दुनिया

US Gains Strategic Access to Bangladesh Ports

बांग्लादेश के दो बंदरगाह अमेरिका इस्तेमाल करेगा, हिंद महासागर में बढ़ेगी रणनीतिक हलचल

surbhi मई 23, 2026 0
Bangladesh and US strategic agreement involving Chittagong and Matarbari ports in the Bay of Bengal
US Access to Bangladesh Ports Agreement

Bangladesh और United States के बीच हुए नए रणनीतिक समझौतों ने दक्षिण एशिया और हिंद महासागर क्षेत्र की भू-राजनीति को लेकर नई चर्चाएं शुरू कर दी हैं।

रिपोर्ट्स के मुताबिक बांग्लादेश ने अमेरिका को अपने दो अहम बंदरगाहों - Port of Chittagong और Matarbari Port - के इस्तेमाल की अनुमति देने पर सहमति जताई है।

इसके साथ ही दोनों देशों के बीच खुफिया जानकारी साझा करने और समुद्री रणनीतिक सहयोग बढ़ाने को लेकर भी अहम करार हुए हैं।

किन बंदरगाहों तक मिलेगी पहुंच?

समझौते के तहत अमेरिकी नौसेना और सैन्य जहाज:

  • Port of Chittagong
  • Matarbari Port

का इस्तेमाल कर सकेंगे।

विशेषज्ञों के मुताबिक इससे अमेरिका को बंगाल की खाड़ी और हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी सैन्य मौजूदगी मजबूत करने में मदद मिलेगी।

खास बात यह है कि चिटगांव बंदरगाह भारत के Andaman and Nicobar Islands से लगभग 1100 किलोमीटर दूर है।

अमेरिका की नजर मलक्का स्ट्रेट पर

Strait of Malacca दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में गिना जाता है।

दुनिया के बड़े हिस्से का:

  • तेल व्यापार
  • गैस सप्लाई
  • इलेक्ट्रॉनिक्स और औद्योगिक सामानों का ट्रांसपोर्ट

इसी रास्ते से होता है।

विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका इस क्षेत्र में अपनी मौजूदगी बढ़ाकर चीन की समुद्री गतिविधियों पर करीबी नजर रखना चाहता है।

बांग्लादेश-अमेरिका के 3 बड़े समझौते

1. बंदरगाह इस्तेमाल समझौता

अमेरिकी सैन्य और नौसैनिक जहाजों को चिटगांव और मतारबाड़ी बंदरगाहों तक पहुंच मिलेगी।

2. खुफिया जानकारी साझा करना

दोनों देश समुद्री सुरक्षा और सैन्य गतिविधियों से जुड़ी इंटेलिजेंस साझा करेंगे।

3. रणनीतिक सहयोग बढ़ाना

बंगाल की खाड़ी और मलक्का क्षेत्र में संयुक्त निगरानी और सामरिक सहयोग मजबूत किया जाएगा।

चीन के लिए क्यों अहम है मलक्का?

China के लिए मलक्का स्ट्रेट बेहद संवेदनशील रणनीतिक क्षेत्र माना जाता है।

चीन के लगभग 80% तेल आयात इसी रास्ते से गुजरते हैं। यही वजह है कि पूर्व चीनी राष्ट्रपति Hu Jintao ने इसे “मलक्का डिलेमा” कहा था।

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर इस समुद्री मार्ग पर किसी भी तरह का दबाव बढ़ता है तो इसका असर सीधे चीन की अर्थव्यवस्था और सप्लाई चेन पर पड़ सकता है।

भारत के लिए क्यों बढ़ी अहमियत?

India का भी बड़ा समुद्री व्यापार इसी मार्ग से होकर गुजरता है।

भारत के:

  • लगभग 55% समुद्री व्यापार
  • ऊर्जा आयात का बड़ा हिस्सा

मलक्का मार्ग से जुड़ा है।

भारत की रणनीतिक ताकत का सबसे बड़ा आधार Andaman and Nicobar Islands माने जाते हैं, जो मलक्का स्ट्रेट के पश्चिमी प्रवेश द्वार के पास स्थित हैं।

INS बाज की भूमिका

INS Baaz भारत का महत्वपूर्ण एयर स्टेशन है, जो समुद्री निगरानी में अहम भूमिका निभाता है।

विशेषज्ञों के मुताबिक यहां से हिंद महासागर और मलक्का क्षेत्र की गतिविधियों पर करीबी नजर रखी जा सकती है।

क्या बढ़ेगा भारत-अमेरिका सहयोग?

रणनीतिक मामलों के जानकार मानते हैं कि यदि अमेरिका बंगाल की खाड़ी और मलक्का क्षेत्र में अपनी सक्रियता बढ़ाता है, तो भारत की भूमिका भी और महत्वपूर्ण हो सकती है।

इस पूरे क्षेत्र में:

  • Indonesia
  • Malaysia

जैसे देश अपनी समुद्री संप्रभुता को लेकर काफी संवेदनशील हैं।

इसलिए आने वाले समय में हिंद महासागर क्षेत्र की रणनीतिक राजनीति और भी दिलचस्प हो सकती है।

 

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शादी समारोह में जम्मू-कश्मीर के पूर्व सीएम पर हमला नाकाम, हमलावर 20 साल से कर रहा था मौके का इंतज़ार

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लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर आज अमित शाह का भाषण, सदन में हंगामे के आसार

  नई दिल्ली: लोकसभा स्पीकर Om Birla को पद से हटाने के लिए लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर संसद में सियासी घमासान तेज हो गया है। इस मुद्दे पर जारी बहस के बीच बुधवार को केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah लोकसभा में सरकार का पक्ष रखेंगे। माना जा रहा है कि उनके संबोधन के दौरान सदन में तीखी बहस और हंगामे की स्थिति बन सकती है। यह प्रस्ताव कांग्रेस सांसद Mohammed Javed ने पेश किया है, जिसे विपक्ष के कई दलों का समर्थन मिला है। प्रस्ताव को 50 से अधिक सांसदों का समर्थन मिलने के बाद इसे चर्चा के लिए स्वीकार किया गया। मंगलवार को सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता कर रहे Jagadambika Pal ने प्रस्ताव पर चर्चा की अनुमति दी और इसके लिए कुल 10 घंटे का समय निर्धारित किया। उन्होंने सांसदों से अपील की कि वे बहस के दौरान केवल प्रस्ताव से जुड़े मुद्दों पर ही अपनी बात रखें।   118 विपक्षी सांसदों का समर्थन स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर कुल 118 विपक्षी सांसदों ने हस्ताक्षर किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि Om Birla ने सदन की कार्यवाही के दौरान निष्पक्षता नहीं बरती और कई मौकों पर ‘पक्षपातपूर्ण व्यवहार’ किया। इसी आरोप के आधार पर यह प्रस्ताव लाया गया है। मंगलवार को बहस शुरू होते ही प्रक्रिया को लेकर भी विवाद देखने को मिला। एआईएमआईएम प्रमुख Asaduddin Owaisi और कांग्रेस सांसद K. C. Venugopal ने आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की बहस की अध्यक्षता के लिए सदन को किसी सदस्य का चुनाव करना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि अध्यक्षों के पैनल से किसे कार्यवाही की अध्यक्षता के लिए चुना गया, इसका निर्णय किस आधार पर लिया गया। हालांकि सत्तारूढ़ दल के नेताओं ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया। भाजपा सांसद Ravi Shankar Prasad और Nishikant Dubey ने विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हुए कहा कि नियमों के तहत ही कार्यवाही चल रही है।   गौरव गोगोई ने शुरू की बहस बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद Gaurav Gogoi ने की। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्तिगत विरोध के कारण नहीं बल्कि संसद की गरिमा और निष्पक्षता बनाए रखने के उद्देश्य से लाया गया है। उन्होंने कहा, “यह प्रस्ताव सदन की गरिमा की रक्षा की जिम्मेदारी के तहत लाया गया है, न कि व्यक्तिगत रूप से स्पीकर के खिलाफ।” गोगोई ने संसदीय कार्य मंत्री Kiren Rijiju पर भी निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि वे अक्सर विपक्षी सांसदों की बातों में बाधा डालते हैं। उन्होंने कहा कि भविष्य में जब संसदीय रिकॉर्ड का अध्ययन होगा तो यह सामने आएगा कि विपक्ष की आवाज़ को सबसे अधिक बाधित किया गया।   रिजिजू ने राहुल गांधी पर साधा निशाना अपने जवाब में Kiren Rijiju ने कांग्रेस नेता Rahul Gandhi पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि यदि कोई खुद को स्पीकर से ऊपर समझता है तो उसका “कोई इलाज नहीं है।” रिजिजू ने कहा कि संसद के नियम स्पष्ट हैं और सदन में बोलने के लिए स्पीकर की अनुमति जरूरी होती है, चाहे वह प्रधानमंत्री हो, मंत्री हो या विपक्ष का नेता।   प्रियंका गांधी का पलटवार इस टिप्पणी पर कांग्रेस नेता Priyanka Gandhi Vadra ने तीखा पलटवार किया। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनता से जुड़े मुद्दों पर सरकार को बेखौफ होकर घेरते हैं और यही बात सत्तारूढ़ दल को असहज करती है। प्रियंका गांधी ने कहा, “पिछले 12 वर्षों में इस देश में केवल एक व्यक्ति है जिसने इनके सामने झुकने से इनकार किया है और वह विपक्ष के नेता हैं। वे जो सच बोलते हैं, उसे ये लोग पचा नहीं पाते।” आज जब गृह मंत्री Amit Shah इस प्रस्ताव पर सदन में अपना पक्ष रखेंगे, तब बहस और अधिक तीखी होने की संभावना है। ऐसे में लोकसभा में राजनीतिक टकराव और हंगामे के आसार बने हुए हैं।  

यौन उत्पीड़न केस में शंकराचार्य को राहत, हाईकोर्ट ने दी अग्रिम जमानत

लखनऊ, एजेंसियां। यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों से घिरे Swami Avimukteshwaranand Saraswati को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलाहबाद हाई कोर्ट  ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार कर ली है, जिससे फिलहाल उनकी गिरफ्तारी पर रोक लग गई है। इसी मामले में उनके शिष्य Swami Mukundanand Giri को भी राहत दी गई है।   फैसला सुरक्षित रखने के बाद सुनाया गया आदेश इस मामले में अदालत ने पहले ही सभी पक्षों की दलीलें सुन ली थीं और 27 फरवरी को फैसला सुरक्षित रख लिया था। विस्तृत सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति जितेंद्र कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने यह फैसला सुनाया। अदालत के इस निर्णय को आरोपियों के लिए बड़ी राहत के तौर पर देखा जा रहा है, हालांकि केस की जांच और आगे की कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।   मीडिया बयान पर भी कोर्ट की रोक हाईकोर्ट ने इस मामले को संवेदनशील मानते हुए एक अहम निर्देश भी दिया है। अदालत ने शिकायतकर्ता और आरोपियों—दोनों पक्षों को मीडिया में बयान देने से रोक दिया है, ताकि जांच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित न हो।   क्या है पूरा मामला? यह मामला नाबालिगों के कथित यौन शोषण से जुड़ा है। आरोप है कि आश्रम से जुड़े कुछ बच्चों के साथ गलत व्यवहार किया गया। शिकायत के आधार पर विशेष POCSO अदालत ने पुलिस को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया था। इसके बाद प्रयागराज के झूंसी थाने में एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई।   जांच जारी, आगे भी होगी सुनवाई फिलहाल, अदालत से मिली अग्रिम जमानत के कारण गिरफ्तारी से राहत जरूर मिली है, लेकिन मामला खत्म नहीं हुआ है। पुलिस और संबंधित एजेंसियां जांच में जुटी हैं और आने वाले समय में इस केस में और भी कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

इच्छामृत्यु के बाद Harish Rana को अंतिम विदाई, पिता की मार्मिक अपील- "रोना मत"

गाजियाबाद/दिल्ली, एजेंसियां। 13 साल से कोमा में रहे 31 वर्षीय हरीश राणा का पार्थिव शरीर बुधवार सुबह 8.30 बजे अंतिम संस्कार के लिए दिल्ली के ग्रीन पार्क श्मशान घाट लाया गया। पिता अशोक राणा ने बेटे को आखिरी बार प्रणाम किया और कहा, “कोई रोए न, बेटा शांति से जाए। उसे भगवान का आशीर्वाद मिले।” थोड़ी देर बाद हरीश का अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें उनके भाई ने मुखाग्नि दी।   क्या है मामला? हरीश 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद क्वाड्रिप्लेजिया और गंभीर लकवे के कारण कोमा में चले गए थे। बीते 13 वर्षों में उनका जीवन केवल लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर निर्भर रहा। 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी, जिससे हरीश की जिंदगी का अंत उनके परिवार की सहमति और मेडिकल बोर्डों की मंजूरी के तहत संभव हुआ।   कैसे हुई  मौत ? एम्स में हरीश को पैसिव यूथेनेशिया के तहत जीवनरक्षक उपकरण और फीडिंग ट्यूब से हटाया गया। परिवार ने हरीश के हार्ट वाल्व और कॉर्निया दान कर दिए। इस प्रक्रिया ने भारत में इच्छामृत्यु के कानूनी मान्यता प्राप्त पहले मामले का उदाहरण पेश किया।अंतिम संस्कार के दौरान माता निर्मला राणा और पिता अशोक राणा भावुक नजर आए। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय और ब्रह्मकुमारी लवली समेत अन्य लोग मौजूद रहे। घाट पर हरीश का पार्थिव शरीर फूलों और उपलों से सजाया गया। पिता ने अंतिम संस्कार के समय सबको संयम रखने और शांति बनाए रखने की अपील की।   सुप्रीम कोर्ट ने क्या  कहा ? सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में इच्छामृत्यु के लिए नियम बनाए थे। इसके तहत या तो मरीज ने लिविंग विल लिखी हो या परिवार/करीबी निर्णय लें। पैसिव यूथेनेशिया में इलाज या लाइफ सपोर्ट रोक दिया जाता है, जबकि एक्टिव यूथेनेशिया भारत में गैरकानूनी है। हरीश राणा का यह मामला न केवल परिवार के साहस का प्रतीक है, बल्कि देश में इच्छामृत्यु के संवैधानिक अधिकार को भी सामने लाता है।

Surbhi

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अमेरिका-ईरान तनाव के बीच ट्रंप से मिले इराकी पीएम अली अल-जैदी, कूटनीतिक संतुलन पर टिकी नजर

पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच इराक के प्रधानमंत्री अली अल-जैदी का अमेरिका दौरा चर्चा का विषय बन गया है। ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के अंतिम संस्कार में शामिल होने के कुछ ही दिनों बाद जैदी ने वाशिंगटन पहुंचकर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से मुलाकात की। विश्लेषकों के अनुसार, यह दौरा ऐसे समय में हुआ है जब अमेरिका और ईरान के बीच तनाव चरम पर है, इसलिए इसे इराक की संतुलित कूटनीति के रूप में देखा जा रहा है। ईरानी दबाव के बावजूद अमेरिका पहुंचे? मीडिया रिपोर्टों में दावा किया गया है कि ईरान ने इराकी प्रधानमंत्री और उनकी टीम से अमेरिका की यात्रा टालने का आग्रह किया था। हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। रिपोर्टों के अनुसार, जैदी ने अपनी पहली आधिकारिक विदेश यात्रा के लिए वाशिंगटन जाने का फैसला बरकरार रखा। कुछ अमेरिकी अधिकारियों ने इसे इराक की स्वतंत्र विदेश नीति और "इराक फर्स्ट" दृष्टिकोण का संकेत बताया है। ट्रंप ने की इराकी प्रधानमंत्री की सराहना ओवल ऑफिस में हुई मुलाकात के दौरान राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अली अल-जैदी का स्वागत करते हुए उनकी प्रशंसा की। दोनों नेताओं के बीच द्विपक्षीय संबंधों, आर्थिक सहयोग और क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर चर्चा हुई। मुलाकात के दौरान ट्रंप ने उनके सम्मान में आधिकारिक लंच का भी आयोजन किया। आर्थिक सहयोग और सुरक्षा पर रही चर्चा रिपोर्टों के अनुसार, इराकी प्रधानमंत्री ने अपनी यात्रा के दौरान ईरान से जुड़े विवादों पर सार्वजनिक टिप्पणी करने से परहेज किया। उन्होंने अमेरिका के साथ आर्थिक संबंधों को मजबूत करने और इराक से अमेरिकी सैनिकों की प्रस्तावित वापसी जैसे मुद्दों पर अधिक ध्यान केंद्रित किया। दोनों देशों के बीच संतुलन बनाए रखना चुनौती इराक लंबे समय से अमेरिका और ईरान दोनों के साथ संबंध बनाए रखने की कोशिश करता रहा है। ऐसे में मौजूदा हालात में बगदाद के लिए दोनों देशों के बीच संतुलन बनाए रखना बड़ी कूटनीतिक चुनौती माना जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका के साथ संवाद बढ़ाने का अर्थ यह नहीं है कि इराक ने ईरान से दूरी बना ली है। फिलहाल इराक दोनों देशों के साथ अपने संबंधों को संतुलित रखने की नीति पर आगे बढ़ता दिखाई दे रहा है।  

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ईरान पर अमेरिका के लगातार छठे दिन हवाई हमले, 4 लोगों की मौत, बंदर अब्बास में बिजली व्यवस्था प्रभावित

अमेरिका ने शुक्रवार को लगातार छठी रात ईरान पर सैन्य कार्रवाई जारी रखी। ताजा हवाई हमलों के बाद दोनों देशों के बीच तनाव और बढ़ गया है। हालांकि, अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि सैन्य कार्रवाई के बावजूद कूटनीतिक बातचीत की संभावना अब भी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) के अनुसार, इस अभियान में ईरान की सैन्य क्षमताओं और उससे जुड़े ठिकानों को निशाना बनाया गया। सेना का कहना है कि कार्रवाई का उद्देश्य ईरान की सैन्य ताकत को और कमजोर करना है। बंदर अब्बास और आसपास के इलाकों को बनाया निशाना ईरान के सरकारी टीवी के अनुसार, अमेरिकी मिसाइलों ने दक्षिणी बंदरगाह शहर बंदर अब्बास और उसके आसपास के क्षेत्रों को निशाना बनाया। यह रणनीतिक शहर होर्मुज जलडमरूमध्य (Hormuz Strait) के पास स्थित है और अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। हमलों में 4 लोगों की मौत, 17 घायल ईरान के सरकारी प्रसारक आईआरआईबी (IRIB) के मुताबिक, अमेरिकी हमलों में कम से कम चार लोगों की मौत हुई है, जबकि 17 लोग घायल हुए हैं। होर्मोजगान प्रांत में तीन लोगों की मौत और नौ लोग घायल हुए। बंदर अब्बास में एक व्यक्ति की जान गई, जबकि आठ अन्य घायल बताए गए हैं। बिजली लाइनें क्षतिग्रस्त, कई इलाकों में ब्लैकआउट ईरान के जनसंपर्क विभाग के प्रमुख होसैन मोगिमी ने बताया कि हमलों में कई बिजली लाइनें क्षतिग्रस्त हो गईं, जिससे दक्षिणी ईरान के कई इलाकों में बिजली आपूर्ति बाधित हो गई। बाद में कुछ क्षेत्रों में बिजली बहाल की गई। प्रशासन ने लोगों से अपील की है कि वे एसी और अन्य अधिक बिजली खपत वाले उपकरणों का सीमित उपयोग करें, ताकि बिजली व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव न पड़े। हवाई अड्डे पर भी हमला सरकारी मीडिया के अनुसार, दक्षिण-पूर्वी प्रांत स्थित ईरानशहर हवाई अड्डे के परिसर में एक मिसाइल गिरने से आग लग गई। इस घटना में एक व्यक्ति घायल हुआ है। हमले के बाद हवाई अड्डे की बिजली आपूर्ति भी ठप हो गई, जिससे संचालन प्रभावित हुआ। बातचीत के संकेत भी बरकरार लगातार सैन्य कार्रवाई के बीच अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि यदि ईरान बातचीत के लिए आगे आता है तो कूटनीतिक समाधान का रास्ता अब भी खुला है। वहीं, क्षेत्र में बढ़ते तनाव पर पूरी दुनिया की नजर बनी हुई है।  

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यूक्रेन के रक्षा मंत्री को हटाने पर बवाल, कीव में हजारों लोगों का प्रदर्शन; ज़ेलेंस्की सरकार पर बढ़ा दबाव

कीव, एजेंसियां। यूक्रेन की राजधानी कीव में रक्षा मंत्री को पद से हटाए जाने के फैसले के खिलाफ हजारों लोग सड़कों पर उतर आए। प्रदर्शनकारियों ने सरकार के फैसले पर सवाल उठाते हुए इसे ऐसे समय का गलत कदम बताया, जब देश रूस के साथ जारी युद्ध का सामना कर रहा है। इस घटनाक्रम के बाद राष्ट्रपति वोलोदिमिर ज़ेलेंस्की की सरकार पर राजनीतिक दबाव और बढ़ गया।   सरकार के फैसले पर उठे सवाल   प्रदर्शन में शामिल लोगों का कहना है कि युद्ध के दौरान रक्षा मंत्रालय में बड़े बदलाव सेना के मनोबल और सैन्य रणनीति पर असर डाल सकते हैं। विपक्षी नेताओं ने भी सरकार से इस फैसले के पीछे की वजह स्पष्ट करने की मांग की है। उनका आरोप है कि सरकार ने इतना बड़ा फैसला बिना पर्याप्त सार्वजनिक जानकारी दिए लिया।   कीव की सड़कों पर उमड़ी भीड़   राजधानी के कई प्रमुख इलाकों में लोगों ने रैलियां निकालीं और सरकार के खिलाफ नारेबाजी की। प्रदर्शन को देखते हुए प्रशासन ने सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी। पुलिस की भारी तैनाती के बीच प्रदर्शन अधिकांश स्थानों पर शांतिपूर्ण रहा, हालांकि कुछ जगह प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच हल्की झड़प की भी खबरें सामने आईं।   ज़ेलेंस्की सरकार पर बढ़ा राजनीतिक दबाव   रक्षा मंत्री की बर्खास्तगी को लेकर देश के राजनीतिक हलकों में भी बहस तेज हो गई है। कई विश्लेषकों का मानना है कि सरकार को अब इस फैसले को लेकर संसद और जनता के सामने स्पष्ट जवाब देना होगा। वहीं, विपक्ष इसे सरकार की कार्यशैली पर सवाल उठाने का बड़ा मुद्दा बना रहा है।   युद्ध के बीच फैसले पर दुनिया की नजर   रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच हुए इस घटनाक्रम पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय की भी नजर है। विशेषज्ञों का मानना है कि रक्षा मंत्रालय में नेतृत्व परिवर्तन का असर यूक्रेन की सैन्य रणनीति और पश्चिमी देशों के साथ रक्षा सहयोग पर भी पड़ सकता है। ऐसे में आने वाले दिनों में सरकार की अगली रणनीति और नए रक्षा मंत्री की नियुक्ति पर सभी की निगाहें टिकी रहेंगी।

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