना बनाकर जवाबी कार्रवाई जारी रखी है। साथ ही Strait of Hormuz को लेकर तनाव भी बना हुआ है। कुवैत और बहरीन पर हमलों से बढ़ी चिंता, अमेरिकी ठिकाने भी निशाने पर बुधवार को ईरानी हमलों में कुवैत के एक हवाई अड्डे पर एक व्यक्ति की मौत हुई, जबकि कई लोग घायल हुए। बहरीन में भी ड्रोन हमलों की खबरें सामने आईं, जहां अमेरिकी सैन्य उपस्थिति महत्वपूर्ण मानी जाती है। कांग्रेस में घिरे रूबियो, डेमोक्रेट सांसदों ने उठाए सवाल डेमोक्रेट सांसदों ने रूबियो के ‘युद्ध समाप्त’ होने के दावे पर सवाल उठाए। उनका कहना था कि जब क्षेत्र में हमले जारी हैं और अमेरिकी सैनिक खतरे में हैं, तब संघर्ष समाप्त होने का दावा वास्तविकता से मेल नहीं खाता। सांसद सारा जैकब्स का पलटवार- नाम बदलने से हालात नहीं बदलते Sara Jacobs ने सुनवाई के दौरान कहा कि अभियान का नाम बदलने या उसे समाप्त घोषित करने से यह तथ्य नहीं बदलता कि क्षेत्र में तनाव जारी है और अमेरिकी सैनिक अभी भी जोखिम में हैं। वॉशिंगटन-तेहरान वार्ता में यूरेनियम भंडार बना सबसे बड़ा मुद्दा रूबियो ने बताया कि अमेरिका और ईरान के बीच जारी बातचीत में ईरान के उच्च संवर्धित यूरेनियम का भंडार सबसे महत्वपूर्ण विषय बना हुआ है। वॉशिंगटन चाहता है कि इस मुद्दे पर स्पष्ट और ठोस समझौता हो। शांति समझौते पर अब भी नहीं बनी सहमति अमेरिकी विदेश मंत्री के अनुसार तेहरान ने अभी तक किसी अंतिम शांति समझौते को मंजूरी नहीं दी है। दोनों पक्षों के बीच दस्तावेजों का आदान-प्रदान जारी है, लेकिन अंतिम स्वीकृति अभी नहीं मिली है। युद्ध खत्म या विराम? पश्चिम एशिया में बनी हुई है अनिश्चितता रूबियो भले ही ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ को समाप्त घोषित कर रहे हों, लेकिन मिसाइल हमले, ड्रोन हमले और परमाणु वार्ता पर गतिरोध यह संकेत देते हैं कि अमेरिका-ईरान टकराव का अध्याय अभी पूरी तरह बंद नहीं हुआ है।  

Deepshikha जून 4, 2026 0
Students checking IIT BTech seat matrix and JoSAA counselling 2026 admission details
IIT में बढ़ीं बीटेक सीटें, इस बार 791 नए अवसर; कंप्यूटर साइंस नहीं, मैकेनिकल इंजीनियरिंग में सबसे ज्यादा सीटें

देश के प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग संस्थानों में प्रवेश का सपना देख रहे लाखों छात्रों के लिए राहत भरी खबर है। Joint Seat Allocation Authority काउंसलिंग 2026 की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है और इसके साथ जारी सीट मैट्रिक्स में पता चला है कि भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (IIT) में बीटेक सीटों की संख्या इस वर्ष बढ़ा दी गई है। सीटों में हुई इस बढ़ोतरी से अधिक छात्रों को देश के शीर्ष इंजीनियरिंग संस्थानों में प्रवेश पाने का मौका मिलेगा। उम्मीदवार आधिकारिक वेबसाइट पर जाकर संस्थानवार और शाखावार सीटों का पूरा विवरण देख सकते हैं। पिछले वर्ष की तुलना में बढ़ीं सीटें JoSAA द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2025 में IITs में बीटेक की कुल 18,160 सीटें उपलब्ध थीं। वहीं वर्ष 2026 में यह संख्या बढ़कर 18,951 हो गई है। यानी इस साल कुल 791 नई सीटें जोड़ी गई हैं। इससे उन छात्रों को लाभ मिलने की उम्मीद है जो संयुक्त प्रवेश परीक्षा (जेईई एडवांस्ड) के माध्यम से IIT में दाखिला लेना चाहते हैं। कंप्यूटर साइंस नहीं, इस शाखा में सबसे ज्यादा सीटें आमतौर पर इंजीनियरिंग अभ्यर्थियों के बीच कंप्यूटर साइंस एंड इंजीनियरिंग सबसे लोकप्रिय शाखा मानी जाती है। बेहतर प्लेसमेंट, आकर्षक वेतन पैकेज और बढ़ती तकनीकी मांग के कारण अधिकांश छात्र इसी शाखा को प्राथमिकता देते हैं। हालांकि सीटों की संख्या के मामले में इस बार भी मैकेनिकल इंजीनियरिंग सबसे आगे रही है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार— मैकेनिकल इंजीनियरिंग : 2,286 सीटें कंप्यूटर साइंस एंड इंजीनियरिंग : 2,183 सीटें इस तरह सीटों की संख्या के लिहाज से मैकेनिकल इंजीनियरिंग ने कंप्यूटर साइंस को पीछे छोड़ दिया है। सीट मैट्रिक्स क्यों है महत्वपूर्ण? JoSAA काउंसलिंग के दौरान सीट मैट्रिक्स छात्रों के लिए सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेजों में से एक होता है। इसमें देश के सभी IIT, NIT, IIIT और GFTI संस्थानों में उपलब्ध सीटों का विस्तृत विवरण दिया जाता है। इसकी मदद से छात्र यह जान सकते हैं— किस संस्थान में कितनी सीटें उपलब्ध हैं किस शाखा में प्रवेश के कितने अवसर हैं विभिन्न श्रेणियों के लिए सीटों का वितरण काउंसलिंग विकल्प भरने की बेहतर रणनीति विशेषज्ञों का मानना है कि सीटों में बढ़ोतरी से इस वर्ष IIT में प्रवेश के अवसर पहले की तुलना में बेहतर हो सकते हैं, हालांकि प्रतिस्पर्धा अभी भी काफी कड़ी रहने वाली है।  

surbhi जून 4, 2026 0
US President Donald Trump speaking about Iran conflict and Middle East ceasefire during a White House briefing.
ट्रंप बोले- सीजफायर का मतलब पूरी तरह शांति नहीं, कम हो सकती है गोलीबारी

  अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव के बीच राष्ट्रपति Donald Trump ने संघर्षविराम की नई व्याख्या पेश की है। उन्होंने कहा कि मध्य पूर्व में सीजफायर का मतलब हमेशा पूरी तरह युद्धविराम नहीं होता, बल्कि कई बार इसका अर्थ केवल कम तीव्रता वाली सैन्य कार्रवाई भी हो सकता है। व्हाइट हाउस में ट्रंप का संकेत- अमेरिकी सैनिक मरे तो खत्म हो सकता है संघर्षविराम ओवल ऑफिस में पत्रकारों से बातचीत के दौरान ट्रंप ने कहा कि यदि किसी हमले में अमेरिकी सैनिकों की मौत होती है और उसके पीछे ईरान की भूमिका साबित होती है, तो मौजूदा संघर्षविराम जारी रखना मुश्किल होगा। वॉशिंगटन पोस्ट रिपोर्ट: सहयोगियों को ट्रंप ने दिया सख्त संदेश रिपोर्टों के मुताबिक, ट्रंप ने अपने करीबी अधिकारियों से कहा है कि छोटे स्तर की झड़पों को कुछ समय तक सहन किया जा सकता है, लेकिन अमेरिकी सैनिकों पर घातक हमले की स्थिति में अमेरिका की रणनीति बदल सकती है। होर्मुज के पास अमेरिकी कार्रवाई के बाद बढ़ा नया तनाव ताजा तनाव तब बढ़ा जब अमेरिका ने ईरान के केश्म द्वीप के निकट एक सैन्य नियंत्रण केंद्र और होर्मुज जलडमरूमध्य क्षेत्र में एक लक्ष्य पर कार्रवाई की। इसके बाद क्षेत्र में हालात और संवेदनशील हो गए। कुवैत और बहरीन में ईरानी हमले, भारतीय नागरिक की मौत ईरान की जवाबी कार्रवाई में कुवैत और बहरीन के कई ठिकानों को निशाना बनाया गया। कुवैत अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर हुए हमले में एक भारतीय नागरिक की मौत हो गई, जबकि दर्जनों लोग घायल हुए। ट्रंप का दावा- ईरानी हमले हालिया अमेरिकी कार्रवाई का जवाब राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा कि हर सैन्य कार्रवाई के पीछे कोई न कोई कारण होता है। उनके अनुसार, हाल के अमेरिकी हमलों के बाद ईरान की प्रतिक्रिया अपेक्षित थी और स्थिति को नियंत्रण में लाया जा रहा है। वॉशिंगटन-तेहरान संपर्क अब भी जारी, ट्रंप ने खारिज की बातचीत रुकने की खबरें ईरानी मीडिया में वार्ता रुकने की खबरों के बावजूद ट्रंप ने दावा किया कि दोनों देशों के बीच संपर्क बना हुआ है और बातचीत की प्रक्रिया जारी है। तीन महीने से खाड़ी क्षेत्र में जारी है टकराव 28 फरवरी से शुरू हुए इस संकट के दौरान मिसाइल और ड्रोन हमलों की कई घटनाएं सामने आई हैं। 8 अप्रैल को संघर्षविराम लागू हुआ था, लेकिन इसके बाद भी छिटपुट सैन्य कार्रवाइयां जारी रहीं। होर्मुज जलडमरूमध्य पर अटका विवाद, वैश्विक ऊर्जा बाजार की बढ़ी चिंता Strait of Hormuz इस पूरे विवाद का केंद्र बना हुआ है। दुनिया के तेल और एलएनजी व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी मार्ग से गुजरता है, इसलिए क्षेत्र में अस्थिरता का असर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर भी पड़ रहा है। परमाणु कार्यक्रम और प्रतिबंधों पर अब भी आमने-सामने हैं अमेरिका-ईरान वॉशिंगटन चाहता है कि ईरान अपने संवर्धित यूरेनियम भंडार पर नियंत्रण स्वीकार करे, जबकि तेहरान प्रतिबंधों में राहत और विदेशों में जमा अपनी संपत्तियों तक पहुंच की मांग कर रहा है। इसी मुद्दे पर दोनों देशों के बीच सबसे बड़ा गतिरोध बना हुआ है। युद्ध और कूटनीति साथ-साथ, पश्चिम एशिया में अनिश्चितता बरकरार ट्रंप के ताजा बयान ने संकेत दिया है कि संघर्षविराम लागू होने के बावजूद क्षेत्र में तनाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। बातचीत जारी है, लेकिन किसी भी बड़े हमले से हालात फिर तेजी से बदल सकते हैं।  

Deepshikha जून 4, 2026 0
Israeli Prime Minister Benjamin Netanyahu concerned over possible US-Iran agreement during ongoing diplomatic talks
अमेरिका-ईरान वार्ता के बीच इजरायल की बढ़ी बेचैनी, नेतन्याहू को सता रहा ‘खराब समझौते’ का डर

अमेरिका और ईरान के बीच जारी शांति समझौते की बातचीत ने पश्चिम एशिया की राजनीति में नए समीकरण पैदा कर दिए हैं। इस बीच इजरायल की चिंता बढ़ती दिखाई दे रही है। रिपोर्टों के अनुसार, इजरायली प्रधानमंत्री Benjamin Netanyahu को आशंका है कि अमेरिका और ईरान के बीच होने वाला संभावित समझौता इजरायल की सुरक्षा चिंताओं को पर्याप्त महत्व दिए बिना आगे बढ़ सकता है। वार्ता में इजरायल का प्रभाव घटने की चर्चा रिपोर्टों के मुताबिक, अमेरिका और ईरान के बीच चल रही बातचीत में इजरायल की भूमिका पहले की तुलना में काफी सीमित हो गई है। बताया जा रहा है कि नेतन्याहू ने निजी बातचीत में स्वीकार किया है कि मौजूदा वार्ता प्रक्रिया पर उनका प्रभाव पहले जैसा नहीं रहा और अंतिम निर्णय मुख्य रूप से वाशिंगटन और तेहरान के बीच ही तय हो रहे हैं। सार्वजनिक रूप से इजरायली नेतृत्व अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump की आलोचना करने से बच रहा है, लेकिन अंदरखाने बढ़ती चिंता की खबरें सामने आ रही हैं। ईरान पर दबाव बनाए रखने की थी मांग सूत्रों के अनुसार, अप्रैल में घोषित शुरुआती युद्धविराम के बाद नेतन्याहू लगातार इस बात की वकालत करते रहे कि ईरान पर सैन्य और आर्थिक दबाव बनाए रखा जाए। उनका मानना था कि लगातार दबाव से तेहरान की रणनीतिक क्षमता कमजोर की जा सकती है। लेकिन अमेरिकी प्रशासन ने सैन्य दबाव बढ़ाने के बजाय कूटनीतिक बातचीत और समझौते के रास्ते को प्राथमिकता दी। इससे दोनों सहयोगी देशों के दृष्टिकोण में अंतर स्पष्ट हो गया। किन मुद्दों को लेकर चिंतित है इजरायल? इजरायल की सबसे बड़ी चिंता यह है कि संभावित समझौते में ईरान के संवर्धित यूरेनियम भंडार, बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम और क्षेत्रीय सहयोगी समूहों (प्रॉक्सी नेटवर्क) से जुड़े मुद्दों पर पर्याप्त प्रतिबंध या नियंत्रण शामिल न हो। इजरायली अधिकारियों का मानना है कि यदि इन प्रमुख सुरक्षा मुद्दों का समाधान किए बिना ईरान पर लगे आर्थिक प्रतिबंधों में ढील दी जाती है, तो तेहरान को रणनीतिक लाभ मिल सकता है। 'खराब अंतरिम समझौते' का डर रिपोर्ट के अनुसार, इजरायली अधिकारियों को आशंका है कि अमेरिका किसी ऐसे अंतरिम समझौते पर सहमत हो सकता है जो ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर केवल सीमित नियंत्रण स्थापित करे। इजरायल चाहता है कि किसी भी समझौते में ईरान के संवर्धित यूरेनियम भंडार को लेकर स्पष्ट और सत्यापित प्रावधान हों। इजरायली पक्ष का तर्क है कि केवल आश्वासनों के आधार पर किया गया समझौता भविष्य में नई चुनौतियां पैदा कर सकता है। पश्चिम एशिया की राजनीति पर रहेगा असर विश्लेषकों का मानना है कि यदि अमेरिका और ईरान के बीच कोई व्यापक समझौता होता है, तो उसका असर पूरे पश्चिम एशिया की शक्ति-संतुलन व्यवस्था पर पड़ सकता है। ऐसे में इजरायल, खाड़ी देशों और अन्य क्षेत्रीय शक्तियों की प्रतिक्रिया भी महत्वपूर्ण होगी। फिलहाल अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत जारी है, जबकि इजरायल अपनी सुरक्षा चिंताओं को लेकर लगातार अमेरिकी प्रशासन के संपर्क में बना हुआ है। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि संभावित समझौते में इजरायल की मांगों को कितनी जगह मिलती है।  

surbhi मई 30, 2026 0
Donald Trump speaking on global security and warning Oman over Hormuz Strait tensions
ओमान तक पहुंची ट्रम्प की धमकी की राजनीति, 15 देशों को दे चुके हैं चेतावनी; दुनिया में बढ़ी बेचैनी

अमेरिका के राष्ट्रपति Donald Trump एक बार फिर अपने आक्रामक बयानों को लेकर वैश्विक चर्चा में हैं। इस बार ट्रम्प ने ओमान को लेकर कड़ा बयान दिया है। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर ओमान, ईरान के साथ मिलकर होर्मुज स्ट्रेट पर नियंत्रण करने की कोशिश करता है, तो अमेरिका कड़ी सैन्य कार्रवाई करेगा। ट्रम्प का यह बयान ऐसे समय आया है, जब पश्चिम एशिया में तनाव लगातार बढ़ रहा है और ईरान-अमेरिका संबंध पहले से ही बेहद संवेदनशील दौर से गुजर रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का मानना है कि ट्रम्प की लगातार बढ़ती सैन्य चेतावनियां दुनिया में अस्थिरता और रणनीतिक तनाव को और बढ़ा सकती हैं। ट्रम्प की धमकियों की सूची में ओमान बना 15वां देश ओमान अब वह 15वां देश बन गया है, जिसे लेकर ट्रम्प ने सार्वजनिक रूप से सैन्य कार्रवाई या सख्त कदम की चेतावनी दी है। इससे पहले भी ट्रम्प कई देशों के खिलाफ आक्रामक बयान दे चुके हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, अपने कार्यकाल के दौरान अमेरिका ने ईरान, इराक, सीरिया, यमन, सोमालिया, नाइजीरिया और वेनेजुएला समेत कई देशों में सैन्य कार्रवाई की। इनमें कुछ ऑपरेशन ड्रोन हमलों के जरिए हुए, जबकि कुछ में सीधे सैन्य हस्तक्षेप किया गया। विशेष रूप से ईरान को लेकर अमेरिका का रुख सबसे ज्यादा सख्त माना जा रहा है। हाल के महीनों में अमेरिका और इजराइल द्वारा ईरानी ठिकानों पर हमलों के बाद दोनों देशों के बीच तनाव और गहरा गया है। कनाडा से क्यूबा तक, कई देशों को दी कब्जे की चेतावनी ट्रम्प केवल सैन्य कार्रवाई तक सीमित नहीं रहे। उन्होंने कई देशों को अमेरिका में शामिल करने या उन पर नियंत्रण स्थापित करने जैसे विवादित बयान भी दिए हैं। बताया जा रहा है कि कनाडा, ग्रीनलैंड, क्यूबा और वेनेजुएला को लेकर भी ट्रम्प ने बेहद आक्रामक टिप्पणियां की थीं। इसके अलावा पनामा नहर को लेकर भी उन्होंने अमेरिकी नियंत्रण की बात कही थी। इन बयानों ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में चिंता बढ़ा दी है। कई विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह की बयानबाजी अमेरिका की पारंपरिक विदेश नीति से अलग दिखाई देती है। चुनाव से पहले शांति की बात, सत्ता में आते ही बदले तेवर राष्ट्रपति चुनाव अभियान के दौरान ट्रम्प खुद को “शांति स्थापित करने वाले नेता” के रूप में पेश करते रहे थे। उन्होंने कई बार कहा था कि अगर वह सत्ता में होते तो रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू ही नहीं होता। ट्रम्प अपने विरोधियों पर अमेरिका को “अनावश्यक युद्धों” में धकेलने का आरोप लगाते थे। लेकिन सत्ता में आने के बाद उनका रुख अधिक आक्रामक दिखाई देने लगा। विश्लेषकों का कहना है कि ट्रम्प अब दबाव की राजनीति के जरिए अपने विरोधियों और सहयोगियों दोनों को संदेश देना चाहते हैं कि अमेरिका किसी भी हद तक जा सकता है। क्या है ‘मैडमैन थ्योरी’, जिससे जोड़ा जा रहा ट्रम्प को राजनीतिक विशेषज्ञ ट्रम्प की रणनीति को पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति Richard Nixon की “मैडमैन थ्योरी” से जोड़कर देख रहे हैं। इस सिद्धांत के तहत नेता अपने विरोधियों को यह एहसास दिलाने की कोशिश करता है कि वह अप्रत्याशित और बेहद कठोर कदम उठा सकता है। इसका मकसद विरोधी देशों पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाना होता है। निक्सन ने वियतनाम युद्ध के दौरान इसी रणनीति का इस्तेमाल किया था। माना जाता है कि ट्रम्प भी कई बार इसी शैली में बयान देकर विरोधियों को डराने की कोशिश करते हैं। विशेषज्ञों की चेतावनी- उल्टा पड़ सकता है दबाव कई रणनीतिक विशेषज्ञ मानते हैं कि ट्रम्प की यह रणनीति हर जगह असरदार साबित नहीं हो रही। रूस और ईरान जैसे देशों पर अमेरिकी दबाव का सीमित असर देखने को मिला है। कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि लगातार सैन्य धमकियों से ईरान जैसे देश अपने परमाणु कार्यक्रम को और तेजी से आगे बढ़ा सकते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति, समुद्री व्यापार और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है।  

surbhi मई 29, 2026 0
Donald Trump discusses Middle East diplomacy and urges Arab nations to normalize relations with Israel.
ईरान डील के बहाने मिडिल ईस्ट की नई रणनीति: ट्रंप ने अरब देशों से कहा- इजरायल को मान्यता दें

Donald Trump अब सिर्फ Iran के साथ युद्धविराम या शांति समझौते तक सीमित नहीं रहना चाहते। अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, ट्रंप अब पूरे पश्चिम एशिया की राजनीतिक व्यवस्था को नए सिरे से आकार देने की कोशिश में जुटे हैं। रिपोर्ट के अनुसार, ट्रंप ने कई अरब और मुस्लिम देशों के नेताओं से कहा है कि ईरान युद्ध खत्म होने के बाद वे Israel के साथ अपने संबंध सामान्य करें और Abraham Accords में शामिल हों। हाई-लेवल कॉल में उठी मांग रिपोर्ट में दावा किया गया है कि शनिवार को हुई एक उच्चस्तरीय कॉन्फ्रेंस कॉल में ट्रंप ने यह मुद्दा उठाया। इस बातचीत में Saudi Arabia, United Arab Emirates, Qatar, Pakistan, Turkey, Egypt, Jordan और Bahrain के नेता शामिल थे। बताया गया कि ट्रंप ने कहा कि जो देश अब तक इजरायल को मान्यता नहीं देते हैं, उन्हें अब रिश्ते सामान्य करने की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। ट्रंप की बात के बाद छा गया सन्नाटा अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक, ट्रंप के इस बयान के बाद कॉल पर कुछ देर के लिए खामोशी छा गई। माहौल हल्का करने के लिए ट्रंप ने मजाक में पूछा, “क्या आप लोग अभी भी लाइन पर हैं?” रिपोर्ट के अनुसार, सऊदी अरब, कतर और पाकिस्तान की ओर से तत्काल कोई प्रतिक्रिया नहीं दी गई। इन देशों के इजरायल के साथ अब तक औपचारिक राजनयिक संबंध नहीं हैं। ईरान को भी दिया संकेत ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर भी कहा कि अगर पश्चिम एशिया के देश अब्राहम अकॉर्ड्स में शामिल होते हैं तो क्षेत्र में स्थिरता बढ़ेगी। उन्होंने यह भी कहा, “कौन जानता है, शायद ईरान भी इसमें शामिल होना चाहे। इसे फिलहाल बेहद मुश्किल संभावना माना जा रहा है। ईरान लंबे समय से इजरायल को मान्यता देने से इनकार करता रहा है। ईरान के विदेश मंत्री Abbas Araghchi पहले ही कह चुके हैं कि ईरान ऐसे शासन को कभी मान्यता नहीं देगा, जिस पर बच्चों की हत्या और नरसंहार के आरोप हों। क्या है अब्राहम अकॉर्ड्स? अब्राहम अकॉर्ड्स की शुरुआत साल 2020 में अमेरिका की मध्यस्थता में हुई थी। इसका उद्देश्य अरब देशों और इजरायल के बीच संबंध सामान्य करना था। सबसे पहले United Arab Emirates और Bahrain ने इस समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। बाद में Sudan और Morocco भी इसमें शामिल हुए। विशेषज्ञों के मुताबिक, यह पहल पश्चिम एशिया में ईरान के प्रभाव को सीमित करने और इजरायल व अरब देशों के बीच व्यापार, तकनीक और सुरक्षा सहयोग बढ़ाने की रणनीति का हिस्सा है। सऊदी अरब सबसे बड़ी चुनौती ट्रंप की इस योजना के सामने सबसे बड़ी चुनौती Mohammed bin Salman के नेतृत्व वाला सऊदी अरब माना जा रहा है। सऊदी अरब ने साफ कहा है कि इजरायल के साथ किसी भी औपचारिक रिश्ते की शुरुआत तभी होगी, जब फिलिस्तीनी राष्ट्र के गठन की दिशा में ठोस और स्थायी कदम उठाए जाएंगे। दूसरी ओर, इजरायल फिलहाल इस मांग को स्वीकार करने के पक्ष में नहीं दिख रहा। ईरान समझौते पर अब भी कई अड़चनें ट्रंप पश्चिम एशिया में नए समीकरण बनाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन ईरान के साथ समझौता अभी आसान नहीं दिख रहा। रिपोर्ट्स के मुताबिक, प्रस्तावित समझौते में 60 दिन का युद्धविराम, होर्मुज जलडमरूमध्य को दोबारा खोलना और ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर आगे की बातचीत शामिल हो सकती है। लेकिन प्रतिबंध हटाने, यूरेनियम भंडार और फ्रीज की गई ईरानी संपत्तियों जैसे मुद्दों पर अब भी सहमति नहीं बन पाई है।  

surbhi मई 25, 2026 0
US and Iran officials continue talks amid tensions over uranium stockpile and Strait of Hormuz dispute
US-Iran बातचीत में नरमी के संकेत, लेकिन यूरेनियम और होर्मुज स्ट्रेट पर अब भी टकराव

United States और Iran के बीच जारी तनाव के बीच बातचीत में कुछ नरमी के संकेत जरूर मिले हैं, लेकिन यूरेनियम भंडार और Strait of Hormuz को लेकर दोनों देशों के बीच मतभेद अभी भी गहरे बने हुए हैं। अमेरिकी विदेश मंत्री Marco Rubio ने हालिया वार्ता को लेकर कहा कि बातचीत में कुछ “पॉजिटिव संकेत” मिले हैं, लेकिन किसी बड़े समझौते की उम्मीद करना अभी जल्दबाजी होगी। वहीं, ईरान के वरिष्ठ सूत्रों का कहना है कि दोनों पक्षों के बीच दूरी पहले से कुछ कम हुई है, लेकिन फिलहाल कोई औपचारिक सहमति नहीं बनी है। यूरेनियम भंडार सबसे बड़ी अड़चन अमेरिका और ईरान के बीच सबसे बड़ा विवाद ईरान के समृद्ध यूरेनियम (Enriched Uranium) भंडार को लेकर बना हुआ है। अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने साफ कहा है कि अमेरिका किसी भी कीमत पर ईरान को परमाणु हथियार बनाने की क्षमता हासिल नहीं करने देगा। व्हाइट हाउस में पत्रकारों से बातचीत में ट्रंप ने कहा कि अमेरिका नहीं चाहता कि ईरान के पास ऐसा यूरेनियम रहे, जिसका इस्तेमाल परमाणु हथियार बनाने में किया जा सके। उन्होंने कहा, “हम ईरान को यूरेनियम रखने नहीं देंगे। जरूरत पड़ी तो उसे नष्ट भी किया जा सकता है।” ईरान का दावा- परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण दूसरी तरफ तेहरान लगातार यह दावा कर रहा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम पूरी तरह शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है। ईरानी अधिकारियों ने संकेत दिए हैं कि यूरेनियम मुद्दे पर वे पीछे हटने के लिए तैयार नहीं हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, Mojtaba Khamenei ने निर्देश दिया है कि समृद्ध यूरेनियम किसी भी स्थिति में ईरान से बाहर नहीं भेजा जाएगा। इस रुख से साफ है कि परमाणु मुद्दे पर दोनों देशों के बीच तनाव अभी खत्म होने वाला नहीं है। होर्मुज स्ट्रेट पर भी टकराव तनाव की दूसरी बड़ी वजह होर्मुज स्ट्रेट है, जो दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में से एक माना जाता है। दुनिया के बड़े हिस्से का तेल और गैस इसी रास्ते से गुजरता है। ऐसे में यहां किसी भी तरह का तनाव वैश्विक ऊर्जा बाजार को प्रभावित कर सकता है। ट्रंप ने ईरान की उस कोशिश का विरोध किया, जिसमें होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों पर शुल्क या नियंत्रण बढ़ाने की बात कही गई थी। उन्होंने कहा, “यह एक अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्ग है और इसे दुनिया के सभी जहाजों के लिए खुला रहना चाहिए। यहां किसी तरह का टोल या प्रतिबंध नहीं होना चाहिए।” वैश्विक बाजार की बढ़ी चिंता विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यूरेनियम और होर्मुज स्ट्रेट को लेकर तनाव बढ़ता है, तो इसका असर वैश्विक तेल सप्लाई और समुद्री व्यापार पर पड़ सकता है। मध्य पूर्व में बढ़ती अस्थिरता से तेल की कीमतों में तेजी, शिपिंग लागत में वृद्धि और नए सैन्य तनाव की आशंका भी बढ़ सकती है। दोनों देशों के बीच बातचीत जारी रहना फिलहाल राहत की बात मानी जा रही है। आने वाले दिनों में वार्ता किस दिशा में जाती है, इस पर पूरी दुनिया की नजर बनी हुई है।  

surbhi मई 22, 2026 0
Donald Trump and Benjamin Netanyahu discussing Iran strategy amid rising Middle East tensions
ईरान मुद्दे पर अमेरिका-इजराइल में मतभेद, ट्रंप और नेतन्याहू के बीच तीखी बातचीत की रिपोर्ट

डोनाल्ड ट्रंप और बेंजामिन नेतन्याहू के बीच ईरान को लेकर रणनीति पर मतभेद सामने आने की खबर है। अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, दोनों नेताओं के बीच फोन पर हुई बातचीत काफी तनावपूर्ण रही और ईरान पर आगे की कार्रवाई को लेकर दोनों की राय अलग-अलग नजर आई। रिपोर्ट के अनुसार, जहां इजराइल ईरान के खिलाफ दोबारा सैन्य अभियान शुरू करने के पक्ष में है, वहीं अमेरिका फिलहाल बातचीत और संभावित समझौते के रास्ते पर जोर देता दिखाई दे रहा है। ‘एक्सियोस’ की रिपोर्ट में बड़ा दावा अमेरिकी मीडिया संस्थान Axios की रिपोर्ट के मुताबिक, मंगलवार को ट्रंप से बातचीत के बाद नेतन्याहू “बेहद नाराज” थे। रिपोर्ट में कहा गया है कि इजराइली नेतृत्व ईरान की सैन्य क्षमता को और कमजोर करने तथा उसके अहम बुनियादी ढांचे को निशाना बनाकर दबाव बढ़ाने के पक्ष में है। बताया गया कि नेतन्याहू का मानना है कि मौजूदा हालात में सैन्य दबाव कम करना इजराइल की रणनीतिक स्थिति को कमजोर कर सकता है। ट्रंप ने टाली हमले की योजना ट्रंप ने हाल ही में कहा था कि ईरान पर प्रस्तावित हमले की योजना को फिलहाल टाल दिया गया है। उन्होंने बताया कि कतर और संयुक्त अरब अमीरात समेत कई अरब देशों के अनुरोध के बाद यह फैसला लिया गया। अमेरिकी राष्ट्रपति ने संकेत दिए कि वह अब भी कूटनीतिक समाधान की संभावना देख रहे हैं। हालांकि उन्होंने यह भी साफ किया कि यदि बातचीत असफल रहती है तो अमेरिका सैन्य विकल्प अपनाने के लिए तैयार रहेगा। नया शांति प्रस्ताव तैयार रिपोर्ट में कहा गया है कि पाकिस्तान और कतर सहित कुछ क्षेत्रीय मध्यस्थों ने अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम करने के उद्देश्य से नया शांति प्रस्ताव तैयार किया है। सूत्रों के अनुसार, इस प्रस्ताव का मकसद दोनों देशों के बीच संवाद बहाल करना और संभावित सैन्य टकराव को टालना है। हालांकि नेतन्याहू इस प्रक्रिया को लेकर पूरी तरह आश्वस्त नहीं बताए जा रहे हैं। “समझौते और युद्ध के बीच खड़ी है दुनिया” ट्रंप ने बुधवार को कनेक्टिकट स्थित कोस्ट गार्ड अकादमी में संबोधन के दौरान कहा कि अमेरिका और ईरान फिलहाल “समझौते और युद्ध के बीच की सीमा” पर खड़े हैं। उन्होंने पत्रकारों से कहा, “स्थिति बेहद निर्णायक मोड़ पर है। अगर हमें संतोषजनक जवाब नहीं मिले तो हालात तेजी से बदल सकते हैं। हम हर स्थिति के लिए तैयार हैं।” क्षेत्रीय तनाव पर बढ़ी वैश्विक नजर ईरान, अमेरिका और इजराइल के बीच बढ़ते तनाव पर पूरी दुनिया की नजर बनी हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कूटनीतिक प्रयास सफल नहीं होते तो मध्य पूर्व में बड़े सैन्य संघर्ष की आशंका बढ़ सकती है। वहीं अरब देशों की कोशिश है कि बातचीत के जरिए स्थिति को नियंत्रित रखा जाए।  

surbhi मई 21, 2026 0
US-Iran tensions
अमेरिका-ईरान फिर बढ़ा तनाव, ट्रंप के प्रस्ताव पर भड़का तेहरान

वाशिंगटन, एजेंसियां। अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव एक बार फिर तेज हो गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump के शांति प्रस्ताव पर ईरान की प्रतिक्रिया को अमेरिका द्वारा खारिज किए जाने के बाद तेहरान ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। ईरान की सरकारी मीडिया ने अमेरिकी योजना को “ट्रंप के लालच के आगे ईरान के आत्मसमर्पण” जैसा बताया।   ईरान ने अमेरिका पर लगाया दबाव की राजनीति का आरोप ईरान के सरकारी मीडिया संस्थान Islamic Republic of Iran Broadcasting (IRIB) ने कहा कि अमेरिका का प्रस्ताव पूरी तरह एकतरफा था और इसका उद्देश्य ईरान की संप्रभुता को कमजोर करना था। तेहरान ने साफ कहा कि वह किसी भी कीमत पर अपने “मौलिक अधिकारों” से समझौता नहीं करेगा। ईरानी अधिकारियों ने यह भी कहा कि “यहां कोई भी ट्रंप को खुश करने के लिए प्रस्ताव तैयार नहीं करता।   ईरान की प्रमुख मांगें रिपोर्ट्स के मुताबिक, ईरान ने अपने जवाब में कई शर्तें रखीं। इनमें युद्ध में हुए नुकसान की भरपाई, अमेरिकी प्रतिबंधों को पूरी तरह हटाना, ईरानी संपत्तियों को अनफ्रीज करना और तेल निर्यात की अनुमति शामिल है। इसके अलावा, ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में अमेरिकी नाकाबंदी खत्म करने, लेबनान में युद्धविराम और युद्ध के बाद 30 दिनों की वार्ता का प्रस्ताव भी दिया।   ट्रंप ने बताया “पूरी तरह अस्वीकार्य” राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान के जवाब को सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म Truth Social पर कहा कि ईरान का रुख अमेरिका के लिए “पूरी तरह अस्वीकार्य” है। ट्रंप ने आरोप लगाया कि ईरान पिछले 47 वर्षों से अमेरिका और दुनिया को केवल “देरी की रणनीति” से गुमराह करता रहा है। उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि अब ईरान “और ज्यादा नहीं हंस पाएगा।”

Unknown मई 11, 2026 0
Donald Trump announces halt of Project Freedom amid Iran deal talks and ongoing US pressure strategy
ईरान से डील की उम्मीद के बीच ट्रंप ने ‘Project Freedom’ पर लगाई रोक, लेकिन दबाव बरकरार

डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ चल रही बातचीत में प्रगति का हवाला देते हुए ‘Project Freedom’ को अस्थायी रूप से रोकने का ऐलान किया है। हालांकि उन्होंने साफ कर दिया कि ईरान पर दबाव बनाए रखने के लिए अमेरिका की रणनीति में कोई ढील नहीं दी जाएगी। बातचीत में प्रगति, ऑपरेशन पर ब्रेक ट्रंप ने कहा कि ईरान के साथ वार्ता में “अच्छी प्रोग्रेस” देखने को मिल रही है, जिसके चलते इस सैन्य परियोजना को फिलहाल रोक दिया गया है। ‘Project Freedom’ का उद्देश्य समुद्री मार्गों में जहाजों की आवाजाही सुनिश्चित करना और रणनीतिक नियंत्रण बनाए रखना था, लेकिन संभावित समझौते को ध्यान में रखते हुए इसे अस्थायी रूप से स्थगित किया गया है। अंतरराष्ट्रीय दबाव और सहमति का संकेत ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म Truth Social पर बताया कि यह फैसला पाकिस्तान समेत कई देशों के सुझाव के बाद लिया गया है। उन्होंने इसे “बड़ी सैन्य सफलता” के बाद उठाया गया संतुलित कदम बताया, जिससे कूटनीतिक रास्ता खुल सके। ‘हालात पहले से बेहतर’ अमेरिकी राष्ट्रपति के अनुसार, हालिया सैन्य कार्रवाई के बाद अब हालात पहले से बेहतर हो गए हैं और ईरान के प्रतिनिधियों के साथ बातचीत अंतिम चरण के करीब पहुंच चुकी है। उन्होंने कहा कि समझौते की दिशा में तेजी से प्रगति हो रही है और यह सही समय है जब कूटनीति को मौका दिया जाए। नाकेबंदी जारी, दबाव कायम ट्रंप ने यह भी स्पष्ट किया कि ‘Project Freedom’ को भले ही रोका गया हो, लेकिन ईरान के खिलाफ अमेरिकी नाकेबंदी और दबाव पूरी तरह जारी रहेगा। उनका कहना है कि यह रणनीति इसलिए जरूरी है ताकि ईरान समझौते के लिए गंभीर बना रहे और बातचीत का परिणाम सकारात्मक दिशा में जाए। क्यों लगाई गई अस्थायी रोक? ट्रंप के मुताबिक, यह फैसला इसलिए लिया गया है ताकि यह परखा जा सके कि कूटनीतिक प्रयास कितने प्रभावी साबित होते हैं। अब यह देखा जाएगा कि क्या बातचीत सफल होकर अंतिम समझौते तक पहुंचती है या नहीं। कूटनीति बनाम सैन्य दबाव विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका इस समय “डुअल स्ट्रेटेजी” अपना रहा है–एक तरफ सैन्य दबाव बनाए रखना और दूसरी ओर बातचीत के जरिए समाधान निकालना। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि यह रणनीति ईरान के साथ समझौते तक पहुंचती है या फिर तनाव एक बार फिर बढ़ता है।  

surbhi मई 6, 2026 0
Donald Trump speaking about Cuba amid rising US-Cuba tensions and possible new sanctions
US-Cuba Tension: ट्रंप का बड़ा बयान–‘एयरक्राफ्ट कैरियर भेजूंगा, क्यूबा सरेंडर कर देगा’, बढ़ सकती है नई टकराव की स्थिति

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक बार फिर अपने बयान को लेकर अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों में हैं। इस बार उन्होंने क्यूबा को लेकर ऐसा बयान दिया है, जिसने वैश्विक राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। फ्लोरिडा के पाम बीचेस में एक कार्यक्रम के दौरान ट्रंप ने कहा कि अमेरिका “बहुत जल्द क्यूबा पर कब्जा करने वाला है”, जिससे कूटनीतिक हलकों में हलचल तेज हो गई। ‘एयरक्राफ्ट कैरियर भेजूंगा, तुरंत सरेंडर करेंगे’ कार्यक्रम में बोलते हुए डोनाल्ड ट्रंप ने मजाकिया लेकिन तीखे अंदाज में कहा कि अगर अमेरिका अपना एयरक्राफ्ट कैरियर क्यूबा के पास भेज दे, तो वहां के लोग तुरंत आत्मसमर्पण कर देंगे। उन्होंने कहा, “हम वहां लगभग तुरंत कब्जा कर सकते हैं, वे धन्यवाद कहेंगे और हार मान लेंगे।” इस बयान के बाद यह सवाल उठने लगे हैं कि क्या ट्रंप इसे हल्के-फुल्के अंदाज में कह रहे थे या यह किसी संभावित रणनीति का संकेत है। बयान के पीछे क्या संकेत? ट्रंप ने अपने बयान को विस्तार से नहीं समझाया, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यह बयान अमेरिका की सख्त विदेश नीति का हिस्सा हो सकता है। हालांकि, व्हाइट हाउस की तरफ से इस पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है, जिससे स्थिति और अस्पष्ट बनी हुई है। क्यूबा पर नए प्रतिबंधों का ऐलान इस बयान के साथ ही डोनाल्ड ट्रंप ने 1 मई 2026 को क्यूबा के खिलाफ नए प्रतिबंध लागू करने का आदेश दिया है। इन प्रतिबंधों में: क्यूबा के कुछ अधिकारियों और संस्थाओं को निशाना बनाया गया है उनके साथ लेन-देन करने वाले विदेशी बैंकों को चेतावनी दी गई है विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम क्यूबा पर आर्थिक दबाव बढ़ाने की रणनीति का हिस्सा है। अमेरिका-क्यूबा संबंधों का इतिहास अमेरिका और क्यूबा के बीच संबंध दशकों से तनावपूर्ण रहे हैं। क्यूबा मिसाइल संकट के बाद से दोनों देशों के बीच अविश्वास बना हुआ है। हालांकि कुछ समय के लिए रिश्तों में सुधार की कोशिश हुई, लेकिन हाल के वर्षों में फिर से तनाव बढ़ता नजर आ रहा है। क्या बढ़ेगा सैन्य टकराव? ट्रंप के बयान के बाद यह आशंका जताई जा रही है कि अमेरिका क्यूबा के खिलाफ और सख्त कदम उठा सकता है। हालांकि, अभी तक किसी सैन्य कार्रवाई का आधिकारिक संकेत नहीं मिला है। फिर भी, एयरक्राफ्ट कैरियर जैसे शब्दों का इस्तेमाल यह दिखाता है कि अमेरिका अपनी सैन्य ताकत का संदेश देना चाहता है। वैश्विक राजनीति पर असर इस बयान का असर केवल अमेरिका और क्यूबा तक सीमित नहीं रहेगा। विशेषज्ञों के मुताबिक, अगर तनाव बढ़ता है तो इसका असर लैटिन अमेरिका और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर भी पड़ सकता है। इसके अलावा, यह बयान उस समय आया है जब अमेरिका पहले से ही ईरान और अन्य क्षेत्रों में तनाव का सामना कर रहा है। आगे क्या? फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि ट्रंप का यह बयान केवल राजनीतिक संदेश है या आने वाले किसी बड़े कदम की झलक। लेकिन इतना तय है कि इस बयान और नए प्रतिबंधों के बाद अमेरिका और क्यूबा के रिश्तों में और तल्खी आ सकती है।

surbhi मई 2, 2026 0
Donald Trump strategy on NATO allies sparks debate over good and bad country list
ट्रंप का ‘नॉटी और नाइस’ लिस्ट प्लान: ईरान युद्ध में साथ या सजा, नाटो में बढ़ा तनाव

  नाटो देशों को लेकर अमेरिका की नई रणनीति पर विवाद अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक बार फिर अपने फैसले को लेकर चर्चा में हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, ट्रंप प्रशासन ने नाटो (NATO) देशों के लिए एक “नॉटी और नाइस” (अच्छे और खराब) सूची तैयार की है। इसमें यह आकलन किया जा रहा है कि कौन से देश अमेरिका का साथ ईरान युद्ध में दे रहे हैं और कौन उससे दूरी बनाए हुए हैं। इस कदम को लेकर पश्चिमी देशों के गठबंधन में तनाव और बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। सहयोग के आधार पर होगा देशों का आकलन रिपोर्ट के मुताबिक, इस सूची का उद्देश्य उन देशों को अलग-अलग श्रेणी में रखना है जो अमेरिका के सैन्य रुख का समर्थन करते हैं या विरोध करते हैं। माना जा रहा है कि यह विचार पहले भी अमेरिकी रक्षा मंत्रालय की बैठकों में सामने आ चुका है, जिसमें “मॉडल सहयोगी देशों” को विशेष लाभ देने की बात कही गई थी। सूत्रों के अनुसार, यह सूची नाटो महासचिव मार्क रूटे की वॉशिंगटन यात्रा से पहले तैयार की गई थी। सजा या इनाम जैसी नीति पर सवाल रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि इस सूची के आधार पर अमेरिका अपने सहयोगी देशों के खिलाफ कदम उठा सकता है। इनमें अमेरिकी सैनिकों की तैनाती बदलना या रक्षा उपकरणों की बिक्री रोकना शामिल हो सकता है। हालांकि, यूरोपीय अधिकारियों का मानना है कि ऐसे फैसले अमेरिका के लिए भी नुकसानदायक साबित हो सकते हैं। पोलैंड और रोमानिया को मिल सकता है फायदा सूत्रों के अनुसार, कुछ देशों जैसे पोलैंड और रोमानिया को इस सूची में सकारात्मक स्थान मिलने की संभावना है। पोलैंड को नाटो में रक्षा खर्च और योगदान के लिए पहले से ही महत्वपूर्ण माना जाता है, जबकि रोमानिया ने अमेरिका को सैन्य अभियानों के लिए अपने एयरबेस उपलब्ध कराए हैं। नाटो के साथ ट्रंप की बढ़ती खटास नाटो के कई देश ईरान संघर्ष में अमेरिका का सीधे समर्थन नहीं कर रहे हैं, जिससे ट्रंप नाराज बताए जा रहे हैं। उन्होंने पहले भी नाटो देशों पर रक्षा खर्च कम रखने का आरोप लगाया था और कई बार गठबंधन की भूमिका पर सवाल उठाए हैं। ट्रंप के हालिया बयानों ने यह संकेत दिया है कि अमेरिका अब अपने सहयोगियों पर निर्भर रहने के बजाय खुद की रणनीति पर ज्यादा ध्यान दे रहा है।  

surbhi अप्रैल 23, 2026 0
Donald Trump announcement influences Israel Lebanon ceasefire decision amid ongoing regional tensions
लेबनान युद्धविराम के बीच ट्रंप ने फिर मोड़ा नेतन्याहू का रुख, इज़राइल पर बढ़ा अमेरिकी दबाव

  अमेरिकी राष्ट्रपति के ऐलान के बाद इज़राइल को युद्ध रोकने पर मजबूर होना पड़ा लेबनान में जारी संघर्ष के बीच अब एक बड़ा कूटनीतिक मोड़ सामने आया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अचानक युद्धविराम की घोषणा कर दी, जिसके बाद इज़राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को अपनी सैन्य रणनीति बदलनी पड़ी। रिपोर्टों के मुताबिक, यह पहली बार नहीं है जब ट्रंप ने इस संघर्ष में सीधे हस्तक्षेप करते हुए इज़राइल के फैसलों को प्रभावित किया है। ट्रंप की घोषणा से पहले ही तय हो गया युद्धविराम जानकारी के अनुसार, ट्रंप ने पहले ही यह संकेत दे दिया था कि इज़राइल और लेबनान के बीच युद्धविराम जल्द लागू होगा। इसके कुछ ही घंटों बाद उन्होंने सोशल मीडिया पर घोषणा कर दी कि संघर्ष रोक दिया गया है और दोनों पक्षों को सैन्य कार्रवाई बंद करनी होगी। इसके बाद इज़राइल सरकार के पास ज्यादा विकल्प नहीं बचे और उसे युद्धविराम को स्वीकार करना पड़ा। नेतन्याहू की सैन्य योजना पर फिर पड़ा असर इज़राइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू हाल ही में हिज़बुल्लाह के खिलाफ सैन्य कार्रवाई जारी रखने की बात कर रहे थे। इज़राइली सेना भी नए हमलों की योजना तैयार कर रही थी। लेकिन अमेरिकी दबाव के बाद स्थिति बदल गई और सरकार को युद्ध रोकने का निर्णय लेना पड़ा। देश को जानकारी ट्रंप के पोस्ट से मिली सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि इज़राइल के नागरिकों और कई नेताओं को युद्धविराम की जानकारी अपने प्रधानमंत्री से नहीं, बल्कि ट्रंप के सोशल मीडिया पोस्ट से मिली। इससे इज़राइली राजनीतिक हलकों में भी चर्चा तेज हो गई है। ट्रंप बनते जा रहे हैं निर्णायक शक्ति विश्लेषकों का कहना है कि हाल के महीनों में ट्रंप ने कई अंतरराष्ट्रीय मामलों में सीधे हस्तक्षेप किया है, जिनमें गाजा, ईरान और अब लेबनान शामिल हैं। रिपोर्टों के अनुसार, कई मौकों पर उन्होंने: युद्धविराम लागू कराया सैन्य कार्रवाई रोकने का दबाव बनाया और क्षेत्रीय नेताओं से सीधे बातचीत को प्रभावित किया गाजा और ईरान संघर्ष पर भी असर इससे पहले गाजा और ईरान से जुड़े संघर्षों में भी अमेरिका ने इज़राइल की रणनीति पर प्रभाव डाला था। कई मामलों में इज़राइल को अपने सैन्य अभियान सीमित करने पड़े, जिससे उसे निर्णायक जीत हासिल नहीं हो सकी। हिज़बुल्लाह अभी भी बड़ा खतरा युद्धविराम के बावजूद लेबनान में हिज़बुल्लाह की स्थिति मजबूत बनी हुई है। संगठन ड्रोन और रॉकेट हमलों की क्षमता रखता है, जिससे इज़राइल की सुरक्षा चुनौती बनी हुई है। नेतन्याहू का बयान: शांति और युद्ध दोनों तैयार युद्धविराम के बाद नेतन्याहू ने कहा कि इज़राइल ने अमेरिका के अनुरोध पर समझौता किया है, लेकिन जरूरत पड़ने पर सेना फिर से कार्रवाई के लिए तैयार है। उन्होंने कहा: “हमारे एक हाथ में हथियार है, और दूसरा हाथ शांति के लिए बढ़ा हुआ है।” स्थिति अभी भी नाजुक हालांकि युद्धविराम लागू हो चुका है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यह अस्थायी है और क्षेत्र में तनाव अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। आने वाले दिनों में हालात फिर बदल सकते हैं।  

surbhi अप्रैल 18, 2026 0
JD Vance speaking on Iran-US nuclear talks after Islamabad negotiations amid rising Middle East tensions
Iran–US Tension: ‘गेंद अब ईरान के पाले में’, इस्लामाबाद वार्ता के बाद बोले वेंस

मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच J. D. Vance ने बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि Islamabad में हुई शांति वार्ता में “अच्छी प्रगति” हुई है, लेकिन अब अगला कदम Tehran को उठाना होगा। वेंस ने साफ कहा–“गेंद अब ईरान के पाले में है।” 21 घंटे चली वार्ता, लेकिन समझौता नहीं अमेरिका और Iran के बीच वीकेंड पर इस्लामाबाद में करीब 21 घंटे तक चली लंबी बातचीत किसी ठोस समझौते पर खत्म नहीं हो सकी। अमेरिकी पक्ष का कहना है कि ईरान ने न्यूक्लियर फ्यूल एनरिचमेंट रोकने की शर्त मानने से इनकार कर दिया। ‘सही दिशा में बढ़ी बातचीत’ Fox News को दिए इंटरव्यू में वेंस ने कहा कि हालात बिगड़े नहीं हैं, बल्कि बातचीत सही दिशा में आगे बढ़ी है। उन्होंने कहा: “कुछ पॉजिटिव संकेत मिले हैं” “सामने वाला पक्ष भी आगे बढ़ा” “हालांकि, उम्मीद के मुताबिक प्रगति नहीं हुई” न्यूक्लियर एम्बिशन पर अमेरिका सख्त वेंस ने जोर देकर कहा कि अगर ईरान अपने न्यूक्लियर एम्बिशन पर अमेरिका की शर्तें मान लेता है, तो दोनों देशों के बीच बड़ा समझौता संभव है। उन्होंने कहा, “क्या हम आगे बातचीत करेंगे? क्या समझौता होगा? यह अब ईरान पर निर्भर करता है।” क्यों रुकी बातचीत? वेंस के मुताबिक, ईरानी डेलिगेशन के पास अंतिम फैसला लेने का अधिकार नहीं था। उन्होंने कहा: “टीम को तेहरान लौटना पड़ा” “अंतिम मंजूरी के लिए शीर्ष नेतृत्व से सहमति जरूरी है” किन नेताओं ने लिया हिस्सा? इस हाई-लेवल वार्ता में दोनों देशों के बड़े नेता शामिल हुए: अमेरिका की ओर से: J. D. Vance, Steve Witkoff, Jared Kushner ईरान की ओर से: Mohammad Bagher Ghalibaf, Abbas Araghchi आगे क्या? इस्लामाबाद वार्ता के बाद अब नजरें तेहरान पर हैं। अगर ईरान अमेरिका की शर्तों पर नरमी दिखाता है, तो क्षेत्र में तनाव कम हो सकता है। फिलहाल, कूटनीतिक हल की उम्मीद कायम है, लेकिन स्थिति अभी भी संवेदनशील बनी हुई है।  

surbhi अप्रैल 14, 2026 0
Iran-US ceasefire and Middle East tensions.
“War Not Over”: ईरान सीजफायर पर रूस का हमला, अमेरिका-NATO पर साधा निशाना

मध्य पूर्व में जारी तनाव के बीच रूस ने ईरान और अमेरिका के बीच हुए सीजफायर का स्वागत तो किया, लेकिन साथ ही वॉशिंगटन और उसके सहयोगियों पर तीखा हमला भी बोला है। रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने साफ शब्दों में कहा कि यह संघर्ष अभी समाप्त नहीं हुआ है और क्षेत्र में हालात अब भी बेहद नाजुक बने हुए हैं। लावरोव ने कहा कि रूस मिडिल ईस्ट में स्थायी शांति चाहता है, जो किसी एक देश की दादागिरी पर नहीं बल्कि सभी क्षेत्रीय शक्तियों के संतुलन पर आधारित हो। उन्होंने चेतावनी दी कि सैन्य कार्रवाई के जरिए इस संकट का समाधान संभव नहीं है और अमेरिका का अभियान इतिहास में एक असफल प्रयास के रूप में दर्ज हो सकता है। रूस ने इस पूरे घटनाक्रम को पश्चिमी शक्तियों की कमजोरी के तौर पर भी पेश किया। NATO, European Union और ब्रिटेन की भूमिका पर सवाल उठाते हुए मॉस्को ने कहा कि ईरान को घेरने की रणनीति पूरी तरह विफल रही है। इससे पश्चिमी सैन्य गठबंधन की प्रभावशीलता पर गंभीर प्रश्न खड़े हो गए हैं। क्रेमलिन का मानना है कि भले ही पाकिस्तान में बातचीत और अस्थायी युद्धविराम की कोशिशें हो रही हैं, लेकिन जमीनी हालात अभी भी विस्फोटक हैं। रूस ने स्पष्ट किया कि “War Is Not Over” और क्षेत्र में संघर्ष की आशंका बनी हुई है। इस बीच, इस टकराव का आर्थिक पहलू भी चर्चा में है। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में बाधा के कारण वैश्विक तेल और उर्वरक आपूर्ति प्रभावित हुई, जिसका सीधा लाभ रूस को मिला। दुनिया के बड़े ऊर्जा निर्यातकों में शामिल रूस की मांग अचानक बढ़ी और कीमतों में उछाल से उसकी अर्थव्यवस्था को मजबूती मिली। रूस ने यह भी संकेत दिया कि मिडिल ईस्ट की भू-राजनीति अब केवल अमेरिका के नियंत्रण में नहीं है। मॉस्को और चीन की बढ़ती सक्रियता ने इस क्षेत्र में शक्ति संतुलन को बदल दिया है। संयुक्त राष्ट्र में वीटो जैसे कदमों के जरिए यह साफ हो चुका है कि अब वैश्विक फैसले बहुध्रुवीय व्यवस्था में लिए जा रहे हैं। कुल मिलाकर, रूस का संदेश साफ है-ईरान सीजफायर के बावजूद संकट टला नहीं है, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन की नई लड़ाई शुरू हो चुकी है।  

surbhi अप्रैल 9, 2026 0
Donald Trump speaking with Greenland map and NATO flags highlighting geopolitical tensions after Iran ceasefire.
ईरान सीजफायर के बाद ट्रंप का नया फोकस: ग्रीनलैंड पर नजर, NATO को बताया ‘पेपर टाइगर’

ईरान के साथ तनाव कम होने के बाद Donald Trump ने एक बार फिर वैश्विक राजनीति में हलचल मचा दी है। इस बार उन्होंने न सिर्फ NATO पर तीखा हमला बोला, बल्कि Greenland को लेकर अपनी पुरानी महत्वाकांक्षा को भी दोहराया। ईरान के बाद बदला अमेरिकी फोकस हाल ही में Iran के साथ हुए सीजफायर के बाद ट्रंप का रुख फिर आक्रामक नजर आया। उन्होंने दावा किया कि सैन्य अभियान के दौरान सहयोगी देशों से उम्मीद के मुताबिक समर्थन नहीं मिला, जिससे पश्चिमी गठबंधन की एकजुटता पर सवाल खड़े हो गए। NATO पर करारा हमला ट्रंप ने NATO को “पेपर टाइगर” बताते हुए कहा कि जब अमेरिका को जरूरत थी, तब सहयोगी देश साथ नहीं आए। उनका यह बयान न सिर्फ आलोचना, बल्कि NATO की विश्वसनीयता पर सीधा हमला माना जा रहा है। यह टिप्पणी ट्रंप की ‘America First’ नीति को फिर से उजागर करती है, जिसमें वह अंतरराष्ट्रीय गठबंधनों से ज्यादा एकतरफा रणनीति को प्राथमिकता देते हैं। ग्रीनलैंड पर फिर जताई दिलचस्पी ट्रंप ने सोशल मीडिया पर ग्रीनलैंड को लेकर टिप्पणी करते हुए अपनी पुरानी योजना की ओर इशारा किया। इससे पहले भी वह डेनमार्क से ग्रीनलैंड खरीदने का प्रस्ताव दे चुके हैं, जिसे खारिज कर दिया गया था। ग्रीनलैंड का महत्व सिर्फ भौगोलिक नहीं, बल्कि रणनीतिक भी है- आर्कटिक क्षेत्र में अहम स्थिति रूस और चीन की गतिविधियों पर नजर दुर्लभ खनिज और ऊर्जा संसाधन अमेरिकी सैन्य उपस्थिति की संभावनाएं ट्रांस-अटलांटिक रिश्तों पर असर ट्रंप के इस बयान से अमेरिका और यूरोपीय देशों के बीच तनाव बढ़ सकता है। NATO जैसे गठबंधन में भरोसे की कमी और कूटनीतिक खींचतान तेज होने की आशंका है। नई जियोपॉलिटिक्स की ओर संकेत विशेषज्ञ मानते हैं कि ट्रंप का यह रुख दिखाता है कि अमेरिका अब मिडिल ईस्ट के साथ-साथ आर्कटिक क्षेत्र में भी अपनी रणनीतिक पकड़ मजबूत करना चाहता है। यह बदलाव आने वाले समय में वैश्विक राजनीति को और जटिल बना सकता है। ईरान सीजफायर के तुरंत बाद ट्रंप का NATO और ग्रीनलैंड पर बयान साफ करता है कि अमेरिकी विदेश नीति में आक्रामकता और तेजी से बदलती प्राथमिकताएं बनी हुई हैं। ग्रीनलैंड का मुद्दा आने वाले समय में बड़ा कूटनीतिक विवाद बन सकता है।  

surbhi अप्रैल 9, 2026 0
Donald Trump speaking on Iran policy with oil fields and Strait of Hormuz shipping route in background.
‘मैं पहले एक बिजनेसमैन हूं’-ईरान को लेकर ट्रंप के बयान से मचा बवाल, तेल और टोल पर फोकस

मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का एक बयान अंतरराष्ट्रीय राजनीति में हलचल पैदा कर रहा है। ट्रंप ने साफ कहा है कि वह “सबसे पहले एक बिजनेसमैन हैं”, और इसी नजरिए से ईरान के साथ चल रहे टकराव को देख रहे हैं। तेल पर नजर या रणनीति? ट्रंप ने कहा कि अगर अमेरिका युद्ध में जीत हासिल करता है, तो उसे ईरान के तेल संसाधनों पर कब्जा करना चाहिए। उन्होंने तर्क दिया- “युद्ध में जीतने वाले का ही संसाधनों पर अधिकार होता है।” ट्रंप के अनुसार, यह कदम अमेरिका के सैन्य खर्च की भरपाई करने का एक तरीका हो सकता है। ‘जंग की लागत तेल से वसूलेंगे’ ट्रंप ने खुलकर कहा कि- अमेरिका ने युद्धों पर खरबों डॉलर खर्च किए हैं अब समय आ गया है कि इन खर्चों की भरपाई की जाए ईरान के तेल कुओं से होने वाली कमाई इसका जरिया बन सकती है उनका यह बयान उनकी ट्रांजेक्शनल (लेन-देन आधारित) विदेश नीति को दर्शाता है। वेनेजुएला मॉडल का दिया उदाहरण ट्रंप ने अपनी बात को सही ठहराने के लिए वेनेजुएला का उदाहरण दिया। उन्होंने दावा किया कि- वहां अमेरिका की भागीदारी से भारी मात्रा में तेल निकाला गया इससे युद्ध की लागत की भरपाई संभव हुई ट्रंप अब इसी मॉडल को ईरान पर लागू करना चाहते हैं। होर्मुज़ स्ट्रेट पर ‘अमेरिकी टोल’ का प्रस्ताव ट्रंप की योजना सिर्फ तेल तक सीमित नहीं है। उन्होंने दुनिया के सबसे अहम समुद्री रास्तों में से एक होर्मुज़ जलडमरूमध्य पर भी बयान दिया। ट्रंप ने सुझाव दिया कि इस रास्ते से गुजरने वाले जहाजों से अमेरिका टोल वसूले उनका कहना था- “हम विजेता हैं, तो टोल हम क्यों न लें?” गौरतलब है कि वैश्विक तेल सप्लाई का करीब 20% हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। अंतरराष्ट्रीय कानूनों पर उठे सवाल ट्रंप के इन बयानों के बाद कई विशेषज्ञों ने चिंता जताई है- किसी देश के संसाधनों पर कब्जा करना अंतरराष्ट्रीय कानूनों के खिलाफ है इससे वैश्विक तनाव और बढ़ सकता है यह संप्रभुता (sovereignty) के सिद्धांत को चुनौती देता है क्या कहता है यह बयान? विशेषज्ञों के मुताबिक, ट्रंप का यह रुख दिखाता है कि- वह विदेश नीति को भी बिजनेस डील की तरह देखते हैं सैन्य कार्रवाई के पीछे आर्थिक लाभ को प्राथमिकता देते हैं

surbhi अप्रैल 7, 2026 0
होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव और डोनाल्ड ट्रंप
होर्मुज पर नाटो की ‘ना’ से भड़के ट्रंप, यूक्रेन पर उतार सकते हैं गुस्सा

वाशिंगटन,एजेंसियां। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर अपने सहयोगी देशों पर दबाव बढ़ाते हुए संकेत दिया है कि यदि नाटो देश होर्मुज स्ट्रेट को खुलवाने के लिए अमेरिका का साथ नहीं देते, तो यूक्रेन को हथियारों की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। इस बयान ने न सिर्फ यूरोप में बेचैनी बढ़ा दी है, बल्कि रूस-यूक्रेन युद्ध के समीकरणों को भी नया मोड़ दे दिया है।   होर्मुज स्ट्रेट इस समय वैश्विक राजनीति और ऊर्जा सुरक्षा का सबसे संवेदनशील बिंदु बना हुआ है। दुनिया के तेल और गैस व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी समुद्री मार्ग से गुजरता है। अमेरिका और इजराइल के हमलों के बाद ईरान ने इस जलमार्ग पर प्रभावी दबाव बना दिया है, जिससे अंतरराष्ट्रीय शिपिंग और ऊर्जा बाजार में तनाव बढ़ गया है। ट्रंप चाहते हैं कि नाटो देश अमेरिका के नेतृत्व में एक सैन्य या नौसैनिक अभियान का हिस्सा बनें, लेकिन कई यूरोपीय देशों ने इसे “हमारा युद्ध नहीं” कहकर दूरी बना ली है।   यूक्रेन बन सकता है दबाव की राजनीति का शिकार यूरोपीय देशों की इस हिचकिचाहट से नाराज ट्रंप अब यूक्रेन को दबाव के औजार के रूप में इस्तेमाल कर सकते हैं। यूक्रेन फरवरी 2022 से रूस के खिलाफ लगातार युद्ध लड़ रहा है और उसकी सैन्य क्षमता काफी हद तक पश्चिमी हथियारों और वित्तीय सहायता पर निर्भर रही है। यदि अमेरिका हथियारों की आपूर्ति या समर्थन कम करता है, तो इसका सीधा असर यूक्रेन की युद्ध क्षमता पर पड़ेगा।   ऐसी स्थिति रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के लिए रणनीतिक बढ़त साबित हो सकती है। पश्चिमी मोर्चे पर कमजोरी आने का मतलब यह होगा कि रूस को सैन्य और मनोवैज्ञानिक दोनों स्तरों पर फायदा मिल सकता है।   नाटो के भीतर बढ़ी बेचैनी रिपोर्टों के अनुसार, ट्रंप की चेतावनी के बाद नाटो के भीतर कूटनीतिक हलचल तेज हो गई है। नाटो महासचिव मार्क रूटे ने फ्रांस, जर्मनी और ब्रिटेन जैसे प्रमुख देशों के साथ एक संयुक्त बयान जारी करने की कोशिश की है, ताकि होर्मुज में सुरक्षित आवाजाही के समर्थन का संकेत दिया जा सके। माना जा रहा है कि यह कदम ट्रंप को शांत करने और यूक्रेन के लिए अमेरिकी समर्थन बनाए रखने की कोशिश का हिस्सा है।   ट्रंप पहले भी नाटो को लेकर तीखी टिप्पणी कर चुके हैं। उनका आरोप है कि अमेरिका सहयोगियों की सुरक्षा करता है, लेकिन बदले में समान प्रतिबद्धता नहीं मिलती। हालांकि अमेरिका का नाटो से बाहर निकलना आसान नहीं है, लेकिन यूक्रेन की मदद रोकना ट्रंप के हाथ में एक प्रभावी राजनीतिक हथियार जरूर बन सकता है।

Unknown अप्रैल 2, 2026 0
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शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

  जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री Farooq Abdullah पर जम्मू में एक शादी समारोह के दौरान हुए हमले ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना उस समय हुई जब वे एक कार्यक्रम से बाहर निकल रहे थे और भीड़ में मौजूद एक व्यक्ति ने उनके बेहद करीब आकर पिस्तौल तान दी और गोली चलाने की कोशिश की। हालांकि सुरक्षाकर्मियों की त्वरित कार्रवाई से यह हमला नाकाम हो गया और वे बाल-बाल बच गए। यह घटना जम्मू के ग्रेटर कैलाश इलाके में आयोजित एक विवाह समारोह में हुई, जहां Farooq Abdullah जम्मू-कश्मीर के उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary के साथ पहुंचे थे।   कौन है हमलावर? पुलिस ने आरोपी की पहचान कमल सिंह जम्वाल (करीब 65 वर्ष) के रूप में की है, जो जम्मू के पुरानी मंडी इलाके का निवासी बताया जा रहा है। प्रारंभिक पूछताछ में आरोपी ने दावा किया कि वह पिछले करीब 20 वर्षों से इस मौके का इंतज़ार कर रहा था। पुलिस के अनुसार कमल सिंह के पास एक लाइसेंसी पिस्तौल थी और घटना के समय वह कथित तौर पर नशे में भी था। सुरक्षाकर्मियों ने मौके से हथियार बरामद कर लिया है और उससे पूछताछ जारी है। जांच एजेंसियां यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि यह हमला व्यक्तिगत रंजिश का नतीजा था या इसके पीछे कोई बड़ी साजिश हो सकती है।   CCTV में कैद हुई पूरी घटना घटना का CCTV फुटेज भी सामने आया है। वीडियो में दिखता है कि जैसे ही Farooq Abdullah समारोह से बाहर निकल रहे थे, आरोपी पीछे से तेजी से आया और उनकी कनपटी पर पिस्तौल तान दी। उसने फायर करने की कोशिश की, लेकिन उसी क्षण सुरक्षा में तैनात कमांडो सक्रिय हो गए और उसका हाथ झटक दिया, जिससे गोली लक्ष्य से चूक गई। इसके तुरंत बाद सुरक्षाकर्मियों और मौके पर मौजूद लोगों ने आरोपी को पकड़ लिया। घटना के बाद का वीडियो सोशल मीडिया पर भी तेजी से वायरल हो रहा है।   सीएम उमर अब्दुल्ला ने उठाए सुरक्षा पर सवाल हमले के बाद जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री Omar Abdullah ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उनके पिता बाल-बाल बच गए। उन्होंने लिखा कि एक व्यक्ति भरी हुई पिस्तौल के साथ इतने करीब तक कैसे पहुंच गया, यह गंभीर सुरक्षा चूक का संकेत है। मुख्यमंत्री ने इस घटना की उच्च-स्तरीय जांच की मांग भी की है, ताकि सुरक्षा व्यवस्था में हुई संभावित खामियों का पता लगाया जा सके। घटना के समय उपमुख्यमंत्री Surinder Choudhary भी वहां मौजूद थे। इस दौरान उन्हें हल्की चोट आई, जिसके बाद मौके पर ही प्राथमिक उपचार दिया गया।   पुलिस की जांच जारी जम्मू पुलिस के अनुसार हमला ग्रेटर कैलाश के रॉयल पार्क में आयोजित विवाह समारोह के दौरान हुआ। सुरक्षा दल ने तुरंत कार्रवाई करते हुए आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने बताया कि आरोपी की पिस्तौल जब्त कर ली गई है और उसके पारिवारिक पृष्ठभूमि, संपर्कों और मानसिक स्थिति की भी जांच की जा रही है। सुरक्षा एजेंसियां यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि कहीं इस घटना के पीछे कोई बड़ी साजिश तो नहीं।  

हरीश राणा मामला: इच्छामृत्यु की अनुमति ने खड़े किए संवेदनशील सवाल, क्या सच में कोई अकेले मरता है?

भारत के कानूनी और सामाजिक विमर्श में एक ऐतिहासिक और भावनात्मक मोड़ तब आया, जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दे दी। यह फैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अहम है, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और पारिवारिक पीड़ा को भी गहराई से छूता है। 13 साल का संघर्ष: जीवन और मृत्यु के बीच अटका एक अस्तित्व हरीश राणा पिछले 13 वर्षों से अचेत अवस्था में जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे। एक हादसे में चंडीगढ़ स्थित हॉस्टल की चौथी मंज़िल से गिरने के बाद उनका शरीर तो जीवित रहा, लेकिन वे किसी भी प्रकार की प्रतिक्रिया देने में असमर्थ हो गए। इन वर्षों में उनके माता-पिता ने निरंतर उनकी सेवा की, लेकिन बढ़ती उम्र और शारीरिक थकान ने उन्हें एक कठिन निर्णय के सामने ला खड़ा किया-अपने ही बेटे के लिए मृत्यु की अनुमति मांगना। अदालत का फैसला: ‘गरिमामय मृत्यु’ की दिशा में कदम सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिसमें जीवन को कृत्रिम रूप से बनाए रखने वाले उपकरणों को हटाया जाता है, ताकि व्यक्ति स्वाभाविक रूप से मृत्यु की ओर बढ़ सके। यह निर्णय भारत में इच्छामृत्यु को लेकर एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है। इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आए थे, जैसे अरुणा शानबाग का मामला, लेकिन तब अदालत ने अनुमति नहीं दी थी। एक सवाल जो दिल को झकझोरता है यह मामला सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि गहरे मानवीय और भावनात्मक सवाल भी खड़े करता है- क्या हरीश राणा अकेले मरेंगे? असल में, किसी की मृत्यु कभी अकेली नहीं होती। हरीश के साथ उनके माता-पिता का एक हिस्सा भी खत्म होगा-खासतौर पर उनकी मां, जिन्होंने अपने बेटे की इच्छामृत्यु की अनुमति पर हस्ताक्षर किए। यह निर्णय केवल कागज पर हस्ताक्षर नहीं, बल्कि एक मां के भीतर की पीड़ा, त्याग और टूटन का प्रतीक है। समाज और परिवार पर उठते बड़े सवाल इस घटना ने समाज के बदलते स्वरूप पर भी सवाल खड़े किए हैं- क्या आधुनिक जीवनशैली और टूटते पारिवारिक ढांचे लोगों को ऐसे फैसले लेने के लिए मजबूर कर रहे हैं?   क्या ‘गरिमामय मृत्यु’ की मांग, ‘गरिमामय जीवन’ की कमी को दर्शाती है?   हरीश राणा और अरुणा शानबाग जैसे मामलों ने यह दिखाया है कि कई बार जीवन केवल शरीर से नहीं, बल्कि रिश्तों और देखभाल से भी चलता है। कानून बनने की जरूरत और संभावित खतरे सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इच्छामृत्यु पर स्पष्ट कानून बनाने की भी सलाह दी है। हालांकि, इसके साथ एक चिंता भी जुड़ी है- कहीं इस कानून का दुरुपयोग तो नहीं होगा? विशेषज्ञों का मानना है कि बिना सख्त नियमों के, यह कानून कमजोर और बुजुर्ग लोगों के लिए खतरा बन सकता है। वहीं, कुछ परिवारों के लिए यह पीड़ा से मुक्ति का रास्ता भी साबित हो सकता है।  

लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

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abhishek singh जून 30, 2026 0